प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 11–20

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 11–20

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ( घ ) ' न्याय ' शब्द का प्रयोग बड़ी सूझबूझ के साथ किया है । शोपाध्याय से पहले न्याय और वैशेषिक दोनों सिद्धान्तों के फलतः परवर्ती काल में गगे-निरूपण के लिए शिवादित्य ने ' तर्कभाषा ' गङ्गेशोपाध्याय के ' सप्तपदार्थी ' नामक ग्रन्थ की रचना की । केशवमिश्र की परवर्ती काल की रचना है । श्रीधर के परवर्ती श्रीवत्स तथा वल्लभाचार्य ने भी प्रशस्तपाद पर रची गयी अपनी व्याख्याओं के नामों में ' न्याय ' शब्द को सम्बद्ध किया है । श्रीधराचार्य की व्याख्या को अधिक स्पष्ट करने के लिए पद्मनाभ मिश्र ने ' न्यायकन्दलोसार ' और जैन पण्डित राजशेखर ने ' न्यायकन्दली पञ्जिका ' नामक टीकाओं की रचना की है । न्यायकन्दली व्याख्या की विशिष्टता के निदर्शन के लिए अधोलिखित विषय अवलोकना है- १. महोदय शब्द की व्याख्याएँ ( ६० ), श्रेयः सम्बन्ध में मण्डनमत का खण्डन ( १६५० ); बौद्धों के अर्थक्रियाकारित्व ' का खण्डन ( ३३ ५० ), अनुतसिद्ध पदार्थ का विचार ( ३७ पु ० ), उद्योतकर के मत का खण्डन ( ७१ ५० ), शरीरारम्भ से कारणता का विचार ( ८३ पृ ० ), अनुमानाङ्ग के सम्बन्ध में बौद्धों के मत का खण्डन १८४५० ), अन्तःकरणत्व का साधन ( २१८ पृ ० ), प्रदेशवृत्तित्वका व्याख्यान ( २४७ पृ ० ), द्वित्व की उत्पत्ति इत्यादि का निरूपण ( २५-३१३० ), सत् अथवा असत् की कारणता का विचार ( ३३६ १० ), विपर्यय का समर्थन ( ४३० ५० ), निर्विकल्पक साधन ( ४४६ ५० ), युक्तों की व्याख्या ( ४६५ ५० ), ' यदनुमेयेन ' की व्याख्या ( ४८१ पु ० ), ' विधिस्तु ' की व्याख्या ( ४११ ० ), भाध्य की उवा ( ५०३० ), ' आम्नायविधातृणाम् की व्याख्या पर विचार ( ६२७ पृ ० ) इत्यादि । प्रशस्तपाद की इस व्याख्या के महत्व के कारण वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय के अनुसन्धान संस्थान ने अपने अन्यतम अनुसन्धान सहायक श्रीदुर्गाधर झा को हिन्दी अनुवाद करने का कार्य सन् १६६० में सौंपा । न्याय - वैशेषिक दर्शन के उद्भट विद्वान् श्रीझा ने इस गुरुतर कार्य का निर्वाह प्रत्यग्रन्थिभेदपूर्वक सफलता के साथ किया । सन् १ ९ ३३ में इस ग्रन्थ का प्रकाशन अनुसन्धान संस्थान से किया गया । इस अनुवाद की उपादेयता का भान इसी से होता है कि कुछ ही वर्षों में ग्रन्थ की सभी प्रतियाँ विक्रीत हो गयीं । न्याय-कन्दली के पुनः प्रकाशन के लिए जिज्ञासुओं के द्वारा कई वर्षों से निरन्तर प्रार्थना की जाती रही है । फलतः स्वापकन्दली सहित प्रशस्तपाद की हिन्दी व्याख्या का यह संशोधित द्वितीय संस्करण जिज्ञासुओं और विद्वानों के समक्ष प्रस्तुत है । अनुसन्धान संस्थान के अन्यतम अनुसन्धान सहायक डॉ ० उमाशंकर त्रिपाठी ने इस प्रन्य का संशोधन कार्य बड़ी तत्परता के साथ किया है । मुझे पूर्ण विश्वास है कि यह जिज्ञापुओं का उपकारक और विद्वज्जनों को मनोमोदकर सिद्ध होगा । वाराणसी मकरसंक्रान्तिः २०३४ वे. ( १४-१-७८ ई ० शनिवार ) भागीरथप्रसाद त्रिपाठी ' वागीश शास्त्री ' निदेशक, अनुसन्धान संस्थान For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir || T: || विज्ञप्तिः

गङ्गानाथान् गुरून् नत्वा बहुग्रन्थानुवादकान् ।

तन्नाम्ना ग्रन्थमालायाः प्रक्रमं करवाण्यहम् ॥

प्रशस्तपादभाष्यस्य कन्दलीटीकया सह ।

प्रकाशः क्रियतेऽस्माभिरनुद्य देशभाषया ॥

संशोधनं कृतं यत्नैहिंन्दी भाषानुवादिना ।

अस्मत्सहायकेनैव श्रीदुर्गाधरशर्मणा ॥

लिखिता भूमिकाप्येका न्यायशास्त्रविदाऽसुना ।

वैशेषिकपदार्थानां सम्यग् बोधो यथा भवेत् ॥

मालायाः सुमनश्चाद्यं सौमनश्यं प्रसारयेत् ।

प्रार्थना काशिकापूर्या क्षेत्रेशचन्द्रशर्मणः ॥

शास्त्रज्ञ पण्डितों के अतिरिक्त अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त अथवा हिन्दी भाषा के वेत्ता साधारण बुद्धिमान् जनता में अवा विद्वानों में प्राचीन भारतीय दर्शनों के प्रति विशेष रुचि आजकल पाई जाती है । परन्तु संस्कृत भाषा में पूर्ण ज्ञान न होने के कारण वे मूल ग्रन्थों का अध्ययन नहीं कर सकते हैं । इस त्रुटि की पूर्ति के लिए यह आवश्यक है कि हमारे मुख्य मुख्य दार्शनिक तथा अन्य शास्त्रों के साथ प्रकाशन हो, जैसे ग्रीक तथा लातिन भाषा ग्रन्थों का प्रामाणिक अनुवाद के की लोएब क्लैसिकल लाइब्रेरी । काशी से प्रकाशित ' अच्युत-( LOEB_CLASSICAL LIBRARY ) में हुआ है प्रन्थमाला ' ने अंशतः यह कार्य किया है । परन्तु इस ग्रन्थमाला में कुछ ही शास्त्रों का समावेश हुआ । यह ग्रन्थमाला भी इधर बन्द हो गई । सन् १ ९ ५८ में काशी राजकीय संस्कृत महाविद्यालय के " वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय " में परिणत होने पर अनुसंधान संचालक के पद पर जब मेरी नियुक्ति हुई, मैंने प्रथम उपकुलपति श्री आदित्यनाथ झा जी से प्रार्थना की कि ऐसी एक ग्रन्थ-माला हम भी प्रकाशित करें और उन्होंने इस प्रस्ताव को स्वीकृत किया । ग्रन्थमाला का नाम रखा गया ' गङ्गानाथझा ग्रन्थमाला ' । इस नामकरण के दो कारण थे - ( १ ) हमारे दिवङ्गत गुरु विद्यासागर महामहोपाध्याय डा ० श्री गङ्गानाथ झा जी ने बहुत संस्कृत ग्रन्थों का अनुवाद किया था और ( २ ) गुरुजी के अनुवादों के कारण हमारे देश में और विदेशों में भारतीय दर्शन का ज्ञान पर्याप्त मात्रा में फैला । For Private And Personal

पृष्ठ 13

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ( ख ) इस ग्रन्थमाला का प्रथम पुष्प है श्रीधरकृत " न्यायकन्दली " टीका सहित प्रशस्त-पादाचार्य कृत ' पदार्थधर्मसंग्रह ' नाम का वैशेषिक भाष्य । इन पुस्तकों का संशोधन और अनुवाद विश्वविद्यालय के अनुसंधान सहायक न्यायाचार्य श्री दुर्गावर झा ने किया है । “ पदार्थधर्मसंग्रह " वैशेषिक शास्त्र में एक स्वतन्त्र ग्रन्थ है, कणाद कृत वैशेषिक सूत्रों की क्रमिक व्याख्या नहीं । यह ग्रन्थ इतना प्रामाणिक समझा गया कि इसके आगे सूत्र का प्रचार कम हो गया । पदार्थधर्मसंग्रह के ऊपर विद्वानों ने टीकायें लिखीं । ऐसी तीन टीकायें बहुत प्रसिद्ध हैं - श्रीधरकृत ' न्यायकन्दली '. उदयनकृत ' किरणावली ' और व्योम-शिवाचार्यकृत ' व्योमवती ' । इनमें ' न्यायकन्दली ', ग्रन्थ लगाने की दृष्टि से सर्वोत्तम है । इस कारण से इस टीका का और उसके अनुवाद का यहाँ समावेश किया गया है । आगे इस ग्रन्थमाला में उदयन कृत ' न्यायकुसुमाञ्जलि ' ( गद्य और पद्य ) और अन्य ग्रन्थों का प्रकाशन होगा । दर्शन शास्त्र के अतिरिक्त अन्य शास्त्रों के भी ग्रन्थ प्रकाशित किये जायेंगे । १४-१२-१६६३ क्षेत्रेशचन्द्र चट्टोपाध्याय For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir भूमिका न्यायकन्दली सहित प्रशस्तपादभाष्य को हिन्दी अनुवाद तथा टिप्पणियों के साथ पण्डितों के समक्ष उपस्थित करते हुए मुझे विशेष हर्ष हो रहा है । हर्ष दो कारणों से है ( १ ) वर्तमानकाल में दुर्लभ इस टीका के साथ प्रशस्तपादभाष्य की पुस्तक मूल संस्कृत पुस्तकों के चाहनेवालों के लिए सुलभ हो जायगी । ( २ ) एवं प्रशस्तपादभाष्य और न्यायकन्दली का अर्थ हिन्दी संसार के सामने स्पष्ट हो जायगा । पुस्तकका सम्पादक हो या अनुवादक, सब के लिए यह अलिखित कर्त्तव्य निर्दिष्ट सा हो गया है कि पुस्तक के साथ वह कोई भूमिका अवश्य लिखे । तदनुसार मैं भी एक भूमिका लिख रहा हूँ । शास्त्रों से ज्ञान - लाभ करने के लिए पद और पदार्थों का सम्यक् ज्ञान आवश्यक है । इनमें पद- ज्ञान के लिए जिस प्रकार व्याकरणशास्त्र का शरण लेना अनिवार्य है, उसी प्रकार पदार्थज्ञान के लिए कणादनिर्मित इस दर्शन की भी आवश्यकता है । वैशेषिक दर्शन की इस आवश्यकता को " काणादं पाणिनीयञ्च सर्वशास्त्रोपकारकम् " इत्यादि उक्तियाँ भी समर्थन करती हैं । अत एव वैशेषिक दर्शन की उपादेयता में तो कोई सन्देह ही नहीं है | वैशेषिकदर्शन और इसके सूत्र इस के तीन नाम अधिक प्रसिद्ध हैं - ( १ ) वैशेषिकदर्शन, ( २ ) औलूक्यदर्शन और ( ३ ) काणाददर्शन | इन में ' वैशेषिक ' नाम के प्रसङ्ग में ६ प्रकार की युक्तियाँ प्रचलित हैं - ( १ ) ' अन्यत्र अन्त्येभ्यो विशेषेभ्य: ' ( १-२-६ ) इस सूत्र के अनुसार ' अन्त्य ' विशेष पदार्थ के साथ सम्बद्ध जो ' दर्शन ' वही ' वैशेषिकदर्शन ' है, क्योंकि दूसरे किसी भी दर्शन में इस प्रकार का विशेष ' पदार्थ स्वीकृत नहीं है । अतः ' विशेष ' रूप स्वतन्त्र पदार्थ के निरूपण के द्वारा यह अन्य दर्शनों से अलग समझा जा सकता है । अतः दूसरे दर्शनों से इसको अलग समझानेवाली यह ' वैशेषिकदर्शन ' संज्ञा है । ( २ ) न्यायदर्शन में दुःखों की पूर्ण निवृत्ति को ' मोक्ष ' कहा गया है । इस दर्शन में आत्मा के सभी विशेष गुणों के पूर्ण विनाश को ' अपवर्ग ' माना गया है । अतः सभी दर्शनों के द्वारा समान प्रतिपाद्य मोक्ष के प्रसङ्ग में यह ' विशेषगुण ' को को ' मुक्ति ' माना है, अतः ' विशेष एवं वैशेषिकः ' अवलम्बन कर उस के मूलतः उच्छेद इस स्वार्थिक प्रत्यय के द्वारा निष्पन्न ' वैशेषिक ' शब्द के द्वारा मोक्ष के प्रसङ्ग में इस का उक्त असाधारण्य ही प्रतिपादित होता है, अतः इस का नाम ' वैशेषिकदर्शन ' है । फलतः ' विशेष ' से, अर्थात् विशेषगुण ' से मोक्ष के प्रसङ्ग में जो शास्त्र सम्बद्ध हो वही ' वैशेषिक ' दर्शन है | ( ३ ) ' विगतः शेषो यस्य तत् विशेषम् ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार निर्विशेष ही प्रकृत ' विशेष ' शब्द का अर्थ है । विशेष एव वैशेषिकम् ' इस प्रकार स्वार्थिक प्रत्यय For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ( २ ) करके यह ' वैशेषिक ' शब्द निष्पन्न है । अर्थात् नैयायिकादि पदार्थों की षोडशादि संख्याओं को स्वीकार कर प्रमाणादि जिन पदार्थों को स्वीकार किया है, वे सभी वैशेषिकों से स्वीकृत सात पदार्थों में ही ' निरवशेष ' होकर अन्तर्भूत हो जाते हैं । कोई भी अन्तर्भूत होने से अवशिष्ट नहीं रहते, अतः इस दर्शन का नाम ' वैशेषिक दर्शन ' है । ( ४ ) ' विशेषणं विशेष: ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार लक्षणपरीक्षादि के क्रम से पदार्थों का प्रतिपादन ही प्रकृत में ' विशेष ' शब्द का अभिप्रेत अर्थ है । उक्त प्रतिपादन रूप कार्य जिस शास्त्र के द्वारा हो वही ' वैशेषिकदर्शन ' है । इस प्रकार से व्याख्या करने-वालों का अभिप्राय है कि सांख्य, वेदान्तादि दर्शनों में मोक्ष के लिये साक्षात् उपयोगी आत्मा एवं अन्तःकरणादि पदार्थ और सृष्टितत्त्व प्रभृति ही विशेष रूप से विवेचित हुए हैं । इससे जगत् के और पदार्थों के तत्त्व यथावत् परिस्फुट नहीं होते । आत्म-तत्त्व को समझने के लिये भी आत्मा के सजातीय और विजातीय दोनों प्रकार के पदार्थों का ज्ञान आवश्यक है । अतः आत्मा और उन के सजातीय और विजातीय सभी पदार्थों की ओर ' विशेष ' रूप से मुमुक्षुओं की दृष्टि आकृष्ट करने के कारण ही इस दर्शन का नाम वैशेषिकदर्शन ' है । ( ५ ) प्रकृत ' विशेष ' शब्द के ' भेद ' और विशेष गुण ' दोनों ही अर्थ हैं । इन दोनों अर्थों के साथ सम्बद्ध जो दर्शन वही ' वैशेषिकदर्शन ' है । वेदान्तदर्शन के अनुसार आत्मा में भेद और विशेष गुण ये दोनों ही नहीं हैं । इस दर्शन में आत्माओं में परस्पर भेद और ज्ञान, इच्छा प्रभृति विशेष गुण दोनों ही स्वीकृत हैं । सांख्यदर्शन में आत्माओं में परस्पर भेद यद्यपि स्वीकृत है, फिर भी वे आत्मा में विशेष गुण की सत्ता नहीं मानते । तस्मात् आत्मा में उक्त भेद और विशेष गुण इन दोनों ' विशेषों ' का प्रतिपादन करते हुए महर्षि कणाद ने इस नाम के द्वारा यह सूचित किया है कि वेदान्त और सांख्यदर्शन से यह दर्शन गतार्थ नहीं है । " ( ६ ) ' विशेष ' शब्द का प्रयोग परमाणु अर्थ में भी होता है, तदनुसार परमाणु की सत्ता और तन्मूलक सृष्टि जिस दर्शन में स्वीकृत हो वही ' वैशेषिकदर्शन ' है । कुछ विद्वानों की ऐसी भी सम्मति है । औलूक्यदर्शन महर्षि कणाद किसी उलूक नाम के महर्षि के वंश में थे, अतः उनका ' औलूक्य ' नाम भी था । इसी कारण कणाद - निर्मित दर्शन को ' औलूक्यदर्शन ' भी कहते हैं | काणाददर्शन महर्षि कणाद के द्वारा रचित होने के कारण इसे काणाददर्शन भी कहते हैं । १. टिप्पणी -- ये पाँच व्युत्पत्तियां म ० म ० विद्वद्वर श्रीयुत कालीपदतर्फाचार्य महोदय के द्वारा सम्पादित सूक्ति और उनकी टीका के साथ संस्कृतसाहित्यपरिषद् से प्रकाशित ' प्रशस्तपादभाष्य ' की भूमिका से ली गयी हैं । अतः उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करता हूँ । For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ( ३ ) वैशेषिकसूत्र और उसकी टीकाओं की परम्परा वैशेषिकसूत्र के ऊपर प्रशस्तपादकृत भाष्य से पहिले की टीकाउपलब्ध नहीं हैं । रावणकृत भाष्य एवं भारद्वाजकृत वृत्ति की बातें सुनने में आती हैं, किन्तु वे अपने स्वरूप में उपलब्ध नहीं हैं । ग्रन्थान्तरों में उनकी चर्चा अवश्य मिलती है । प्रशस्तपाद-नहीं होते । अतः शङ्कर मिश्रकृत ' उपस्कार ' कृतभाष्य के द्वारा सभी सूत्रों के अर्थ प्रकाशित टीका के द्वारा ही इतने दिनों तक सूत्रों के प्रसङ्ग में जो कुछ भी कहा जाता रहा है । इधर दरभङ्गा विद्यापीठ से अज्ञातनामा किसी दाक्षिणात्य विद्वान् की टीका प्रकाशित हुई है । उस ग्रन्थ के सम्पादक उसे उपस्कार से प्राचीन और किरणावली से अर्वाचीन मानते हैं । गायकवाड़ औरियण्टल सिरीज से अभी चन्द्रानन्द नाम के किसी विद्वान् की एक वृत्ति निकली है । पं ० श्रीजयनारायण भट्टाचार्य और पं ० श्रीचन्द्रकान्त तर्का-लङ्कार की टीकायें प्राय: इसी शताब्दी की हैं । सूत्र की संख्याओं के सम्बन्ध में प्रथमोक्त तीन टीकाओं में काफी अन्तर है । शेष दोनों अर्वाचीन टीकायें इस के सम्बन्ध में श्री शङ्कर मिश्र के अनुयायी हैं । उपस्कार के अनुसार सूत्र की संख्या है ३७० और मिथिला विद्यापीठवाली पुस्तक के अनुसार ६ अ ० के पहिले आह्निक तक सूत्रों की संख्या ही ३२४ है । इस पुस्तक में आगे का अंश नहीं है, क्योंकि टीका उतनी ही उपलब्ध थी । अगर इसके आगे के उपस्कारानुयायी सूत्रों को जोड़ देते हैं तो उनकी संख्या ३५३ तक ही पहुँचती है । इस प्रकार सूत्रों के सम्बन्ध में मतान्तर चले आ रहे हैं । स्थिति यह मालूम होती है कि प्रशस्तपाद को भाष्यरचना के बाद उसके सौष्ठव के कारण सूत्र की तरफ से सबका ध्यान ही हट गया और वैशेषिकदर्शन के सम्बन्ध में जितने भी कुछ विचार हुए या ग्रन्थ रचनायें हुईं सभी प्रशस्तपादभाष्य की आधार मानकर ही होने लगीं । मिथिला विद्यापीठ से और बड़ौदा से प्रकाशित पूर्वोक्त वैशेषिकसूत्र की दोनों पुस्तकों के छपने के बाद एक बात और सामने आयी है । उन दोनों ही पुस्तकों में " धर्मविशेषप्रसूतात् " ( १-१-३ ) इत्यादि उपक्रम सूत्र नहीं है । किन्तु धर्मनिरूपण की प्रतिज्ञा और लक्षण लिखने के बाद हठात् ' पृथिव्यापस्तेजो वायुः ' ( १-१-५ ) इस सूत्र के द्वारा पदार्थों के विभाग से जो असङ्गति की आपत्ति आती है, उसको उन दोनों टीकाकारों ने अपनी अपनी टीका में जिस युक्ति से समर्थन किया है, वह युक्ति ' धर्मविशेषप्रसूतात् ' इत्यादि सूत्र के द्वारा कही हुई युक्तियों से अधिक भिन्न नहीं है । इस प्रसङ्ग में दो ही बातें संभव जान पड़ती हैं -- ( १ ) जिन लोगों ने " धर्मविशेष-प्रसूतात् ' इत्यादि को सूत्र नहीं माना है, उन लोगों के हाथ में जो सूत्रावली आई उसके मूल लेखक से प्रमादवश उक्त सूत्र छूट गया हो और उस के बाद से उसी सूत्रावली का प्रचार उस क्षेत्र में हो गया हो । अथवा ( २ ) धर्मव्याख्या की प्रतिज्ञा और लक्षण कहने के बाद हठात् पदार्थ निरूपण करने से जो असंगति आती है, उसकी पूर्ति किसी विद्वान् ने अपनी सूत्रपाठ की पुस्तक में " घर्मविशेषप्रसूताद् ' इत्यादि शब्दों के द्वारा टिप्पणी रूप में कर दो हो । आगे उस पुस्तक के आधार पर लिखनेवाले किसी दूसरे लेखक ने भ्रमवश उस टिप्पणी को सूत्र समझ कर पृथक् सूत्र के रूप में लिख दिया हो । भ्रम और प्रमाद इन दोनों की संभावनाओं में से प्रकृत में किस संभावना की कल्पना में लाघव और स्वारस्य है, इसे पण्डितगण विचार कर देखें । For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ( ४ ) वैशेषिकदर्शन और ईश्वर सभी जानते हैं कि न्याय और वैशेषिकदर्शन के आचार्यों ने ईश्वर साधन के प्रसङ्ग में बहुत कुछ लिखा है । किन्तु वैशेषिक दर्शन के कणादरचित सूत्र में ईश्वर शब्द का स्पष्ट उल्लेख न रहने के कारण एवं सष्ट रूप से ईश्वर - साधन का कोई प्रकरण न रहने के कारण कुछ विद्वानों का कहना है कि कणाद के समय से लेकर प्रशस्तपाद से पहिले तक वैशेषिकदर्शन में ईश्वर स्वीकृत नहीं थे । अतः मूलतः यह दर्शन ईश्वर नहीं है । वैशेषिक दर्शन को ईश्वर - परक माननेवालों की दृष्टि इस प्रसङ्ग में कुछ भिन्न प्रकार की है । उनका कहना है कि किसी वस्तु का स्पष्ट उल्लेख न करना ही उस वस्तु के अभाव का साधक नहीं हो सकता, किसी वस्तु को अस्वीकृत करना है तो फिर उन के लिए उस प्रसङ्ग में केवल मौन साधन से ही काम नहीं चल सकता । उसके लिए उक्त वस्तु की सत्ता के विरुद्ध युक्तियों का स्पष्ट रूप से निर्देश आवश्यक है | क्योंकि किसी वस्तु की अनुक्ति ही उसकी विरुद्धोक्ति नहीं हो सकतो । अनुक्ति और विरुद्धोंक्ति में बहुत अन्तर है । अतः प्रशस्तपाद प्रभृति आचायों ने एवं उनके अनुयायी उदयनादि आचायों ने ईश्वर साधन के प्रसङ्ग में अपनी चरम प्रतिभा का परिचय दिया है । एवं इस दर्शन में ईश्वर को सिद्ध मानकर उपपादन किया है । शङ्करमिश्र प्रभृत्ति सूत्र के टीकाकारों ने सूत्र के द्वारा ही ईश्वरसिद्धि का भी प्रयास किया है । उन लोगों का कहना है कि किसी विषय का सष्ट उल्लेख न होने पर भी उसके अन्य उपपादनों से विषय में उस विषय में उस व्यक्ति की अनुमति का पता चल जाता है । जैसे व्याकरणशास्त्र में योगविभागादि के द्वारा सूत्र में अनुद्दिष्ट विधानों का भी आपेक्ष होता है । इसी प्रकार प्रकृत में ' तद्वचनादाम्नायस्य प्रामाण्यम् ' ( १-१-३ ) संज्ञाकर्मत्वस्मद्विशिष्टानां लिङ्गम् ( २-१-१८ ) प्रत्यक्षप्रवृत्तत्वात्सं-ज्ञाकर्मणः ( २-१-१६ ) इत्यादि सूत्रों के द्वारा आनुषङ्गिक रूप में ईश्वरसिद्धि का प्रयास शङ्कर मिश्रादि टीकाकारों के द्वारा किया गया है । धर्म और वैशेषिकदर्शन वैशेषिकदर्शन का आरम्भ ' धर्मव्याख्या ' की प्रतिज्ञा से हुआ है । उसके दूसरे सूत्र के द्वारा अवसर प्राप्त धर्म का लक्षण कहा गया है । और तीसरे सूत्र के द्वारा धर्म के कारणी-भूत यागादि के प्रतिपादक वेदों में प्रामाण्य का प्रतिपादन हुआ है । ' धर्मविशेषप्रसूतात् ' इत्यादि चौथे सूत्र के द्वारा यह उपपादन किया गया है कि द्रव्यादि छः पदार्थों के साधर्म्य एवं वैधर्म्य सहित तत्त्वज्ञान के द्वारा ही निःश्रेयस का लाभ होता है । उक्त तत्त्वज्ञान निवृत्तिलक्षण विशेष प्रकार के धर्म से उत्पन्न होता है । फलतः निःश्रयेस के लिये धर्म अत्यन्त आवश्यक है, अतः उसका निरूपण भी आवश्यक है, जिसके लिए इस शास्त्र का आरम्भ उचित है । फिर इसके बाद धर्म के सम्बन्ध में विशेष चर्चा नहीं दीख पड़ती है । क्कम के अनुसार और पदार्थों की तरह धर्म का भी निरूपण किया गया है । पदार्थों के निरूपण से ग्रन्थ की समाप्ति हो जाती है । For Private And Personal

पृष्ठ 18

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ( x ) इस प्रसङ्ग में कुछ लोगों का आक्षेप है कि धर्म निरूपण के लिए प्रवृत्त शास्त्र में धर्म की इतनी सी चर्चा हो और उससे असम्बद्ध द्रव्यादि पदार्थों का इतना विस्तृत वर्णन हो यह कुछ ठीक नहीं जनता इसी आक्षेप की प्रतिध्वनि ' धर्म ' व्याख्यातुकामस्य षट्पद थपवर्णनम् । सागरं गन्तुकामस्य हिमवद्गमनोपमम् ' इत्यादि वचनों से होती है । इस प्रसङ्ग में वैशेषिक सिद्धान्त के अनुयायियों का यह कहना है कि इस शास्त्र में जिस धर्म की व्याख्या की प्रतिशा की गयी है वह पूर्वमीमांसा के प्रतिज्ञासूत्र में कथित ' धर्म ' से भिन्न है । मीमांसको ने धर्म शब्द से यागादि क्रियायों को लिया है । ये क्रियायें केवल वेदों के द्वारा ही प्रमित हो सकती हैं । फलतः केवल वेद ही धर्मरूप क्रिया कलाप के ज्ञापक हेतु है, किन्तु इन क्षणिक क्रियाकलापों को स्वर्गादि कालपर्यन्त रहने की सम्भावना नहीं है, अतः मध्य ती एक अतीन्द्रिय अपूर्व की कल्पना मीमांसक भी करते हैं । वैशेषिक गण इस अपूर्व को ही धर्म करते हैं । यह ' धर्म ' केवल अनुमानं से ही समझा जा सकता है । अतः जिस प्रकार मीमांसकों ने यागादि कर्मकलाप रूप धर्म के शापक प्रमाण रूप वेदों के अर्थ के निर्णय में ही अपना सारा श्रम व्यय किया है, उसी प्रकार अगर वैशेषिकगण आत्मनिष्ठ उक्त अपूर्व रूप गुण के एकमात्र साधक अनु-मान और आवश्यक पदार्थ निरूपण के प्रसङ्ग में अधिक जागरूक हों तो उनके ऊपर प्रतिज्ञात अर्थ से असम्बद्ध अर्थ के अभिधान का दोष नहीं मढ़ा जा सकता । दूसरी बात यह है कि अगर वैशेषिक दर्शन के उपक्रमस्थ धर्म शब्द से भी गादि क्रियाकलापों को ही लें, तथापि द्रव्यादि के निरूपण को यागादि से सर्वथा असम्बद्ध नहीं कहा जा सकता । हेतु दो प्रकार के होते हैं एक ज्ञापक और दूसरा उत्पादक । दण्ड घट का उत्पादक कारण है और धूम वह्नि का शापक कारण है । इसी कारणत्वा-साम्य से दोनों प्रकार के हेतु बोधक पदों से हेतु में पञ्चमी विभक्ति होती है । जैसे ' दण्डाद् घटः, धूमाद् वह्निः ' इत्यादि । प्रकृत में विधिवाक्य रूप वेद धर्म के ज्ञापक कारण हैं और द्रव्यादि पदार्थ उनके उत्पादक कारण हैं I क्योंकि ब्रीहि प्रभूति द्रव्य, आरण्यादि गुण, उत्खन अवहननादि कर्म, ब्राह्मणत्वादि सामान्य इन सबों को मीमांसा-साशास्त्र में भी यागादि का सम्पादक मान गया है । इसी प्रकार इनके तत्त्वज्ञान में सहायक विशेष और समवाय का तत्वज्ञान भी परम्परया यांग में उपकारक है फिर धर्म व्याख्या के प्रसङ्ग में द्रव्यादि पदार्थों के निरूपण करनेवालों को सागर जाने की इच्छा से हिमालय जानेवालों की उपमा देना कहां तक उचित है? इस दर्शन के ऊपर सबसे अधिक प्रहार हुये हैं और हो रहे हैं, अपने थूथ दार्शनिकों द्वारा और त्रयीबाह्य बौद्धादि के द्वारा भी । किन्तु इन सभी विरोधियों ने इस शास्त्र के प्रसङ्ग में आचार्य महर्षि प्रशस्तपाद को ही सत्र से प्रामाणिक व्याख्याता रूप में मानते चले आ रहे हैं । अतः प्रशस्तपादभाष्य का महत्त्व तो निर्विवाद है । तब रही बात यह भाष्य है? या स्वतन्त्र निबन्ध ग्रन्थ है? इस प्रसङ्ग में ' सूत्रार्थों वर्ण्यते येन ' भाष्य का यह लक्षण पूर्व रूप से संघटित न होने के कारण ही विवाद उपस्थित होता है | किन्तु यह भी ध्यान देने की बात है इस दर्शन में या और दर्शनों मैं भी स्वतन्त्र निबन्ध ग्रन्थों की कमी नहीं है । उन सभी के ऊपर दृष्टिपात करने For Private And Personal

पृष्ठ 19

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 19 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ( a ) पर प्रशस्तपाद भाष्य को स्वतन्त्र निबन्ध मानने में भी कुछ कठिनाई होती है । क्योंकि इस ग्रन्थ में जिस प्रकार अपने सभी मन्तव्यों को प्रतिपद सूत्र के द्वारा प्रतिपन्न करने की चेष्टा की गई है, वैसी चेष्टा और स्वतन्त्र निवन्धग्रन्थों में नहीं देखी जाती । अतः इसे भाष्य न मानने वालों को भी इसे और स्वतन्त्र निबन्धग्रन्थों से भिन्न प्रकार का मानना ही होगा । अतः हम यथास्थितिपालकों का कहना है कि यह वैशे-षिकसूत्रों का भाष्य ही है । ' भाष्य के सभी लक्षण इसमें पूर्णरूप से संघटित नहीं होते ' यह कोई इतनी बड़ी बात नहीं है । क्योंकि पदों के जितने भी अर्थ होते हैं, वे सभी अविकल रूप से सभी अभिधेयों में नहीं घटते । यह बात भाष्य पद से निर्विवाद रूप से समझे जाने वाले ग्रन्थों में भी देखी जा सकती है कि सभी भाष्य कहाने वालों ग्रन्थों में उक्त सूत्रानुवर्तिता समान नहीं है, थोड़ा बहुत अन्तर है हो । तस्मात् यह ग्रन्थ भाष्य के पूर्ण लक्षण से युक्त न होने पर भी भाष्य ही है, प्रामाणिकता में तो किसी भाष्य ग्रन्थ से न्यून है ही नहीं । इसके बाद तो फिर वैशेषिक दर्शन के प्रसङ्ग में जो कुछ भी टीकादि ग्रन्थों का निर्माण हुआ, सब इसी ग्रन्थ को आधार मानकर हुआ । जिनमें ( १ ) मिथिला के श्री उदयनाचार्य की किरणावली ( २ ) वङ्गकुलालङ्कार श्री श्रीधरभट्ट की न्यायकन्दली और ( ३ ) विद्वत्कुलालङ्करण श्री व्योमशिवाचार्य की व्योमवती ये तीन प्राचीन टीकार्ये अधिक प्रसिद्ध हुईं । इनमें भी किरणावली टीका सम्पूर्ण न होने पर भी सबसे अधिक मान्य हुई और इसकी टीका और उपटीकाओं की एक लम्बी परम्परा बन गयी । न्यायकन्दली पर भी टीका की रचनायें हुई, किन्तु वे उतनी प्रसिद्धि न पा सक गुजरात प्रान्त में इसका प्रचलन अधिक सुना जाता है । न्यायकन्दलीटीका की सबसे खूबी यह है कि वह सम्पूर्ण प्रशस्तपाद भाष्य के ऊपर है, और मूल ग्रन्थप्राय के प्रत्येक पद को सादे शब्दों में समझाने में अधिक तत्पर है । व्योमवती टीका प्रायः दक्षिण में अधिक प्रचलित है । इन तीनों से भिन्न पद्मनाभमिश्रकृत सेतु और जगदीश तर्कालङ्कार की सूक्ति टीका भी है, किन्तु दोनों ही असम्पूर्ण हैं । वैशेषिकदर्शन के सिद्धान्तों का संक्षिप्त विवरण वैशेषिकदर्शन का आरम्भ ' धर्म ' व्याख्या की प्रतिज्ञां से हुआ है । सभी प्रकार के ऐहिक और पारलौकिक इष्टों और मोक्ष के साधन को ही इस दर्शन में धर्म कहते हैं । यह धर्म ( १ ) प्रवृत्तिलक्षण और ( २ ) निवृत्तिलक्षण भेद से दो प्रकार का है । प्रवृत्तिलक्षण धर्म से ऐहिक तथा पारलौकिक स्वर्गादि सुखों की प्राप्ति होती है । एवं निवृत्तिलक्षण रूप ' विशेष ' धर्म के द्वारा ( १ ) द्रव्य, ( २ ) गुण, ( ३ ) कर्म, ( ४ ) सामान्य ( ५ ) विशेष ( ६ ) समवाय और ( ७ ) अभाव इन सात पदार्थों का साधर्म्य और वैधर्म्य रूप से तत्त्वज्ञान उत्पन्न होता है, उसी से मुक्ति होती है । अर्थात् निवृत्ति-लक्षण धर्म के द्वारा मुक्ति के सम्पादन में द्रव्यादि पदार्थों का और उनके परस्पर साधर्म्य और वैधर्म्य का ज्ञान मध्यवर्ती व्यापार हैं । यद्यपि ' आत्मा वारे श्रोतव्यः, तमेव विदित्वा अतिमृत्युमेति ' इत्यादि श्रुतियों के द्वारा आत्मतत्त्व ज्ञान को ही मोक्ष का कारण माना For Private And Personal

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प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 20 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ( ७ ) गया है, किन्तु आत्मा को अच्छी तरह समझने के लिये भी संसार के और सभी पदार्थों को समझना आवश्यक है । अपने सहधर्मियों से और विरुद्वधर्मियों से विविक्त होकर किसी व्यक्ति को समझे बिना उसका तत्त्व समझना सम्भव नहीं है । संसार की प्रत्येक वस्तु अन्य सभी वस्तुओं के साथ किसी न किसी प्रकार सादृश्य या वैसादृश्य सेयुक्त हैं, अतः परस्पर सम्बद्ध है । अतः एक वस्तु को समझने के लिये और सभी वस्तुओं को भी समझना आवश्यक है । सुतराम् आत्मा को समझने के लिये भी संसार के अन्य सभी वस्तुओं को समझना आवश्यक है । किन्तु संसार के असंख्य वस्तुओं को अलग अलग प्रत्येकशः समझना साधारणजनों के लिये सम्भव नहीं है । अतः महर्षि कणाद ने समझने की सुविधा के लिये जगत् को द्रव्यादि सात भागों में विभक्त किया है । फलतः इनके मत से संसार की सभी वस्तुयै द्रव्यादि खात पदार्थों में से ही कोई हो सकती हैं । द्रव्य द्रव्य उसे कहते हैं जिसमें गुण हो या क्रिया हो । इसका यह अर्थ नहीं कि सभी द्रव्यों में सभी अवस्थाओं में गुण या कर्म रहते ही हैं, क्योंकि उत्पत्ति समय उत्पत्तिशील पृथिव्यादि द्रव्यों में भी गुण या कर्म नहीं रहते । गुण और कर्म का समवायिकारण आश्रयीभूत द्रव्य ही हैं जो अपनी उत्पत्ति से पहिले नहीं रह सकता । अतः उत्पत्ति के समय द्रव्य बिना गुण या बिना कर्म के ही रहते हैं । उत्पत्ति के बाद उनमें गुण या क्रिया की उत्पत्ति होती है । आकाशादि विभुद्रव्यों में तो क्रियायें कभी रहती ही नहीं | अतः ' गुण या क्रिया से युक्त जो पदार्थ वही द्रव्य है ' इस लक्षण का * अर्थ इतना ही है कि गुण और कर्म द्रव्यों में ही रहते हैं, द्रव्य से भिन्न गुणादि में नहीं । वस्तुतः ' द्रव्यत्व ' जाति ही द्रव्य का लक्षण है । यह द्रव्यत्व जाति कहाँ रहती है? इस को समझाने के लिए ही कर्म का विशेषतः गुण का सहारा लिया जाता है । विभिन्न व्यक्तियों को किसी एक रूप से समझने के लिए उन सभी व्यक्तियों में किसी सादृश्य की आवश्यकता होती है । सभी मनुष्यपरस्पर भिन्न हैं, किन्तु ठीक एक ही आकार के दो मनुष्य नहीं मिल सकते । किन्तु सभी मनुष्यों में कुछ आन्तर और बाह्य सादृश्य भी है, जिनके चलते सभी मनुष्यों में ' यह मनुष्य है ' इस एक तरह का व्यवहार होता है । इस प्रकार जिन सभी व्यक्तियों में ' यह द्रव्य है ' इस प्रकार का व्यवहार होता है, उन सभी द्रव्यों में कोई सादृश्य अवश्य ही होना चाहिये, इस सादृश्य के लिये संयोग और विभाग नाम के गुण को आचार्यों ने उपस्थित किया है । संयोग सभी द्रव्यों में समान रूप से रहनेवाला गुण है और विभाग भी अतः सभी द्रव्य संयोग या विभाग के समवायिकारण हैं । संयोग और विभाग का समवायिकारण होना या समवायि-कारणत्व नाम का धर्म ही द्रव्यत्वजाति का ज्ञापक है । संयोग और विभाग का यह समवायिकारणत्व गुणादि पदार्थों में नहीं है, अतः गुणादि पदार्थ संयोग और विभाग के समवायिकारण नहीं है, अतः उनमें द्रव्यत्व नहीं है । इसी प्रकार गुणत्वादि सभी पदार्थ-विभाजकथमों में समझना चाहिए । For Private And Personal