पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ — पृष्ठ 671–680
पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ · Gita Press · पृष्ठ 671–680
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पातञ्जलयोगप्रदीप ] विषयसूची * * [ परिशिष्ट ४ विषय विषय पृष्ठ पृष्ठ १०६- ( ६ ) शीर्षपादासन, ( ७ ) हृदयस्तम्भासन, -प्राणायामके तीन भेद ११८ - सूत्र ५०-४४१ ( ८ ) उत्तानपादासन और उसकी नौ प्रक्रियाएँ ४२ ९ ११ ९- विशेष वक्तव्य— ४४२ १०७- ( ९ ) हस्तपादाङ्गुष्ठासन, ( १० ) स्नायु-१२० - प्राणायाम प्रणवरूप है । ४४३ संचालनासन, ( ११ ) पवनमुखासन, ( १२ ) १२१ - कुम्भकके आठ भेद – प्राणायाममें बन्धोंका ऊर्ध्वसर्वाङ्गासन ४३० प्रयोग, प्राणायाममें अङ्गुलियोंका प्रयोग ४४४ १०८- ( १३ ) सर्वाङ्गासन ( हलासन ), ( १४ ) १२२- सगर्भ ( सबीज ) और निर्गर्भ - सहित कर्णपीडासन ( १५ ) चक्रासन ( १६ ) कुम्भक | सगर्भ प्राणायामकी विधि | सात-गर्भासन, ( १७ ) शवासन ( विश्रामासन ), सहित - कुम्भकोंका वर्णन ( १ ) साधारण-पेटके बल लेटकर करनेके आसन, ( १८ ) सहित अथवा अनुलोम - विलोम कुम्भक ४४५ मस्तकपादाङ्गुष्ठासन १२३ - उपर्युक्त प्राणायाममें मात्राओंके बढ़ानेकी ४३१ १० ९- ( १ ९ ) नाभ्यासन, ( २० ) मयूरासन, विधि । तालयुक्त प्राणायाम ४४५ ( २१ ) भुजङ्गासन ( सर्पासन ) और उसकी १२४- ( २ ) सूर्यभेदी कुम्भक, चन्द्रभेदी प्राणायाम तीन प्रक्रियाएँ, ( २२ ) शलभासन ४३२ ( ३ ) उज्जाई कुम्भक, दीर्घसूत्री उज्जाई, ११०- ( २३ ) धनुरासन, बैठकर करनेके आसन — ( ४ ) शीतली कुम्भक ४४७ ( २४ ) मत्स्येन्द्रासन पाँचों भागों - सहित, ( २५ ) १२५ - शीतकारी प्राणायाम, काफी प्राणायाम, वृश्चिकासन, ( २६ ) उष्ट्रासन, ( २७ ) सुप्त-भुजङ्गी प्राणायाम ( ५ ) भस्त्रिका कुम्भक-वज्रासन, ( २८ ) कन्दपीड़ासन.... ४३३ ( क ) मध्यम भस्त्रिका, ( ख ) वाम भस्त्रिका, १११- ( २ ९ ) पार्वती - आसन, ( ३० ) गोरक्षासन, ( ग ) दक्षिण भस्त्रिका, ( घ ) अनुलोम-( ३१ ) सिंहासन, ( ३२ ) वकासन, ( ३३ ) विलोम भस्त्रिका ४४८ १२६ - भस्त्रिकाके अन्तर्गत दो प्राणायाम ( ६ ) लोलासन, ( ३४ ) एकपादाङ्गुष्ठासन, पद्मासन लगाकर करनेके आसन, ( ३५ ) ऊर्ध्व-भ्रामरी कुम्भक ..... ४४ ९ १२७ - अनुलोम - विलोम भ्रामरी प्राणायाम, पादासन ४३४ .... ध्वन्यात्मक प्राणायाम, ( ७ ) मूर्च्छा कुम्भक ११२- ( ३६ ) उत्थितपद्मासन, ( ३७ ) कुक्कुटासन, ( षणमुखी सर्वद्वार बंद मुद्रा ), ( ८ ) प्लावनी ( ३८ ) गर्भासन, ( ३ ९ ) कूर्मासन, ( ४० ) कुम्भक, केवल कुम्भक.... ४५० मत्स्यासन, ( ४१ ) तोलाङ्गुलासन, ( ४२ ) १२८- केवल कुम्भककी विधि हठयोगद्वारा । त्रिबन्धासन, खड़े होकर करनेके आसन, केवल कुम्भककी विधि राजयोगद्वारा । विशेष ( ४३ ) ताड़ासन, ( ४४ ) गरुडासन ४३५ ११३- ( ४५ ) द्विपादमध्यशीर्षासन, ( ४६ ) ४५१ सूचना १२ ९ - सूत्र ५१ – चौथे प्राणायामका लक्षण पादहस्तासन, ( ४७ ) हस्तपादाङ्गुष्ठासन, ( ४८ ) कोणासन, विशेष आसनोंसे विशेष व्यासभाष्य ४५२ १३० - चौथे प्राणायामकी चार विधियाँ । विशेष लाभ उठानेकी विधि.... ४३६ ११४ - सूर्यभेदी व्यायाम और इसके विभिन्न प्रकार ४३७ ४५३ वक्तव्य-१३१ - पाँचवीं विधि सूत्र ५२ - प्राणायामका फल । ११५ - आसनका उठना । आसन उठानेकी विधि । गुफामें बैठना, गुफामें बैठनेकी दो विधियाँ ४३८ सूत्र ५३ - प्राणायामका दूसरा फल.... ५५४ १३२- सूत्र ५४ – प्रत्याहारका लक्षण | सूत्र ५५-११६- सूत्र ४७- -आसनकी सिद्धिका उपाय ४३ ९ ४५५ प्रत्याहारका फल ११७ - सूत्र ४८— आसनकी सिद्धिका फल । सूत्र .... ..... ४५६ १३३ - साधनपादका उपसंहार ४ ९ - प्राणायामका लक्षण ४४० ( ६३४ )
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परिशिष्ट ४ ] * विषयसूची * [ पातञ्जलयोगप्रदीप विषय विषय पृष्ठ पृष्ठ परिशिष्ट-१२- भैंसिया अर्थात् काले दाद, छाजन, चम्बल, नासूर, भगंदर, कमरके अंदरके फोड़े तथा १- ओषधिद्वारा शरीरशोधन ( आरोग्यता ) । कोष्ठबद्ध दूर करनेकी ओषधियाँ.... ४५७ गाँठवाले फोड़ोंकी अनुभूत ओषधियाँ... ४७० १३- भगंदर तथा गुदाके रोगों, अर्श बवासीर, २- वातविकारनाशक तथा रेचक कफ - नाशक, पाचक और रेचक, बिगड़े हुए जुकाम, खाँसी मस्सोंके झाड़नेकी दवाएँ.... ४७१ १४- तिल्ली, दर्द गुर्देकी दवाइयाँ • ४७२ सब प्रकारके मस्तिष्क या पेटके विकारोंको १५- बंद पेशाबके खोलने, रुक - रुककर पेशाब दूर करनेके लिये अनुभूत ओषधियाँ.... ४५८ आने, वायुगोला, पेटके कीड़े, दिमागके ३- साधारण जुकामके लिये काढ़ा, भजन कीड़े - सम्बन्धी दवाएँ, फीलपा, गजपा ४७३ ( प्राणायाम, ध्यान आदि क्रिया ) से उत्पन्न १६- गठिया, आँखोंसे सम्बन्ध रखनेवाले रोगोंकी होनेवाली खुश्की दूर करनेके लिये तीन दवाएँ.... ४७४ अनुभूत ओषधियाँ.... ४५ ९ १७- कानका दर्द, मुँहके छालेके लिये दवाएँ, ४- आँवके रोग मरोड़ व पेचिशके लिये पाँच अनुभूत ओषधियाँ, ज्वरके पश्चात् निर्बलता दिलकी धड़कन - सम्बन्धी अनुभूत दवाएँ, पागलपन या उन्मादकी दवा, नींदका न आना ४७६ दूर करनेके लिये चूर्ण, खाँसीकी ओषधियाँ ४५ ९ १८- बुद्धिवर्धक सरस्वतीचूर्ण, नहरुआ, पारा ५- श्वास, दमाके १४ अनुभूत नुसखे.... ४६० बाँधना.... ४७७ ६- अजीर्ण, दस्त और कै आदिके लिये अमृत-( ३ ) विभूतिपाद धारा तथा संजीवनीवटीके नुसखे तथा अन्य ओषधियाँ, संग्रहणीके दो नुसखे.... ४६१ १- सूत्र १. - धारणाका लक्षण । व्याख्या-७- हैजेका नुसखा, अम्लपित्तसे हाजमा ठीक न देश, बन्ध, ध्येय । सूत्र २– ध्यानका रहनेके लिये अविपत्तिकर चूर्ण । वातविकारके लक्षण । व्याख्या - प्रत्यय, एकतानता ४७८ .... लिये रेचक, वातारि गूगुल, अरण्डीपाक तथा २- सूत्र ३ – समाधिका लक्षण । व्याख्या-स्वरूपशून्यम् इव, अर्थमात्र - निर्भासम् ४७८ अन्य ओषधियाँ.... ४६३ ८- आधे सिरका दर्द, नथने बंद रहने, सिरके ३ - विशेष वक्तव्य - त्रिपुटी, धारणा, ध्यान और समाधिमें भेद भारी रहनेकी अनुभूत ओषधियाँ । प्रमेह, .... ४७८ पेशाबमें शक्कर आना, स्वप्नदोष आदि वीर्य-४- सूत्र ४ – संयमका लक्षण .... ४८० विकारके लिये चन्द्रप्रभावटी, सूर्यप्रभावटी, ५- सूत्र ५ – संयमका फल .... ४८० ब्राह्मी घृतकी दो विधियाँ तथा अन्य अनुभूत ६- प्रज्ञालोक । सूत्र ६ – संयमका विनियोग, ओषधियाँ.... विशेष वक्तव्य -- संयमका महत्त्व ४६४ ४८१ ९- सोते समय पेशाब निकल जाना, पेशाब ७- सूत्र ७– - योगके अन्तरङ्ग .... ४८४ साथ शक्कर आना, बहुमूत्र - इनकी ८- सूत्र ८ – योगके बहिरङ्ग । संगति - धर्म-ओषधियाँ । हर प्रकारके बुखारके लिये परिणाम, लक्षण - परिणाम, अवस्था - परिणाम ४८५ ओषधियाँ.... ४६६ ९- सूत्र ९ - चित्तका निरोध - परिणाम । १०- तपेदिकके लिये तीन अनुभूत ओषधियाँ । व्याख्या –निरोध, अभिभव, प्रादुर्भाव, पायोरिया, दाढ़का दर्द, दाँतोंके सब रोगोंके निरोधक्षणचित्तान्वय । निरोध - परिणाम ४८६ लिये ओषधियाँ,.... ४६८ १०- सूत्र १० – निरोधसंस्कारका फल । सूत्र ११- फोड़े, फुन्सी, रक्तविकार आदि - सम्बन्धी ११ - चित्तमें समाधि - परिणाम.... ४८८ ओषधियाँ । सफेद कोढ़, दादकी अनुभूत ११- समाधि - परिणाम और निरोध परिणाममें भेद । ओषधियाँ ४६ ९ सूत्र १२ – एकाग्रता - परिणाम ४८ ९ ( ६३५ )
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पातञ्जलयोगप्रदीप ] विषयसूची * * [ परिशिष्ट ४ विषय विषय पृष्ठ पृष्ठ १२- सूत्र १३ – भूत और इन्द्रियोंमें धर्म - लक्षण कण्ठकूपमें संयम करनेसे भूख - प्यासकी और अवस्था - परिणाम .... ४८ ९ निवृत्ति । सूत्र ३१ – कूर्म नाड़ीमें संयम करनेसे १३- टिप्पणी – व्यासभाष्यका भाषानुवाद ४ ९ १ स्थिरता.... १४- विज्ञानभिक्षुके वार्त्तिकका भाषानुवाद ५२ ९ ३२- सूत्र ३२ – मूर्द्धा - ज्योतिमें संयम करनेसे ४ ९ ३ १५- सूत्र १४ – धर्मीका लक्षण । शान्त, उदित, सिद्धोंके दर्शन । विशेष विचार । सूत्र ३३- — अव्यपदेश्य प्रातिभसे सब बातोंका ज्ञान । सूत्र ३४-५०१ १६- टिप्पणी – व्यासभाष्यका भाषानुवाद.... ५०२ हृदयमें संयमसे चित्तका ज्ञान.... ५३० १७- विज्ञानभिक्षुके गोवार्त्तिकका भाषानुवाद ५०३ ३३- सूत्र ३५ – स्वार्थसंयमका फल पुरुषविषयक १८- सूत्र १५ – एक धर्मीके अनेक परिणाम किस ज्ञान ५३१ .... प्रकार होते हैं? व्याख्या ३४- विशेष वक्तव्य— ५०७ ५३२ १ ९- चित्तके प्रत्यक्ष रूप और सात अप्रत्यक्ष ३५- भोजवृत्तिका भाषार्थ । सूत्र ३६ – पुरुष-रूप परिणाम.... ५०८ विषयक ज्ञानसे पूर्व होनेवाली छः सिद्धियाँ— २०- सूत्र १६ – तीनों परिणामोंके संयमका फल, प्रातिभ, श्रावण, वेदना, आदर्श, आस्वाद, -भूत और भविष्यत्का ज्ञान । सूत्र १७– वार्ता ५३२ शब्द, अर्थ और ज्ञानके विभागमें संयम ३६- सूत्र ३७ — ये सिद्धियाँ समाधिमें विघ्न, करनेका फल सब प्राणियोंकी बोलीका ज्ञान ५० ९ व्युत्थानमें सिद्धियाँ हैं । सूत्र ३८ – चित्तका २१- टिप्पणी – स्फोटवाद । भोजवृत्तिका दूसरेके शरीरमें आवेश ५३३ ३७- टिप्पणी – भोजवृत्तिका भाषार्थ । सूत्र ३ ९-भाषानुवाद । व्यासभाष्यका भाषानुवाद.... ५१० २२- विज्ञानभिक्षुके योगवार्त्तिकका भाषानुवाद उदानजयका फल जलादिमें असङ्ग रहना और ५१२ २३- विशेष वर्णन.... ऊर्ध्वगति ५३४ ५१७ २४- सूत्र १८ – संस्कारके साक्षात् करनेका फल ३८- विशेष वक्तव्य १ - अन्तःकरणकी दो • पूर्वजन्मका ज्ञान । टिप्पणी प्रकारकी वृत्तियाँ । विशेष वक्तव्य २– ..... ५१८ . २५- सूत्र १ ९ -२० - दूसरेके चित्तका ज्ञान मृत्युके समय लिङ्ग शरीरकी चार अवस्थाएँ ५३५ ५१ ९ .... ३ ९- पितृयाण एवं देवयान दक्षिणायन २६- सूत्र २१ – सामने होते हुए दिखलायी न .... ५३६ देना । सूत्र २२ – मृत्युका ज्ञान । सोपक्रम-४०- देवयान, उत्तरायण .... ५३८ ४१ - मुक्तिके दो भेद । क्रममुक्ति निरुपक्रम अरिष्ट ५२० .... ५३ ९ ४२- सद्योमुक्ति सूत्र ४० - समानके जीतनेसे २७- सूत्र २३ - मैत्री आदिमें संयमका फल ५२१ .... दीप्तिमान् होना । सूत्र ४१–२ - श्रोत्र- आकाशके २८- सूत्र २४ – हाथी आदिके बलकी प्राप्ति । सम्बन्धमें संयम करनेसे दिव्य श्रोत्र होना । सूत्र २५ – सूक्ष्म दृष्टिकी प्राप्ति | सूत्र २६— सूत्र ४२ – शरीर और आकाशके सम्बन्धमें • सूर्यमें संयम करनेसे भुवनोंका ज्ञान । -संयम करनेसे आकाशगमन सिद्धि.... ५४० टिप्पणी ५२२ ४३- सूत्र ४३ – बहिरकल्पिता वृत्तिसे प्रकाशके २ ९- व्यासभाष्यका भाषानुवाद । भुवनोंका वर्णन । ५२३ आवरणका नाश । सूत्र ४४ – पाँचों ग्राह्य ३०- सूत्र २७ - चन्द्रमामें संयम करनेसे तारा-भूतोंके स्थूल स्वरूप, सूक्ष्म, अन्वय और ५२८ • व्यूहका ज्ञान अर्थवत्त्वमें संयमका फल, भूतजय ५४१ - ध्रुवमें संयम करनेसे तारोंकी ३१- सूत्र २८ -४४- टिप्पणी — व्यासभाष्यकी व्याख्या ५४२ गतिका ज्ञान । सूत्र २ ९ – नाभिचक्रमें संयम ४५- सूत्र ४५ - भूतजयका फल आठ प्रकारकी करनेसे शरीरके व्यूहका ज्ञान । सूत्र ३०– ( ६३६ )
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परिशिष्ट ४ ] विषयसूच* * [ पातञ्जलयोगप्रदीप *********************************** विषय विषय पृष्ठ पृष्ठ सिद्धियाँ, कायसम्पत् और भूतोंके धर्मोकी वृत्तिका भाषानुवाद ५५५ रुकावटका दूर होना । व्याख्या – अणिमा, २- सूत्र २ – जात्यन्तर परिणामका वर्णन प्रकृत्यापूर लघिमा, महिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य ५४४ टिप्पणी- भोजवृत्तिका भाषार्थ । ५५६ ४६- वशित्व, ईशित्व, यत्रकामावसायित्व सूत्र ३- सूत्र ३ – प्रकृतियोंके बदलनेमें धर्म-अधर्मका काम भोजवृत्तिका भाषानुवाद । ४६ — कायसम्पत्का लक्षणरूप, लावण्य, ५५७ वज्रकी - सी बनावट । ४- विशेष वक्तव्य । सूत्र ४– बल, ५४५ ५५८ .... .... ५- निर्माण चित्तोंका वर्णन । विशेष विचार- ५५८ ४७- सूत्र ४७ – ग्रहण - इन्द्रियोंके ग्रहण, स्वरूप, ६- सूत्र ५ – निर्माण चित्तोंका प्रेरक अधिष्ठाता अस्मिता, अन्वय, अर्थवत्त्वमें संयमका फल चित्त विशेष विचार – सूत्र ६ - अपवर्गके इन्द्रियजय । टिप्पणी - व्यासभाष्यका उपयोगी चित्तका वर्णन । ५६० ५४६ भाषानुवाद .... ७- सूत्र ७ – कर्मोंके चार भेदोंमेंसे योगीके ४८- सूत्र ४८ – इन्द्रियजयका फल मनोजवित्व, विकरणभाव और प्रधानजय । सूत्र ४ ९-अशुक्ल अकृष्ण कर्म ५६१ -कर्मोंके फलोंके अनुकूल ग्रहीतृमें संयम अर्थात् विवेकख्यातिका फल ८- सूत्र ८-वासनाओंका उत्पन्न होना । सूत्र ९ – दूसरा सर्वभाव अधिष्ठातृत्व और सर्वज्ञातृत्व । जन्म देनेवाली वासनाओंके उदय होनेमें जाति, टिप्पणी — व्यासभाष्यका भाषानुवाद, योग-वार्तिकका भाषानुवाद.... ५४७ देश और कालकी रुकावट नहीं होती है । ५६२ ९- सूत्र १० - वासनाओंके अनादि होनेका ४ ९- सूत्र ५० – विवेक - ख्यातिसे भी वैराग्यका वर्णन विशेष वक्तव्य । फल । कैवल्य ५४ ९ .... ५६२ ५० - टिप्पणी - व्यासभाष्यका भाषानुवाद सूत्र १०- व्यासभाष्यका भाषार्थ तथा स्पष्टीकरण तथा चित्तके परिणामके सम्बन्धमें ५१ – स्थानधारियोंके आदरभावपर योगी -लगाव और घमंड न करे । योगियोंकी चार दार्शनिक विचार ५६४ भूमियाँ - प्रथम काल्पिक । मधुभूमिका, ११- सूत्र ११ -अनादि वासनाओंके दूर - होनेमें प्रज्ञाज्योति, अतिक्रान्त भावनीय.... युक्ति ५६७ ५५० ५१ - सूत्र ५२ – क्षण और उसके क्रमोंमें संयम १२- व्यासभाष्यका भाषानुवाद, भोजवृत्तिका करनेका फल विवेकज ज्ञान भाषानुवाद । सूत्र १२ – अतीत और अनागत ५५१ .... -५२ - टिप्पणी – भोजवृत्तिका भाषानुवाद स्वरूपसे रहते हैं; क्योंकि धर्मोंका कालसे भेद होता है ।.... ५६८ सूत्र ५३-५५२ ५३- विवेकज ज्ञानके मुख्य फलसे पूर्व अवान्तर १३- विशेष वक्तव्य -- पाँच प्रकारका अभाव ५६ ९ फल-- -जाति, लक्षण, देशसे भेदका निश्चय १४- भोजवृत्तिका भाषानुवाद । सूत्र १३ – सारे न होनेसे दो तुल्य वस्तुओंका विवेकज प्रकट और सूक्ष्म ( धर्म ) कार्य गुण-ज्ञानसे निश्चय होना । सूत्र ५४ - विवेकज स्वरूप हैं ५७० ज्ञानका स्वरूप | सूत्र ५५- ५५३ १५- सूत्र १४ – परिणामके एक होनेसे वस्तुकी ५४ - चित्त और पुरुषकी समान शुद्धि होनेपर एकता । विशेष वक्तव्य— ५७१ कैवल्य । उपसंहार ५५४ १६- सूत्र १५ – चित्त और विषयका भेद, भोज-( ४ ) कैवल्यपाद वृत्तिका भाषानुवाद । ५७२ .... १- सूत्र १ - पाँच प्रकारकी सिद्धियाँ । जन्मजा १७- विज्ञान - वादियोंकी शङ्काका समाधान विशेष सिद्धि, ओषधिजा सिद्धि, मन्त्रजा सिद्धि, वक्तव्य--५७३ तपोजा सिद्धि, समाधिजा सिद्धि । भोज-१८- सूत्र १६ – ग्राह्य वस्तु एकचित्तके अधीन ( ६३७ )
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पातञ्जलयोगप्रदीप ] विषयसूची * [ परिशिष्ट ४ विषय विषय पृष्ठ पृष्ठ नहीं । व्यासभाष्यका भाषानुवाद बीच - बीचमें पिछले संस्कारोंके कारण ५७४ १ ९- सूत्र १७ —– उपरागकी अपेक्षासे चित्तको बाह्य व्युत्थानकी वृत्तियोंका उदय होना ५८७ .... वस्तु ज्ञात और अज्ञात होती है ३३- सूत्र २८ – व्युत्थानके संस्कारोंकी निवृत्तिका ५७४ २०- भोजवृत्तिका भाषानुवाद सूत्र १८ – पुरुषको - धर्ममेघ समाधि । ५८८ उपाय । सूत्र २ ९– चित्तकी वृत्तियाँ सदा ज्ञात रहती हैं ५७५ ३४- सूत्र ३०- - धर्ममेघ समाधिका फल क्लेश २१- भोजवृत्तिका भाषानुवाद | सूत्र १ ९ - - चित्त और कर्मकी निवृत्ति । सूत्र ३१ – क्लेश और स्वप्रकाश नहीं । कर्मकी निवृत्तिपर चित्तके प्रकाशकी अनन्तता ५८ ९ ५७६ २२- भोजवृत्तिका भाषानुवाद ३५- सूत्र ३२– - कृतार्थ गुणोंके परिणामके क्रमकी ५७७ २३- सूत्र २० – चित्तको एक समयमें दोनों चित्त समाप्ति । ५ ९ ० और विषयका ज्ञान नहीं हो सकता, भोज-३६- सूत्र ३३ – क्रमका स्वरूप टिप्पणी । भोज-वृत्तिका भाषानुवाद वृत्तिका भाषानुवाद | विशेष वक्तव्य ५ ९ २ ५७७ २४- सूत्र २१ - एक चित्त दूसरे चित्तका प्रकाश्य ३७- सूत्र ३४ – कैवल्यका स्वरूप– - पुरुषार्थसे नहीं । भोजवृत्तिका भाषानुवाद । शून्य हुए गुणोंका अपने कारणमें लीन होना ५७८ २५- सूत्र २२ – स्वप्रतिबिम्बित चित्तके आकारकी अथवा चिति शक्तिका अपने स्वरूपमें प्राप्ति होनेसे पुरुषको अपने विषयभूत चित्तका अवस्थित होना । ५ ९ ३ ज्ञान रहता है ३८- भोजवृत्तिका भाषानुवाद । ५७ ९ ५ ९ ४ .... २६- भोजवृत्तिका भाषानुवाद ३ ९- आत्मा क्षणिक विज्ञान नहीं है । ५८० ५ ९ ४ २७- सूत्र २३ – चित्तका सारे अर्थोंवाला होनेके ४०- आत्मा संसार - दशा और मुक्ति - अवस्थामें कारण चिति और बाह्य विषयोंके न माननेमें एकरूप है । आत्मा विज्ञानसे विलक्षण स्वयं भ्रान्ति । टिप्पणी प्रकाश ज्ञानस्वरूप है ५८१ ५ ९ ५ २८- भोजवृत्तिका भाषानुवाद ४१- आत्मत्वादि जातियोंसे भिन्न आत्मा अधिष्ठान ५८२ २ ९- विशेष वक्तव्य— चेतनरूप है । आत्मा अहंप्रतीतिका विषय ५८४ ३०- सूत्र २४ – चित्तका संहत्यकारी होनेसे परार्थ नहीं; किन्तु केवल चिद्रूप है.... ५ ९ ६ सिद्ध होना । भोजवृत्तिका भाषानुवाद ५८५ ४२- आत्मा अव्यापक, शरीरपरिमाणवाला और परिणामी नहीं है । आत्मामें साक्षात्कर्तृत्व ३१- सूत्र २५ – विवेक - ख्यातिद्वारा चित्त और पुरुष-धर्म नहीं है । आत्मा विमर्शरूपसे चैतन्य में भेद - दर्शनसे आत्मभाव भावनाकी निवृत्ति • ५८६ नहीं है । ५ ९ ७ ३२- सूत्र २६ – भेद - दर्शनके उदय होनेपर चित्तकी निर्मलता सूत्र २७– विवेक ज्ञानके ४३- उपसंहार ५ ९ ८ ( ६३८ )
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४ ] -परिशिष्ट ५ पुस्तकके छप जानेके बाद बढ़ाये हुए विषय पृष्ठ - संख्या २७ ऊपरसे चौथी पंक्तिके पश्चात् — विवर्त्तवादद्वारा रज्जुरूप आत्मसत्तासे सर्परूप त्रिगुणात्मक मायाको हटाकर शुद्ध परमात्मस्वरूपमें अवस्थिति करायी जाती है । परिणामवादद्वारा सर्परूप त्रिगुणात्मक प्रकृतिसे रज्जुरूप आत्मसत्ताको पृथक् करके शुद्ध परमात्मस्वरूपमें अवस्थिति करायी जाती है । किन्तु शंकरने तो अपने “ निर्वाण षट्क ” में क्रियात्मक रूपसे परिणामवादको ही सिद्ध किया है " मनोबुद्धिरहङ्कारचित्तानि नाहम् " यहाँ रज्जुरूप आत्मसत्ताको सर्परूप त्रिगुणात्मक मन, बुद्धि, अहंकार और चित्तसे पृथक् करके शुद्ध परमात्मस्वरूपमें अवस्थिति करायी गयी है । वास्तवमें शुद्ध परमात्मस्वरूपमें अवस्थितिरूप लक्ष्यकी प्राप्तिमें इन दोनों वादोंमें कोई भेद नहीं है । सत् अर्थात् भाव पदार्थ और असत् अर्थात् अभाव पदार्थके लक्षण करनेमें ही अन्तर है । सांख्य और योग सत् अर्थात् भाव पदार्थमें कूटस्थ नित्यके साथ परिणामी नित्यको भी सम्मिलित करते हैं । शंकर सत् अर्थात् भाव पदार्थमें केवल कूटस्थ नित्यको ही मानते हैं । परिणामी नित्य पदार्थको इससे पृथक् करके असत् अर्थात् अभाव पदार्थमें रखते हैं । यद्यपि वे त्रिगुणात्मक परिणामिनी मायाको सत् - असत् दोनोंसे विलक्षण मानकर अनिर्वचनीय कहते हैं I । कैवल्य प्राप्त किये हुओंकी अपेक्षासे मायाका अभाव हो जाता है अर्थात् माया अनादि सान्त है, इसलिये शंकर उसको असत्की श्रेणीमें रखते हैं । सांख्य और योग " कृतार्थं प्रति नष्टमप्यनष्टं तदन्यसाधारणत्वात् " ( योग ० २ । २२ ) के अनुसार, प्रकृति यद्यपि कैवल्य प्राप्त किये पुरुषोंके प्रति नष्ट हो जाती है किन्तु अपने स्वरूपसे नष्ट नहीं होती, क्योंकि वह दूसरे पुरुषोंके भोग और अपवर्गके सम्पादनमें लगी रहती है, अर्थात् यद्यपि प्रकृति कृतार्थ पुरुषोंके लिये सान्त है किन्तु अपने स्वरूपसे तो अनादि और अनन्त ही है । विवर्त्तवादके अनुसार यदि मायाको ब्रह्मकी अनिर्वचनीय शक्ति ही माना जाय तब भी वह “ पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते " श्रुतिके अनुसार अपने स्वरूपसे अनादि, अनन्त ही सिद्ध होती है इसलिये उसको सत् अर्थात् भाव पदार्थकी श्रेणीमें रखते हैं । यदि विवर्त्तवादवाले सत् अर्थात् भाव पदार्थकी श्रेणीमें परिणामी नित्य पदार्थको भी सम्मिलित कर लें तो उनको परिणामवादके माननेमें कोई आपत्ति नहीं हो सकती । इसी प्रकार यदि परिणामवादवाले सत् अर्थात् भाव पदार्थकी श्रेणीमेंसे परिणामी नित्य पदार्थको अलग कर दें तो उनको भी विवर्त्तवादके माननेमें कोई आपत्ति नहीं हो सकेगी । यह भेद हमने केवल इसलिये दर्शाया है कि दोनों वादवाले एक - दूसरेके अभिप्रायको ठीक - ठीक रूपसे समझ सकें । ( ६३ ९ )
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' गीताप्रेस ' गोरखपुरकी निजी दूकानें तथा स्टेशन - स्टाल | गोरखपुर - २७३००५ गीताप्रेस - पो ० गीताप्रेस © ( ०५५१ ) २३३४७२१; फैक्स २३३६ ९९ ७ website: www.gitapress.org/e-mail: booksales@gitapress.org २६० ९, नयी सड़क दिल्ली- ११०००६ © ( ०११ ) २३२६ ९ ६७८; फैक्स २३२५ ९ १४० | कोलकाता - ७००००७गोबिन्दभवन - कार्यालय; १५१, महात्मा गाँधी रोड © ( ०३३ ) २२६८६८ ९ ४; फैक्स २२६८०२५१ e - mail: gobindbhawan@gitapress.org | मुम्बई - ४००००२ २८२, सामलदास गाँधी मार्ग ( प्रिन्सेस स्ट्रीट ) मरीन लाईन्स स्टेशनके पास © ( ०२२ ) २२०३०७१७ २४/५५, बिरहाना रोड © ( ०५१२ ) २३५२३५१; फैक्स २३५२३५१ | कानपुर - २०८००१ अशोकराजपथ, महिला अस्पतालके सामने © ( ०६१२ ) २३००३२५ पटना- ८००००४ कोर्ट सराय रोड, अपर बाजार, बिड़ला गद्दीके प्रथम तलपर राँची - ८३४००१ © ( ०६५१ ) २२१०६८५ वैभव एपार्टमेन्ट, नूतन निवासके सामने, भटार रोड ∫ २२३७३६२, सूरत- ३ ९ ५००१ ) © ( ०२६१ ) e - mail: suratdukan @ gitapress.org; २२३८०६५ | इन्दौर - ४५२००१ जी ०५, श्रीवर्धन, ४ आर. एन. टी. मार्ग ( ०७३१ ) २५२६५१६, २५११ ९ ७७ | जलगाँव - ४२५००१ ७, भीमसिंह मार्केट, रेलवे स्टेशनके पास © ( ०२५७ ) २२२६३ ९ ३ | हैदराबाद - ५००० ९ ६४१, ४-४-१, दिलशाद प्लाजा, सुल्तान बाजार © ( ०४० ) २४७५८३११ श्रीजी कृपा कॉम्प्लेक्स, ८५१, न्यू इतवारी रोड © ( ०७१२ ) २७३४३५४ | नागपुर - ४४०००२ भरतिया टावर्स, बादाम बाड़ी © ( ०६७१ ) २३३५४८१ | कटक- ७५३०० ९ मित्तल कॉम्प्लेक्स, गंजपारा, तेलघानी चौक ( छत्तीसगढ़ ) ( ०७७१ ) ४०३४४३० | रायपुर - ४ ९ २०० ९ वाराणसी - २२१००१५ ९ / ९, नीचीबाग © ( ०५४२ ) २४१३५५१ e - mail: varanasidukan@gitapress.org सब्जीमण्डी, मोतीबाजार हरिद्वार - २४ ९ ४०१ © ( ०१३३४ ) २२२६५७ | ऋषिकेश - २४ ९ ३०४ गीताभवन, पो ० स्वर्गाश्रम २४३०१२२, © ( ०१३५ ) २४३२७ ९ २ e - mail: gitabhawan@gitapress.org स्टेशन - स्टाल दिल्ली ( प्लेटफार्म नं ० १२ ); नयी दिल्ली ( नं ० ८ - ९ ); हजरत निजामुद्दीन [ दिल्ली ] ( नं ० ४-५ ); कोटा [ राजस्थान ] ( नं ० १ ); बीकानेर ( नं ० १ ); गोरखपुर ( नं ० १ ); कानपुर ( नं ० १ ); लखनऊ [ एन ० ई ० रेलवे ]; वाराणसी ( नं ० ४-५ ); मुगलसराय ( नं ० ३-४ ); हरिद्वार ( नं ० १ ); पटना ( मुख्य प्रवेशद्वार ); राँची ( नं ० १ ); धनबाद ( नं ० २-३ ); मुजफ्फरपुर ( नं ० ५ १ ) );; | समस्तीपुर ( नं ० २ ); हावड़ा ( नं ० ५ तथा १८ दोनोंपर ); सियालदा मेन ( नं ० ८ ); आसनसोल ( नं ० | कटक ( नं ० १ ); भुवनेश्वर ( नं ० १ ); राऊरकेला ( पुस्तक -ट्राली ); राजगांगपुर ( पुस्तक - ट्राली ); औरंगाबाद [ महाराष्ट्र ] ( नं ० १ ); सिकन्दराबाद [ आं ० प्र ० ] ( नं ० १ ); गुवाहाटी ( नं ० १ ); खड़गपुर ( नं ० १-२ ); रायपुर [ छत्तीसगढ़ ] ( नं ० १ ) एवं अन्तर्राज्यीय बस अड्डा, दिल्ली । फुटकर पुस्तक - दूकानें © ( ०१५६२ ) २५२६७४ ऋषिकुल ब्रह्मचर्याश्रम, पुरानी सड़क चूरू- ३३१००१ ऋषिकेश - २४ ९ १ ९ २ मुनिकीरेती तिरुपति - ५१७५०४ शॉप नं ० ५६, टी ० टी ० डी ० मिनी शॉपिंग कॉम्प्लेक्स, तिरुमलाई हिल्स
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