भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ — पृष्ठ 551–560
भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ · पृष्ठ 551–560
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४४० नाट्यशास्त्र साक्षात् बोधक पदों से नहीं कहा हो तो वे ' वा ' सरिता, आश्रम आदि को शब्द की वीप्सा से द्योतित हो जाते हैं । के ८. इतिवृत्त या प्रस्तुत रूपकादि में विद्यमान या प्राप्त वृत्तान्त प्रदेश ही रङ्गपीठ पर कक्ष्या में विभाग पूर्वक दिखलाये जाए – इसी मध्यवर्ती विशिष्ट देश को— ' बाह्यं वा ' इत्यादि से बतलाते हैं । भाव से रंगपीठ के कल्पना के साथ प्रदेश के दूर या रङ्गपीठ के अभिनेय - स्थल पर देशादि की के कारण सामीप्य के आधार पर या अभिनय के अल्पत्व एवं आधिक्य लिये हुए परिक्रम से ही ( दूर आदि भेदों की ) कल्पना की भिन्नता को जाए 1 ' पूर्व प्रविष्टा ' इत्यादि से निरूपित करते हैं । ६. ये बाह्य आदि भेद— । अतः यहाँ पूर्व पद का अर्थ दो तरह से होता है एक पूर्व अर्थात् प्रधानभूत होने से जिनका प्रवेश पहिले हुआ था, वे आभ्यन्तर तथा उनसे प्रधान कहते हैं । इसी प्रकार पीछे प्रवेश अधिष्ठित देश विशेष को आभ्यन्तरकक्ष्या बाह्यकक्ष्या - स्थान विशेष के करने वाला बाह्य तथा उसके द्वारा अधिष्ठित उपसर्पण या अनुगमन करने वाले का स्थानविशेष द्वारा पूर्वप्रविष्ट का भी यदि अप्रधान ( पात्र ) है तो मध्यमकक्ष्या कहलाता है । पूर्व प्रविष्ट में ही स्थित रहता है । प्रधान के प्रवेश के बाद भी वह अपनी कक्ष्या के अन्त यही कल्पना यहाँ की गयी है । हो जाने या मिल जाने १०. पात्रों के रङ्गपीठ पर प्रवेश के साथ एकत्र ' तेषान्तु ' करने योग्य ( सम्पाद्य ) कार्य दिखलाने के लिये-पर उनके द्वारा अर्थात् जो पूर्व में प्रविष्ट हैं उन । यहाँ इत्यादि से विधान बतलाते हैं । तेषां मिल जाने वाले पात्रों के ' तु ' शब्द से पूर्वप्रविष्ट पात्र तथा उनसे बाद में है । इसी प्रकार क्रिया - कलाप का ' बाह्य ' कक्ष्य में विधान सूचित किया गया में प्रविष्ट पात्रों का दक्षिणादि से क्रम तो बाद ' अर्थ ' शब्द से पूर्वप्रविष्ट क्रम स्पष्ट ( ही ) समझा जा पात्रों का उसके सामने होने से ) विपरीत पात्रों की है, ( यहाँ यही क्रम ' अथ ' पद से दिखलाया है ) पूर्वप्रविष्ट सकता क्रम विहित यही आशय है ) । प्रवृत्ति के लिये ही दक्षिणाभिमुख आदि पूर्व दिशा हैं? -- उत्तर -जिसकी १ ९. रंगपीठ पर कौन “ सा प्रदेश ) बैठे हो वही ओर आतोद्यादि वाद्ययन्त्र रखे हों तथा वादक अपेक्षा से या जिस के मुख को ही प्रमाण क्यों माने? पूर्वदिशा होती है । प्रश्न – केवल भाण्ड को प्रमाण मान कर । इसी लिये ' द्वार ' को भी कहा गया है कि द्वार के उत्तर- ही निर्मित होता है । इसी प्रकार नेपथ्य पद क्योंकि वह विधानानुसार
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परिशिष्ट टिप्पणी, अध्याय १४ ४४१ गहण से भी यही स्पष्ट है कि नेपथ्यगृह का द्वार पूर्वाभिमुख होता है । अतः वही पूर्व दिशा है । भाण्ड पद तो उसकी प्रतियोजना रहने पर प्रमुखता के साथ पूर्वदिशा को सूचित करता है यही समझ कर प्रयुक्त है । १२. ‘ तेनैव ' का अर्थ है कि पूर्व में प्रविष्ट पात्र के अनन्तर प्रविष्ट दूसरे पात्र के सम्बन्ध द्वारा । १७. पूर्वकथित बाह्य, मध्य तथा आभ्यन्तर तथा दूर, मध्य एवं सन्निकृष्ट के विभाग को कहते हैं- ' सैव भूमि ' इत्यादि से । १८- १६. ' नगरे वा ' इत्यादि से भूमि के विकृष्टत्व, मध्यत्व एवं सन्नि-कृष्टत्व को उसके बहुत्वं एवं अल्पत्व के कारण ही नहीं परन्तु परिक्रम की विचित्रता के कारण भी मानना होता है यही दिखलाया गया है । प्रयोग = जो नाट्य में किया जाए । दिव्य = पिशाच से लेकर सभी देवयोनियाँ । इनका नगर, दीप आदि में गमन आकाश से, आकाशगामी विमान या अन्तर्हित करने वाली माया से अथवा विविध प्रयोजनों वाली बलाद् आहरण करने वाली क्रियाओं से दिखलाया या सम्पन्न करवाया जाए.. । २०-२१. दिव्यों के लिये केवल यही उपर्युक्त विधान नहीं है । ऐसे अन्य प्रकार भी हैं उन्हें दिखलाने के लिये- ' नाटके ' इत्यादि से पुनः कहते हैं । छन्नवेष पद से यह दिखता है कि वरदान आदि या अनुग्रह T करने के कारण देवताओं का भी अपने स्वरूप को छिपा कर मनुष्य के रूप में दर्शन हो जाता है । ऐसी दशा में दिव्य पात्र का भूमि पर संचार होगा ही क्योंकि जहाँ घूमना है वहाँ तो भूमि रहेगी ही । २२. ( यहाँ ) देवताओं का साधारण प्रकार दिखलाते हैं-- ' दिव्यानाम् ' इत्यादि से । पुराणों में सामान्यतः इसे बतलाया भी है । यह भारतवर्ष में ही न कि इलावृत आदि खण्डों में । २७-३२. वर्षों में हरिवर्ष, किम्पुरुष आनि स्थानों में प्रचार कहते हैं-' हिमवत् ' इत्यादि से । हिमवान् में इनकी गति अर्थात् प्रचार । इसी प्रकार सर्वत्र समझना चाहिए । नील पद अद्रि का विशेषण है तथा इसी का विशेषण वैडूर्यमय है । यह विवरण कविशिक्षा के लिये ( भी ) दिया गया है । दिव्यजन के ये ही आवास होते हैं । ३२-३६. तेषाम् ' इत्यादि से वर्षान्तरों में होने वाले ( दिव्य पर्वतों पर सम्भव एवं उचित ) गमन प्रदेश के तथा कार्य आदि विषय में यहाँ बतलाया
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४४२ ४१. नाट्यशास्त्र गया है । ‘ कक्ष्याविभागश्च ' में उपात्त ' च ' को ' इव ' अर्थ में प्रयुक्त समझना चाहिए । जम्बुद्वीप की तरह दिव्य पर्वतों को भी कक्ष्याविभाग में लिया जाकर दिव्यपात्रों की गति स्थानविशेष से उपलक्षित करनी होती है । ' परिच्छदविशेष ' पाठके अनुसार उन देवताओं के विशिष्ट उपकरणों को चारों ओर नहीं रखा जाता है । ' परिच्छेद ' पाठ को यहाँ मूल में लिया गया है । तदनुसार अर्थ है— दूरस्थ पदार्थ को जान लेना और व्यवधान में स्थित पदार्थ को जान लेने जैसे कार्य ( यहाँ ) नहीं दिखलाने चाहिए । प्रश्न – यदि देवगण के ऐसे रूप को न दिखलाये तो फिर कैसा रूप रखा जाए? उत्तर इनमें भी मनुष्यों के भाव ही दिखलाने अभीष्ट हैं जिन्हें मनुष्यों की तरह दिखलाना चाहिए । अंशावतार श्री रामादि नायकों का जो उत्कृष्ट एवं अतिशय विशिष्ट चरित है वह भी मानुषोचित ही है । इसी प्रकार जिन २ अवतारों में दिव्यभाव की स्थिति हो उनके भी चरित मनुष्यवत् ही दिखाना चाहिए । ऐसी स्थिति में देवगण के पलक न गिराने जैसे शास्त्र वर्णित रूप को यहाँ नहीं दिखलाना चाहिए । इसका अन्य कारण यह है कि इस लोक में भाव, संचारी और स्थायी सभी दृष्टि के द्वारा ही प्रस्तुत किये जाते हैं । इसके अतिरिक्त सूचा अभिनय भी भाव के योग से ही प्रस्फुटित होता है । इसलिये इन सभी कारणों से देवपात्रों की ( भी ) उनकी अपनी मूल प्रकृति मंच पर प्रस्तुत नहीं की जाए किन्तु मनुष्यवत् ही उनकी चेष्टाएँ रखी जाए । ३६. प्रवृत्तियों का उद्देश्यक्रम से चतुविधत्व दिखलाने के लिये-' चतुर्विधा ' इत्यादि से स्वरूपादि विवरण आरम्भ करते हैं । प्रश्न -- इन्हें क्यो प्रवृत्ति कहते हैं, इनके मानने में हेतु क्या है, किस आधार पर ये प्रवृत्तियाँ है तथा इन प्रवृत्तियों का किससे उद्भव हुआ है । ये चार प्रश्न यहाँ बनते हैं जिनका आचार्य ने विवेचन किया है । इनमें प्रथम प्रवृत्ति के विषय को कहा गया कि वह कैसे हुई । देश विशेष के वेष, भाषा, आचार एवं वार्ता के वैचित्र्य की प्रसिद्धि को ' प्रवृत्ति ' कहते हैं । इसमें ऐसी योजना है - जिन २ देशों में जो वेषभूषा है, जो भाषाप्रवाह है, जो लौकिक एवं शास्त्रीय रूप में प्रचलित आचार है तथा जो कृषि - पालन एवं वाणिज्यादि जीविका रूप वार्ता है उनको प्रख्यापन करने या पृथिवी मण्डल पर स्थित विद्या की प्रसिद्धि की आधायिका भी ' प्रवृत्ति ' कहलाती है । ' प्रवृत्ति '
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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय १४ ४४३ शब्द बाह्य अर्थ के निवेदन अर्थात् निःशेष वेदन या बतलाने के ज्ञान रूप अर्थ में यहाँ प्रयुक्त है । # प्रवृत्तियों के चतुर्विधत्व ( तथा ) संख्या के विषय में और भी बतलाते हैं ' यथा ' इत्यादि से ' देशाः ' तक | देशों के नानात्व को मान कर मुनि ने ' चारप्रवृत्तियाँ ' ऐसा कहा है अतएव देश भी चार ही हैं ऐसा नहीं समझना चाहिए । इसका आशय यह नहीं कि इतनी ही कहीं गयी हैं तथा अन्य का परित्याग कर दिया हो । ये सभी आशंकाएँ हैं । वस्तुतः इनके चार प्रभेद ( प्रयोगों में ) लक्षणों की समानता के आधार पर रखे गये हैं । प्रयोग अर्थात् नाट्य - प्रयोग । इन चारों की लक्षणगत समानता से साधारण स्वभाव वाले प्रयोगों का व्यवहार होता है । प्रवृत्ति सदा लोक के अनुगुण ( अनुकूल ) अनुसरण को ही कहा जाता है । क्योंकि लोक का - दक्षिण, पूर्व, पश्चिम तथा उत्तरभूमि इस प्रकार - चतुर्धाविभाग है और यह • विभाग बिना किसी कारण के नहीं है ' तथाहि ' इत्यादि से दाक्षिणात्यों में शृङ्गार की प्रचुरता होने से कैशिकी वृत्ति का होना संभव है, पश्चिम में आवन्ती का संग्रह तो है परन्तु कैशिकी भी है, इसके अतिरिक्त धर्म की प्रमुखता होने से सात्वती भी है । प्राच्यों में विशिष्ट वागाडम्बर की प्रमुखता रहने से भारती एवं आरभटी का योग रहता है । उत्तर में यद्यपि भारती एवं आरभटी का ही प्रमुखतः योग होता है फिर भी कैशिकी के आंशिक सम्बन्ध रहने से जनता शृङ्गारमय प्रयोग की सहिष्णु रुचि रखती है । इस प्रकार विभिन्न चित्तवृत्तियों के सादृश्य को चार प्रभेदों में दिखलाया गया । यद्यपि लोक अनेक प्रकार के वेष, भाषा तथा आचार आदि से युक्त होता है परन्तु नाट्य में चित्तवृत्तियों की चार प्रमुखता के अनुकूल ही ये चार प्रभेद कर लिये गये हैं । ३७-४०. यहाँ भिन्न - भिन्न कुछ देशादि का प्रतिपद पाठ कवि एवं अध्येतृगण को उन उनकी रुचि एवं देश का ज्ञान करवाने के उद्देश्य से दिया गया है । ४१-४२. ' नित्यमेव तु ' - देशभेद से होने वाली चित्तवृत्तियों का क्रम अनादि है क्योंकि देशभेद के औचित्य से प्राप्त स्वभावभेद वेषभूषा पर स्पष्ट दिखाई देता है । यह स्वभावभेद ही वेष की प्रक्रिया को देशगत भिन्नता में बदल देता है ।
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४४४ नाट्यशास्त्र ४३-४५. पूर्वदेश की सीमा होने से दक्षिण में उड़ है तथा समुद्र के निकट उत्तर में मागधी है अतः इन देशों के मध्य के प्रदेश में ' उड्रमागधी ' है । यहाँ इसीलिये अंग, बंग, एवं कलिंगों में उभयोपजीविता के आशय से उन्हें दो वृत्तियों के मध्य में परिगमन किया गया । ४६. यहाँ ' पुराणे ' शब्द के द्वारा यह विषय आगम सिद्ध है यह भी संकेत दिया गया है । ४७-४६. यहाँ अल्पगीतार्थ कथन से लेशतः कैशिकी की सहमति मुनि ने दिखलायी है । ५०-५२. दक्षिण तथा उत्तर को छोड़ कर परिक्रमण नहीं किया जाता है । इसीलिये निकट की दो वृत्तियों को मिला कर प्रयोग करने का विधान बतलाया गया है । इस प्रयोग के समय दाक्षिणात्य उत्तरद्वार से प्रवेश कर पश्चिम दिशा में परिक्रमण करे और घूम कर उसी दिशा में आत्मनिवेदन करे । जैसा कि पूर्व में कहा भी है- ' दक्षिणाभिमुख हो आत्मनिवेदन करें ' ( ना ० शा ० १४।१० ) । निष्क्रमण में भी उत्तर से पूर्व को तथा फिर दक्षिण तथा पश्चिम की ओर जाते हुए उत्तर दिशा से निष्क्रमण किया जाय । इसी प्रकार सात्वती आदि से विपरीत क्रम पाञ्चाली में रहता है । दक्षिण द्वार से किया जाने वाला प्रवेश भी आभ्यन्तर कक्ष्या में स्थित पात्र के निकट ही होता है । यही प्रक्रिया अपसव्य प्रवेश में भी होती है । ५३. अन्य विशेषताएँ भी बतलाते हैं- ' एकीभूता ' इत्यादि से । देश, काल एवं स्थितिवश पात्रों की समीक्षा से जो वैचित्र्यकृत प्राधान्य दिखे उसी के अनुसार नियम में सांकर्य भी किया जा सकता है । इसी कारण मूल में ‘ एकीभूताः ' कहा गया । अर्थात् प्रधान का अनुगमन सर्वत्र किया जाए । ५४. इसी प्रकार प्रयोक्ता का परिक्रम दिखला कर अब प्रवृत्तियों का उपयोग बतलाते हैं— ' येषु ' इत्यादि से । जिन देशों में जो प्रवृत्ति हो उसी के अनुरूप रूपकों में वृत्तियाँ भी रहे । अर्थात् उसी देश के नायक के प्राधान्य द्वारा वे ही रूपक कवि के द्वारा निबन्धनीय एवं अभिनेता के द्वारा प्रयोज्य भी होना चाहिए । ५८-५६. आविद्धाङ्गहारं = आविद्ध अर्थात् उत्कट अंगों का हरण जहाँ हो वह । आहव = संग्राम, जहाँ वीर एक दूसरे को चुनौती देते हों ( अह्व-यन्ते इति आहवः - व्युत्पत्ति के अनुसार ) । मणि, मन्त्र या औषधि के प्रयोग से रूप का परिवर्तन ' माया ' ( कहलाता ) है । सादृश्य के आधार पर द्वारा रूपान्तरण ' इन्द्रजाल ' होता है । पुस्त = लकड़ी या मिट्टी हस्तलाघव
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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय १४ ४४५ आदि से निर्मित आकृति या मूर्तियाँ । आविद्ध = स्त्रियों के कर्म तथा रूपों को दिखलाने वाला होता है जिसे आगे बतलाएँगें । ६०. ' डिमादि ' चार रूपक उद्धत माने गये हैं ये भिन्न - भिन्न तो है. ही; किन्तु इनका वर्ग बना कर विभाजन कर दिया गया है । इसी प्रकार शेष नाटकादि छः सुकुमार समझना चाहिए । नाट्य के अन्तरंग एवं उपकारक कक्ष्याओं के आधार पर उद्धत तथा सुकुमार नाट्य - प्रयोग होते हैं । ६८. देश का प्रवृत्ति के क्रम से विवरण देकर अब उसी को आङ्गिक अभिनय के अंग रूप में दिखलाने के उद्देश्य से ' धर्मी ' का विवरण देना आवश्यक मान कर यहीं मुनि ने ' धर्मी ' का भी निरूपण किया । यह धर्मी दो प्रकार का होता है ( जिसका ना ० शा ० षष्ठ अध्याय ६।१० उद्देश्यक्रम में उल्लेख हैं ) लोक विषयक एवं नाट्यविषयक होने से द्विविध धर्मी हो जाता है । यह धर्मी नाट्यप्रयोग की भित्ति या आधार होता है । यद्यपि लौकिक धर्म के अतिरिक्त नाट्य में धर्म नही होता । तथापि वह लौकिक प्रक्रिया में रञ्जनाधिक्य की प्रमुखता के आधार पर प्रयुक्त होने पर प्रयोग - व्यापारगत विचित्रता को लाता है इसी कारण ये लोक नाट्यधर्मी दोनों प्रभेद माने भी जाते हैं । ६६ - ७०, जो जिसका स्वाभाविक भाव है I स्थायी या संचारी उनसे युक्त | स्त्री तथा पुरुष नाना हैं फिर भी जब ( भूमिका ) स्त्री प्रयोज्य हो तो उसकी प्रयोजिका स्त्री मानी जाएगी और पुरुषों में पुरुष । इस प्रकार का अभ्यास एवं चेष्टित ( काय व्यापार ) जहाँ हो उसे ' लोकधर्मी ' कहेंगे क्योंकि उसमें लोक के धर्मों का व्यपदेश है । लोकवार्ता = लोकप्रसिद्धि । इसमें जो क्रिया या ) व्यवहार है उससे युक्त जो नाट्य है वह भी ' लोक-धर्मी । धर्म तथा धर्मवान् में अभेदोपचार ( भी ) होता है । काव्य के एवं नाट्यप्रयोग के भाग का लोकधर्म पर आश्रय लेना या आधारितरूप ' लोकधर्मी ' समझना चाहिए जिसमें वैचित्र्य का योग या उद्घावना होती हो । ७१-७२. अब नाट्यधर्मी का क्रमप्राप्त विवरण देते हैं ' अतिवाक्य ' इत्यादि से । अतिवाक्य क्रियोपेतम् = इसमें प्रयुक्त ' क्रिया ' शब्द का अर्थ है कि इतिहास की यथावृत्त घटना का अतिक्रमण कर जो कथावस्तु के उपयुक्त इतिवृत्त की कल्पना की गयी है वही यहाँ ' क्रिया ' है । सत्व = स्वभाव, भाव = चित्तवृत्ति । इनका अतिक्रमण करके जो कवि - कल्पित चित्तवृत्तियाँ । जैसे स्वभाव का अतिक्रमण कर महारानी द्वारा संस्कृत में भाषण करना । यह
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४४६ sew नाट्यशास्त्र: अभिनेय में नाट्यधर्मी हो गया है । लीलाप्रधान एवं मनोहर अंगहारों की प्रमुखता वाले अभिनय से युक्त नाट्य की लक्षणानुसारिता भी नाट्यधर्मी है जहाँ पुरुष अपने ( सहज ) रूप में न रह कर स्त्रीभाव का आश्रय ले ले तो भी नाट्यधर्मी हो जाता है । यहाँ " भवेत् ' क्रिया के द्वारा ग्रन्थकार ने संभावना में लिङ् का प्रयोग किया है जो समयनिष्ठता को दर्शाता है । यह सम्भावना रञ्जन के तथा कथावस्तु के लिये भी उपयोगी रहना चाहिए । ७४. आसन्नवचन के अश्रवण तथा दूसरों के अश्रूयमाण का श्रवण आदि केवल यहाँ धर्मतः सम्भव है तथा सौन्दर्याधायक भी होते हैं । अनुक्त को आकाशभाषित के रूप में केवल अभिनेता मात्र श्रवण करता है । ७५. नाट्यधर्मी की इसी बहुलता तथा व्यापक क्षेत्र को अनेक उदाहरणों तथा विवरणों से दिखलाने के लिये यह विस्तार दिया गया है । शैल आदि पदार्थों का आवश्यकतानुसार अभिनेता जो प्रयोग करते हैं यह प्रयोग भी ' नाट्यधर्मी ' होता है । ७८. ' नृत्यतेऽवगम्यते ' में नृत्त सदृश ' विशाखागति ' का प्रयोग सूचित किया गया है । यहाँ ललित अर्थात् आवेष्टितादि करण से गृहीत वर्तना तथा उत्क्षिप्त पद से चतुस्तालादि के द्वारा काल विभाग भी सूचित होता है । ८१. नाट्यधर्मी के व्यापकत्व को दिखला कर उपसंहार में कहते हैं--' नाट्यधर्मी ' इत्यादि । नाट्यधर्मी में जो गति है उसमें हेतु है अंग अर्थात् गीत, आतोद्य आदि तथा अभिनय । यहाँ अङ्गाभिनय पद में समाहार द्वन्द्व के कारण एकवचन का प्रयोग हुआ है । राग = सामाजिक की प्रीति । ८२-८३. अध्यायार्थं का उपसंहार करते हैं— ' एवम् ' इत्यादि से । यहाँ दो धर्मियों के रहने से यद्यपि द्विवचन होना चाहिये फिर भी ' धर्मी ' पद में एकवचन के प्रयोग के द्वारा अभिनय में नाट्यधर्मी की प्रमुखता को दिखलाया गया है, क्योंकि लोकधर्मी इसी में समाविष्ट ( हो सकता ) है । युक्तयः प्रवृत्तियाँ । अवशिष्ट अभिनय को सात्विक भावों के अभिनय तथा सामान्य-भिनय के प्रसंग में आगे कहा जायगा । ( ना ० शा ० भाग ३: अध्याय २४ में ) अब जो ' वाक्य ' बचा तथा जो तत्वतः धर्मी भी है उसके स्वरूप का अगले अध्याय में निरूपण किया जायगा इस कथन से यहाँ आङ्गिक अभिनय का उपसंहार करते हुए अध्याय समाप्ति को ( भी ) किया गया है ।
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परिशि एके -४ 15STRIE पञ्चदश अध्याय ( वाचिकाभिनय ) १. आङ्गिक अभिनय के अनन्तर वाचिक का विशेष निरूपण आवश्यक है क्योंकि आङ्गिक के विषय को प्रस्तुत करने या समर्पण में आधारभूत यही वाचिक अभिनय होता है । वागभिनय यहाँ ' वाचामभिनय: ' से षष्ठी तत्पुरुष समास है ही नहीं किन्तु ' वागेवाभिनयः ' विग्रह से कर्मधारय समास ही है । क्योंकि वाणी ही अभिनय है अर्थात् रंगस्थल पर अभिनेता जो संवादादि बोलता है वही अभिनय । षष्ठ अध्याय में जिसका नाम मात्र उल्लेख हुआ था अब यहाँ उसी का स्वरूप विशेषतः प्रस्तुत करना है । अतः यहाँ लक्षणत्वेन अभिधान के कारण इसी का प्राधान्य समझना चाहिए । २. वाचिक के लक्षण में कारण बतलाने के लिये कहते हैं – ' वाचि ' इत्यादि से । क्योंकि वाणी नाट्यप्रयोग के अभिनय की तनु = आधारभूमि है । सकल प्रयोगों की आधार, गाने बजाने के लिये अनुग्राहक तथा स्वयं अभिनय स्वरूपा वाणी ही होती है । इसलिये जब वाणी से अभिनय होता है, तब ये अङ्गादि भी ( वाक् सहित होकर ) अपने - अपने अर्थ को व्यक्त करते हैं । ३. वाणी उपयोगिनी होकर विश्व की कारण है इसे ' वाङ्मयानि ' इत्यादि से भी कहते हैं । यह वाणी ' चतुर्थंगोपाय ' अर्थात् चौथे भाग में ( पुरुषार्थ ) के रहने वाले मोक्ष की उपायभूता होती है । इस तथ्य का भी संकेतित मिलता है । वानिष्ठानि अर्थात् फलरूपा वाणी में जिसकी निष्ठा अवस्थान है । इस प्रकार वाणी ही संसार की अवभासिका है तथा सभी की कारण है और वही निर्वाहिका ( भी ) है । ' वाणी ही सम्पूर्ण भूत है ' ( वाग् वै विश्वा भुवनानि ) इस श्रुति के अनुसार वाणी ही समग्र जगत् का कारण है क्योंकि विश्व शब्द का विवर्त है तथा यह वाणी ही अर्थ के रूप में विवर्तित होती है । इसी तथ्य को भर्तृहरि ने वाक्यपदीय के ब्रह्मकाण्ड में विस्तार से दिया है । ( इसके उद्धरणात्मक अंश १।१२१, १२४ तथा १२६ को पाद टिप्पणी में देखना चाहिये । द्र ० ना ० शा ०, भाग २ पृष्ठ २०१ ) । यह सर्वाकार है इसी कारण इतिवृत्त को नाट्य का शरीर भी आगे कहा जायगा ( द्र ० ना ० शा ० अध्याय २१।१ ) क्योंकि इतिवृत्त भी वाङ्मय ( रूप वाला ) होता है ।
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४४८ नाट्यशास्त्र वाचिक के अंग ( विभिन्न ) शास्त्रों में प्रसिद्ध नामाख्यातादि हैं । ४. इस विवरण आरम्भ करते हैं- ' नामाख्या-जिनका अगली कारिका से शिक्षार्थ से होता है, तादि ' । यह शास्त्र योग अर्थों के द्वारा तथा शब्दरूपसौन्दर्य युक्त ( अंग ) हैं ये ही नामादि । नाम - जैसे ' मदनरिपु ' जिसके विभाग के प्रसंग में इसका प्रयोग वर्ज्य है । शब्द यह संज्ञावाचक है किन्तु शृंगार क्योंकि जो मदन का रिपु हो शृङ्गारी कैसे होगा । इस प्रकार व्यावहारिक । नाम की तरह आख्यात - ( क्रिया ) का भी दृष्टि से यहाँ अनौचित्य वैचित्र्याधान की स्थिति में ही प्रयोग इष्ट है । ' स्मरसि स्मर मेखलागुणैरुत गोत्रस्खलितेषु वन्धनम् ' यहाँ ' स्मरसि ' पद वैचित्र्य का आधायक है । से योग रखे तो प्रयोज्य होता है अन्यथा होने पर मे ' ( मेघदूत ३०।४२ ) वन्मुहुरुपचितैर्दृष्टिरालुप्यते यथा कुमारसम्भव में ---( कु ० ४१८ ) । उपसर्ग भी प्रकृत अर्थ नहीं । यथा ' अस्त्रस्ता-यहाँ ' उपचितैः ' में ' उप ' अर्थाधिक्य द्योतित होता है । इसी प्रकार उपसर्ग पद से ही उपसर्ग के कारण कर्मप्रवचनीय का भी उपलक्षण समझना चाहिए । निपात का उदाहरण-धौरा भव ' इत्यादि पद्य जहाँ ' ह हा ' हा ' से तीव्र खेद की ' ह हा हा देवि का उदाहरण है रघुवंश का पद्य अभिव्यक्ति को साधा गया है । तद्धित पपुर्यशः ’ ४।४२ ) यहाँ अण् प्रत्यय से ग्रासी कृत या गुणीकृत ' शात्रवञ्च व्यक्त किया गया है । समास का उदाहरण है— यश को ग्रहण करना वैशिष्ट गङ्गायमुनम् अनु यहाँ समास के कारण एकार्थीभावगत ' मध्ये उदाहरण है- ' भवतोया ' यहाँ भवतो + या दिखलाया गया है । सन्धि का सुप् तथा तिङ् हैं सन्धि है जिसकी एकपद सी प्रतीति होती है । विभक्ति शक्ति और लिङ्ग आदि का उपग्रह उपलक्षित होता है । जिनसे कारक वपुः ' ( विद्ध ० भ ० २।२१ ) इसमें शरीर को यथा— ' पाण्डिनि मग्नं कर्तृत्व के अधीन शरीर मज्जनक्रिया का कर्त्ता बतलाया है तथा उस का आधार हो गया है यह द्योतन अतीव रंजनकारी है । क्रिया पाण्डुत्व का जगत् ' यहाँ ग्रस्तं पद का उपन्यास है न कि भुक्तं उदाहरण है— ' ग्रस्तं कुलात्तं किया है तथापि यह का । यद्यपि ग्रसति पद से भक्षण मात्र परिभाषित है कुलान्त के विषय में । इस प्रकार कविता के वाचक शब्द को-प्रास्तातिशय हैं विभक्त करके यहाँ इस प्रकार दिखलाया गया है । जो काव्यरूप होते छन्द नियत अक्षरों वाला होता है जिसमें अक्षरों ( या मात्राओं ) ३७. रहता है ( अर्थात् गुरु, लघु आदि का नियम होता हैं ) इसके का नियम
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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय १५ ४४ ९ विपरीत चूर्णपद होता है जहाँ अक्षर एवं संख्या का नियम नहीं हो । अर्थ की अर्थात् श्रृंगार या वीरादि उनकी अपेक्षा से जहाँ अक्षर निबद्ध हों, यह पाय होता है, अतः गद्य कहलाता है । ३८. यति = विराम तथा छेद = यति के द्वारा किये गये पद विभाग इनसे युक्त | प्रमाणनियतात्मकम् पाद की संख्या के प्रमाण के अनुसार जिसका स्वरूप नियत = निबद्ध है ऐसा पद ' निबद्धपद ' कहलाता है । ३६. छन्द का लक्षण आरम्भ करने के लिये उसके स्वरूप को बतलाते हैं-- ' एवम् ' इत्यादि से । वर्ण गुरुत्व से एवं लघुत्व से युक्त विशिष्ट वर्णरूप जो चार पादों से युक्त हो - पद्य है । यह पद्य पादों से निर्मित होता है । गद्य तथा पद्य दोनों ही निगदनीय अर्थात् उच्चारणीय होते हैं तथापि गद्य ही इस नाम से व्यवहार में प्रचलित है । ४३-४६. एक अक्षर से आरम्भ कर २६ अक्षरों तक के पाद वाले उक्ता से उत्कृति तक ' छन्द होते हैं । जिनके चारों पाद तुल्य लक्षण वाले हो वे ' सम ' कहलाते हैं तथा जो प्रथम एवं तृतीय या द्वितीय एवं चतुर्थ पादो में सम हों वे ' अर्धसम ' तथा चारों पादों में अतुल्य लक्षण वाले पाद हों तो उन्हे ' विषम ' छन्द कहते हैं । ५०. ये छन्द हैं तथा इनके ये आगे भेद हैं । प्रश्न- इनके ये भेद कैसे हो जाते हैं? उत्तर- प्रस्तार में जो योग युक्ति है उससे भेद बनते हैं जिसे आगे बतलाया जाएगा । ५ ९. यद्यपि एकाक्षर से आरम्भ होने वाले पादों के छन्द होते हैं किन्तु भरतमुनि ने उन्हें छोड़ कर छः अक्षरों वाले पाद छन्दः से ही विवरण आरम्भ किया है तथा प्रस्तरभेद भी दिये हैं । इसका कारण है काव्यों में तथा शास्त्र ग्रन्थों में इन्हीं छन्दों की प्रयोग बहुलता तथा प्रयोग योग्यता रहना । दूसरा कारण है इनके लक्ष्य में प्रयोग या उदाहरण की विरलता, फिर भी शास्त्रज्ञान की पूर्णता के लिये निरूपयेगी भी इन प्रकारों का उध्ययन वेद की तरह किया जाना उचित है । ५२. ' वृत्तानि ' इत्यादि के द्वारा भरत मुनि संख्या आदि को स्वकण्ठ से पढ़ते है । नाट्यशास्त्र में पद्य १०१ के पश्चात् प्राप्त अधिक एवं प्रक्षिप्त पद्यों को मूल तथा हिन्दी व्याख्या सहित यहाँ दिया जा रहा है । सौकर्य के लिये इनमें क्रम संख्या लगाई गयी है जो अन्य संस्करणों में भी ( मिलती ) हैं । २६ ना ० शा ० द्वि ०