भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ — पृष्ठ 421–430
भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ · पृष्ठ 421–430
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३१० नाट्यशास्त्रम्
आकारस्तु ' स्मृते कार्यम् ऊकारश्चाभ्यसूयिते ।
परिदेविते च हाकारम् ' ओङ्कारोऽध्ययने तथा ॥ ११६ ॥
स्मरण में ' आ ' का असूया में ' ऊ ' का, रोदन में ' हा ' का तथा चेदों के अध्ययन में ' ओम् ' का प्रयोग होना चाहिए ॥ ११६ ॥
ह्रस्वदीर्घप्लुतानीह यथाभावं यथारसम् ।
' काव्यबन्धेष्वशेषेषु ह्यक्षराणि प्रयोजयेत् ॥ ११७ ॥
इसके अतिरिक्त सभी प्रकार की काव्य - रचनाओं में भाव तथा रसों की स्थिति के अनुरूप ह्रस्व, दीर्घ तथा प्लुत अक्षरों का प्रयोग करना चाहिए ' ॥ ११७ ॥
" यच्छन्दः पूर्वमेवोक्तं विषमार्द्धसमे समम् ।
' उदारमधुरैः शब्दैस्तत् ' कार्यन्तु रसानुगम् ॥ ११८ ॥
पूर्व अध्याय में जिन सम, अर्धसम तथा विषम छन्दों को बतलाया गया है उनका उदार तथा मधुर शब्दावली द्वारा काव्यों में अर्थानुसारी प्रयोग किया जाए ॥ ११८ ॥
शब्दानुदारमधुरान् प्रमदाभिधेयान् ' नास्याश्रयासु कृतिषु प्रयतेत कर्तुम् । तैर्भूषिता भुवि विभान्ति हि काव्यबन्धाः पद्माकरा विकसिता इव राजहंसैः ॥ ११ ९ ॥ नाटककार अपनी रचना में ऐसे शब्दों का प्रयोग करे जो औदार्य गुण १. आशय यह कि दूर से बुलाने आदि के लिये व्याकरण शास्त्र में अभिहित प्लुत आदि नियमों का भी प्रयोग विधिवत् करना चाहिए । १. अकारस्तु स्मृते कार्ये – ग ० । २. हुङ्कारं वाप्यसूयिते - ख ०; उकारश्चाप्यसूचिते - ग ० । ३. हुंकार - ख ० । ४. एतानि कान्ययोगेषु त्वक्षराणि निवेशयेत् क, काव्ययोगेष्वक्षराणि यथा शोभं निवेशयेत् — ख ० । काव्ययोगेषु सर्वेषु ह्यक्षराणि तु योजयेत् - ग ०; । ५. ये बन्धाः पूर्वमुद्दिष्टा विषमार्धसमा समाः - ख ० । ६. उदारशब्दे मंधुरैः कार्यास्तेऽर्थवशानुगाः - ग ० । ७. कार्यास्त स्यू रसानुगाः – ख ० । ८. प्रमदाभिनेयान् - ख ०; ग ० । ९. नाट्याश्रितान् -क ०; नाट्याश्रयान् नु – ख ० ।
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सप्तदशोऽध्यायः ३११ से पूर्ण, ' ( अर्थपूर्ण ) तथा मधुर हों, जिन्हें त्रियों के द्वारा उच्चारण किया ( या गाया ) जा सके । यदि इन विशेषताओं से युक्त काव्य रचना होगी तो वह राजहंसी से युक्त कमल सरोवरों जैसी अति सुन्दर होकर सुशोभित होगी ॥ ११ ९ ॥
चेक्रीडितप्रभृतिभिर्विकृतैश्व ' शब्द-र्युक्ता न भान्ति ललिता भरतप्रयोगाः ।
यज्ञक्रियेव ' रुरुचर्मधृतैर्धृता-वैश्या द्विजैरिव कमण्डलुदण्डहस्तैः ॥ १२० ॥
‘ चेक्रीडित ’ ” जैसे रूक्ष शब्दों ( के प्रयोगों ) से युक्त नाट्यरचना सुन्दर नहीं लगती । जैसे कृष्णाजिन तथा रूक्ष ( मृग ) चर्म को वहन करने वाले, यज्ञ के घृत से सने हुए कमण्डल और अक्षमाला युक्त हाथों वाले ब्रह्मचारी गण का नर्तकी ( वेश्या ) के साथ हो जाना अनुचित होता है ॥ १२० ॥
१. यहाँ कारिका में उदार पद से शब्दगुण तथा मधुर पद से उसी के अनुकूल माधुर्यादि गुणों का प्रयोग सूचित किया गया है । इसी प्रकार प्रमदाभिधेय पद की अन्य व्याख्या भी है । तदनुसार प्रमद का अर्थ है आह्लादजनक जिनका अभिधेय अर्थात् भावार्थ या हृदयगत क्रियाविशेष हों ऐसे समग्र अर्थगुणों से युक्त भावों वाली पदावली का नाटकीय रचना में प्रयोग किया जाए । २. ' चेक्रीडित ' पद यङन्त है । यहाँ आदि शब्द से इसी प्रकार के व्यन्त या सन्नन्त पदों का भी प्रयोग नटों के लिये उचित नहीं होता यह संकेत दिया है । यहाँ अन्य व्याख्यान इस प्रकार भी है कि जैसे ललित अर्थात् सुकुमार प्रयोग कठोर या रूक्ष पदावली से युक्त नहीं रहते ठीक उसी प्रकार जैसे वेश्याओं के साथ कमण्डलधारी ऋजुवृत्ति ब्रह्मचारी को रखना अनुचित है या जैसे यज्ञक्रिया में ब्रह्मचारी के साथ वेश्याओं का रखना अनुचित होता है । इस प्रकार यह दृष्टान्त साधर्म्य तथा वैधर्म्य दोनों प्रकार से बनकर रसानुकूल एवं व्याकरण शास्त्रसम्मत प्रसिद्ध तथा प्रचलित शब्द प्रयोगों को ही नाटघरचना में समावेश के उपयुक्त निर्देशित करता है । १. प्रकृतिभि - ख ०; ग ० । २. मुक्ता क ० । ३. कृष्णाजिनाक्षरुरु – ग ० । ४. शरवमंधरैः घृताक्तैः - ख ०; चर्मधुरैः - ग ० । फिर
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नाट्यशास्त्रम् ३१२ मृदुललितपदार्थ ' गूढशब्दार्थही नं किसिमक जनपदसुखभोग्यं युक्तिमन्नृत्त योज्यम् । बहुकृतरसमार्ग सन्धिसन्धानयुक्तं कडू " भवति जगति योग्यं नाटकं प्रेक्षकाणाम् ॥ १२१ ॥
इति भारतीये नाट्यशास्त्रे वागभिनये काव्यलक्षणो नाम सप्तदशोऽध्यायः । में मृदु तथा ललित अर्थों वाली पदावली हो, गूढ़ जिस नाट्य रचना - देख और समझ सकें तथा आनन्द शब्द तथा अर्थ न हों, प्रेक्षक सुखपूर्वक की योजना की गई हो, उपलब्ध करे, जिसमें युक्ति एवं विचारपूर्वक नृत्त स्वरूप परिलक्षित प्रवाहमय गति हो, सन्धियों का ( जिसमें ) स्पष्ट रस की संसार में प्रेक्षण योग्य हो जाता है ॥ १२१ ॥
होता हो वही नाटक तथा ) ( लक्षणालंकार गुण - दोष निरूपण -भरतनाट्यशास्त्र का वागभिनयान्तर्गत अध्याय समाप्त । काव्यलक्षण नामक सत्रहवां Baby In ठ कि ि P The BFIE Bliss for flere TSP RP की कार TPST में Bf १. पदाढधं — ख ० । - ख ०; बुधजनसुखयोग्यं – ग ० । २. बुधजनसुखभोग्यं – क ०; जनपदसुखबोध्यं ३. बुद्धिमन्नृत्त — ग ० । ४. बहुरसकृतमार्ग — क ०, ग ० । ५. स भवति सुकवि काव्यं नाट्यकाले मनोज्ञम् -६ ६. वागभिनयो नाम षोडशोऽध्यायः क ०, ख ०
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FR ( 87 ) FEIPFI ( $ ) 5-195 ( 95 ) 1 ( 19 ) ( P ए सप्तदशाध्यायानुबन्धः (
विभूषणश्चाक्षर संहतिश्च ' शोभाभिमानी गुणकीर्तनञ्च ।
प्रोत्साहनोदाहरणे निरुक्तं गुणानुवादोऽतिशयः सहेतुः ॥ १ ॥
सारूण्य - मिथ्याध्यवसायसिद्धि- पदोच्चयाकन्दमनोरथाश्च 1 आख्यानयाञ्चाप्रतिषेध पृच्छादृष्टान्त निर्भासन संशयाश्च ॥ २ ॥
आशीः प्रियोक्तिः कपटः क्षमा च प्राप्तिश्च पश्चात्तपनं तथैव ।
अथानुवृत्तिर्युपपत्तियुक्ती " कार्योऽनुनीतिः परिदेवनश्च ॥ ३ ॥
षट्त्रिंशदेतानि तु लक्षणानि प्रोक्तानि वै भूषणसम्मितानि ।
काव्येषु भावार्थगतानि तज्ज्ञैः सम्यक्प्रयोज्यानि यथारसं तु ॥ ४ ॥
दृश्य काव्य के अङ्गभूत छत्तीस लक्षण ' होते हैं । जिनके नाम इस प्रकार हैं- ( १ ) विभूषण, ( २ ) अक्षरसंघात, ) शोभा, ( ४ ) अभि-मान, ( ५ ) गुणकीर्तन, ( ६ ) प्रोत्साहना, ( ७ ) उदाहरण, ( ८ ) निरुक्त, ( ( १३ ९ ) ) गुणानुवाद, वसाय ( १०, ९ ) १ अतिशय अतिसाद,, ( ( ११ ११ ) ) प हेतु, ( १२ ) सारूप्य, आक्रन्द, ( १७ ) मनोरथ, ( १८ ) आख्यान, ( १ ९ ) याञ्चा, ( २० ) प्रतिषेध, १. दो भिन्न पाठों में पठित लक्षणों के क्रम में यहाँ अनुबन्धरूप में प्रदत्त इस पाठ को आचार्य अभिनव गुप्त ने अपनी परम्परा में समागत पाठ स्वीकृत करते हुए मुख्य माना है । आचार्य पाद ने ही दूसरे पाठ की भी व्याख्या की तथा इस पाठ की भी व्याख्या की तथा इस पाठ को भी उद्देश कथन के रूप में भरतमुनि सम्बद्ध भी बतलाया । इस प्रकार दो पाठों में विभक्त लक्षणों के स्वरूप को लेकर भोज आदि ने चौसठ काव्य लक्षण निरूपित किये इन सभी लक्षणों का सोदाहरण विवेचन ' परिशिष्ट ' में ही उचित मानकर यहाँ केवल अर्थमात्र ही देकर हम सन्तोष कर रहे हैं । ( सम्पा ० व्याख्या ० ) १. चाक्षरसङ्गतिश्च – ख ०; चाक्षरसंहितञ्च – ग ० २. आख्यानवादा: - ख ० । ३. दृष्टाङ्ग ख ० । ४. प्रियं वै कपटं क्षमा च - ग ० । ५. कार्यानुनीती - ग ० । ६. मया समासात् – क ० । ७. सोदाहरणेषु - क ० । ८. यथारसानि — क ० ।
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३१४ नाट्यशास्त्रम् ( २१ ) पृच्छा, ( २२ ) दृष्टान्त, ( २३ ) निर्भासन, ( २५ ) आशीः, ( २६ ) प्रियोक्ति, ( २७ ) कपट, ( २ ९ ) प्राप्ति, ( ३० ) पश्चात्तापः, ( ३१ ) अनुवृत्ति, ( ( ३३ ) युक्ति, ( ३४ ) कार्य, ( ३५ ) अनुनीति या ( ३६ ) परिदेवन ॥ १-४ ॥
विभूषण-अलङ्कारैर्गुणैश्चैव बहुभिर्यदलङ्कृतम् ।
भूषणैरिव विन्यस्तैस्तद्भूषणमिति स्मृतम् ॥
जो रचना अनेक अलङ्कार तथा गुणों से अलंकृत अलंकार से सजाए गए व्यक्ति की तरह सुशोभित होने अर्थगुण सूचक ऐसे लक्षण को ' विभूषण ” समझना चाहिए अक्षरसंघात—
' यत्रात्पेरक्षरैः श्लिष्टैर्विचित्रार्थोपवर्णनम् ।
तदप्यक्षरसङ्घातं विद्यालक्षणसंज्ञितम् ॥
जहाँ थोड़े अक्षरों के प्रयोग से श्लेषगत वैशिष्ट्य के ( २४ ) संशय, ( २८ ) क्षमा, ३२ ) उपपत्ति, अनुनय तथा ५ ॥ होने के कारण लगे तो विविध ॥ ५ ॥
६ ॥ कारण विविध एवं वैचित्र्य सम्पन्न अर्थ की अभिव्यक्ति होती हो तो उसे ' अक्षरसंघात " नामक लक्षण समझना चाहिए ॥ ६ ॥
शोभा-सिद्धैरथैः समं कृत्वा ह्यसिद्धोऽर्थः प्रसाध्यते ।
यत्र लक्ष्णा विचित्रार्था सा शोभेत्यभिसंज्ञिता ॥ ७ ॥
यदि असिद्ध या अज्ञातार्थ सिद्ध या ज्ञात रूप में उद्धृत करते हुए श्लेष के कारण नवीन या मनोहारि स्थिति में अर्थाभिव्यक्ति होती हो ऐसे लक्षण को ‘ शोभा ’ ” समझना चाहिए ॥ ७ ॥
१. ' विभूषण ' का पर्याय अन्य पाठ में ' भूषण ' दिया है । २. ' अक्षरसंघात ' दोनों पाठों में समान प्राप्त होता है । ३. ' शोभा ' का लक्षण भी दोनों पाठों में समान है । १. यत्रार्थैः — क ० । २. विचित्रैरुपर्वाणतम् – क ०; विचित्रमुपवण्यंते - ग ० ३ तमप्यक्षर ग ० । ४. यत्रासिद्धं - क ० । ५. श्लिष्टा - क ०; श्लक्ष्णविचित्रार्थाः - ख ०, ग ० ६. त्यभिधीयते - ख ०; ग ० ॥ TRE
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सप्तदशाध्यायानुबन्धः ३१५
अभिमान-धार्यमाणस्तु ' बहुभिर्वचनैः कार्य युक्तिभिः ।
न यः पर्यवतिष्ठेत सोऽभिमानस्तु संज्ञितः ॥ ८ ॥
जब कोई पुरुष अनेक कथनों, कार्यों तथा युक्तियों के द्वारा समझाने पर भी उसे नहीं समझ पाता या सन्तुष्ट न होता हो तो ऐसे लक्षण को ' अभिमान ' ' समझना चाहिए ॥ ८ ॥
गुणकीर्तन -कीर्त्यमानैर्गुणैर्यत्र विविधार्थसमुद्भवैः ।
दोषा ' न परिकथ्यन्ते तज्ज्ञेयं गुणकीर्तनम् ॥
जब एक व्यक्ति के अनेक गुणों को- विविध उद्देश्यों से बतलाने के समय - दोषों का उद्घाटन न किया जाए तो ' गुणकीर्तन " समझना चाहिए ॥ ९ ॥
प्रोत्साहन -उत्साहजननैः स्पष्टैरथैरौपम्यसंश्रयैः ।
९ ॥
उद्भूत अथों में ऐसी रचना को प्रसिद्धैरुपगूढञ्च ' ज्ञेयं प्रोत्साहनं बुधैः ॥ १० ॥
जहाँ औपम्य का आश्रय या अन्वेषण करते हुए उत्साहवर्द्धक एवं सुस्पष्ट अर्थ के द्वारा प्रसिद्ध व्यक्तित्व का वर्णन किया जाए तो ऐसे लक्षण को ' प्रोत्साहन ' ' समझना चाहिए ॥ १० ॥
उदाहरण-यत्रैकस्यापि शब्दस्य दर्शनात् सुबहून्यपि ।
याति सिद्धिमनुक्तानि तदुदाहरणं स्मृतम् ॥ ११ ॥
१. ' अभिमान ' के समान लक्षण होने पर अन्य पाठ में ' सारूप्य ' ( इसके स्थान पर ) प्राप्त होता है । २. ' गुणकीर्तन ' दोनों पाठों में गृहीत है किन्तु दोनों में ( ( इसके ) लक्षण भिन्न है । ३. प्रोत्साहन के स्थान पर अन्य पाठ में प्रियवचन या प्रियोक्ति प्राप्त होता है । १. वार्यमाणस्तु - ख ०; ग ० २. नार्यो यन्नानुतिष्ठन्ति — क ० । ३. भिमानः प्रकीर्तितः- क ० । ४. दोषांशान् परिकल्प्यन्ते – क ० । ५. रुपगूढन्तु — क ० । ६. यत्रैकस्यैव — क ० । ७. मनुक्तादि - ख ०; ग ० ।
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३१६ नाट्यशास्त्रम् किसी एक शब्द के उच्चारित होते ही अनेक अकथित या जब प्राप्त होने लगे तो उसे ' उदाहरण ” समझना असंकेतित अर्थों की भी सूचना चाहिए ॥ ११ ॥
निरुक्त-
निरुक्तं द्विविधं प्रोक्तं ' तथ्यञ्चातथ्यमेव च ।
सिद्धिपूर्व भवेत् तथ्य तथ्यञ्चाप्रसाधितम् ॥ १२ ॥
निरुक्त के दो प्रभेद हैं— ( १ ) तथ्य तथा ( २ ) अतथ्य | इनमें जो तरह से प्रसिद्ध या ज्ञात हो उसे ' तथ्य ' तथा जो किसी प्रकार इसके अच्छी या अच्छी तरह से प्रसिद्ध न हो उसे ' अतथ्य ' नामक निरुक्त ' विपरीत हो समझना चाहिए ॥ १२ ॥
गुणानुवाद- हीनानामुत्तमैरुपमाकृतः जब किसी गुणानुवादो हीन विषय की उत्तम विषय से तुलना की कथन वाले लक्षण को ‘ गुणानुवाद समझना चाहिए । अतिशय ' उत्तमार्थाद्विशिष्टो - यः स चाप्यतिशयः स्मृतः पदार्थ से तुलना करने पर भी किसी का । जाए तो ऐसे ॥ १३.॥ ( उक्त अर्थ जब किसी उत्तम प्रतीत होने लगे तो ऐसे लक्षण को ' अतिशय से भी ) अधिक वैशिष्ट समझना चाहिए ॥ १३ ॥
हेतु - त्वेकस्यार्थविनिर्णयम् । बहूनां भाषमाणानां सिद्धोपमानवचनं हेतुरित्यभिसंज्ञितः ॥ १. उदाहरण का नाम दोनों पाठों में है परन्तु लक्षण भिन्न २. अन्य पाठ में निरुक्त के दो विभेदों का उल्लेख नहीं है १४ ॥ हैं ॥ FIRE ' गुणानुवाद ' का अन्य पाठ में ' गुणातिपात ' अभिधान मिलता है । ३. यह लक्षण पूर्व पाठ के ' अतिशय ' के लक्षण का पूरक लक्षण होकर थोड़ी ४. रखता है । ' अतिशय ' का दोनों पाठों में सन्निवेश मिलता है । भिन्नता १. वातथ्य - ख ०; ग ० । २. सिद्धि प्रसाधितं तथ्य - क ० । चाप्यसाधकम् - क ० ४. गुणाभिवादो - क ० ३. विशिष्टो — क ०; उत्तमार्थं विशेषो – ख ०; ग ० गरी ६ ५. उत्तमार्थं ६. भाष्य माणानां - ख ० ग ० । ७. अनेकार्थं विनिश्चयः - क ०; अनेकार्थं विनिर्णयात्- ग ००
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सप्तदशाध्यायानुबन्धः ३१७ अनेक व्यक्तियों के कथन को सुनकर किसी एक असाधारण अर्थ का प्रमाण पुरस्सर वचन के आधार पर निश्चय करना ' हेतु " कहलाता है ॥ १४ ॥
सारूप्य-' अपदेशस्तु परोक्षो यस्मादुत्पद्यतेऽनुकरणेन ।
लक्षणसमानकरणात् सारूप्यं तत्तु विज्ञेयम् ॥ १५ ॥
किसी तथ्य को न जानकर यदि अनुकरण के अनुसार आधार लेकर लक्षण की आलोचना करते हुए सप्रमाण वस्तु का स्थापन किया जाए तो उसे ' सारूप्य " समझना चाहिए ॥ १५ ॥
मिथ्याध्यवसाय-" अभूतपूर्वैर्यत्रार्थैस्तत्तुल्यार्थस्य निर्णयः ।
समिध्याध्यवसायस्तु प्रोच्यते काव्यलक्षणम् ॥ १६ ॥
जहाँ किन्हीं अतथ्यभूत या अनृत अर्थों के द्वारा उसी के समान असत् वस्तु का वक्तृत्वपूर्ण पदावली में निर्धारण या विनिश्चय किया जाता हो तो उसे ' मिथ्याध्यवसाय ' " नामक काव्य लक्षण समझना चाहिए ॥ १६ ॥
सिद्धि-बहूनाञ्च प्रधानानां मध्ये यन्नाम कीर्त्यते ।
" एकार्थसाधनकृतं सा सिद्धिरिति कीर्तिता ॥ १७ ॥
अनेक प्रसिद्ध या प्रमुख व्यक्ति या पदार्थों के बीच यदि एक अप्रसिद्ध नाम का अभिधान उसके असाधारणत्व के निदर्शनार्थ निविष्ट किया जाता है तो उसे ‘ सिद्धि " समझना चाहिए ॥ १७ ॥
१. हेतु का सन्निवेश दोनों पाठों में है परन्तु लक्षण दोनों भिन्न हैं । २. सारूप्य के स्थान पर अन्य पाठ में दिष्ट या दृष्ट को रखा गया है । ३. मिथ्याध्यवसाय के स्थान पर अन्य पाठ में ' विपर्यय ' मिलता है । ४. सिद्धि ' का लक्षण दोनों पाठों में मिलता है परन्तु लक्षणों प्राप्त होता है । १. अपदेशेन परोक्षो योऽर्थो ह्युत्पद्यते - क ० । २. योगात् — क ० । ३. निर्देश्यम् — क ० ४. अभूतपूर्वे यत्रार्थे तुल्यस्यार्थस्य निर्णय: - ख ५. लक्षणे - ख ० ।
६. नाम यत्राभिकीत्यंते क ० ।
७. अभिप्रेतार्थसिद्ध्यर्थं क ० ॥
०; ग ० । में थोड़ा विभेद
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३१८ नाट्यशास्त्रम्
पदोच्चय-गुणैर्बहुभिरेकाथैः पदैर्यः सम्प्रशस्यते ।
पदोचयन्तु तं विद्यान्नानार्थग्रथितार्थकम् ॥ १८ ॥
एक ही पदार्थ को निदर्शित करने वाले अनेक शब्द या वचनों के द्वारा जब किसी वस्तु की प्रशंसा की जाए तो अनेक अर्थों या वचनों द्वारा इष्ट वस्तु को स्वरूप प्रदान करने वाले ऐसे लक्षण को ' पदोचय " समझना चाहिए ॥ १८ ॥
आक्रन्द- । आत्मभावमुपन्यस्य ' परसादृश्ययुक्तिभिः तीर्थभाषणं यत् स्यादाक्रन्दः स तु कीर्तितः ॥ १ ९ ॥ अन्य पुरुष के सम्मुख जब सादृश्य या समानता को दर्शाने वाली युक्तियों से अपने अभीष्ट अप्रत्यक्ष अभिप्राय को प्रमुखतः स्पष्ट कथन ( के ) द्वारा स्वभावाविष्करण करते हुए रखा जाए तो वह ' आक्रन्दर कहलाता है ॥१ ९ ॥
मनोरथ-हृदयस्थस्य भावस्य ' सुश्लिष्टार्थप्रदर्शकम् ।
' अन्यापदेशकथनैर्मनोरथ इति स्मृतः ॥ २० ॥
जब किसी गूढ़ मनोगत भाव को अन्य वस्तु के कथन के व्याज के द्वारा जाए तो ऐसी सुनियोजित वाक्यावली को ‘ मनोरथ ” ” समझना बतलाया ` चाहिए ॥ २० ॥
आख्यान-"
पृष्ठैरपृष्टैरथवा निर्णयः क्रियते तु यः ।
आख्यानमिति तज्ज्ञेयं लक्षणं नाटकाश्रयम् ॥ २१ ॥
१. ' पदोच्चय ' का नाम तथा लक्षण दोनों पाठों में मिलता है । २. ‘ आक्रन्द ' के स्थान पर अन्य पाठ में ' तुल्यतर्क ' रखा गया है । ३. ' मनोरथ ' का लक्षण दोनों पाठों में गृहीत है । १. ग्रथनात्मकम् - क; मथनात्मकम् - ख ०; कथनात्मकम् - ग ० । २. भावेष्वपत्यस्य ख ० ० । ३. सुस्पष्टार्थप्रदर्शकम् — ख ०; ग ० । ४. कथनं - ख ०; ग ० । ५. अपृष्टैरथवा पृष्टे – ख; ० ग ० । श
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सप्तदशाध्यायानुबन्धः जव प्रश्नपूर्वक या बिना किसी प्रश्न या पूछताछ के ही निश्चय किया जाए तो उसे ' आख्यान " समझना चाहिए ॥ याञ्चा-आदौ ' यत् क्रोधजननमन्ते हर्षप्रवर्धनम् यत्र प्रियं पुनर्वाक्यं सा याञ्चा परिकीर्तिता जिस वचन को हितकर समझ कर आरम्भ में कहने पर ३१ ९ किसी बात का २१ ॥
।
॥ २२ ॥
क्रोध की तथा अन्त में हर्ष की उत्पत्ति हो तथा जो प्रियजन को ( उनकी ही भलाई के लिये ) कहा जाता हो तो ऐसा कथन ' याञ्चा " कहलाता है ॥ २२ ॥
प्रतिषेध-कार्येषु विपरीतेषु यदि किञ्चित्प्रवर्तते ।
निवार्यते च कार्यशैः प्रतिषेधः प्रकीर्तितः ॥ २३ ॥
यदि कोई विपरीत कार्य में प्रवृत्त हो या किसी की निषिद्ध कार्य में प्रवृत्ति को देखकर उसे कार्यज्ञ या अनुभवी पुरुष उस कार्य से निवृत्त होने या हटने का उपदेश देता हो तो ऐसा कथन ' प्रतिषेध ' कहलाता है ॥२३ ॥
पृच्छा-यत्राकरोद्भवैर्वाक्यैरात्मानमथवा परम् ।
' पृच्छन्निवाभिधत्तेऽर्थ सा पृच्छेत्यभिसंज्ञिता ॥ २४ ॥
१. ' आख्यान ' के स्थान पर अन्य पाठ में ' प्रसिद्धि ' प्राप्त होता है । २. ' याचा ' के स्थान पर अन्य पाठ में ' दाक्षिण्य ' प्राप्त होता है । यान्चा
का अन्य लक्षण भी प्राप्त होता है । जैसे: -लाभोपपत्तिमाख्याय स्वयं दूतमुखेन वा ।
प्रार्थयते यत्र कन्याया सा यान्चेत्यभिधीयते ॥
अर्थात् स्वयं या दूत के द्वारा लाभ की उपलब्धि या संभावना को दर्शाते हुए जब किसी कन्या की प्रार्थना की जाए तो उसे ' याञ्चा ' कहते हैं । अन्य विद्वानों का मत है कि केवल कन्या मात्र की याचना करने से यह याचना के एक पार्श्व की ही सूचक होगी । कुछ अन्य इसे प्रियवचन से मेल खाने के कारण ' प्रियोक्ति ' नामक लक्षण के स्थान पर मानते हैं । ३. ' प्रतिषेध ' के स्थान पर अन्य पाठ में ' लेश ' रखा गया है । १. च क्रोधजं नित्यं - क ० । १२. यत्तु - ख ०; ग ० । ३. कश्चित् - ख ०; ग ० ॥ ४. पृच्छत्यभिनयेनार्थं – ख ०; ग ० ।