प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 231–240

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 231–240

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir १५६ न्याय कन्दली संवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ द्रव्ये काल-भावाद्यदत्र निमित्तं स कालः । सर्वकार्याणाञ्चोत्पत्तिस्थितिविनाश-हेतुस्तद्व्यपदेशात् । क्षणलव निमेपकाष्ठाकला मुहूर्त्तयामाहोरात्रार्द्ध-मासमासवयनसंवत्सरयुग कल्पमन्वन्तरप्रलय महाप्रलय व्यवहारहेतुः । प्रतीतिगत इन वैलक्षण्यों का कोई कारण अवश्य है, उसी को ' काल ' कहते हैं । यह सभी उत्पत्तियों और विनाशों का कारण है, क्योंकि सभी उत्पत्ति और विनाश काल से युक्त होकर ही कहे जाते हैं । यह क्षण, लव, निमेष, काष्ठा, कला, मुहूर्त्त, याम, अहोरात्र, पक्ष, मास, ऋतु, अयन, वर्ष, युग, कल्प, मन्वन्तर, प्रलय और महाप्रलय इन सबों के व्यवहार का कारण है । न्यायकन्दली लिङ्गम् । ननु कालस्याप्रत्यक्षत्वात् तेन सह परापरादिप्रत्ययानां व्याप्तिग्रहणा-भावात् कुतो लिङ्गत्वमत आह- तेषामिति । तेषां युगपदादिप्रत्ययानां विषयेषु द्रव्यादिषु पूर्वप्रत्ययविलक्षणानां द्रव्यादिप्रत्यय विलक्षणानामुत्पत्तावन्यस्य निमित्त -स्याभावात् । एतदुक्तं भवति - द्रव्यादिषु विषयेषु पूर्वापरादिप्रत्यया जायन्ते, न चैषां द्रव्यादयो निमित्तं तत्प्रत्ययविलक्षणत्वात् न च निमित्तमन्तरेण कार्य्यस्यो-त्पत्तिरस्ति, तस्माद्यदत्र निमित्तं स काल इति । आदित्यपरिवर्त्तनाल्पीयस्त्वभूयस्त्वनिबन्धनो युवस्थविरयोः परापरव्यवहार इत्येके, तदयुक्तम्, आदित्यपरिवर्तनस्य युवस्थविरयोः सम्बन्धाभावादसम्बद्धस्य निमित्तत्वे चातिप्रसङ्गात् । इन दोनों की प्रतीतियाँ भी काल की ज्ञापक हेतु हैं । ( प्र ० ) काल का तो प्रत्यक्ष नहीं होता है, अतः उन प्रतीतियों के साथ उसकी व्याप्ति गृहीत नहीं हो सकती हैं । अतः वे किस प्रकार हेतु हो सकती हैं? इसी प्रश्न का उत्तर ' तेषाम् ' इत्यादि से देते हैं । ' तेषाम् ' काल के ज्ञापक उन प्रतीतियों के विषय द्रव्यादि से विलक्षण इस ज्ञान की उत्पत्ति में काल को छोड़कर और कोई भी कारण नहीं है । इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि द्रव्यादि विषयों में परत्व और अपरत्व की प्रतीतियाँ होती हैं । उनके कारण वे द्रव्य नहीं हैं, क्योंकि केवल द्रव्यादि विषयक प्रतीतियों से परत्वादि विषयक प्रतीति विलक्षण आकार की होती है । निमित्त के बिना कार्य की उत्पत्ति सम्भव नहीं है । तस्मात् उन ( विलक्षण ) प्रतीतियों का कारण ही ' काल ' है । कोई कहते हैं कि सूर्य की गति की अधिकता एवं न्यूनता से ही वृद्ध और युवक में परत्व एवं अपरत्व की प्रतीति होती है, किन्तु यह ठीक नहीं है । क्योंकि सूर्य की गति के साथ उस वृद्ध और युवक का कोई भी सम्बन्ध नहीं है । असम्बद्ध पदार्थ को कारण मानने से अतिप्रसङ्ग होगा । For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली १५७ सहभावो यौगपद्यमित्यपरे, तदसङ्गतम्, कालानभ्युपगमसहार्थाभावात् । कस्याञ्चित् क्रियायां भावानामन्योन्यप्रतियोगित्वं सहार्थ इति चेन्न, अनुत्पन्नस्थित-निरुद्धानामन्योन्यप्रतियोगित्वाभावात् सहभवताञ्च प्रतियोगित्वे कालस्याप्रत्या-ख्यानमेवेत्युक्तम् । एवमयुगपदादिप्रत्यया अपि समर्थनीयाः । कालस्याभेदात् कथं प्रत्ययभेद इति चेत्? सामग्रीभेदात् वस्तुद्वयस्योत्पादसद्भावयोर्यदेकेन ज्ञानेन ग्रहणं तत्सहकारिणा कालेन परापरप्रत्ययौ जन्येते, भूयसामुत्पादव्यापारयो-रेकग्रह्णसहकारिणा युगपत्प्रत्ययः, कार्य्यस्योत्पादविनाशयोरन्तर्वत्तिनां क्रियाक्षणानां भूयस्त्वाल्पीयस्त्वग्रहणसहकारिणा चिरक्षिप्रप्रत्ययाविति यथासम्भवं वाच्यम् । ननु तत्तनिबन्धन एवास्तु प्रत्ययभेदः कृतं कालेन? न, असति तस्मिन् वस्तू-त्पादाभावात् । न तावदत्यन्तसतो गगनस्योत्पादः, नाप्यत्यन्तासतो नरविषाणस्य, किन्तु प्रागसतः । कालासत्त्वे चाभावविशेषणस्य प्राक्शब्दार्थस्याभावान्नायं विशेष: कोई कहते हैं कि एक साथ रहना हो ' यौगपद्य ' है एक कालिकत्व नहीं, किन्तु यह कहना भी ठीक नहीं है, क्योंकि काल के न मानने पर ' सह ' शब्द का कुछ अर्थ हो नहीं होता है । ( प्र ० ) किसी क्रिया में अनेक वस्तुओं का अविरोधित्व ही ' सह शब्द का अर्थ है । ( उ ० ) जिसकी उत्पत्ति नहीं हुई है, एवं जो विद्यमान है, एवं जिसका नाश हो गया हैं, इन तीनों में परस्पर विरोध की कोई सम्भावना ही नहीं है । एक साथ होनेवाले पदार्थों में अगर परस्पर विरोध मानें तो एक काल का न मानना असम्भव ही है । इसी प्रकार अयोगपद्य विषयक प्रतीति का भी समर्थन करना चाहिए | ( प्र ० ) काल अगर एक ही है तो तन्मूलक प्रतीतियों में अन्तर क्यों है? ( उ ० ) कारणों ( सामग्री ) के भेद से । एक वस्तु की उत्पत्ति और दूसरी वस्तु को स्थिति इन दोनों का एक ज्ञान से ग्रहण ही परत्व और अपरत्व की प्रतीति है । यह प्रतीति अपने सहकारी कारण ' काल ' से उत्पन्न होती है । बहुत सी वस्तुओं के उत्पादन आदि व्यापारों के एक ज्ञान का सहकारिकाणीभूत ' काल ' से ही युगपत्प्रत्यय होता है । कार्यों की उत्पत्ति और विनाश के बीच की क्रियाओं के आधार जितने क्षण हैं, उन्हीं की न्यूनता और अधिकता से विलम्बत्व और क्षिप्रत्व की प्रतीति होती है । इसी प्रकार और भी कल्पना करनी चाहिए | ( प्र ० ) ( सहकारी काल के अति-रिक्त उनके और ) निमित्तों से ही उन विलक्षण ( युगपदादि ) प्रत्ययों की उत्पत्ति हो? ( उ ० ) काल की सत्ता न मानने से सभी वस्तुओं की उत्पत्ति ही अनुपपन्न हो जाएगी, क्योंकि अत्यन्त ' सत् ' वस्तु की उत्पत्ति नहीं होती है, जैसे कि गगनादि की, अत्यन्त असत् वस्तु की भी उत्पत्ति नहीं होती हैं, जैसे कि नरविषाण की । किन्तु ' प्रागसत् ' अर्थात् पहिले से अविद्यमान वस्तु की ही उत्पत्ति होती है । अगर ' काल ' For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir १५८ न्यायकन्दली संवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ द्रव्यै काल-सिद्धयतीति न कस्यचिदुत्पत्तिः स्यात् । अप्रत्यक्षेण कालेन कथं विशिष्टा प्रतीतिरिति चेत्? तत्राह कश्चित् - विशिष्ट प्रत्ययस्योत्पत्ताविन्द्रियवत् कारणत्वं कालस्य, न तु दण्डवद् विशेषणत्वमिति, तद्सारम्, बोधैकस्वभावस्य ज्ञानस्य विषयसम्बन्धमन्तरेण विशेषणान्तराभावात् । तस्मादन्यथोच्यते । युवस्थविरयोः शरीरावस्थाभेदेन तत्कारणतया कालसंयोगेऽनुमिते स पश्चात्तयोः कालविशिष्टतावगतिः प्रत्येतुरेकत्वात् प्रमाणान्तरोपनीतस्यापि विशेषणत्वाविरोधात्, यथा सुरभि चन्दनमिति । यथा वा मीमांसकानामघट भूतलमिति, घटादिषु तु मूर्त्तद्रव्यत्वेनावस्थाभेदेन वा शरीरवत् कालसम्बन्धेऽनुमिते तद्विशिष्टो युगपदादिप्रत्ययो जातः । पश्चात् कार्य्यत्वादिविप्रतिपन्नं प्रति काललिङ्गत्वमित्यनवद्यम् । की सत्ता न रहे तो ' प्रागसत् ' शब्द के अर्थ उस अभाव विशेषार्थक असत् शब्द में विशेषण रूप ' प्राक् ' शब्द का कुछ अर्थ ही नहीं होता है । इससे अनुत्पत्तिशील गगनादि और अत्यन्त असत् नरविषाणादि से उत्पत्तिशील घटादि में प्रागसत्व ' रूप विशेष की सिद्धि नहीं होगी, अतः उन्हीं अनुत्पत्तिशील वस्तुओं की तरह और सभी वस्तुओं का उत्पादन असम्भव हो जाएगा । ( प्र ० ) अप्रत्यक्ष काल रूप विशेषण से युक्त प्रागसत्त्व रूप विशेषण का ज्ञान ही कैसे होगा? इस प्रश्न का समाधान कोई यों देते हैं कि प्राग-सत्त्व की विशिष्ट प्रतीति में काल इन्द्रियों की तरह ' सामान्य ' कारण है, दण्डादि की तरह विशेष नहीं । ( उ ० ) किन्तु यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि बोधमात्र स्वभाव के ज्ञानों में विषयों के सम्बन्ध को छोड़कर परस्पर भेद का कोई प्रयोजक नहीं है, अतः उक्त आक्षेप का दूसरा समाधान कहते हैं । बालक और वृद्ध के शरीर की विभिन्न अवस्थाओं से शरीरभेद का अनुमान होता है । एवं इस विभिन्नशरीरता के कारण रूप से काल का अनुमान होता है । उन शरीरों में कालविशिष्टता की प्रतीति होती है । क्योंकि ज्ञाता एक ही है । प्रत्यक्षातिरिक्त प्रमाणों से ज्ञात अर्थों को भी विशेषण मान लेने में कोई बाधा नहीं हैं । जैसे कि ' सुरभि चन्दनम् ' इत्यादि स्थलों में, अथवा मीमांसकों के अघटं भूतलम् ' इत्यादि स्थलों में । घटादि द्रव्यों में उक्त शरीर की तरह, अथवा मूर्त्तद्रव्यत्व हेतु से काल का संयोग अनुमित होनेपर एककालिकत्व ( यौगपद्य ) की प्रतीति होती है । उसके बाद काल रूप कारण उन प्रतीतियों से काल का अनुमान होता है । इस प्रकार काल की सत्ता के प्रसङ्ग में विरुद्ध मत रखनेवाले को काल की सत्ता समझाने के लिए इन यौगपद्यादि प्रतीतियों को हेतु मानने पुरुष में कोई बाधा नहीं है । For Private And Personal

पृष्ठ 234

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् १५६ तस्य गुणाः सख्यापरिमाणपृथक्त्व संयोगविभागाः । काललिङ्गा-विशेषादेकत्वं सिद्धम् । तदनुविधानात् पृथक्त्वम् । कारणे काल इति इसमें संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग और विभाग ये पाँच गुण हैं । कालप्रतीति के ज्ञापक हेतु चूँकि सभी स्थलों में समानरूप से हैं, अतः वह एक ही है । एवं चूँकि उसमें एकत्व संख्या है, अतः पृथक्त्व भी है । “ कारणे कालाख्या " ( ७ । १ । १५ ) इस सूत्र के बल से इसमें न्यायकन्दली सर्वकार्याणाञ्चोत्पत्तिविनाशहेतुः । अत्र युक्तिमाह - तद्व्यपदेशादिति । तेन कालेनोत्पत्त्यादीनां व्यपदेशात् उत्पत्तिकालो विनाशकाल इत्यादिव्यप-देशात् कालस्य तत्र हेतुत्वमित्यर्थः । काय्र्यान्तरमपि तस्य कथयति-क्षणलवेत्यादि । निमेषस्य चतुर्थो भागः क्षणः, क्षणद्वयेन लवः, अक्षिपक्ष्मकर्म्मा-पलक्षितकालो निमेष इत्यादिगणितशास्त्रानुसारेण प्रत्येतव्यम् । एवं धम्मणि सिद्ध तस्य गुणान् कथयति - तस्य गुणा इति । कालस्य द्रव्यत्वात् सङ्ख्यादियोगे सिद्धे तद्विशेषप्रतिपादनार्थमाह- काललिङ्गाविशेषादिति । कालस्य लिङ्गानां युगपदादिप्रत्ययानामविशेषादेकत्वम्, कालस्य भेदे प्रमाणान्त-राभावादित्यर्थः । ननु युगपदादिप्रत्ययभेद एव तद्भेदप्रतिपादक:? नैवम्, कालाभेदेऽपि सहकारिभेदात् प्रत्ययभेदोपपत्तेः । तदनुविधानात् पृथक्त्वमिति । ' वह सभी कार्यों की उत्पत्ति स्थिति और विनाश जा कारण है । ' तद्वयपदेशात् ' इत्यादि से इसी में हेतु देते हैं । तेन ' अर्थात् उस काल के ' व्यपदेश ' अर्थात् व्यवहारों से । अभिप्राय यह है कि ' इसका यह उत्पत्तिकाल है, इसका यह विनाशकाल है ' इत्यादि व्यवहारों से काल में उत्पत्यादि तीनों के कारणत्व की सिद्धि होती है । ' क्षणलव ' इत्यादि से काल के द्वारा होनेवाले कार्यों को कहते हैं । ' निमेष ' का चौथा भाग ' क्षण ' हैं । दो क्षणों का एक ' लव ' होता है । आँख के पलकों की क्रिया से उपलक्षित काल को ' निमेष ' कहते हैं । ये सभी गणितशास्त्र के द्वारा जानना चाहिए । इस प्रकार कालरूप धर्मी के सिद्ध हो जानेपर ' तस्य गुणाः ' इत्यादि से उसके गुण कहे गये हैं । द्रव्यत्व हेतु के द्वारा काल में सामान्य संख्यादि की सिद्धि हो जानेपर उसमें विशेष संख्यादि की सिद्धि के लिए काललिङ्गाविशेषात् ' यह हेतु वाक्य लिखते हैं । अभिप्राय यह है कि काल की ज्ञापक यौगपद्यादि विषयक प्रतीतियाँ सभी कालों में समान रूप से हैं, अतः ' काल ' एक ही है । काल में अनेकत्व का ज्ञापक कोई प्रमाण भी नहीं है । ( sc ) यौगपद्यादि की विभिन्न प्रतीतियाँ काल For Private And Personal

पृष्ठ 235

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir १६० न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ द्रव्ये काल-वचनात् परममहत्परिमाणम् । कारणपरत्वादिति वचनात् संयोगः । तद्विनाशकत्वाद् विभाग इति । तस्याकाशव द्रव्यत्वनित्यत्वे सिद्धे । काल लिङ्गा विशेषादञ्ज सैकत्वेऽपि सर्वकार्याणामारम्भक्रियाभिनिर्वृत्ति-स्थितिनिरोधोपाधिभेदान्मणिवत्पाचकवद्वा नानात्वोपचार इति । महत्परिमाण भी समझना चाहिए । “ कारणपरत्वात्कारणापरत्वाच्च परत्वापरत्वे " ( ७।२।२२ ) इस सूत्र के बल से इसमें संयोग की सिद्धि समझनी चाहिए । विभाग चूँकि संयोग का विनाशक है, अत: विभाग भी काल में है । उसमें आकाश की ही तरह द्रव्यत्व और नित्यत्व भी सिद्ध हैं । चूँकि सभी कालों में उसके ज्ञापक हेतु समान रूप से हैं, अतः यद्यपि वह एक ही है, तथापि सभी क्रियाओं के आरम्भ, स्थिति और समाप्ति आदि उपाधियों से मणि और पाचक की तरह अनेकों जैसा प्रतीत होता है । न्यायकन्दली एकत्वस्य पृथक्त्वानुविधानं साहच्यर्यनियमः, तेनैकत्वात् पृथक्त्वसिद्धिः । कारणे काल इति वचनात् । परममहत्परिमाणमित्यनेन " कारणे कालाख्या " इति सूत्रं लक्षयति । युगपदादिप्रत्ययानां कारणे कालाख्या कालसंज्ञेति सूत्रार्थः । तेन व्यापकः कालो लभ्यते, युगपदादिप्रत्ययानां सर्वत्र भावादित्यभिप्रायः । कारणपरत्वा-दिति वचनात् संयोग इति । " कारणपरत्वात् कारणापरत्वाच्च परत्वापरत्वे " इति सूत्रे कारणपरत्वशब्देन कालपिण्डसंयोगोऽभिहितः । तेनास्य संयोगगुणत्वं सिद्धम् । के अनेकत्व की ज्ञापिका होंगी? ( प्र ० ) काल के एक मान लेनेपर भी सहकारियों के भेद से उन विभिन्न प्रतीतियों की सिद्धि हो जाएगी । उसके अनुविधान से ही काल में पृथक्त्व भी हैं । अभिप्राय यह है कि एकत्र के साथ ' पृथक्त्व ' का ' अनुविधान ' अर्थात् नियत साहचर्यं है । अतः काल में एकत्व की सिद्धि से पृथक्त्व की सिद्धि समझनी चाहिए । ' कारणे काल: ' सूत्रकार की इस उक्ति से काल में परममहत्परिमाणवत्त्वरूप विभुत्व की भी सिद्धि समझनी चाहिए । कथित ' उक्ति ' शब्द से " कारणे कालाख्या " ( ७ । १ । २५ ) इस सूत्र को समझना चाहिए । उस सूत्र का यह अर्थ है कि यौगपद्यादि विषयक प्रतीतियों के असाधारण कारण का ही नाम ' काल ' है चूंकि ये यौगपद्यादि की प्रतीतियाँ सभी स्थानों में होती हैं, अतः यह समझना चाहिए कि काल व्यापक है । ' कारणपरत्ववचनात् ' अर्थात् " कारणपरत्वात् कारणापरत्वाच्च परत्वा-परत्वे ” ( ७ । २ । २२ ) इस सूत्र में महर्षि कणाद के द्वारा प्रयुक्त कारणपरत्व शब्द से काल और पिण्ड ( अवयवी द्रव्य ) का संयोग अभिप्रेत है । इसीसे काल में संयोगरूप For Private And Personal

पृष्ठ 236

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 236 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra प्रकरणम् ] २१ www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir १६१ भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली For Private And Personal तद्विनाशकत्वाद्विभागं इति । तस्य संयोगस्य कृतकत्वादवश्यं विनाशिनो विभागो विनाशकः, सर्वत्राश्रय विनाशाभावात् । अतः काले विभाग सिद्धिर्व्यधिकर-rer वभागस्याविनाशकत्वात् f । तस्थाकाशवद् द्रव्यत्वनित्यत्वे सिद्धे ( इति ) । यथा गुणवत्त्वादनाश्रितत्वाच्चाकाशं द्रव्यं तथा कालोऽपि । यथा समानासमान-जातीयकारणाभावान्नित्यमाकाशं तथा कालोऽपि । यद्येकः कालः कथं तत्रानेकव्यपदेश इत्याह- काललिङ्गाविशेषादिति । काललिङ्गानां परापरादिप्रत्ययानामविशेषाद् भेदाप्रतिपादकत्वादञ्जसा मुख्यया वृत्त्या कालस्यैकत्वेऽपि सिद्धे नानात्वोपचारान्नानात्वव्यपदेशः । कुतः? सर्वेषां कार्य्यणामारम्भ उपक्रमः क्रियाया अभिनिवृत्तिः क्रियायाः परिसमाप्तिः, स्थितिः स्वरूपावस्थानम्, निरोधो विनाशः, एषामुपाधीनां भेदान्नानात्वव्यपदेशः । यथैको मणिः स्फटिकादिर्नीलाद्युपाधिभेदान्नील इति पीत इति व्यपदिश्यते तथा कालोऽप्येक एवोपाधिभेदादारम्भकाल इति, क्रियाभिव्यक्तिकाल इति, निरोधकाल गुण की सिद्धि होती है । विभाग चूंकि संयोग का विनाशक है, अतः विभाग भी काल में अवश्य है । अभिप्राय यह है कि संयोग उत्पत्तिशील है, उसके विनाशकों में से विभाग भी एक है क्योंकि सभी जगह संयोग का नाश आश्रय के नाश से ही नहीं होता है । एक अधिकरण में रहनेवाला विभाग अन्य अधिकरण में रहनेवाले संयोग का नाश नहीं कर सकता । अतः काल में विभाग भी अवश्य ही है । आकाश की ही तरह इसमें द्रव्यत्व और नित्यत्व भी है, अर्थात् जिस प्रकार अनाश्रितत्व और गुणत्व हेतु से आकाश द्रव्य है, उसी प्रकार उन्हीं हेतुओं से काल भी द्रव्य है । जैसे समानजातीय और असमानजातीय कारणों के अभाव से आकाश नित्य है, वैसे ही काल भी उसी हेतु से नित्य है । यदि काल एक है तो फिर उसमें अनेकत्व की प्रतीति कैसे होती है? इसी प्रश्न का उत्तर ' काललिङ्गा विशेषात् ' इत्यादि से देते हैं । अभिप्राय यह है कि काल की ज्ञापक यौगपद्यादि प्रतीतियों के ' अविशेष ' से अर्थात् भेदप्रतिपादक प्रमाण के न रहने से ' अञ्जसा ' अर्थात् मुख्यवृत्ति से काल यद्यपि एक ही है, किन्तु लक्षणारूप गौणवृत्ति से उसमें नानात्व का भी व्यवहार होता है, क्योंकि सभी कार्यों का आरम्भ अर्थात् उपक्रम सभी क्रियाओं की ' अभिनिर्वृत्ति ' अर्थात् समाप्ति, ' स्थिति ' अर्थात् अपने रूप से विद्यमानता, ' निरोध ' अर्थात् विनाश, इन उपाधियों की विभिन्नता से एक ही काल में नानात्व का व्यवहार होता है । जैसे एक ही मणि स्फटिकादि और नीलादि उपाधियों से कभी नील और कभी पीत प्रतीत होती हैं, वैसे ही उक्त उपाधियों के भेद से एक ही काल कभी आरम्भकाल, कभी क्रिया को अभिव्यक्ति का काल, कभी निरोधकाल इत्यादि नाना रूपों

पृष्ठ 237

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 237 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir १६२ न्याय कन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ द्रव्ये दिक्-दिक पूर्वापरादिप्रत्ययलिङ्गा । मूर्त्तद्रव्यमवधिं कृत्वा मूर्त्ते-वेव द्रव्येष्वेतस्मादिदं पूर्वेण दक्षिणेन पश्चिमेनोत्तरेण पूर्वदक्षिणेन दक्षिणापरेणापरोत्तरेणोत्तरपूर्वेण चाधस्तादुपरिष्टाच्चेति दश प्रत्यया यतो भवन्ति सा दिगिति, अन्यनिमित्तासम्भवात् । ' यह पूर्व है, यह पश्चिम है ' इत्यादि प्रतीतियों से अनुमित होनेवाला ( द्रव्य ही ) दिक् है । किसी मूर्त्त द्रव्य को अवधि बनाकर किसी दूसरे मूर्त्त द्रव्य में ही इससे यह पूर्व है या इससे यह दक्षिण है, पश्चिम है, उत्तर है, पूर्वदक्षिण है, दक्षिणा-पर है, अपरोत्तर है, उत्तरपूर्व है, इससे ऊपर है या इससे नीचे है, ये दश प्रकार के ज्ञान जिससे होते हैं उसे ही ' दिक् ' कहते हैं । इन प्रतीतियों का कोई अन्य ( असाधारण ) कारण सम्भव नहीं है । न्यायकन्दली इति व्यपदिश्यत इत्यर्थः । मणेरुपाधिसम्बन्धो न वास्तव:, कालस्य तु क्रिया-सम्बन्धो वास्तव इति प्रतिपादयितुं दृष्टान्तान्तरमाह - पाचकेति । यथैकस्य पुरुषस्य पचनादिक्रियायोगात् पाचक इति, पाठक इति व्यपदेशस्तथा कालस्यापि, न तु प्रारम्भादिक्रियैव काल:, विलक्षण बुद्धिवेद्यत्वादिति । युगपदादिप्रत्ययलिङ्गत्वमिव कालस्य पूर्वापरादिप्रत्ययलिङ्गत्वं दिशो वैधर्म्यमिति प्रतिपादयन्नाह - दिक् पूर्वापरादिप्रत्ययलिङ्गेति । पूर्वमित्य-परमित्यादिप्रत्ययो लिङ्गं यस्या दिशः सा तथोक्ता । एतदेव दर्शयति- मूर्त्तद्रव्य -मित्यादिना । अमूर्त्तस्य द्रव्यस्य नावधित्वम्, नापि पूर्वापरादिप्रत्ययविषयत्व-से व्यवहृत होता है । मणि एवं उपाधियों का सम्बन्ध अवास्तविक है, किन्तु काल और क्रियाका सम्बन्ध तो वास्तविक है, यही दिखलाने के लिए ' पाचक ' इत्यादि सन्दर्भ से प्रकृत विषय के अनुरूप दूसरा दृष्टान्त देते हैं । अर्थात् जिस प्रकार एक ही पुरुष में पाक क्रिया के सम्बन्ध से ' यह पाचक है ' एवं पठन क्रिया के सम्बन्ध से यह पाठक है ' इत्यादि अनेक व्यवहार होते हैं, वैसे ही काल में भी समझना चाहिए । प्रारम्भादि क्रियायें ही काल नहीं हैं, क्योंकि उनसे विलक्षण काल की प्रतीति होती है जैसे योगपद्यादि प्रतीति से ज्ञात होना काल का असाधारण धर्म है, वैसे ही ' यह पूर्व है, यह पश्चिम इत्यादि प्रतीतियों से ज्ञात होना ' दिक् का असाधारण धर्म है ' यही वैलक्षण्य प्रतिपादन करते हुए ' दिक् पूर्वापरादिप्रत्ययलिङ्गा ' इत्यादि पंक्ति लिखते हैं । " पूर्वमपरमित्यादि प्रत्ययो लिङ्गं यस्याः सा पूर्वापरादिप्रत्ययलिङ्गा " इस व्युत्पत्ति के अनुसार जिसकी ज्ञापक ' यह पूर्व है, यह पश्चिम है ' इत्यादि प्रतीतियाँ हैं, For Private And Personal

पृष्ठ 238

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 238 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली १६३ मस्त्यनवच्छिन्नपरिमाणत्वात् । अत इदमुक्तं मूर्त्तद्रव्यमवधिं कृत्वा, मूर्त्तेष्वेव द्रव्ये-विदमस्मात् पूर्वेणेत्यादिप्रत्यया यतो भवन्ति सा दिगिति । एतस्मादिदं पूर्वमित्य-स्मिन्नेवार्थे पूर्वेणेति निर्देशः, प्रातिपदिकार्थे तृतीयोपसङ्ख्यानाद् । ननु पूर्वापरादिप्रत्ययानां कार्य्यत्वात्कारणमनुमीयते तत्तु दिगेवेति कुतो निश्चयः? तत्राह - अन्यनिमित्तासम्भवादिति । न तावत् पूर्वापरादिप्रत्ययानां द्रव्य-मात्रं निमित्तम्, यथाकथञ्चिदवस्थिते द्रव्ये तेषामुत्पत्तिप्रसङ्गात् । परस्परा-पेक्षया द्रव्ययोरुत्पत्तिनिमित्तत्वेऽपि स एव दोषः, उभयाभावप्रसङ्गश्चाधिकः । क्रियागुणादिनिमित्तत्वे च समानगुणक्रियादिषु प्रत्ययविशेषो न स्यात् । तेन यदेषां निमित्तं सा दिगिति । यत्रैतस्मादिदमिति पञ्चमी प्रयुज्यते, अन्यथा सापि निर्विषया ' पूर्वापरादिप्रत्ययलिङ्गा ' शब्द का अर्थ है । यही ' मूर्तद्रव्यमवधि कृत्वा ' इत्यादि से समझाते हैं । अमूर्त ( आकाशादि ) द्रव्य किसी के अवधि नहीं हो सकते और न वे उक्त पूर्वापरादि प्रत्यय के विषय ही हैं, क्योंकि उनमें परममहत्परिमाण है । अतः ' मूर्त्तद्रव्यमवधिं कृत्वा ' यह वाक्य लिखा है । अर्थात् मूर्त्तद्रव्यों में ही ' यह उससे पूर्व है, अथवा यह उससे पश्चिम है ' इत्यादि प्रतीतियाँ होती हैं । ये प्रतीतियाँ जिससे हों वही ' दिक् ' है । ' एतस्मादिदं पूर्वम् ' इसी अर्थ में केवल प्रातिपदिक अर्थमात्र के बोधक ' पूर्वेण ' इस पद में प्रातिपदिकार्थ मात्र में तृतीया है । ( प्र ० ) यह ठीक है कि पूर्वा-परादि प्रतीतियाँ यतः कार्य हैं, अतः उनका कोई कारण अवश्य है, वह कारण ' दिक् ' ही है यह किस प्रकार निश्चय किया जाय? इसी प्रश्न का समाधान है । ' अन्यनिमित्तासम्भवात् ' । अर्थात् पूर्वापरादि के अवधिभूत वे मूत्तं द्रव्य ही उनकी प्रतीतियों के कारण नहीं हैं, क्योंकि इससे दक्षिणादि दिशाओं में विद्यमान द्रव्य में अनभीष्ट पूर्वापरादि की प्रतीतियाँ होंगी, क्योंकि कारणीभूत मूर्त्त द्रव्य तो है ही । ' दो विरुद्ध दिशाओं में विद्यमान दोनों द्रव्यों में ही एक दूसरे की सहायता से यथायोग्य पूर्वापरादि प्रतीतियाँ होती है ' यह कहने पर उक्त दोष तो है ही, बल्कि इस कथन में उभयाभाव प्रसङ्ग का दोष अधिक १ है । द्रव्य में रहने वाले गुणों एवं कर्मों को अगर पूर्वादि प्रत्ययों का कारण मानें तो पूर्व दिशा में विद्यमान द्रव्य में रहनेवाले गुण और क्रिया से युक्त पश्चिम दिशा में विद्यमान मूर्तं द्रव्य में भी पूर्व दिशा की प्रतीति होगी । ' अत्र एतस्मादिदम् ' इस अर्थ में पञ्चमी का प्रयोग हैं । नहीं तो ' अस्मा-दिदं प्राची ' इत्यादि वाक्यों में प्रयुक्त पञ्चमी का प्रयोग व्यर्थ हो जायगा । ( 10 ) यदि उक्त पञ्चमी का प्रयोग अवधि के अर्थ में मानें? ( उ ० ) तो ठीक है, किन्तु बिना १. अर्थात् पूर्व प्रत्यय में पश्चिम दिशा में विद्यमान मूत्तं द्रव्य और पूर्व दिशा में विद्यमान सूर्य द्रव्य दोनों को परस्पर सम्मिलित होकर कारण मानें तो पूर्व प्रत्यय एवं पश्चिम प्रत्यय दोनों में से एक की भी उत्पत्ति नहीं होगी । क्योंकि एक प्रत्यय दूसरे प्रत्यय के विषय मूत्तं द्रव्य के अधीन हो जायेंगे । अतः परस्पराश्रयत्वरूप आपत्ति से दोनों प्रत्यय असम्भूत होंगे । For Private And Personal

पृष्ठ 239

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir १६४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ द्रव्ये दिक्-तस्यास्तु गुणाः सङ्ख्यापरिमाणपृथक्त्वसंयोगविभागाः काल-वदेते सिद्धाः । काल की तरह इसके ( दिशा के ) भी संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग और विभाग ये ही पाँच गुण हैं । न्यायकन्दली स्यात् । अवधावियं पञ्चमीति चेत्? सत्यम्, किन्त्वधित्वं दिगपेक्षया, न तु द्रव्यमात्रस्य, सर्वत्राविशेषप्रसङ्गात् । तस्या अप्रत्यक्षत्वेऽपि कालवद् विशिष्ट प्रत्यय-हेतुत्वं वाच्यम् । गुणवत्त्वं द्रव्यलक्षणं तदस्यामस्तीति प्रतिपादयन्नाह - तस्यास्तु गुणा इत्यादि । कालवदेते सिद्धाः, यथा काललिङ्गा विशेषात् कालस्यैकत्वं सिद्धं तथा दिग्लिङ्गाविशेषाद् दिश एकत्वम्, यथा तदनुविधानात् काले पृथक्त्वं तथा दिशि यथा कारणे काल इति वचनात् परममहत्परिमाणं तथा कारणे दिगिति वचनाद् दिशः परममहत्परिमाणम् । सर्वत्र तत्काय्र्यस्य पूर्वापरादिप्रत्ययस्य भावात् । यथा कारणपरत्वाच्चेति कालस्य संयोगगुणत्वं प्रतिपादितं तथा दिशोऽपि यथा संयोगविनाशकत्वात् काले विभागः सिद्धस्तथा दिशीत्यतिदेशार्थः । दिशा के वह भी सम्भव नहीं है, क्योंकि केवल उक्त मूर्त द्रव्य को ही अवधि मानने से सभी दिशाओं की प्रतीति सभी वस्तुओं में समान रूप से होगी । दिशा स्वयं यद्यपि अप्रत्यक्ष है, फिर भी काल की ही तरह विशिष्ट बुद्धि का कारण है । दिशा में गुणवत्त्व रूप द्रव्य का लक्षण है ' यह प्रतिपादन करते हुए ' तस्यास्तु गुणाः ' इत्यादि पंक्ति लिखते हैं । ' काल की ही तरह इसमें भी इन गुणों की सत्ता समझी जाती है ' । अर्थात् जैसे सभी कालों में यौगपद्यादि प्रत्यय रूप ज्ञापक हेतुओं के समान रूप से रहने के कारण एकत्व संख्या की सिद्धि होती है, वैसे ही सभी दिशाओं में दिशा के ज्ञापक उक्त पूर्वापरादि प्रत्ययों के होने से दिशा में भी एकत्व संख्या की सिद्धि जाननी चाहिए । जैसे एकत्व संख्या की व्याप्ति से काल में एकपृथक्त्व की सिद्धि की है, वैसे ही दिशा में भी एक पृथक्त्व की सिद्धि समझनी चाहिए । जैसे ' कारणे काल: ' सूत्रकार की इस उक्ति से काल में परममहत्परिमाण की सिद्धि की गयी है, वैसे ही ' कारणे दिक् ' सूत्रकार की इस उक्ति से दिशा में भी परममहत्परिमाण रूप गुण समझना चाहिए । क्योंकि सर्वत्र दिशा के कार्य पूर्व, पश्चिम आदि प्रतीतियाँ होती हैं । जैसे ' कारण-परत्वाच्च ' इस सूत्र के अनुसार कालका संयोगगुण प्रतिपादित है, वैसे दिशा में भी संयोगगुण समझना चाहिए । जैसे विनाशशील संयोग की सत्ता से काल में विभाग नाम के गुण की सिद्धि की गयी है, वैसे ही दिशा में भी समझना चाहिए । यही ' कालवदेते सिद्धा: ' इस अतिदेश वाक्य का अर्थ है । For Private And Personal

पृष्ठ 240

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 240 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् १६५ दिग्लिङ्गा विशेषादञ्जसैकत्वेऽपि दिशः परममहर्षिभिः श्रुतिस्मृति-यतः दिक् के ज्ञापक उक्त प्रतीति रूप सभी हेतु सर्वत्र समान रूप से हैं, अतः यह भी वस्तुतः एक ही है । किन्तु श्रुति स्मृति एवं लोकव्यवहार के लिए न्यायकन्दली ननु दिग्लिङ्गा विशेषो न सिद्ध:, पूर्वापरादिप्रत्ययानां परस्परतो भेदात् । तथा च सति दिशो भेद इति युक्तम्? न, एकस्मिन्नेवार्थे युगपद्वस्त्वन्तरापेक्षया पूर्वापरादिप्रत्ययोत्पत्तेः, दिग्भेदे हि यत्पूर्वं न तत्र पश्चिमप्रत्ययो भवेत् । सर्व-दिक्सम्बन्धस्तस्यास्तीति चेत्? तह सर्वार्थेषु सर्वापेक्षया सर्वेषां सर्वे प्रत्ययाः प्रसज्येरन् । न चैवम्, तस्मादेका दिक्, प्रत्यय भेदस्तूपाधिभेदात् । पूर्वमादित्यसंयोगस्य तदार्जवावस्थितस्य च द्रव्यस्यान्तराले ( पूर्वेति ) दक्षि-ति, अस्तमयसंयोगस्य तदार्जवावस्थितस्य च द्रव्यस्यान्तराले पश्चिमेति, यत्रा-दित्य संयोगो न दृश्यते तत्र मध्याह्नसंयोगप्रगुणावस्थित द्रव्यापेक्षयोत्तरव्यवहारः, तासामन्तरालेषु पूर्वदक्षिणादिव्यवहार इत्युपपद्यते प्रतीतिभेदः । आदित्यसंयोग-निबन्धन एवास्तु प्रत्यय:? न तस्य मूर्त्तद्रव्यसंयोगाभावात्, असम्बद्धस्य च प्रत्ययहेतुत्वासम्भवात् । एतदेव दर्शयति- दिग्लिङ्गाविशेषादिति । दिश एकत्वे ( प्र ० ) सभी दिशाओं में तो दिग्बुद्धि के वे हेतु एक से नहीं हैं, क्योंकि पूर्वापरादि प्रत्यय परस्पर भिन्न प्रकार के होते हैं । अतः दिशाओं को भी अनेक मानना पड़ेगा । ( उ ० ) यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि एक ही समय एक ही वस्तु में अवधि रूप वस्तुओं के भेद से पूर्वपश्चिमादि नाना प्रतीतियों की उपपत्ति हो सकती है । अगर वे वास्तव में भिन्न हों तो फिर पूर्व दिशा में विद्या-मान वस्तु में कभी पश्चिम दिशा की प्रतीति ही नहीं होगी । ( प्र ० ) उस वस्तु में सभी दिशाओं का सम्बन्ध है? ( उ ० ) तो फिर सभी वस्तुओं में सभी वस्तुओं की अपेक्षा सभी को पूर्वापरादि प्रत्यय होना चाहिए, किन्तु होते नहीं हैं । तस्मात् " दिक " एक ही है । उपाधियों के भेद से उसमें नानात्व की प्रतीति होती है । सूर्य का प्रथम संयोगाधिकरण देश एवं उसके सामने के द्रव्य इन दोनों के बीच में पूर्वदिशा की प्रतीति होती है । सूर्य के अस्तकालिक संयोग के प्रदेश एवं उसके सम्मुख द्रव्य के बीच पश्चिम दिशा की प्रतीति होती है । मध्याह्नकालिक सूर्य के संयोगवाले प्रदेश के एक ओर दक्षिण ओर दूसरी ओर उत्तर की प्रतीति होती है । इस प्रकार विभिन्न प्रतीतियों की उपपत्ति होती है । ( प्र ० ) सूर्य के उक्त संयोग से ही पूर्वादि दिशाओं का व्यवहार मान लिया जाय? ( 30 ) नहीं, क्योंकि उन मूर्त्त द्रव्यों के साथ सूर्य का संयोग सम्बन्ध नहीं है । असम्बद्ध वस्तु ज्ञान का कारण नहीं हो सकती है । यह " दिग्लिङ्गा विशेषात् " से दिखलाते हैं । इस प्रकार दिक् में एकत्व की सिद्धि हो जाने For Private And Personal