प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 241–250

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 241–250

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प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 241 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir १६६ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ द्रव्ये दिक्-लोकसंव्यवहारार्थ मेरुं प्रदक्षिणमावर्त्तमानस्य भगवतः सवितुर्ये संयोगविशेषा लोकपालपरिगृहीतदिक प्रदेशानामन्वर्थाः प्राच्यादिभेदेन दशविधाः संज्ञाः कृताः, अतो भक्त्या दश दिशः सिद्धाः । तासामेव देवतापरिग्रहात् पुनर्दश मेरु की प्रदक्षिण परिक्रमा करते हुए भगवान् सूर्य के जो संयोग विशेष उनका ही लोकपालों से अधिकृत प्रदेशों का योग के द्वारा बोध करानेवाले प्राची प्रभृति दश नाम महर्षियों ने बनाये हैं । अत गौणवृत्ति से दश दिशाओं का व्यवहार होता है । उन्हीं दिशाओं के ( १ ) माहेन्द्री ( २ ) वैश्वानरी न्यायकन्दली स्थिते महर्षिभिः प्राच्यादिभेदेन दशविधाः सञ्ज्ञाः कृताः । कीदृश्यस्ताः? अन्वर्थाः, अनुगतोऽर्थो यासामिति ता अन्वर्थाः । केषामर्थस्तास्वनुगतः? लोकपालैरिन्द्रादिभिः परिगृहीतानां संयोग-दिक्प्रदेशानाम् । सवितुर्ये विभागास्तेषामित्यध्याहारः । तथा हि- प्रथममस्यामश्वति सवितेति प्राची । अवागञ्चतीति अवाची । प्रत्यगवतीति प्रतीची । उदगञ्श्वतीति उदीची । किं विशिष्टस्य सवितुः? मेरुं प्रदक्षिणमावर्त्तमानस्य, मेरुं प्रदक्षिणं परिभ्रमतः । किमर्थं सञ्ज्ञाः कृताः? श्रुतिश्च स्मृतिश्च लोकश्च तेषां सम्यग् व्यवहारार्थम् । श्रौतो पर भी महर्षियों ने उसकी अन्वर्थ दश संज्ञायें बनायी हैं । ' अनुगतोऽय यासामु ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार जिस संज्ञा का जो यौगिक अर्थ हो, उस वस्तु की वही अन्वर्थ संज्ञा है | ( प्र ० ) किनके अर्थ उन संज्ञाओं में अनुगत हैं? इस प्रश्न के समाधान के लिए " इन्द्रादि लोकपालों की अधिकृत दिशाओं के प्रदेश के साथ सूर्य के संयोगों और विभागों का " यह अध्याहार करना चाहिए । ' अस्यां सविता प्रथमञ्चति ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार ' प्राची ' शब्द का अर्थ है कि पूर्व दिशा में सूर्य सबसे पहिले आते हैं, अतः उसका नाम ' प्राची ' है । ' अवागञ्चतीति अवाची ' अर्थात् सूर्य जिस दिशा में पूर्व दिशा से कुटिल गति के द्वारा जाते हैं वही अवाची ' है । ' प्रत्यगञ्चतीति प्रतीची ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार सूर्य जिस दिशा में सबसे पीछे जाँय वही ' प्रतीची ' है । ' उदगच्चतीति उदीची ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार सूर्य जिस दिशा में सबसे ऊँचे पर् हों वही ' उदीची ' है । किस विशेषण से युक्त सूर्य का? इस आकाङ्क्षा की पूर्ति के लिए ' मेरुं प्रदक्षिणमावर्त्तमानस्य ' यह वाक्य है । अर्थात् मेरु के चारों तरफ प्रदिक्षण क्रम से घूमते हुए सूर्य का । महर्षियों ने ये संज्ञायें क्यों बनायीं? इस प्रश्न के उत्तर के लिए ' श्रुतिस्मृति लोकसंहारार्थ है यह वाक्य लिखा गया है । " श्रुतिश्च, स्मृतिश्च, लोकश्च, तेषां संव्यवहारार्थम् ” इस व्युत्पत्ति के अनुसार अर्थ है कि श्रोत, स्मार्त और लौकिक इन सभी व्यवहारों को अच्छी तरह चलाने के लिए महर्षियों ने उन संज्ञाओं की रचना For Private And Personal

पृष्ठ 242

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् १६७ संज्ञा भवन्ति --- माहेन्द्री, वैश्वानरी, याम्या, नैर्ऋती, वारुणी, वायव्या, कौबेरी, ऐशानी, ब्राह्मी, नागी चेति । आत्मत्वाभिसम्बन्धादात्मा । तस्य सौक्ष्म्यादप्रत्यक्षत्वे सति ( ५ ) वारुणी ( ६ ) वायवी ( ३ ) याम्या ( ४ ) नैर्ऋती ( ७ ) कौबेरी ( ८ ) ऐशानी ( ६ ) ब्राह्मी और ( १० ) नागी देवताओ के अधिकारमूलक ये दश ( यौगिक ) नाम और हैं । आत्मत्व जांति के सम्बन्ध से ' यह आत्मा है ' यह व्यवहार होता है । आत्मत्व जाति ही आत्माओं का असाधारण धर्म है । वह दुर्लक्ष्य होने के न्यायकन्दली व्यवहारः ' न प्रतीचीशिराः शयीत ' इत्यादिः । स्मार्त्तो व्यवहारः ' आयुष्यं प्राङ्मुखो भुङ्क्ते ' इत्यादिः । लोकव्यवहारः पूर्वं गच्छ, दक्षिणमवलोकय ' इत्यादिः । यतो दश संज्ञाः कृतास्ततो भक्त्या उपचारेण दश दिशः सिद्धा व्यवस्थिताः । माहे-न्द्रयादिसंज्ञास्तु नार्थान्तरविषयाः, किन्तु तासामेव निमित्तान्तरवशात् प्रवर्त्तन्त इत्याह- तासामेवेत्यादि । महेन्द्रस्येयमिति माहेन्द्री । वैश्वानरस्येयं वैश्वानरीत्यादि सर्वत्र निर्वचनीयम । यस्य तत्वज्ञानं निःश्रेयसाय घटते विपर्य्ययज्ञानं संसारहेतुर्यदर्थानि च भूतानि तत्प्रतिपादनार्थमाह - आत्मत्वाभिसम्बन्धादात्मेति । आत्मत्वं नाम की । श्रीत व्यवहार का उदाहरण है ' न प्रतीचीशिराः शयीत ' अर्थात् पश्चिम की तरफ शिर रख कर नहीं सोना चाहिए । स्मार्त्त व्यवहार का उदाहरण है ' आयुष्यं प्राङ्-मुखो भुङ्क्ते ' अर्थात् आयु की कामना वाले पुरुष को पूर्वाभिमुख होकर भोजन करना चाहिए इत्यादि । लोक व्यवहार का उदाहरण है पूर्व की ओर जाओ दक्षिण की ओर देखो इत्यादि । यत महर्षियों ने दिशा की दश संज्ञायें बनायी हैं, अतः लक्षणा वृत्ति के द्वारा दिशाओं में भी दशत्व का व्यवहार होता है । माहेन्द्री प्रभृति संज्ञाएँ किसी दूसरी वस्तु की नहीं हैं, वे भी दिशाओं को ही दूसरे निमित्त से समझाती हैं । यही ' तासामेव ' इत्यादि से कहते हैं । ' महेन्द्रस्येयं माहेन्द्री ' अर्थात् जिस दिशा के अधिष्ठाता महेन्द्र हों उस दिशा को माहेन्द्री कहते हैं । ' वैश्वानरस्येयं वैश्वानरी ' इस व्युत्पति के अनुसार जिस दिशा के अधिष्ठाता वैश्वानर ( अग्नि ) हों उस दिशा को वैश्वानरी कहते हैं । इसी प्रकार और संज्ञाओं का भी निर्वचन करना चाहिए । जिसका तत्त्वज्ञान निःश्रेयस ( मोक्ष ) का कारण है, एवं जिसका विपर्यय ( मिथ्याज्ञान ) संसार का कारण है, एवं जिसके उपभोग के लिए ये भौतिक वर्ग हैं, उसी के प्रतिपादन के लिए ' आत्मत्वाभिसम्बन्धादात्मा ' यह सन्दर्भ लिखते हैं । ' आत्मत्व ' For Private And Personal

पृष्ठ 243

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir १६८ न्याय कन्दलीसंवलित प्रशस्तपादभाष्यम् [ ब्रव्ये आत्म-प्रशस्तपादभाष्यम् करणैः शब्दाद्युपलब्ध्यनुमितैः श्रोत्रादिभिः समधिगमः क्रियते । वास्यादीनां करणानां कर्तृप्रयोज्यत्वदर्शनात् शब्दादिषु प्रसिद्धथा च कारण बाह्य इन्द्रियों से गृहीत नहीं होता है । ( १ ) अतः शब्दादि प्रत्यक्ष से अनुमित होनेवाले श्रोत्रादि करणों ( इन्द्रियों ) के द्वारा आत्मा का अनुमान करते हैं । यह देखा जाता है कि बसुला आदि करण बढ़ई रूप कर्ता के सम्बन्ध से ही छेदनादि कार्य करते हैं । ( २ ) शब्दादि विषयक ज्ञानादि क्रियाओं से भी न्यायकन्दली सामान्यं तदभिसम्बन्धादात्मेति व्यवहारः । इदमस्येतरेभ्यो वैधर्म्यम् । ननु दृश्यस्य सत्त्वं तदाकारसंवेदनेन व्याप्तम्, न चात्माकारं कस्यचित्संवेदनमस्ति, अतो व्यापकानुपलब्ध्या तस्य सत्वमेव निराक्रियत कुतो धर्मनिरूपणमित्याशङ्क्य तत् सद्भावे बाधकं प्रमाणं नास्ति, प्रत्यक्षानुपलब्धेरन्यथासिद्धत्वात् साधकञ्च प्रमाणमनुमानमस्तीति प्रतिपादयन्नाह - तस्येति । प्रत्यक्षोपलब्धियोग्यताविरहः सौक्ष्म्यम् । तस्मादप्रत्यक्षस्यात्मनः करणैः शब्दाद्युपलब्धयः करणसाध्याः क्रियात्वाच्छिदिक्रियावदित्यनुमितैः श्रोत्रादिभिः समधिगमः क्रियते । कुत इत्याह- वास्यादीनां करणानां कर्त्तृ प्रयोज्यत्वदर्शनात् । यत्करणं तत् केनचित् शब्द का अर्थ है आत्मत्व नाम की जाति । उसी के सम्बन्ध से ' यह आत्मा है ' इस प्रकार का व्यवहार होता है । यह ' आत्मत्व ' जाति ही अन्य पदार्थों की अपेक्षा आत्मा का वैधर्म्य असाधारणधर्म या इतरभेदानुमितिजनक हेतु है । ( प्र ० 2 ) उसी वस्तु की सत्ता स्वीकार की जाती है. जो अपने आकार द्वारा ज्ञान का विषय हो, किन्तु आत्मा का कोई भी आकार उपलब्ध नहीं है, अतः अस्तित्व के व्यापक ' स्वाकारविषयत्व ' के अभाव से हम आत्मा के अस्तित्व का ही खण्डन करते हैं । फिर उसके धर्मों का निरूपण क्यों? इस शङ्का के दो समाधान करते हैं एकतो आत्मा की सत्ता में बाधा डालने वाला कोई प्रमाण ही नहीं है । ' प्रत्यक्षानुपलब्धेः ' हेतु अन्यथासिद्ध है अर्थात् आत्मत्वाभावका साधक नहीं है । क्योंकि बाह्य इन्द्रियों से आत्मा का प्रत्यक्ष न होने का कोई अन्य ही हेतु है, आत्मा की असत्ता नहीं । दूसरे आत्मा की सत्ता का ज्ञापक अनुमान प्रमाण है । आत्मा की असत्त्वापत्ति का समाधान करते हुए तस्य ' इत्यादि पंक्ति लिखते हैं । प्रत्यक्ष प्रमाण के द्वारा ज्ञात होने की अयोग्यता ही ' सौक्ष्म्य ' शब्द का अर्थ है | अत: ( १ ) प्रत्यक्ष से ज्ञात न होने पर भी ' श्रोत्रादि करणों से ' शब्दादि की ये उपलब्धियाँ करणजन्य हैं, क्योंकि ये भी क्रियारूप हैं । जैसे कि छेदनादि क्रिया ' इस प्रकार के अनुमानों से सिद्ध श्रोत्र आदि करणों के द्वारा आत्मा का अनुमान होता है । कैसे होता है? इस प्रश्न का समाधान ' वास्यादीनाम् ' इत्यादि से करते हैं । कर्ता के द्वारा ही करण कार्य में प्रवृत्त होते हैं । For Private And Personal

पृष्ठ 244

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra प्रकरणम् ] " दूसरी वस्तु २२ www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir १६ ९ भाषानुवादसहितम् . For Private And Personal कर्त्रा प्रयुज्यते कार्ये व्यापार्यते, यथा वास्यादिकं वर्धकिणा । करणञ्च श्रोत्रादिकं तस्मात् केनचित् प्रयोक्तव्यं य एषां प्रयोक्ता स आत्मा । आकाशस्य श्रोत्रस्य यात्मना सह साक्षात् सम्बन्धो नास्ति, विभुत्वात्, तथाप्यात्मना तस्य प्रयोज्य-त्वमन्तःकरणाधिष्ठानद्वारेण यथा हस्तेन सन्दंशयोगिना तत्संयुक्तस्यायः पिण्डस्य संयोगः । करणत्वञ्च श्रोत्रादीनां नियतार्थस्य ग्राहकत्वात्, प्रदीपवत् । यद्यप्यात्मा अहंममेति स्वकर्मोपार्जित कार्यकारणसम्बन्धोपाधिकृत कर्त्तृ तास्वामित्वरूपस-भिन्नो मनसा संवेद्यते, तथाप्यत्राप्रत्यक्षत्ववाचोयुक्तिर्बाह्येन्द्रियाभिप्रायेण । शब्दादिषु प्रसिद्धया च प्रसाधकोऽनुमीयते । शब्दादिषु विषयेषु प्रसिद्धिर्ज्ञानं तत्रापि प्रसाधको ज्ञातानुमीयते । ज्ञानं क्वचिदाश्रितं, क्रियात्वात्, छिदिक्रियावत् यत्रेदमाश्रितं स आत्मा । अथेदं स्वयमेव जानाति, न पराश्रितमिति चेत्? किमिदं नित्यम्? जैसे बढ़ई के द्वारा वसुला प्रभृति करण । श्रोत्रादि इन्द्रियाँ भी करण हैं । अतः उनका भी कोई प्रयोग करनेवाला चाहिए । वह प्रयोक्ता ही आत्मा है । यद्यपि श्रोत्र आकाश रूप होने के कारण त्रिभु है । एवं आत्मा भी विभु है । दो विभु किसी भी साक्षात् सम्बन्ध से परस्पर सम्बद्ध नहीं हो सकते, तथापि आत्मा से अधिष्ठित मन के साथ सम्बन्ध के द्वारा आत्मा में श्रोत्र रूप करण का भी प्रयोज्यकर्तृत्व है । जैसे कि तपे हुए लोहे को बढ़ई सोधे हाथ से नहीं छूता । हाथ से सड़सी को और सड़सी से तपे हुए लोहे को, तब भी हाथ में प्रयोज्यकर्तृत्त्व रहता ही है, क्योंकि चिमटे से संयुक्त लोहे के साथ भी चिमटे से संयुक्त हाथ का भी सम्बन्ध है हो । श्रोत्र शब्द- प्रत्यक्ष का ही करण है दूसरे प्रत्यक्ष का नहीं । चक्षुरूप प्रत्यक्ष का ही करण है रसादि का नहीं । अतः इन्द्रियाँ प्रदीप की तरह नियत अर्थों की ही प्रकाशक होने से ' करण ' हैं । यद्यपि अपने कर्मों से उपार्जित शरीर एवं इन्द्रियादि के सम्बन्ध रूप उपाधि के द्वारा स्वामित्व मिश्रित कर्तृत्त्व रूप से आत्मा मानसप्रत्यक्ष का भी विषय है, क्योंकि हम जानते हैं कि यह मेरा शरीर है, मेरी आँखें सुन्दर हैं, अतः अप्रत्यक्षत्व की युक्तियाँ बाह्य प्रत्यक्ष के अभिप्राय से कही गई समझनी चाहिए । ( २ ) शब्द दिषु प्रसिद्धया च प्रसाधको ज्ञातानुमीयते ' अर्थात् शब्दादि रूप विषयों में जो ' प्रसिद्धि ' अर्थात् ज्ञान, उससे आत्मा का अनुमान होता है । जैसे कि ज्ञान कहीं पर आश्रित है, क्योंकि वह क्रिया है । जैसे कि छेदनादि क्रिया । यह ज्ञान रूप क्रिया जहाँ पर आश्रित है वही ' आत्मा ' है । ( प्र ० ) यह ज्ञान स्वयं ही विषय को समझ लेता है, इसके लिए इसे किसी में आश्रित होने की आवश्यकता नहीं होती है । ( उ ० ) यह ज्ञान नित्य

पृष्ठ 245

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 245 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir १७० न्यायकन्दली संवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ द्रव्ये आत्म-प्रतिक्षणविनाशि वा? यदि नित्यम्? संज्ञाभेदमात्रम् । अथ क्षणिकम्, चिरानु-भूतस्य न स्मरणम्, प्रतिपत्तृभेदात् । यत्तु कार्यकारणभावात् पूर्वक्षणानुभूतस्योत्तरेण स्मरणम्, यत्पुनः पित्रानुभूतस्य पुत्रेणास्मरणम्, तत्र पितृपुत्रज्ञानयो: कार्यकारणभावा-भावात्, शरीरयोश्च तथाभूतयोरचेतनत्वात् । तदयुक्तम्, आत्माभावे कार्यकारण भावस्यानिश्चयात् । कारणविज्ञानकाले कार्यज्ञानमनागतम्, तत्काले च कारण-मतीतम् । न च ताभ्यामन्यः कश्चिदेको द्रष्टास्तीति कस्तयोः क्रमभाविनोः कार्य्य-कारणभावं प्रतीयात् । अथ मतम्, स्वात्मग्राहिणी पूर्वा बुद्धिः स्वात्माव्यतिरिक्तिं स्वस्य कारणत्वमतिरूपं गोचरयति । उत्तरापि बुद्धिः स्वरूपविषया तदव्यति-रिक्तमात्मीयं कार्य्यत्वमपि गृहणाति, ताभ्याञ्च प्रत्येकमुपात्तं कारणत्वं कार्यत्वं च तदुभयजनितैकवासनाबलभुवा विकल्पेनाध्यवसीयत इति चेत्? अहो है, या प्रशिक्षण विनाशशील? अगर नित्य है तो फिर फलतः आत्मा ही है, केवल नाम का अन्तर है । अगर प्रतिक्षण विनाशशील है तो फिर बहुत दिन पहिले अनुभूत विषय का आज स्मरण नहीं होगा क्योंकि स्मृति और अनुभव के कर्ता ( प्रकृत में ) भिन्न हैं, ( किन्तु अनुभव और स्मृति दोनों का एक ही कर्ता होना चाहिए ) ( प्र ० ) पहिले जिस विषय का ज्ञान चक्षुरादि से होता है, वहीं अपने विनाश काल के उत्तर क्षण में उसी विषय के दूसरे ज्ञान को जन्म देता है, फलतः कारणीभूत ज्ञान से ही अनुभूत विषय का स्मरण होता है । ' पिता से अनुभूत विषय का स्मरण पुत्र को नहीं होता हैं ' इसमें यह हेतु है कि पितृविज्ञान पुत्रविज्ञान का कारण नहीं है । पितृ-शरीर पुत्रशरीर का कारण हैं, किन्तु शरीर अचेतन हैं । ( उ ० ) आत्मा अगर न माना जाय तो दोनों विज्ञानों में कार्यकारणभाव है, यही निश्चय नहीं हो पायेगा । क्योंकि जिस क्षण में कारणविज्ञान है, उस समय कार्यविज्ञान भविष्य के ही गर्भ में रहता है | जिस क्षण में कार्यविज्ञान की सत्ता रहती है, उसी क्षण कारणविज्ञान का नाश हो जाता है । उन दोनों से भिन्न देखनेवाला कोई नही है, फिर क्रमशः उत्पन्न होनेवाले उन दोनों विज्ञानों के कार्यकारणभाव को कौन समझे? ( प्र ० ) विज्ञान जिस प्रकार विषयों को समझता है, उसी प्रकार अपने स्वरूप को भी समझता है । कारणविज्ञान का कारणत्व हो स्वरूप है, फिर कारणविज्ञान ही अपने से अभिन्न कारणत्व को भी समझता है । इसी प्रकार उत्तरकाल में होनेवाले कार्यविज्ञान को भी कार्यत्व का ज्ञान है । फलतः कारणविज्ञान को कारणत्व का ज्ञान है और कार्य-विज्ञान को कार्यत्व का ज्ञान है । फिर दोनों विज्ञानों से वासना रूप विलक्षण बल से युक्त ' विकल्प ' नाम के ज्ञान की उत्पति होती है । उससे ही कार्यकारणभाव For Private And Personal

पृष्ठ 246

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra प्रकरणम् ] ज्ञान का अपने से हो सकता है? इसी प्रश्न के इस वाक्य के आगे लिखित www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir भाषानुवादसहितम् १७१ प्रशस्तपादभाष्यम् For Private And Personal प्रसाधको को नुमीयते । न शरीरेन्द्रिय मनसाम्, अज्ञत्वात् । न शरीरस्य चैतन्यम्, घटादिवद् भूतकार्यत्वात् मृते चासम्भवात् । नेन्द्रियाणाम्, करणत्वात्, उक्त क्रिया के आश्रय रूप कारण आत्मा का अनुमान करते हैं । यह आश्रयत्व ( कर्त्तृत्व ) शरीर, इन्द्रिय एवं मन इन तीनों में सम्भव नहीं है, क्योंकि वे अज्ञ ( जड़ ) हैं | चैतन्य ( ज्ञान ) शरीर का धर्म नहीं है, क्योंकि वह ( शरीर ) घटादि की तरह भूत द्रव्य से उत्पन्न होता है । एवं मृत शरीर में ज्ञान सम्भव भी नहीं हैं । वह ( चैतन्य ) इन्द्रियों का भी धर्म नहीं है, क्योंकि वे ( ज्ञानक्रिया के ) करण हैं । एवं इन्द्रियों न्यायकन्दली कुसृष्टिकल्पना? पूर्वोत्तरधियौ स्वात्ममात्रनियते, कुतस्तस्याः कारणहमस्या-चास्मि कार्य्यमिति प्रतीयेताम् परस्परवार्त्तानभिज्ञत्वात् । ताभ्यामगृहीतं कुतो -ऽध्यवस्यति, तस्यानुभवानुसारित्वात् भवतु पराश्रितं ज्ञानम्, तदधिकरणन्तु शरीरमिन्द्रियं मनो वा भविष्यति । तत्राह - न शरीरेन्द्रियमनसामिति । उत्तरवाक्यस्थितं चैतन्यमिति पदमिह सम्बद्धयते । शरीरेन्द्रियमनसां चैतन्यं न भवति, कुतस्तत्राह अज्ञत्वादिति । ज्ञानं प्रति समवायिकारणत्वाभावादित्यर्थः । नन्वेतदपि साध्याविशिष्टमित्याशङ्कयाह - न शरीरस्येति । चैतन्यं शरीरस्य न भवति घटादिवच्छरीरस्य भूतकार्य्यत्वात्, यद् भूतकार्यं न तच्चेतनं, यथा घटः । गृहीत होता है । ( उ ० ) एक तो यह कल्पना ही बड़ी विचित्र है कि वे दोनों ज्ञान अपने स्वरूप को समझ सकते हैं । फिर पूर्वविज्ञान को यह भान ही कैसे होगा कि ' उत्तरविज्ञान का कारण मैं ही हूँ ' । एवं उत्तरविज्ञान को भी यह कैसे पता चलेगा कि ' मैं पूर्वविज्ञान का कार्य & | क्योंकि दोनों ही अपने से भिन्न किसी भी विज्ञान के स्वरूप और प्रभाव से अनभिज्ञ हैं । फिर दोनों विज्ञानों से अगृहीत कार्यकारणभाव का निश्चय कैसे होगा? क्योंकि निश्चय अनुभवमूलक है । ( प्र ० ) मान लिया कि भिन्न कोई आश्रय है । किन्तु वह आश्रय शरीर, इन्द्रिय एवं मन भी उत्तर में " शरीरेन्द्रियमनसाम् " इत्यादि पंक्ति लिखते हैं । ' न शरीरस्य चैतन्यम् ' इस वाक्य के चैतन्य पद का अनुस-न्धान करके प्रकृत वाक्य को ' न शरीरेन्द्रियमनसां चैतन्यम् ' इस प्रकार पढ़ना चाहिए । उक्त प्रश्न का ही ' अज्ञत्वात् ' इत्यादि से समाधान करते हैं । अर्थात् शरीरादि ज्ञान के समवायिकारण नहीं हैं । किन्तु यह भी तो सिद्ध नहीं है, किन्तु साध्य ही है, अतः ' शरीरादि प्रत्येक चैतन्य नहीं है ' यह प्रतिपादन करने के लिए " न शरीरस्य " इत्यादि सन्दर्भ लिखते हैं । शरीर में चैतन्य नहीं है, क्योंकि वह घटादि जड़ द्रव्यों की तरह भूत द्रव्य का कार्य

पृष्ठ 247

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir १७२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ द्रव्ये आत्म-भूतकार्य्यञ्च शरीरम्, तस्मादेतदप्यचेतनम् । युक्त्यन्तरमाह-- मृते चासम्भ-वादिति । मृते शरीरे चैतन्यस्यासम्भवादित्यनेनायावद्द्रव्यभावित्वं विवक्षितम् । चैतन्यं शरीरस्य विशेषगुणो न भवति, अयावद्द्रव्यभावित्वात् संयोगवत् । अत एव तत्कारणान्यप्यचेतनानि तेषां चैतन्ये कार्य्येऽपि चैतन्यं स्यात् । एकस्मिन् शरीरे ज्ञातृबहुत्वञ्च प्राप्नोति । ततश्चैकाभिप्रायेण प्रवृत्तिनियमाभावादिदोषः । नेन्द्रियाणां करणत्वादिति । इन्द्रियाण्यचेतनानि करणत्वाद्दण्डवत् । हेत्वन्तरञ्च समुच्चिनोति - उपहतेष्विति । विनष्टेष्वपीन्द्रियेषु पूर्वानुभू-तोऽर्थः स्मर्य्यते, न चानुभवितरि विनष्टे स्मरणं युक्तम्, तस्मान्नेन्द्रियगुण । ज्ञानम् । न च विषयस्य पूर्वानुभूतस्यासान्निध्येऽपि स्मृतिर्दृष्टा, बाह्येन्द्रियाणां प्राप्यकारि-त्वात् । तस्मात् स्मृतिस्तावन्नेन्द्रियाणाम् । तदभावादनुभवोऽपि न स्यादन्यस्यानु-भवेऽन्यस्यास्मरणादित्यर्थः । अत एव विषयस्यापि न चैतन्यम्, नष्टे विषये जितने भी कार्य भूतद्रव्यों से उत्पन्न होते हैं वे सभी अचेतन ही होते हैं, जैसे कि घटादि । शरीर भी भूत द्रव्य का ही कार्य है, अतः उसमें भी चैतन्य नहीं है । ' मृते चास-म्भवात् ' इत्यादि से इसी प्रसङ्ग में दूसरा हेतु देते हैं कि मृत शरीर में चैतन्य असम्भव है । इससे यह अनुमान अभीष्ट है कि चैतन्य ( ज्ञान ) शरीर का विशेषगुण नहीं है क्योंकि वह अयावद्द्रव्यभावी है, जैसे कि संयोग । इसी हेतु से शरीर के अव-यवों में भी चैतन्य नहीं है । यदि वे चेतन होते तो उनका कार्य शरीर भी चेतन होता । शरीर के अवयवों को अगर चेतन मान लें तो फिर एक ही शरीर में अनेक ज्ञाताओं की सत्ता माननी पड़ेगी । जिससे एक अभिप्राय के द्वारा नियमित प्रवृत्त्यादि की अनुपपत्ति होगी । ' नेन्द्रियाणां करणत्वात् ' इन्द्रियाँ अचेतन हैं, क्योंकि करण हैं, जैसे कि दण्डादि । ' उपहतेषु ' इत्यादि से इसी प्रसङ्ग में दूसरा हेतु देते हैं । इन्द्रियों के नाश हो जाने पर भी उनके द्वारा अनुभूत विषयों को स्मृति होती है । फिर तो अनुभव करने वाली इन्द्रिय का नाश हो जाने पर उससे अनुभूत विषयों का स्मरण होना उचित नहीं है, अतः ज्ञान इन्द्रियों का गुण नहीं है । ( इस में एक युक्ति यह भी है कि ) इन्द्रियों का यह स्वभाव है कि जिस विषय के साथ उन का सम्बन्ध विद्यमान रहता है, उसी विषय के ज्ञान का वह उत्पादनकरती हैं । किन्तु जिस समय जिस विषय के साथ इन्द्रिय का सम्बन्ध न भी रहे उस समय भी उस विषय की स्मृति होती है, अतः स्मृतियों की उत्पत्ति इन्द्रियों से नहीं होती है । इन्द्रियों में अनुभव करने की क्षमता भी नहीं है, क्योंकि अनुभव करने की एवं स्मरण करने की क्षमता एक ही वस्तु में होनी चाहिए । यह कभी नहीं होता कि अनुभव कोई करे एवं स्मृति किसी और को हो । ठीक इन्हीं कारणों से विषयों में भी चैतन्य नहीं For Private And Personal

पृष्ठ 248

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 248 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् १७३ उपहतेषु विषयासान्निध्ये चानुस्मृतिदर्शनात् । नापि मनसः, करणान्तरा-नपेक्षित्वे युगपदालोचनस्मृतिप्रसङ्गात् स्वयं करणभावाच्च । परि-का सामीप्य न रहने पर या इन्द्रियों के नष्ट हो जाने पर भी स्मृति की उत्पत्ति देखी जाती है । ज्ञान मन का भी धर्म नहीं है, क्योंकि मन को अगर ( चक्षुरादि ) अन्य कारणों से निरपेक्ष होकर ज्ञान का समवायिकारण मानें तो फिर एक ही समय एक ही व्यक्ति को आलोचनज्ञान और स्मृति दोनों होंगी । एवं मन स्वयं करण न्यायकन्दली तत्स्मरणायोगात् । इतोऽपि न तस्य चैतन्यम्, तद्देशज्ञानस्य तज्जन्यस्य च सुखादे -रननुभवात्, बुद्धिपूर्व्व कचेष्टाविशेषाभावाच्च । न चेन्द्रियचैतन्ये विषयचैतन्ये च रूपमद्राक्षं रसमन्वभवं स्पर्शं स्पृशामि गन्धं प्रास्यामीति रूपादिप्रत्ययानामे-करूपत्वप्रतिपत्तिसम्भवः, रूपादीनां चक्षुरादीनाञ्च भेदात् । अस्तु तर्हि मनोगुणो ज्ञानम्? तस्य सर्वविषयत्वे नित्यत्वे च प्रतिसन्धाना-द्युपपत्तंस्तत्राह - नापि मनस इति । मनो यदि चक्षुरादिविविक्तं कारणान्तरमपेक्ष्य रूपादीन् प्रत्येति, सञ्ज्ञाभेदमात्रे विवादः, यदपेक्षणीयं तन्मनो यच्च ज्ञानाधिकरणं स्वीकार किया जाता, क्योंकि विषयों के नष्ट हो जाने पर भी उनकी स्मृति होती है । विषयों में चैतन्य न मानने में एक यह भी युक्ति है कि वे ज्ञान के आश्रय रूप में ज्ञात नहीं होते, एवं उनमें ज्ञानजनित सुख का भी अनुभव नहीं होता है, एवं विषयों में ज्ञानजनित विशेष प्रकार की चेष्टा भी नहीं है । इन्द्रियों में या विषयों में चैतन्य मान लेने से ' मैंने रूप को देखा, मैंने रस का अनुभव किया, मैं स्पर्श का अनुभव कर रहा हूँ, मैं गन्ध को सूघूँगा ' इत्यादि विभिन्न प्रतीतियों में एक कर्त्ता के द्वारा उत्पन्न होने का अनुभव ठीक नहीं बैठेगा । क्योंकि वे रूपादि और उनकी ग्राहक इन्द्रियाँ भिन्न - भिन्न हैं । ( प्र ० ) ज्ञान को मन का ही गुण मान लीजिए, क्योंकि वह सभी विषयों का ग्राहक एवं नित्य भी है । अतः शरीर में, इन्द्रियों में या विषयों में चैतन्य मान लेने से होने वाली स्मृति की अनुपपत्तियाँ आपत्तियाँ इस पक्ष में नहीं आयेंगी । इसी पूर्वपक्ष का खण्डन ' नापि मनसः ' इत्यादि से करते हैं | मन यदि चक्षुरादि इन्द्रियों से भिन्न किसी ( कारणान्तर ) इन्द्रिय की सहायता से रूपादि विषयों के ज्ञान का उत्पादन करता है तो फिर नाममात्र का विवाद रह जाता है । क्योंकि आप के मत से ज्ञान के उत्पादन में मन को चक्षुरादि इन्द्रियों से भिन्न जिस इन्द्रिय की अपेक्षा होती है उसे हम लोग ' मन ' कहते हैं । एवं ज्ञान के जिस अधिकरण को आप ' मन ' कहते हैं, वही हम लोगों For Private And Personal

पृष्ठ 249

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir १७४ न्याय कन्दली संवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ द्रव्ये आत्म-मनः सोऽस्माकमात्मेति । अथ नापेक्षते करणान्तरम्, तदा रूपरसादिष्विन्द्रियसम्बद्धेषु युगपदालोचनानि प्रसज्यन्ते, कारणयौगपद्यात् । कारणान्तरापेक्षायां तु तस्या-णुत्वे सर्वन्द्रियेषु सान्निध्याभावाद्युगपदालोचनानुत्पत्तिः । अथान्तःकरणाभावो युगपत्स्नरणानि स्युरपेक्षणीभावात् करणापेक्षायां तु तत्संयोगस्य युगपद-सामर्थ्यात् क्रमेण स्मृत्युत्पत्तिः । यत्तूक्तं केनचिदेकस्य नित्यस्य क्रमयौगपद्याभ्यामकरणमिति! तदयुक्तम्, युगपत्करणासम्भवात्, उत्तरकालमकरणश्व कर्त्तव्याभावात्! न च तावता तस्य सत्त्वम्, अर्थक्रियाकारित्वव्यतिरिक्तस्य सत्त्वस्येष्टत्वात् । इतोऽपि मनोगुणो ज्ञानं न भवति, मनसः स्वयं करणत्वादित्याह - स्वयं की आत्मा है । यदि किसी अन्य ( करण ) इन्द्रिय की अपेक्षा नहीं होती है तो फिर एक ही क्षण में एक ही अधिकरण में स्मृति और अनुभव दोनों की उत्पत्ति अनिवार्य होगी, क्योंकि एक ही समय दोनों की सामग्री तैयार है । अगर दूसरे कारण की अपेक्षा मानते हैं और मन को अणु मान लेते हैं तो एक काल में अनेक इन्द्रियों के साथ उसका सम्बन्ध नहीं सकता, अतः ज्ञान यौगपद्य ' ( अर्थात् एक आश्रय में एक क्षण में अनेक ज्ञानों की उत्पत्ति ) की आपत्ति होगी । ( प्र ० ) यह ठीक है कि मन को चक्षुरादि से भिन्न किसी दूसरे करण की भी आवश्यकता रहती है, किन्तु वह करण ' अन्तःकरण नहीं है । ( उ ० ) तब भी एक काल में अनेक स्मृतियों की आपत्ति रहेगी, क्योंकि स्मृति के उत्पादन में बाह्य किसी भी करण की आवश्यकता नहीं होती है? अगर अन्तःकरण मान लेते हैं तो फिर अन्तःकरण में एक काल में अनेक स्मृतियों के उत्पादन का सामर्थ्य नहीं रहता है, अतः उससे क्रमशः ही स्मृतियाँ उत्पन्न होंगी । ( प्र ) एक एवं नित्य कोई वस्तु कारण ही नहीं हो सकती. क्योंकि कारण का यह स्वभाव है कि या तो वह एक ही समय अपने सभी कामों को करेगा ( यही युगपत्कारित्व है ) या क्रमशः ही अपने कामों को करेगा ( यही क्रमकारित्व है ) । इन दोनों में से कोई भी किसी नित्य एक वस्तु में सम्भव नहीं है । अतः नित्य आत्मा ज्ञान का समवायिकारण नहीं हो सकता । ( उ ० ) एक ही कारण से होनेवाले सभी कार्य किसी एक ही क्षण में हो ही नहीं सकते क्योंकि ऐसा मान लेने पर वह उसके बाद कारण ही नहीं रह जायगा । पतः उससे सम्पादित होनेवाले सभी कार्य हो चुके हैं, अब उसे कुछ करना नहीं है । एवं यह भी कोई नियम नहीं है कि जो किसी का कारण न हो उसकी सत्ता हो उठ जाय । जो किसी का कारण नहीं है, उसकी भी सत्ता मानने में कोई बाधा नहीं है । ' मन स्वयं ही करण है ' इस हेतु से भी ज्ञान मन का गुण नहीं है, यही बात For Private And Personal

पृष्ठ 250

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 250 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् १७५ शेषादात्मकार्यत्वात्तेनात्मा समधिगम्यते । है ( अतः कर्त्ता नहीं हो सकता ) । परिशेषानुमान के द्वारा यतः ज्ञान आत्मा रूप कारण का कार्य है, अतः ज्ञान रूप कार्य से आत्मा रूप कारण को समझते हैं । न्यायकन्दली करणभावाच्चेति । मनश्चेतनं न भवति करणत्वाद् घटादिवदिति । असिद्धं मनसः करणत्वम् कर्तृ त्वाभ्युपगमादिति चेत्? मनसः कर्त्तृत्वे रूपादिप्रतीतौ चक्षुरादिवत् सुखादिप्रतीत करणान्तरं मृग्यं क्रियायाः करणमन्तरेणानुपजननात् । तथा सति च सञ्ज्ञाभेदमात्रम्, कर्तुःकरणस्य चोभयोरपि सिद्धत्वात् । इतोऽप्यचेतनं मनोमूर्त्तत्वाल्लोष्टवत् । यदि शरीरेन्द्रियमनसां गुणो ज्ञानं न भवति, तथाप्यात्मसिद्धौ किमायातं तत्राह --- परिशेषादिति । ज्ञानं तावत् कार्यत्वात् कस्यचित् समवायिकरणस्य कार्य्यम्, शरीरेन्द्रियमनसाञ्च तदाश्रयत्वं प्रतिषिद्धम् । न चान्येषु वक्ष्यमाणेन न्यायेन ज्ञानकारणत्वं प्रति शक्तिरस्ति, अतः परिशेषादात्मकार्य्यं ज्ञानम् । आत्मकार्य्यत्वात्तेन ज्ञानेनात्मा समधिगम्यत इत्युपसंहारः । ननु सर्वमेतदसम्बद्धम्, क्षणिकत्वेनाश्रयाश्रयिभावाभावात् । तथा हि-' स्वयं करणभावाच्च ' इस वाक्य से कहते हैं । मन चेतन नहीं है, क्योंकि स्वयं करण हैं, जैसे कि घटादि । ( प्र ० ) मैंने तो मन को कर्त्ता मान लिया है फिर उसके करणत्व की चर्चा कैसी? ( उ ० ) मन को अगर कर्ता मान लें तो फिर जैसे रूपादिज्ञान के चक्षु-रादि करण हैं, वैसे ही सुखादि ज्ञान के लिए भी कोई करण खोजना पड़ेगा । क्योंकि करण के बिना किया की उत्पत्ति ही असम्भावित है । तब फिर नाम का ही विवाद रह जाता है, क्योंकि सुखादि प्रतीति के कर्ता और करण दोनों ही सिद्ध हो चुके हैं । मन चेतन नहीं है, क्योंकि वह मूर्त्त है, जैसे कि ढेला, इस प्रकार मूर्त्तत्त्र हेतु से भी समझते हैं कि मन चेतन नहीं है । ( प्र ० ) ज्ञान शरीर, इन्द्रिय एवं मन इन तीनों में से किसी का भी गुण नहीं है, यह सिद्ध हो जाने पर आत्मा की सिद्धि में क्या उपकार हुआ? इसी प्रश्न का उत्तर ' परिशेषात् ' इत्यादि से देते हैं । यतः ज्ञान ( समवेत ) कार्य है, अतः अवश्य ही उसका कोई समवायिकारण है । यह सिद्ध हो चुका है कि शरीर, इन्द्रिय और मन ये तीनों समदाय सम्बन्ध से उसके आश्रय नहीं हैं । आगे कही जाने वाली युक्तियों से और भी किसी वस्तु ज्ञान ( समवायि ) कारणत्व रूप शक्ति सम्भव नहीं है, अतः परिशेषानुमान से यह समझते हैं कि ज्ञान आत्मा रूप समवायिकारण का ही कार्य है । यही प्रकृत विषय का उपसंहार है । ( प्र ० ) किन्तु ये सभी बातें असम्बद्ध हैं, क्योंकि संसार की सभी वस्तुएँ क्षणिक १. बौद्धों का कहना है कि ' बीजों में अङ्कुरों को जन्म देने का सामर्थ्य For Private And Personal