भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ — पृष्ठ 1–10
भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ · पृष्ठ 1–10
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श्री काशी संस्कृत ग्रन्थमाला २१५ श्रीभरतमुनिप्रणीतं सचित्रम् नाट्य शास्त्र म् ' प्रदीप ' हिन्दीव्याख्या - टिप्पणी - परिशिष्ट - प्रस्ता-वनादिभिर्विभूषितम् श्री बाबूलाल शुक्ल शास्त्री ( सप्तमाध्यायान्तः भागः ) एरा सरस्वती मा संस्कृत 19 संस्थान चौरवम्भा संस्कृत संस्थान भारतीय सांस्कृतिक साहित्य के प्रकाशक तथा विक्रेता पो ० आ ० चौखम्भा, पो ० बा ० नं ० १३ ९ जड़ाव भवन के. ३७/११६, गोपाल मन्दिर लेन वाराणसी ( भारत )
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श्रीभरतमुनिप्रणीतं सचित्रम् नाट्यशास्त्रम् ( अष्टमाध्यायादारभ्य एकोनविंशत्यध्यायान्तो द्वितीयो भागः )
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1 | ft: 11 काशी संस्कृत ग्रन्थमाला २१५ श्रीभरतमुनिप्रणीतं सचित्रम् नाट्य शास्त्र म् ' प्रदीप ' हिन्दीव्याख्या - टिप्पणी - परिशिष्ट-प्रस्तावनादिभिर्विभूषितम ( अष्टमाध्यायादारभ्य एकोनविंशत्यध्यायान्तो द्वितीयो भागः ) सम्पादक एवं व्याख्याकार श्री बाबूलाल शुक्ल शास्त्री एम ० ए ०, साहित्याचार्य प्रभृति प्राध्यापक - स्नातकोत्तर संस्कृत - अध्यापन एवं संशोध शासकीय कला एवं वाणिज्य स्नातकोत्तर महाविद्यालय इन्दौर ( म ० प्र ० ) सरस्वती * संस्कृत वारा , संस्थाम चौरवम्भा संस्कृत संस्थान भारतीय सांस्कृतिक साहित्य के प्रकाशक तथा विक्रेता पो ० आ ० चौखम्भा, पो ० बा ० नं ० १३६ जड़ाव भवन, के. ३७/११६, गोपाल मन्दिर लेन वाराणसी ( भारत )
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प्रकाशक: चौखम्भा संस्कृत संस्थान, वाराणसी मुद्रक: विद्याविलास प्रेस, वाराणसी संस्करण: प्रथम, वि ० संवत् २०३५ मूल्य: रु ० 16-00 पूर्ण हमारे प्रकाशनों की एकमात्र वितरक संस्था चौखम्भा ओरियन्दालिया प्राच्यविद्या एवं दुर्लभ ग्रन्थों के प्रकाशक तथा विक्रेता पो ० आ ० चौखम्भा, पो ० बाक्स नं ० ३२ गोकुल भवन के. ३७ / १० ९, गोपाल मन्दिर लेन वाराणसी - २२१००१ ( भारत ) टेलीफोन: ६३०२२ टेलीग्राम: गोकुलोत्सव शाखा - बंगलो रोड, ९ यू ० बी ० जवाहर नगर दिल्ली- ११०००७ प्रधान शाखा चौखम्भा विश्वभारती पो ० बाक्स नं ० १३६ चौक ( चित्रा सिनेमा के सामने ) वाराणसी फोन: ६५४४४
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THE KASHI SANSKRIT SERIES 215 ***** NATYA SASTRA OF BHARAT MUNI Critically edited with Pradipa Hindi Commentary, Various readings, Introduction, Preface, Index and Critical notes By Prof. BABU LALA ŠUKLA, SASTRI M. A., SahityIcIrya Professor, Postgraduate Teaching and Research in Sanskrit, Government Arts and Commerce Postgraduate College, Indore ( M. P. ) CHAUKHAMBHA SANSKRIT SANSTHAN Publisher and Seller of Oriental Cultural Literature P. O. Chaukhambha, P. Box No. 139 Jadau Bhawan K. 37/116, Gopal Mandir Lane VARANASI ( INDIA )
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Also Can be had of CHAUKHAMBHA VISVABHARATI Post Box No. 139 Chowk ( Opposite Chitra Cinema ) VARANASI - 221001 Phone: 65444 Chaukhambha Sanskrit Sansthan, Varanasi First Edition 1978 Price: Rs. 40-00 Sole Distributors: -CHAUKHAMBHA ORIENTALIA A House of Oriental and Antiquarian Books P. O. Chaukhambha, Post Box No. 32 Gokul Bhawan, K. 37/109, Gopal Mandir Lane VARANASI - 221001 ( India ) Branch - Bungalow Road, 9 U. B. Jawahar Nagar, DEL41-110007 ( India ) Telephone: 63022 Telegram: Gokulotsav
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पुरोवाक् " नाट्यशास्त्र " के प्रदीपव्याख्यादि के साथ मण्डित द्वितीय भाग को - प्रस्तुत क्रम में प्रकाशित कर सुधीजन के सम्मुख रखते हुए आज प्रसन्नता और सन्तोष है । यह द्वितीय भाग भी प्रथम भाग के प्रकाशित होने के पाँच वर्ष पश्चात् प्रस्तुत हो सका । इन पाँच वर्षों के अन्तराल में परि-स्थितिवश अनेक ऐसे परिवर्तन लेखक तथा प्रकाशक के यहाँ घटित हुए जिनने इस ग्रन्थ को यथासमय प्रस्तुत न होने दिया । इतना प्रत्यूहव्यूह भेदन होने पर यह द्वितीय भाग अब सुधीजन की सेवा में प्रस्तुत हो रहा है । अतः इसका भी प्रथम भाग की तरह ही स्वागत होगा, यह पूर्ण विश्वास है । इसी के साथ यह भी आशा है कि अब तृतीय तथा चतुर्थ भाग में प्रकाशनगत विलम्ब अधिक मात्रा में नहीं होगा तथा इसमें शेष भाग यथासमय प्रकाशित हो जाएँगे ( क्योंकि इनका मुद्रण भी प्रगति पर है तथा शीघ्र ही पूर्ण हो जायगा ) । नाट्यशास्त्र के इस भाग भी प्रथमखण्ड की तरह प्रस्तावना में इसी भाग से सम्बद्ध विषयों की विवेचना रखी गयी है जिससे नाट्य जैसे विस्तीर्ण एवं व्यापक शास्त्र के अध्ययन में सहायता मिलेगी । परिशिष्ट १ में विस्तीर्ण व्याख्यात्मक टिप्पणियाँ पूर्व खण्ड की तरह रखी गयी हैं । तथा छन्दों के एक प्रक्षिप्त भाग को भी सानुवाद रखा गया है । लक्षणों तथा हस्तमुद्राओं का विवेचनात्मक विवरण परिशिष्ट तथा प्रस्तावना में है जिसे उपयोग की दृष्टि से दोनों स्थानों पर रखा गया है । नाट्यशास्त्र के नवम अध्याय के अन्तर्गत हस्तमुद्राओं की उत्पत्तिकथा भी यथास्थान लगायी
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( = ) गयी है जो अपना मौलिक महत्व रखती है साथ ही अपेक्षित रेखाचित्र भी इस भाग में लगा दिये गये हैं जिनसे इस भाग का भी प्रथमभाग की तरह ही अधिक उपयोग होगा । नाट्यशास्त्र के प्रथमभाग के प्रकाशन के बाद से ही इस कार्य को कुछ सफलताएँ भी मिली हैं तथा अनेक विश्वविद्यालयों में यह अनुमोदित एवं पाठ्य ग्रन्थ का गौरव प्राप्त कर रहा है जो अगले सभी भागों को भी प्राप्त होगा, यही आशा है । इस कार्य में सहृदय सुधीजन एवं संशोधक छात्रों एवं गुणग्राही विद्वानों का जो सहयोग रहा उसके प्रति मैं अतिशय कृतज्ञता व्यक्त करता हूँ । प्रकाशन कार्य के सन्दर्भ में एक निवेदन और करना है । यह ग्रन्थ अब वाराणसी की प्रसिद्ध संस्कृत ग्रन्थों की प्रकाशन संस्था — ' चौखम्भा संस्कृत संस्थान ' से प्रकाशित हो रहा है तथा आगे के सभी भाग इसी क्रम में प्रकाशित हो रहे हैं । यह प्रसन्नता की बात है कि इस गौरवशाली ग्रन्थ को पूरी तत्परता एवं तन्मयता से प्रकाशित करने की इनकी निष्ठा को सहृदय पाठक स्वागतार्ह मानेंगे तथा इन्हें प्रोत्साहन देंगे । मैं इस ग्रन्थ के मुद्रणादि में होने वाली त्रुटियों के लिए सहृदय सुधीजन से क्षमाप्रार्थी हूँ तथा विलम्ब के लिये भी । विजया दशमी सुधीजनकृपाकाङ्क्षी वि ० सं ० २०३५ बाबूलाल शुक्ल, शास्त्री
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प्रस्तावना नाट्यशास्त्र के स्वरूप तथा ( पीठिका के साथ ) उसके विषयसंक्षेप को प्रथम भाग में दिखलाया जा चुका है तथा यह भी कि प्रकृतग्रन्थ नाट्यविद्या की आत्मा है, क्योंकि इस ग्रन्थ में नाट्य विषयों का जो मौलिक विवरण है । वहीं परवर्ती सभी क्षेत्रों में अपेक्षानुसार उपजीव्य हो गया था, यह सर्व विदित है । भरत मुनि का यह महोद्योग नाट्यविद्या के इतिहास में ज्योतिस्तम्भ की तरह प्रकाशित है तथा विराट् भी । नाट्यकला के सिद्धान्त तथा प्रयोग — दोनों पक्षों को नाट्यशास्त्र में जिस दक्षता से उपस्थापित किया गया है वह अप्रतिम है । आज भी नाट्यशास्त्र का अध्ययन इसके स्थायी विषय विवरण के कारण उतने ही मनोयोग से जारी है जैसा इसके व्याख्याकाल में चलता था । प्रस्तुत द्वितीय खण्ड में नाट्यशास्त्र के आठ से उन्नीस अध्यायों का भाग आता है जिसका प्रथम खण्ड में संक्षेप में विषय दिया गया था । अतः हम अब क्रमशः उसी विवेचित विषयों के क्रम को इस भाग में भी आगे प्रस्तुत कर रहे हैं । इसमें ( प्रस्तुत ) अष्टम अध्याय से लेकर उन्नीसवें अध्याय तक आङ्गिक तथा वाचिक अभिनय का आदि विवरण दिया गया है । इस विषय का अष्टम अध्याय से आरम्भ हुआ है जिसमें अभिनयादि के स्वरूप आदि विवरण भरत मुनि ने विस्तार से दिये हैं । अभिनय: स्वरूपादि विचार: -यह हम बतला आये हैं कि भरतमुनि ने ही सर्व प्रथम नाट्यकला के -सिद्धान्त तथा प्रयोग दोनों पक्षों को निरूपित किया था । इसका कारण यह भी था कि वे शास्त्रप्रणेता के साथ - साथ नाट्यप्रयोक्ता भी रहे थे, जिसको नाट्यशास्त्र में ही दिखलाया गया है । इस नाट्यप्रयोग के उपकरणों में अभिनय एक सशक्त साधन माना जाता है तथा इसे ' अभिनय ' ही सम्पन्न भी करता है । इसी कारण नाट्यप्रयोग विषयक सिद्धान्तों के विवेचन को ' अभिनय ' के बिना देखना सम्भव ही नहीं । नाट्यप्रयोग में अभिनय का उपयोग अपेक्षित ( होता ) है । इसी कारण मुनि ने प्रयोगात्मा नाट्यविज्ञान में ' अभिनय ' का विधान अतिशय मनोयोग से दिखलाया भी है । ' अभिनय ' में पात्र अनुकार्य रामादि की अवस्थाओं का अनुकरण करने के कारण