प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 1–10

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 1–10

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ॥ कोबातीर्थमंडन श्री महावीरस्वामिने नमः ॥ ॥ अनंतलब्धिनिधान श्री गौतमस्वामिने नमः ॥ ॥ गणधर भगवंत श्री सुधर्मास्वामिने नमः ॥ ॥ योगनिष्ठ आचार्य श्रीमद् बुद्धिसागरसूरीश्वरेभ्यो नमः ॥ ॥ चारित्रचूडामणि आचार्य श्रीमद् कैलाससागरसूरीश्वरेभ्यो नमः ॥ आचार्य श्री कैलाससागरसूरि ज्ञानमंदिर पुनितप्रेरणा व आशीर्वाद राष्ट्रसंत श्रुतोद्धारक आचार्यदेव श्रीमत् पद्मसागरसूरीश्वरजी म. सा. जैन मुद्रित ग्रंथ स्केनिंग प्रकल्प ग्रंथांक: १ महावीर जैन अमृतं आराधना तु विद्या केन्द्र कोबा श्री महावीर जैन आराधना केन्द्र आचार्यश्री कैलाससागरसूरि ज्ञानमंदिर कोबा, गांधीनगर - श्री महावीर जैन आराधना केन्द्र आचार्यश्री कैलाससागरसूरि ज्ञानमंदिर कोबा, गांधीनगर -३८२००७ ( गुजरात ) ( 079 ) 23276252, 23276204 फेक्स: 23276249 Websiet: www.kobatirth.org Email: Kendra@kobatirth.org शहर शाखा आचार्यश्री कैलाससागरसूरि ज्ञानमंदिर शहर शाखा आचार्यश्री कैलाससागरसूरि ज्ञानमंदिर त्रण बंगला, टोलकनगर परिवार डाइनिंग हॉल की गली में पालडी, अहमदाबाद - ३८०००७ ( 079 ) 26582355 For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir गङ्गानाथझा ग्रन्थमाला [ १ ] प्रशस्तपादभाष्यम् श्रीधर भट्टप्रणीतया न्यायकन्दलीव्याख्यया संवलितम् . संस्कृत-सम्पूर्णानन्द-श्रुतम् विश्वविद्यालयः गोपाय सम्पूर्णानन्द - संस्कृत - विश्वविद्यालयः For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org. Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir गङ्गानाथझा - यन्यमाला [ 1 ] प्रशस्तपादभाष्यम् श्रीधर भट्टणी तया निम् सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालयः For Private And Personal

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idhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir GANGANATHAJHA - GRANTHAMILI ( Vol. 1 ) Chief Editor .BHIGIRATHA PRASIDA TRIPIIHI ‘ VAGIŠA IISTRI, Director, Research Institute, Sampurnanand Sanskrit Vishvavidyalaya, Varanasi सुतम. में जावाय PRASASTAPIDABHIIYA ( PADIRTHADHARMASAIGRAHA ) With Commentary NYAYAKANDALI by SRIDHARA BHATTA Along with HINDI TRANSLATION Edited by Pt. DURGIDHARA JHÁ VARANASI 1977 For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Published byDirecten, Research Institute, Sampurnanand Sanskrit Vishvavidyalaya, Varanasi. Available at Publication Section Sampurnanand Sanskrit Vishvavidyalaya, Varanasi - 221002. Printed 1100 Copies Price: 68-00 p For Private And Personal Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir Printed byG. S. Upadhyay: Manager Varanas Sampurnanand Sanskrit Vishvavidyalaya Press

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Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir गङ्गानाथ झा · ग्रन्थमाला ( १ ) मुख्य सम्पादकः डॉ ० भागीरथप्रसादत्रिपाठी ' वागीशः शास्त्री ' अनुसन्धानसंस्थाननिदेशकः सम्पूर्णानन्द संस्कृतविश्वविद्यालये संस्कृत - वि सुतम् मगोपाय प्रशस्तपादाचार्यप्रणीतं प्रशस्तपादभाष्यम् ( पदार्थघर्मसङ्ग्रहाख्यम् ) श्रीधर भट्टप्रणीतया न्यायकन्दलीव्याख्यया संवलितम् सम्पादको हिन्दीभाषानुवादकश्च प ० दुर्गाघरक्षा शर्मा वाराणस्याम् ०३४ तमे वैक्रमादे १८ ९९ तमे शकाब्दे १ ९ ७७ तमे खैस्तार For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकाशकः, निदेशकः, अनुसन्धान संस्थानस्य, सम्पूर्णानन्दसंस्कृतविश्वविद्यालये, वाराणसी । प्राप्तिस्थानम् -प्रकाशन विभागः सम्पूर्णानन्दसंस्कृतविश्वविद्यालयः, वाराणसी - २२१००२ ( उ ० प्र ० ) द्वितीयं संस्करणम्: ११०० प्रतिरूपाणि मूल्यम्: ६८०० रूप्यकाणि मुद्रक: --घनश्याम उपाध्यायः सम्पूर्णानन्दसंस्कृतविश्वविद्यालयीय-मुद्रणालय व्यवस्थापकः For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्राक्कथन भारतीय परम्परा के अनुसार वेद सम्पूर्ण ज्ञान के निधान माने जाते हैं । वेद तथा उनके अन्तिम भाग उपनिषद् आस्तिक दर्शनों के स्रोत हैं । मूलतः तीन दर्शन परिगणनीय होते हैं -१, सांख्य, २. वैशेषिक तथा ३. पूर्वमीमांसा यद्यपि उक्त तीनों दर्शन वेद का प्रामाण्य स्वीकृत करने के कारण आस्तिक हैं, तथापि ये ईश्वर को नहीं मानते । पद्मपुराण में इन्हें वेदवाह्य कहा गया है । इनके सेश्वरत्व के लिए पुरक रूप में अन्य तीन दर्शनों का अवतार हुआ । वे हैं क्रमशः -१. योगदर्शन, २. न्यायदर्शन तथा ३. उत्तर-मीमांसा ( वेदान्तदर्शन ) । उक्त दर्शनों के जो तत्त्ववीज वेदों में संनिहित हैं, उन्हीं को सूत्ररूप में प्रस्तुत करने का कार्य किया है— कपिल, पतञ्जलि, कणाद, गोतम, जैमिनि तथा व्यास ने । कणाद के वैशेषिक सूत्र ( चतुर्थ तथा सप्तम अध्याय ) में भौतिक जगत् का आधार परमाणुओं में संनिहित बताया गया है । पदार्थों के स्वरूप निर्णय के लिए भारतीय विद्या वेत्ताओं को वैशेषिक दर्शन का ज्ञान उसी प्रकार अनिवार्य है, जिस प्रकार पदसाधुत्व के निर्णय के लिए पाणिनीय व्याकरण का अनुशीलन । जिस प्रकार योगसूत्र के प्रथम सूत्र ' अथ योगानुशासनम् ' में योग शब्द के उल्लेख के कारण योगसूत्र तथा ब्रह्मसूत्र के प्रथम सूत्र ' अथातो ब्रह्मजिज्ञासा ' में ब्रह्म शब्द के उल्लेख के कारण ग्रन्थ का नामकरण ब्रह्मसूत्र हुआ, उसी प्रकार वैोकदर्शन के प्रथम सूत्र ' अवातो धर्म व्याख्यास्यामः ' के अनुसार यद्यपि इसका नामकरण धर्मसूत्र होना चाहिए था, तथापि चतुर्थ सूत्र में वर्णित पदार्थों के मध्य ' विशेष ' पदार्थ के कारण यह दर्शन प्रसिद्ध हुआ है । सांख्य दर्शन की अपेक्षा विशिष्ट होने के कारण इसका नाम वैशेषिक दर्शन पड़ा — ऐसी भी कुछ विद्वानों की मान्यता है । -यद्यपि महाभारत के शान्तिपर्व ( अ ० ३२०, २२ ) में वैशेषिक शब्द का स्पष्ट उल्लेख हुआ है—

यस्माच्चैतन्मया प्राप्तं ज्ञानं वैशेषिकं पुरा ।

यस्य नान्यः प्रवक्ताऽस्ति मोक्षं तदपि मे शृणु ॥

तथापि व्याख्याकारों में पर्याप्त मतभेद है । परमानन्द महाभारत की अपनी व्याख्या में ' वैशेषिक ' का अर्थ करते हैं— ' आरमनो यो विशेषस्तत्प्रकाशकम् । केवल अर्जुन मिश्र ( महा ) भारताचं ( प्र ) दीपिका नामक अपनी व्याख्या में वैशेषिक शब्द को स्पष्टतः कणादकृत वैशेषिक दर्शन बताते हैं- ' वैशेषिकम् = पदार्थस्वरूपनिरूपणद्वारा हेयोपादेय-फलम् हेयोपादानाभ्यामात्मतत्वविवेकफलं कणादप्रणीतशास्त्रम् । किन्तु उन्होंने अपने द्वारा किये गये उक्त अर्थ के प्रति अरुचि दिखाते हुए ' यद्वा विशेषाय प्रवृतं सांख्यपदेन प्रसिद्धमेव शास्त्रं वैशेषिकम् ' लिखा । महाभारत के उक्त श्लोक के पूर्व प्रथम तथा चतुर्थ For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ( ख )

श्लोकों में ' छत्रादिषु विशेषेण मुक्तं मां विद्धि तत्वत: ' तथा ' जनकोऽप्युत्स्मयन् राजा

भावमस्या विशेषयन् ' कहकर जनक एवं संन्यासिनी के मध्य प्रचलित दार्शनिक प्रसङ्ग में ' विशेष ' शब्द साभिप्राय रखा गया है । विद्वज्जनों को इस पर विचार करना चाहिए कि उक्त प्रसङ्ग में ' विशेष ' शब्द को लेकर जिस दर्शन पर विचार किया गया है, क्या वह कणाद प्रणीत वैशेषिक दर्शन है अथवा सांख्यदर्शन । ' ऋतूक्थादिसूत्रान्ताट्ठक् ' ( ४-२-१० ) सूत्र के गणपाठ में पाणिनि ने ' भ्याय उक्थ लोकायत, ज्योतिष, संहिता, निरुक्त, वृत्ति, आयुर्वेद ' इत्यादि का उल्लेख किया है, ' विशेष ' शब्द का नहीं । ' विनयादिभ्यष्ठक् ' ( ५-४-३४ ) सूत्र के गणपाठ में यद्यपि ' विशेष ' शब्द का पाठ हुआ है, तथापि उक्त सूत्र स्वार्थ में प्रत्यय - विधान करता है । ' विशेषमधिकृत्य कृते ग्रन्थे ' इस अर्थ में ' अधिकृत्य कृते ग्रन्थे ' ( ४-३-८७ ) सूत्र से ठक् प्रत्यय होकर ' वैशेषिक ' शब्द निष्पन्न होता है । यद्यपि इस प्रकार पर्यालोचना करने पर ज्ञात होता है कि पाणिनि को ' वैशेषिक दर्शन ' अज्ञात था, तथापि पाणिनि के ' परेरभितोभावि मण्डलम् ' ( ६, २, १८२ ) सूत्र में ' परिमण्डल ' शब्द वैशेषिक दर्शन के ' नित्यं परिमण्डलम् ' ७,२,२० ) सूत्र - गत परिमण्डल शब्द के सदृश परमाणुपरिमाण अर्थ में प्रयुक्त हुआ है । वायुपुराण के महेश्वरावतारयोग नामक तेईसवें अध्याय में अक्षपाद, कणाद, उलूक तथा वत्स को सोमशर्मा का पुत्र बताया गया है । छब्बीसवें परिवर्त में वैद्युत एवं आश्वलायन की उत्पत्ति तथा सत्ताइसवें परिवर्त में अक्षपाद, कणाद इत्यादि के जन्म का उल्लेख किया गया है । जातूकर्ण्य व्यास के काल में सोमशर्मा की स्थिति प्रभासतीर्थ में बतायी गयी है । वह प्रभासपतन के नाम से गुजरात में अवस्थित है । पद्मपुराण ( उत्तरखण्ड ) के २६३ वें अध्याय में दस ऋषियों को तामस कहा गया है । - १. कणाद, २. गौतम, ३. शक्ति, ४. उपमन्यु, ५ जैमिनि ६. कपिल, ७. दुर्वासा, ८. मृकण्डु, ६. बृहस्पति तथा १०. भृगुवंशोत्पन्न जमदग्नि । इन्हें भावशक्त्या-वेशावतार बताया गया है । इनके द्वारा रचित शास्त्रों को वेदबाह्य तथा तामस कहा गया

है ( २६२, ६६-१८ ) -शृणु देवि प्रवक्ष्यामि तामसानि यथाक्रमम् ।

येषां स्मरणमात्रेण पातित्यं ज्ञानिनामपि ॥

प्रथमं हि मया चोक्तं शंबं पाशुपतादिकम् ।

मच्छवस्थावेशितैविप्रः प्रोक्तानि च ततः शृणु ॥

कणादेन तु संप्रोक्तं शास्त्रं वैशेषिकं महत् ।

गौतमेन तथा न्यायं सांख्यं तु कपिलेन वै ॥

वायुपुराण के अनुसार जातूकर्ण्य व्यास सत्ताइसवें परिवर्त में तथा कृष्णद्वैपायन व्यास अठ्ठाइसवें परिवर्त में हुए थे । इस प्रकार बातूकण्यं व्यास के समय उत्पन्न सोमशर्मा के पुत्र कणाद द्वैपायन व्यास से पूर्ववर्ती ठहरते हैं । For Private And Personal

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प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 10 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ( ग ) जैनों की तत्त्वसमीक्षा वैशेषिक पदार्थ निरूपण से प्रभावित है । मिलिन्दप्रश्न जैसे प्राचीन बौद्धग्रन्थों में वैशेषिक दर्शन का बारम्बार उल्लेख हुआ है । वेद और ईश्वर को प्रमाणकोटि में न रखे जाने के कारण बौद्धों में वैशेषिक सूत्रों के प्रति विशेषतः समादर की दृष्टि बनी प्रतीत होती है । वैशेषिकों के लिए ' वैशेषिका अर्धवैनाशिक: ' की प्रसिद्ध उक्ति भी उक्त बात को पुष्ट करती है । प्रशस्तपाद ने ' पदार्थधर्मसंग्रह ' नामक अपने स्वोपज्ञ ग्रन्थ में वैशेषिक दर्शन के तत्त्वों के निरूपणार्थ तथा ' अर्धवेनाशिकाः ' की लोकधारणा के निराकरणार्थ महनीय कार्य किया है । वैशेषिक दर्शन को सेश्वरता को प्रतिष्ठापित करने का श्रेय प्रशस्तपाद को ही प्राप्त है । पदार्थधर्मंसंग्रह की अपनी सर्वाङ्गपूर्णता के कारण वैशेषिक दर्शन पर रचित रावण-कृत भाष्य लुप्त हो गया । इस की विशिष्टता तथा महनीयता इसी से समझी जा सकती है कि ' संग्रह ' होते हुए भी परवर्ती आचार्यों ने इसे भाष्य के रूप में मान्यता प्रदान की है । प्रशस्तपाद ने कणाद मुनि को नमस्कार किया है । सूत्रों का आधार लेकर उन्होंने कुछ स्थलों पर व्याख्या की है । ' अथातो धर्मं व्याख्यास्यामः ' सूत्र के ' धर्मम् ' का आधार लेकर अपने ग्रन्थ का नाम ' पदार्थधर्म संग्रह ' रखा है । चतुर्थ सूत्र ' धर्मविशेषणप्रसूताद् द्रव्य-गुणकर्मसामान्यविशेषसमवायानां पदार्थानां तत्त्वज्ञानान्निःश्रेयसम् ' के आधार पर ( १५ पृ ० पर ) इस प्रकार लिखा है - ' द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषसमवायानां पदार्थानां तत्त्वज्ञानं निःश्रेयसहेतु: ' ( १५ पृ ० ) ' यतोऽभ्युदय निःश्रेयससिद्धिः स धर्मः ' सूत्र के आधार पर उन्होंने ' ईश्वर ' शब्द जोड़ते हुए लिखा- ' तच्चेश्वरचोदनाभिव्यक्ताद् धर्मादेव ' ( पृ ० १८ ) | कणाद के सूत्रों का आधार लेने पर भी ' पदार्थधर्म संग्रह ' स्वतन्त्र ग्रन्थ है, व्याख्या ग्रन्थ नहीं । इसके अतिरिक्त इसमें कई मौलिक उद्भावनाएँ दृष्टिगोचर होती हैं । परमाणुवाद, प्रमाण, २४ गुण तथा जगत् की उत्पत्ति एवं विनाश का विशद और प्रामाणिक विवेचन यहाँ मिलता है । न्यायदर्शन के भाष्यकार वात्स्यायन ने अपने भाष्य में ' पदार्थधर्म संग्रह ' ( प्रशस्तपाद भाष्य ) से सहायता ली है । अनीश्वरवादी बौद्धों पर इसकी प्रतिक्रिया हुई और बौद्ध विद्वान् वसुबन्धु ने प्रशस्तपाद द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्तों का खण्डन करने की चेष्टा की । प्रशस्तपाद के ' पदार्थधर्म संग्रह ' पर छठी से सोलहवीं शताब्दी तक व्याख्याएं लिखी गयीं । छठी शताब्दी में व्योमशिवाचार्य ने ' व्योमवती ' नामक व्याख्या लिखी । दसवीं शताब्दी में दो प्रौढ व्याख्याएँ उदयनाचार्य तथा श्रीधराचार्य द्वारा रची गयीं - १. किरणा-वली, एवं २. न्यायकन्दली । उदयनाचार्य ने वैशेषिक दर्शन पर ' लक्षणावली ' नामक एक स्वतन्त्र ग्रन्थ की भी रचना की है । ' व्योमवती ' तथा ' किरणावली ' की अपेक्षा ' न्यायकन्दली ' अधिक प्रौढ एवं विशद व्याख्या है । इसमें कई स्थापनाएँ नवीन हैं । तम के आरोपित नील रूप मानने के सिद्धान्त के उपज्ञाता के रूप में श्रीधराचार्य की प्रसिद्धि है । रावणकृत वैशेषिक दर्शन के भाष्य का नाम ' वैशेषिक कन्दली ' ( वैशेषिककटन्दी ) था | अधिक सम्भव है कि श्रीधराचार्य ने रावणभाष्य की स्मृति को जगाये रखने के साथ साथ अपनी व्याख्या की प्रसिद्धि के लिए उसका नामकरण ' कन्दली ' किया । ' वैशेषिक ' के स्थान पर श्रीधर ने For Private And Personal