प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 211–220

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 211–220

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir १३६ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ द्रव्ये सृष्टिसंहार-साध्यमाने पृथिव्यादिनिर्माणसामर्थ्यलक्षणोऽपि विशेषः सिद्धयत्येव, निर्विशेषस्य सामान्यस्य सिद्ध्यभावात् । ननु मा सिद्धयतु सामान्यमिति चेन्न कार्य्यत्वेन सह तद्व्याप्तेरप्रतिक्षेपत्वात् । यदि हि व्याप्तमपि न सिद्ध्यति, धूमादप्यग्नि-सामान्यं न सिद्धयेत्, अग्निविशेषस्यानन्वितस्यासिद्धेः, निर्विशेषस्थानवस्थानात् । अथेदमुच्यते-- द्वयमनुमानस्य स्वरूपं व्याप्तिः पक्षधर्म्मता च, तत्र व्याप्ति-सामर्थ्यात् सामान्यं सिद्धयति, पक्षधर्म्मताबलेन चाभिप्रेतो विशेषः पर्वताद्यवच्छिन्न-वह्निलक्षणात्मा सिद्धयति । अन्यथा पक्षधर्म्मताया: क्वोपयोगः क्व चानुमानस्य गृहीतग्राहिणः प्रामाण्यम्? एवञ्चेत्, ईश्वरानुमानेऽपि तुल्यम्, अन्यत्राभि-निवेशात् । अथ मतम्, सिद्धयत्यनुमाने विशेषोऽपि यत्र प्रमाणविरोधो नास्ति । तथा हि-- धूमात् पर्वतनितम्बवृत्तिर्वाह्न विशेषसिद्धौ का नामानुपपत्तिः? दृष्टो हि देशकालादिभेदः स्वलक्षणानाम् । ईश्वरानुमाने तु विशेषो न सिद्ध्यति, प्रमाणविरो-धात् । तथा हि-- नात्र शरीरपूर्वकत्वं साधनीयम्, शरीरे सत्यवश्यमिन्द्रियप्राप्ता-वतीन्द्रियोपादानोपकरणादिकारकशक्तिपरिज्ञानासम्भवे सति कर्तृत्वासम्भवात् । जाने पर पृथिव्यादि में उनके निर्माण में समर्थ कर्तृ जन्यत्वरूप विशेष की सिद्धि स्वत: हो जाएगी, क्योंकि विशेषों से रहित सामान्य की सिद्धि सम्भव नहीं है । ( प्र ० ) सामान्य की भी सिद्धि न हो? ( उ ० ) नहीं, क्योंकि कार्यत्व में कर्तृ जन्यत्व की व्याप्ति है, इसमें कोई गड़बड़ नहीं है । अगर व्याप्ति के रहने पर भी सामान्य की सिद्धि न हो तो फिर धूम से वह्नि सामान्य की भी सिद्धि नहीं होगी । अगर यह कहें कि अनुमान के दो रूप हैं— व्याप्ति और पक्षधर्मता । इनमें व्याप्ति के बल से सामान्य की सिद्धि होती हे और पक्षधर्मता के बल से विशेष की सिद्धि होती है । अगर पक्षधर्मता से विशेष का नियमन न हो तो उसका उपयोग ही क्या है? एवं ज्ञात-ज्ञापक हो जाने के कारण अनुमान में प्रामाण्य ही कैसे हो? ( उ ० ) अगर यह न्याय है तो फिर ईश्वरानुमान में भी यही न्याय है, अगर आपका कोई विशेष आग्रह न हो । अनुमान से विशेषों की सिद्धि वहीं होती है, जहाँ उसके विरुद्ध कोई प्रमाण उपस्थित नहीं रहता । जैसे कि पर्वत के मूल में वह्निविशेष की सिद्धि होती है । देश और काल के भेद से विशेषों का असाधारण्य प्रत्यक्ष से सिद्ध हैं । इसमें कौनसी अनुपपत्ति है? किन्तु उक्त अनुमान से पृथिव्यादि के निर्माण में समर्थ कर्ता की सिद्धि का तो विरोधी प्रमाण है, क्योंकि इससे पृथिव्यादि महाभूतों के शरीरी कर्ता की सिद्धि तो आपको इष्ट नहीं है, क्योंकि इससे ईश्वर का शरीर एवं उनकी इन्द्रियाँ माननी पड़ेगी और इन सबों से सब गुड़ गोबर हो जाएगा, क्योंकि इन्द्रियादि से युक्त कर्ता में महाभूतों के अतीन्द्रिय परमाणु रूप उपादानों में कार्योत्पादन शक्ति का ज्ञान सम्भव For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra प्रकरणम् ] १५ www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir भाषावादसहितम् १३७ For Private And Personal अशरीरपूर्वकत्वञ्चाशक्यसाधनम्, सर्वोऽपि कर्त्ता कारकस्वरूपमवधारयति, तत इच्छतीदमहमनेन निर्वर्त्तयामीति, ततः प्रयतते तदनु कायं व्यापारयति, ततः कारणान्यधितिष्ठति, ततः करोति, अनवधारयन्ननिच्छन्नप्रयतमानः कायम -व्यापारयन् न करोतीत्यन्वयव्यतिरेकाभ्यां बुद्धिवच्छरीरमपि कार्योत्पत्तावु -पायभूतम् । निखिलोपाधिग्रहणे व्याप्तिग्राहकप्रमाणादेवावधारितं न शक्यते प्रातुं वह्नेरिवेन्धनविकारसामर्थ्यं धूमानुमाने, तत्परित्यागे च बुद्धिरपि परि-त्यज्यताम् । प्रभावातिशयादशरीरवदबुद्धिमानेवायमीश्वरः करिष्यति । उपादा-नोपकरणादिस्वरूपानभिज्ञो न शक्नोतीति चेत्? कुत एतत्? तथानुपलम्भा-दिति चेत्? फलितं ममापि मनोरथद्रुमेण, न तथा यावदिच्छा प्रयत्नव्यवहिता कार्य्योत्पत्तावुपयुज्यते यथेदमव्यवहितव्यापारं शरीरम् । नहीं है, एवं उसके बिना कर्तृत्व ही असम्भव है । यह सिद्ध करना तो बिलकुल ही असम्भव है कि ये महाभूत उन कर्ता से उत्पन्न होते हैं जिनके शरीर नहीं हैं । क्योंकि कर्ताओं का यह स्वभाव है कि वे पहिले उपादानों के स्वरूप को जानते हैं । फिर यह इच्छा होती है कि इन उपादानों से अमुक कार्य को उत्पन्न करें । इसके बाद वे तदनुकूल प्रयत्न करते हैं । फिर अपने शरीर को उस कार्य के अनुसार संचालित करते हैं । इन सबों के बाद कार्य के उपकरणों को यथावत् परिचालित कर कार्य को उत्पन्न करते हैं । बिना उपादान निश्चय के, उस कार्य की इच्छा न रखते हुए, उस कार्य विषयक प्रयत्न के बिना ही, शरीर को हिलाये डुलाये बिना कोई भी कर्ता किसी भी कार्य को उत्पन्न नहीं कर सकता । इस अन्वय और व्यतिरेक से बुद्धि की तरह शरीर में भी कारणता सिद्ध | व्याप्ति की प्रतिबन्धक उपाधियों की खोज के बाद भी जिस हेतु में जिस साध्य की व्याप्ति गृहीत होती है, उस हेतु से साध्य के ज्ञान को कोई रोक नहीं सकता है । जैसे कि आद्रेन्धन प्रभव वह्निरूप उपाधि से युक्त होने के कारण धूम की सिद्धि नहीं होती हैं । इस प्रकार शरीर में सिद्ध कारणत्व का भी अगर परित्याग करे तो बुद्धि को भी छोड़िए । ईश्वर अगर अतिशय प्रभाव के कारण बिना शरीर के भी महाभूतों को उत्पन्न कर सकते हैं तो फिर बिना बुद्धि के भी उन कार्यों का सम्पादन कर सकते हैं । ( I ० ) उपादान एवं और कारणों से अनभिज्ञ कर्ता से किसी कार्य का उत्पादन सम्भव नहीं है, अतः बुद्धि को भी कार्यों का कारण मानते है ) | ( उ ० ) यह आपने कैसे समझा? ( प्र ० ) स्थूल घटादि कार्यों में यह देखा जाता है कि वे उपादानादि कारणों के ज्ञान से युक्त कर्ता से ही उत्पन्न होते हैं । ( उ ० ) तो फिर हमारे मनोरथ के वृक्ष भी फल गये, क्योंकि जिस प्रकार किसी विषय की इच्छा रहने पर भी अगर उस विषय का प्रयत्न नहीं रहता हैं तो कार्य

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir १३८ न्यायकन्दली संवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ द्रव्ये सृष्टिसंहार-एवं तहिं का गतिरत्र बुद्धिमत्कर्तृ पूर्वकत्वसामान्यस्य? अगतिरेव, उभ-योरपि शरीरित्वाशरीरित्वविशेषयोरनुपपत्तेः, निर्विशेषस्य सामान्यस्य सिद्धयभा-वात् । किमनुमानस्य दूषणम्? न किञ्चित्, पुरुष एवायं विशेषाभावाच्छशवि-षाणायमाने साधनानहं सामान्ये साधनं प्रयुञ्जानो निगृह्यते, यथा कश्चिन्निशितं कृपाणमच्छेद्यमाकाशं प्रति व्यापारयन् । अथानुमानदूषणं विना न तुष्यति भवान्, तदिदमशरीरिपूर्वकत्वानुमानं व्याप्तिग्राहकप्रमाणबाधितत्वात् कालात्य-यापदिष्टम्, व्याप्तिबलेन चाभिप्रेतमशरीरित्वविशेषं विरुन्धद् विशेषविरुद्धम्, ततश्च विरुद्धावान्तरविशेष एवेति पूर्वपक्षसङ्क्षेपः । अत्र प्रतिसमाधिः- किं शरीरित्वमेव कर्तृत्वमुत परिदृष्टसामर्थ्यंकारक-प्रयोजकत्वम्? न तावच्छरीरित्वमेव कर्तृत्वम्, सुषुप्तस्योदासीनस्य च कर्तृत्व-नहीं होता है, उसी प्रकार शरीरव्यापार के बिना केवल प्रयत्न से भी कार्य नहीं होता । ( प्र ० ) कथित अनुमान से पृथिव्यादि महाभूतों में सिद्ध बुद्धिविशिष्टकर्तृ-जन्यत्व की क्या गति होगी? ( उ ० ) कोई भी गति नहीं, ( क्योंकि बुद्धिमत्कर्तृ -जन्यत्वरूप ) सामान्य के विशेषभूत शारीरिकर्तृ जन्यत्व और अशरीरिकर्तृ जन्यत्व इन दोनों में से किसी भी विशेष की सिद्धि नहीं होगी । एवं विशेषों से शून्य सामान्य की सिद्धि भी सम्भव नहीं है । ( प्र ० ) उस सामान्य विषयक अनुमान में दोष क्या है? ( उ ० ) कोई भी दोष नहीं है, चूँकि विशेषों में से किसी की भी सिद्धि नहीं है, अतः आकाशकुसुमप्रतिम ईश्वर ही साधन के आयोग्य है । अतः अनुमान के द्वारा ईश्वर का साधन करनेवाला पुरुष उसी प्रकार विफल होगा, जैसे कि किसी भी प्रकार से न खण्डित होनेवाले आकाश की तरफ कृपाण को उछालनेवाला व्यक्ति विफल हो जाता है । अगर आपको बिना हेत्वाभासों के सुने सन्तोष न हो तो फिर उन्हें भी सुनिये | अशरीरिकर्तृ ' जन्यत्व में फलित उक्त अनुमान व्याप्तिग्राहक प्रमाणों से बाधित होने के कारण ' कालात्ययापदिष्ट ' नाम के हेत्वाभास से दूषित है । एवं व्याप्ति के बल से हो अशरीरिकर्तृ जन्त्वरूप विशेष की सिद्धि हो सकती है, किन्तु ' कर्ता शरीरयुक्त ही होता हैं ' विशेष प्रकार की इस व्याप्ति से भी उक्त अनुमान दूषित होता है, जो वस्तुतः विरुद्ध नाम से प्रसिद्ध हेत्वाभास का ही प्रभेद है । इतना हो उक्त ईश्वरानुमान के विषय में आक्षेप करनेवाले पूर्वपक्षियों का आशय है । ( उ ० ) अब हमें इन सब आक्षेपों के समाधान में यह पूछना है कि शरीर का सम्बन्ध ही कर्तृत्व है? या जिन कारणों में कार्य करने का सामर्थ्य ज्ञांत For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली १२६ प्रसङ्गात्, किन्तु परिदृष्टसामर्थ्य कारक प्रयोजकत्वम्, तस्मिन् सति कार्य्योत्पत्तेः । तच्चाशरीरस्यापि निर्वहति यथा स्वशरीरप्रेरणायामात्मनः । अस्ति तत्राप्यस्य स्वकर्मोपार्जितं तदेव शरीरमिति चेत्? सत्यमस्ति परं प्रेरणोपायो न भवति, स्वात्मनि क्रियाविरोधात् । प्रेय्यतयाऽस्तीति चेत्? ईश्वरस्यापि प्रेय्र्यः परमाणु-रस्ति । ननु स्वशरीरे प्रेरणाया इच्छाप्रयत्नाभ्यामुत्पत्तेरिच्छा प्रयत्नयोश्च सति शरीरे भावादसत्यभावाद् अस्ति तस्य स्वप्रेरणायामिच्छा प्रयत्नजनन-द्वारेणोपायत्वमिति चेन्न तस्येच्छाप्रयत्नयोरुपजननं प्रत्येव कारकत्वात्, लब्धा-त्मकयोरिच्छा प्रयत्नयोः प्रेरणाकरणकाले तु तदनुपायभूतमेव शरीरं कर्मत्वा-दिति व्यभिचार:, अनपेक्षितशरीरव्यापारस्येच्छा प्रयत्नमात्रसचिवस्यैव चेतनस्य कदाचिदचेतनव्यापारं प्रति सामर्थ्यदर्शनात्, बुद्धिमदव्यभिचारि तु कार्यत्व-मितीश्वरसिद्धिः । इच्छा प्रयत्नोत्पत्तावपि शरीरमपेक्षणीयमिति चेत्? अपेक्षतां हो गया है, उन्हें उचित रूप से परिचालित करना ही कर्तृत्व है? अगर शरीर सम्बन्ध कोही कर्तृत्व मानें तो फिर सोये हुए व्यक्ति में एवं कार्यों से उदासीन व्यक्ति में भी कर्तृत्व मानना पड़ेगा । अतः उक्त प्रकार के कारणों को परिचालित करना ही कर्तृत्व है, क्योंकि उचित रूप से उन्हें परिचालित होने पर ही कार्य की उत्पत्ति होती है । यह दूसरे प्रकार का कर्तृत्व शरीर सम्बन्ध के बिना भी सम्भव है, जैसे कि अपने शरीर के लिए जीव का । ( II ) यहाँ भी अपने पूर्व कर्मों से उपार्जित उसी शरीर का सम्बन्ध जीव को अपने शरीर को प्रेरित करने में सहायक है? ( उ ० ) यह ठीक है कि जीव में शरीर का सम्बन्ध है, किन्तु अपने शरीर की क्रिया से अपने शरीर में प्रेरणा नही हो सकती । ( प्र ० ) फिर भी यहाँ प्रेरणा का आश्रय तो है? ( उ ० ) ईश्वर की प्रेरणा के लिए भी परमाणु रूप आश्रय तो ही । ( प्र ० ) इच्छा और प्रयत्न से अपने शरीर में प्रेरणा उत्पन्न होती है । इन दोनों में भी शरीर अपेक्षित है ही । इस प्रकार अपने शरीर की प्रेरणा में भी अपने शरीर की अपेक्षा होती है । ( उ ० ) शरीर केवल इच्छा और प्रयत्न का ही कारण है, अपने कारणों से उत्पन्न इच्छा एवं प्रयत्न इन दोनों से प्रेरणा की उत्पत्ति होती है । प्रेरणा में शरीर कारण नहीं है, क्योंकि शरीर प्रेरणा रूप क्रिया का कर्म है । इस प्रकार यह नियम हो गलत हो जाता है कि कर्तृत्व शरीर युक्त द्रव्यों में ही रहता है, क्योंकि शरीरव्यापार की अपेक्षा न रखते हुए भी केवल इच्छा और प्रयत्न की सहायता से ही चेतन में जड़ वस्तुओं को व्यावृत करने का सामर्थ्य कहीं कहीं देखा जाता है । कार्यत्व और बुद्धिमत्कर्तृ जन्यत्व दोनों अव्यभिचारी हैं, अतः उक्त अनुमान से ईश्वर की सिद्धि होती है । ( प्र ० ) ( महाभूतादि सृष्टि के प्रयोजक For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra II-आगे इन्हीं का विस्तार है । www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir [ द्रव्ये सृष्टिसंहार-न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली केवल परमाणु ही पृथिव्यादि महाभूतों की उपार्जित इन्द्रियों के अधीन है, ज्ञान जीवों में सम्भव नहीं है । है ही । ( ३० ) तो For Private And Personal यत्र तयोरागन्तुकत्वम्, यत्र पुनरिमौ स्वाभाविकावासाते तत्रास्यापेक्षणं व्यर्थम् । न च बुद्धीच्छा प्रयत्नानां नित्यत्वे कश्चिद् विरोधः । दृष्टा हि रूपादीनां गुणाना-माश्रयभेदेन द्वयी गतिः - नित्यतानित्यता च । तथा बुद्ध्यादीनामपि भविष्य-तीति । सेयमीश्वरवादे वादिप्रतिवादिनोः पराकाष्ठा । अतः परं प्रपञ्चः । आत्माधिष्ठिताः परमाणवः प्रवत्तिष्यन्त इति चेन्न, तेषां स्वकम्मोंपा जितेन्द्रिय-गणाधीन संविदां शरीरोत्पत्तेः ( विना ) सर्वविषयावबोधविरहात् । अस्त्यात्मनामपि सर्वविषयव्यापि सहजचैतन्यमिति चेन्न, सहजं शरीरसम्बन्धभाजां तत् केन विप्लुतं येनेदं सर्वत्रापूर्ववदवभासयति । शरीरावरणतिरोधानात् तदात्मन्येव समाधीयते, न बहिर्मुखं भवतीति चेत्? व्यापकत्वेन तस्य विषयसम्बन्धानुच्छेदेन नित्यत्वेन च विषयप्रकाशस्वभावस्यानिवृत्तौ का तिरोधानवाचोयुक्तिः? वृत्तिप्रतिबन्ध-चैतन्यतिरोधानमिति चेत्? कथं तहि शरीरिणां विषयग्रहणम्? क्वचिदस्य ईश्वरीय ) इच्छा और प्रयत्न के लिए भी शरीर की आवश्यकता होगी? ( उ ० ) इच्छा और प्रयत्न जहाँ आगन्तुक गुण हैं, वहाँ शरीर की आवश्यकता भले ही हो, जहाँ ये दोनों स्वाभाविक गुण हैं, वहाँ शरीर की अपेक्षा व्यर्थ है । बुद्धि, इच्छा और प्रयत्न इन सबों का नित्यत्व भी युक्ति विरुद्ध नहीं है, क्योंकि आश्रय के भेद से रूपादि गुणों की नित्यत्व और अनित्यत्व दोनों प्रकार की गति देखी जाती है | अतः बुद्धयादि भी जीव और ईश्वर रूप आश्रयों के भेद से नित्य और अनित्य दोनों प्रकार के होंगे । ईश्वर को माननेवाले और न माननेवाले दोनों की इतनी ही युक्तियाँ हैं, ( प्र ० ) जीवों की अध्यक्षता में सृष्टि करेंगे? ( उ ० ) उनका ज्ञान अपने कर्मों से अतः महाभूतों की सृष्टि में अपेक्षित सभी विषयों का ( प्र ० ) जीवों में भी सभी विषयों में व्याप्त चैतन्य की सत्ता तो फिर शरीर से युक्त जीवों में उस सहज चैतन्य का विघटन कौनकर देता हैं? जिससे कि सभी विषयों को विना देखी हुई वस्तुओं की तरह देखता है । ( प्र ० ) शरीर रूप आवरण के कारण वह सर्वविषयक सहज चैतन्य जीवों में तिरोहित रहता है, केवल प्रकाशित मात्र नहीं होता है । ( उ ० ) जीव भी व्यापक है, अतः विषयों के साथ सर्वदा उसका सम्बन्ध रहेगा । जीव नित्य है, अतः विषयों को प्रकाशित करनेवाला स्वभाव भी उसमें बराबर रहेगा । फिर तत्स्वरूप सहज चैतन्य के तिरोभाव में क्या युक्ति है? ( प्र ० ) कार्य को उत्पन्न करने की शक्ति का नाश ही उसका तिरोभाव है? ( उ ० ) फिर जीवों को विषयों का ज्ञान कैसे होता है? ( प्र ० ) कहीं उसकी वृत्तियाँ निरुद्ध नहीं भी होती हैं? ( उ ० ) ( कहीं वह शक्ति उद्बुद्ध रहती है एवं कहीं तिरोहित ), इस

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली II वृत्तयो न निरुध्यन्त इति चेत्? कुतोऽयं विशेष:? इन्द्रियप्रत्यासत्तिविशे-षाद् यद्येवम्, इन्द्रियाधीनश्चैतन्यस्य विषयेषु वृत्तिलाभो न सन्निधिमात्रनिबन्धनः, सत्यपि व्यापकत्वे सर्वार्थेषु वृत्त्यभावादिन्द्रियवैयर्थ्यप्रसङ्गाच्च ( इति ) साधू-क्तमशरीरिणामात्मनां न विषयावबोध इति । तथा चैके वदन्ति - “ रावि खानि व्यतृणत् स्वयम्भूस्तस्मात् पराङ् पश्यति नान्तरात्मन् ” इति । अनवबोधे च तेषां नाधिष्ठातार इति तेभ्यः परः सर्वार्थदशसहजज्ञानमयः कर्त्तृस्वभावः को s प्यधिष्ठाता कल्पनीयः, चेतनमधिष्ठातारमन्तरेणाचेतनानां प्रवृत्त्यभावात् । स किमेको s नेको वा? एक इति वदामः । बहूनामसर्वज्ञत्वेऽस्मदादिवद-सामर्थ्यात्, सर्वज्ञत्वे त्वेकस्यैव सामर्थ्यादपरेषामनुपयोगात् । न च समप्रधानानां भूयसां सर्वदैकमत्ये हेतुरस्तीति कदाचिदनुत्पत्तिरपि कार्य्यस्य स्यात्, एकाभि-प्रायानुरोधेन सर्वेषां प्रवृत्तावेकस्येश्वरत्वं नापरेषाम्, मठपरिषदामिव कार्य्यो-विशेष में क्या युक्ति है? अगर इन्द्रिय सन्बन्ध रूप विशेष से ऐसा होता है? ( उ ० ) तो फिर विषय केवल जीवों के समीप रहने के कारण ही उसके सहज चैतन्य के द्वारा प्रतिभासित नहीं होते, क्योंकि व्यापक होने पर भी जीवों को सभी विषयों का ज्ञान नहीं होता है! अगर जीवों में इन्द्रियों से निरपेक्ष भी ज्ञान की सत्ता रहे तो फिर इन्द्रियों की रचना ही व्यर्थ हो जाएगी, अतः मैंने पहिले जो कहा है कि ' जीवों को बिना शरीर के विषयों का ज्ञान नहीं होता है ' वह ठीक है । ' पराञ्चि खानि ' इत्यादि श्रुतियों का अवलम्बन करते हुए कोई कहते हैं कि सभी विषयों का ज्ञान जीवों को नहीं है । सभी विषयों के ज्ञान के बिना सृष्टि जैसा कार्यं सम्भव नहीं है । सृष्टि रचना के लिए जीवों से भिन्न सहजज्ञान से युक्त कर्तृत्वस्वभाववाले किसी अधिष्ठाता की कल्पना करनी होगी, क्योंकि जड़ वस्तुओं की प्रवृत्ति चेतन अधिष्ठाता के बिना सम्भव ही नहीं है, अतः ईश्वररूप अधिष्ठाता अवश्य है । किन्तु वह एक हैं या अनेक? इस प्रसङ्ग में हम लोगों का कहना है कि वह एक ही है, क्योंकि अगर ईश्वर अनेक हों एवं सर्वज्ञ हों तो फिर हमलोगों की तरह ही सृष्टिकार्य में असमर्थ होंगे । अगर ईश्वर को अनेक मानकर सभी को सर्वज्ञ मानें, तो फिर एक ही ईश्वर के सामर्थ्य से सृष्टि कार्य की उत्पत्ति हो जाएगी, अन्य सभी ईश्वरों के सामर्थ्यं व्यर्थ जाएँगे । एवं एक ही प्रकार के प्राधान्य से युक्त अनेक व्यक्तियों में सर्वदा ऐकमत्य भी नहीं रहता है । अगर एक ही ईश्वर के अभिप्राय से अन्य ईश्वरों की For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir १४२ न्यायकन्दली संवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ ब्रष्ये सृष्टिसंहार-न्यायकन्दली त्पत्त्यनुरोधेन सर्वेषामविरोधे प्रत्येकमनीश्वरत्वम् । तदेवं कार्य्यविशेषेण सिद्धस्य कर्तृ विशेषस्य सर्वज्ञत्वान्न कुत्रचिद् वस्तुनि विशेषानुपलम्भः । अतो न तन्निबन्धनं मिथ्याज्ञानम्, मिथ्याज्ञानाभावे च न तन्मूलौ रागद्वेषौ तयोरभावान्न तत्पूर्विका प्रवृत्तिः प्रवृत्त्यभावे च न तत्साध्यौ धर्माधम्मौ, तयोरभावात् तज्जयोरपि सुखदुःखयोरभावः, सर्वदेव सद्भावात् स्मृतिसंस्कारावपि नासाते चानुभव इत्यष्टगुणाधिकरणो भगवानीश्वर इति केचित् । अन्ये तु बुद्धिरेव तस्या-व्याहता क्रियाशक्तिरित्येवं वदन्त इच्छाप्रयत्नावप्यनङ्गीकुर्वाणाः षड्गुणाधि-करणोऽयमित्याहुः । स कि बद्धो मुक्तो वा? न तावद् बद्धः, बन्धनसमाज्ञातस्य बन्धहेतोः क्लेशादेरसम्भवात् । मुक्तोऽपि न भवति, बन्धविच्छेदपर्यायत्वा-मुक्तेः । नित्यमुक्तस्तु स्यात्, यदाह तत्रभवान् पतञ्जलि: - " क्लेशकर्म्मविपाका-शयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः " इति । भी प्रवृत्ति मानें तो फिर वही ईश्वरपद के मुख्यार्थ होंगे, और बाकी सर्वज्ञ ईश्वर न कहला सकेंगे । अगर कार्यसम्पादन के अनुरोध से अन्य विषयों में मतभेद रहते हुए भी मठ की परिषद् के सभासदों की तरह सृष्टिरूप एक कार्य में सभा ईश्वरों का एक मत मानें तो फिर प्रत्येक ईश्वर में अनीश्वरता की आपत्ति होगी । तस्मात् अन्य सभी कार्यों से विलक्षण कार्य द्वारा सिद्ध अन्य सभी कर्ताओं से विशिष्ट सृष्टिरूप कार्य का ईश्वररूप कर्ता एक ही है । चूंकि सर्वज्ञ हैं, किसी भी विषय का कोई भी विशेष उनको अज्ञात नहीं है, अतः विषयों के विशेष के अज्ञान से उत्पन्न होने-वाला मिथ्याज्ञान भी उनमें नहीं है । सुतरां मिथ्याज्ञानमूलक राग और द्वेष भी उनमें नहीं है । इसी हेतु से राग और द्वेष से होनेवाली प्रवृत्तियाँ भी उनमें नहीं हैं । फिर प्रवृत्ति, धर्म और अधर्म की उनमें सत्ता कैसी? धर्म और अधर्म के न रहने से उनमें सुख एवं दुःख भी नहीं है । सर्वदा सभी विषयों के अनुभव के ही रहने के कारण उनमें स्मृति और संस्कार भी नहीं हैं । इस प्रकार किसी का मत है कि भगवान् परमेश्वर संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, विभाग. ज्ञान, इच्छा और प्रयत्न इन आठ गुणों से युक्त हैं । किसी विषय में व्याहत न होनेवाला ज्ञान ही उनकी क्रियाशक्ति है । इस प्रकार उनमें इच्छा और प्रयत्न को भी अस्वीकार करते हुए कोई उन्हें छः गुणों काही आधार मानते हैं । वे बद्ध हैं या मुक्त? बद्ध तो वे नहीं हैं, क्योंकि बन्धन के कारण क्लेशकर्मादि उनमें नहीं हैं । वे मुक्त भी नहीं हो सकते, क्योंकि ' मुक्ति ' और ' बन्धविच्छेद ' दोनों शब्द पर्यायवाची हैं । नित्यमुक्त वे हो सकते हैं, जैसा कि भगवान् पतञ्जलि ने ' क्लेशकर्म्मविपाकाशयैः ' इत्यादि सूत्र से है । कहा For Private And Personal

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प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 218 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् १४३ आकाशकालदिशामेकैकत्वादपरजात्यभावे संज्ञा भवन्ति, आकाशः कालो दिगिति । पारिभाषिक्यस्तिस्रः तत्राकाशस्य गुणाः शब्दसङ्ख्यापरिमाणपृथक्त्वसंयोगविभागाः । आकाश, काल और दिक् इन तीनों में से प्रत्येक एक एक ही है, अतः उनमें से किसी में ( द्रव्यत्व से भिन्न द्रव्यत्व व्याप्य और कोई ) भी अपर जाति नहीं है । तस्मात् आकाश, काल और दिक् नाम की उन तीनों की तीन पारिभाषिक संज्ञायें हैं । इनमें आकाश के शब्द, संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग और विभाग ये छ: गुण हैं । न्यायकन्दली आकाशादीनां त्रयाणां सङ्क्षेपार्थमेकेन ग्रन्थेन वैधम्र्म्यं कथयति -आकाशकालदिशामिति । आकाशस्य कालस्य दिशश्चैकैकत्वादपरजातिर्नास्ति, तस्या व्यक्तिभेदाधिष्ठानत्वात् । अपरजात्यभावे चाकाश इति काल इति दिगिति तिस्रः संज्ञा: पारिभाषिक्यो न पृथिव्यादिसंज्ञावदपरजातिनैमित्तिक्य इत्यर्थः । संज्ञेषामितरवैधर्म्यं यस्याः संज्ञाया विना निमित्तेन शृङ्गग्राहिकया सङ्केतः सा पारिभाषिकी, यथायं देवदत्त इति । यस्याः पुनर्नमित्तमुपादाय सङ्केतः सा नैमित्तिकोति विवेकः । सम्प्रति प्रत्येकं निरूपणार्थमाह - तत्राकाशस्य गुणा इति । तेषां त्रयाणां थोड़े शब्दों में ही आकाशादि तीनों द्रव्यों का लक्षण कहने के अभिप्राय से ' आकाशकालदिशाम् ' इत्यादि एक ही वाक्य से उन सभी के असाधारण धर्म कहे गये हैं । अभिप्राय यह है कि जातियों की कल्पना आश्रयों की विभिन्नता से ही की जाती है, आकाशादि चूँकि एक एक ही हैं, अतः अपर जातियाँ उनमें न रहने के कारण आकाश, काल और दिक् ये तीनों संज्ञायें पारिभाषिकी हैं । अर्थात् पृथिवीत्वादि अपर जातियों की निमित्तमूलक पृथिव्यादि संज्ञाओं की तरह आकाशादि नैमित्तिक संज्ञायें नहीं हैं । इन तीनों की ये पारिभाषिक संज्ञायें ही औरों को अपेक्षा इनका वैधर्म्य । जैसे कि शाम को गोष्ठ के सामने इकठ्ठी हुई गायों में से उनका रक्षक अपनी इच्छा के अनुसार किसी एक को पकड़ कर अन्दर कर देता है, उसी प्रकार जो संज्ञा किसी निमित्त विशेष की अपेक्षा न करके किसी व्यक्तिविशेष का बोध करा देती है, वही पारिभाषिकी संज्ञा है, जैसे कि देवदत्तादि संज्ञाएँ । जो संज्ञा किसी निमित्तमूलक सङ्केत से स्वार्थ विषयक बोध का उत्पादन करती है, उसे नैमित्तिकी संज्ञा कहते हैं । यही इन दोनों संज्ञाओं में अन्तर है । अब इन तीनों में से प्रत्येक का निरूपण करने के लिए ' तत्राकाशस्य गुणाः ' इत्यादि वाक्य लिखते हैं । अर्थात् इन तीनों में से आकाश में शब्द, संख्या, परिमाण, For Private And Personal

पृष्ठ 219

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir १४४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ द्रव्ये आकाश-शब्दः प्रत्यक्षत्वे सत्य कारणगुणपूर्वकत्वादयावद्द्रव्यभावि त्वादाश्रयादन्यत्रोपलब्धेश्च न स्पर्शवद् विशेषगुणः । बाह्येन्द्रिय प्रत्यक्षत्वा-दात्मान्तरग्राह्यत्वादात्मन्यसमवायादहङ्कारेण विभक्तग्रहणाच्च नात्म-गुणः । श्रोत्रग्राह्यत्वाद् वैशेषिकगुणभावाच्च न दिक्कालमनसाम् । शब्द स्पर्श से युक्त द्रव्यों का गुण नहीं है, क्योंकि वह प्रत्यक्ष का विषय होने पर भी अपने समवायिकारण के गुण से उत्पन्न नहीं होता है, एवं अपने समवायिकारण के अन्तिम समय तक वह नहीं रहता है, एवं अपने आश्रय ( स्पर्शवत् शङ्खादि द्रव्यों ) से अन्यत्र श्रोत्र में उनकी उपलब्धि होती है । शब्द आत्मा का भी गुण नहीं है, क्योंकि उसका प्रत्यक्ष बाह्य इन्द्रिय से होता है । एवं एक ही शब्द विभिन्न आत्माओं से गृहीत होता है । एवं शब्द का समवाय आत्मा में नहीं है । एवं अहङ्कार के साथ ( ' अहं जानामि ' इत्यादि प्रतीतियों में ज्ञान की तरह ) शब्द की प्रतीति नहीं होती है । शब्द दिक्, काल और मन का भी गुण नहीं है, क्योंकि वह विशेष गुण है । इस प्रकार चूँकि शब्द गुण है, अतः न्यायकन्दली मध्ये आकाशस्य गुणाः शब्दसङ्ख्यापरिमाणपृथक्त्वसंयोगविभागाः । शब्दादिगुण-योगोऽप्याकाशस्य वैधर्म्यम् । नन्वाकाशस्य सद्भावे किं प्रमाणम्? प्रत्यक्षमेव वियति पतति पतत्त्रिणि चक्षुर्व्यापारेणेहायं पक्षी प्राप्तो नेहेति नियतदेशाधिकरणा प्रतीतिरिति चेत्, तदयुक्तम्, अरूपस्य द्रव्यस्य चाक्षुषत्वाभावात् । योऽप्ययमधिकरणप्रत्ययस्तत्र विततालोकमण्डलव्यतिरेकेण न द्रव्यान्तरं प्रतिभाति, अत आकाशस्य सद्भावे परिशेषानुमानमुपन्यस्यञ्छब्दस्य द्रव्यान्तरगुणत्वं निषेधति - शब्द इति । --संयोग और विभाग ये छः गुण हैं । फलतः शब्द प्रभृति इन छः गुणों का सम्बन्ध भी आकाश का वैधर्म्य है । ( प्र ० ) आकाश की सत्ता में ही क्या प्रमाण है? कोई कहते हैं कि प्रत्यक्ष ही इसमें प्रमाण है, क्योंकि आकाश में चिड़ियों के उड़ने के समय चक्षु के व्यापार से इस प्रदेश में पक्षी हैं, उस प्रदेश में नहीं इस प्रकार किसी नियमित अधिकरण में पक्षियों की प्रतीति होती है, किन्तु यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि बिना रूप के द्रव्य आखों से नहीं देखे जाते । उक्त प्रतीति में जो अधिकरणता भासित होती है, उसके सम्बन्ध में अगत्या यही मानना पड़ेगा कि आकाश में फैला हुआ प्रकाश-पुञ्ज ही अधिकरणतया भासित होता है, अत: उसकी सत्ता में परिशेषानुमान का For Private And Personal

पृष्ठ 220

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra प्रकरणम् ] १६ www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir भाषानुवादसहितम् १४५ प्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली For Private And Personal परिशेषाद् गुणो भूत्वा आकाशस्याधिगमे लिङ्गम् । उक्त परिशेषानुमान के द्वारा आकाश के ज्ञान का हेतु है । स्वाश्रयस्य यत्समवायिकारणं तद्गुणपूर्वः शब्दो न भवति, पटरूपादिवदाश्रयो-त्पत्त्यनन्तरमनुत्पादात् । अतः सुखादिवत् स्पर्शवतो विशेषगुणो न भवति । विशेष-गुणत्वप्रतिषेधे सामान्यगुणत्वं भविष्यतीति नाशङ्कनीयम्, सामान्यविशेषवतस्तस्य बाह्येन्द्रियग्राह्यत्वेन रूपादिवद्विशेषगुणत्वसिद्धेः । पार्थिवपरमाणुरूपादयः स्पर्श-द्विशेषगुणा अथ चाकारणगुणपूर्वकाः परमाणोरकार्य्यत्वात् तद्वयवच्छेदार्थं प्रत्यक्षत्वे सतीति कृतम् । यावद्द्रव्यं शब्दो न भवति सत्येवाश्रये शङ्खादौ तस्य विनाशात्, अतोऽपि सुखादिवत् स्पर्शवद्विशेषगुणो न भवति । तत्रापि पार्थिव -परमाणुरूपादिभिरेव व्यभिचार:, तेषां सत्येवाश्रये परमाणावग्निसंयोगेन विना-प्रदर्शन करने के बाद ' शब्दः प्रत्यक्षत्वे सति ' इत्यादि से प्रतिपादन करते हैं कि शब्द आका-शादि से भिन्न पृथिव्यादि का गुण नहीं है । जिस प्रकार पट का रूप अपने समवायि-कारण पट के आश्रयीभूत तन्तुओं के रूप से उत्पन्न होता है, क्योंकि पट के उत्पन्न होने के बाद ही वह उत्पन्न होता है, उसी प्रकार से शब्द अपने समवायिकारण के आश्रयी-भूत द्रव्यगत गब्द से उत्पन्न नहीं होता है, क्योंकि आश्रय की उत्पत्ति के बाद उसकी उत्पत्ति नहीं होती है । अतः जिस प्रकार स्पर्श से युक्त पृथिवी, जल, तेज और वायु इन चार द्रव्यों का सुख विशेषगुण नहीं है, उसी प्रकार शब्द भी स्पर्शो से युक्त द्रव्यों का गुण नहीं है । इससे यह शङ्का न करनी चाहिए कि " शब्द अगर उन स्पर्श-युक्त द्रव्यों का विशेषगुण नहीं है, तो विशेषगुण ही नहीं है, किन्तु सामान्य गुण ही है " क्योंकि शब्द परजाति एवं अपरजाति दोनों से युक्त है, एवं श्रोत्ररूप एक ही बाह्येन्द्रिय से गृहीत होता है, अतः वह अवश्य ही विशेषगुण है । पार्थिव परमाणु के रूपादि यद्यपि स्पर्शयुक्त द्रव्य के ही गुण हैं, फिर भी ' कारणगुणपूर्वक ' नहीं हैं, अर्थात् अपने आश्रय के समवायिकारण के गुण से उत्पन्न नहीं होते हैं. क्योंकि परमाणु कार्य नहीं है । अतः पार्थिव परमाणु के रूपादि में व्यभिचार वारण के लिए प्रकृत परिशे-बानुमान के प्रथम हेतु में ' प्रत्यक्षत्वे सति ' यह विशेषण दिया गया है । शब्द चूँकि याद्रव्यभावी नहीं है, अर्थात् अपने समवायिकारणीभूत द्रव्य की अवस्थिति के सभी कालों में नहीं रहता है, क्योंकि ( पूर्वपक्षियों के अभिमत शब्द के आश्रय ) शङ्खादि के रहते हुए भी शब्द नष्ट हो जाते हैं । इसलिए अयावद्द्रव्यभावित्व हेतु से भी समझते हैं कि शब्द स्पर्श से युक्त द्रव्यों का गुण नहीं है । यह हेतु भी केवल अपने इस रूप से पार्थिव परमाणु के रूपादि में व्यभिचरित होगा, क्योंकि रूपादि गुणों के आश्रयीभूत