Part III Mahamanglik pitrswarup — पृष्ठ 1–10

महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३ · पृष्ठ 1–10

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श्रीः किमपि प्रास्ताविकम् निगमागमाम्नायनिष्ठ भारतीय श्रास्तिक श्रद्धालु प्रजा की दृष्टि में अग्निहोत्र - ज्योतिष्टोम -से भी " पार्वण -वाजपेय - राजसूय - चयन " आदि श्रौतयज्ञकर्मानुबन्धी सौर ' देवकम्मों ' की अपेक्षा एकोद्दिष्ट - क्षयाह - महालय - गया श्राद्ध - रात्रिजागरणात्मक कुलस्त्रीवर्गद्वारा अनुष्ठित मान्यतालक्षण है कि,: गृह्यपितृकर्म्म " इत्यादि लक्षण पारमेष्ठथ पितृयज्ञात्मक ' पितृकम्मों ' का इसलिए विशेष एवं पितृकर्माधिष्ठाता महत्त्व देवकर्म्माधिष्ठात्मा विज्ञानात्मंप्रभव सूर्य का स्थान प्राकृतिक विश्व में अवर है । तिष्ठति ' महानात्मप्रभव परमेष्ठी का स्थान प्राकृतिक विश्व में ' पर ' है । ' सूर्य्यादपि परस्थाने - ऊर्ध्व स्थाने परमे स्थाने निर्वचन के आधार पर ही पितृप्राणमूर्ति परमेष्ठी ' परमेष्ठी ' कहलाए हैं, जैसा कि से - प्रमाणित " है । तिष्ठति, तस्मात् परमेष्ठी नाम " ( शत ० प्रा ० ११ | १ | ६ | १६ | ) इत्यादि ब्राह्मणश्रुति हुई है कि— इसी आधार पर निगमानुगत श्रमगशास्त्र । स्मृतिशास्त्र यह घोषणा " देवकार्य्याद् द्विजातीनां पितृकार्य्यं विशिष्यते " । जैसाकि, अन्यान्य धाम्मिक मान्यताओं के सम्बन्ध में कालदोष, शिक्षादोष, देशदोष, पात्रशेष, . सत्तादोष, सङ्गदोष, काल्पनिक व्याख्यादोष, आदि आदि दोषपरम्पराओं के निग्रहानुग्रह से भारतीय से सर्वथा विरुद्ध जाती प्रजा की आस्थापूर्णा श्रद्धा कुछ एक विगत शताब्दियों से निगमाम्नायपरम्परा धर्मसंरक्षण के स्थान में धर्मग्लानि को ही प्रोत्साहित कर रही है, ठीक यही दशा नैगमिक श्राद्धकर्म पितृ-कर्मानुबन्धी ' श्राद्धकर्म्म ' के सम्बन्ध में भी घटित विघटित हो रही है । नैगमिक श्रौतस्मार्त्त से सम्बन्धित उस परोक्ष, सर्वथा अतीन्द्रिय चन्द्रलोकस्थ सुसूक्ष्म श्रतिवाहिक शरीरधारी सोम्य पितृदेवता है, जिसकी स्वरूपस्थिति सामान्य लौकिक मानवों के लिए दुर्विज्ञेय ही बनी रहती है । केवल शास्त्रवचन-प्रामाण्य पर आस्था श्रद्धापूर्वक निष्ठा रखते हुए शास्त्रविधिपूर्वक इस पितृकर्म का अनुगमन करते रहना ह्रीं सामान्य आस्तिकप्रजा के अभ्युदय के लिए अनन्य श्रेयः पन्था है । सुसूक्ष्म प्राकृतिक विज्ञान बन, से सम्बन्धित रहस्यपूर्ण श्राद्धविज्ञान का स्वरूप सर्वसामान्य की दृष्टि से झटिति एकहेलया विज्ञात जाय, यह असम्भव नहीं, तो कठिन अवश्य है । श्रतएव एवंविधा सामान्य श्रास्तिक प्रजा का अभ्युदय तो एकमात्र - ' तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते ' - ' यदस्माकं शब्द ग्राह, तदस्माकं प्रमाणम् ' इत्यादि शास्त्रादेश इस की गति करते हुए श्रद्धापूर्वक बिना किसी तर्क - युक्ति - विज्ञान जिज्ञासा के अनन्यनिष्ठापूर्वक और्ध्वदेहिक निबन्धन सुसूक्ष्म पितृकर्म ( श्राद्धकर्म ) के अनुगमन से ही सम्भव है । ' नान्यः पन्था विद्यते ना ' | ' जो जिसका गुण है, वही सीमातिक्रान्त बन कर उसका दोष बन जाता है ', इत्यादि भारतीय लोकसूत्र के अनुसार, एवं - ' मानव अपने सद्गुणों से हीं दण्डित होता है ' ५ 29415921

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किमपि प्रस्ताविकम इत्यादि प्रतीच्य ( नीत्से ) मान्यता के अनुसार जिस आस्थानुगत ' श्रद्धागुण ' से भारतीय आस्तिक श्रद्धालु प्रजावर्ग श्रद्धापूर्वक शास्त्रीय विधि - विधानों में अनन्य निष्ठा से अद्यावधि श्रारूढ़ था, वही प्रजावर्ग अपनेश्रद्धागुण से पर प्रतारकों के द्वारा प्रतारित होता हुआ वर्त्तमान युग में सर्वात्मना विगलितश्रद्ध बन गया है, अथवा तो द्रुतवेग से बनता जा रहा है । वर्त्तमान युग की तात्कालिक प्रभावोत्पादिका अनुकूलताप्रवत्तिका गन्धर्वनगरलीलावत् श्राश्चर्य्यकारिणी भूतविज्ञानपरम्परा - भूताविष्कारपरम्परा-भारतीय प्रजा को वर्त्तमान में व्यामुग्ध कर दिया है, सर्वात्मना लक्ष्यच्युत बना दिया है । इस तात्कालिक चाकचिक्य की चकाचौंधने आज इसे तिमिरान्ध बना दिया है । इस की श्रद्धानुगता सहज भावुकता आज परप्रत्ययानुगामिनी बन गई है । इसी गतानुगतिक दोष के कारण आज के आस्तिक भारतीय मानव के शास्त्रनिष्ठ - आस्थापरिपूर्ण भी श्रद्धाक्षेत्र में ' हेतुवाद ' ने जन्म ले लिया है । क्यों करें?, क्या विज्ञान है?, क्या फल प्राप्त होगा?, इस प्रकार की तर्क -युक्ति-विज्ञानात्मिका जिज्ञासा - परम्परा इस श्रद्धालुको भी आज उत्पीड़ित कर रही है । ओर इस उत्पीड़न को प्रोत्साहन प्राप्त हुआ है दुर्भाग्य से एक वैसे भारतीय से ही, जिसने ' वेदशास्त्र ' की घोषणा के माध्यम से ही क्रियात्मक ( विध्यात्मक ) सनातन - शाश्वत धर्मकर्मेति-कर्त्तव्यताओं को निःशेष बनाना ही अपना परम पुरुषार्थ मान लिया था । केवल वेदडिण्डिम -घोषपरायण उस वेदभक्त ने वेदरहग्यानभिज्ञतापरवशता से ' अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः ' को अक्षरशः अन्वर्थ बनाते हुए सनातनमान्यतानुगत न केवल श्राद्धकर्म पर ही, अपितु अन्यान्य भी प्रायः सभी श्रौतस्मार्त्त विधि - विधानों पर जो प्रहार किया, उस से होने वाले अनिष्ट की कल्पना भी यदि उसे उस समय हो जाती, तो सम्भवत: वह इस प्रकार अपनी व्यक्तिप्रतिष्ठा के व्यामोह से आस्तिक प्रजा की सहज श्रद्धा को उत्पीड़ित करने के महापातक से संस्पृष्ट बना रहता हुआ देवलोक का नहीं, तो चान्द्र पितृलोक का तो अधिकारी बन सकता था । किन्तु उद्बोधन न हो सका उस अभिनिवेश- दशा में उस वेदभक्तं का, जिस के परिणाम स्वरूप आस्तिक प्रजा की धर्मशीलता में जो आत्यन्तिक स्खलन हो पड़ा था, उसे दृढ़मूल बना डाला तथाकथित पूर्वोक्त पश्चिम के भौतिक विज्ञान - क्षणिकविज्ञान - के चाकचिक्यने । ' गिलोय, और नीम चढ़ी ' लोकोक्ति को चरितार्थ करने वाली इस ' द्विबद्धं सुबद्धं भवति ' मूला दृढपाशरज्ज् से आमूलचूढ़ बद्ध बद्ध आस्तिक प्रजा सर्वात्मना सनातन निगमागमाम्नाय से पराः परावत बनती हुई ' शास्त्र -प्रामाण्यनिष्ठा ' को विस्मृत कर बैठी । आस्तिक प्रजा की सहज प्रामाण्यनिष्ठा पुनः जागरूक हो, वह अपने विस्मृतप्राय - परित्यक्तप्राय देव - पितृकर्म परम्परा का पुनः धानुगमन करती हुई अपना अभ्युदय - निःश्रेयस् संसाधन कर सके, सर्वोपरि इस प्रजा की इस शास्त्रप्रमाण - श्रद्धा पर बकवृत्ति परायण हैतुकों के जो आपातरमणीय तत्त्वतः सर्वथा निर्मूल - निरतत्त्व तर्क - युक्ति हेतु - क्षणिक विज्ञानानुगता आलोचना ६

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किमपि प्रस्ताविकम् प्रत्यालोचना आदि के जो नगण्य आक्रमणाभास हो रहे हैं, उन से इस का सन्त्राण हो, इत्यादि प्रयोजनों के लिए ही ' श्राद्धविज्ञानोपनिषत् ' ग्रन्थ संकल्पित हुआ है, जिसकी ि चार खण्डों में अनुप्राणित है । इन सब बहिरङ्ग - प्रश्नपरम्पराओं का ' आत्मविज्ञानोपनिषत् ' नामक प्रथम खण्ड की प्रारम्भिक ' प्रस्तावना ' में समाधान कर दिया है । प्रकृत में हमें प्रस्तुत ' सापिण्ड्य विज्ञानोपनिषत् ' नामक तृतीय खण्ड में प्रतिपादित विषयों की दिशा के सम्बन्ध में दो शब्द निवेदन कर देने हैं ।. प्रस्तुत खण्ड में ' प्रजातन्तुवितान विज्ञानोपनिषत्, ऋणमोचनोपायोपनिषत्, आशौच-विज्ञानोपनिषत् ' इन तीन मुख्य अवान्तर प्रकरणों का समावेश हुआ है । प्रथमोपनिषत् में बृहदुक्थ महर्षि की पितृ वद्या के आधार पर चतुरशीतिकल पितृतन्तुलक्षण ' प्रजातन्तु ' का वैज्ञानिक विश्लेषण हुआ है । द्वितीयोपनिषत् में प्रजोत्पादनकर्म, सपिण्डीकरणकर्म्म, श्राद्धकर्म्म, गयापिण्डदान, इन चार आनुष्यकम्र्मों के वैज्ञानिक स्वरूप का विश्लेषण हुआ है । इन में से चतुर्थ गयापिण्डदान - प्रकरण में हीं महासङ्गीतनिबन्धन - रात्रिजागरणात्मक - पारिवारिक कुलस्त्री-वर्गकृत मान्यतात्मक लौकिक पितृकर्म का समावेश हुआ है । तृतोयोपनिषत् में सूतकाशौच, शावाशौच, आदि घाशौच की तात्त्विक स्वरूप मीमांसा हुई है । यही प्रस्तुत खण्ड के विषयों की संक्षिप्त स्वरूपदिशा है । जैसा कि, प्रथमखण्ड के प्रारम्भिक वक्तव्य में स्पष्ट कर दिया गया है, खण्डचतुष्टयात्मक यह ग्रन्थ स्वर्गीय पितु: श्री के वार्षिक श्राद्धोपलक्ष में सन् ३४ में हीं यद्यपि लिपिबद्ध होगया था । किन्तु युगधर्मानुगता ज्ञात - अज्ञात विघ्नपरम्पराओं के कारण अद्यावधि वह प्रकाशित न हो सका । ' आत्मविज्ञानोपनिषत् ' प्रथम खण्ड का प्रकाशन यद्यपि कुछ वर्षों पूर्व हो गया था । किन्तु तत्समय में उसे हम व्यक्त न कर सके । कारण, उस में लगभग ३० तिरङ्ग खगोलीय चित्रों का समावेश अनिवार्य था । एवं वैसी व्यवस्था उस समय हमारे सीमिततम कष्टसाध्य अर्थतन्त्र की दृष्टि से असम्भव थी । श्रागे चलकर हमें इस कार्य के लिए एक वैसे सात्त्विक सहयोगी का सात्त्विक सहयोग प्राप्त हुआ, जिस के लोकानुग्रह से हम प्रथमखण्ड को भी इस तृतीयखण्ड के साथ ही अभिव्यक्त कर सके । सुविख्यात व्यवसायी महाप्राण श्रेष्ठिप्रवर माननीय स्व ० श्रीगोविन्दरामजी सेकसरिया के सुपुत्र माननीय श्रेष्ठिप्रवर श्रीकुड़ीलालजी सेकसरिया के सात्त्विक सहयोग प्रथमखण्ड प्रकाशन व्यय, तथा १५ तिरङ्ग चित्रों के प्रकाशनव्यय की व्यवस्था हुई । एवं शेष १५ चित्रों का प्रकाशन नितान्त नैष्ठिक माननीय उन श्रीमहावीरप्रसादजी मुरारका के सौजन्य से सम्भव बन सका, जिन मुरारकाजी का श्रद्धाविगलित, किन्तु प्रमाण ऐकान्तिक निष्ठात्मक सहयोग हमें शाश्वतीभ्यः समाभ्यः प्राप्त है । प्रस्तुत तृतीय खण्ड के प्रकाशन का श्रेय हम श्री मुरारकाजी को अब इस लिए प्रदान करना नहीं चाहते कि, कुछ समय से उनकी ऐकान्तिक निष्ठा

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किमपि प्रस्ताविकम् उस ' आत्मसंवित् ' रूप में परिणत हो गई है, जिस संवित् सम्पूर्ण लोकैषणाओं से अहि: कञ्चुकिवत् विनिर्मुक्त हो जाया करता को प्राप्त कर लेने के पश्चात् मानत्र दैवयोग से उनके नैष्ठिक अन्तःकरण में सहसा उद्भुत है । इष्टदेव से यही कामना है कि, रहे । समद्भूत यह आत्मसंवित् अक्षुण्ण सर्वान्त में हम अपने सहज सात्त्विक उस मानवश्रेष्ठ ( श्रीकुड़ीलालजी प्रति कृतज्ञता समर्पण के द्वारा उनका सात्त्विक मूल्याङ्कन सेकसरिया ) के विश्रान्त नहीं कर देना चाहते, जिनकी विगत - प्रक्रान्त, तथा भावी सात्त्विक सहयोग प्रदानपरम्परा से ही हम अपनी स्वाध्यायनिष्ठा सुरक्षित रखने में भूतबल प्राप्त कर सके हैं, करते रहेंगे । इस के साथ को सर्वश्री महावीरप्रसादमोदी महोदय का भी यहाँ स्मरण कर लेते हैं, ही जो हम सर्वथा अपने आत्मीयसम अपनी ' गुप्त ' अभिधा को अन्वर्थ बनाते हुए आरम्भ से ही सहजरूप से सहयोगी बने रहे हैं । जगन्माता जगदम्बा मोदी महोदय को हमारे लौकिक दुःख - सुख कामना है । सर्वाभ्युदय - सम्पन्न बनावे, यही मङ्गल-हमारी भावुकतापूर्णा सहज कल्पना से जिस व्यक्ति से सम्बन्धित ईश्वरप्राप्त सहज प्रतिभा सम्बन्ध में के ' अनुमानत: आज से १०-१२ वर्ष पूर्व श्रीमुरारकाजी से हमने ये मनोभाव अभिव्यक्त थे कि, “ यदि किसी नैष्ठिक के तत्त्वावधान में इस बालक का शिक्षा किए क्रम सुव्यवस्थित रहा, तो कालान्तर में यह बालक सेकसरिया परिवार के गौरव को महामहिमशाली व्यक्ति के ( माननीय सर्वश्री जगदीशप्रसादजी सेकसरिया के ) सत्त्वपूर्ण सहयोग प्रमाणित कर देगा ", उसी परिग्रह का बल यदि हमें प्राप्त न होता, तो मानवाश्रमविद्यापीठनिम्मरिण की एषणा से प्राप्त प्रकाशन-वाले समस्त प्रेसपरिग्रह के अनुग्रह से हम कथमपि इस प्रकाशन - कार्य्य को में आहुत हो जाने सर्वथा असमर्थ ही बने रहते । श्रतएव लोकानुबन्धिनी इस कृतज्ञताभिव्यक्ति के पुनः प्रक्रान्त करने में मा ० जगदीशजी महोदय के प्रति भी हसारी कृतज्ञताभावना शाश्वत ही बनी रहेगी माध्यम से सर्वश्री के छोटे बड़े कङ्कर, सभी शङ्कर " इस लोकसूक्ति के अनुसार अन्यान्यं ज्ञात - अज्ञात । " नर्मदा नदी योगियों के प्रति भी हम अपनी कृतज्ञता अभिव्यक्त किए बिना नहीं रह सकते उन सभी सह-कर्म्मरणा, किंवा अर्थेन सहयोग प्राप्त होता रहता है । ' परस्परं भावयन्तः, जिनका मनसा - वाचा-इस कृतज्ञताभिव्यक्ति का माङ्गलिक मूल माना गया है । एवं इसी माङ्गलिक श्रेयः परमवाप्स्यथ ' ही प्रास्ताविक उपरत हो रहा है । मूलसंस्मरणपूर्वक यह संक्षिप्त श्रावण शुक्लत्रयोदशी वि ० सं ० २०१० " मानवोक्थवैरः जिकब्रह्मोद्य " श्रीमानवाश्रम विद्यापीठ ) दुर्गापुरा j ? श्रस्थाश्रद्वापूतास्तिक नैष्ठिकैर्विधेयः नितान्तभावुकः मोतीलाल शर्मा भारद्वाजः ( गोड़:) defen:

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श्रीः महामांगलिक ' पितृस्वरूप ' संस्मरण स्तुत्यात्मक, तथा स्वरूपवर्णनात्मक

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निगमानुगता महामङ्गलप्रदा पितृस्तुतिः स्वरूपवर्णनात्मिका

( १ ) -- उदीरतामवर · उत्परास उन्मध्यमाः पितरः सोम्यासः ।

य ईरवृका ऋतज्ञास्ते नोऽवन्तु पितरो हवेषु ॥

( २ ) -- इदं पितृभ्यो नमो अस्त्वद्य ये पूर्वासो य उपरास ईयुः । ये पार्थिवे रजस्यो निषत्ता ये वा नूनं सुवृजना सु विक्षु ॥

( ३ ) - हं पितॄन्त्सुविदत्राँ अवित्सि नपातं च विक्रमणं च विष्णोः ।

बर्हिषदो ये स्वधा सुतस्य भजन्त पित्वस्त इहागमिष्ठाः ॥

( ४ ) -- बर्हिषद: पितर ऊत्यर्वागिमा वो हव्या चक्रमा जुषध्वम् ।

तया गतावसा शन्तमेनोथा नः शंयोररपो दधात ॥

( ५ ) - - उपहूताः पितरः सोम्यासो बर्हिष्येषु निधिषु प्रियेषु ।

तगमन्तु त इह श्रुवन्त्यधि ब्रुवन्तु तेऽवन्त्वस्मान् ॥

। - - श्राच्या जानु दक्षिणतो निषद्य मं यज्ञमभि गृणीत विश्वे ।

माहिंसिष्ट पितरः केन चिन्नो यद्व आग: पुरुषता कराम॥

( ७ ) -- आसीनासो अरुणीनामुपस्थे रयिं धत्त दाशुषे मर्त्याय 1 ( ६ ). पुत्रभ्यः पितरस्तस्य वस्वः प्रयच्छत त इहोर्जं दधात ॥

( ८ ) – ये नः पूर्वे पितरः सोम्यासोऽनूहिरे सोमपीथं वसिष्ठाः ।

तेभिर्यमः संरराणो हवींष्युशन्नुशद्भिः प्रतिकाममत्तु ॥

( ६ ) -- ये तातृषुर्देवत्रा जेहमाना होत्राविदः स्तोमतष्टासो अर्कैः ।

आग्नेयाहि सुविदत्रेभिरर्वाङ सत्यैः कन्यैः पितृभिर्धर्मसद्भिः ॥

( १० ) - ये सत्यासो हविरदो हविष्या इन्द्रेण देवैः सरथं दधानाः ।

आग्नेयाहि सहस्रं देववन्दैः परैः पूर्वैः पितृभिर्धर्मसद्भिः ॥

( ११ ) - अग्निष्वात्ताः पितर एह गच्छत सदः सदः सदत सुप्रणीतयः त्ता हवींषि प्रयतानि बर्हिष्यथा रयिं सर्ववीरं दधातन ॥ । १०

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माङ्गलिकसंस्मरण

( १२ ) - ईलितो जातवेदोऽवाढव्यानि सुरभीणि कृत्वी ।

प्रादाः पितृभ्यः स्वधया ते अक्षन्नद्धि त्वं देव प्रयता हवींषि ॥

( १३ ) –ये चेह पितरो यं च नेह यांश्च विद्म याँ उ च न प्रविद्म ।

त्वं वेत्थ यति ते जातवेदः स्वधाभिर्यज्ञं सुकृतं जुषस्व ॥

( १४ ) - अग्नदग्धा ये अनग्निदग्धा मध्ये दिवः स्वधया मादयन्ते ।

तेभिः स्वराडसुनीतिमेतां यथावशं तन्वं कल्पयस्व ॥

- ऋग्वेदसंहिता, १० मण्डल, १५ वाँ सूक्त खण्डचतुष्टयात्मिका श्राद्धविज्ञानोपनिषत् ( एतन्नामक ग्रन्थ ) के द्वारा हम ' श्राद्ध ' कर्म के सम्बन्ध तर्क -युक्ति - विज्ञानमाध्यम से जो कुछ प्रतिपादन करना चाहते हैं, उन यच्चयावत् विषयों का मूल ( मौलिक रहस्य ) पूर्वोपात्त पितृस्वरूप संस्मरणात्मक ऋग्वेदीय दशममण्डलान्तर्गत पञ्चदशमसूक्त की चतुर्दशमन्त्रसमष्टि से सर्वात्मना गतार्थ है । महर्षि ' यम ' के पुत्र, अतएव ' यामायन ' नाम से प्रसिद्ध मन्त्रद्रष्टा भगवान् शङ्खमहर्षि द्वारा दृष्ट, ' पितर देवता'त्मक, चिरात्रिष्टुप् त्रिष्टुप् - पादनिचत्रिष्टुप्-आर्चीभुरित्रिष्टुप् -निचज्जगती - छन्दों से छन्दित, धैवत, एवं निषाद स्वरद्वयी से सन्तुलित उद्धृत प्रस्तुत ऋग्वेदीयसूक्त में स्तुतिमाध्यम से ' पितृदेवता ' के जिस मौलिक स्वरूप का विश्लेषण हुआ है, उसके आनुपूर्वी से निरूपण के लिए तो एक स्वतन्त्र महानिबन्ध ही अपेक्षित है । स्तुति का एकमात्र आस्थापरिपूर्णा सात्त्विकी श्रनन्यश्रद्धा से सम्बन्ध है । फिर उस पितृस्तुति के सम्बन्ध में तो कुछ वक्तव्य ही नहीं है. जिसका एकमात्र मूलाधार - सर्वाधार - सर्वस्व - चान्द्री ' श्रद्धा ' ही बना हुआ है । इस पूततम श्रद्धाक्षेत्र से सम्बन्धित पितृस्तुतिरूप वेदसूक्त की युक्ति - तर्क - विज्ञानसम्मता नैष्ठिकी व्याख्या की जिज्ञासा यत् कश्चित् भी तो महत्त्व नहीं रखती पितृकर्मभक्त, अनन्य श्रद्धालु आस्तिक भारतीय मानव की दृष्टि में । अतएव सहजश्रद्धातन्तुओं को प्रारम्भ में विकम्पित कर देने वाली वैज्ञानिक व्याख्या का उत्तरदायित्त्व ' स्वतन्त्रग्रन्थ ' पर छोड़ते हुए प्रकृत में केवल सूक्तमन्त्रों का भावार्थ उद्धृत कर दिया जाता है । ( १ ) — उदीरतामवर ० " अवरे, उत् - परासः, उत- मध्यमाः पितरः, सोम्यासः उदीरताम् । ये वृकाः, ऋतज्ञाः, सु येई, ते पितरः नः, हवेषु, अवन्तु " इत्यन्वयः । " वरस्थानीयाः पार्थिवाः, उत द्युलोकस्थानीया: परासः उत श्रन्तरीच्या मध्यमाः पितरः सोमात्मकाः ( पितृकर्मानुष्ठानपरायणाय यजमानाय ) यशस्विनो भवन्तु । ये पितरः सुशान्ताः सन्तो ऋतभावापन्नाः पारमेष्ठ्यभावापन्नाः यजमानस्याध्यात्मिकं प्राणमनुगताः - श्रागतास पितरः- अत्र - पितृ-कर्म्मणि - अस्मदीयेषु आह्वानेषु रक्षन्त्वस्मान् " इति - अतरार्थः । ११

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माङ्गलिक संस्मरण “ पार्थिव प्रथमश्रेणि के पार्थिव पितर, और उत्तम श्रेणि के दिव्य पित्तर, एवं मध्यमश्रेणि के आन्त रिक्ष्य पितर, जो कि स्वरूपतः सोमप्राणप्रधान बनते हुए सोम्य हैं, हमारे लिए यशः प्रदाता बनें । ऐसे जो पितर हैं, वे अपने सुशान्त सोम्यभाव से, अपने सोमलोकात्मक पारमेष्ठ्य ऋतस्त्ररूप से पितृकर्मानु-ष्टाता यजमान की अध्यात्मसंस्था के अभिमुख बनते हुए हमारी प्रार्थना सुनें, हमारी रक्षा करें " इति प्राकृतभाषासमन्वयः । सूर्य र पृथिवी, दोनों का मध्यस्थान अन्तरिक्ष है, इसे ' प्रथम द्युलोक ' माना गया है । स्वयं सूर्य ' सूर्यो स्थान: ' के अनुसार ' द्वितीय द्युलोक ' है, एवं सूर्य्य से भी परम - ऊर्ध्व-स्थान में अवस्थित, अतएव ' परमे स्थाने तिष्ठति ' निर्वचनानुसार ' परमेष्ठी ' नाम से प्रसिद्ध ऋतभावप्रधान भृग्वङ्गिरोमय लोके ' तृतीय द्युलोक ' है । ' तृतीयस्यां वै इतो दिवि सोम श्रासीत् ' इत्यादि ब्राह्मणश्रुति के अनुसार इस तृतीय द्युलोक में ही ' अम्भ: ' नामक पवित्र उस: ' ब्रह्मणस्पति ' सोम का साम्राज्य है, जो पितरों की मूलप्रतिष्ठा माना गया है । पारमेष्ठ्य सोम्य पितर ही सौर त्रैलोक्य का प्रभव - प्रतिष्ठा परायण है । तृतीय स्थानीय पारमेष्ठ्य पितर सौर त्रैलोक्य में आकर क्रमशः सौर दिव्य पितर, चान्द्र अन्तरिक्ष्य पितर, पार्थिव पितर, इन तीन श्रेणियों में विभक्त हो जाते हैं । तनों क्रमशः ' परास: ' - ' मध्यमाः ' - ' अवरे ' कहलाए हैं । तीनों में मध्यस्थ अन्तरिक्ष्य चन्द्रमा भास्वर सोमात्मक सत्य सोमपिण्ड है, जिसके ' रेतः - श्रद्धा - यशः ' - ये तीन मनोता मानें गए हैं । इन तीनों का क्रमशः पृथिवी - चन्द्रमा - सूर्य्यं, इन तीन सौर लोकों के साथ प्राकृतिक समन्वय हो रहा है । पृथिवी रेतोमयी है, स्वयं चन्द्रमा श्रद्धाप्रधान है, एवं द्वादशादित्यप्राणसमष्टिरूप सूर्य यशोमूत्ति है । यह यशोभाव ही विविध पितरों का प्रधान विशिष्ट गुण है । ' उदीरताम् ' से इसी विशिष्ट गुण की ओर सङ्केत हुआ है । शरीर प्रतिष्ठारूप अङ्गिरोभावापन्न आग्नेय प्राण का संरक्षण - इसी त्रिविध सोम्य तरप्रारण से हो रहा है । एवं यही मन्त्र की संक्षिप्त विज्ञानदिशा है । ( २ ) - इदं पितृभ्यो नमः ० " ये पूर्वास:, ये उपरास: ईयुः ये पार्थिवे रजसि आनिषत्ताः ये वा नूनं सुवृजनासु विक्षु - श्रानिषक्ताः- ( तेभ्यः - सर्वेभ्यः ) पितृभ्यः - इंदं नमः ' अस्तु ' इत्यन्वयः । प्राकृतिकपूर्णायुर्भोगानन्तर जो आध्यात्मिक महत्पितर चन्द्रलोक में व्यवस्थित हैं, वे ' पूर्वास: ' हैं । एवं अकालमृत्यु से जो चन्द्रलोक में स्वल्पावस्था में हीं चले गए हैं - वे ' उपरासः ' हैं । * ऋतमेव परमेष्ठी ऋते भूमिरियं श्रिता । ऋते समुद्र आहित ऋतं नात्येति किञ्चन ॥ ( गोपथब्राह्मण ) - पवित्र ते विततं ब्रह्मणस्पते प्रभुर्गात्राणि पर्येषि विश्वतः । तप्ततनूनं तदाम समश्नुते शृतास इद्वहन्तस्तत् समासत ( ऋक्संहिता ) १२

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माङ्गलिकसंस्मरण जिन महत्पतरों की औपपातिक भावानुबन्ध से भी चन्द्रलोकगति नहीं हुई है, वे पार्थिव रजोलोक में इतस्ततः चक्रममा पितर हैं । आध्यात्मिक fear के ये तीन ह्रीं श्रेणिविभाग होते हैं । तीनों श्रेणियों के प्रतपितर सम्पत्तिशाली श्रद्धाशील अपनी पुत्रादि प्रजा ( सुवृिजनासु षित् ) में आश रूप से अनुगत रहते हैं, जिह्न नमस्कार पूर्वक हन्यप्रदानद्वारा श्रद्धालु प्रजा तृप्त किया करती है । ( ३ ) -- हं पितन् ० पितृकर्मकर्त्ता श्रद्धालु यजमान ने अनुग्रह करने वाले पितरों को अपने अनुकूल बना लिया है, पारमेष्ठ्य सौम्य विष्णु का भी इस सौम्य पितर- अनुग्रह से अनुग्रह प्राप्त कर लिया है । ' द ' नाम के पितर पार्थिव पितर इस पुराड़ाशाहुतिरूप द्रव्य का, तथा सोम का यजमान के इस पितृयज्ञकर्म में उपभोग कर रहे हैं । ( ४ ) - र्हिषदः पितरः ० हे ' बर्हिषद: ' नामक पितृदेवताओ! आप हमारी अर्वाचीन आगे की वंशम्परा का अवश्य ही संरक्षण करेंगे । हम आपके लिए यह विद्रव्य सम्पन्न कर रहे हैं । आप इन से तुष्ट तृप्त afar | । एवं हमारे लिए तथा हमारे परिवार के लिए शान्ति - स्वस्ति प्रदान करने का अनुग्रह कीजिए । ( ५ ) - उपहूताः पितरः ० वे हमारे पितृदेवता हमारे इस श्रद्धात्मक पितृकर्म में हमारी प्रार्थना से यहाँ पधारें, यहाँ पधार कर वे हमारी प्रार्थना सुनने का अनुग्रह करें । प्रार्थना सुन कर हमें आशी प्रदान करने का अनुग्रह करें । ( ६ ) -- ' च्या जानु दक्षिणतः ० ' ' दक्षिण जान्वाच्य पितरः उपासोदन ' ( शत ० ) इत्यादि श्रुति के अनुसार प्राचीनावीती बनकर दक्षिण जानु को नत बनाकर समुपस्थित पितर बड़े ही अनुग्रह से हमारे इस कर्म से सन्तुष्ट तृप्त हो रहे हैं । हे पितृदेवता! इस पितृकर्म में यदि आपके आतिथ्य में हमसे कुछ अपराध बन पड़ा हो, तो हमें विश्वास है, आप अवश्य हमें क्षमा कर देंगे । ( ७ ) - श्रासीनासो अरुणीनाम् ० तेजोमय आग्नेय देवताओं के सानिध्य में समुपस्थित हे पितृदेवताओ! प्राप इस पितृकर्म प्रदान करने वाले यजमान के लिए सम्पत्ति प्रदान का अनुग्रह करेंगे । यजमानप्रजा को सम्पत्तिशालिनी, तथा ' कू ' नामक सहोबलशालिनी बनाने का अनुग्रह करेंगे । ( ८ ) - ये नः पूर्वे पितरः ० • जो हमारे वृद्धावृद्धप्रपितामहादि पूर्व पितर यथासमय देवपितृ कम्मो के द्वारा तुष्ट - प् होते रहे हैं, उन पितरों के साथ समन्चित दक्षिणपथाधिष्ठाता यमदेवता ( रुद्रदेवता ) भो तुष्ट तृप्त बनते हुए हमारे लिए अनुग्रहप्रदाता प्रमाणित हो रहे हैं । १३

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महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३, पृष्ठ 10 का मूल पृष्ठ
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माङ्गलिक संस्मरण ( ६ ) - ये तातृपुर्देवत्रा० प्राकृतिक स्थिति क्रमानुसार कालान्तर में अपने पितृभाव से देवभाव में परिणत होते हुए ' नान्दीमुख ' बन जाने वाले पितर स्तुतिकर्ता - हविः प्रदाता - श्रद्धांशील- यजमानों के लिए अनुग्रह-भजन बन जाते हैं । अभिदेवता! देवभावापन्न वे दिव्य नान्दीमुख पितर आप के साथ हमारे इस देवक • यथासमय पधारने का अनुग्रह करते रहें । ( १० ) - सत्यासः ० अपने ऋतसोमध से स्वरूपतः ' ऋताम: ' ( सौम्य ) भी पितर देवप्राणानुशयसम्बन्ध से ' सत्यासः ' ( आग्नेय ) बनते हुए देववर्ग - संयुक्त इन्द्रदेवता के साथ संयुक्त होते हुए देवक में पधारते रहते हैं । ( ११ ) - श्रग्निष्वात्तः पितरः ० द्वारा आस्वादित area ' अग्निष्वाता ' नाम से प्रसिद्ध अमपितर ( गृह्य भौन - पार्थिव पितर ) इस पितृकर्म में पधारें । पधार कर अपने अनुरूप स्थानों में प्रतिष्ठित होने का अनुग्रह करें | स्वस्थता पूर्वक विराजमान होकर हविर्भक्षण का अनुग्रह करें । इस से तुष्ट तृप्त बनते हुए वे पुत्रपौत्रादियुक्त सम्पत्ति प्रदान का अनुग्रह क 1 ( १२ ) - त्वमग्न ईलितः ० हे अग्ने! आपने अनुग्रह कर हमारी प्रार्थना पर अनुग्रहदृष्टि करते हुए हमारी यज्ञसामग्री को आपने अपने विशकलनधर्म से देवपितृभोग्य बना दिया है । आपने सब प्राणदेवपितरों में आहुतिद्रव्य विभक्त कर दिया है । हे पितृदेवताओ! अनि के अनुग्रह से यथाभागविभक्त स्वधापूर्वक प्रदत्त इस छवि का आप ग्रहण करें । हे अग्निदेव! आप भी हविर्ग्रहण से तृप्त होने का अनुग्रह करें । ( १३ ) -- ये चेह पितर: ० जो पितर यहाँ समुपस्थित हैं, जो उपस्थित नहीं हैं, जिन्हें हम जानते हैं, एवं जिह्न हम नहीं जानते, वे सब उपस्थित - अनुपस्थित - ज्ञात - अज्ञात - हमारे वंशपितर अमिदेवद्वारा अवश्य ही उपस्थित, एवं विज्ञात हैं । अतएव हम जातवेदा सर्वज्ञ उन अग्निदेव से ही यह प्रार्थना करेंगे कि, आप ही अनुग्रह कर उन सब को प्रदत्त हवि से तृप्त करने का अनुग्रह करें । ( १४ ) - अग्निदग्धाः ० जो महपितर अग्निसंस्कारद्वारा चन्द्रलोक में पहुँचे हैं, जो पितर गाङ्गतोय-प्रवाह विक्षेपादिद्वारा ) अनिरूप से तंत्र प्राप्त हुए हैं, द्युलोक ( सौरलोक ) के मध्यस्थानरूप अन्तरिक्ष्य चन्द्रलोक में अवस्थित वे सर्वविध प्रतपितर स्वधापूर्वक प्रदत्त इस हवि से तृप्त हो रहे हैं । हे अग्निदेव! अपने हविःप्रदानरूप कर्म से विरारूप ( दशावयव ) बने हुए आप उन पितरों के साथ संयुक्त होते हुए इस प्रदत्त हविद्रव्य से उन हमारे प्रतपितरों की शरीरस्वरूप निष्पत्ति का अनुग्रह करें । इति नैगमिकमङ्गलस्तुतिः पिताम् १४