प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 201–210
प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 201–210
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir १२६ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ मध्ये सृष्टिसंहार-पवनानामपि महाभूतानामनेनैव क्रमेणोत्तरस्मिन्नुत्तरस्मिन् सति पूर्वस्य पूर्वस्य विनाशः । ततः प्रविभक्ताः परमाणवोऽवतिष्ठन्ते धर्माधर्म-संस्कारानुविद्धा आत्मानस्तावन्तमेव कालम् | हुए पहिले पहिले का विनाश होता है । उसके बाद उतने ही समय तक ( ब्राह्म मान से सौ वर्ष पर्यन्त ) अपने में परस्पर असम्बद्ध परमाणु एवं धर्म, अधर्म और संस्कार से युक्त जीव ही रह जाते हैं । न्यायकन्दली इत्येवं सर्वत्र विषयप्रवृत्तौ न शरीरादीनां युगपदभावो घटते " इति, तदनेन परा-हतम् - अदृष्टानां वृत्तिप्रतिबन्ध इति । ब्रह्मणोऽपवर्गकाले निशीत्युक्त | M सर्वप्राणिनां प्रबोधप्रत्यस्तमयसाधर्म्येणोपचारात् । महाभूतानामप्येवं विनाश इत्याह- तथेति । यथा शरीरेन्द्रियाणामापरमाण्वन्तो विनाशस्तथा महाभूताना-मप्यनेनैव क्रमेणेति । परमाणुक्रिया विभागादिक्रमेणोत्तरस्मिन्नुत्तरस्मिन् सति पूर्वस्य पूर्वस्य विनाश इति । जले तिष्ठति पूर्व पृथिव्या विनाशः, तेजसि तिष्ठति जलस्य, वायौं तिष्ठति तेजस इत्यर्थः । ततः प्रविभक्ताः परमाणवोऽवतिष्ठन्ते धर्माधर्म्मभावनाख्यसंस्कारैरनुविद्धा उपगृहीताश्र्चात्मानस्तावन्तमेव कालं फल के प्रति उन्मुख अदृष्ट से भोग करता ही रहेगा, अथवा किसी अदृष्ट में आगे फल देने की उन्मुखता ही उत्पन्न होगी । इा प्रकार के सभी कालों के विषयों में प्रवृत्त रहने के कारण शरीरादि सभी विषयों का विनाश एक काल में नहीं हो सकता, किन्तु ' अदृष्टानां वृत्तिप्रतिबन्धे ' इस वाक्य से उक्त आपत्ति का समाधान हो जाता है, क्योंकि ईश्वर की संहारेच्छा से सभी अदृष्टों की कार्यजननशक्ति एक ही समय में कुण्ठित हो जाएगी । ' निशि ' शब्द से लक्षणावृत्ति के द्वारा ब्रह्मा के मोक्ष का काल कहा गया है । जैसे कि रात में सोने पर प्राणियों के जाग्रत अवस्था के सभी सुखदुःखादि नष्ट हो जाते हैं, उसी तरह उस समय भी जीवों के सभी सुख दुःखादि नष्ट हो जाते हैं, यही सादृश्य इस लक्षणावृत्ति का मूल है | शरीरों और इन्द्रियों की तरह और भी सभी भूत नष्ट होते हैं, यही ' तथा ' इत्यादि पङ्क्ति से कहते हैं । अर्थात् जैसे शरीरों और इन्द्रियों का परमाणुपर्यन्त विनाश होता हैं, उसी प्रकार और उसी क्रम से अन्य महाभूतों का भी विनाश होता है । पहिले परमाणुओं में क्रिया, फिर उनमें परस्पर विभाग इत्यादि कथित क्रम से पूर्व पूर्व का विनाश होता है, अर्थात् जल के रहते हु पृथिवी का विनाश, एवं तेज के रहते हुए जल का विनाश और वायु के रहते हुए तेज का विनाश होता है । इसके बाद परस्पर असम्बद्ध परमाणु, एवं धर्म, अधर्म भावनाख्य संस्कार इन तीन गुणों से युक्त जीव ये ही ' उतने समय तक ' अर्थात् ब्रह्मा के For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् -१२७ प्राणिनां भोगभूतये महेश्वर सिसृक्षानन्तरं सर्वात्मगतवृत्तिलब्धादृष्टापेक्षेभ्यस्तत्संयोगेभ्यः ततः पुनः कर्मोत्पत्तौ तेषां परस्परसंयोगेभ्यो पवनपरमाणुषु द्वयणुकादि-फिर जीवों के भोग सम्पादन के लिए महेश्वर को सृष्टि करने की इच्छा उत्पन्न होती है । तब सभी आत्माओं के अदृष्ट की कुण्ठित शक्ति कार्यों के उत्पा-दन के लिए फिर से उन्मुख हो जाती है । कार्य में उन्मुख अदृष्ट एवं आत्मा और पर-माणुओं के संयोग से वायु के परमाणुओं में क्रिया उत्पन्न होती है । फिर क्रिया से न्यायकन्दली ब्रह्मणो वर्षशतमेवावतिष्ठन्ते । दिगादयोऽपि तिष्ठन्ति नित्यत्वात् । किन्त्वा -त्मनामदृष्टवशात् परमाणवः पुनर्नारप्स्यन्त इति । प्राधान्याददृष्टवशादात्म-परमाण्ववस्थानसंकीर्त्तनम् । एवं संहारक्रमं प्रतिपाद्य सृष्टिक्रमं प्रतिपादयन्नाह - ततः पुनरिति । यद्यपि तदा आत्मनां प्राणसम्बन्धो नास्ति, तथापि प्राणिन इत्युक्तं योग्यत्वात् । तेषां भोगभूतये सुखदुःखानुभवोत्पत्तये महेश्वरस्य सिसृक्षा सर्जनेच्छा जायते । तदनन्तरं सर्वेष्वात्मसु गता अदृष्टा वृत्ति लभन्ते । यद्यपि युगपदुत्पद्य -मानासंख्येयकार्योत्पत्तौ व्याप्रियमाणा दिगादिव नित्यत्वादेकै वेश्वरेच्छा क्रिया-शक्तिरूपा, तथाप्येषा तत्तत्कालविशेषसहकारिप्राप्तौ कदाचित् संहारार्था भवति, सौ वर्षों तक रहते हैं । यद्यपि दिगादि पदार्थ भी नित्य होने के कारण उस समय रहते ही हैं, तथापि जीवों के अदृष्ट ( को अक्षमता ) से ही परमाणु अपने काम को नहीं करते । अतः प्रधान होने के कारण अदृष्टों से युक्त जीव और परमाणुओं की अवस्थिति का ही वर्णन किया है । इस प्रकार संहारक्रम का प्रतिपादन करने के लिए ' ततः पुनः ' इत्यादि लिखते हैं । यद्यपि उस समय के जीवों में प्राण का सम्बन्ध नहीं है, तथापि प्राणसम्बन्ध की योग्यता के कारण ' प्राणिनः ' पद का प्रयोग किया है । प्राणियों की ' भोगभूति ' अर्थात् सुख और दुःख के अनुभव के लिए महेश्वर की ' सिसृक्षा ' अर्थात् सृष्टि करने की इच्छा होती है । इसके बाद जीवों के सभी अदृष्टों में कार्यों को उत्पन्न करने की क्षमता आ जाती है । यद्यपि ईश्वर की असंख्य कार्यों की उत्पत्ति में व्यापृत इच्छा उनकी क्रियाशक्ति का रूप है, एवं दिगादि पदार्थों की तरह नित्य होने के कारण एक ही है, फिर भी तत्तत्काल रूप सहकारी को पाकर वही कभी संहार का कारण होती. है और कभी सृष्टि का कारण होती है । जब वह सृष्टि का कारण होती हैं, तब जीवों For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir १२८ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ द्रव्ये सृष्टिसंहार-प्रशस्तपादभाष्यम् प्रक्रमेण महान् वायुः समुत्पन्नो नभसि दोधूयमानस्तिष्ठति । तदनन्तरं तस्मिन्नेव वायावाप्येभ्यः परमाणुभ्यस्तेनैव क्रमेण महान् सलिलनिधि-उत्पन्न परमाणुओं के संयोगो के द्वारा द्वणुकादि क्रम से महान् वायु उत्पन्न होकर आकाश में अत्यन्त वेग से युक्त होकर रहता है । उसके बाद उसी क्रम से उसी वायु में जलीय परमाणुओं से उत्पन्न महान् जलराशि सर्वत्र प्लावित होकर रहता है । न्यायकन्दली कदाचित् सृष्ट्यर्था भवति । यदा संहारार्था तदा तदनुरोधाददृष्टानां वृत्तिनिरोध औदासीन्यलक्षणो जायते । यदा त्वसौ सृष्टद्यर्था भवेत् तदा वृत्तिलाभः स्वकार्य्य-जननं प्रति व्यापारो भवति । वृत्तिर्लब्धा यैस्ते वृत्तिलब्धा इति । आहि-ताग्न्यादित्वान्निष्ठायाः पूर्वनिपातः, दन्तजात इति यथा । सर्वात्मगताश्च वृत्तिलब्धाश्चादृष्टाश्च तानपेक्षन्ते ये तत्संयोगा आत्माणुसंयोगास्तेभ्यः पवन-परमाणुषु कर्माण्युत्पद्यन्ते । पवनपरमाणवः समवायिकारणम् । लब्धवृत्त्य-दृष्टवदात्मपरमाणुसंयोगोऽसमवायिकारणम् । अदृष्टं निमित्तकारणम् । एवं कर्मोत्पत्तौ तेषां पवनपरमाणूनां परस्परसंयोगा जायन्ते । तत्संयोगेभ्यश्च घणुकान्युत्पद्यन्ते । तदनु त्र्यणुकानीत्यनेन क्रमेण महान् वायुः समुत्पद्यमानो नभसि आकाशे दोधूयमानः क्वचिदप्रतिहतत्वाद् वेगातिशययुक्तस्तिष्ठति । के अदृष्ट कार्यक्षम हो जाते हैं और अपने - अपने कार्यों के प्रति व्यापारशील हो जाते हैं । जब ईश्वर की इच्छा संहार का कारण होती है, तब अदृष्टों में कार्यों के प्रति उदासी-नता रूप ' वृत्तिनिरोध ' हो जाता है । ' वृत्तिर्लब्धा यैस्ते वृत्तिलब्धा: ' इसी आशय का समास ' वृत्तिलब्ध ' पद में है । यद्यपि निष्ठाप्रत्ययान्त ' लब्ध ' शब्द का प्रयोग पहिले चाहिए, शब्द के साथ समस्त निष्ठा प्रत्ययान्तपद किन्तु आहिताग्निगण में पठित का पूर्व प्रयोग विकल्प से होता है, जैसे कि ' दन्तजातः ' इत्यादि स्थलों में, तदनुसार ही ' वृत्तिलब्ध ' शब्द का प्रयोग भी है । ' सर्वात्मगतवृत्तिलब्धा दृष्टापेक्षेभ्य: ' इस समस्त महावाक्य का विग्रहवाक्य यों है कि ' सर्वात्मगताश्च वृत्तिलब्धाश्च, अदृष्टाश्च तान-पेक्षन्ते ये, तत्संयोगास्तेभ्य: । ' तत्संयोग ' अर्थात् आत्मा और अणुओं का संयोग । इन संयोगों से वायवीय परमाणुओं में क्रिया उत्पन्न होती है । इस क्रिया के समवायिकारण हैं वायु के परमाणु, असमवायिकारण हैं वृत्तिलब्ध अदृष्ट से युक्त आत्मा और परमाणुओं का संयोग, एवं अदृष्ट निमित्तकारण है । इस प्रकार परमाणुओं में क्रिया को उत्पत्ति हो जाने पर इन वायवीय परमाणुओं में फिर संयोगों की उत्पत्ति होती है । इन संयोगों कों की उत्पत्ति होती है, उसके बाद त्र्यसरेणु की । इस क्रम से महान् वायु उत्पन्न For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् १२ ९ रुत्पन्नः पोप्लूयमानस्तिष्ठति । तदनन्तरं तस्मिन्नेव पार्थिवेभ्यः परमाणु-यो महापृथिवी संहतावतिष्ठते । तदनन्तरं तस्मिन्नेव महोदधौ तेज-सेभ्योऽणुभ्यो द्वयणुकादिप्रक्रमेणोत्पन्नो महाँस्तेजोराशिः केनचिदनभि भूतत्वाद्देदीप्यमानस्तिष्ठति । मात्रात् एवं समुत्पन्नेषु चतुर्षु महाभूतेषु महेश्वरस्याभिध्यान-तेजसेभ्योऽणुभ्यः पार्थिव परमाणुसहितेभ्यो महदण्ड-इसके बाद इसी जलनिधि में उसी क्रम से पार्थिव परमाणुओं के द्वारा कठिन स्वभाव का पार्थिव द्रव्य उत्पन्न होकर रहता है । एवं उसी जलनिधि में तैजस परमाणुओं से महान् तेज उत्पन्न होकर किसी से प्रतिहत न होने के कारण अत्यन्त दीप्ति से युक्त होकर विद्यमान होता है । इस प्रकार चारों महाभूतों के उत्पन्न होने पर केवल महेश्वर के संकल्प से ही पार्थिव परमाणुओं की सहायता से तेजस परमाणुओं से महान् ( हिरण्मय ) तदनन्तरं तस्मिन्नेव वायावाप्येभ्यः परमाणुभ्य:, तेनैव क्रमेण द्वयणुकादि-क्रमेण, महान् सलिलनिधिरुत्पन्नः पोप्लूयमानः प्रतिरोधकाभावात् सर्वत्र प्लवमानस्तिष्ठति । तदनन्तरं जलनिधेरुत्पत्त्यनन्तरम्, तस्मिन्नेव जलधौ पार्थिवेभ्यः परमाणुभ्यो महापृथिवी संहता स्थिरस्वभावावतिष्ठते । तद-नन्तरं तस्मिन्नेव महोदधौ तैजसेभ्योऽणुभ्यो द्वयणुकादिप्रक्रमेणात्पन्नो महाँ-स्तेजोराशिः केनचिदनभिभूतत्वाद्देदीप्यमानस्तिष्ठति । यद्यपि पयःपावकयोः स्वाभाविको विरोधस्तथाप्यदृष्टव शेनाधाराधेयभावो नानुपपन्नः । हर किसी से बाधित न होने के कारण अत्यन्त वेग से युक्त होकर रहता है । उसी महान् वायु में जलीय परमाणुओं से ' उसी क्रम से ' अर्थात् द्वयणुकादि क्रम से जल का महान् निधि उत्पन्न होकर किसी से प्रतिरुद्ध न होने के कारण सर्वत्र प्लावित रहता है । तदनन्तर अर्थात् इस जलनिधि के उत्पन्न होने पर जल के उसी समुद्र में पार्थिव परमाणुओं से कठिन स्वभाव की महापृथिवी उत्पन्न होकर स्थित रहती है । तदनन्तर उसी जलनिधि में तैजस परमाणुओं से द्वथणुकादि क्रम से महान् तेज का समूह किसी से अभिभूत न होने के कारण अतिशय दीप्ति से युक्त होकर विद्यमान रहता है । यद्यपि जल और तेज इन दोनों मे स्वभावतः विरोध है, तथापि जीवों के अदृष्ट से उनमें भी आधाराधेयभाव होता है । १७ For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir १३० न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ ब्रव्ये सृष्टिसंहार-प्रशस्तपादभाष्यम् मारभ्यते । तस्मिंश्चतुर्वदनकमलं सर्वलोकपितामहं ब्रह्माणं सकलभुवन-सहितमुत्पाद्य प्रजासर्गे विनियुङ्क्ते । स च महेश्वरेण विनियुक्तो ब्रह्मा-तिशयज्ञानवैराग्यैश्वय्यं सम्पन्नः प्राणिनां कम्मविपाकं विदित्वा कर्मा-पिण्ड की उत्पत्ति होती है । उसी तेजस पिण्ड में ( महेश्वर ) कमल के सदृश चार मुँहवाले ब्रह्मा को उत्पन्न कर प्रजा की सृष्टि के लिए नियुक्त करते हैं । विलक्षण ज्ञान, उत्कट वैराग्य और अभूतपूर्व ऐश्वर्य से सम्पन्न, एवं परमेश्वर के द्वारा नियुक्त कर्म की परिणति समझकर कर्मों के अनुरूप ज्ञान, भोग, वह ब्रह्मा प्राणियों न्यायकन्दली एवम् अनन्तरोक्तेन प्रक्रमेणोत्पन्नेषु महाभूतेषु महेश्वरस्य अभिध्यानमात्रात् , तैजसेभ्यः परमाणुभ्यः पार्थिवपरमाणुसहितेभ्यो महदण्डं सङ्कल्पमात्रात् महद् बिम्बमारम्यते । बिम्बारम्भे पार्थिवा अथवया उपष्टम्भकाः, तेनेदं वह्नि-पुञ्जप्रायं नाभूत् । तस्मिन्नण्डे चत्वारि वदनकमलानि यस्य तं ब्रह्माणं सर्वलोकपितामहं सर्वेषामेव लोकानामाद्यं पुरुषं समस्तैर्भुवनैः सहोत्पाद्य प्रजानां सर्गे जनने विनियुङ्क्ते त्वमिदं कुविति । स च महेश्वरेण विनि-ब्रह्मातिशयज्ञानवैराग्यैश्वर्य्यसम्पन्नो ज्ञानञ्च वैराग्यञ्चैश्वर्य्यञ्च युक्तो ज्ञानवैराग्यैश्वर्य्याणि अतिशयेन ज्ञानवैराग्यैश्वर्य्याणि तैः सम्पन्न उपचितो ज्ञानातिशयात् प्राणिनां धर्माधम्मौ यथावत् प्रत्येति । वैराग्यान्न पक्षपातेन ' एवम् ' अर्थात् द्वयणुकादि क्रम से महाभूतों के उत्पन्न हो जानेपर महेश्वर के ' अभिध्यान ' अर्थात् केवल संकल्प से ही पार्थिव परमाणुओं से सहारा हुए पाये तैजस परमाणुओं से महदण्ड ' अर्थात् महान् पिण्ड को उत्पत्ति होती है । इस पिण्ड ( बिम्ब ) की उत्पत्ति में चूँकि पार्थिव परमाणुओं का विशेष सम्बन्ध है, अतः यह पि ' ( तैजस होनेपर भी ) वह्निपुञ्ज सदृश नहीं होता है । उसी पिण्ड में कमल के समान चार मुखवाले ' सर्वलोकपितामह ' अर्थात् सभी पुरुषों के आदि पुरुष ब्रह्मा को सकल भुवनों के साथ उत्पन्न कर जाओं को उत्पन्न करने के लिए नियुक्त करते हैं । कि तुम यह काम करो ' । महेश्वर के द्वारा सृष्टिकार्य के लिए नियुक्त वह ब्रह्मा ' अतिशय ज्ञानवैराग्यैश्वर्य सम्पन्न: ' अर्थात् " ज्ञानञ्च वैराग्यञ्च, ऐश्वर्यञ्च ज्ञानवैराग्यैश्वर्य्याणि, अतिशयेन ज्ञानवैराग्यैश्वय्र्याणि तैः सम्पन्नः ” इस व्युत्पत्ति के अनुसार उक्त वाक्य का अर्थ है कि वह ब्रह्मा उत्तम ज्ञान, उत्कट वैराग्य और अमित ऐश्वर्य से युक्त हैं | अपने उत्तम ज्ञान के बल से वह प्राणियों के धर्म और अधर्म को ठीक से समझते हैं । उत्कट वैराग्य के प्रभाव से उनकी प्रवृत्ति पक्षपात से दूषित नहीं होती है । अपने अमित ऐश्वर्य For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् १३१ प्रशस्तपादभाष्यम् नुरूपज्ञानभोगायुषः सुतान् प्रजापतीन् मानसान् मनुदेवर्षिपितृगणान् मुखबाहूरुपादतश्चतुरो वर्णानन्यानि चोच्चावचानि भूतानि च सृष्ट्वा -शयानुरूपैर्धर्मज्ञानवैराग्यैश्वय्यैः संयोजयतीति । और आयु से युक्त ' सुत ' अर्थात् प्रजापतियों की एवं ' मानस ' अर्थात् मनु, देवर्षि और पितृगणों की सृष्टि करते हैं । एवं अपने मुँह से ब्राह्मणों को, बाहु से क्षत्रियों को, जङ्घा से वैश्यों को और पैर से शूद्रों को उत्पन्न करते हैं । इसी प्रकार और भी छोटे बड़े अनेक प्राणियों को उत्पन्न करके सभी को कर्मों के अनुरूप धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य के साथ सम्बद्ध करते हैं । न्यायकन्दली प्रवर्त्तते, ऐश्वर्य्यात् कर्म्मफलं भोजयति । प्राणिनां कर्म्मविपाकं विदित्वेति । विविधेन प्रकारेण पाको विपाकः, कर्म्मणां विपाकः कर्म्मविपाकः, तं विदि-त्वा एतावदस्य कर्मफलं भविष्यतीति ज्ञात्वा कम्र्मानुरूपाणि ज्ञानभोगायूंषि तान् सुतान् प्रजापतीन् दक्षादीन् मानसान् मनःसङ्कल्पप्रभवान् मनु-देवर्षिपितृगणान् मनून्, देवान्, ऋषीन्, पितृगणान्, मुखबाहूरुपादतश्चतुरो वर्णान् मुखाद् ब्राह्मणान्, बाहुभ्यां क्षत्रियान् ऊरुभ्यां वैश्यान् पद्भ्यां शूद्रान्, अन्यानि चोच्चावचानि क्षुद्रक्षुद्रतराणि च भूतानि सृष्ट्वा, आशयानुरूपैः आशेते फलोपभोगकालं यावदात्मन्यवतिष्ठत इत्याशयः कर्म्म, तदनुरूपैर्धर्मज्ञान-वैराग्यैश्वय्यैः, संयोजयति यस्य यथाविधं कर्म तत्तदनुरूपेण ज्ञानादिना सम्यग् योजयति, मात्रयाऽप्यन्यथा न करोतीत्यर्थः । 1 के बल से वह प्राणियों के कर्म का भोग सम्पन्न कर सकते हैं । ' प्राणिनां कर्म्मविपाकं विदित्वा ', विविधेन प्रकारेण पाको विपाकः ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार अनेक प्रकार की परिणति ' विपाक ' शब्द का अर्थ है । ' कर्म्मणां विपाकः कम्र्म्मविपाकः ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार कर्मों की विविध परिणति ही ' कर्मविपाक ' शब्द का अर्थ है | अतः वे कर्मविपाक को समझकर अर्थात् ' इस जीव के कर्मों का फल इतना होगा ' यह समझकर ' कर्मानुरूपज्ञानभोगायुषः ' अर्थात् कर्म के अनुरूप ज्ञान, भोग और आयु से युक्त दक्षप्रजापति प्रभृति पुत्रों को मन मात्र से उत्पन्न अत एव मानस पुत्र-रूप मनुओं, देवताओं, ऋषियों और पितरों को उत्पन्न करते हैं । इसी प्रकार मुख, बाहु, जङ्घा, एवं चरणों से क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन चारों वर्णों को एवं और भी छोटे बड़े जीवों को उत्पन्न करते हैं । ' आशयानुरूपैः ' अर्थात् ' आशेते फलोपभोगकालं यावदात्मन्यवतिष्ठित इत्याशय: ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार फलों के उप-भोग पर्यन्त जो आत्मा रहे उसे ' आशय ' कहते हैं । फलतः कर्म ( अदृष्ट ) ही ' आशय ' For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir १३२ यत् खलु न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ द्रव्ये सृष्टिसंहार-केचिदेवमाचचक्षिरे - प्रेक्षावत्प्रवृत्तिरिष्टार्थाधिगमा स्यादनिष्टपरिहारार्था वा न चेष्टानिष्टप्राप्तिपरिहारावीश्वरे समस्तावाप्तकामे सम्भवतः, तेनास्य जगन्निर्माणे प्रवृत्तिरनुपपन्ना । तत्रोत्तरम् - - प्राणिनां भोगभूतय इति । परार्था सिसृक्षायां प्रवृत्तिर्न स्वार्थनिबन्धनेत्यभिप्रायः । नन्वेवं तर्हि सुखमयीमेव सृष्टि कुर्य्यान्न दुःखशबलां करुणाप्रवृत्तत्वादित्यत्रैष परिहारः -- प्राणिनां कर्म्मविपाकं विदित्वेति । परार्थं प्रवृत्तोऽपि न सुखमयीमेव करोति, विचित्रकर्माशयसहायस्य कर्तृत्वादित्यर्थः । न चैवं सति करुणाविरोधः, दुःखोत्पादस्य वैराग्यजननद्वारेण परमपुरुषार्थहेतुत्वात् । यदि धर्माधर्मावपेक्ष्य करोति नास्य स्वाधीनं कर्त्तृ त्वमित्यनीश्वरतादोष इत्यस्यायं प्रतिसमाधिः --आशयानुरूपैर्धर्म्मज्ञानवैराग्यैश्वय्यैः संयोजयति । स हि सर्वप्राणिनां शब्द का अर्थ है । उसके अनुरूप धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वयं से जीवों को सम्बद्ध करते हैं । अर्थात् जिस जीव का अदृष्ट जिस प्रकार का है उसी के अनुरूप धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य इन चारों वस्तुओं से जीवों को उचित रीति से सम्बद्ध करते हैं, इसमें थोड़ा सा भी इधर उधर नहीं करते । इस प्रसङ्ग में किसी की आपत्ति है कि ( १ ) इष्ट वस्तुओं की प्राप्ति एवं ( २ ) अनिष्ट वस्तुओं के परिहार इन दो भेदों से प्रवृत्ति दो ही प्रकार की है । महेश्वर को सभी वस्तुयें बराबर प्राप्त ही हैं । उनका अनिष्ट तो कोई है ही नहीं, अतः कारण की अनुपपत्ति से संसार रचना की उनकी प्रवृत्ति ही नहीं हो सकती । इसी आपत्ति का समाधान ' प्राणिनां भोगभूतये ' इस वाक्य से दिया है । अभिप्राय यह है कि सृष्टि-कार्य में महेश्वर को प्रवृत्ति अपने लिए नहीं है ( उक्त कार्यकारणभाव स्वार्थमूलक प्रवृति का है ) । ( इस पर यह आक्षेप हो सकता है कि ) तो फिर वे सुखमयी सृष्टि की ही रचना करते, दुःखबहुल सृष्टि की नहीं, क्योंकि वे करुणा से ही इसमें प्रवृत्त होते हैं । इसी आक्षेप का परिहार प्राणिनां कर्म्मविपाकं विदित्वा ' इस वाक्य से किया गया है । कहने का तात्पर्य है कि दूसरों के लिए प्रवृत्त होनेपर भी केवल सुखमयी सृष्टि नहीं कर सकते, क्योंकि सुख और दुःख दोनों के जनक ' विचित्र ' कर्माशय के साहाय्य से ही उनमें सृष्टि का कर्तृत्व है । ऐसा होनेपर भी उनकी स्वाभाविक करुणा में कोई अन्तर नहीं आता, क्योंकि वैराग्य के उत्पादन के द्वारा दुःखों का उत्पादन भी परम पुरुषार्थं मोक्ष ) का साधन है । अगर सृष्टिकार्य के लिए उन्हें भी जीवों के धर्म और अधर्म की अपेक्षा है तो फिर कहना पड़ेगा कि उनमें सृष्टि कार्य के प्रति स्वातन्त्र्य रूप कर्तृत्व नहीं है, फिर उनमें अनीश्वरत्व का दोष अनिवार्य है । इसी आक्षेप का समाधान ' आशया-नुरूपैर्धर्मज्ञानवैराग्येश्वय्यैः संयोजयति ' इस वाक्य से किया है । अभिप्राय है कि For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली १३३ कर्मानुरूपं फलं प्रयच्छन् कथमनीश्वरः स्यादिति भावः । नहि योग्यतानु-रूप्येण भृत्यानां फलविशेषप्रदः प्रभुरप्रभुर्भवति । कल्पादावुत्पन्नानां प्राणिनां सर्वशब्दार्थेष्वव्युत्पन्नानां सङ्केतस्था-शक्यकरणत्वाच्छाब्दव्यवहारानुपपत्तिरिति चोदनायां प्रत्यवस्थान बीजमिदम् — मानसानिति । योनिजशरीरो हि महता गर्भवासादिदुःखप्रबन्धेन विलुप्त-संस्कारो जन्मान्तरानुभूतस्य सर्वस्य न स्मरति । ऋषयः प्रजापतयो मनवस्तु मानसा अयोनिजशरीर विशिष्टादृष्टसम्बन्धिनो दृष्टसंस्काराः कल्पान्तरानुभूतं सर्वमेव शब्दार्थव्यवहारं सुप्तप्रतिबुद्धवत् प्रतिसन्दधते, प्रति-सन्दधानाश्च परस्परं बहवो व्यवहरन्ति । तेषां व्यवहारात् तत्कालवत्तिनां प्राणिनां व्युत्पत्तिः, तद्व्यवहाराच्चान्येषामित्युपपद्यते व्यवहारपरम्परया शब्दार्थ-व्युत्पत्तिरित्यर्थः । किं पुनरीश्वरसद्भावे प्रमाणम्? आगमस्तावदनुमानञ्च । महा-भूतचतुष्टयमुपलब्धिमत्पूर्वकं कार्य्यत्वाद् यत्काय्यं तदुपलब्धिमत्पूर्वकं यथा घटः कार्य्यश्च महाभूतचतुष्टयं तस्मादेतदप्युपलब्धिमत्पूर्वकम् । प्रमाणेन सभी जीवों को अपने कर्म के अनुसार फल देते हुए भी वह ' अनीश्वर ' क्यों होंगे? क्योंकि योग्यता के अनुसार अपने भृत्यों को फल देते हुए भी स्वामी अप्रभु नहीं होते । सृष्टि के आदि में उत्पन्न जीव शब्द और अर्थ के व्यवहार से अनभिज्ञ रहते हैं, अतः सृष्टि के आदि में सङ्केत के द्वारा शब्द से होनेवाले व्यवहारों की उपपत्ति नहीं होगी । इसी का समाधान मानसान् ' इस पद में है । अभिप्राय यह है कि योनिज शरीर के जीवों के संस्कार गर्भवासादिजनित बहुत बड़े दुःखों के भोगने के कारण विलुप्त हो जाते हैं, अतः उन जीवों को दूसरे जन्म में अनुभूत सभी बातों का स्मरण नहीं रहता है । ऋषि प्रजापति और मनु चूँकि मानस हैं ( योनिज नहीं ), अतः योनिज शरीरवालों से उनका अदृष्ट विलक्षण है । अत एव उनके सभी संस्कार उद्बुद्ध रहते हैं । वे सोकर उठे हुए व्यक्तियों की तरह दूसरे जन्मों में किये गये शब्द और अर्थों के व्यवहारों को स्मरण कर इस जन्म में भी शब्द और अर्थ का व्यवहार करते हैं । उनके व्यवहार से ही और सभी जीव शब्द और अर्थ के सङ्केत को ग्रहण करते हैं । उन जीवों के व्ववहार से फिर अन्य जीव भी शब्दार्थ व्यवहार को ग्रहण करते हैं । व्यवहार की इस परम्परा से शब्द और अर्थ के सङ्केत का ग्रहण होता है । ( प्र ० ) ईश्वर की सत्ता में प्रमाण ही क्या है? ( उ ० ) शब्द और अनुमान दोनों हो । ( अनुमान इस प्रकार है कि ) पृथिवी प्रभृति चारों महाभूत किसी ज्ञानी कर्ता के द्वारा उत्पन्न होते हैं, क्योंकि वे कार्य हैं । कार्य अवश्य ही किसी ज्ञानी कर्ता के For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir १३४ न्यायकन्दली संवलितप्रशस्तपादभाष्यमु न्यायकन्दली [ द्रव्ये सृष्टिसंहार-पूर्व कोट्यनुपलब्धेर सिद्धं पृथिव्यादिषु कार्य्यत्वमिति चेत्? तदयुक्तम्, साव-यवत्वात्, यत् सावयवं तत् काय्र्य्यं यथा घटः सावयवश्व पृथिव्यादि, तस्मादेत -कार्य्यमेव । ननु व्याप्तिग्रहणादनुमानप्रवृत्तिः, कार्यत्वबुद्धिमत्पूर्वकत्व -योश्च व्याप्तिग्रहणमशक्यम्, घटादिषु कर्त्तृप्रतीतिकाले एवाङ्कुरादिषूत्पद्यमानेषु तदभावप्रतीतेः । न चाङ्कुरत्वादीनामपि पक्षत्वमिति न्याय्यम्, गृहीतायां व्याप्ता-वनुमानप्रवृत्तिकाले प्रतिवाद्यपेक्षया पक्षादिप्रविभागः, इह तु सर्वदैव प्रतिपक्ष-प्रतीत्याकान्तत्वाद् व्याप्तिग्रहणमेव न सिद्ध्यतीत्युक्तम् । अत्र प्रतिविधीयते -यदि चैवं द्वैतानुपलम्भाद् व्याप्तिग्रहणाभाव:, तदानीं मीमांसाभाष्यकृदभिमतं सामान्यतो दृष्टमादित्य गत्यनुमानमपि न सिद्ध्यति, तत्रापि देवदत्तगतिपूर्वक देशा-न्तरप्राप्तिग्रहणकाल एव नक्षत्रादिषु देशान्तरप्राप्तिमात्रोपलम्भात् । अथ तेषु द्वारा उत्पन्न होते हैं, जैसे कि घटादि पृथिव्यादि चारों भूत भी कार्य हैं अतः वे सभी भी अवश्य ही ज्ञानी कर्त्ता के द्वारा उत्पन्न हैं । ( प्र ० ) किसी भी प्रमाण से ' पूर्वकोटि ' अर्थात् पक्षधर्मता का ज्ञान ( अर्थात् पृथिव्यादि चारों महाभूतरूप पक्ष में कार्यत्व रूप हेतु का निश्चयात्मक ज्ञान ) नहीं है, उक्त पक्ष में कार्यत्व हेतु सिद्ध नहीं ( होने के कारण कार्यत्व हेतु स्वरूपासिद्ध ) है । ( उ ० ) प्रकृत में कार्यत्व हेतु स्वरूपासिद्ध नहीं है, क्योंकि पक्ष रूप चारों महाभूतों के सावयव होने के कारण उक्त सावयवत्व हेतु से उनमें कार्यत्व हेतु सिद्ध है, क्योंकि जितने भी सावयव हैं वे सभी कार्य हैं जैसे घटादि । पृथिव्यादि चारों महाभूत भी सावयव हैं, अतः वे भी अवश्य ही कार्य हैं । ( प्र ० ) व्याप्तिज्ञान से ही अनुमान की प्रवृत्ति होती है, किन्तु उपलब्धिमत्कर्तृ -जन्यत्वरूप प्रकृत साध्य की व्याप्ति का ज्ञान कार्यस्वरूप हेतु में सम्भव नहीं है, क्योंकि घटादि में उक्त साध्य और हेतु के दोनों की प्रतीति - काल में ही अङ्कुरादि में उक्त साध्य के अभाव के साथ कार्यत्व हेतु के सामानाधिकरण्य की भी अबाधित प्रतीति होती है | ( उ ० ) अङ्कुर तो पक्ष के अन्तर्गत है? ( 50 ) इस कथन में कोई सार नहीं है, क्योंकि व्याप्ति के ज्ञात हो जाने के बाद अनुमान की प्रवृत्ति होती है । उस प्रवृत्तिकाल में प्रतिवादी को आकाङ्क्षा के अनुसार पक्ष- साध्यादि विभाग प्रवृत्त होते हैं । यहाँ तो हेतु में साध्याभाव के सामानाधिकरण्य के ज्ञान से व्याप्ति का ज्ञान ही असम्भव है | ( उ ० ) इसके समाधान में कहना है कि अगर इस प्रकार हेतु और साध्य के सामानाधिकरण्य की अनुपलब्धि से व्याप्ति का ज्ञान न हो तो मोमांसाभाष्यकार का अभिमत सामान्यतोदृष्ट अनुमान का सूर्य की गतिवाला उदाहरण ही असङ्गत हो जाएगा, क्योंकि जिस समय यह ज्ञान उत्पन्न होता है कि ' देवदत्त का दूसरे देश के १. अर्थात् नहि पक्षे पक्षसमे वा व्यभिचारो दोषाधायक: ' इस न्याय से पक्षा-न्तर्गत अङ्कुर में व्यभिचार का उद्भावन अनुमिति का प्रतिरोध नहीं कर सकता । For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली १३५ देशविप्रकर्षेणापि गतेरनुपलब्धौ सम्भवन्त्यां न तया व्याप्तिग्रहणहेतोर्निरुपाधि-प्रवृत्तस्य भूयोदर्शनस्य प्रतिरोधः, तुल्यकक्ष्यत्वाभावात् । एवञ्चेत्, अत्राशरीर-त्वेनाभ्युपेतस्य कर्तुः स्वरूपविप्रकर्षेणाप्यङ्कुरादिष्वनुपलम्भसम्भवान्न तेन निरुपाधिप्रवृत्तस्य भूयो दर्शनस्य सामर्थ्यमुपहन्यत इति समानम् । अपि च भोः! किमनुमानेन कर्तृ मात्रं साध्यते? पृथिव्यादिनिर्माणसमर्थो वा? कर्त्तृ मात्र-साधने तावदभिप्रेतासिद्धि:, नह्यस्मदादिसदृशः कर्त्ताऽभिप्रेतो भवताम्, न च तेनेदं पृथिव्यादिकार्य्यमर्वादृशा शक्यनिर्माणम्, पृथिव्यादिनिर्माणसमर्थस्तु कर्त्ता न सिद्धयत्यनन्वयात्, अन्वयबलेन हि दृष्टान्तदृष्टकर्त्ता सदृशः सिद्धयतीति । नायं प्रसङ्गः कर्त्तृ विशेषस्याप्रसाधनात् व्याप्तिसामर्थ्याद् बुद्धिमत्पूर्वकत्वे सामान्ये साथ सम्बन्ध गति से उत्पन्न होता हैं, उसी समय नक्षत्रों में केवल दूसरे देशों के साथ सम्बन्ध का ही ज्ञान होता है । इसके लिए अगर यह उत्तर दिया जा सकता है कि नक्षत्र चूँकि बहुत दूर है, अतः उनमें दूसरे देशों के साथ सम्बन्ध का ज्ञान होने पर भी गति का ज्ञान नहीं होता है । यहाँ गति की अनुपलब्धि से व्याप्तिज्ञान के कारण-रूप उपाधि से शून्य ( गति और देशान्तरसञ्चार ) के भूयोदर्शन का प्रतिरोध नहीं हो सकता, क्योंकि ( प्रकृत गति की अनुपलब्धि और प्रकृत भूयोदर्शन ) दोनों समान कक्षा के नहीं हैं । ( उ ० ) तो फिर प्रस्तुत विषय में भी कहा जा सकता है कि जिस कार्य का कर्ता शरीरी पुरुष होता है, उस कर्ता के शरीर में प्रत्यक्ष की योग्यता रहने के कारण उसके कार्यों में भी कर्तृ जन्यत्व की प्रतीति होती है, किन्तु प्रस्तुत महा-भूतादि की सृष्टि के कर्ता महेश्वर को तो शरीर नहीं है, अतः ईश्वररूप - कर्तृ जन्य अङ्कुरादि कार्यों में कर्तृ जन्यत्व की प्रतीति नहीं होती है । किन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि अङ्कुरादि कार्यों में कर्तृ जन्यत्व है ही नहीं । तस्मात् कोई अनुपपत्ति नहीं है । ( 50 और भी बात है— अनुमान से आप क्या साधन करना चाहते हैं? केवल कर्ता? या पृथिवी प्रभृति उक्त महाभूतों के निर्माण से समर्थ कर्ता? केवल कर्ता की सिद्धि से तो आपका अभीष्ट सिद्ध नहीं होगा, क्योंकि हम लोगों के समान अल्पज्ञ कर्ता की सिद्धि आपको उस अनुमान से इष्ट नहीं है, एवं हम लोगों के समान अल्पज्ञ पुरुष पृथिव्यादि का निर्माण कर भी नहीं सकता है । उक्त अनुमान से पृथिव्यादि के निर्माण में समर्थ कर्ता की सिद्धि हो ही नहीं सकती, क्योंकि इस विशेष प्रकार का कर्तृ जन्यत्व कहीं उपलब्ध नहीं है । अन्वय ( हेतु में साध्य का सामानाधिकरण्य ) के बल से दृष्टान्त में जिस प्रकार के कर्तृ जन्यत्व रूप साध्य की उपलब्धि होगी, पक्ष में भी उसी प्रकार के साध्य की सिद्धि होगी । घटादि रूप दृष्टान्तों में तो पृथिव्यादि निर्माण में समर्थ कर्ता का जन्यत्व उपलब्ध नहीं है । ( उ ० ) उक्त आपत्ति ठीक नहीं है, क्योंकि विशेष प्रकार के कर्ता की सिद्धि अनुमान से इष्ट नहीं है, क्योंकि व्याप्ति के बल से पृथिव्यादि के किसी बुद्धियुक्त कर्ता को सिद्धि हो For Private And Personal