भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ — पृष्ठ 401–410
भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ · पृष्ठ 401–410
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२ ९ ० नाट्यशास्त्रम् यथा
सरांसि हंसैः कुसुमैश्च वृक्षाः मत्तैर्द्विरेफैश्च सरोरुहाणि ।
गोष्ठीभिरुद्यानवनानि चैव तस्मिन्नशून्यानि सदा क्रियन्ते ॥ ५७ ॥
उदाहरण: - वहां हंसी से सरोवर, पुष्पों से वृक्ष, मत्त भंवरों से कमल तथा गोष्ठियों से उपवन ( सदा ) ( शोभा ) युक्त रहते हैं ॥ ५७ ॥
रूपक-स्वविकल्पेन ' रचितं तुल्यावयवलक्षणम् ।
। कञ्चित्सादृश्यसम्पन्नं यद् रूपं रूपकन्तु तत् ॥ ५८ ॥
जो अपने विकल्प से निर्मित ' तुल्य अवयवों वाला तथा थोड़ा सादृश्य गुण युक्त ( अभिन्न ) रूप हो वह ' रूपक " कहलाता है ॥ ५८ ॥
[ ' नानाद्रव्यानुरागाद्यैर्यदौपम्यगुणाश्रयम् । रूपनिर्वर्णनायुक्तं तद्रूपकमिति स्मृतम् ॥ ] [ प्रक्षिप्त - अनेक द्रव्यों के सम्बन्ध से उपमा के गुणों का आश्रय लेकर जिसके स्वरूप का सम्यक् वर्णन हो उसे ' रूपक ' कहते हैं ॥ ]
यथा-पद्माननास्ताः कुमुदप्रभासा ' ' विकोशनीलोत्पलचारुनेत्राः ।
' वापीस्त्रियो हंसकुलैः स्वनद्भिः विरेजुरन्योन्यमिहालपन्त्यः ॥ ५ ९ ॥
उदाहरण - वे वापियों में स्थित कमलवदनी, कुमुदहासिनी तथा विकसित नीलकमल सदृश नेत्रों वाली ललनाएं कूजित हंसी के द्वारा एक दूसरे को बतलाती हुई शोभित हुईं ॥ ५ ९ ॥ १. ' रूपक ' का प्रक्षिप्त कारिका में अन्य लक्षण दिया गया है । इसका यहाँ संनिवेश अभिनवगुप्तपाद द्वारा उद्धृत एवं व्याख्यात होने से मूल के साथ किया गया । ( सम्पा ० ) १. स्वविकल्पैविरचितं – क ०, ख ० । २. नानाद्रव्यानुषङ्गाद्यैर्यदौपम्यं गुणाश्रयम् — ख ०; ग ० । ३. प्रकाशा – ख ०; प्रहासा – क ०; ग ० । ४. विलोल - क ०; विकासिनीलो - ख ०, ग ० । ५. वापीतरुण्योऽधिककद्य भान्ति शोभा मिवान्योन्यमधिक्षिपन्त्यः । — क ० । ६. नदद्भि: - ख ०; ग ० । ७. मिवालपन्त्य: - क ०, रन्योन्यमिवाह्वयन्त्यः – ख ०; ग ० ।
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सप्तदशोऽध्यायः २ ९ १
यमक-शब्दाभ्यासस्तु ' यमकं पादादिषु विकल्पितम् ।
विशेषदर्शनञ्चास्य गदतो मे निबोधत ॥ ६० ॥
शब्दों की आवृत्ति ‘ यमक " कहलाती है । जो कि पादों से प्रारंभ होकर अनेक विधाओं को धारण करती हैं । अब इनके विशेष स्वरूप को बतलाता हूँ । आप ध्यान पूर्वक सुनें ॥ ६० ॥
यमकोंके दस प्रकार—
पादान्तयमकञ्चैव काञ्चीयमकमेव च ।
समुद्रयमकञ्चैव विकान्तयमकन्तथा ॥ ६१ ॥
यमकं चक्रवालञ्च संदध्यमकं तथा ।
पादादियमकञ्चैव तथाम्रेडितमेव च ॥ ६२ ।
चतुर्व्यवसितञ्चैव मालायमकमेव च ।
एतद्दशविधं ज्ञेयं यमकं नाटकाश्रयम् ॥ ६३ ॥
द्रश्य काव्य ( नाटक ) में होनेवाले यमक के दस प्रकार होते हैं । यथा - ( १ ) पादान्तयमक, ( २ ) काञ्ची - यमक, ( ३ ) समुद्र - यमक, ( ४ ) विक्रान्त - यमक, ( ५ ) चक्रवाल- यमक, ( ६ ) संदष्ट - यमक, ( ७ ) पादादि - यमक, ( ८ ) आम्रेडित - यमक, ( ९ ) चतुर्व्यवसित - यमक
तथा ( १० ) माला- यमक ॥। ६१-६३ ॥
पादान्तयमक-चतुर्णी यत्र पादानामन्ते स्यात् सममक्षरम् ।
तद्धि पादान्तयमकं विज्ञेयं नामतो यथा ॥ ६४ ॥
( लक्षण ) यदि चारों पादों के अन्त में समान पद ( अक्षर ) हो तो उसे ' पादान्तयमक ' समझना चाहिये ॥ ६४ ॥
यथा - दिनक्षयात् संहृतरश्मिमण्डलं दिवीव लग्नं तपनीयमण्डलम् । १. ' यमक ' के भरतमुनि ने १० प्रभेद किये हैं । आचार्य भामह ने इसके ५ भेद माने हैं तथा भरतमुनि के १० प्रभेदों का अपने भेदों में अन्तर्भाव भी निर्दिष्ट किया है । ( द्र ० भाम ० काव्या ० २।९ ० ) १. शब्दाभ्यासं कं ० । २. पदान्त - क ० । ३. सामुद्ग – क ० । ४. आम्रेडितमथापि च - क ० । ५. स्याद् यमकाक्षरम् - क ० ।
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२ ९ २ नाट्यशास्त्रम् विभाति ताम्रं दिवि सूर्यमण्डलं यथा तरुण्याः स्तनभारमण्डलम् ' ॥ ६५ ॥
दिन की समाप्ति पर ( सायंकाल ) सूर्य का रक्ताभ मण्डल अपने रश्मिमण्डल को समेटते हुए, आकाश में स्वर्णिमवृत्त जैसा चमकते हुए तरुणियों के उरोजमण्डलों जैसा प्रतीत हो रहा है ॥ ६५ ॥
काञ्चीयमक— पादस्यादौ तथान्ते च यत्र ' स्यातां पदे समे तत् काञ्चीयमकं नाम विज्ञेयं सूरिभिर्यथा यदि पाद के आदि तथा अन्त में समान पद हों तो यमक जानें ॥ ६६ ॥
यथा - " यामं यामं चन्द्रवतीनां द्रवतीनां व्यक्ताव्यक्ता सा रजनीनां रजनीनाम् । फुल्ले फुल्ले सभ्रमरे वा भ्रमरे वा रामा रामा विस्मयते च स्मयते च ॥
।
॥ ६६ ॥
उसे ' काञ्ची- ' ६७ ॥ चन्द्र से पूर्ण रात्रियों के लम्बे प्रहर ( याम ) का — जो सुन्दरियों के सान्निध्य में बीत रहे हैं - ज्ञान कभी रहता है और कभी बिखर जाता है तथा पुष्प भ्रमरों से युक्त तथा विहीन हो रहे हैं तथा अनिन्द्यि ललना गण कहीं उसके कारण मुस्करा रही हैं और विस्मित हो रही हैं ॥ ६७ ॥
समुद्ग यमक—
' अर्धेनैकेन यद्वृत्तं सर्वमेव समाप्यते ।
" समुद्रयमकं तत्तु विज्ञेयं नामतो यथा ॥ ६८ ॥
लक्षण वृत्त के अर्ध भाग की आवृत्ति द्वारा सम्पूर्ण वृत्त की पूर्ति ' समुद्र यमक ' कहलाती है ॥ ६८ ॥
१. क ० पुस्तके तु
लोकानां प्रभविष्णुर्दैत्येन्द्रगदानिपातनसहिष्णुः ।
जयति सुरदैत्य जिष्णुर्भगवानसुरवरमथनकारि विष्णुः ॥
इति पद्यम् अधिकं प्रक्षिप्तञ्च । २. तथा चादी —- क ०, ग ० तथा चान्ते - ख ० । ३. स्यातां यत्र - ख ०; स्यातां तत्र ग ० । ४. चैव - ग ० । ५. माया माया - ख ०; ग ० । ६. सारजनी सा रजनी साक ० । ७. साधेनैकेन – क ० । ८. सर्वमेवं क ० । ९. सामृग – क ० । १०. नाम तज्ज्ञेयं पण्डितैयथा - ख ०; ग ० ।
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सप्तदशोऽध्यायः २ ९ ३
यथा - केतकीकुसुमपाण्डुरदन्तः ' शोभते प्रवरकाननहस्ती ।
केतकीकुसुमपाण्डुरदन्तः शोभते प्रवरकाननहस्ती ॥ ६ ९ ॥
इस विशाल वन - गज के दांत केतकी के पुष्पों जैसे श्वेत पीत दिखाई दे रहे हैं । तथा हाथी- रूपी विशालवन अपने केतकी के पुष्पों के पीले नीले रंग के दांतों से और अधिक सुन्दर दिखलाई पड़ता है ॥ ६ ९ ॥ विक्रान्त यमक—
एकैकं पादमुत्क्रम्य द्वौ पादौ सदृशी यदा ।
विक्रान्तयमकं नाम विज्ञेयं नामतो यथा ॥ ७० ॥
यदि एक पाद को छोड़कर दूसरा पाद समान हो ( अर्थात् द्वितीय और चतुर्थ पाद की रचना समान हो ) तो उसे ' विक्रान्त यमक ' जानें ॥ ७० ॥
यथा- पूर्व वारणो भूत्वा द्विश्टङ्ग इव पर्वतः ।
अभवद्दन्तवैकल्याद्विश्टङ्ग इव पर्वतः ॥ ७१ ॥
यह हाथी पहिले अपने दो अंगों ( दांत, चोटी ) वाले पर्वत से तुलनीय रहता था अब इसके दोनों दांत टूट जाने से यही शृङ्गहीन पर्वत जैसा हो रहा है ॥ ७१ ॥
चक्रवाल यमक-पूर्वस्यान्तेन पादस्य परस्यादिर्यदा समः ।
चक्रवच्चक्रवालं तद् विज्ञेयं नामतो यथा ॥
यदि पादान्त शब्द की दूसरे पाद प्रारंभ में आवृत्ति ' चक्रवाल यमक ' कहते हैं ॥ ७२ ॥
यथा - शैलास्तथा ' शत्रुभिराहताहता हताश्च " भूयस्त्वनुपुङ्खगैः खगैः ।
१. मुकुल - ख ०, ग ० । २. मुकुल -- ख ०; ग ० ।
७२ ॥
की जाए तो उसे ३. मुत्क्षिप्य - ख ० । ४. यदि - ग ० । ५. तद्विज्ञेयमिदं - क ० । ६. सम्पूर्ण वारण - ख ०; स पूर्वं वानरो - ग ० । ७. पादस्या क ० । ८. चक्रवालयमकस्य लक्षणान्तरं क- -पुस्तके तु -तुल्यात् पादद्वयादन्त्यादेकेनादियंदा समः । सर्वत्र चक्रवालं तद्विज्ञेयं नामतो यथा ॥ इति अधिकं प्रक्षिप्तञ्च । ९. तलैस्तथा — क ०; शैला यथा - ख ० ग ० । १०. भूयोऽप्यनु – ख ०; बाणैरनुपुङ्खगै- -० । 98
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२ ९ ४ नाट्यशास्त्रम् खगैश्च सर्वैर्युधि सञ्चिताश्चिता - ' म न श्चिताधिरूढा निहतास्तलैस्तलैः ॥ ७३ ॥
जैसे ये पर्वत शत्रुओं के बाणों और उनके पीछे आने वाले शिकारी पक्षियों से आहत होकर मर गए वैसी ही यह युद्ध भूमि भी ऐसे खों वाले पक्षियों की तरह बाणों से आच्छादित हो गई है और चिता पर रखे हुए शव इन पक्षियों की चोचों से और नखों से क्षतविक्षत हो गए हैं ॥ ७३ ॥
सन्दष्ट - यमक-आदौ द्वे यत्र पादे तु भवेतामक्षरे समे ।
सन्दष्टयमकं नाम विज्ञेयं नामतो यथा ॥ ७४ ॥
यदि पाद के प्रारंभ में दो समान शब्दों की आवृत्ति हो तो ' सन्दष्ट-यमक ' होता है ॥ ७४ ॥
यथा-पश्य पश्य रमणस्य मे गुणान् येन येन वशगां करोति माम् ।
येन येन हि ममैति दर्शनं तेन तेन वशगां करोति माम् ॥ ७५ ॥
देखो देखो, मेरे प्रिय की विशेषताएं; जिनसे वह मुझे आकृष्ट कर रहा है, यह जब भी मेरी दृष्टि में आता है तभी मुझे अपनी ओर झुका पादादियमक-आदौ पादे ' तु यत्र स्यात् समावेशसमाक्षरः पादादियमकं नाम विज्ञेयं " नामतो यथा यदि प्रत्येक पाद के प्रारंभ में आनेवाले शब्द की आगे आवृत्ति हो तो ' पादादियमक ' होता है ॥ ७६ ॥
यथा - विष्णुः सृजति भूतानि विष्णुः संहरते लेता है ॥ ७५ ॥
।
॥ ७६ ॥
सभी पादों में
प्रजाः ।
विष्णुः " प्रसूते त्रैलोक्यं " विष्णुर्लोकाधिदैवतम् ” ॥७७ ॥
१. सञ्चिताञ्चिता - ग ० । 3 २. निहताः फलैः फलैः - ख; हि हता हता नराः - ग ० । ३. सन्देशं क ० । ४. तद् बुधैः - ख ०; ग ० । e ५. यस्य यस्य ग ० । ६. गुरणाः क ० ० ७. दिनमेति - ख ०; हि समैति - ग ० । पादस्य - ख ०, ग ० । ९. समावेशः समाक्षरः - ख ०; ग ० । १०. तद्विज्ञेयं बुधैयथा - ख ०; ग ० । ११. विष्णु प्रसूतं क ० 12 १२. यच्च - क ० । १३. लोकादिदैवतम् -- ख ० ।
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सप्तदशोऽध्यायः २ ९ ५ विष्णु समस्त प्राणियों की रक्षा करते हैं, वे ही संहार करते हैं तथा वे ही त्रिलोकी का निर्माण भी करते हैं । ये श्री विष्णु भगवान् सभी लोकों के स्वामी हैं ॥ ७७ ॥
आम्रेडित यमक-पादस्यान्त्यं पदं यत्र द्विर्द्विरेकमिहोच्यते ।
ज्ञेयमाम्म्रेडितं नाम यमकं तत्तु सूरिभिः ॥ ७८ ॥
यदि पाद का अन्तिम पद दो बार आवृत्त हो तो उसे आम्रेडित यमक जानो ॥ ७८ ॥
यथा-विजृम्भितं निःश्वसितं मुहुर्मुहुः कथं विधेय स्मरणं पदे पदे ।
यथा च ते ध्यानमिदं पुनः पुनः ध्रुवं गता ते रजनी विना विना ॥७ ९ ॥
लम्बी उसासें लेते हुए जैसे ही तुमने उसका नाम लिया उसका मुझे तुरन्त स्मरण हो आया और फिर निश्चल हो उसी के ध्यान में ( मेरी ) उदास होते हुए मेरी सारी रात बीत गई ॥ ७ ९ ॥ चतुर्व्यवसित यमक-सर्वे पादाः समा यत्र भवन्ति नियताक्षराः । शागड चतुर्व्यवसितं नाम तद्विज्ञेयं बुधैर्यथा ॥ ८० ॥।
यदि चारों पाद समान अक्षर वाले हों तो ' चतुर्व्यवसित- यमक ' होता है ॥ ८० ॥
यथा- - वारणानामयमेव कालो वारणानामयमेव कालः ।
वारणानामयमेव कालो वारणानामयमेव कालः ॥ ८१ ॥
यह समय पुष्पों ( वारण ) ( की बहार ) का है, यही वह ऋतु है जब हाथी ( वारण ) व्याधिरहित होता है । यह शत्रुओं के ( आक्रमण हेतु ) आने का समय और उनके प्रतीकारार्थ वीरों के युद्धभूमि में कूदने का भी यही समय है ॥ ८१ ॥
१. यच्च - ग ० । कि २. पादान्ताम्रेडितं नाम विज्ञेयं निपुणैर्यथा – ख ०, ग ० ॥ ३. यथाभिधानं - क ०; ग ०; कथाभिधानं ख ० । ४. तथागता ते - ख ०; ग ० । ५. सावारणानामिति सर्वत्र पाठः । ख ० पुस्तके, ग ० पुस्तके तु सावारणा-नामसमेव ' इति पाठः समुपलभ्यते ।
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२ ९ ६ नाट्यशास्त्रम्
मालायमक-नानारूपैः स्वरैर्युक्तं यत्रैकं व्यञ्जनं भवेत् ।
तन्मालायमकं नाम विज्ञेयं काव्यकोविदैः ॥ ८२ ॥
जब अनेक व्यञ्जनों से युक्त एक ही स्वर विभिन्न शब्दों में आता हो तो उसे मालायमक कहते हैं ॥ ८२ ॥
यथा - हली बली हली ' माली खेली ' माली सली जली ।
" खलो बलो बलो मालो मुसली त्वभिरक्षतु ॥ ८३ ॥
जो वीर, मालाओं से विभूषित, हाथ में अनाज की बाली रखे हुए, खिलाड़ी, लड़खड़ा कर चलने वाले, भावों से ओतप्रोत, शक्तिशाली, चंचल नेत्रों वाले और हाथ में गदा घरने वाले हैं वे भगवान् बलराम तुम्हारी रक्षा करें ॥ ८३ ॥
असौ हि रामा रतिविग्रहप्रिया ' रहः प्रगल्भा रमणं मनोगतम् ।
` रतेन रात्रौ रमयेत् परेण वा न चेदुदेष्यत्यरुणः पुरो रिपुः ॥ ८४ ॥
प्रणय द्वन्द्व में रुचि लेने वाली यह सुन्दरी रमणी रात में अपने आलिंगन अपने प्रियतम को बिना लज्जा किये हुए तब तक प्रगाढ़ रिझाती रहेगी जब तक उसका शत्रु सूर्य सम्मुखवर्ती पूर्व दिशा में उदय नहीं हो जाता ॥ ८४ ॥
क्षतजोक्षिताक्षः क्षरत्क्षतेभ्यः क्षतजं दुरीक्ष्यम् " ।
स पुष्कराक्षः साक्षात् सहस्राक्ष इवावभाति ॥८५ ॥
क्षतैर्गवाक्षैरिव संवृताङ्गः यह वीर जो कमल के समान नेत्र वाला है, जिसके नेत्र क्रोध से भरे होने से रक्त से नहाए हुए से लगते हैं, जिसके घावों से रक्त बह रहा है और जिसके शरीर के घाव वातायन के समान मोटे और खुले हुए हैं, अतएव यह सम्प्रति सहस्र नेत्रों वाले इन्द्र जैसा लग रहा है ॥ ८५ ॥
१. यत्र - ग ० । २. पाठकैयथा – ख ०; पण्डितैयथा - ग ० । ३. लली - ख ०; ग ० । ४. शूली जाली लली जली - ख ०; ग ० । ५. बलो बलोच्चलोलाक्षो - ख ०; ग ० । ६. स्वाभिरक्षतु ग ० । ७. विग्रहः – ख ० । ८. मनोद्गतम् — क ०; रहोगतम् - ख ०; ग ० । ९. रात्रि - ख ०; ग ० । १०. क्षतजीक्षिताक्षः - ख ०; ग ० । ११. दुरीक्ष्यः - ख ० । १२. संवृताक्षः - ख ०; ग ०
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सप्तदशोऽध्यायः २ ९ ७
एभिरर्थक्रियायुक्तः ' काव्यं कुर्यात्तु लक्षणैः ।
अतः परं प्रवक्ष्यामि काव्यदोषान् गुणांस्तथा ॥ ८६ ॥
नाटकों की रचना ( उनके ) विषय तथा कार्य ( अवस्था ) आदि का विचार करते हुए इन अलङ्कारों की योजना काव्य में करनी चाहिए । अब मैं काव्य रचनाओं में होने वाले दोषों को बतलाता हूँ ॥ ८६ ॥
काव्यदेोष-" गूढार्थमर्थान्तरमर्थहीनं भिन्नार्थमेकार्थमभिप्लुतार्थम् ।
न्यायादपेतं विषमं विसन्धि शब्दच्युतं वै दश काव्यदोषाः ॥ ८७ ॥
काव्यगत दोष दस ( प्रकार के ) हैं । यथा - ( १ ) गूढ़ार्थ, ( २ ) अर्थान्तर, ( ३ ) अर्थहीन, ( ४ ) भिन्नार्थ, ( ५ ) एकार्थ, ( ६ ) अभिप्लुतार्थ, ( ७ ) न्यायादपेत, ( ८ ) विषम, ( ९ ) विसन्धि तथा ( १० ) शब्दच्युत ॥ ८७ ॥
“ पर्यायशब्दाभिहितं गूढार्थमिति संज्ञितम् । गूढ़ार्थः — जहां पर्यायवाचक ( अप्रसिद्ध ) शब्दों द्वारा वर्ण्य या विषय को कह दिया जाय तो उसे ' गूढ़ार्थ ' समझना चाहिए । ' अवर्ण्य वर्ण्यते यत्र तदर्थान्तरमिष्यते ॥ ८८ ॥
अर्थान्तर — जहाँ अवर्णनीय विषय का वर्णन किया जाय उसे अर्थान्तर ' दोष कहा जाता है ॥ ८८ ॥
१. ' गूढार्थ ' में क्लिष्ट शब्द का प्रयोग करने से अर्थ - ज्ञान में कठिनाई था जाती है । जैसे— दशरथ के लिये ' एकाधिकनवविमान ' पद का प्रयोग । परवर्ति आचार्यों के ' निहतार्थत्व ' दोष से इसकी तुलना की जा सकती है । २. वर्णनीय अर्थ के साथ किसी अनभोष्ट या अवर्णनीय अर्थ को भी जब साथ-साथ प्रतीति हो तो ' अर्थान्तर ' होता है । जैसे - चिन्तामोहमनङ्गमङ्ग तनुते विप्रेक्षितं सुभ्रुवः ' यहाँ काम का बतलाना इष्ट है पर इसी के साथ बुद्धि में चिन्ता और मोह की भी बिना वर्णन के प्राप्ति हो जाती है । इसे मम्मटादि सम्मत ' अमतपरार्थता ' दोष मानना चाहिए । १. क्रियापेक्षं - ख ०; क्रियापेक्ष:: -ग - ० । २. कार्य तु ख ० । ३. ऊर्ध्व तु वक्ष्यामि – ग ० । ४. समासतः - ख ०; दोषांस्तथाविधान् — ग ० । ५. अगूढ — ग ० । ६. च्युतच शब्दात् — शब्दात् च्युतं क ० । ७. इतः आरभ्य सार्धश्लोकपञ्चकं केषुचिदादर्श पुस्तकेषु नास्ति । ८. मभिसंज्ञितम् - क ०; ग ० । ९. यत्तु — क ० ।
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नाट्यशास्त्रम् २ ९ ८ त्वसम्बद्धं ' सावशेषार्थमेव च । अर्थहीनं अर्थ हो या जो अर्थ असमाप्त ( अर्थहीन — जो असम्बद्ध
तो उसे ‘ अर्थहीन ” दोष कहा जाता है ।
ग्राम्यमेव च ॥ ८ ९ ॥
अधूरा ) हो भिन्नार्थमभिविज्ञेयमसभ्यं के सूचक अर्थ को भित्रार्थ ' दोष भिन्नार्थ — असभ्य या ग्राम्य अर्थ जानो ॥ ८ ९ ॥ एवार्थो यत्रान्यार्थेन विद्यते विवक्षितोऽन्य भिन्नार्थं तदपि प्राहुः काव्यं काव्यविचक्षणाः विविक्षित अर्थ के स्थान पर अविवक्षित अथवा जहाँ ' भिन्नार्थ ' दोष कहते हैं ॥ ९ ० किया जाय तो उसे भी विद्वान् यत्तदेकार्थमिति स्मृतम् ॥ ॥ ९ ० ॥ अर्थ का कथन ॥ " अविशेषाभिधानं पर अर्थ के असम्बद्ध हो जाने १. पूर्व कथन से उत्तर कथन के विरोध होने रसालसं मनो मे दोष हो जाता है । जैसे— ' अद्यापि स्मरति मन से यह । ( मेरा रस या आनन्द से मन्थर मुग्धायाः स्मरचतुराणि ' इत्यादि ) का स्मरण करता है ) यहाँ अभी भी उस स्मरचतुरा मुश्धा ( भोली का विरोध बतलाना पूर्वकथन से उत्तरकथन मुग्धा कहकर स्मरचतुरा अधूरे कथन के रहने पर यह उदाहरण-है । इसी प्रकार असमाप्त या महामना भाग्यवश महान् । ' ( वह ' स महात्माभाग्यवशान्महापदमुपागतः प्राप्त कर गया । ) प्रस्तुत उदाहरण में पद या महती आपत्ति को या वक्तव्य शेष होने से के अनुसार अन्य सम्बद्ध शब्द की न्यूनता प्रकरण ' अर्थहीन ' दोष हो गया है ॥ ( १ ) जहाँ व्यवधान २. भिन्नार्थं दोष की तीन अवस्था में उपलब्धि होगी आए, ( २ ) जहाँ असभ्य के कारण अर्थ का अन्वय करने में कठिनाई या उद्दिष्ट अर्थ के अर्थ का अभिधान हो तथा ( ३ ) विवक्षित या ग्राम्य का अन्यथाकरण हो । विपरीत कथन या उद्दिष्टार्थ १. सा त्वशेषार्थमेव च – ख ०; ग ० । १३. विवक्षितान्य क ० । DIREC २. मषि - क ० । ५ तत्तु ते ०. ४. यत्वन्यार्थेन भिद्यते - ० ० ६. काव्यविदो जनाः- क ०, काव्यविचक्षणाः ०० यत् ख ० ० ० ० ७. एकार्थस्याभिधानं
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सप्तदशोऽध्यायः २ ९९ एकार्थ- जहां अनेक शब्दों का एक ही अर्थ के लिए प्रयोग किया जाय
तो ‘ एकार्थ ” नामक दोष होता है ।
' अभिप्लुतार्थ विज्ञेयं यत् पदेन समस्यते ॥ ९ १ ॥
अभिप्लुतार्थ - जिसके प्रत्येक पाद में संक्षेप में वाक्यार्थ ( पूर्णरूप से ) स्थापित किया जाय उसे ' अभिप्लुतार्थ " नामक दोष जानो ॥ ९ १ ॥ न्यायादपेतं विज्ञेयं प्रमाणपरिवर्जितम् । न्यायादपेत- -प्रमाण रहित विषय का कथन ' न्यायादपेत'३ नामक
काव्य दोष कहलाता है ।
वृत्तभेदो भवेद्यत्र विषमं नाम तद्भवेत् ॥ ९ २ ॥
विषम – छन्दों भंग होने पर ' विषम " नामक काव्य - दोष हो जाता है । " अनुपश्लिष्टशब्दं यत् तद्विसम्धीति कीर्तितम् । १. एकार्थं दोष का उदाहरण है: - ' कुन्देन्दुहार हरहाससितम् ' यहाँ वर्ण्य की शुभ्रता के लिये कुन्द, चन्द्र, पुष्पमाला, शिवजी का हास आदि अनेक उपमाएँ दी जाने से यह कथन एक ही अर्थ की पूर्ति करता है । २. प्रत्येक पाद में अर्थ समाप्त हो जाने के कारण एकवाक्यता न आने से
भतार्थं दोष हो जाता है । जैसे: --स राजा नीतिकुशलः सरः कुमुदशोभितम् ।
सर्वप्रिया वसन्तश्री ग्रीष्मे मालतिकागमः ॥
यहाँ प्रत्येक पाद का अर्थ दूसरे किसी पाद के विषय से सम्बद्ध नहीं है । ३. प्रमाणरहित विषय का आशय है कि देश तथा काल के या कला एवं शास्त्रादि के विपरीत अभिधान करना न्यायादपेत दोष है जैसे - सुबीरेष्वस्ति नगरी मथुरा नाम विश्रुता । अक्षोनारिकेलाढ्या यस्याः पर्यन्तभूमयः ॥ इति । ४. यति भंग के या छन्द के लक्षण का व्यवस्थित अनुगमन न करने के कारण ' विषम ' नामक काव्यदोष होगा । इसे ही उत्तरवर्ती आचार्यों ने ' हतवृत्तता ' दोष कहा है । १. अविप्लुतार्थ - क ० ।
२. नोपपन्नं भवेत्तु यत् — क ०; प्रमाणपरिवर्तितम् - ग ० ।
३. वृत्तभेदे - क ०; वृत्तदोषो - ख ०, ग ० ॥
४. अनुपारूढशब्दश्च विसन्धिः परिवर्जितः क ०; अनु प्रतिष्ठाशब्दं यत् तद्विसन्धीति काशितम् — ख ०; ग ० ।