पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ
Patanjal Yog Pradip of Swami Omanand · Gita Press · 682 पृष्ठ · 69 खण्ड
विषय सूची
- PUR । ॐ श्रीपरमात्मने नमः । 47 पातञ्जलयोगप्रदीप गीताप्रेस गोरखपुर GITA PRESS, GORAKHPUR गीताप्रेस, गोरखपुर 047 । ॐ श्रीपरमात्मने नमः… 1–10
- [ २ ] श्रीस्वामी दिव्यानन्दजी महाराज ( पूर्व बा ० देवकीनन्दन गुप्त वानप्रस्थी ) ( संयोजक पातञ्जलयोगप्रदीप- प्रकाशन- प्रबन्ध परिषद् ) सन् १ ९ ३ ९ के अप्रैल… 11–20
- पातञ्जलयोगप्रदीप षड्दर्शनसमन्वय भूमिका पहिला प्रकरण वेद वेद ईश्वरीय ज्ञान है, जिसका प्रादुर्भाव ऋषियोंपर सृष्टिके आरम्भमें समाधिद्वारा होता है… 21–30
- दूसरा प्रकरण ] षड्दर्शनसमन्वय * * [ उत्तरमीमांसा द्वैत - अद्वैत सिद्धान्तके भेद आत्मतत्त्वके सम्बन्धमें द्वैत - अद्वैत आदि मतावलम्बियोंने शब्दोंके अर्थ… 31–40
- दूसरा प्रकरण ] षड्दर्शनसमन्वय * [ उत्तरमीमांसा आचार्यका नाम ( ब्रह्म ॰ सू ० ३ । ४ । ४४ में ) और जैमिनिदर्शनमें ( ४ । ३ । १८, ६ । १ । २६ ) दो बार आया है… 41–50
- दूसरा प्रकरण ] : षड्दर्शनसमन्वय * * [ उत्तरमीमांसा प्राप्त किये हुए जीवकी अपेक्षासे अद्वैत कहा जा सकता है न कि सांसारिक जीवोंकी अपेक्षासे… 51–60
- दूसरा प्रकरण ] षड्दर्शनसमन्वय * * [ उत्तरमीमांसा पञ्चविंशतितत्त्वज्ञो यत्र तत्राश्रमे वसेत् । जटी मुण्डी शिखी वापि मुच्यते नात्र संशयः… 61–70
- तीसरा प्रकरण ] षड्दर्शनसमन्वय * * [ वैशेषिक दर्शन पृथिवी, जल, तेज, वायु और आकाश — ये पाँचों द्रव्य पञ्चभूत कहलाते हैं… 71–80
- तीसरा प्रकरण ] षड्दर्शनसमन्वय * * [ न्याय दर्शन उसकी चिन्ता संशयसे लेकर निर्णयतक जिस कारण की गयी है वही निर्णयके लिये काममें लाया जाय तो दोनों पक्षोंकी… 81–90
- चौथा प्रकरण षड्दर्शनसमन्वय* [ सांख्य और योगदर्शन लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ । ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्… 91–100
- चौथा प्रकरण ] षड्दर्शनसमन्वय * * [ तत्त्वसमास जडतत्त्व कार्य कहते हैं । जुड़तत्त्वके चौबीस विभागोंमेंसे जो आठ प्रकृतियाँ बतलायी हैं उनमेंसे प्रधान अर्थात्… 101–110
- चौथा प्रकरण ] षड्दर्शनसमन्वय * [ सृष्टि और प्रलय * चित्तमें ' जिसका विशेष स्थान आनुमानिक अङ्गुष्ठमात्र हृदय है, बतलाया गया है और सांख्य तथा **********… 111–120
- चौथा प्रकरण ] षड्दर्शनसमन्वय * * [ चौदह प्रकारकी प्राणि - सृष्टि बृहदारण्यक उपनिषद् ४ । ३ । २… 121–130
- चौथा प्रकरण ] * षड्दर्शनसमन्वय * [ सृष्टि - क्रम सृष्टि - क्रम प्रकृतेर्महांस्ततोऽहंकारस्तस्माद् गणश्च षोडशकः । तस्मादपि षोडशकात् पञ्चभ्यः पञ्चभूतानि… 131–140
- चौथा प्रकरण ] * षड्दर्शनसमन्वय,* [ ' ईश्वरासिद्धेः ' का समाधान अथवा-लीनवस्तुलब्धातिशयसम्बन्धाद्वादोषः । ( सा ० द ० १… 141–150
- चौथा प्रकरण ] पातञ्जलयोगप्रदीप* [ योगदर्शनके चार पाद योगके आदि आचार्य योगके आदि आचार्य हिरण्यगर्भ हैं… 151–160
- पूज्यपाद १०८ श्रीस्वामी सोमतीर्थजी महाराज-प्रणीत षड्दर्शन- सदुपयोग - समन्वय - सूत्र १ – अथ षड्दर्शनसदुपयोगसमन्वयसूत्रम्… 161–170
- समाधिपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र २ , अधर्म , अनैश्वर्य , प्रवृत्ति राग अज्ञान , धर्म , मोह क्रोध , लोभ | निमित्त काम की - गति नीच मनुष्यों स्थिति… 171–180
- समाधिपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप* [ सूत्र ७ विशेष वक्तव्य सूत्र ७ –— इस सूत्रकी व्याख्यामें विज्ञानभिक्षु अपने योगवार्तिकमें प्रत्यक्ष - प्रमाणके सम्बन्धमें… 181–190
- समाधिपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप * * [ सूत्र १३ जिस प्रकार पक्षीका आकाशमें उड़ना दोनों ही पक्षोंके अधीन है, न केवल एक पक्षके… 191–200
- समाधिपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप* [ सूत्र १७ ( १ ) किसी भी सुखासनपूर्वक स्थिर बैठकर अन्नमय कोशमें आत्माध्यास छोड़कर प्राणमय कोशमें घुसना… 201–210
- सूत्र १ ९ ] भवप्रत्ययो विदेहप्रकृतिलयानाम् * * [ समाधिपाद * हे भारत! जब - जब धर्मकी हानि और अधर्मकी वृद्धि होती है, तब - तब मैं अपनेको प्रकट ( अपने शुद्ध… 211–220
- सूत्र २१-२२ ] मृदुमध्याधिमात्रत्वात् ततोऽपि विशेषः * * [ समाधिपाद अपेक्षासे किसीको विलम्बतम ( अत्यन्त विलम्बसे ), किसीको शीघ्रतम समाधिका लाभ प्राप्त होता… 221–230
- सूत्र २७ ] * तस्य वाचकः प्रणवः * [ समाधिपाद भाव यह है कि जैसे पिता - पुत्रका परस्पर जन्य - जनक - भाव सम्बन्ध विद्यमान हुआ हो ' यह इसका पिता है और यह इसका… 231–240
- समाधिपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र २ ९ तमोगुण रजोगुणको इतना दबा लेता है कि सूक्ष्म शरीर स्वप्नमें भी कार्य करनेमें असमर्थ हो जाता है तब सुषुप्ति -… 241–250
- समाधिपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप* [ सूत्र ३४ लगाकर नाभिको उठाकर कोष्ठस्थित वायुको दोनों नासिका -पुटद्वारा वमनकी भाँति एकदम बाहर फेंक देना चाहिये… 251–260
- समाधिपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप * * [ सूत्र ३४ रखकर ओम्के मानसिक जापके साथ त्राटक करना चाहिये । जलतत्त्वका साधन – चाँदी या काँसेका अर्धवृत्ताकार यन्त्र इतना… 261–270
- समाधिपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप [ सूत्र ३४ एक निश्चित संख्यामें मूलाधारतक मध्यम भस्त्रिका । एक निश्चित संख्यामें मूलाधार चक्रपर अश्विनी मुद्रासदृश क्रिया… 271–280
- समाधिपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप* [ सूत्र ४२ शब्दार्थ — तन = उन समापत्तियोंमेंसे; शब्द - अर्थ - ज्ञान - विकल्पैः = शब्द, अर्थ और ज्ञानके ( भेदोंसे );… 281–290
- समाधिपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप* सूत्र ४ ९ -५० ] श्रुतानुमानप्रज्ञाभ्यामन्यविषया विशेषार्थत्वात् । ४ ९… 291–300
- साधनपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदी [ सूत्र १ वक्तव्यमें बतलाया गया है । दूसरे अर्थका सम्बन्ध आभ्यन्तर क्रियासे है… 301–310
- साधनपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप* [ सूत्र ५ क्लेश अविद्याके भेद हैं, क्योंकि सबमें अविद्या ही प्रकाशित होती है… 311–320
- साधनपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप* [ सूत्र १३ ( १ ) ईश्वरीय नियमोंसे तो सदैव ऐसे बुरे कर्मोंसे बचनेकी प्रेरणा होती रहती है, मांस आदिको देखकर मनुष्यको स्वाभाविक… 321–330
- साधनपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र १८ कर्मस्थत्वका अर्थ है कर्मतया अर्थात् सकर्मक होनेसे । कर्मत्वका अर्थ क्रिया व्यापक है; क्योंकि दुःखव्याप्तत्व… 331–340
- साधनपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप * * [ सूत्र १ ९ कारण हैं; और एक अहंकार जो एकादश इन्द्रियोंका कारण है ( १ । ४५ )… 341–350
- साधनपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र १ ९ ऐसे ही प्रकृति और पुरुषका पुराणोंमें श्रूयमाण उत्पत्ति भी अन्योन्यके संयोगसे अभिव्यक्ति ही जाननी चाहिये… 351–360
- साधनपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र २१ सङ्गति — इस दृश्यका प्रयोजन पुरुषके लिये है, यह अगले सूत्रमें बतलाते हैं । तदर्थ एव दृश्यस्यात्मा । २१… 361–370
- साधनपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप: * * [ सूत्र २४ अन्वयार्थ — इस अदर्शनरूपी संयोगका कारण अविद्या है व्याख्या – अदर्शनरूपी संयोगका कारण अविद्या अर्थात् मिथ्या -… 371–380
- साधनपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र २ ९ और अभिनिवेश क्लेश राग - द्वेष तनु हो जाते हैं । २. नियम — नियमोंका सम्बन्ध केवल अपने व्यक्तिगत है, इसलिये इनके… 381–390
- साधनपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप* [ सूत्र २ ९ न रूव लावण्ण विलास हासं, नजंपियं इंगिय पेहियं इत्थीण चित्तंसि निवेसइत्ता, दडुं ववस्से समणे तवस्सी वा । । ५… 391–400
- साधनपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र ३१ हो जाते थे । इस प्रकार धर्म और देशरक्षाके परम कर्तव्यको अपने अन्त समयतक पर इस वीरताके साथ - साथ उनमें एक संकीर्णता… 401–410
- साधनपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र ३२ ३. इस विचारसे कि सब काम काल - अधीन हैं, समय आनेपर अपवर्ग स्वयं प्राप्त हो जायगा, यत्न न करना काल - तुष्टि है… 411–420
- सूत्र ३२ ] शौचसंतोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः * * [ साधनपाद शौचके पश्चात् इन्द्रियके मुखपर ठंडा पानी धारके साथ डालनेसे भी लाभ प्राप्त होता है… 421–430
- * शौचसंतोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि सूत्र ३२ ] नियमाः * [ साधनपाद निद्राको प्राप्त हो जाओगे उसको घड़ीमें समय देखते रहनेको कहो… 431–440
- सूत्र ३४ ] * वितर्का हिंसादयः कृतकारिता इति प्रतिपक्षभावनम्* [ साधनपाद शरण ली है । अब उन छोड़े हुए हिंसा आदि अधर्मोंका पुनः ग्रहण करना कुत्तेके सदृश अपनी… 441–450
- सूत्र ४६ ] स्थिरसुखमासनम् * * * [ साधनपाद पहुँचनेकी सम्भावना नहीं है, यद्यपि इसमें समय अधिक लगेगा… 451–460
- पातञ्जलयोगप्रदीप हस्तपादाङ्गुष्ठासन ( पहिला प्रकार ) पवनमुक्तासन अणनीयर उर्ध्व सर्वाङ्गासन हस्तपादाङ्गुष्ठासन उर्ध्व - सर्वाङ्गासन शर शिक लिहि F… 461–470
- पातञ्जलयोगप्रदीप I नमस्कार आसन हस्त - पादासन एकपादप्रसरणासन द्विपादप्रसरणासन अर्ध्य नमस्कार- आसन पातञ्जलयोगप्रदीप CC भूधरासन सर्पासन अष्टाङ्ग पर्णिपातासन… 471–480
- सूत्र ५० ] बाह्याभ्यन्तरस्तम्भवृत्तिर्देशकालसंख्याभिः परिदृष्टो दीर्घसूक्ष्मः * * [ साधनपाद रेचक तथा पूरक करते समय दोनों नथुनेपरसे अंगुलियाँ हटा ली जाती… 481–490
- साधनपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप* [ सूत्र ५२-५३ || आक्षेपीके अर्थ उलाँघने अर्थात् त्यागने करनेसे सूत्रका अर्थ इस प्रकार होगा-बाहर और अंदरके विषयके अर्थात्… 491–500
- साधनपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र ५५ ( ५ ) वातके रोगकी अत्यन्त पीड़ामें चरस ( सुल्फा ) आधी रत्ती खिलाकर गायका दूध गायके घीके साथ पिलावें… 501–510
- साधनपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप * * [ सूत्र ५५ यही उपाय । १ हल्दी, २ आँवला, ३ आकाशबेल, ४ छाछ ( मट्ठा ), ५ चिरचिरा, ६ चूल्हे आदिके ऊपरकी छतमें जमा हुआ धुँआ… 511–520
- विभूतिपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप* [ सूत्र ७ अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः । दम्भाहंकारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः… 521–530
- विभूतिपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप* [ सूत्र १३ धर्मपरिणाम, लक्षणपरिणाम और अवस्थापरिणामकी व्याख्या समझ लेनी चाहिये ) भाष्य… 531–540
- विभूतिपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र १४ शङ्का - तो क्या इस प्रकार धर्मोक एकका दूसरेसे अत्यन्त भेद है? भेद अभेद नहीं है? समाधान — ‘ न इत्याह ' नहीं— जब… 541–550
- विभूतिपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप* [ सूत्र १७ समाधान – ' वर्णाः पुनरित्यादि ' यहाँसे लेकर संकेत्यते इस पर्यन्त वाक्यसे समाधान -उसका अर्थ यह है, यद्यपि वर्ण… 551–560
- विभूतिपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप * * [ सूत्र २६ नीलकमलके पत्रके सदृश श्याम ( दिखलायी देता है । पूर्व भागमें स्थित आकाश श्वेत वर्ण ( दिखलायी देता ) है… 561–570
- विभूतिपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र ३ ९ हैं । योगी जब धारणा, ध्यान, समाधिके अभ्याससे सकाम कर्मोंको छोड़कर है तो इन बन्धोंके कारणोंको ढीला कर देता है… 571–580
- विभूतिपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप * * [ सूत्र ४५ सामान्यका और स्नेहादि धर्मोंसहित शब्दादि विशेषोंका ' अयुतसिद्धावयव प्रकार सामान्य - विशेषोंका ' अयुतसिद्धावयव… 581–590
- विभूतिपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप * * [ सूत्र ५५ शब्दार्थ – सत्त्वपुरुषयोः - चित्त और पुरुषकी; शुद्धिसाम्ये - शुद्धि समान होनेपर; कैवल्यम् = कैवल्य होता है;… 591–600
- कैवल्यपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप * * [ सूत्र १० अर्थ - आशिषके नित्य होनेसे उन वासनाओंका अनादित्व ‘ ऐसा न हो कि मैं न होऊँ ' किंतु ' बना रहूँ ' यह आशिष अर्थात्… 601–610
- कैवल्यपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप* [ सूत्र १६-१७ सत्त्व, रजस् और तमस्की क्रमशः अधिकता होनेसे सुख, दुःख और मोह उन त्रिगुणात्मक वस्तुओंमें उपेक्षा हो जाती है… 611–620
- कैवल्यपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र २३ शास्त्रोपदेशरूपी कारणकी अपेक्षासे मोक्षरूप फलको प्राप्त होता है… 621–630
- कैवल्यपाद ] * पातञ्जलयोग - प्रदीप* [ सूत्र ३४ पुरुषार्थके सम्पादनसे कृतार्थ हुए पुरुषार्थ - शून्य कार्य - कारण - स्वरूप गुण प्रतिप्रसवको प्राप्त होते हैं… 631–640
- पातञ्जलयोगप्रदीप ] वर्णानुक्रमसूत्रसूची * * [ परिशिष्ट २ वर्णानुक्रमसूत्रसूची तत्त्वसमाससांख्य - सूत्र सूत्र - संख्या पाद पृष्ठ ( 37 ) १ - अथ योगानुशासनम्… 641–650
- पातञ्जलयोगप्रदीप ] * शब्दानुक्रमणी * [ परिशिष्ट ३ पृष्ठ पृष्ठ ( ह ) २२- अपान २२८, २२ ९, ५३४, ५३५ १- हस्त .... ७८ २३- अवतार १८६, २७३ .... २- हान ( दुःखका… 651–660
- पातञ्जलयोगप्रदीप ] विषयसूची [ परिशिष्ट ४ विषय विषय पृष्ठ पृष्ठ आत्मामें बुद्धिको सम्मिलित करके उसके शबल गण्याचार्यप्रणीत षष्टितन्त्र, सांख्यसप्तति ७५… 661–670
- पातञ्जलयोगप्रदीप ] विषयसूची * * [ परिशिष्ट ४ विषय विषय पृष्ठ पृष्ठ १०६- ( ६ ) शीर्षपादासन, ( ७ ) हृदयस्तम्भासन, -प्राणायामके तीन भेद ११८ - सूत्र ५०-४४१ (… 671–680
- 391,392,393 424 गीताप्रेस गोरखपुर GITA PRESS, GORAKHPUR 5 गीताप्रेस, गोरखपुर – २७३००५ फोन: ( ०५५१ ) २३३४७२१; फैक्स: २३३६ ९९ ७ ISBN 81-293-0011-7 9788129… 681–682