महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३
Part III Mahamanglik pitrswarup · 596 पृष्ठ · 60 खण्ड
विषय सूची
- श्रीः किमपि प्रास्ताविकम् निगमागमाम्नायनिष्ठ भारतीय श्रास्तिक श्रद्धालु प्रजा की दृष्टि में अग्निहोत्र - ज्योतिष्टोम -से भी " पार्वण -वाजपेय - राजसूय -… 1–10
- श्रीः श्रागमानुगता महामङ्गतप्रदा पितृस्तुतिः स्वरूपवर्णनात्मिका-नमस्येऽहं पितन् श्राद्धे ये वसन्त्यधिदेवताः || देवैरपि हि तप्यन्ते ये च श्राद्धे स्वधोचरैः… 11–20
- १४३ - पिण्डसन्तानक्रमचक्र परिलेखः १४४ - सन्तानराशिचक्रपरिलेखः १४५ - शेष राशिचक्रपरिलेखः १४६ - प्रसूत्याशौच दिनपरिमाण परिलेखः परिलेख, तथा रेखाचित्रसूची १४७… 21–30
- संक्षिप्त विषयसूची १६३ - लोकसंग्रहस्वरूपमीमांसा १६४ - अज्ञकर्म्मसङ्गीमानव १६५ - कर्मसङ्गी अज्ञ के चार विव १६६ - लोकसंग्राह्य कर्मसङ्गी मानव 4725 १६७ -… 31–40
- प्रजातन्तुवितान जगत के उपादानभूत पूर्वोक्त त्रिविध पितर भी इसी सौम्य महान् के गर्भ में प्रविष्ट हैं | वसु - रुद्र - आदित्यादि ३३ आङ्गिरस देवता, ६६ आप्य… 41–50
- प्रजातन्तुवितान कौषीतकि का ' विचक्षण ' तत्व-' आपः पुरुषवचसो भवन्ति ० ' इस छान्दोग्य - सिद्धान्त के अनुसार यद्यपि पुरुषसृष्टि का मूलारम्भक गया है, तथापि इस… 51–60
- प्रजातन्तुवितान " महाँ असि महिष वृष्णयेभिर्धनस्पृदुग्र सहमानो अन्यान् । rat विश्व भुवनस्य राजा स योधया च क्षयया च जनान् " । ( ऋक् सं ० ३ । ४६ २ )… 61–70
- प्रजातन्तु वितान • * * आह्निकपिण्डः -- अक्षत भावात्मकः ( मासिकपिण्डे - अन्तर्भावः ) ** १ - मासिकपिण्डाः ( २८ कलात्मक प्रत्येकः ) -२ -- षाएमासिकपिण्डौ (… 71–80
- पितृधनानि - पितरः प्रजातन्तुवितान पितृऋणानि - सूनवः १ - पितरि - 1 ७ सहांसि * मूलपुरुषः २- पुत्रे -६ सहांसि पुत्रे -२१ हांसि ३ - पौत्रे -.. ५ सहांसि… 81–90
- प्रजातन्तुवितान भक्ति का हृदय से अभिनन्दन करते हुए, साथ ही यह भी समझते हुए कि, यदि बतलाये गए संहिता - प्रमाणों से कहीं उन अभिनिविष्टों का कल्पित सिद्धान्त… 91–100
- 4 प्रजातन्तुवितान. वृषाप्राणप्रधान है, यही शुक्र की प्रतिष्ठा है । जिस प्रकार शरीर प्रतिष्ठा दृष्टि से पुरुष स्त्री कहलाया है, वहाँ शुक्र की प्रतिष्ठा की… 101–110
- .प्रजातन्तु वितान देवघन सौरजगत् के महिममण्डल में पृथिव्यादि सब प्रतिष्ठित हैं, एवमेव आध्यात्मिक प्राणाग्नित्रयी महिमा - मण्डल में सौम्य पितरप्राण… 111–120
- IIII r निवाप्य = पिण्डस्व सहांसि बीजनि७ II ७ सहांसि २१ सहांस पिंडर मिननिवाय तन्यः सहासि २१ २८ २८ ( ७ ) २७ २७ ( ६ ) २६२६ ( ५ ). २५ २५ ( ४ ) २४ २४ ( ३ ) २३… 121–130
- \ a इति सा पिएड्यविज्ञानोपनिषदि प्रजातन्तुवितानविज्ञानोपनिषत् प्रथमा - १- ' सापिण्ड्यविज्ञानोपनिषदि -अथ " ऋणमोचनोपायोपनिषत् " द्वितीया २… 131–140
- ऋणमोचनोपायोपनिषत् १- प्रजोत्पादन त्मकं प्रथममानृण्यं कर्म्म प्रजोत्पादनानुगत आनृण्यविज्ञानोपक्रम — सर्वप्रथम क्रमप्राप्त प्रजोत्पादनलक्षण प्रथम ऋणपरिशोध… 141–150
- ऋणमोचनोपायोपनिषत् इत्यादि वचनों के अनुसार सवर्ण मातापिता के द्वारा उनकी इच्छा से निश्चित धनराशि देकर क्रय क्रिया हुआ पुत्र ' क्रीतपुत्र ' कहलाया है… 151–160
- ऋणमोचनोपायोपनिषत् है । बीजीपुरुष का इसी के वृद्धातिवृद्धपितामह का प्रतिवृद्धप्रपौत्र है । बीजीपुरुष का पितामह इसी के 1. वृद्धातिवृद्धप्रपितामह का… 161–170
- ऋणमोचनोपायोपनिषत् सूर्य्य तो भूपिण्डोपलक्षिता पृथिवी से २१ वें अहर्गण की दूरी पर अवस्थित है । परन्तु आश्चर्य है कि, पृथिवी ( भूपिण्ड ) पर रहने वाले मनुष्य… 171–180
- ऋणमोचनोपायोपनिषत् १ – अविद्यायामन्तरे वर्त्तमानाः स्वयं धीराः पण्डितं मन्यमानाः । ` दन्द्रम्यमाणाः परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः… 181–190
- है ऋणमोचनोपायोपनिषन पक्ष ज्योतिर्मय है, वही पितरों के लिए तमोमयी रात्रि है । हमारे कृष्णपक्ष के १५ दिन पितरों का एक दिन है, हमारे शुक्लपक्ष के १५ दिन… 191–200
- ऋणमोचनोपायोपनिषत् उक्त चारों संस्थाओं में सौरज्योति, तथा पारमेष्ठ्य सोमरूप से ज्योतिर्म्मय देवता, तथा सोम मय पितर, दोनों का विपर्य्यय से भोग हो रहा हैं… 201–210
- ४ - ब्राह्म- अहोरात्रम् अघतनानघतनानुगतम् ( पारमेष्ठयम् ) ( स्वयम्भु ) १५ इन्द्रः वैिवस्वतो सावशीः इन्द्र an I an १४ ११ ब्रह्म 2 उत्तमो ALI तोमसोधर्मः १२… 211–220
- १ ऋणमोचनोपायोपनिषत् १ – अनानद्यतनानुगताहोरात्राणामवान्तरभोगका ला: -१ -- मानुषे - अहोरात्रे मानुषाहोरात्रस्य देवदृष्ट्या भोगकालाः त्रामानुषाहोरात्रस्य… 221–230
- ऋणमोचनोपायोपनिषत् सोमप्रधान हैं, देवता सौर ज्योतिर्लक्षण इन्द्रात्मक बनते हुए इन्द्रप्रधान हैं… 231–240
- ऋणमोचनोपायोपनिषत् देव - पितर - असुरभाव- समर्थकनिगमाः --- " अहरेव देवाः " ( शत ० २ १ । ३ । १ । ) देवाः ३ -- " अहर्देवाः सूर्य्य: ” ( शत ० १ । १ । २ । ११ )… 241–250
- ऋणमोचनीपायोपनिषत ५ - श्रद्धाभूतानि भूतानि पवित्राणि सदैव तु । श्रद्धा तु माता भूतानां श्रद्धा श्राद्धेषु शष्यते || ( नन्दिपुराणम् ) ६ - विधिहीनममृष्टान्न… 251–260
- ऋणमोचनोपायोपनिषत् दूसरा नाम ' श्मशान ' नाम से भी प्रसिद्ध है । अपठित यथाजात लोग बोला करते हैं ' शम-शान ', एवं पठित संस्कारी मानव कहा करते हैं ' श्मशान '… 261–270
- ऋणमोचनोपायोपनिषत् ( ३ ) - अनुभव पितरः- अनुभवविधाः - पुकालिनः - शूद्रपितरः - अवैध कम्र्मानुगता लौकिकाः… 271–280
- ऋणमोचनोपायोपनिषत् वैध - अवैध चतुर्दश पत्नियों में समन्वित समझना चाहिये, जिन्हें पूर्व में ' साम्राज्ञी ' कहा गया है, जो संगीतभाषा में ' महाराणी ' कहलाई… 281–290
- ".... ऋणमोचतोपायोपनिषत् .: और यहाँ आकर इस का सौभाग्य सफल माना जाता है, जिस की प्रामाणिकता के लिए पोडश स्मार्त्त -संस्कारों में प्रसिद्ध, ‘ सीमन्तसंस्कार '… 291–300
- ऋणमोचनोपायोपनिषत् स्त्रियों के द्वारा ) रात्रि में पितरों के लिए पट्ट स्थापन होता है, पितरों की प्रतीकरूपा सुबर्ण ( हिरण्मयतेज ) मूर्त्ति ( जो कि लोकभाषा… 301–310
- ऋणमोचनोपायोपनिषत् ( १ ) मा था ( माथान ) मँ मद ( मॅमद ) पर ल्यो | ( परन्यो ) द्वाराण्यों ए! र खड़ी ( रखड़ी ) ए माता रतन ( रतन ) जड़ाय - ( जड़ाय ) भैरूँ बाब… 311–320
- 1 ऋणमोचनोपायोपनिषत् अब क्रमप्राप्त [ ४ ] - पितृकर्मानुगत मुख्य महासङ्गीत के नैगमिक आम्नाय का भी समन्वय कर लीजिए | इस समन्वय से पूर्व कुलस्त्रियों में… 321–330
- ऋणमोचनोपायोपनिषत् उभयविध ( अन्नादात्मक, एवं अन्नात्मक ) पितरों का वस्तुस्वरूप स्पष्ट कर दिया गया है… 331–340
- मक कर्म्म ) क जाँय, इसी से माध्यम ' क्षिणा - दिग ' द्वितीयाय ' -संहारात्मक भूत समन्वय कृतिकरूप ही न - भुवपतिः, भूतवन्नाम् ' थ - भौम- ' ष्ट ही पार्थिव 1 )… 341–350
- आप: -ऋणमोचनोपायोपनिषत् - मृत्-पद्यात्मक महासङ्गीत से | ' अष्टाक्षरा वै गायत्री - या वै सा गायत्री ग्रासीदियं वै सा पृथिवी ' १ | ४ | १ | ३४ | -- ' ' ) रूप… 351–360
- ऋणमोचनोपायोपनिषत् ही माना जायगा । इसी का समन्वय प्रसङ्गतः उपात्त है । पितृकर्म का मुख्य उद्द ेश्य वही है, जो मह-दुक्थरूप इन्द्र के लिए ' अशीति ' प्रदान का… 361–370
- ऋणमोचनोपायोपनिषत् ( २ ) - आप धम्र्मोपदेशञ्च वेदशास्त्राऽविरोधिना । ' यस्तर्केणानुसन्धत्ते ' स धर्मं वेद नेतरः || ( मनुः १२/१८६ | | ) तस्मात् -( ३ ) -… 371–380
- } ऋणमोचनोपायोपनिषत न सही आचारमीमांसानुगता धर्म्ममीमांसा का समावेश तथाकथिता प्रतीच्यसरणी के सम्मान की दृष्टि से… 381–390
- ऋणमोचनोपायोपनिषत् शास्त्रभक्ति, दर्शनाभिनिवेश, वेदाम्नायघोषणा । आम्नाय का स्वरूप क्या है?, वेद किन विद्याओं का किस पद्धति से प्रतिपादन करता है?, उन… 391–400
- १ २.. ३ ' १ आनन्दः विज्ञानम मनः १ २ ३ ब्रह्मा विष्णुः इन्द्रः ऋणमोचनोपायोपनिषत् ( १ ) - प्राकृतिकसर्गाधारः - सर्गनिमित्तः - सर्वोपादानः - सर्वमूत्तिः -… 401–410
- ऋणमोचनोपायोपनिषत् अव्ययात्मा षोडशी स्वयम्भूः ( पितामहः ) परमेष्ठी ( पिता ) ऋषिभावः ( ऋषिसर्गः ) पितृभाव: ( पितृसर्गः. ) ऋषिमानवः पितृमानवः २ अक्षरात्मा… 411–420
- ऋणमोचनोपायोपनिषत् अवों में अन्तर्भाव हो रहा है । आत्मबोधस्वरूपविश्लेषिका, धर्म - ज्ञान - वैराग्य - ऐश्वर्यलक्षणा विद्या-बुद्धिचतुष्टयी के द्वारा… 421–430
- ऋणमोचनोपायोपनिषत् प्रकृतिसम्मत विधिकम्मों की उपेक्षा, एवं निषिद्ध कम्मों का अनुगमन, अतएव ) ऐसे श्रासुर मानव बाह्याभ्यन्तर- दोनों प्रकार की पवित्रता से… 431–440
- , ऋऋणमोचनोपायोपनिषत् दोनों का इस अवैध ( यथापद्धतिपूर्वक न किए जाने वाले ) कर्म से कुछ उपकार सम्भव है? 1 यह स्मरण रहे कि, ये दोनों ही श्रेणियाँ… 441–450
- { ऋणमोचनोपायोपनिषत् ( ४ ) - पार्थिवमानवसंस्थासमर्थकानि - मिगमागमवचनानि ( विकृतिविकारनिष्ठा मानवाः ) * १ - बृहती इव सूनवे रोदसी गिरो होता मनुष्यो नदक्षः… 451–460
- ऋणमोचनोपायोपनिषत् है | हिं ऐसे स्थानों में अपना सहज वैर छोड़ देते हैं । कलुषितान्तःकरण मनुष्य भी ऐसे स्थान पर पहुँच कर शान्तिलाभ करने में समर्थ हो जाता है… 461–470
- शौचविज्ञानोपनिषत् विषमा प्रकृति - ‘ मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् " ( गीता ६ । १० ) के अनुसार विश्व का मूल-कारण बनी हुई है, जिस प्रकृतिपाश में आबद्ध… 471–480
- शौचविज्ञानोपनिषत् मान ही है । साथ ही उन समानाधिकारियों के प्रचार का कुरूत । नहीं तो श्राज के २०० वर्ष पहिले के ' भारत पर दृष्टि डालिए… 481–490
- . आशौचविज्ञानोपनिषत् सर्वलोकचक्षु बना हुआ सूर्य्य बाह्य चाक्षुष दोषों से संस्पृष्ट रहता है, एवमेव सम्मूर्ण भूतों में समरूप से प्रतिष्ठित रहता हुआ भी वह… 491–500
- शौचविज्ञानोपनिषत् पुत्र - कन्या आदि के प्रति जिस प्रकार आपका स्वाभाविक वात्सल्यप्रेम रहता है, एवमेत्र सोम-प्रधाना, अतएव अबला, अतएव आश्रयाकांक्षिणी स्त्री… 501–510
- शौचविज्ञानोपनिषत् कारणशरीरावच्छिन्न प्राज्ञप्रधान कम्र्मात्मा में १ - स्वायम्भुव अव्यक्तात्मा, २ - पारमेष्ट्य यज्ञा-त्मा, ३ - चान्द्र महानात्मा,… 511–520
- शौचविज्ञानोपनिषत धातु हैं, एवं त्रिधातु सूक्ष्मधातु हैं । इन सूक्ष्म धातुओं की ( प्राणमयकोश की ) प्रतिष्ठा मनोमय कोश है, जिसे अपनी परिभाषा में हम '… 521–530
- संख्यानम् ४६६ शौचपात्राणि --जातयः ) | शुचिभावाः अशुचिभावाः संस्काराः १ अधम् -मलं --महानात्मानो पितृप्राणमूर्त्तेरव्यक्तयज्ञगर्भितस्य )( ५ अघशुद्धिसंस्कारः… 531–540
- शौच विज्ञानोपनिषत् है । यदि पूरे दिन पर्यन्त आहुति सम्बन्ध के बिना भी आहवनीयानि कुण्ड में सुरक्षित है, अग्निवि च्छेद नहीं हुआ है, तो उस दशा में आशौचकाल… 541–550
- } _ आशौचविज्ञानोपनिषत् की गर्भसंज्ञा हो गई । पूर्ण परिपुष्टि से पहिले हो किसी दोषविशेष से शनैः शनैः गर्भवित्र सन होने ' लगा, यही स्थिति ' गर्भस्राव ' है… 551–560
- सपिण्ड मैरुपरिलेख: -श्राशौचविज्ञानोपनियत ५ ड ४ ज ४ ८ ३ घ ३ झ २ ख २ च २८ क ग छ | | १ | १ | १ भावः पि ० १८ ७ र ६ ध ६ ल ५ प.व ४.५ ३ त श ४ व ३ थ २ भ | | २ १ द… 561–570
- शौचविज्ञानोपनिषत् ( १ ) - श्रवयवसापिण्ड्यपरिलेख: -*. बीजी ( १ ) -१- पुत्र: ( २ ) -२ - पौत्रः ( ३ ) --३- प्रपौत्रः ( ४ ) -४- वृद्धप्रपौत्रः ( ५ ) -५-… 571–580
- शौचविज्ञानोपनिषत् सप्तकोशचक्र परिलेख: -साप्तपौरुषं सापिण्ड्यम् ( ७ ) परमातिवृद्धप्रपितामहाल्लब्धा कला ( ६ ) अतिवृद्धप्रपितामहाल्लब्धाः कलाः ( ५… 581–590
- शौचविज्ञानोपनिषत् प्रसूतिकापत्यनुगताशौचदिनपरिमाण परिलेखः ---निमित्ते स्पर्शाशौचम् कर्माशौचम गर्भस्रावे सचैल स्नानम् गर्भपाते सचैलस्नानम् - तथा पुत्रप्रस… 591–596