श्रीगणेशाय नमः।
भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २
Natya Shastra of Bharat Muni Part 2 Pradipa Hindi Vyakhya Babu Lal Shukla Shastri Chowkambha Sanskrit Series · 668 पृष्ठ · 67 खण्ड
In English
Natya Shastra of Bharat Muni, Part 2
This is the second volume of the Natya Shastra by Bharata Muni, containing chapters eight through nineteen. It includes a Hindi commentary titled 'Pradipa' by Babu Lal Shukla Shastri and features illustrations of hand gestures.
This book answers
- What are the different types of angika abhinaya?
- How are hand gestures described in natya shastra?
- What does the pradipa hindi commentary cover in natya shastra?
- Which chapters of natya shastra are included in this second part?
विषय सूची
- श्री काशी संस्कृत ग्रन्थमाला २१५ श्रीभरतमुनिप्रणीतं सचित्रम् नाट्य शास्त्र म् ' प्रदीप ' हिन्दीव्याख्या - टिप्पणी - परिशिष्ट - प्रस्ता-वनादिभिर्विभूषितम्… 1–10
- ( २ ) ' अभिनेता ' कहलाता है, क्योंकि नाट्य प्रयोग अभिनय के द्वारा सम्पन्न होता है । अभिनय का ही यह प्रभाव है कि काव्य ' नाट्य ' होकर रस की ओर गतिशील बनकर… 11–20
- ( १२ ) से नहीं जाना जाता है फिर भी वहाँ मुद्रा ( नाट्यशास्त्र का सन्देश ) तथा अर्धचन्द्र जैसे हस्तों की विविध भङ्गिमाओं वाले रूपों में योजना रख कर प्रयोग… 21–30
- ( २० ) भौमिक तथा आकाशिक मण्डल के दस दस प्रभेद किये गये हैं । है । इनमें जो सब मिल कर मण्डलों के बीस प्रभेद बनाते हैं… 31–40
- ( ३० ) ऊँचा कर तिरछा मोड़ते हुए ( आगे की ओर ) रखना । ( बैशाख स्थान में तथा इस स्थान में अतिशय साम्य है ) गारुड - दायाँ बायाँ पैर उलटा कर ऐसे सिकुड़ाते हुए… 41–50
- ( ४० ) की संगीत विषयक सुस्वरता एवं ध्वनि की सहज रमणीयता को तो कुन्तक ने अपने ' वक्रोक्ति - जीवित ' नामक ग्रन्थ में दिखलाया भी है… 51–60
- ( ५० ) गीति तथा उपगीति प्रभेद होते हैं जिनमें गीति के प्राकृत भाषा में उद्गाथा आदि प्रभेद किये गये है… 61–70
- ( ६० ) भरत के उत्तरभावी साहित्य के आचार्यों ने इसी अलङ्कारपद्धति को धीरे - धीरे विकसित, व्यवस्थित एवं व्यापक बनाकर उसे शास्त्रीय गौरव की इतनी ऊँचाई तक… 71–80
- ( ७० ७० ) कम । दूसरे पक्ष के आचार्यों में जिनमें भामह प्रमुख थे— काव्यरचना के साधनों की सूची में अलङ्कारों पर प्रधानरूप से ध्यान देते हुए अलङ्कारों को… 81–90
- ( 50 ) है । जैसा कि हमने प्रथमभाग में कहा था कि श्रीग्रासे को अपने संस्करण के लिये नाट्यशास्त्र के विभिन्न हस्त लेखों के कारण एक नवीन पद्धति निर्मित करनी… 91–100
- ( ६० ) पक्षप्रद्योतक तथा गरुडपक्ष - लक्षण ( १८३ ) ७ ९. दण्डपक्ष लक्षण ( १ ९ ४ ) ७ ९ ऊर्ध्वमण्डली तथा पार्श्वमण्डली-लक्षण ( १ ९ ५ ) ७ ९ उरोमण्डली तथा… 101–110
- श्री भरतमुनिप्रणीतं नाट्यशास्त्रम् ' प्रदीप ' हिन्दी - व्याख्योपेतम् ( द्वितीयो भागः ) मे FETIVISTE ( ) PERS 1 GE अष्टमोऽध्यायः मुनि जन का प्रश्न: -ऋषय… 111–120
- ०१० नाट्यशास्त्रम् उत्क्षिप्तञ्चापि विज्ञेयमुन्मुखावस्थितं शिरः । प्रांशु दिव्यास्त्रयोगेषु स्यादुत्क्षिप्तं प्रयोगतः… 121–130
- २० नाट्यशास्त्रम् ( अवशिष्ट ) व्यभिचारीभावों की अभिव्यंजक दृष्टियों की योजना बतलाता हूँ । ८५ । संचारी दृष्टियों की योजना-शून्या दृष्टिस्तु… 131–140
- ३० नाट्यशास्त्रम् नीचले ओठ का फड़कना ( या नीचे झुकना ) ' विवर्तन ', ओठ का धूजना ' कम्पन ', ओठ का बाहर निकलना ' विसर्ग ', ओठ का अन्दर ले जाना ' विनिगूहन ',… 141–150
- ४० नाट्यशास्त्रम् त्रिपताक, ( ३ ) कर्तरीमुख, ( ४ ) अर्धचन्द्र, ( ५ ) अराल, ( ६ ) शुकतुण्ड, ( ७ ) मुष्टि, ( ८ ) शिखर, ( ९ ) कपित्थ, ( १० ) कटकामुख, ( ११ )… 151–160
- नाट्यशास्त्रम् शिखरे-अस्यैव च यदा मुटेरूर्ध्वोऽङ्गुष्ठः प्रयुज्यते । हस्तः स शिखरो नाम तदा ज्ञेयः प्रयोक्तृभिः । ५६… 161–170
- ६० नाट्यशास्त्रम् ' हंसास्य-तर्जनीमध्यमाङ्गुष्ठास्त्रे ताग्निस्था निरन्तराः । भवेयुर्ह सवक्त्रस्य शेषे द्वे सम्प्रसारिते । १०२… 171–180
- ७० नाट्यशास्त्रम् इस मुद्रा से सिंह, हाथी, गेंडा, घडिताल, मगर, मत्स्य तथा अन्य हिंसक जन्तुओं का अर्थ प्रदर्शित किया जाता है । १४७… 181–190
- ८० नाट्यशास्त्रम् हस्तौ तु मणिबन्धान्ते कुञ्चितावश्चितौ यदा । टकाख्यौ कृतौ स्यातां मुष्टिकस्वस्तिकौ तदा । १ ९ ८… 191–200
- ९ ० नाट्यशास्त्रम् यथा दर्शनमन्यच्च लोकाद् ग्राह्यं प्रयोक्तृभिः । ३२ । इत्यूर्वोर्लक्षणं प्रोक्तं जङ्घ ' योस्तु निबोधत… 201–210
- १०० नाट्यशास्त्रम् जनिता - यदि एक ' मुष्टि ' हस्त छाती पर तथा दूसरा हाथ गोल चक्कर लगाते हुए रखे और पैर ' अमतलसंचर ' दशा में हो तो ' जनिता ' चारी हो जाती… 211–220
- ११० नाट्यशास्त्रम् बायें हाथ में ढाल को सामने रखते हुए तथा दाहिने हाथ में तलवार ( शस्त्र ) लेकर अभिनेता रंगमंच पर चले… 221–230
- १२० नाट्यशास्त्रम् से अतिक्रान्ता चारी को और ) फिर दाहिने पैर से ' अपक्रान्ता चारी ' तथा बाएं पैर से अतिक्रान्ता चारी को प्रदर्शित कर ' भ्रमरी को ( त्रिक… 231–240
- १३० नाट्यशास्त्रम् पात्रों की गति ( उनकी स्थिति के अनुसार ) स्थित, मध्य तथा द्रुत लय में रखनी चाहिए… 241–250
- १४० नाट्यशास्त्रम् करुण - रस गति: -पुनश्च करुणे कार्या गतिः स्थितंपदैरथ । बापाम्बुरुद्धनयनः सन्नगात्रस्तथैव च । उत्क्षिप्तपातितकरस्तथा सस्वनरोदनः… 251–260
- १५० नाट्यशास्त्रम् उसी प्रकार सूचित हो जाता है जैसे अंकुश के हाथ में लेने पर हाथी की, पावड़ी लगाने पर घोड़े की तथा रास लेने पर रथ की अभिव्यक्ति होती है… 261–270
- १६० नाट्यशास्त्रम् शकार की गति अहंकार पूर्ण तथा साधारण डगों ( चूर्णपाद ) वाली होती है । यह चलते समय अपने वस्त्र तथा अलंकारों को छूता या बार - बार कभी -… 271–280
- १७० नाट्यशास्त्रम् स्वस्थ दशा में ( विश्रामावस्था में ) ( स्वस्थे ) बैठने पर दोनों पैरों को वैशाखस्थान में फैलाकर सुन्दरता से रखे, पीठ थोड़ी तनी हुई और… 281–290
- १८० नाट्यशास्त्रम् नंगरे वा वने वापि वर्षे वा पर्वतेऽपि वा । यत्र वार्ता प्रवर्तेत तत्र कक्ष्यां प्रयोजयेत् । ७… 291–300
- १ ९ ० · नाट्यशास्त्रम्-करना चाहिए, क्योंकि इन्हीं देशों की प्रजा पर इस प्रवृत्ति निर्भर करता है । ४२… 301–310
- पञ्चदशोऽध्यायः ( वाचिकाभिनयाद्यध्याय ) यो वागभिनय: ' पूर्व मया प्रोक्तो द्विजोत्तमाः । लक्षणन्तस्य वक्ष्यामि स्वरव्यञ्जनसम्भवम् । १… 311–320
- नाट्यशास्त्रम् २१० सन्धि-वर्णपदक्रमसिद्धः पदैर्कयोगाच्च वर्णयोगाच्च सँन्धोयते तु यस्मात्तस्मादुपदिश्यते सन्धिः पृथक्भूत पद, वर्ण या स्वर व्यञ्जन परस्पर… 321–330
- २२० नाट्यशास्त्रम् लघुपूर्वी यकारस्तु नकारस्तु लघुत्रयम् । इन त्रिकों में यदि आदि गुरु हो तो भगण ( 5… 331–340
- २३० नाट्यशास्त्रम् मधुकरी - यदि नौ अक्षरों के पाद में अन्तिम तीन वर्ण गुरु हों तो मधुकरी ' वृत्त होता है । २२… 341–350
- २४० नाट्यशास्त्रम् यथा- न ते काचिदन्या समा दृश्यते स्त्री ' नृलोके विशिष्टा गुणैरद्वितीयैः । त्रिलोक्यां गुणाग्रयान् समाहृत्य सर्वान् जगत्यप्रमेयासि… 351–360
- २५० नाट्यशास्त्रम् भवन्ति यत्र दीर्घाणि शेषाणि च लघून्यथ । विलम्बितगतिः सा ' तु विज्ञेया नामतो यथा । ९ ०… 361–370
- २६० नाट्यशास्त्रम् TE स्फुटितकलशशुक्तिनिर्गीर्णमुक्ता- ' फलैरूर्मिहस्तैर्नमस्यन्ति वः सागराः । मुदितजलचराकुलाः सम्प्रकीर्णामलाः कीर्तयन्तीव कीर्ति… 371–380
- २७० नाट्यशास्त्रम् मात्रा के अयुग गण काव्य रचना में कवि द्वारा रखे जा सकते हैं चार पर युग गण में ऐसा कोई प्रतिबन्ध नहीं है । १६०… 381–390
- २५० नाट्यशास्त्रम् गुणातिपात डीड़ गुणाभिधानैर्विविधैर्विपरीतार्थयोजितैः । गुणातिपातो ' मधुरैर्निष्ठुरायैर्भवेद्यथा । १ ९… 391–400
- २ ९ ० नाट्यशास्त्रम् यथा सरांसि हंसैः कुसुमैश्च वृक्षाः मत्तैर्द्विरेफैश्च सरोरुहाणि । गोष्ठीभिरुद्यानवनानि चैव तस्मिन्नशून्यानि सदा क्रियन्ते । ५७… 401–410
- ३०० नाट्यशास्त्रम् विसन्धि – यदि शब्दों को परस्पर सन्धि हीन दशा में वहाँ ‘ विसन्धि ” नामक दोष होता है… 411–420
- ३१० नाट्यशास्त्रम् आकारस्तु ' स्मृते कार्यम् ऊकारश्चाभ्यसूयिते । परिदेविते च हाकारम् ' ओङ्कारोऽध्ययने तथा । ११६… 421–430
- नाट्यशास्त्रम् ३२० को संकेतित करने वाले वाक्यों के द्वारा जब किन्हीं गूढ़ अभिप्रायों हुए जब किसी तथ्य या अर्थ का कथन अन्य व्यक्ति या स्वयं को ही पूछते जाए… 431–440
- ३३० नाट्यशास्त्रम् ' छ इति षकारो नित्यं बोद्धव्यः षट्पदादियोगेषु । कलशब्दान्त्यो रेफो भवति तथा ' खुत्ति खलु शब्दः । १०… 441–450
- नाट्यशास्त्रम् २४० कोई संन्धि या विग्रह से सम्बन्धित बात चल रही हो, रखा जाए जबकि के शुभ या अशुभ फल पर विचार किया जा आकाश में किसी उदितनक्षत्र उससे राजा के… 451–460
- ३५० नाट्यशास्त्रम् जो पुरुष या स्त्रीपात्र नौकर हों उन्हें तथा कलाकार ' ( शिल्पी ) या उसकी पत्नी आदि को उनके स्थिति व्यवसाय या पदानुसार सम्बोधित किया जाए… 461–470
- ३६० नाट्यशास्त्रम्, चार वर्ण तथा उनका व्यवहार-उदात्तश्चानुदात्तश्च स्वरितः कम्पितस्तथा । वर्णाश्चत्वार एव स्युः पाठ्ययोगे तपोधनाः । । ४३… 471–480
- ३७० नाटयशास्त्रम् प्रायो वीरे च रौद्रे च करौ प्रहरणाकुलौ । बीभत्से ' कुत्सितत्त्वाश्च भवतः कुञ्चितौ करौ । ६३ । हास्ये चोद्देशमात्रेण करुणे च प्रलम्बितौ… 481–490
- ३८० नाट्यशास्त्र १०६ - ११६. यहाँ मुनि ने पलकों के ९ प्रभेद दिखलाते हुए उनकी अभिनय योजना दिखलाई… 491–500
- नाट्यशास्त्र ३ ९ ० दिशा में जाने वाली हिलाकर किया जाता है । सामने और विरुद्ध जाता है । यह लियों को तर्जनी से दिन की समाप्ति को दिखलाया किया, दोनों हाथों… 501–510
- ४०० नाट्यशास्त्र १४६ - १४७. मकरहस्त: - दोनों अंगूठों का मकर के कणों की तरह होने के कारण इसका ' मकर ' नाम है… 511–520
- दशम अध्याय ( शारीराभिनय ) १. शारीराभिनय के क्रम में उर: कर्म बतलाये हैं जो पाँच हैं । २- ३. आभुग्नउर: - इसमें वक्षः उन्नत या तान कर निष्क्रान्त, शुद्ध या… 521–530
- ४२० ११ नाट्यशास्त्र अब परिकर सामग्री बतलाते हैं— ' व्यायाम ' इत्यादि से । यहाँ गया था उसकी प्रशिक्षण एवं अभ्यास के उपयुक्त काल है व्यायाम पद का अर्थ अंग… 531–540
- ४३० श्रीनाट्यशास्त्र मध्यमपात्रों की इसी क्रम में रहनेवाली गति में भी अनुकूल संचारी ( आवेग आदि में ) भाव में यही गति होती है… 541–550
- ४४० नाट्यशास्त्र साक्षात् बोधक पदों से नहीं कहा हो तो वे ' वा ' सरिता, आश्रम आदि को शब्द की वीप्सा से द्योतित हो जाते हैं… 551–560
- ४५० एतेषां छन्दसां लक्षणं प्रस्तारोऽक्षर निर्दिष्टो fit off वर्णों " गुरोरधस्तायाद्यस्य नाट्यशास्त्र भूयः प्रसारविधिसंश्रयम् । मुद्दिष्टमेव च… 561–570
- ४६० नाट्यशास्त्र काल प्रवाह से ( कारण ) भरत के ग्रन्थ में ही पाठान्तर के रूप में प्रविष्ट या समायोजित कर दिये गये… 571–580
- ४७० नाट्यशास्त्र रोकता है तथा - ' प्रिये, तुम प्रसन्न हो जाओ ' इत्यादि कहता है परन्तु इतना कर से देवी निकल कर चली जाती है तो ' अरण्यरोदन व्यर्थ होने पर भी… 581–590
- ४८० नाट्यशास्त्र ६३. जहाँ दो वर्णों या पदों में नैरन्तर्य है अर्थात् अव्यवधान है, जहाँ विचार या सम्बन्ध है तथा जहाँ अन्य का अन्य में लय होता है… 591–600
- ४ ९ ० नाट्यशास्त्र जैसे — असारं संसारं परिमुषितरत्नं त्रिभुवनं निरालोकं लोकं जननयन निर्माणमफलम्… 601–610
- ५०० नाट्यशास्त्र भाषा - श्लेष तथा पताका स्थानक आदि में इनके प्रयोग कहे गये हैं । यहाँ अपि शब्द से यह भी कहा गया है कि प्राकृत में प्रयुक्त शब्दों में समास… 611–620
- ५१० नाट्यशास्त्र उदय भी होगा । स्वरों के स्थानों का भेद अलङ्कारों एवं अङ्गों के कारण नहीं होता है… 621–630
- ५२० एष गजोऽद्विमस्तक एष च वधूवराणा एष च सलिलनिवापे एष चारीप्रयोगस्तु एषः पादप्रचारस्तु एष पादाहते कार्यों एष प्रहारपाते एष प्रहारे व्यायामे मदनाङ्गमर्दे… 631–640
- ५३० नता मुहुः श्लिष्ट - पुटा न ते काचिदन्या न निषण्णं न च स्तब्धं न बर्बर किरातान्ध्र न भेद्यं नापि च च्छेद्यं नमनोज्ञमनात् पार्श्वे न मे प्रियमिदं जनस्य… 641–650
- ५४० राश्याश्च गणिकायाश्व रिपुशतमुक्त रुधिरनिदेो यो रूक्षस्फुटितकेश रूक्षा स्थिरोवृत्तपुटा रूक्षो निर्भर नपरो रूपणं पचिणाचैव रूपदीपक संयुक्तं… 651–660
- ५५० साहित्यदर्पण । सङ्गीतमकरन्द सङ्गीतरत्नाकर नाट्यशास्त्र विश्वनाथ कविराज चौखम्बा, वाराणसी । । नारद । बडौदा… 661–668