श्रीगणेशाय नमः।
पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ
Patanjal Yog Pradip of Swami Omanand · Gita Press · 682 पृष्ठ · 69 खण्ड
In English
Patanjala Yog Pradip
This book is a commentary on the Yoga Sutras of Patanjali written by Swami Omanand Tirtha. It includes explanations of the Samadhi Pada, Sadhana Pada, Vibhuti Pada, and Kaivalya Pada, along with discussions on the six schools of philosophy. The edition contains Sanskrit verses and Hindi translations/commentaries.
This book answers
- What are the different stages of yoga in patanjali's yoga sutras?
- How do the six schools of indian philosophy relate to each other?
- What are the specific physical postures and breathing techniques used in yoga?
- How can one achieve samadhi according to yoga philosophy?
विषय सूची
- PUR । ॐ श्रीपरमात्मने नमः । 47 पातञ्जलयोगप्रदीप गीताप्रेस गोरखपुर GITA PRESS, GORAKHPUR गीताप्रेस, गोरखपुर 047 । ॐ श्रीपरमात्मने नमः… 1–10
- [ २ ] श्रीस्वामी दिव्यानन्दजी महाराज ( पूर्व बा ० देवकीनन्दन गुप्त वानप्रस्थी ) ( संयोजक पातञ्जलयोगप्रदीप- प्रकाशन- प्रबन्ध परिषद् ) सन् १ ९ ३ ९ के अप्रैल… 11–20
- पातञ्जलयोगप्रदीप षड्दर्शनसमन्वय भूमिका पहिला प्रकरण वेद वेद ईश्वरीय ज्ञान है, जिसका प्रादुर्भाव ऋषियोंपर सृष्टिके आरम्भमें समाधिद्वारा होता है… 21–30
- दूसरा प्रकरण ] षड्दर्शनसमन्वय * * [ उत्तरमीमांसा द्वैत - अद्वैत सिद्धान्तके भेद आत्मतत्त्वके सम्बन्धमें द्वैत - अद्वैत आदि मतावलम्बियोंने शब्दोंके अर्थ… 31–40
- दूसरा प्रकरण ] षड्दर्शनसमन्वय * [ उत्तरमीमांसा आचार्यका नाम ( ब्रह्म ॰ सू ० ३ । ४ । ४४ में ) और जैमिनिदर्शनमें ( ४ । ३ । १८, ६ । १ । २६ ) दो बार आया है… 41–50
- दूसरा प्रकरण ] : षड्दर्शनसमन्वय * * [ उत्तरमीमांसा प्राप्त किये हुए जीवकी अपेक्षासे अद्वैत कहा जा सकता है न कि सांसारिक जीवोंकी अपेक्षासे… 51–60
- दूसरा प्रकरण ] षड्दर्शनसमन्वय * * [ उत्तरमीमांसा पञ्चविंशतितत्त्वज्ञो यत्र तत्राश्रमे वसेत् । जटी मुण्डी शिखी वापि मुच्यते नात्र संशयः… 61–70
- तीसरा प्रकरण ] षड्दर्शनसमन्वय * * [ वैशेषिक दर्शन पृथिवी, जल, तेज, वायु और आकाश — ये पाँचों द्रव्य पञ्चभूत कहलाते हैं… 71–80
- तीसरा प्रकरण ] षड्दर्शनसमन्वय * * [ न्याय दर्शन उसकी चिन्ता संशयसे लेकर निर्णयतक जिस कारण की गयी है वही निर्णयके लिये काममें लाया जाय तो दोनों पक्षोंकी… 81–90
- चौथा प्रकरण षड्दर्शनसमन्वय* [ सांख्य और योगदर्शन लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ । ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्… 91–100
- चौथा प्रकरण ] षड्दर्शनसमन्वय * * [ तत्त्वसमास जडतत्त्व कार्य कहते हैं । जुड़तत्त्वके चौबीस विभागोंमेंसे जो आठ प्रकृतियाँ बतलायी हैं उनमेंसे प्रधान अर्थात्… 101–110
- चौथा प्रकरण ] षड्दर्शनसमन्वय * [ सृष्टि और प्रलय * चित्तमें ' जिसका विशेष स्थान आनुमानिक अङ्गुष्ठमात्र हृदय है, बतलाया गया है और सांख्य तथा **********… 111–120
- चौथा प्रकरण ] षड्दर्शनसमन्वय * * [ चौदह प्रकारकी प्राणि - सृष्टि बृहदारण्यक उपनिषद् ४ । ३ । २… 121–130
- चौथा प्रकरण ] * षड्दर्शनसमन्वय * [ सृष्टि - क्रम सृष्टि - क्रम प्रकृतेर्महांस्ततोऽहंकारस्तस्माद् गणश्च षोडशकः । तस्मादपि षोडशकात् पञ्चभ्यः पञ्चभूतानि… 131–140
- चौथा प्रकरण ] * षड्दर्शनसमन्वय,* [ ' ईश्वरासिद्धेः ' का समाधान अथवा-लीनवस्तुलब्धातिशयसम्बन्धाद्वादोषः । ( सा ० द ० १… 141–150
- चौथा प्रकरण ] पातञ्जलयोगप्रदीप* [ योगदर्शनके चार पाद योगके आदि आचार्य योगके आदि आचार्य हिरण्यगर्भ हैं… 151–160
- पूज्यपाद १०८ श्रीस्वामी सोमतीर्थजी महाराज-प्रणीत षड्दर्शन- सदुपयोग - समन्वय - सूत्र १ – अथ षड्दर्शनसदुपयोगसमन्वयसूत्रम्… 161–170
- समाधिपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र २ , अधर्म , अनैश्वर्य , प्रवृत्ति राग अज्ञान , धर्म , मोह क्रोध , लोभ | निमित्त काम की - गति नीच मनुष्यों स्थिति… 171–180
- समाधिपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप* [ सूत्र ७ विशेष वक्तव्य सूत्र ७ –— इस सूत्रकी व्याख्यामें विज्ञानभिक्षु अपने योगवार्तिकमें प्रत्यक्ष - प्रमाणके सम्बन्धमें… 181–190
- समाधिपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप * * [ सूत्र १३ जिस प्रकार पक्षीका आकाशमें उड़ना दोनों ही पक्षोंके अधीन है, न केवल एक पक्षके… 191–200
- समाधिपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप* [ सूत्र १७ ( १ ) किसी भी सुखासनपूर्वक स्थिर बैठकर अन्नमय कोशमें आत्माध्यास छोड़कर प्राणमय कोशमें घुसना… 201–210
- सूत्र १ ९ ] भवप्रत्ययो विदेहप्रकृतिलयानाम् * * [ समाधिपाद * हे भारत! जब - जब धर्मकी हानि और अधर्मकी वृद्धि होती है, तब - तब मैं अपनेको प्रकट ( अपने शुद्ध… 211–220
- सूत्र २१-२२ ] मृदुमध्याधिमात्रत्वात् ततोऽपि विशेषः * * [ समाधिपाद अपेक्षासे किसीको विलम्बतम ( अत्यन्त विलम्बसे ), किसीको शीघ्रतम समाधिका लाभ प्राप्त होता… 221–230
- सूत्र २७ ] * तस्य वाचकः प्रणवः * [ समाधिपाद भाव यह है कि जैसे पिता - पुत्रका परस्पर जन्य - जनक - भाव सम्बन्ध विद्यमान हुआ हो ' यह इसका पिता है और यह इसका… 231–240
- समाधिपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र २ ९ तमोगुण रजोगुणको इतना दबा लेता है कि सूक्ष्म शरीर स्वप्नमें भी कार्य करनेमें असमर्थ हो जाता है तब सुषुप्ति -… 241–250
- समाधिपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप* [ सूत्र ३४ लगाकर नाभिको उठाकर कोष्ठस्थित वायुको दोनों नासिका -पुटद्वारा वमनकी भाँति एकदम बाहर फेंक देना चाहिये… 251–260
- समाधिपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप * * [ सूत्र ३४ रखकर ओम्के मानसिक जापके साथ त्राटक करना चाहिये । जलतत्त्वका साधन – चाँदी या काँसेका अर्धवृत्ताकार यन्त्र इतना… 261–270
- समाधिपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप [ सूत्र ३४ एक निश्चित संख्यामें मूलाधारतक मध्यम भस्त्रिका । एक निश्चित संख्यामें मूलाधार चक्रपर अश्विनी मुद्रासदृश क्रिया… 271–280
- समाधिपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप* [ सूत्र ४२ शब्दार्थ — तन = उन समापत्तियोंमेंसे; शब्द - अर्थ - ज्ञान - विकल्पैः = शब्द, अर्थ और ज्ञानके ( भेदोंसे );… 281–290
- समाधिपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप* सूत्र ४ ९ -५० ] श्रुतानुमानप्रज्ञाभ्यामन्यविषया विशेषार्थत्वात् । ४ ९… 291–300
- साधनपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदी [ सूत्र १ वक्तव्यमें बतलाया गया है । दूसरे अर्थका सम्बन्ध आभ्यन्तर क्रियासे है… 301–310
- साधनपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप* [ सूत्र ५ क्लेश अविद्याके भेद हैं, क्योंकि सबमें अविद्या ही प्रकाशित होती है… 311–320
- साधनपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप* [ सूत्र १३ ( १ ) ईश्वरीय नियमोंसे तो सदैव ऐसे बुरे कर्मोंसे बचनेकी प्रेरणा होती रहती है, मांस आदिको देखकर मनुष्यको स्वाभाविक… 321–330
- साधनपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र १८ कर्मस्थत्वका अर्थ है कर्मतया अर्थात् सकर्मक होनेसे । कर्मत्वका अर्थ क्रिया व्यापक है; क्योंकि दुःखव्याप्तत्व… 331–340
- साधनपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप * * [ सूत्र १ ९ कारण हैं; और एक अहंकार जो एकादश इन्द्रियोंका कारण है ( १ । ४५ )… 341–350
- साधनपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र १ ९ ऐसे ही प्रकृति और पुरुषका पुराणोंमें श्रूयमाण उत्पत्ति भी अन्योन्यके संयोगसे अभिव्यक्ति ही जाननी चाहिये… 351–360
- साधनपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र २१ सङ्गति — इस दृश्यका प्रयोजन पुरुषके लिये है, यह अगले सूत्रमें बतलाते हैं । तदर्थ एव दृश्यस्यात्मा । २१… 361–370
- साधनपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप: * * [ सूत्र २४ अन्वयार्थ — इस अदर्शनरूपी संयोगका कारण अविद्या है व्याख्या – अदर्शनरूपी संयोगका कारण अविद्या अर्थात् मिथ्या -… 371–380
- साधनपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र २ ९ और अभिनिवेश क्लेश राग - द्वेष तनु हो जाते हैं । २. नियम — नियमोंका सम्बन्ध केवल अपने व्यक्तिगत है, इसलिये इनके… 381–390
- साधनपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप* [ सूत्र २ ९ न रूव लावण्ण विलास हासं, नजंपियं इंगिय पेहियं इत्थीण चित्तंसि निवेसइत्ता, दडुं ववस्से समणे तवस्सी वा । । ५… 391–400
- साधनपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र ३१ हो जाते थे । इस प्रकार धर्म और देशरक्षाके परम कर्तव्यको अपने अन्त समयतक पर इस वीरताके साथ - साथ उनमें एक संकीर्णता… 401–410
- साधनपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र ३२ ३. इस विचारसे कि सब काम काल - अधीन हैं, समय आनेपर अपवर्ग स्वयं प्राप्त हो जायगा, यत्न न करना काल - तुष्टि है… 411–420
- सूत्र ३२ ] शौचसंतोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः * * [ साधनपाद शौचके पश्चात् इन्द्रियके मुखपर ठंडा पानी धारके साथ डालनेसे भी लाभ प्राप्त होता है… 421–430
- * शौचसंतोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि सूत्र ३२ ] नियमाः * [ साधनपाद निद्राको प्राप्त हो जाओगे उसको घड़ीमें समय देखते रहनेको कहो… 431–440
- सूत्र ३४ ] * वितर्का हिंसादयः कृतकारिता इति प्रतिपक्षभावनम्* [ साधनपाद शरण ली है । अब उन छोड़े हुए हिंसा आदि अधर्मोंका पुनः ग्रहण करना कुत्तेके सदृश अपनी… 441–450
- सूत्र ४६ ] स्थिरसुखमासनम् * * * [ साधनपाद पहुँचनेकी सम्भावना नहीं है, यद्यपि इसमें समय अधिक लगेगा… 451–460
- पातञ्जलयोगप्रदीप हस्तपादाङ्गुष्ठासन ( पहिला प्रकार ) पवनमुक्तासन अणनीयर उर्ध्व सर्वाङ्गासन हस्तपादाङ्गुष्ठासन उर्ध्व - सर्वाङ्गासन शर शिक लिहि F… 461–470
- पातञ्जलयोगप्रदीप I नमस्कार आसन हस्त - पादासन एकपादप्रसरणासन द्विपादप्रसरणासन अर्ध्य नमस्कार- आसन पातञ्जलयोगप्रदीप CC भूधरासन सर्पासन अष्टाङ्ग पर्णिपातासन… 471–480
- सूत्र ५० ] बाह्याभ्यन्तरस्तम्भवृत्तिर्देशकालसंख्याभिः परिदृष्टो दीर्घसूक्ष्मः * * [ साधनपाद रेचक तथा पूरक करते समय दोनों नथुनेपरसे अंगुलियाँ हटा ली जाती… 481–490
- साधनपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप* [ सूत्र ५२-५३ || आक्षेपीके अर्थ उलाँघने अर्थात् त्यागने करनेसे सूत्रका अर्थ इस प्रकार होगा-बाहर और अंदरके विषयके अर्थात्… 491–500
- साधनपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र ५५ ( ५ ) वातके रोगकी अत्यन्त पीड़ामें चरस ( सुल्फा ) आधी रत्ती खिलाकर गायका दूध गायके घीके साथ पिलावें… 501–510
- साधनपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप * * [ सूत्र ५५ यही उपाय । १ हल्दी, २ आँवला, ३ आकाशबेल, ४ छाछ ( मट्ठा ), ५ चिरचिरा, ६ चूल्हे आदिके ऊपरकी छतमें जमा हुआ धुँआ… 511–520
- विभूतिपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप* [ सूत्र ७ अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः । दम्भाहंकारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः… 521–530
- विभूतिपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप* [ सूत्र १३ धर्मपरिणाम, लक्षणपरिणाम और अवस्थापरिणामकी व्याख्या समझ लेनी चाहिये ) भाष्य… 531–540
- विभूतिपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र १४ शङ्का - तो क्या इस प्रकार धर्मोक एकका दूसरेसे अत्यन्त भेद है? भेद अभेद नहीं है? समाधान — ‘ न इत्याह ' नहीं— जब… 541–550
- विभूतिपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप* [ सूत्र १७ समाधान – ' वर्णाः पुनरित्यादि ' यहाँसे लेकर संकेत्यते इस पर्यन्त वाक्यसे समाधान -उसका अर्थ यह है, यद्यपि वर्ण… 551–560
- विभूतिपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप * * [ सूत्र २६ नीलकमलके पत्रके सदृश श्याम ( दिखलायी देता है । पूर्व भागमें स्थित आकाश श्वेत वर्ण ( दिखलायी देता ) है… 561–570
- विभूतिपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र ३ ९ हैं । योगी जब धारणा, ध्यान, समाधिके अभ्याससे सकाम कर्मोंको छोड़कर है तो इन बन्धोंके कारणोंको ढीला कर देता है… 571–580
- विभूतिपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप * * [ सूत्र ४५ सामान्यका और स्नेहादि धर्मोंसहित शब्दादि विशेषोंका ' अयुतसिद्धावयव प्रकार सामान्य - विशेषोंका ' अयुतसिद्धावयव… 581–590
- विभूतिपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप * * [ सूत्र ५५ शब्दार्थ – सत्त्वपुरुषयोः - चित्त और पुरुषकी; शुद्धिसाम्ये - शुद्धि समान होनेपर; कैवल्यम् = कैवल्य होता है;… 591–600
- कैवल्यपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप * * [ सूत्र १० अर्थ - आशिषके नित्य होनेसे उन वासनाओंका अनादित्व ‘ ऐसा न हो कि मैं न होऊँ ' किंतु ' बना रहूँ ' यह आशिष अर्थात्… 601–610
- कैवल्यपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप* [ सूत्र १६-१७ सत्त्व, रजस् और तमस्की क्रमशः अधिकता होनेसे सुख, दुःख और मोह उन त्रिगुणात्मक वस्तुओंमें उपेक्षा हो जाती है… 611–620
- कैवल्यपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र २३ शास्त्रोपदेशरूपी कारणकी अपेक्षासे मोक्षरूप फलको प्राप्त होता है… 621–630
- कैवल्यपाद ] * पातञ्जलयोग - प्रदीप* [ सूत्र ३४ पुरुषार्थके सम्पादनसे कृतार्थ हुए पुरुषार्थ - शून्य कार्य - कारण - स्वरूप गुण प्रतिप्रसवको प्राप्त होते हैं… 631–640
- पातञ्जलयोगप्रदीप ] वर्णानुक्रमसूत्रसूची * * [ परिशिष्ट २ वर्णानुक्रमसूत्रसूची तत्त्वसमाससांख्य - सूत्र सूत्र - संख्या पाद पृष्ठ ( 37 ) १ - अथ योगानुशासनम्… 641–650
- पातञ्जलयोगप्रदीप ] * शब्दानुक्रमणी * [ परिशिष्ट ३ पृष्ठ पृष्ठ ( ह ) २२- अपान २२८, २२ ९, ५३४, ५३५ १- हस्त .... ७८ २३- अवतार १८६, २७३ .... २- हान ( दुःखका… 651–660
- पातञ्जलयोगप्रदीप ] विषयसूची [ परिशिष्ट ४ विषय विषय पृष्ठ पृष्ठ आत्मामें बुद्धिको सम्मिलित करके उसके शबल गण्याचार्यप्रणीत षष्टितन्त्र, सांख्यसप्तति ७५… 661–670
- पातञ्जलयोगप्रदीप ] विषयसूची * * [ परिशिष्ट ४ विषय विषय पृष्ठ पृष्ठ १०६- ( ६ ) शीर्षपादासन, ( ७ ) हृदयस्तम्भासन, -प्राणायामके तीन भेद ११८ - सूत्र ५०-४४१ (… 671–680
- 391,392,393 424 गीताप्रेस गोरखपुर GITA PRESS, GORAKHPUR 5 गीताप्रेस, गोरखपुर – २७३००५ फोन: ( ०५५१ ) २३३४७२१; फैक्स: २३३६ ९९ ७ ISBN 81-293-0011-7 9788129… 681–682