भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ — पृष्ठ 121–130
भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ · पृष्ठ 121–130
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०१० नाट्यशास्त्रम्
उत्क्षिप्तञ्चापि विज्ञेयमुन्मुखावस्थितं शिरः ।
प्रांशु दिव्यास्त्रयोगेषु स्यादुत्क्षिप्तं प्रयोगतः ॥
यदि मस्तक ऊपर की ओर देखते हुए स्थित हो कहलाता है । इसका प्रयोग ऊँची वस्तु तथा दिव्य - अस्त्र की में किया जाएँ ॥ ३३ ॥
अंवाङ्मुख स्थितञ्चापि बुधाः प्राहुरधोगतम् ।
लज्जायाश्च प्रणामे च दुःखे चाधोगतं शिरः ॥
३३ ॥
तो ' उत्क्षिप्त ' ' प्राप्ति ( करने ) ३४ ॥ यदि चेहरे को ( सिर सहित ) नीचे की ओर झुका लिया जाए तो ' अधोगत ' कहलाता है । इसकी योजना लज्जा, प्रणाम करने तथा दुःख प्रकट करने में की जाए ॥ ३४ ॥
सर्वतोभ्रमणाश्चैव शिरो लोलितमुच्यते ।
मूर्च्छाव्याधिमदा वेशग्रहनिद्रादिषु स्मृतम् ॥ ३५ ॥
यदि मस्तक को चारों ओर घुमाया जाए तो ' लोलित ' ( पाठान्तर ‘ परिलोलित ' ) कहलाता है । इसकी योजना मूर्च्छा, व्याधि, मद, आवेश, भूत आदि ग्रहों से आविष्ट होने तथा निद्रा आदि में की जाए ॥ ३५ ॥
एभ्योऽन्ये बहवो भेदा लोकाभिनयसंश्रयाः ।
ते च लोकस्वभावेन प्रयोक्तव्याः प्रयोक्तृभिः ॥ ३६ ॥
इसके अतिरिक्त मस्तक के अन्य अनेक भेद हो सकते हैं जो सामान्य लोकाभिनय के आधार पर बनते हैं । उनका लोक - प्रकृति के अनुसार यथोचित प्रयोग करना चाहिए ॥ ३६ ॥
त्रयोदशविधं ह्येतच्छिरः कर्म मयोदितम् ।
अतः परं प्रवक्ष्यामि दृष्टीनामपि लक्षणम् ॥ ३७ ॥
इस प्रकार मैंने मस्तक की तेरह ( मुद्राएँ या ) भेद बतलाए । अब मैं दृष्टियों के भेद तथा लक्षण बतलाता हूँ ॥ ३७ ॥
१ दिव्यार्थ - ख ० १२. अधोमुखं स्थितञ्चापि शिरः प्राहुरधोमुखम् - ख; अधोमुखं स्थितं - ग ० । ३. भवेत् — ग ० । ४. लोलनाच्चापि शिरः स्यात् परिललितम् - ख - ग ० । ५. मदावेग - ग ० । ६. संश्रिताः - ग ० । ७. शिरकमंग ० । ८. मिह ल ० ।
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अष्टमोऽध्यायः
दृष्टियों के प्रकार--कान्ता भयानका हास्या करुणा चाद्भुता तथा ।
रौद्री वीरा व बीभत्सा विज्ञेया रसदृष्टयः ॥ ३८ ॥
रस की अभिव्यक्ति करने वाली ये दृष्टियाँ हैं — कान्ता, भयानका, हास्या, करुणा, अद्भुता, रौद्री, वीरा तथा बीभत्सा ( इन्हें रसदृष्टियाँ कहते हैं ) ॥ ३८ ॥
स्निग्धा दृष्टा च दीना च क्रुद्धा दृप्तो भयन्विता ।
जुगुप्सिता विस्मिता च स्थायिभावेषु दृष्टयः ॥ ३ ९ ॥
स्थायि भावों में प्रयुक्त होने वाली द्रष्टियाँ है— स्निग्धा, हृष्टा, दीना, हप्ता, भयान्विता, जुगुप्सिता तथा विस्मिता ॥ ३६ ॥
शून्या च मलिना चैव श्रान्ता लज्जान्विता ग्लाना च शङ्किता चैव विषण्णा मुकुला कुञ्चिता चाभिर्तता च जिह्मा सललिता वितर्कितार्धमुकुला विभ्रान्ता विप्लुता आकेकरा विकोशाच त्रस्ती च मदिरा षट्त्रिंशद् दृष्टयो होता नामतोऽभिहिता संचारी भावों में उपयोगी दृष्टियाँ ये हैं: - शून्या, लज्जान्विता, ग्लाना, शंकिता, विषण्णा, मुकुला, कुंचिता,
तथा ।
तथा ॥ ४० ॥
तथा ।
तथा ॥ ४१ ॥
तथा ।
मया ॥ ४२ ॥
मलिना, श्रान्ता, अभितप्ता, जिह्मा, ललिता, वितर्किता, अर्धमुकुला, विभ्रान्ता, विप्लुता, आकेकरा, विकोशा, त्रस्ता तथा मदिरा | इस प्रकार सभी मिलाकर ये द्रष्टियाँ ३६ हो जाती हैं, जिनके मैंने नाम यहाँ बतलाए हैं ॥ ४०-४२ ॥
अस्य दृष्टिविधानस्य नानाभावरसाश्रयम् ।
लक्षणं सम्प्रवक्ष्यामि यथाकर्मप्रयोगतः ॥ ४३ ॥
अब मैं इन दृष्टियों के अनेक रस तथा भावों के आश्रित ( अभिव्यंजक ) कर्म तथा प्रयोगों के अनुसार लक्षण बतलाता हूँ ॥ ४३ ॥
रसाभिव्यंजक दृष्टियाँ ( लक्षण एवं प्रयोग ) —
हर्षप्रसादजनिता कान्तात्यर्थे समन्मथा ।
क्षेपकटाक्षा च शृङ्गारे दृष्टिरिष्यते ॥ ४४ ॥
जब अतिशय स्नेह ( राग ) में आविष्ट व्यक्ति भौंहें और कटाक्षपूर्ण १. दम्भा - ख ० । २. साभिमाना - ख ०, ग ० । ३. त्रस्ताथ ग ० । ४. स्तासु नाट्यं प्रतिष्ठितम् — क ० । ५. जनितकोपाम - ख ० ।
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२ नाट्यशास्त्रम् दृष्टि से देखे तो हर्ष और प्रसाद ( मनोविनोद ) से उद्भूत ऐसी दृष्टि ' कान्ता ' कहलाती है । इसका प्रयोग शृङ्गाररस में किया जाए ॥ ४४ ॥
प्रवृत्तनिष्टब्धपुटा स्फुरदुवृत्ततारका ।
दृष्टिर्भयानकात्यर्थं भीता ज्ञेया भयानके ॥ ४५ ॥
जिसमें पलकों को ऊपर उठाकर स्थिर कर दिया जाए और पुतलियों को ऊपर की ओर चमकाते हुए गोल घुमाव दिया जाए तो ' भयानका दृष्टि होती है । यह अतिशय भय को सूचित करती है और इसका प्रयोग भयानकरस ' ' में किया जाता है ॥ ४५ ॥
क्रमादाकुञ्चितपुटा सविभ्रान्ताल्पतारका ।
हास्या दृष्टिस्तु कर्त्तव्या कुहकाभिनयं प्रति ॥ ४६ ॥
' हास्या ' दृष्टि में दोनों पलकें क्रमशः सिकुड़ी हुई रहती हैं और ये पुतलियों के साथ थोड़ी खुली तथा घूमती हुई ( विभ्रान्त ) रखी जाती हैं । इसका प्रयोग गुदगुदाने या छू कर हंसाने के प्रदर्शन के अवसर पर किया जाए ॥ ४६ ॥
पंतितोपुटा साना मन्युमन्थरतारका ।
नासाग्रानुगता दृष्टिः करुणा करुणे रसे ॥ ४७ ॥
जिसमें दोनों ऊपरी पलकें नीचे की ओर आ रही हों, क्रोध के कारण पुतलियाँ धीमी हो गई हों, आँखों से आँसू ढलकते हों तथा नासिका की नोक पर दृष्टि स्थित हो तो उसे ' करुणा ' दृष्टि समझना चाहिए । इसका ‘ करुणरस ' में प्रयोग होता है ॥ ४७ ॥
या त्वाकुञ्चितपक्ष्माग्रा साश्चर्योद्वृत्ततारका ।
सौम्या विकसितान्ता च साद्भुता दृष्टिरद्भुते ॥ ४८ ॥
जिस ( दृष्टि ) में बरौनियाँ नोक पर थोड़ी सिकुड़ी हुई रहें, पुतलियाँ आश्चर्य से ऊपर की ओर उठी हुई रहें और आँखें खिली हुई दशा को सुन्दरतापूर्वक प्रदर्शित करें तो उसे ' अद्भुत ' दृष्टि जानो । इसे अद्भुत-रस में प्रयुक्त किया जाए ॥ ४८ ॥
क्रूरा रूक्षारुणोदवृत्ता निष्टब्धपुटतारका ।
भ्रुकुटीकुटिला दृष्टिः रौद्री रौद्ररसे स्मृता ॥ ४ ९ ॥
१. भयानकेत्यथं होना ज्ञेया भयानका क ० । २. विभ्रान्ताकुलतारका - ग ३. चकितो, प्रतीतो— क ० । ४. रौद्री रौद्रे प्रकीर्तिता — क, रौद्रे रौद्री रखा स्मृता ग ० ।
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अष्टमोऽध्यायः १३ ऐसी क्रूर दृष्टि जिसमें पुतलियाँ रूखी, लाल तथा घूमने वाली हों, पलकें स्थिर हों तथा भ्रुकुटी टेढ़ी हों तो ऐसी दृष्टि ' रौद्री ' कहलाती है । इसका प्रयोग रौद्ररस में किया जाए ॥ ४ ९ ॥ दीप्ता विकसिता क्षुब्धा गम्भीरा समतारका उत्फुल्लमध्या दृष्टिस्तु वीरा वीररसाश्रया ॥ ५० ॥
जो दृष्टि चमकीली, फैली हुई, क्षुब्ध गम्भीर हो, पुतलियां बीच में स्थित हों तथा जिसका मध्यभाग खिला हुआ हो तो ( यह ) ' वीरा ' दृष्टि कहलाती है । इसे वीर रस में प्रयुक्त किया जाता है ॥ ५० ॥
निकुञ्चितपुटापाङ्गा घूर्णोपप्लुततारका ।
संश्लिष्टस्थिरपक्ष्मा च बीभत्सा दृष्टिरिष्यते ॥ ५१ ॥
जिसमें पलकों से नेत्रों के कोने ढंक लिये गए हों, पुतलियाँ घुमाव के कारण दबी ( उपप्लुत ) या विनित हों और बरौनियाँ एक दूसरे से मिली.. हुई और स्थिर हों तो ( यह ) ' बीभत्सा ' दृष्टि कहलाती है । इसका उपयोग बीभत्सरस ( के प्रदर्शन ) में किया जाए ॥ ५१ ॥
[ नासाग्रसक्तानिमिषा तथाधोभागचारिणी । आकेकरपुटा चैव शान्ता दृष्टिर्भवेदसौ ॥ ] ( प्रक्षिप्त — जो नासिका के अग्र भाग में स्थित, अपलक तथा नीचे की ओर देखने वाली दृष्टि हो, जिसके पलक ‘ आकेरक ' ( मुद्रा ) में रहें तो उसे ' शान्ता ' दृष्टि जानो । इसका शान्त रस में प्रयोग
रसजा दृष्टयो होता विज्ञेया लक्षणान्विताः ।
अतः परं लक्षयिष्ये स्थायिभावसमाश्रयाः ॥
ये दृष्टियाँ रसों से सम्बद्ध हैं । अब मैं स्थायिभावों से के लक्षण बतलाता हूँ ॥ ५२ ॥
स्थायीभावाभिव्यंजक दृष्टियाँ ( लक्षण एवं योजना ) -व्याकोशमध्या मधुरा स्थितताराभिलाषिणी सानन्दाश्रुकृता दृष्टिः स्निग्धेयं रतिभावजा किया जाए । ) ५२ ॥ सम्बद्ध दृष्टियों
।
॥ ५३ ॥
जिसका मध्य भाग फैला हुआ हो, जो माधुर्य लिये हो, जिसकी १. स्थित पक्ष्मा क ०, स्मितपदमा — ग ० १ २. पद्यमिदं - क ० पुस्तके प्रक्षिप्तं ग ० पुस्तके च नास्ति । ३. प्रवक्ष्यामि – ग ० । ४. व्याकोशमध्यमधुरा स्मेरतारा — ग ० । ५. सानन्दभ्रूलता क ० ।
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१४. नाट्यशास्त्रम् पुतलियाँ स्थिर हों तो आनन्द - जन्य अश्रुओं से पूर्ण ऐसी दृष्टि ' स्निग्धा ' कहलाती है । इसका ' रति ' नामक स्थायी भाव में प्रयोग करना चाहिए ॥
चला हसितगर्भा च विशत्तारानिमेषिणी ।
किञ्चिदाकुञ्चिता हृष्टा दृष्टिसे प्रकीर्तिता ॥ ५४ ॥
जिसमें दृष्टि घूमने वाली ( चंचल ) हो, पलकें थोड़ी सी लगती हुई रहें और जिसकी पुतलियाँ पूर्णरूप से देखने योग्य न रह गई हों, पलक गिरती न हों तथा वे थोड़ी सिकुड़ी हुई हो तो ऐसी ' हृष्टा ' दृष्टि कहलाती है । यह ' हास ' नामक स्थायीभाव में प्रयुक्त होती है ॥ ५४ ॥
अवस्रस्तोत्तरपुटा किश्चित्संरब्धतारका ।
मन्दसश्चारिणी दीना सा शोके दृष्टिरिष्यते ॥ ५५ ॥
जिस ( दृष्टि ) में ऊपरी पलक थोड़ी झुकी रहें, पुतलियाँ ( थोड़ी ) रुकी ( ढंकी ) हुई रहें और जिसका हलन चलन मन्द गति से हो रहा हो तो
उसे ' दीना ' दृष्टि जानो । इसका प्रयोग ' शोक ' स्थायीभाव में किया जाए ॥
रूक्षा स्थिरोवृत्तपुटा निष्टन्धोवृत्ततारका ।
कुटिकुटी दृष्टिः क्रुद्धा क्रोधे विधीयते ॥ ५६ ॥
जो दृष्टि रूखी हो जिसमें पलकें ऊपर की ओर तथा गतिहीन हो पुत-लियाँ ऊपर की ओर घूमने वाली तथा स्थिर हों और भ्रुकुटी टेढ़ी हो तो
उसे ' क्रुद्धा ' दृष्टि जानो । इसका प्रयोग ' क्रोध ' स्थायीभाव में किया जाए ॥
संस्थिते तारके यस्याः स्थिरी विकसिता तथा ।
सत्वमुद्गिरती हप्ता दृष्टिरुत्साहसम्भवा ॥ ५७ ॥
जिस दृष्टि में आँखे स्थिर और पूरी तरह फैली हो, पुतलियाँ स्तब्ध हों तथा जिससे सत्व प्रकट हो रहा तो उसे ' हप्ता ' दृष्टि जानो । इसका प्रयोग ‘ उत्साह ' स्थायी भाव में किया जाए ॥ ५७ ॥
विस्फारितोभयपुटा भयकम्पिततारका ।
निष्क्रान्तमध्या दृष्टिस्तु भयभावे भयान्विता ॥ ५८ ॥
जिसमें आँखों की पुट पूरी तरह फैली हों, पुतलियाँ भय से काँप रही १. विशत्ताराभिलाषिणी - ख ०; विश्वतारानिमेषिणी - ग ० । २. अर्धस्रस्तो ख ०; ईषत्स्रस्तो - ग ० । ३. रुद्धतारा जलाविला - क ख ० । ४. रुच्यते - क ० । ५. कुटिला - ग ० ॥ ६. स्थिता ग ०
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अष्टमोऽध्यायः १५ हों और जो बीच के स्थान से थोड़ी हटकर रखी जाए तो वह ' भयान्विता ' दृष्टि जानो । इसका प्रयोग ' भय ' नामक स्थायी भाव में किया जाए ॥५८ ॥
सङ्कोचितपुटाध्यांमा दृष्टिर्मीलिततारका ।
लक्ष्योद्देशात् समुद्विग्ना जुगुप्सायां जुगुप्सिता ॥ ५ ९ ॥
जिसमें पलकें सिकुड़ी और परस्पर न मिलती हों, पुतलियाँ घूमती हों और वे ( दृष्टि में आने वाले ) लक्ष्य से लौटने वाली रखी जाए तो उसे
' जुगुप्सिता ' दृष्टि जानो । इसका प्रयोग ' जुगुप्सा ' स्थायी भाव में किया जाए ॥
भृशमुद्वृत्ततारात्र नष्टोभयपुटाचिता ।
समा विकसिता दृष्टिर्विस्मिता विस्मये स्मृता ॥ ६० ॥
जो बराबर खुली ( या फैली ) हुई हो, जिसमें पुतलियाँ ऊपर की ओर घुमाव लेती हुई और पलके स्थिर हों तो ' विस्मिता ' दृष्टि जानो । इसका प्रयोग ' विस्मय ' स्थायी भाव में किया जाए ॥ ६० ॥
स्थायिभावाश्रया होता विज्ञेयो दृष्टयो बुधैः । सञ्चारिणीनां दृष्टीनां सम्प्रवक्ष्यामि लक्षणम् ये दृष्टियाँ स्थायी भावों की हैं । अब संचारी भावों दृष्टियों के लक्षण बतलाता हूँ ॥ ६१ ॥
संचारी भावों की अभिव्यंजक दृष्टियाँ-समतारा समपुटा निष्कम्पा शून्यदर्शना ॥। ६१ ॥ में होने वाली बाह्यर्थाग्राहिणी क्षामा शून्या दृष्टिः प्रकीर्तिता ॥ ६२ ॥
जो क्षीण तथा स्थिर दृष्टि हो जिसमें पुतलियां और पलकें सम हों और अपने स्थान पर ही लौटने वाली होकर जो किसी भी बाह्य - पदार्थ को ग्रहण न करें तो उसे ' शून्या ' दृष्टि जानो ॥ ६२ ॥
प्रस्पन्दमानपक्ष्मांन्ता नात्यर्थमुकुलैः पुटैः ।
मलिनान्ता च मलिना दृष्टिर्विह ततारका ॥ ६३ ॥
जिसकी बरौनियां घूजती हों, जिसमें पलकें अतिशय सिकुड़ी हुई न १. पुटश्यामा - क, पुटन्यासा — ख ०, ग ० । २. पक्ष्मोद्देशात् ग ० । ३. विमलोवृत्त - ग ० । ४. हृष्टोभय - ख ० –ग ० । ५. दृष्टयो लक्षिता मया ख ० । ६. बाह्यार्थग्राहिणी ख - ग ० । १७. ध्यामा क ० श्यामा- ख ० । ८. प्रस्यन्दमानख ग ० । ९. पक्ष्मा या क ० पक्ष्माग्रा - क ० । १०. विभ्राभ्र - क; विस्मित - ख- ग ० ।
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१६ नाट्यशास्त्रम् रहें, आँखों के कोने मलिनता लिए हों और जिसमें पुतलियां घूमती न रहें ( विहततारका ) तो उसे ' मलिना ' दृष्टि जानो ॥ ६३ ॥
श्रमात् ' प्रम्लापितपुटा क्षामान्ताश्चितलोचना ।
सन्ना पतिततारा च श्रान्ता दृष्टिः प्रकीर्तिता ॥ ६५ ॥
श्रम के कारण जिसकी पलकें म्लान हो गई हों, आंखों के कोने सिकुड़ गए हों, दृष्टि निर्बल हो ( जिसकी ) पुतलियां नीचे झुकी हों, तो उसे ' श्रान्ता ' दृष्टि कहते हैं ॥ ६४ ॥
किञ्चिदञ्चितपक्ष्माग्रा पतितोपुकिया ।
त्र पाधोगततारा च दृष्टिर्लज्जान्विता तु सा ॥ ६५ ॥
जिसमें बरौनियों के अग्र भाग थोड़े झुके रहें, भीरुता से ऊपरी पलकें नीचे की ओर हों और पुतलियां लज्जा से झुकी हों तो उसे ' लज्जान्विता ' दृष्टि जानो ॥ ६५ ॥
लोन पुटपक्ष्मा यी शिथिला मन्दचारिणी ।
क्लमप्रविष्टतारा च ग्लाना दृष्टिस्तु सा स्मृता ॥ ६६ ॥
जिसमें भौंहें, पलकें तथा बरौनियां ग्लान हों, धीरे धीरे घूमती हों और पुतलियां श्रम के कारण पलकों में ढँकी रहें तो उसे ' ग्लाना ' दृष्टि जानो ॥ ६६ ॥
किञ्चिञ्चला स्थिरा किञ्चिदुर्द्वता तिर्यगायता ।
गूढी चकिततारा च शङ्किता दृष्टिरिष्यते ॥ ६७ ॥
जो दृष्टि कभी हिलती हो कभी स्थिर रहती हो कभी ऊपर कभी तिरछी और कभी विस्तृत फैली हो, जो कभी गूढ़ हो जाए और जिसमें पुतलियां भयभीत ( या चकित ) लगती हों तो उसे ' शंकिता ' दृष्टि जानो ॥
विषादविस्तीर्णपुटापर्यस्तंान्ता निमेषिणी ।
किश्चिन्निष्टन्धतारा च कार्या दृष्टिर्विषादिनी ॥ ६८ ॥
जो दृष्टि व्यग्र हो, जिसमें विषाद के कारण पलकें फैली हों, नेत्रों के १. श्रमप्रम्लायित - क, श्रमप्रम्ला - ख ग । २. क्षामाकाख ० । ३. पतितोऽवपुटा लिया ग ० ४. त्रपाधोमुख - ग ० ५. ग्लान ग ० । ६. च ग ० P ७. क्रमप्रहृष्ट - क; क्लम प्रवृष्ट ग ० । ८. उत्तुङ्गा - क ०, दुन्नता ख ० । ९. मूढ़ाक । १०. पर्यस्तारा ग ० ।
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अष्टमोऽध्यायः कोने न खुलते और न बन्द होते हों और पुतलियां कुछ उसे ' विषादिनी ' दृष्टि जानो ॥ ६८ ॥
स्फुरदश्लिष्ट पक्ष्मार्धा मुकुलोर्ध्वपुटाश्चिता ।
सुखोन्मीलिततारा ' च मुकुला दृष्टिरिष्यते ॥
जिसमें बरौनियां कुछ कुछ धूजती तथा ( परस्पर ) ऊपरी पलकें कलियों जैसी अधखुली हों तथा पुतलियां हर्ष हों ( या खिली हों ) तो उसे ' मुकुला ' दृष्टि जानो ॥ ६ ९ ॥
या निश्चित पक्ष्माग्रा पुटैराकुञ्चितैस्तथा ।
सन्निकुञ्चिततारा च कुञ्चिता दृष्टिरिष्यते ॥
स्थिर हों तो ६ ९ ॥ मिली हुई रहें, के कारण फैली ७० ॥ सिकुड़ी पलकों के कारण जिसकी बरौनियों की नोके झुकी हुई हों और पुतलियाँ भी ( इसी कारण ) जिसमें सिकुड़ी हुई रहें तो उसे ' कुञ्चिता ' दृष्टि जानो ॥ ७० ॥
मन्दायमानतारा या पुटैः प्रचलितैस्तथा 1 सन्तापोपप्लुता दृष्टिरभितप्ता तु सव्यथा ॥ ७१ ॥
पलकों के हिलने से जिसमें पुतलियां धीरे धीरे घूमती रहती हों तथा ( इस प्रकार ) जो अतिशय दुर्गति और विघ्न को स्वतः प्रदर्शित करती हो तो ऐसी दृष्टि को ' अभितप्ता ' जानो ॥ ७१ ॥
लम्बिता कुञ्चितपुटा शनैस्तिर्यनिरीक्षणैः ।
गूढऽचकिततारा च जिह्मा दृष्टिरुदाहृता ॥ ७२ ॥
जिसमें पलकें झुकी तथा थोड़ी सिकुड़ी हुई हों, तिरछी चितवन हो, पुतलियां गूढ़ हों तथा दृष्टि भी ( जिसके कारण गूढ़ हो ) तो उसे ' जिह्मा ' दृष्टि जानो ॥ ७२ ॥
मधुरा कुञ्चितान्ता च सम्रक्षेपा च सस्मिता ।
समन्मथविकाराच दृष्टिः सा ललिता स्मृता ॥ ७३ ॥
जिसका अवलोकन कार्य मधुरता लिये हो, पलकों के कोने सिकुड़े हुए हों और जो ( दृष्टि ) खिलती हुई भौंहो की हलन चलन द्वारा कामजन्य विकारों को अभिव्यक्त करने वाली हो तो उसे ' ललिता ' दृष्टि जानो ॥७३ ॥
१. स्फुरिताश्लिष्ट – ग ० । २. सुखामीलित - क; सुखी मीलित - ख ० । ३. आनिकुञ्चितक, ख ० । ४. सन्नाकुञ्चित - क ० । ५. निरीक्षणी - ख ० । ६. निगूढ़ा गूढ़तारा च क ० ख ० । ७. क्षेपाथ- ग ० । ८. चख ० । २ ना ० शा ० द्वि ०
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१८ नाट्यशास्त्रम्
वितर्कोद्वर्तितपुटा तथैवोत्फुल्लतारका ।
अधोभागविचारा च दृष्टिरेषा वितर्किता ॥ ७४ ॥
जिसमें अटकल ( या तर्क ) के कारण पलकें ऊपर उठी हुई हों और पुतलियां खिली हुई तथा नीचे की ओर हिलने वाली हों तो उसे ' वितर्किता ' दृष्टि जानो ॥ ७४ ॥
अर्धव्यकोशपेक्ष्मा च ह्लादार्धमुकुलैः पुटैः ।
स्मृतार्धमुकुला दृष्टिः किञ्चिल्लुलिततारका ॥ ७५ ॥
जिसमें बरौनियां आधी खिली हों ( या खुली हों ), पलकें भी आधी खिली ( या खुली हुई हों तथा पुतलियाँ ( जिसमें ) पूर्ण रूप में खिली हुई एवं नीचे की ओर घूमती हुई रहती हों तो उसे ' अर्धमुकुला ' दृष्टि जानो ॥७५ ॥
विभ्रान्ततारका या तु विभ्रान्तपुटदर्शना ।
विस्तीर्णोत्फुल्लनेत्रा च विभ्रान्ता दृष्टिरिष्यते ॥ ७६ ॥
जिसमें पुतलियाँ तथा पलकें घूमती हुई रहें और आंखें पूर्ण रूप से खिली तथा फैली हुई हों तो उसे ' विभ्रान्ता ' दृष्टि जानो ॥ ७६ ॥
पुटौ प्रस्फुरितौ स्यानिष्टब्धौ पतितौ पुनः ।
विप्लुतोद्वृत्ततारा च दृष्टिरेषा तु विप्लुता ॥ ७७ ॥
( पहिले ) जिसमें ( दोनों ) पलकें धूजें और फिर स्थिर हो जाएं तथा पुतलियाँ विघ्न के कारण ऊपर की ओर फड़कती रहें तो उसे ' विप्लुता ' दृष्टि जानो ॥ ७७ ॥
आकुञ्चितपुटा पाङ्गा सङ्गतार्धनिमेषिणी ।
मुहुर्व्यावृत्ततारा च दृष्टिराकेकरा स्मृता ॥ ७८ ॥
जिसमें पलकें और आँखों के कोने थोड़े सिकुड़े हुए, एक दूसरे से मिले हुए और आधे खुले हुए हों और पुतलियाँ बार बार गोल घुमाव लेते हुए रहती हों तो उसे ' आकेकरा ' दृष्टि जानो ॥ ७८ ॥
विकोशितोभयपुटा प्रोत्फुल्ला चानिमेषिणी ।
अनवस्थितताराच विकोशा दृष्टिरिष्यते ॥ ७ ९ ॥
जिसमें दोनों पलकें फैली हुई, खिली हुई तथा न गिरने वाली हों और पुतलियाँ अव्यवस्थितगतिशील हों तो उसे ' विकोशा ' दृष्टि जानो ॥७ ९ ॥ १. अधोमुख विरा च - क ०, अधोगत - ख ० ग ० । २. दृष्टिरिष्टा - ० । ३. तारा — ग ० । ४. अनवस्थिततारा च विभ्रान्ताकुलदर्शना - क - ख ० । ५. नयना - क - मध्याख ० । ६. यस्य क ० । ७. रुच्यते - ग ० ।
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अष्टमोऽध्यायः १ ९
त्रासोवृत्तपुटा या तु तथोत्कम्पिततारका ।
सन्त्रासोत्फुल्लुमध्या च त्रस्ता दृष्टिरुदाहृता ॥ ८० ॥
त्रास के कारण ( जिसमें ) पलकें उठी हुई हों, पुतलियाँ ऊपर की ओर घूमती रहती हों तथा जिसका खिला हुआ मध्य भाग रहे तो उस दृष्टि को ' स्ता ' कहते हैं ॥ ८० ॥
आघूर्णमानमध्या या क्षामान्ताञ्चितलोचना ।
दृष्टिर्विकसितापाङ्गा मदिरा तरुणे मदे ॥ ८१ ॥
जिसमें दृष्टि का मध्य भाग घूमने वाला, ( आँखों के ) कोने पतले और आखें झुकी हुई रहें और आँखों की नोके पूर्ण फैली हुई हों तो उसे ' मदिरा ' दृष्टि जानो । इस प्रकार की दृष्टि ' तरुणमद ' में रखी जाती है ॥ ८१ ॥
किञ्चिदाकुञ्चिता किञ्चिल्लुलिततारका ।
अनवस्थितसञ्चारा दृष्टिर्मध्यमदे भवेत् ॥ ८२ ॥
' मध्यमद ' में इसी दृष्टि में पलकें थोड़ी सिकुड़ी हुई रहती हैं एवं पुतलियाँ और बरौनियाँ क्रमहीन दशा में ( थोड़ी ) हिलती रहती हैं ॥८२ ॥
सनिमेषाऽनिमेषा च किञ्चिद्दर्शिततारका ।
अधोभागचरी दृष्टिरधमे तु मदे स्मृता ॥। ८३ ॥
' अधममद ' में इसी दृष्टि में या तो पलकें गिरने लगती है या एकदम रुक जाती हैं, पुतलियाँ थोड़ी मात्रा में देखने लगती है और नीचे की ओर घूमती रहती है ॥ ८३ ॥
इत्येवं लक्षिता ह्येषा षट्त्रिंशद्दष्टयो मया ।
रसजा भावजाश्वासां विनियोगं निबोधत ॥ ८४ ॥
इस प्रकार मैंने इन छत्तीस प्रकार की दृष्टियों के लक्षण बतलाये जो रस तथा भावों की अभिव्यंजक हैं । अब मैं इनकी योजना ( या विधान ) बतलाता हूँ ॥ ८४ ॥
रसजास्तु रसेष्वेव स्थायिषु स्थायिदृष्टयः ।
शृणुत व्यभिचारिण्यः सञ्चारिषु यथास्थिताः ॥ ८५ ॥
इनमें रसदृष्टियों की रसों में योजना की जाती है तथा स्थायी - भाव-दृष्टियों की स्थायी - भावों में । ( जो कि बतला दी गई है अतएव ) अब १. त्रासादुत्फुल्ल – क ०; त्रासोत्कम्पित – ग ० । २. व्याघूर्णमान - ग ० । ३. ह्यनवस्थिततारका - ख - ग ० । ४. सहजा क ० । ५. शृणुध्वं ग ० । ६. यथा हि ताः ग ० ।