पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ — पृष्ठ 321–330
पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ · Gita Press · पृष्ठ 321–330
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साधनपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप* [ सूत्र १३ ( १ ) ईश्वरीय नियमोंसे तो सदैव ऐसे बुरे कर्मोंसे बचनेकी प्रेरणा होती रहती है, मांस आदिको देखकर मनुष्यको स्वाभाविक ग्लानि होती है, दूसरोंकी पीड़ा देखकर दिल काँपता तथा, रुधिर पीड़ित, होता है, किंतु हिंसारूपी मलका आवरण हृदयपर आ जानेसे ईश्वरकी यह आवाज सुनायी नहीं देती । ( २ ) मनुष्य कर्म तथा भोग दोनों प्रकारकी योनि है, इसमें संस्कार बनते भी हैं और धुलते भी हैं । दूसरी जो भोग - योनियाँ हैं, उनमें संस्कार बनते नहीं बल्कि उनकी निवृत्ति होती है । यदि वह हिंसक फिर मनुष्य - योनिमें ही आये तो पिछले कर्माशयसे दबा हुआ हिंसाके कार्य करता रहेगा और उनसे उसी प्रकारके संस्कार बनते रहेंगे । यह क्रम सदाके लिये जारी रहेगा और वह अपने वास्तविक कल्याणसे वञ्चित रहेगा । यदि किसीको अपनी रक्षाके लिये कोई शस्त्र दिया जाय और वह नशेकी अवस्थामें उससे अपने ही शरीरको घायल करने लगे तो उसका हित इसीमें होगा कि नशा रहनेतक उससे वह शस्त्र छीन लिया जाय । ईश्वरीय नियमसे मनुष्य - शरीर इसलिये दिया गया है कि आत्मोन्नति करे और परमात्मातक पहुँचे । यथा— आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु । बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ॥ इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान् । आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः ॥ ( कठ ० उप ० १ । ३ । ३-४ ) आत्माको रथका स्वामी जानो, शरीरको रथ तथा बुद्धिको सारथि और मनको लगाम समझो । इन्द्रियोंको घोड़े कहते हैं और उनके चलनेके मार्ग विषय हैं । इन्द्रिय - मनसे युक्त आत्माको बुद्धिमान् भोक्ता कहते हैं । इस कारण ईश्वरकी दयासे इन नशेके दूर होनेतक अथवा इस मलको दूर करनेके लिये नीची योनियोंमें जाना होता है, इस योनिमें आगेके लिये संस्कार नहीं बनते बल्कि पिछले हिंसा आदिके संस्कार धुल जाते हैं और वह फिर मनुष्य योनिमें पवित्र होकर आत्मोन्नतिके लिये आता है । ये योनियाँ तो अन्तःकरणके मल धोनेके स्थान हैं । जिस प्रकार अनजान बालक अपने शरीरको विष्ठामें सान लेता है तो माता नालीके पास ले जाकर पानीसे धोती है, इसी प्रकार कल्याणकारिणी प्रकृति माता अपने पुत्रोंके इन मलोंको इन योनियोंमें अपने हितकारी नियमोंके जलोंसे धोती है । ( ३ ) इसमें ईश्वरकी दया है न कि क्रूरता; क्योंकि प्रत्येक मनुष्य अपनी इच्छाकी पूर्तिमें ही भेजकर सुख समझता है; और इस प्रकार ईश्वरके पूर्ण ज्ञानवाले नियम उनकी इच्छाओंके अनुसार योनियोंमें उनकी इच्छा - पूर्ति करते हैं । जाते हैं और ( ४ ) इसी तरह ईश्वरकी कल्याणकारिता यह है कि इस प्रकार मनुष्यके सब मल धुल उसे फिर उन्नति करनेका अवसर मिल जाता है । ( ५ ) इसमें ईश्वरका न्यायकारी नियम भी आ जाता है, जिससे है हर कि प्राणीको जिससे उसके समस्त कर्मोंके संसारका अनुकूल कार्य फल मिल जाता है और इसमें उसकी सर्वज्ञता भी पायी जाती काम करते हैं, इसी प्रकार व्यवस्थापूर्वक चल रहा है; क्योंकि जिस प्रकार घड़ीके चलानेमें सब - यन्त्र न - कुछ काम कर रहे हैं । संसाररूपी घड़ीके चलानेमें सब शरीरधारी अपने - अपने स्थानपर कुछ सुख - दुःख मिलता है, यह अगले सङ्गति – जाति, आयु और भोगमें पाप और पुण्यके अनुसार ( २ ९ ६ )
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सूत्र १४ ] ते ह्लादपरितापफलाः पुण्यापुण्यहेतुत्वात् * * [ साधनपाद सूत्रमें बतलाते हैं-ते ह्लादपरितापफलाः पुण्यापुण्यहेतुत्वात् ॥ १४ ॥
शब्दार्थ — ते = वे ( जाति, आयु, भोग ); ह्लाद - परिताप - फलाः - सुख - दुःख फलके देनेवाले होते हैं; पुण्य - अपुण्य - हेतुत्वात् - पुण्य तथा पाप कारण होनेसे । अन्वयार्थ – वे ( जाति, आयु और भोग ) सुख - दुःखरूपी फलके देनेवाले होते हैं, क्योंकि उनके कारण पुण्य और पाप हैं । व्याख्या – पिछले सूत्रमें बतलाये हुए कर्माशयोंके फल जाति, आयु और भोग भी दो प्रकारके ( स्वादवाले ) होते हैं । एक सुखके देनेवाले ( मीठे स्वादवाले ), दूसरे दुःखके देनेवाले ( कड़वे स्वादवाले ) । पुण्य अर्थात् अहिंसात्मक — दूसरोंको सुख पहुँचानेवाले कर्मोंसे जाति, आयु और भोगमें सुख मिलता है । पाप अर्थात् हिंसात्मक – दूसरोंको दुःख पहुँचानेवाले कर्मोंसे दुःख मिलता है । पिछले सूत्रमें बतलाये हु कर्मोंको जब स्वार्थ छोड़कर दूसरे प्राणियोंके कल्याणार्थ उनकी यथार्थ भलाई और सुख पहुँचानेकी मनोवृत्तिसे किया जाता है, तब वे कर्त्ताको सुख पहुँचानेका कारण होते हैं; और जब वे स्वार्थवश दूसरे प्राणियोंको काम, क्रोध, लोभ, मोहादिसे दुःख देनेकी मनोवृत्तिसे किये जाते हैं, तब वे करनेवालेको दुःखका कारण होते हैं । यही कारण है कि सर्वयोनियोंमें सुख - दुःख दोनों देखे जाते हैं । जिस प्रकार भौरेको फूलकी सुगन्धमें आनन्द प्रतीत होता है, इसी प्रकार विष्ठाके कीड़ेको विष्ठामें सुख प्रतीत होता है । जिस प्रकार इसको सुगन्धित फूलके न मिलनेमें दुःख होता है, इसी प्रकार उसको विष्ठाके न मिलनेमें दुःख होता है । कुछ मनुष्योंको ऐश्वर्य, सुख, राज, धन - सम्पत्ति, सब प्रकारके साधन प्राप्त हैं और कुछ लूले, लँगड़े, अन्धे, कोढ़ी रोटीसे तङ्ग, सर्दीमें ठिठुरते हैं । इससे नीची योनियोंमें पशु - पक्षी भी इनसे अधिक सुख पाते हैं । कुछ कुत्ते गलियोंमें मारे - मारे फिरते हैं, कुछ मोटरोंमें बैठते हैं, नाना प्रकारके स्वादिष्ट पदार्थ खाते और तीन - तीन नौकर उनकी सेवामें रहते हैं । जो सुख अथवा दुःख दूसरोंको दिये हैं, उनका फल सुख - दुःख अवश्य मिलता है, चाहे इस योनिमें अथवा दूसरी योनियों ( जन्मों ) में । सुख - दुःख पहुँचानेवाले कमोंमें भी मनोवृत्तियाँ ही कारण होती हैं । डाक्टर एक पके फोड़ेको नश्तरद्वारा चीरकर उसके मवादको निकालता है, इससे डाक्टरके चित्तमें सुख पानेके कर्माशय बनते हैं, यदि कोई मनुष्य द्वेषसे उसी फोड़ेमें चाकू मारता है तो उसके चित्तमें दुःख पानेके कर्माशय बनते हैं । अकर्ममें भी कर्म होता है और कर्ममें भी अकर्म होता है । जैसा कि भगवान् श्रीकृष्णने गीता, अध्याय चारमें बतलाया है-कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः । अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः ॥ १७ ॥
कर्मका स्वरूप भी जानना चाहिये और अकर्मका स्वरूप भी जानना चाहिये तथा निषिद्ध कर्मका स्वरूप भी जानना चाहिये; क्योंकि कर्मकी गति गहन है । कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः । स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत् ॥ ( ४/१८ ) जो पुरुष कर्ममें अर्थात् अहंकाररहित अनासक्त भावसे की हुई सम्पूर्ण चेष्टाओंमें अकर्म अर्थात् ( २ ९ ७ )
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साधनपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप* [ सूत्र १५ वास्तवमें उनका न होनापना देखे और जो पुरुष अकर्ममें भी कर्मके अर्थात् अज्ञानी पुरुषद्वारा सम्पूर्ण क्रियाओंके त्यागमें भी त्यागरूप क्रियाको देखे, वह पुरुष मनुष्योंमें बुद्धिमान् है और वह किये योगी हुए सम्पूर्ण कर्मोंका करनेवाला है । 1 यस्य सर्वे समारम्भाः कामसंकल्पवर्जिताः । ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः ॥ ( ४ । १ ९ ) जिसके सम्पूर्ण कार्य कामना और संकल्पसे रहित हैं, ऐसे उस ज्ञानरूप अग्निद्वारा भस्म हुए कर्मोंवाले पुरुषको ज्ञानी जन पण्डित कहते हैं । त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः । कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किंचित्करोति सः ॥ ( ४।२० ) जो पुरुष सांसारिक आश्रयसे रहित सदा परमानन्द परमात्मामें तृप्त है, वह कर्मोंके फल और सङ्ग अर्थात् कर्तृत्व - अभिमानको त्यागकर कर्ममें अच्छी प्रकार बर्तता हुआ भी कुछ भी नहीं करता है । यदि किसीके समक्ष कोई हिंसक जन्तु किसी सोते हुए मनुष्यको काटनेके लिये जाय और वह मनुष्य उसको दुःख देनेके विचारसे न बचावे अथवा कोई अपने किसी नियत कर्तव्यकर्मको न करे तो वह अकर्ममें कर्म होगा । इससे भी दुःख पानेके कर्माशय बनेंगे । कर्म - सिद्धान्त बहुत गहन है, स्थूल बुद्धिसे समझमें नहीं आ सकता, एकाग्रबुद्धिसे ही समझा जा सकता है । इस कर्म - सिद्धान्तका सार यही है कि कोई कर्म भी किसीको दुःख देनेकी नीयतसे न किया जाय— “ मा हिंस्यात्सर्वभूतानि । ” वास्तवमें न कोई किसीको सुख दे सकता है न दुःख । जो मिलना है वह उसे अवश्य मिलेगा । मनुष्य दूसरोंको सुख - दुःख पहुँचानेकी नीयतसे कर्म करके अपने अंदर सुख - दुःख पानेके कर्माशय एकत्र कर लेता है । सङ्गति — योगीके लिये सुख - दुःख दोनों दुःखरूप ही हैं, अब यह बतलाते हैं— परिणामतापसंस्कारदुःखैर्गुणवृत्तिविरोधाच्च दुःखमेव सर्वं विवेकिनः ॥ १५ ॥
शब्दार्थ — परिणाम - ताप - संस्कारदुःखैः = परिणाम, ताप, संस्कारके दुःखोंसे; गुण - वृत्ति - विरोधात् च = और गुणोंकी वृत्तियोंके विरोधसे; दुःखमेव सर्वं विवेकिनः = दुःख ही है सब कुछ अर्थात् सुख भी दुःख ही है विवेकीको । अन्वयार्थ — क्योंकि ( विषय - सुखके भोगकालमें भी ) परिणाम - दुःख, ताप - दुःख और संस्कार - दुःख बना रहता है और गुणोंके स्वभावमें भी विरोध है, इसलिये विवेकी पुरुषके लिये सब कुछ ( सुख भी जो विषय - जन्य है ) दुःख ही है । व्याख्या — जिस प्रकार विष मिला हुआ स्वादिष्ट पदार्थ भी बुद्धिमान् के लिये त्याज्य है, इसी प्रकार जिन सब योगी - जनोंको सम्पूर्ण क्लेश तथा उनके विभाग आदिका विवेकपूर्ण ज्ञान हो गया है दुःख , उनको सम्मिलित संसारके है, जो विषय - सुखोंमें दुःख - ही - दुःख प्रतीत होता है; क्योंकि इन सुखोंमें भी चार प्रकारका नीचे व्याख्यासहित वर्णन किया जाता है-७ ) उत्पन्न परिणाम - दुःख – विषय - सुखके भोगसे इन्द्रियोंकी तृप्ति नहीं होती है, होती बल्कि है राग । यथा— - क्लेश ( २ । होता है । ज्यों - ज्यों भोगका अभ्यास बढ़ता है, त्यों - त्यों तृष्णा बलवती ( २ ९ ८ )
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विवेकिनः * सूत्र १५ ] * परिणामतापसंस्कारदुःखैर्गुणवृत्तिविरोधाच्च दुःखमेव सर्वं [ साधनपाद
न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति । हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते ॥
( मनु ० २ । ९ ४ ) प - कामना विषयोंके उपभोगसे कभी शान्त नहीं होती, किंतु हवन - सामग्रीके डालनेसे अग्नि विषय-सदृश और अधिक भड़कती है । अर्थात् हविः ( सामग्री ) डालनेसे अग्नि बुझती नहीं, किंतु और बढ़ती है, इसी प्रकार विषय - सुखके भोगसे विषय - सुखकी कामना शान्त नहीं होती, किंतु और बढ़ती है । विषयोंके भोगसे इन्द्रियाँ दुर्बल हो जाती हैं, अन्तमें इन्द्रियोंमें विषय - भोगकी शक्ति बिलकुल नहीं रहती और तृष्णा सताती है । यह सुख परिणाममें दुःख ही है I ताप - दुःख – विषय - सुखकी प्राप्तिमें और उसके साधनमें राग - क्लेश ( २। ७ ) उत्पन्न होता है और उनमें जो रुकावटें होती हैं, उनसे द्वेष - क्लेश ( २ । ८ ) उत्पन्न होता है । यह सुखके नाश होनेका दुःख सुखके भोग - कालमें भी सताता रहता है । इसी कारण यह सुख परिणाममें ताप - दुःख है । संस्कार - दुःख – सुखके भोगके जो संस्कार चित्तपर पड़ते हैं, उनसे राग ( २ । ७ ) उत्पन्न होता है, मनुष्य उनके प्राप्त करनेमें यत्न करता है । उनमें रुकावटोंसे द्वेष ( २ । ८ ) होता है । इस प्रकार राग- -द्वेषके भी संस्कार पड़ते रहते हैं और उनके वशीभूत होकर जो शुभाशुभ कर्म करता है, उनके भी संस्कार पड़ते हैं । ये संस्कार आवागमनके चक्रमें ड़ालनेवाले होते हैं, इसलिये यह सुख परिणाममें संरकार - दुःख है । गुण - वृत्ति - विरोध - दुःख – सत्त्व, रजस्, तमस् – ये क्रमसे प्रकाश, प्रवृत्ति और स्थिति स्वभाववाले हैं । इनकी क्रमसे सुख, दुःख और मोहरूपी वृत्तियाँ हैं । ये तीनों गुण परिणामी हैं । कभी एक गुण दूसरेको दबाकर प्रधान हो जाता है, कभी दूसरा उसको । जब सत्त्व रजस् तथा तमस्को दबा लेता है, तब सुख - वृत्तिका उदय होता है । जब रजस् सत्त्व और तमस्को दबा लेता है, तब दुःख और जब तमस् सत्त्व तथा रजस्को दबा लेता है, तब मोह पैदा हो जाता है । इन तीनों गुणोंमें परिणाम रहता है । इस कारण इनकी वृत्तियोंमें भी परिणामका होना आवश्यक है और सुखके पश्चात् दुःख और मोहका होना स्वाभाविक है । यह गुण - वृत्तियों के विरोधसे सुखमें दुःखकी प्रतीति है । जिस प्रकार मकड़ीका जाला भी आँखमें पड़कर अत्यन्त दुःखदायी होता है, इसी प्रकार विवेकी योगियोंका चित्त अत्यन्त शुद्ध होता है, उनको लेशमात्र भी दुःख और क्लेश खटकता है । इस कारण वे संसारके सुखोंको भी सदैव त्याज्य और दुःख - रूप समझते हैं । इसी प्रकार सांख्य - दर्शन अध्याय ६ में बतलाया गया है-कुत्रापि कोऽपि सुखीति ॥ ७ ॥
तदपि दुःखशबलमिति दुःखपक्षे निःक्षिपन्ते विवेचकाः ॥ ८ ॥
क्या कहीं कोई सुखी है, अर्थात् कहीं कोई भी सुखी नहीं है । ( जिसको सुख भी दुःखसे मिला हुआ है, इसलिये उस सुखको भी दुःखके पक्षमें विवेकी समझा जाता है ) वह सुख
पुरुष संयुक्त करते हैं ।
नानक दुखिया सब संसार । सुखी वे ही जिन्हनाम अधार ॥
सङ्गति — जिस प्रकार चिकित्सा शास्त्रमें रोग, रोगका चार विषय होते हैं, इसी प्रकार यहाँ इस शास्त्रमें कारण, आरोग्य, आरोग्यका साधन ( ओषधि ) ( २ ) दुःखका कारण द्रष्टृ - दृश्यका संयोग जो “ ( १ ) दुःख जो “ हेय ” त्याज्य है सूत्र १६ में, संयोगका अभाव जो “ हान ” अर्थात् कैवल्य है सूत्र हेय २५ - हेतु में " है सूत्र १७ में, ( ३ ) दुःखका नाश, इस , और ( ४ ) विवेकख्याति कैवल्यका साधन ( २ ९९ )
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साधनपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप * * [ सूत्र १६ जो “ हानोपाय ’ ” है सूत्र २६ में वर्णन किया गया है । इस प्रकार यह शास्त्र चतुर्व्यूह कहलाता अर्थात् त्याज्य क्या है, यह अगले सूत्रमें बतलाते हैं— है । “ हेय ” हेयं दुःखमनागतम् ॥ १६ ॥
शब्दार्थ — हेयम् - त्याज्य; दुःखम् - दुःख, अनागतम् = आनेवाला हैI अन्वयार्थ - आनेवाले दुःख हेय ( त्यागनेयोग्य ) हैं । व्याख्या – भूतकालका दुःख भोग देकर व्यतीत हो गया, इसलिये त्यागनेयोग्य नहीं । वर्तमान दुःख इस क्षणमें भोगा जा रहा है, दूसरे क्षणमें स्वयं समाप्त हो जायगा, इस कारण त्याज्य नहीं । इसलिये आनेवाला दुःख ही त्यागनेयोग्य है । विवेकीजन उसीको हटानेका यत्न करते हैं । टिप्पणी सूत्र १६ – बौद्धदर्शन – वैदिक दर्शनोंके चार प्रतिपाद्य विषयोंको बौद्धधर्ममें ' चार आर्य-सत्य ' के नामसे वर्णन किया गया है-पहिला आर्य - सत्य- - दुःखम् - इस संसारका जीवन दुःखसे परिपूर्ण है । दूसरा आर्य सत्य— दुःख - समुदयः — इस दुःखका कारण विद्यमान है । तीसरा आर्य सत्य — दुःख - निरोधः - इस दुःखसे वास्तविक मुक्ति मिल सकती है । चौथा आर्य सत्य — निरोधगामिनी प्रतिपद् - दुःखोंके नाशके लिये वास्तविक मार्ग है ( १ ) दुःखकी व्याख्या करते समय तथागतने बतलाया है - ' हे भिक्षुगण! दुःख प्रथम आर्य - सत्य है । जन्म दुःख है । वृद्धावस्था भी दुःख है । मरण भी दुःख है । शोक, परिदेवना, दौर्मनस्य, उपायास सब दुःख है । अप्रिय वस्तुके साथ समागम दुःख है । प्रियके साथ वियोग भी दुःख है । ईप्सित वस्तुका न मिलना भी दुःख है । संक्षेपसे कह सकते हैं कि रागके द्वारा उत्पन्न पाँचों स्कन्ध ( रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार तथा विज्ञान ) भी दुःख है । ' धम्मपद गाथा १४६ में बतलाया है— को नु हासो किमानन्दो निच्चं पज्जलिते सति । ( को नु हासः क आनन्दो नित्यं प्रज्वलिते सति ) जब यह संसार नित्य जलते हुए घरके समान है, तब यहाँ हँसी क्या हो सकती है और आनन्द क्या मनाया जा सकता है । 1 ( २ ) दुःख - समुदय — योगदर्शनके हेय हेतुके स्थानमें यह दूसरा आर्य - सत्य है । समुदयका अर्थ हेतु है । यहाँ दुःखका हेतु तृष्णा बतलायी गयी है । मज्झिम निकायमें भगवान् बुद्धके शब्दोंमें बतलाया गया है- 1 हे भिक्षुगण! दुःख - समुदय दूसरा आर्य सत्य है । दुःखका वास्तविक हेतु तृष्णा है, जो बारंबार प्राणियोंको उत्पन्न करती है, विषयोंके रागसे युक्त है तथा उन विषयोंका अभिनन्दन करनेवाली है । यहाँ और वहाँ सर्वत्र अपनी तृप्ति खोजती रहती है । यह तृष्णा तीन प्रकारकी है– ( १ ) कामतृष्णा, जो नाना प्रकारके विषयोंकी कामना करती है । ( २ ) भवतृष्णा, जो संसारकी सत्ताको बनाये रखती है । ( ३ ) विभवतृष्णा, जो संसारके वैभवकी इच्छा करती है । संक्षेपमें दुःख समुदयका यही स्वरूप है । सरित: स्निग्धाश्च सौमनस्या भवन्ति जन्तोः । ते स्रोतः सृताः सुखैषिणस्ते वै जातिजरोपगा नराः ॥ ( धम्मपद गाथा ३४१ ) तृष्णाकी धाराएँ प्राणियोंको बड़ी प्रिय और मनोहर लगती हैं । सुखके फेरमें पड़े उसकी धारामें पड़ते ( ३०० )
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द्रष्टृदृश्ययोः संयोगो हेयहेतुः [ साधनपाद * * सूत्र १७ ] हैं और बार - बार जन्म- जराके चक्रमें जाते हैं । बर्वजं च । न तद् दृढं बन्धनमाहुर्धीरा यद् आयसं दारुजं च याऽपेथा ॥ संरक्तरक्ता मणिकुण्डलेषु पुत्रेषु दारेषु ( धम्मपद गाथा ३४५) धीर विद्वान् पुरुष लोहे, लकड़ी तथा रस्सीके बन्धनको दृढ़ इच्छाका नहीं मानते होना । वस्तुतः । दृढ़ बन्धन है — सारवान् पदार्थोंमें रक्त होना या मणि, कुण्डल, पुत्र तथा स्त्रीमें ये रागरक्ता अनुपतन्ति स्रोतः स्वयं कृतं मर्कटक इव जालम् । धम्मपद गाथा ३४७ ) जो रागमें रक्त हैं, वे जैसे मकड़ी अपने बनाये जालमें पड़ती है, वैसे ही अपने विरोधकी बनाये स्रोतमें जननी पड़ते है । हैं । मज्झिम निकायमें बतलाया गया है – “ यही तृष्णा जगत्के समस्त विद्रोह तथा उसीके कारण राजा राजासे लड़ता है, क्षत्रिय क्षत्रियसे लड़ता है, ब्राह्मण ब्राह्मणसे लड़ता है, उसीके माता पुत्रसे लिये लड़ती है और लड़का मातासे लड़ता है । समस्त पापकर्मोंका निदान यही तृष्णा है । चोर चोरी करता है, कामुक इसीके लिये परस्त्रीगमन करता है । धनी इसीके लिये गरीबोंको चूसता है । ” है । तृष्णामूलक यह संसार है । तृष्णा ही दुःखका कारण है, इसीका समुच्छेद प्रत्येक प्राणीका हैं— कर्तव्य सङ्गति — इस हेय दुःखका कारण ' हेयहेतु ' क्या है, यह अगले सूत्रमें बतलाते द्रष्टृदृश्ययोः संयोगो हेयहेतुः ॥ १७ ॥
शब्दार्थ – द्रष्टृदृश्ययोः संयोगः = द्रष्टा और दृश्यका संयोग; हेयहेतुः = हेय ( त्याज्य दुःख ) का है 1 कारण अन्वयार्थ – द्रष्टा और दृश्यका संयोग " हेयहेतु ” ( दुःखका कारण ) है । व्यारण्या — द्रष्टा चेतन पुरुष है, जो चित्तका स्वामी होकर उसको देखनेवाला है । दृश्य चित्त है जो स्व ( मिलकियत ) बनकर पुरुषको गुणोंके परिणाम स्वरूप संसारको दिखाता है । चित्तद्वारा देखे जानेके कारण यह सारा गुणोंका परिणाम विषय, शरीर और इन्द्रिय आदि भी सब दृश्य ही हैं । संयोग — इस पुरुष और चित्तका जो आसक्तिसहित अविवेकपूर्ण भोग्य - भोक्ताभावका सम्बन्ध है, उसके लिये यहाँ संयोग शब्द आया है । यही इस दुःखका ( जो पिछले सूत्रमें हेय अर्थात् त्याज्य बतलाया था ) “ हेतु ’ ” अर्थात् कारण है । पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान् गुणान् । कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु ॥ ( गीता १३ ।२१ ) प्रकृतिमें स्थित हुआ ही पुरुष प्रकृतिसे उत्पन्न हुए त्रिगुणात्मक सब पदार्थोंको भोगता है और इन गुणोंका संग ही इस जीवात्माके अच्छी - बुरी योनियोंमें जन्म लेनेमें कारण है ( सत्त्वगुणके संगसे देवयोनियोंमें, रजोगुणके संगसे मनुष्ययोनिमें और तमोगुणके संगसे पशु - पक्षी आदि नीच योनियोंमें जन्म होता है । ) टिप्पणी — इस सूत्रकी व्याख्या शीघ्रता तथा सरलताके कारण हमने प्रथम भोजवृत्ति - अनुसार कर दी थी । इसके व्यासभाष्यके समझनेमें कई एकोंको संस्करणमें इसलिये उनके स्पष्टीकरणके साथ व्यासभाष्यके भाषार्थको लिखा जाता कुछ शङ्काएँ उत्पन्न हुई हैं, है व्या ॰ भा ॰ भाषार्थ ( सूत्र १७ ) –द्रष्टा नाम बुद्धि - प्रतिसंवेदी होकर तदाकारताको धारण करनेवाले अथवा अपने प्रतिबिम्बद्वारा पुरुषका बुद्धिको है चेतन अर्थात् तुल्य बुद्धिमें करनेवाले प्रतिबिम्बित पुरुषके ( ३०१ )
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साधनपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप ** [ सूत्र १७ लिये द्रष्टा शब्दका प्रयोग हुआ है 1 दृश्य नाम बुद्धि सत्त्वोपारूढ़ सब धर्मों ( सत्त्वमें स्थिर हुई सब धर्मोंवाली ) का है । अर्थात् बुद्धि तथा इन्द्रियोंद्वारा जिन पदार्थोंको बुद्धिसे ग्रहण किया जाता है अथवा अहंकार आदिद्वारा जितने तत्त्व बुद्धिसे उत्पन्न होते हैं, उन सब प्रकृतिके कार्योंको दृश्य पदसे ग्रहण करना चाहिये । यह बुद्धि आदि दृश्य ही अयस्कान्तमणिके तुल्य संनिधिमात्रसे द्रष्टृरूप स्वामीका उपकार करता हुआ दृश्यरूपसे स्व हो जाता है ( और भोक्ता भूत पुरुषका भोग्य ) । यद्यपि यह दृश्य अपने जडरूपसे लब्धसत्तावाला होनेसे स्वतन्त्र है, तथापि पुरुषके अर्थ होनेसे इसको परतन्त्र ही जानना चाहिये । यह पुरुषार्थप्रयुक्त जो स्व - स्वामिभाव या दृग्दृश्यभाव वा भोक्तृ - भोग्यभावरूप अनादि प्रकृतिपुरुषका संयोग है, वह दुःखका कारण है । पञ्चशिखाचार्यने भी ऐसा ही कहा है-" तत्संयोगहेतुविवर्जनात्स्यादयमात्यन्तिको दुःखप्रतीकारः ” अर्थात् दुःखके कारण बुद्धि - संयोगके विवर्जनसे ( हट जानेसे ) दुःखका अत्यन्त प्रतीकार ( नाश ) हो जाता है । ( यहाँ यह भी जान लेना चाहिये कि यह संयोग ही अस्मिता - क्लेश है, जिसका कारण अविद्या है और अविद्या सत्त्वचित्तमें जो लेशमात्र तम है, उसमें वर्तमान है । ) जिस प्रकार लोकमें परिहार करनेयोग्य दुःखहेतु पदार्थ - प्रतीकार ( निवृत्तिका उपाय ) है । इसी प्रकार यहाँ भी दुःख - हेतु संयोगका प्रतीकार जान लेना चाहिये । अर्थात् जिस प्रकार लोकमें पादतल ( पैरका तलवा ) भेद्य ( दुःख पानेवाला ) है और कण्टक ( काँटा ) भेदक ( दुःख देनेवाला ) है तथा कण्टकपर पैर न रखना या जूते पहिनकर पैर रखना, यह इस पैरके तलवेमें काँटे लगनेके दुःखका प्रतीकार ( उपाय ) है, इसी प्रकार यहाँ कोमल पादतलके तुल्य मृदुल सत्त्वगुण ( सत्त्वप्रधान बुद्धि अथवा सत्त्वचित्त ) तप्य ( दुःख पानेवाला ) और रजोगुण उसका तापक ( दुःख देनेवाला ) है तथा प्रकृति - पुरुषके संयोगकी हानि या विवेकख्याति इस तापका प्रतीकार है । जैसे लोकमें भेद्य, भेदक और परिहार – इन तीनोंको जाननेवाला भेदक — कण्टकादिकी निवृत्तिके उपायरूप अनुष्ठान करके भेद - जन्य दुःखको प्राप्त नहीं होता, वैसे यहाँ भी जो तप्य, तापक और परिहार – इन तीनों पदार्थोंको जानता है, वह भी विवेकख्यातिरूप अनुष्ठान करके संयोगजन्य दुःखको प्राप्त नहीं होता । यद्यपि तापरूप जो क्रिया है, वह कर्मभूत सत्त्व ( चित्त ) में ही है न कि पुरुषमें अर्थात् बुद्धि ( चित्त ) ताप्य है न कि पुरुष, क्योंकि पुरुष अपरिणामी तथा निष्क्रिय है, तथापि दर्शित विषयत्वरूप उपाधिसे या अविवेकसे बुद्धिके तदाकार होनेसे पुरुष भी तदाकारधारी अनुतापको प्राप्त हो जाता है । इसलिये पुरुषमें औपाधिक तापका संयोग है अर्थात् बुद्धि उपाधिके सम्बन्धसे पुरुष ताप्य है । प्रकृति - पुरुषका सम्बन्ध तापक है और विवेकख्याति इसका परिहार है ॥ १७ ॥
विशेष जानकारीके लिये - विज्ञानभिक्षुके योगवार्त्तिकका भाषानुवाद ॥ सूत्र १७ ॥ हेयके सूत्रकी व्याख्या करके क्रमसे प्राप्त हेयके हेतुके प्रतिपादक सूत्रका अवतरण करते हैं — तस्मात् — जो हेय कहा जाता है, उसके ही कारणका निर्देश किया जाता है— द्रष्टृदृश्ययोः संयोगो हेयहेतुः — द्रष्टृ शब्दके पदार्थको कहते हैं-द्रष्टा बुद्धि - प्रतिसंवेदी पुरुष है । ( ३०२ ) पा ० यो ० प्र०११-
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द्रष्टृदृश्ययोः संयोगो हेयहेतुः [ साधनपाद * * सूत्र १७ ] प्रतिसंवेदन — संवेदन बुद्धिकी वृत्तिके प्रतिबिम्बका नाम है । प्रतिध्वनिके समान प्रतिसंवेदी इस ( प्रतिसंवेदन – बुद्धिका ) शब्दका प्रयोग किया गया है । वह प्रतिसंवेदन जिसको हो, वह बुद्धिको वृत्तिका साक्षी पुरुष है — यह फलितार्थ है । दृश्य शब्दके पदार्थको कहते हैं — दृश्यबुद्धि - सत्त्वमें उपारूढ़ सब धर्म हैं । बुद्धि - विवक्षित सत्त्वको भी है, दृश्य इस होनेसे यहाँ विशेषण विवक्षित है, धर्म उसको भी बुद्ध्यारूढ होनेसे बुद्धिधर्मत्व अभिप्रायसे अभिप्रायसे दृश्य - बुद्ध्यारूढ सब धर्म हैं, यह कहा गया है— ये धर्म बुद्धिके कार्य हैं, इस नहीं कहा है; क्योंकि प्रधान आदिका भी दृश्य होनेसे त्याग उचित नहीं है । उत्तर सूत्रमें मुख्यतया प्रधानको ही दृश्य कहा है । यद्यपि बुद्ध्यारूढ ( बुद्धिमें प्रतिबिम्बित ) पुरुष भी दृश्य है, तो भी वह दुःखसे रहित नहीं है, अतः उसका दर्शन हेय दुःखका हेतु नहीं है, इस आशयसे यहाँ दृश्यके अंदर पुरुषकी गिनती करेंगे । तथा सुख - दुःख - मोहात्मक दृश्यवाली बुद्धिके साथ द्रष्टा - साक्षी पुरुषका जो काष्ठमें अग्निके समान सम्बन्ध है — जिसको बन्ध भी कहते हैं, वह दुःखका हेतु है, यह सूत्रका अर्थ है । बुद्ध्यारूढ दृश्योंके साथ द्रष्टाका ज्ञानरूप संयोग हेयका हेतु यहाँ विवक्षित नहीं है । ‘ स्वस्वामिशक्त्योः स्वरूपोपलब्धिहेतुः संयोगः ' इस आगामी सूत्रसे इस ज्ञानरूप संयोगको ज्ञानका हेतु ही कहा है, ज्ञानरूप नहीं कहा है । इस सूत्रसे बुद्धि और आत्माके संयोगकी भाँति घटादि वस्तुओंके साथ आत्माका संयोग भी भोगला हेतु है, यह जानना चाहिये; क्योंकि लाघवसे भोक्ता और भोग्य वस्तुका संयोग ही सामान्य भोगका हेतु कहना उचित है । विषयके भोगमें बुद्धिके अवच्छेदसे विषयका संयोग हेतु है, अतः अतिव्याप्ति नहीं है । यह संयोग पुरुषार्थका हेतु है और इस संयोगका हेतु पुरुषार्थ है, इस बातको कहनेके लिये- — सकल पुरुषार्थस्वरूप जो पुरुषका स्वत्व है— सम्पत्ति है— उसका बुद्धिमें प्रतिपादन करते हैं-तदेतदिति — वह यह दृश्य – अयस्कान्तमणिके सदृश संनिधिमात्रसे उपकारी दृशयत्वसे स्वामी पुरुषका स्व - सम्पत्ति होता है । शङ्का – ' तस्य हेतुरविद्या ' इस आगामी सूत्रसे ही संयोगका कारण कहेंगे, यहाँ संयोगके कारणकी अपेक्षा नहीं है? समाधान — यह नहीं कहना चाहिये, क्योंकि अविद्याको भी पुरुषार्थकी असमाप्तिके द्वारा बन्धकी हेतुता आगे कहेंगे । तदेतद् इत्यादिका अर्थ यह है कि तद् बुद्धि सत्त्व है । यह दृश्यजगत् जिसमें रहता है, वह दृश्य है; अतः अयस्कान्तमणिके समान संनिधिमात्रसे उपकारी होनेसे और स्वयं दृश्य होनेसे ज्ञानमात्रस्वरूप – स्वामी पुरुषका वह स्व- ( आत्मीय ) सम्पत्ति होता है । शङ्का — बुद्धिका अन्य स्वामी क्यों मानते हो? वह बुद्धि ही अपरतन्त्रा, स्वयं ही द्रष्ट्री स्वार्थ ही हो सकती है । समाधान — तत्राह - अनुभवकर्मेति — क्योंकि कर्म - कर्तृ - विरोध होनेसे आप अपना दृश्य तो सकता, ( अतः ) अनुभव नामक जो पुरुषका कर्म है, उस कर्मका विषय हो नहीं -चैतन्यसे प्रतिलब्धात्मक - सिद्ध सत्तावाला अथवा अन्यरूपसे अन्यके होता हुआ ही अन्यरूपसे पुरुष ( अतः ) स्वतन्त्र होनेपर भी पुरुषके अनाश्रित भी परार्थ होनेसे परतन्त्र प्रयोजनके हैं, परपुरुषका कारण प्राप्त स्थिति, स्व - सम्पत्ति है । ( ३०३ )
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साधनपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप [ सूत्र १७ इस प्रकार दृश्य नामक भोग्यात्मक अखिल पुरुषार्थके बुद्धिनिष्ठ सिद्ध हो जानेपर वही पुरुषार्थ अनागत अवस्थामें स्थित - बुद्धि और पुरुषके संयोगमें कारण है — यह कहते हुए सूत्रके वाक्यार्थको कहते हैं-तयोरिति – उन स्व और स्वामीका – दृश्यतेऽनयेति दर्शनं बुद्धिः – देखा जाय जिससे वह दर्शन नाम बुद्धिका है— पुरुषार्थकृतत्व वचन कथनके कारण यहाँ अनादिका अर्थ प्रवाहसे अनादि है । शङ्का – पुरुषार्थका पुरुषसे संयोग माननेमें पुरुषकी अपरिणामिताका भंग हो जायगा ( कोई भी संयुक्त पदार्थ अपरिणामी नहीं होता )? समाधान – सामान्य गुणोंके अतिरिक्त धर्मोकी उत्पत्तिको ही व्यवहारके अनुसार परिणाम निश्चय किया है । घट आदिके संयोग आदिसे आकाश परिणामी नहीं होता और द्वित्व आदि संख्याके संयोगसे पुरुष परिणामी नहीं कहा जाता, पद्म - पत्रपर रखी जलकी बूँदसे पद्म - पत्रकी अपरिणामिता और असंयोग भी सुना जाता है । संयोग, विभाग, संख्या आदि द्रव्योंके सामान्य गुण हैं ( अतः सामान्यगुण संयोगसे अपरिणामिताका भंग नहीं होता है ) । श्रुति और स्मृतियोंमें सुखादिरूप परिणाम ही पुरुषमें नहीं माने हैं, मनके साथ सुखादिका अन्वय और व्यतिरेक है, अतः मनमें ही लाघवसे सुखादि माने हैं, सुखादिको मनका अवच्छेदक मानकर अन्यत्र – पुरुषमें उसको ( सुखादिको ) माननेमें गौरव है । संयोगादिके प्रति तो द्रव्यत्वरूपसे ही हेतुता होनेसे वह पुरुषकी भी हो सकती है और पुरुषका द्रव्यत्व तो अनाश्रित होनेसे तथा परिणामसे सिद्ध है ( अर्थात् जो अनाश्रित और परिमाणवाला होता है, वह द्रव्य हुआ करता है । पुरुष किसीके आश्रय नहीं और महत् परिमाणवाला है, अतः द्रव्य है । ) यद्यपि कारणावस्थामें बुद्धि और पुरुष दोनों विभु हैं, तथापि उनका संयोग परिच्छिन्न गुणान्तरके अवच्छेदसे सम्भव है ही; क्योंकि महदादि अखिल परिणाम त्रिगुणके संयोगके बिना उत्पन्न नहीं होते और वह संयोगज संयोग है, कर्मजन्य संयोग नहीं है । जैसे अवयवके संयोगसे अवयवीका संयोग होता है, वैसे अवच्छेदकीभूत गुणके संयोगसे ही दो विभुओंका ( बुद्धि और पुरुषका ) संयोग है । साक्षात् संयोगका पुरुषमें निषेध है, संयोगज संयोगका निषेध नहीं है । यदि आत्माका संयोग ही नहीं है, यह माना जाय तो प्रकृति - पुरुषके संयोगसे सृष्टि और उनके वियोगसे प्रलय यह जो श्रुति, स्मृति और सूत्रोंने माना है, वह न बन सकेगा । भोक्तृ - भोग्य योग्यता ही यहाँ औपचारिक संयोग वक्तव्य है, यह नहीं कहना चाहिये; क्योंकि वह स्व - स्वामी - भाव होनेसे अनादि है, अनादि होनेसे कार्य हो नहीं सकता और उसके अविनाशी होनेपर ज्ञानसे नाशकताका विरोध होगा, नाशवान् माननेमें पुरुषको परिणामता होगी ( जो कि अनिष्ट है । ) शङ्का – पुरुषका संयोग माननेमें पुरुषकी असङ्गताकी क्षति होगी? समाधान — नहीं, कमलपत्रमें जो कि पुरुषका दृष्टान्त है - संयोग होनेपर भी असङ्गता मानी जाती है । स्व - आश्रय - विकारका हेतु जो संयोग है, उस संयोगकी ही सङ्गता है । पुरुषमें ऐसा संयोग नहीं है, जो पुरुषके अंदर विकारका हेतु हो; अतः पुरुषार्थका कारण बुद्धि और पुरुषका संयोग है – , वही योगीन्द्रोंसे जन्मरूपसे भी दुःखका हेतु है — यह बात सिद्ध होती है । वह संयोग विशेष परमेश्वरकी योगमाया ईश्वर, अचिन्त्य – श्रुति और स्मृतियोंसे गम्य है- विशेष तर्कका विषय नहीं है, जिस मायाके द्वारा डालता है नित्य - मुक्त - असङ्ग, अविद्या आदिसे रहित विभु और चेतनमात्र आत्मा जीव - समूहको बन्धनमें ( ३०४ )
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द्रष्टृदृश्ययोः संयोगो हेयहेतुः * [ साधनपाद सूत्र १७ ] * ( जिसके कारण जीवसमूह बन्धनमें फँसे हुए हैं ) ऐसा ही कहा है-' अचिन्त्याः खलु ये भावा न तांस्तर्केण योजयेत् । ' विषयमें तर्कना न करे
निश्चय ही जो भाव अचिन्त्य हैं, उनको तर्कसे युक्त न करे— उनके ।
सेयं भगवतो माया यन्नयेन विरुध्यते । ईश्वरस्य विमुक्तस्य कार्पण्यमुत बन्धनम् ॥
वह ही यह भगवान्की माया है जो कि नीतिका भी विरोध करती है । इसी मायाके कारण विमुक्त ईश्वरको भी दीनता और बन्धन होता है । * संयोगको दुःखकी हेतुता दिखलानेके लिये पञ्चशिखाचार्यके संवादको कहते हैं — तथा चोक्तं — यहाँसे — प्रतीकार – यहाँतक । बुद्धि और पुरुषका संयोग हेय दुःखका हेतु है, उसके परिवर्जनसे — उच्छेदसे दुःखका आत्यन्तिक प्रतीकार होता है, उच्छेद होता है । शङ्का — अनादि कालसे प्रवृत्त जो दुःखका हेतु संयोग, उसका उच्छेद नहीं हो सकता, इस आशयसे पूछते हैं प्रसङ्गसे उसकी शक्यताका निश्चय करनेके लिये – कस्मादिति । समाधान – दुःखके हेतुके परिहारसे दुःखका प्रतीकार देखा जाता है । परिहार्य इस कथनसे प्रकृति आदि नित्य पदार्थोंकी व्यावृत्ति सिद्ध है । दुःखहेतुत्व नित्यत्वरूप लिङ्गसे दुःख - हेतुके अनित्यत्व - दर्शनमें संयोगरूप दुःखके हेतुका अनित्य होना सिद्ध है । प्रकृति आदिकी नित्य व्यावृत्ति तथा च दुःखके हेतुत्व नित्यत्व लिङ्गसे संयोगका उच्छेद हो सकता है । इसका अनुमान होता है । दुःखके हेतुका प्रतीकार हो सकता है; इसमें लौकिक उदाहरण कहते हैं —तद्यथेति । भेद्यत्व — भेदज दुःख — भागित्व हैं, और भेतृत्व – भेदके द्वारा दुःखका हेतु है, पादानधिष्ठान--पैरसे अनारोहण – न चढ़ना है । पादत्राण जूतेको कहते हैं अथवा जूता पहने पैरोंसे काँटोंपर चढ़ना । ये तीन दुःखका आश्रय, दुःखका हेतु और दुःखके परिहारके उपाय हैं, जो इनको जानता है— इस वचनसे भाष्यकारने इन तीनोंके ज्ञानको दुःखके प्रतीकारकी हेतुता कहते हुए - यह तीनों मुमुक्षुको जानना चाहिये यह भी सूचित किया है । शङ्का – ताप और दुःख पर्यायवाची शब्द हैं तब दृष्टान्तमें यथा भेद्य - भेतृ - प्रतीकाररूप त्रिक है, ऐसा दान्तिकमें नहीं है; क्योंकि उसमें एक बुद्धिको ही तप्य ( तपनेवाली ) और तापक ( तपानेवाली ) उभयरूप माना है और पुरुषको निर्दुःख माना है । अतः आक्षेप करते हैं — कस्मादिति-समाधान- -सिद्धान्त कहते हैं — त्रित्वोपलब्धाति । बाह्य दुःखके स्थलमें उक्त बलसे आन्तर दुःखके स्थानमें भी तीनोंकी सिद्धि होती है, यह तीनोंकी उपलब्धिके हैं — अत्रापीति — यहाँ दाष्टन्तिकमें भी, भाव यह है कि बुद्धिके एक होनेपर भाव है, उसका प्रकार कहते अंश होते हैं, उनमेंसे रज - अंश तापक भी त्रिगुणात्मक होनेसे तीन है, सत्त्व - अंश तप्य - तपनेवाला है, बुद्धि और वियोग, पुरुषका दुःखका प्रतीकार है, इस भाँति तीन बन सकते आशयसे पूछते हैं — कस्मादिति — सिद्धान्त कहते हैं हैं— । पुरुष अत्रापि ही इत्यादिना तप्य – तपनेवाला क्यों नहीं है? इस — इससे क्षेत्रज्ञ — इस तर्कसे * टिप्पणी – यह सिद्धान्त नवीन वेदान्तका समझना चाहिये । ( प्रकाशक ) ( ३०५ )