भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ — पृष्ठ 61–70

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ · पृष्ठ 61–70

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( ४६ ) तथा उसे तण्डु द्वारा प्राप्त करने का आदेश दिया । मुनि ने इस आदेश को सहर्ष स्वीकार किया और तण्डु से ताण्डव की शिक्षा प्राप्त कर उस ताण्डव का पूर्वरंग में समावेश किया, जिसमें माता पार्वती के द्वारा सुकुमार शृगां-रिक लास्य का भी योगदान था । इस नाट्यवेद के प्रभाव हेतु चार नाट्य-वृत्तियों को आविष्कृत कर उन्हें भी नाट्यवेद में श्री विष्णु ने प्रविष्ट कर-वाया । इस प्रकार निर्मित इस दिव्य नाट्यवेद को अवर - रूप में भूतल पर स्थानान्तरित करने का कार्य भी भरतमुनि को ही करना पड़ा जिसकी कथा नाट्यशास्त्र के अन्तिम अध्याय में दी गयी है । नाट्य का भूतल पर अवतरण - इस प्रसंग में नाट्यशास्त्र में दो कथाएं हैं । प्रथम कथा के अनुसार भरत पुत्रों को अपनी कला के ज्ञान पर अभिमान हो गया था जिससे एक बार उन्होंने एक नाट्य प्रदर्शन में मुनियों के चरित्र पर आक्षेप पूर्ण व्यङ्ग प्रस्तुतकर डाला । इसे देखकर क्रुद्ध हो मुनियों ने भरत पुत्रों को शाप दे डाला कि ऐसे नाट्य का नाश हो जाए तथा भरत पुत्र भी शुद्र हो जाएँ । यह सुनकर देवताओं को नाट्य के नाश की चिन्ता हुई और उन्होंने मुनियों से जाकर शाप को क्षमा करने का अनुरोध किया । मुनियों ने अपने दत्त शाप को पूर्णरूप से अन्यथा न होने की बात कहते हुए उसमें यह संशोधन किया कि नाट्यविद्या तो नष्ट नहीं होगी किन्तु भरत पुत्रों को शूद्र अवश्य होना पड़ेगा । इस शाप के चरितार्थ होने के प्रसंग में नाट्यशास्त्र में ही दूसरी कथा और भी दी गयी है । इसके अनुसार जब इन्द्र का पद सम्राट् नहुष को मिला तो स्वर्ग में उन्होंने अप्सराओं से अभिनीत नाट्यप्रयोग को देखकर भूलोक में अपने घर भी वही नाट्यप्रयोग प्रस्तुत करने का देवताओं से अनुरोध किया । देवताओं ने नहुष को समझाया कि यद्यपि अप्सराओं के द्वारा भूतल पर नाट्य संभव नहीं है किन्तु यह कार्य आप भरतपुत्रों को पृथ्वी पर ले जाकर अवश्य सम्पन्न करवा सकते हैं । नहुष ने भरतमुनि से भूतल पर नाट्य प्रस्तुत करने की प्रार्थना की जिसे स्वीकार कर भरत मुनि ने अपने पुत्रों को पृथ्वी पर जाकर नाट्यप्रयोग करने का आदेश देकर समझाया कि इस प्रकार वहाँ • जाने से ऋषिप्रदत्त शाप का भी अन्त ही जायगा । तब भरत पुत्रों ने स्वर्ग से जाकर नहुष के अन्तःपुर में नाट्यप्रयोग प्रस्तुत किये तथा कुछ दिन भूतल पर गृहस्थ भाव में समय व्यतीत कर शाप के अन्त हो जाने पर पुनः स्वर्ग लौट आये । किन्तु वे अपनी सन्तति को इस नाट्य के प्रयोग आदि की शिक्षा दे गये जिससे पृथ्वी पर नाट्य स्थित हो गया । अन्य मत - भारतीय नाट्य के उद्भव और विकास के सम्बद्ध में भार-तीय तथा अन्य विदेशी विद्वानों ने अनेक मान्यतायें प्रस्तुत की हैं । भारतीय विद्वानों के मत में भरत प्रतिपादित नाट्य के अवतर या आधार देव - मूलकता

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( ४७ ) है । इसी को लेकर प्रस्तुत प्रयोगों को आदर्श नाट्य माना या धर्ममूलकता के उद्भव या आधार में वेद या धर्म को स्त्रोत जाता है । अन्य विद्वान् नाट्य रूप से लोकवृत्ति या लोक के संस्कारों का के रूप में अस्वीकार कर मुख्य का मत है कि आधार ही स्वीकारते हैं । योरोप के प्रसिद्ध विद्वान् श्रीकीथ को ऐसे सर्वथा वैदिक साहित्य में नाटक का अभाव था इसलिए देवताओं वैदिक युग के पर-नवीन साहित्य के रूप की ब्रह्मा से प्रार्थना करनी पड़ी जो वर्ती काल के उपयुक्त हो जाए । वर्तमान शती में आलोचक विद्वानों ने भरत प्रोक्त उपर्युक्त दिव्य उत्पत्ति-को एक पौराणिक गाथा से अधिक महत्व न देते हुए नाट्यशास्त्र के नाट्य वाद के वेद से ग्रहण करने के कथन से प्रेरित हो वेदों का गम्भीर अनु-उपादानों निकाला कि नाट्य के मूल तत्वों का वेद के संवाद शीलन करते हुए निष्कर्ष की पद्धति सूक्तों से उद्गम हुआ है । सूक्तों के स्वरूप तथा इनसे नाटयोद्भव ने इन्द्र-में विद्वानों की विभिन्न धारणायें हैं । जर्मन विद्वान् श्री मेक्समूलर इन मरुत् सूक्त के आधार पर इस तथ्य का उद्घाटन किया कि ऋत्विकगण पाठ करते थे । वेद में यही नाट्य का बीज है । प्रोफे-सूक्तों का अभिनयात्मक के इसी मत की पुष्टि करते हुए ऋग्वेद - काल सर सिल्वा लेवी ने मेक्समूलर मत है कि ऋत्विकादि के द्वारा में अभिनय की स्थिति स्वीकार की । उनका देवताओं के रूप ग्रहण कर यज्ञादि के समय नाट्याभिनय अवश्य प्रस्तुत किया जाता होगा । मानकर यह निरूपित किया कि इन गेय डा ० हर्टेल ने इन सूक्तों को गेय एक के अधिक व्यक्ति मिलकर गाते थे । इस प्रकार वक्ताओं की सूक्तों को नाट्याभिनय को प्रेरित किया । प्रो ० बान विभिन्नता हो जाती थी जिसने श्रोडर ने इस क्रम को और आगे बढ़ाते हुए बतलाया कि इन सम्वाद सूक्तों के ) के साथ नृत्य भी होता होगा । क्योंकि मानव - विज्ञान ( एन्थ्रापालाजी गान और नृत्य का अभिन्न सम्बन्ध होता है गेय तथा अभिनेय के अनुसार संगीत जाते हैं जो नाट्य के बीज हैं । डॉ ० विडिश, ओल्डेन दोनों तत्व यहाँ मिल वर्ग तथा पिशेल का अनुमान है कि ये सूक्त पहिले गद्यपद्यात्मक थे । अधिक एवं कण्ठस्थ करने में सरल होने से इनका पद्य भाग बच गया तथा रोचक गया । इसके अतिरिक्त ये आख्यानात्मक भी थे । तथा इन्हीं गद्यभाग नष्ट हो तत्व का नाट्य में मिश्रण हुआ । के अनुसरण पर गद्यपद्य के संवादात्मक तथा शतपथ ब्राह्मण का पुरुरवा - उर्वशी -ऐतरेय ब्राह्मण का शुनःशेप आख्यान रूप हैं । अतः इन्हीं से आख्यान इस प्रकार के अंश के प्रमाण भूत अवशिष्ट नाट्य का उद्भव हुआ है । करते हुए डॉ ० ए ० बी ० कीथ ने उपर्युक्त इन सभी मतों को अस्वीकार कि न तो इनका गायन होता था और न अभिनय ही, क्योंकि गायन बतलाया क्रमशः साम तथा यजुर्वेद के तत्व हैं जिनमें संवाद सूक्तों का और अभिनय

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( ४८ ) सर्वथा अभाव है । श्री कीथ का मत है कि इन सूक्तों की गद्यपद्यात्मकता का जो अनुमान किया गया है वह कल्पना से अधिक महत्वशाली नहीं है । इनका मत है कि नाटक की तात्विक स्थिति वेद में अवश्य विद्यमान है किन्तु यह बीज रूप में है । यह सम्वाद सूक्तों तक सीमित भी नहीं की जा सकती क्योंकि यह स्थिति यज्ञादि की विहित विधियों एवं सामगान में भी देखी जा सकती है । डॉ ० कीथ ने नाट्य की धार्मिक उत्पत्ति की बात करते हुए उसके मूल में मानवीय अन्तःकरण में प्रसुप्त धार्मिक भावना का होना निरूपित किया । इन्होंने आगे बतलाया कि प्राचीनतम नाटकों के नाम तथा कथावस्तु इसके साक्षी हैं, जिससे नाटयोद्गम के धार्मिक सिद्धान्त का असाधारण महत्व स्वतः बन जाता है - जैसे कंसवध, त्रिपुरदाह बलिबन्धन आदि । डॉ ० रिजवे ने नाट्य की विधाओं को देखकर उससे यह निष्कर्ष निकाला कि नाट्य की उत्पत्ति का मूल प्रेरक तत्व वीर - पूजा है जिसके बीज से नाट्य-रूपी वृक्ष का विस्तार हुआ । इनके मत में मूर्ति या प्रशस्तिस्तम्भ के समान किसी वीर पुरुष के साहस या पराक्रम का निदर्शन करते हुए नाटक प्रस्तुत करना भी उसके प्रति आदर भाव प्रदर्शित करना होने से यह भी इसी प्रकार का एक साधन मानना चाहिए । इनके अनुसार यह मत सार्वभौम महत्व का है क्योंकि इसी के अनुसार यूनान में त्रासदी नाटकों का भी आलेखन हुआ था । इन्होंने भारतीय नाट्यसाहित्य एवं काव्य का विवेचन करते हुए यह भी बतलाया कि राम तथा कृष्ण को आधार मानकर बनायी गयी नाट्य - रच-नाओं, यात्राओं एवं उत्सवों को करने की प्रवृत्ति के पीछे भी मृत वीर पुरुषों के प्रति आदर भाव प्रकट करने की भावना ही मूल रूप में निहित है । श्री ए ० बी ० कीथ तथा अन्य विद्वानों ने उपर्युक्त मत के प्रति अनिच्छा प्रकट करते हुए इनका खण्डन किया । इनका तर्क है कि जब संस्कृत के अनेक नाटक नाटकों में वीर रस ही नहीं पाया जाता है तब उन्हें वीर - पूजात्मक नाटक कैसे माना जा सकता है और संस्कृत नाटक की किसी प्रस्तावना में भी इस बात का उल्लेख नहीं मिलता कि नाटक की रचना किसी वीर पुरुष के प्रति आदर या स्मृति में की गयी है । किन्तु इसके विपरीत राजाओं तथा राजसभासदों एवं प्रजाजन के मनोरंजनार्थ ही नाटक के ग्रथन करने की बातें मिलती हैं । अतएव मृत बीर - पुरुषों के प्रति आदर भाव प्रकट करने या धार्मिक-उत्सवों के अवसर के कारण नाट्य के उद्गम की कल्पना उचित नहीं है । सुप्रसिद्ध जर्मन विद्वान् डॉ ० पिशेल ने भारतीय नाट्य की उत्पत्ति पुत्त-लिकानृत्य से मानी । उन्होंने अपने मत को विस्तार से प्रतिपादित करते हुए बतलाया कि भारत ही वह मूल स्थान है जहाँ से पुत्तलिका नृत्य प्रचलित

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( ४६ ) होकर यूनान आदि देशों में पहुँचते हुए सर्वत्र व्याप्त हो गया था । संस्कृत • साहित्य में पुत्तलिका के प्राचीनतम विवरण भी मिलते हैं । जैसे: - महा-भारत में राजकुमारी उत्तरा तथा उसकी सखियों ने अर्जुन से पुत्तलिका लाने की प्रार्थना की थी । कथा सरित् - सागर में यन्त्रचालित पुत्तकालिकाओं का वर्णन मिलता है । मय दानव की पुत्री सोमप्रभा ने अपनी सखी राजकुमारी कलिंगसेना को पुत्तलिका की एक पिटारी भेंट की थी । पुत्तलिकानृत्य में एक सूत्रधार होता है जो सूत्र की डोरी के सहारे पुत्तलिकाओं को नचाकर प्रद-र्शन करता है । प्रो ० पिशेल ने भारतीय नाटक में सूत्रधार के अभिधान को इस क्रम में जोड़ते हुए कहा कि इन पुत्तलिकाओं को नचाते हुए उनके डोरों को पीछे से पकड़े रहने के कारण ही सर्वप्रथम इसका नाम सूत्रधार हो गया होगा । जो बाद में नाटक के प्रयोक्ता के लिये मान लिया गया । इसके अति-रिक्त नाट्य का स्थापक शब्द भी इस बात का संकेत करता है कि पुत्तलियों को लाकर मंच पर व्यवस्थित रखने का कार्य स्थापक का होता है तथा उसके इसी भाव को ध्यान में रखकर इस शब्द का प्रयोग स्थापक के लिये प्राचीनकाल में किया गया होगा । अतः नाटकों का आरम्भ पुत्तलिका नृत्य से मानना उचित है । डॉ ० रिजेवे ने पुत्तलिका नृत्य से नाटयोद्गम के डॉ ० पिशेल के उपर्युक्त मत का खण्डन कर उसे भ्रमात्मक बतलाया । इनने यह विस्तार से बतलाया कि सूत्रधार तथा स्थापक शब्द का सम्बन्ध पुत्तलिका नृत्य से नहीं जोड़ा जा सकता है क्योंकि सूत्रधार नाटक की कथावस्तु आदि का संक्षेप में वर्णन करता है तथा इसी कारण इसकी संज्ञा भी सूत्रधार है, यह किसी डोरी को धारण करने के कारण नहीं है । पुत्तलिका नचाने वाले के लिए सूत्रधार शब्द का प्रयोग बहुत बाद की कल्पना है ( सम्भवतः ईसवी नवीं शती की ) जब कि नाटकों में सूत्रधार शब्द का प्रयोग निश्चित रूप से ईसवी पूर्व का है । इससे सिद्ध है कि जब पुत्तलिका नृत्य ही नाटकों की नकल है तो इससे नाटयोद्गम की कल्पना कैसे की जा सकती है । इस सन्दर्भ में डॉ पिशेल ने एक दूसरा मत भी रखा है वह है — छाया-नाटक से नाट्य की उत्पत्ति । डॉ ० स्टेनकोनों ने इनके इस मत का बड़े जोरों से समर्थन भी किया । संस्कृत में कुछ छायानाटक प्राप्त होते हैं । जिनमें दीपक की सहायता से छाया द्वारा नाटक दिखलाया जाता है । यह छायामात्र सामा-जिक या दर्शक देखता है जो अभिनेताओं की या पुत्तलिकाओं की होती है । सुभट कवि के दूतांगद आदि कुछ नाटक छायानाटक के रूप में अद्यावधि प्राप्य हैं तथा जिनके विवरण मिलते हैं ये संख्या में इतने कम और परवर्ती नाटक हैं कि इनके आधार पर भारतीय नाटकों का उद्गम छायानाटकों से मानना उचित नहीं प्रतीत होता । दूसरे यह भी इस सन्दर्भ में विचारणीय है कि संस्कृत

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( ५० ) के किसी प्राचीन ग्रंथ से लेकर मध्य या उत्तरकालीन किसी भी नाट्यशास्त्रीय ग्रन्थ में छायानाटक के स्वरूप की प्राप्ति तक नहीं है । अतएव इस आधार पर नाटकों का उद्गम छायानाटक से मानना नितान्त अनुचित ही होगा । नाट्यशास्त्र में वर्णित इन्द्रध्वजमहोत्सव के अवसर पर सर्वप्रथम नाट्या-भिनय का आधार लेकर तथा नेपाल में इन्द्रध्वज महोत्सव के आज भी प्रव-तित रहने को देखकर कुछ विदेशी विद्वानों ने इन्द्रध्वज महोत्सव से संस्कृत-नाट्य के उद्गम की कल्पना की । उनने इसके अनुरूप एक समान प्रसंग ढूंढ निकाला जो मेपोल डान्स है । यूरोप में मई मास में एक सामूहिक महोत्सव मनाया जाता है, जिसमें किसी एक युवती को पुष्पों से सजाकर मई की बनाया जाता है । इस मई मास का प्रतिरूप प्रतीक एक बाँस होता है, रानी कर सभी इसके चारों ओर परिक्रमा करते हुए नाचते हैं । इसमें जिसे अलंकृत जर्जर का प्रतीक । अत एव इन्द्रध्वज महोत्सव से नाट्य बाँस नाट्यशास्त्रोक्त का उद्गम हुआ है । किन्तु यह मत भी अधिक नहीं टिकता । क्योंकि यूनान के मेपोल डान्स से एक तो समता का टिकना भी कल्पित आधारों के कारण अशक्य है, दूसरे शुभकार्य या उत्सवों पर नाटक खेलने या नृत्य करवाने का आशय यह नहीं होता कि इनसे ही नाट्य की उत्पत्ति भी मान ली जाए । डॉ ० ए ० बी ० कीथ वे पातंजल - महाभाष्य में कंसवध तथा बलिबन्धन के उल्लेख को लेकर बतलाया कि ये इस बात का संकेत करते हैं कि ऋतुओं ( आदि ) के प्राकृतिक परिवर्तनों को मूर्तरूप में दिखलाने की प्रतीक भावना से नाट्य का उद्गम हुआ होगा । कंसवध में कंस के सहचरों का कदाचित् का नेपथ्य बनाने और कृष्ण के अनुयायियों को रक्तमुखों में रखने का कालेमुख है वसन्त की हेमन्त पर विजय, जिसके प्रतीक ये दीनों वर्ण हैं । इसके आशय • अतिरिक्त कृष्ण की कंस पर विजय भी उद्भिज्ज जगत् के अन्दर अपनी स्वतन्त्र चेष्टा प्रदर्शित करने वाली जीवनी शक्ति की विजय का प्रतीक है । कीथ की यह कल्पना बड़ी दूरारूढ़ है, जिसे मुश्किल से स्वीकारा जा सकता है । यह केवल एक कल्पना मात्र होने पर उत्कृष्ट मानी जा सकती है, किन्तु ऐसी कल्पना नाट्य के उद्गम में अधिक सहायक नहीं हो सकती । डॉ ० मेकडानल ने नाट्य के उद्गम को इसकी प्रारम्भिक अवस्था नृत्त से माना । इसी तथ्य का श्री डी ० आर ० मांकड़ ने अपनी सुप्रसिद्ध पुस्तक The Types of Sanskrit Drama ( दि टाइप्स ऑफ संस्कृत ड्रामा ) में भी समर्थन किया तथा इसके लिये प्रमाण और विकास क्रम की प्रक्रिया भी बत-लाई । इन्होने यह बतलाने का प्रयत्न किया कि नृत्त से नृत्य होकर किस प्रकार नाट्यरूप में इसका परिणमन हुआ, जो असंख्य दिनों के विकास की कहानी है । इनके मत में ताल लयाश्रित नृत्त की दूसरी अवस्था है भावाश्रित

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( ५१ ) नृत्य । इसी कारण दोनों के कार्यकलाप में अधिक साम्य भी दृष्टिगत होता है, जो इनके एक से दूसरे के उद्भुत होने का कारण है । नृत्त और नृत्य के मिश्रित रूप से नाट्य का उद्भव हुआ जो क्रमशः एक पात्र के एक भाव की रसात्मक प्रस्तुति को एक अंक में रखने से लेकर फिर अनेक पात्रों द्वारा अनेक भावों की अनेक रसात्मक प्रस्तुतियों तक को अनेक अंकों द्वारा रखकर किया गया है । इस प्रणाली के द्वारा नृत्त से नाट्य का विकास हुआ । नाट्य के भेदों में क्रमशः इस विकास का क्रम रूपकों के भाण, प्रहसन, ईहामृग जैसे प्रभेदों से होकर नाटक और सबके बाद प्रकरण में जाकर पूर्ण हो जाता है । इस प्रकार नाट्योत्पत्ति के ये विभिन्न मत हैं । हमने पूर्व में ही निर्देशित किया है कि पाणिनि की अष्टाध्यायी के समकालीन नाट्य ही नहीं नाट्यशास्त्र के विधायक - ग्रन्थ भी विद्यमान थे । यदि ईसा पूर्व पाँचवीं शती में रसप्रधान नाट्य तथा संगीत कला न होती तो कौटिल्य अपने सुप्रसिद्ध ग्रन्थ अर्थशास्त्र में नाट्यप्रयोग के लिये उपयोगी रंगोपजीवी पुरुष तथा रंगोपजीवी गणिकाओं का गीतवाद्य नाट्य, नृत्त और नृत्य जैसे शब्दों के पारिभाषिक अर्थों के साथ उल्लेख न करता । फिर भी नाट्योद्भव के ठीक समय और इसकी उत्पत्ति के कारणों की कल्पना दुरूह है किन्तु इसका अनुमानित काल ईसा की ही छठी शती के पूर्व ही समीप कहीं रखना पड़ेगा । इसका कारण यह है कि उस काल में निर्मित नाटकों का नाट्याचार्यों द्वारा अपनी नाट्य मंडली द्वारा अवश्य प्रयोग होता होगा जिसके आधार पर ही लक्षण - ग्रन्थों का ग्रथन संभव होता है । यह बात दूसरी है कि कालप्रवाह के कारण उनकी रक्षा सम्भव न हुई और वे आज हम तक नहीं पहुँच पा रहे हैं । फिर भी इस विशाल नाट्य-साहित्य के उद्गम का श्रेय भारत के नाटयशास्त्रीय सिद्धान्त - ग्रंथों को ही है यह निश्चित है । और तब ऐसे पथप्रदर्शक ग्रन्थ को हम नाटयशास्त्र ही पाते हैं जिसमें नाटयोद्गम का एक व्यवस्थित परम्परागत प्रतिपादन है जिसे किसी भी प्रतीक से हृदयंगम उचित ही है । इस नाटय का स्वरूप क्या है उसका उत्तर भी भरत के ' त्रैलोक्यस्यास्य सर्वस्व नाट्यं भावानुकीर्तनम् ' वचन से हो जाता है ( पाठक इस पर अभि-नवगुप्त के विवेचन की अतिरिक्त टिप्पणियों में देखें; विस्तार भय से यहाँ हम उसे नहीं दोहराना चाहते हैं ) जिसका संक्षेप में यही आशय है कि नाट्य भावानुकरण नहीं है । अब जब यह अनुकरण नहीं है तो इसमें समीक्षकों के इस कथन के लिये भी स्थान नहीं रहेगा कि ' नाट्य ' सभी अवस्थाओं में गीत-वाद्य - युक्त होने से एक विशेष प्रकार का अनुकरण ही है । ' [ इसका स्वरूप अतिविशद तथा विवेचन सापेक्ष है, जिसका विवरण हमने टिप्पणियों में स्थान स्थान पर दे दिया है । एतदर्थं नाटयशास्त्र के श्लोक १।१०७, १।११६ तथा १।११ पर अभिनव टिप्पणियां देखना चाहिए । यहाँ तक नाट्यशास्त्र के प्रथम अध्याय की चर्चा है ]

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( ५२ ) नाट्यमण्डप - नाटयशास्त्र के द्वितीय अध्याय में नाट्य की प्राथमिक आवश्यकता के कारण नाट्यगृह की निर्माण - विधि विस्तार से दिखलाई गयी है । विश्वकर्मा ने नाटयमण्डप के तीन प्रकार के सन्निवेशों तथा उनका विधान बतलाया । इनमें विकृष्ट नाट्यगृह आयताकार, चतुरस्र नाट्यगृह वर्गाकार तथा त्र्यस्त्र नाट्यगृह त्रिभुजाकार होता है । विकृष्ट को कुछ लोग मण्डलाकार भी मानते हैं किन्तु यह विवरण नाट्यशास्त्र के अनुसार न रहने से मान्य नहीं है । इनमें प्रमाण की दृष्टि से फिर नाटयमण्डप के ओर भी भेद किये गये हैं । जो ज्येष्ठ, मध्यम और कनीयस् रूप में बनते हैं । ज्येष्ठ या विकृष्ट मण्डप देवों के लिये; मध्यम या चतुरस्र मनुष्यों के लिये उपयोगी होता है । ज्येष्ठ नाट्य-मण्डप के विशाल रहने से पात्रों के द्वारा उच्चारित पाठ्यांश दर्शकों को श्राव्य नहीं होता है और न ही उनकी भावपूर्व शरीराभिनय की मुद्राएँ दृश्य हो पाती हैं; अतएव मध्यम नाट्यगृह ही अधिक उपयोगी होता है । इसी प्रकार अवर या व्यत्र नाट्यगृह सामान्य जनता के लिए उपयोगी होता है । विकृष्ट नाट्य-गृह का प्रमाण १०८ हाथ या दण्ड का, चतुरस्र का प्रमाण ६४ हाथ या दण्ड का तथा त्र्यत्र का प्रमाण ३२ दण्ड या हाथ का होता है । ( इनके इस प्रकार १८ भेद बनते हैं जिनके विवरण तथा मान्यताओं को यथास्थान पाद - टिप्पणियों तथा अतिरिक्त टिप्पणियों में विस्तार से निर्देशित किया गया है । ) विकृष्ट नाट्यगृह — सभी प्रकार के नाटयगृहों के निर्माण के पूर्व उचित भूमि का चयन करना चाहिए । इसके उपरान्त भूमि का शोधन स्वस्थ बैलों द्वारा हल चलाकर करते हुए अस्थि, कील आदि अशुद्ध पदार्थों को भूमि से निकाल देना चहिए । इसके बाद उजले दृढ़ - सूत्र से भूमि का माप करना चाहिए तथा इस समय पर्याप्त सतर्कता बरतनी चाहिए, जिससे न तो सूत्र हाथ से छूटने पाये और न ही टूटने पावे अन्यथा किसी अमंगल के होने की आशंका रहती है । मध्यम विकृष्ट मण्डप की विधि यह है कि चौंसठ हाथ लम्बी तथा बत्तीस हाथ चौड़ीं लम्बाई का क्षेत्र लेकर फिर डोरी से उसके दो भाग कर लें । इन दो भागों को फिर और दो भागों में बाटें जिसमें से एक भाग पर रङ्गपीठ तथा रंगशीर्ष की तथा दूसरे ( बाद वाले ) भाग पर नेपथ्य गृह की रचना करे । ( रंगशीर्ष तथा रंगपीठ के विशेष विवरण परिशिष्ट - १ सम्बन्धित अंश की टिप्पणियाँ २।३७-३८ पर इसके विस्तार हेतु देखना चाहिए ) । निवेशन - इस प्रकार हो चुकने पर इसके निवेशन या नींव रखने की विधि सम्पन्न करना चाहिए तथा इस समय उत्सव मनाते हुए मंगलवाद्यों ( शंख, दुन्दुभि, पणव आदि ) का निर्घोष करना चाहिए । क्योंकि पवित्र ध्वनियों से आकाश परिष्कृत एवं विशुद्ध हो जाता है और अनिष्ट की आशंका

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( ५३ ) निर्मूल हो जाती है । इस समय यहाँ पाखंडी, सन्यासी तथा विकलांग व्यक्तियों को नहीं आने देना चाहिए तथा रात्रि में दिशाओं में बलि दी जाए जो उनके अनेक देवता के मन्त्र तथा बलि पदार्थ के अनुरूप विधिवत् सम्पन्न की जाती हो । इस प्रकार बड़े मनोयोग से नींव रखने या शिलान्यास का समारोह सम्पन्न करना चाहिए । भित्तिकर्म एवं स्तम्भारोपण - नींव की स्थापना के बाद मण्डप निर्माण कार्य का आरम्भ करते हुए दीवारों को उठवाना आरम्भ किया जाय तथा दीवारों को उठाने के साथ - साथ स्तम्भारोपण करना चाहिए । यह कार्य भी उत्वव मनाते हुए शुभ वेला में रखना उत्तम होता है । विविध पूजाद्रव्यों से स्तम्भों की पूजा कर पुष्पमालाओं से स्तम्भों को सजाना चाहिए तथा इनके मूल या जड़ों में स्वर्ण आदि धातुओं को निर्देशानुसार छोड़ना चाहिए । ये स्तम्भ प्रेक्षकों के विवेशन के अतिरिक्त अन्य स्थान जैसे रंगपीठ, नेपथ्य तथा मत्तवारणी में लगाये जाते हैं । ( इनका विवरण २६३-६६ की अतिरिक्त टिप्पणियों में विस्तार से दिया गया है ) । मत्तवारणी - स्तम्भारोपण के उपरान्त मत्तवारणी का निर्माण किया जाता है । रंगपीठ की दोनों बाजू में इसका निर्माण किया जाता है । इसकी ऊँचाई रंणपीठ से ऊँची और डेढ़ हाथ प्रमाण की रखना चाहिए । मत्तवारणी बरामदे की आकार की होती थी तथा रंगपीठ या मश्च के दोनों बाजू में रहती थी । ( मत्तवारणी के विषय में विस्तार से सभी विवेचक विद्वानों के आशय ना ० शा ० अ ० २।६७ की अतिरिक्त टिप्पणियों ( पृष्ठ ४६५ ) पर दे दिया गया है ) । मत्तवारणी की रचना समाप्ति पर भी पूर्ववत् उत्सव मनाना चाहिए । रंगपीठ - इसके उपरान्त रंगपीठ की रचना की जाए तथा रंगपीठ के पिछले भाग में नेपथ्यगृह का निर्माण करना चाहिए जो रंगपीठ से अपेक्षाकृत ऊँचा रहे । इससे होकर नेपथ्य गृह में जाने के लिये दो द्वार रखे जाएं जिनसे पात्र प्रवेश और निष्क्रमण करें । इसे ऊँचा करके वेदिका निमाणार्थ काली मिट्टी का प्रयोग किया जाए । श्वेत वर्ण के बैलों से जुताई कर मिट्टी के कंकड़ - पत्थर साफ करने के बाद उस वेदिका का भराव करना चाहिए । मिट्टी ढोने वाले श्रमिक भी विकलांग न हो इसका ध्यान रखा जाए रंगपीठ बीच में ऊँचा तथा चारों ओर नीचा रहे, जो कछुए की पीठ के आकार का नहीं हो और नहीं वह मछली की पीठ जैसा एक ओर ऊँचा और दूसरी ओर से नीचा रहना चाहिए । इस विशुद्ध दर्पण की सतह के जैसा सम-तल ही बनाया जाए । रङ्गपीठ के एक भाग में रङ्गशीर्ष रखना चाहिए । ( रङ्ग-पीठ तथा रङ्गशीर्ष का विवेचन अतिरिक्त टिप्पणियाँ पृष्ठ ४६४ पर दृव्य ) ५ प्रस्ता ० ना ० शा ० प्र ०

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( ५४ ) दारुकर्म - नाटयगृह की रचना में लकड़ी की कारीगरी भी सुन्दर ढंग सें रहनी चाहिए । इसे दारुकर्म कहते हैं । तदनुसार इसके सभी स्तम्भ, द्वार और वातायन ( खिड़कियाँ ) विविध शिल्पकला से पूर्ण होना चाहिए । इसमें स्थान - स्थान पर चौके बने हुए रहने चाहिए । हाथियों या सर्पों की आकृतियाँ उकेरी हुई रखना चाहिए तथा काष्ठ की पुतलिकाओं से चतुर्दिक सुशोभित करते हुए नाट्यगृह को अलंकृत करना चाहिए । आशय यह कि दारुकर्म विविध प्रकार की कारीगरी से युक्त होना चाहिए । नागृह की रचना करते समय एक बात का ध्यान अवश्य रहे कि कोई स्तम्भ, खिड़की द्वार या नागदन्त ( खूंटी ) किसी के सामने न आने पावे क्यों-कि ऐसा रहने पर इसकी सजावट ( या अलंकरण ) में शोभाहीनता आ जाएगी । ( दारुकर्म के प्रसङ्ग में अनेक शास्त्रीय शब्दों का प्रयोग हुआ है जिनका विवरण अध्याय २।७३-७७ पर तथा अतिरिक्त टिप्पणियों में देखना चाहिए ) । मण्डप – यह नाट्यमण्डप द्विभूमि बनाया जाता है । इस मण्डप में छोटे-छोटे वातायन या खिड़कियाँ भी रखना चाहिए । जिससे वायु का प्रवेश कम हो और शब्द गम्भीर रूप में सुनाई दे सके तथा वाद्य संगीत के सूक्ष्मतम वादनादि क्रिया - कलापों को आसानी से सुना जा सके । ( द्वि - भूमि नाट्यमण्डप पर टिप्पणी ना ० शा ० अ ० २२८५, ८६ पर ( दोनों स्थानों पर द्रष्टव्य ) नाट्यमण्डप की दीवारों की अच्छी तरह लिपाई पुताई करने के बाद उन्हें चमकदार बनाया जाए और उन पर सुन्दर अंकित करवाये जाए । इनमें अधिकतर पुरुष और स्त्रियों के शृङ्गार प्रसाधन एवं ललितभाव से युक्त चित्र हों या फिर लता - वृक्ष, गुल्म, पर्वत, नदी आदि के सुन्दर चित्र अंकित किये जाँए । इन चित्रों में विलास एवं क्रीडाओं का भी अंकन किया जा सकता हैं । नाट्यमण्डप में कितने द्वार रहते हैं इस विषय में भी मर्तक्य नहीं है । कुछ आचार्य नाट्यमण्डप में चार द्वार रखने तथा अन्य आचार्य छः द्वार रखने का विधान मानते हैं । मध्यम विकृष्ट नाट्यमण्डप का यही स्वरूप है । - चतुरस्र नाट्यमण्डप को लम्बाई और चौड़ाई चतुरस्रनाट्यमण्डप ( ३२ = ३२ ) ३२-३२ हाथ की रहने से यह वर्गाकार नाट्यमण्डप कहलाता है । इसके निर्माण में वही सब कार्य होते हैं जो विकृष्ट के स्वरूपवर्णन के प्रसंग में पूर्व में बतलाये गये हैं । इसकी दीवारें ईंटों से निर्माण की जाँय । इसमें दस स्तम्भ रखना चाहिए । विकृष्ट की अपेक्षा छोटा मण्डप होने से इसमें प्रेक्षकों को बैठने के लिये सीढ़ीनुमा बैठक का निर्माण किया जाए जिसे लकड़ी और ईंट से बनाया जाए । ये सीढ़ियाँ धरातल से एक हाथ ऊपर उठते हुए इतनी ऊँचाई तक चली जांए जहाँ से रंगपीठ ( सीधा ) दिखलाई दे सकता हो ।

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भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १, पृष्ठ 70 का मूल पृष्ठ
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( ५५ ) विकृष्ट के समान ही यहाँ रङ्गपीठ तथा रङ्गशीर्ष की भी रचना की जाए तथा इसमें नेपथ्यगृह की ओर जाने के लिये एक ही द्वार रखा जाए तथा एक द्वार सामने के मण्डप में हो जिससे सामान्य दर्शक प्रवेश करे । इसका रङ्गपीठ आठ हाथ के प्रमाण का होता है तथा दोनों बाजू में मत्तवारणी चार-चार स्तम्भों की रहती है । इसका धरातल आदर्श - तल के समान समतल होता है तथा वेदिका भी समतल ही । जबकि निकृष्ट में वेदिका से इस धरातल को ऊंचा रखा जाता । चतुरस्र - नाट्घमण्डप का यही स्वरूप है । त्र्यस्त्र नाट्यमण्डप - त्र्यत्र संज्ञक नाटयमण्डप का आकार त्रिभुज जैसा रखा जाता है तथा इसके मध्यभाग में जिस रङ्गपीठ की रचना होती है वह भी त्रिभुज ही रहता है । इसका एक द्वार कोने में निकला हुआ रखा जाता तथा दूसरा द्वार रंगपीठ के पिछली और रखते हैं । इनमें पहला द्वार सामान्य जन के प्रवेश के लिये और दूसरा द्वार अभिनेताओं के प्रवेश के लिये होता है । चतुरस्र में अभिहित विधि के अनुसार ही इसमें भी दीवारों का निर्माण किया जाता है और इसी प्रकार स्तम्भ भी लगाये जाते हैं । शेष कार्य विकृष्ट नाट्यगृह के समान व्यस नाट्यगृह में भी होता है । व्यस्त्र नाट्यमण्डप का यही स्वरूप है । नाट्यमण्डपों का नाट्यशास्त्र में इस प्रकार विवरण है । इस विषय में कुछ विवेचकगण प्रश्न करते हैं कि ये सभी नाट्यमण्डप खुले रखे जाते थे या इन पर छत का निर्माण होता था? इस आशंका का नाट्यमण्डप के विवरणों को ध्यान से पढ़ने पर स्थान ही नहीं रहता, क्योंकि जब नाट्यमण्डप अन्दर स्तम्भों के स्थापन की विधि बतलाई है तो बिना छत के इन स्तम्भों का स्थापन व्यर्थ हो जाता है । दूसरे जब मण्डप को धारण करने वाले स्तम्भों को स्थापित करने की बात मुनि ने कही तो इसका आशय भी नाट्यमण्डप में छत के रखने से ही है । तीसरे यदि नाट्यमण्डप खुला हो तो वह निवात या गूँजने की स्थिति वाला हो ही नहीं सकेगा । यह भी नाट्यमण्डप में छत के निर्माण का ही समर्थन करती है तथा अन्तिम बात यह कि बिना छत के कोई स्थापत्य निर्माण ही नहीं होता । अतएव सिद्ध है कि नाट्यमण्डप की छत बनायी जाती थी । [ नाट्यमण्डपों से सम्बन्धित अन्य विषयों का तथा कक्ष्याविभाग आदि का विवरण द्वितीय भाग में अध्याय क्रम से प्रस्तुत किया जाएगा जिसे पाठक नाट्यशास्त्र के द्वितीय खण्ड में अवलोकन करें ] यद्यपि नाट्यशास्त्र के द्वितीय अध्याय में नाट्यमण्डपों के इन विवरणों को भरतमुनि ने बड़ी स्पष्टता से प्रतिपादित किया है फिर भी समय की दूरी तथा अपेक्षाओं के विपरिवर्तित होने से इसकी व्याख्या में कालान्तर में विचार-• भिन्नता आ गयी थी ( इस सन्दर्भ के सभी व्याख्येय अंशों की मीमांसा हमने यथास्थान टिप्पणियों में कर दी है । अतएव भूमिका में इन विषयों पर फिर