प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 351–360
प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 351–360
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir २७६ न्यायकन्दलीसंवलिप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ गुणसंख्या-एवं द्वित्वस्योत्पन्नस्य प्रतीतिकारणं निरूपयति - ततः पुनरिति । ततो द्वित्वोत्पादादनन्तरं द्वित्वसामान्ये तस्मिन् ज्ञानमुत्पद्यते । अत्रापि संयुक्तसमवाय एव हेतुः । एकत्वसामान्यापेक्षया पुनरिति वाचोयुक्तिः । द्वित्वसामान्यं द्वित्वगुणस्य विशेषणम्, न चागृहीते विशेषणे विशेष्ये बुद्धिरुदेति, अतो विशेष्यविज्ञान-कारणत्वेनादौ सामान्यज्ञानं निरूपितम् । अस्य सद्भावेऽपि द्वित्वसामान्यविशिष्टा द्वित्वबुद्धिरेव प्रमाणम् । तस्याः सद्भावेऽपि द्वे द्रव्ये इति ज्ञानं प्रमाणम् । द्वे द्रव्ये इति ज्ञानं विशेषणज्ञानपूर्वकं विशिष्टज्ञानत्वाद् दण्डीति ज्ञानवदित्यनुमिते गुणज्ञाने तस्यापि विशिष्टज्ञानत्वेन विशेषणज्ञानपूर्वकत्वमनुमेयम् । येतु विशेषणविशेष्ययो रे कज्ञानालम्बनत्वमाहुः, तेषां सुरभि चन्दन-इस प्रकार से उत्पन्न द्वित्व के प्रत्यक्ष के कारणों का निरूपण ' ततः पुनः इत्यादि ग्रन्थ से करते हैं । ' ततः ' अर्थात् द्वित्व की उत्पत्ति के बाद, ' तस्मिन् ' अर्थात् संख्या रूप द्वित्व में जाति रूप द्वित्व ( द्वित्वत्व ) का ज्ञान उत्पन्न होता है । जाति स्वरूप इस द्वित्व के प्रत्यक्ष में संयुक्तसमवेतसमवाय सम्बन्ध ही कारण है । ( द्वित्व के आश्रयी-भूत दोनों द्रव्यों में अलग अलग ) पहिले एकत्व ही था, उसके बाद द्वित्व की उत्पत्ति हुई- - इस आनन्तर्य को समझाने के लिए ही ' पुनः ' शब्द का प्रयोग है । जातिरूप द्वित्व ( द्वित्वत्व ) संख्यारूप द्वित्व का विशेषण है । विशेषण का ज्ञान विशेष्य ( विशिष्ट ) ज्ञान का कारण है, अतः बिना विशेषण ज्ञान के विशेष्य ( विशिष्ट ) ज्ञान उत्पन्न ही नहीं हो सकता । इसी लिए सब से पहिले सामान्य रूप द्वित्व के ज्ञान का ही निरूपण किया गया है । जातिरूप द्वित्व ( द्वित्वत्व ) विशिष्ट संख्यारूप द्वित्व का ज्ञान सर्वजनीन है, इसी से प्रमाणित होता है कि जातिरूप द्वित्व का भी अस्तित्व है । एवं ' द्वे द्रव्ये ' इत्यादि आकार की विशिष्ट अनुभूतियों से ही संख्यारूप द्वित्व की सत्ता प्रमाणित होती है । इस प्रसङ्ग में अनुमान का प्रयोग इस प्रकार है कि जिस प्रकार ' दण्डी पुरुष: ' यह विशिष्ट बुद्धि केवल विशिष्ट बुद्धि होने के कारण हो दण्डरूप विशेषण की सत्ता के बिना नहीं हो सकती, उसी प्रकार ' द्वे द्रव्ये ' इस आकार की विशिष्ट बुद्धि भी केवल विशिष्ट बुद्धि होने के कारण ही संख्यात्मक द्वित्व रूप विशेषण के अस्तित्व के बिना सम्भव नहीं है । अतः द्वित्व संख्या की सत्ता अवश्य है । द्वित्व संख्या की इस प्रकार से अनुमिति हो जाने पर ' इस अनुमिति की भी उत्पत्ति विशिष्ट बुद्धि होने के कारण ही जातिरूप द्विज विशेषण की अस्तित्व के बिना सम्भव नहीं है, अतः जातिरूप द्वित्व की भी सत्ता अवश्य है ' इस प्रकार द्वित्व संख्या की अनुमिति के बाद जातिरूप द्वित्व का भी उक्त रीति से अनुमान करना चाहिए । जो कोई विशेष्य और विशेषण दोनों को ( नियमतः ) एक ही ज्ञान का विषय मानते हैं, उनके सामने ' सुरभि चन्दनम् ' इस ज्ञान का प्रसङ्ग रखना चाहिए, For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली २७७ मित्यत्र का वार्त्ता? नहि चक्षुर्गन्धविषयं न च घ्राणं द्रव्यमादत्ते । अत एव न ताभ्यां सम्बन्धग्रह्णम्, उभयसम्बन्धिग्रहणाधीनत्वात् सम्बन्धग्रहणस्य । यथा संस्का-रेन्द्रियजन्यं प्रत्यभिज्ञाप्रत्यक्षमुभयकारणसामर्थ्यात्पूर्वापरकालविषयम्, एवं चक्षुर्घा -णाभ्यां सम्भूय जन्यमानमिदं कारणद्वयसामर्थ्यादुभयविषयं स्यादित्येके समर्थयन्ति । तदपि न साधीयः, निर्भागत्वात् । यदि ज्ञानं सभागं स्यात्तदा कश्चिदस्यांशो घ्राणेन जन्येत कश्चिच्चक्षुषेत्युपपद्यते व्यवस्था, किन्त्विदमेकमखण्ड मुभाभ्यां जनितं यदि गन्धं द्रव्यं च गृह्णाति, तदा गन्धोऽपि चाक्षुषो द्रव्यमपि घ्राणगम्यं प्रसक्तम्, तज्जनितज्ञानविषयत्वलक्षणत्वात्तदिन्द्रियग्राह्यतायाः । न चाणुत्वान्मनसो युगपदुभयेन्द्रियाधिष्ठानसम्भवः । तस्माद् घ्राणेन गन्धे गृहीते पश्चात्तद्ग्रहणसहकारिणा चक्षुषा केवलविशेष्यालम्बनमेवेदं विशेष्यज्ञानं जन्यत इत्यकामेनाप्यभ्युपगन्तव्यम् । तथा च सत्यन्येषामपि विशेष्यज्ञानानामयं न्याय क्योंकि गन्ध का ग्रहण आँखों से नहीं होता, एवं घ्राण में द्रव्य को ग्रहण करने की शक्ति नहीं है । अत एव सौरभ और चन्दन इन दोनों का ग्रहण भी इन दोनों इन्द्रियों से नहीं हो सकता, क्योंकि सम्बन्ध के प्रत्यक्ष के लिए उनके दोनों आश्रयों का प्रत्यक्ष आवश्यक है । कोई कहते हैं कि ' सुरभि चन्दनम् ' यह एक ही ज्ञान चक्षु और घ्राण दोनों इन्द्रियों से होता है । इसका समर्थन इस प्रकार करते हैं कि जिस प्रकार ( योऽहं घटमद्राक्षं सोऽहमिदानीं स्मरामि ) इत्यादि आकार की प्रत्यभिज्ञारूप प्रत्यक्ष इन्द्रिय से उत्पन्न होने के कारण वर्तमान काल विषयक होता हैं, एवं संस्कार से उत्पन्न होने के कारण भूतकाल विषयक भी होता है, इस प्रकार ' सुरभि चन्दनम् ' यह ज्ञान अलग अलग सामर्थ्य वाली चक्षु और घ्राण इन दोनों इन्द्रियों से उत्पन्न होने के कारण द्रव्य एवं सौरभ दोनों विषयों का हो सकता है । किन्तु इस प्रकार का समर्थन संगत नहीं है, क्योंकि ज्ञान अखण्ड है, उसके अंश नहीं होते । यदि ज्ञान अंशों से युक्त होता तो यह कह सकते थे कि उसका एक अंश आँखों से उत्पन्न होता है तो दूसरा घ्राण से । अतः ज्ञान अगर अखण्ड है और उसकी उत्पत्ति दो इन्द्रियों से होती है, एवं सौरभ और द्रव्य दोनों उसके विषय हैं तो फिर यह मानना ही पड़ेगा कि गन्ध का ग्रहण भी आंख से होता है, एवं घ्राण से द्रव्य भी गृहीत होता है, क्योंकि जिस इन्द्रिय के द्वारा उत्पन्न ज्ञान से जिसका प्रतिभास होता है, वही उस इन्द्रिय का ग्राह्य विषय है । दूसरी बात यह है कि मन अणु है, अतः एक ही समय वह दो इन्द्रियों का अधिष्ठान नहीं हो सकता, अतः इच्छा न रहते हुए भी प्रकृत में आप को यही मानना पड़ेगा कि घ्राण के द्वारा केवल गन्ध का ग्रहण हो जाने के बाद उसके सहकारी चक्षु के द्वारा केवल विशेष्य विषयक ( चन्दन विषयक ) ज्ञान उत्पन्न होता है । इस प्रकार यही रीति अन्य विशेष्य ज्ञानों के लिए भी प्रयुक्त होती For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir २७८ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ गुणसंख्या-उपतिष्ठते । विवादाध्यासितं विशेष्यज्ञानं, केवलविशेष्यालम्बनं, प्रत्यक्षत्वे सति विशेष्यज्ञानत्वात्, सुरभि चन्दनमिति ज्ञानवत् । प्रत्यक्षत्वे सतीति लैङ्गिकज्ञान-व्यवच्छेदार्थम् । ननु यदि द्रव्यस्वरूपमात्रमेव विशेष्यज्ञानस्यालम्बनम् असत्यपि विशेषणे तथा प्रत्ययः स्यात् । अथ विशेषणस्य जनकत्वान्न तदभावे विशेष्यज्ञानो-दय:, तथापि द्रव्यरूपप्रत्ययादस्य न विशेषः, विषयविशेषमन्तरेण ज्ञानस्य विशेषा-न्तराभावात् न, अनभ्युपगमात् । न विशेष्यज्ञानस्य द्रव्यस्वरूपमात्रमालम्बनं ब्रूमः, किन्तु विशिष्टम् । विशिष्टता च स्वरूपातिरेकिण्येव, या दण्डीति ज्ञाने प्रतिभासते । न खलु तत्र पुरुषमात्रस्य प्रतीतिर्नापि दण्डसंयोगितामात्रस्य । तथा च दण्डीति प्रतीतावितरविलक्षण एव पुरुषः संवेद्यते । वैलक्षण्यं चास्य दण्डोपसर्जनत्वमेव । अत एव विशेषणं व्यवच्छेदकमिति गीयते । दण्डो हि स्वोपसर्जनताप्रतिपत्त पुरुषे कुर्वन् पुरुषमितरस्माद् व्यवच्छिनत्ति । अयमेव है | इससे यह अनुमान निष्पन्न होता है कि जिस प्रकार ' सुरभि चन्दनम् ' यह ज्ञान प्रत्य-क्षात्मक होने पर भी केवल विशेष्य विषयक ज्ञान है, उसी प्रकार प्रकृत में विवाद का विषय ' द्वे द्रव्ये ' यह ज्ञान भी केवल विशेष विषयक ही है, क्योंकि वह भी प्रत्यक्षात्मक होने पर भी विशेष्य ज्ञान है । प्रकृत अनुमान वाक्य के प्रयोग के हेतु वाक्य में ' प्रक्षत्वे सति ' यह विशेषण अनुमिति में व्यभिचार वारण के लिए है । ( प्र ० ) यदि ' द्वे द्रव्ये ' इस विशेष्य ( विशिष्ट ) ज्ञान का विषय केवल द्रव्य ही हो तो फिर विशेषण के न रहने पर भी उक्त प्रकार की प्रतीति होनी चाहिए । यदि यह कहें कि विशेषण विशेष्यज्ञान का कारण है, अतः विशेषण के न रहने पर विशिष्टज्ञान की उत्पत्ति नहीं होती है, तथापि केवल ' द्रव्यम् ' इस आकार के ज्ञान में और उक्त विशिष्टज्ञान में कोई अन्तर नहीं रहेगा, क्योंकि कारणों की विभिन्नता रहते हुए भी दोनों ज्ञानों के विषयों में कोई अन्तर नहीं है । विषयों के भेद से ही ज्ञानों में भेद होता है कारणों के भेद से नहीं । ( उ ० ) हम यह नहीं मानते कि ' द्वे द्रव्ये ' इस ज्ञान में केवल द्रव्य ही विषय है । किन्तु ' विशेष्य ' ( विशिष्ट ) को उक्त ज्ञान का विषय मानते हैं । ' दण्डी ' इस प्रकार की विशिष्ट प्रतीति में भासित होने वाली विशिष्टता विशेष्य ( विशिष्ट ) के स्वरूप से कोई भिन्न वस्तु नहीं है । ' दण्डी ' इस प्रतीति के दण्ड से रहित पुरुषों के विलक्षण पुरुष का ही बोध होता है । और पुरुषों से इस पुरुष में यही वैलक्षण्य है कि यह दण्डरूप विशेषण का विशेष्य है, और कुछ भी अन्तर नहीं है । अत एव विशेषण को व्यवच्छेदक ( भेदक ) कहा जाता है । पुरुष में अपनी ( दण्ड की ) विशेष्यता की प्रतीति एवं इस पुरूष को और पुरुषों से भिन्न में समझना ये ही दो काम यहाँ दण्डरूप विशेषण के हैं । विशेषण और उपलक्षण इन दोनों में यही अन्तर है कि उपलक्षण For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् २७६ पेक्षा बुद्धेविनश्यता, द्वित्व सामान्यतत्सम्बन्धतज्ज्ञानेभ्यो द्वित्वगुणबुद्धे-रुत्पद्यमानतेत्येकः कालः । तत इदानीमपेक्षा बुद्धिविनाशाद् द्वित्वगुणस्य अपेक्षाबुद्धि के विनाश की सम्भावना उत्पन्न होती है । द्वित्व संख्या रूप गुण का द्वित्वसामान्य के साथ सम्बन्ध और द्वित्व गुण में द्वित्वसामान्य का ज्ञान इन सबों से गुणरूप द्वित्वविषयक बुद्धि की उत्पत्ति की सम्भावना, इतने काम एक काल में होते हैं । इसके बाद उसी समय अपेक्षाबुद्धि के विनाश से गुणरूप द्वित्व न्यायकन्दली चास्योपलक्षणाद्विशेषः । उपलक्षणमपि व्यवच्छिनत्ति, न तु स्वोपसर्गनताप्रतीति-हेतुः । नहि यथा दण्डीति दण्डोपसर्जनता पुरुषे प्रतीयते तथा जटाभिस्तापस इति तापसे जटोपसर्जनता, दण्डोपसर्जनतापुरुषस्य प्राधान्यं चार्थक्रि-यायामुपभोगातिशयाऽनतिशयापेक्षया । नन्वेवं तर्ह्यपेक्षिकोऽयं विशेषणविशे-ष्यभावो न वास्तवः किं न दृष्टो भवद्भिः कर्तृकरणादिव्यवहार आपेक्षिको वास्तवश्चेति कृतं विस्तरेण संग्रहटीकायाम् । द्वित्वसामान्यज्ञानादपेक्षाबुद्धेविनश्यत्ता । उभयकगुणालम्बना बुद्धिरपेक्षा-बुद्धिरित्युच्यते । तस्या द्वित्वसामान्यज्ञानाद्विनश्यता विनाशकारणसान्निध्यं द्वित्वसामान्यात् । तस्य द्वित्वगुणेन सह सम्बन्धाज्ज्ञानाच्च द्वित्वगुणबुद्धे-अपने आश्रय को दूसरों से भिन्न रूप में समझाता तो है, किन्तु उसमें अपनी उपसर्जनता की प्रतीति को उत्पन्न नहीं करता, क्योंकि ' दण्डी ' इस प्रतीति से जिस प्रकार में दण्डरूप विशेषण की उपसर्जनता प्रतीत होती है, उसी प्रकार ' जटाभिस्तापसः ' पुरुष इस प्रकार के स्थलों में जटादि से युक्त तापसादि को जटा से शून्य तापसादि से विलक्षण रूप में भान यद्यपि होता है, फिर भी जटादि उपलक्षणों की उपसर्जनता की प्रतीति तापसादि में नहीं होती । दण्ड से युक्त ( दण्डी ) पुरुष में दण्ड से रहित पुरुष की अपेक्षा विशेष प्रकार का उपभोग मिलता है, इसी दृष्टि से दण्डी पुरुष में प्रधानता और दण्ड में उपसर्जनता है । ( प्र ० ) तो फिर यह कहिये कि विशेष्यविशेषण-भाव आपेक्षिक हैं, वास्तविक नहीं? ( उ ० ) क्या आप लोगों ने कर्तृत्वकरणत्वादि के आपेक्षिक है, वास्तविक दोनों प्रकार के व्यवहार नहीं देखे है? टीकादि रूप संग्रह ग्रन्थों में इससे अधिक लिखना व्यर्थ है । ( द्वित्व सामान्यज्ञानादपेक्षा बुद्धेविनश्यत्ता ) । गुणस्वरूप दो एकत्वों को विषय करने-वाले एक ज्ञान को ' अपेक्षाबुद्धि ' कहते हैं । जातिस्वरूप द्वित्व ( द्वित्वत्व ) के ज्ञान से उसकी ( अपेक्षा बुद्धि की ) ' विनश्यत्ता ' अर्थात् उसको विनष्ट करनेवाले कारणों की समीपता संघटित होती है, ( फलतः विनाश को उत्पन्न करनेवाली सामग्री का संवलन होता है ) । For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir २८० न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्ययम् [ गुणे संख्या-प्रशस्तपादभाष्यम् विनश्यत्ता, द्वित्वगुणज्ञानम्, द्वित्वसामान्यज्ञानस्य विनाशकारणम्, द्वित्व-गुणतज्ज्ञानसम्बन्धेभ्यो द्वे द्रव्ये इति द्रव्यबुद्धेरुत्पद्यमानतेत्येकः कालः । के विनाश की सामग्री का संवलन, गुणरूप द्वित्व का ज्ञान, सामान्यरूप द्वित्व विषयक ज्ञान के विनाशक गुणरूप द्वित्व का ज्ञान, गुणरूप दित्व और उसका ज्ञान एवं गुणरूप द्वित्व का ( अपने आश्रय द्रव्य के साथ ) सम्बन्ध इन तीनों से ' द्वे द्रव्ये ' इस आकार के द्रव्य विषयक ज्ञान की सामग्री का न्यायकन्दली रुत्पद्यमानता उत्पत्तिकारणसान्निध्यम् । द्वित्वसामान्यज्ञानमपेक्षाबुद्धे विनाशकं गुणबुद्धेश्चोत्पादकम् । तेन तदुत्पत्तिरेवैकस्य विनश्यता परस्य चोत्पद्यमान-त्युपपद्यते विनश्यत्तोत्पद्यमानतयोरेककालत्वम् । तत इदानीमपेक्षा-बुद्धिविनाशो द्वित्वविनाशस्य कारणम्, तत्सद्भावे तस्यानुपलम्भात् । अतोऽपेक्षा बुद्धिविनाशो द्वित्वस्य विनश्यत्ता । दृष्टो गुणानां निमित्तकार-णादपि विनाशो यथा मोक्षप्राप्त्यवस्थायामन्त्यतत्त्वज्ञानस्य शरीरविनाशात् । द्वित्वगुणज्ञानं द्वित्वसामान्यज्ञानस्य विनाशकारणं बुद्धेर्बुद्धयन्तर-विरोधात् । तथा द्रव्यज्ञानस्यापि कारणम् । अतो गुणबुद्धयुत्पाद एवै-कस्योत्पद्यमानताऽपरस्य विनश्यता स्यात् । द्वित्वगुणज्ञानसम्बन्धेभ्य इति । जातिरूप द्वित्व का गुणस्वरूप द्वित्व के साथ सम्बन्ध एवं इस सम्बन्ध का ज्ञान इन दोनों से गुणस्वरूप द्वित्व की ' उत्पद्यमानता ' अर्थात् द्वित्व संख्या को उत्पन्न करने वाले कारणसमूह परस्पर समीप हो जाते हैं, ( द्वित्वोत्पत्ति की सामग्री एकत्र हो जाती है ) । जातिरूप द्वित्व ( द्विश्वत्व ) का ज्ञान अपेक्षाबुद्धि का नाशक एवं गुणस्वरूप द्वित्व ( संख्या ) विषयक बुद्धि का उत्पादक भी है, अतः जातिरूप द्वित्व विषयक बुद्धि की उत्पत्ति एक ( अपेक्षा बुद्धि ) की ' विनश्यत्ता ' एवं दूसरे ( गुणस्वरूप द्वित्व-विषयक बुद्धि ) की उत्पद्यमानता दोनों ही है । सुतराम् उक्त विनश्यत्ता एवं उक्त उत्पद्यमानता दोनों का एक ही समय रहना युक्ति से सिद्ध है ( असङ्गत नहीं ) । उसके बाद के क्षण में अपेक्षाबुद्धि का नाश होता है, यही ( नाश ) द्वित्व के नाश का कारण है, क्योंकि अपेक्षाबुद्धि के विनाश के बाद द्वित्व की उपलब्धि नहीं होती है, अत: अपेक्षा बुद्धि का विनाश ही द्वित्वबुद्धि की ' विनश्यत्ता ' है । जिस प्रकार मोक्षप्राप्ति की अवस्था में शरीर रूप निमित्तकारण के विनाश से अन्तिम तत्त्वज्ञानरूप गुण का विनाश होता है, उसी प्रकार ( यह मानना पड़ेगा कि ) निमित्तकारण के विनाश से भी अन्य गुणों का विनाश होता है । गुणस्वरूप द्वित्व का ज्ञान जातिरूप द्वित्वविषयक ज्ञान का विनाशक है, क्योंकि एक बुद्धि दूसरी बुद्धि की विनाशिका है । एवं ( गुणस्वरूप द्वित्व विषयक यह For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra प्रकरणम् ] ३६ www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir भाषानुवादसहितम् २८१ प्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली For Private And Personal तदनन्तरं द्वे द्रव्ये इति द्रव्यज्ञानस्योत्पादो द्वित्वस्य विनाशो द्वित्व-गुणबुद्धेर्विनश्यत्ता द्रव्यज्ञानात् संस्कारस्योत्पद्यमानतेत्येकः कालः । तदनन्तरं द्रव्यज्ञानाद् द्वित्वगुणबुद्धेविनाशो द्रव्यबुद्धेरपि संस्कारात् । संवलन, द्रव्यज्ञान से उसी विषयक संस्कार की उत्पादक सामग्री का संवलन - इतने काम एक समय में होते हैं । इसके बाद उक्त द्रव्य विषयक ज्ञान से गुणरूप द्वित्व विषयक बुद्धि का विनाश और उस द्रव्य विषयक बुद्धि का भी संस्कार से विनाश हो जाता है । द्वित्वगुणश्च तस्य ज्ञानं च सम्बन्धश्चेति योजना । तदनन्तरं द्वे द्रव्ये इति द्रव्यज्ञानस्योत्पादो द्वित्वस्य विनाशो गुणबुद्धेविनश्यत्तेत्येकः कालः । यद्यपि द्वे द्रव्ये इति ज्ञानोत्पत्तिकाले द्वित्वं नास्ति, तथापि तदस्य कारणम्, कार्योत्पत्ति-काले कारणस्थितेरनुपयोगात् । कार्योत्पत्त्यनुगुणव्यापारजनकत्वं हि कारणस्य कारणत्वम् । स चेदनेन कृतः किमस्य कार्योत्पत्तिकाले स्थित्या? व्यापारादेव कार्योत्पत्तिसिद्धेः । न त्वेवं सति तस्याकारकत्वम्, व्यापारद्वारेण तस्यैव हेतुत्वात् । न चैवं सति भाक्तं कारकत्वम्? स्वव्यापारेण व्यवधाना-ज्ञान ' द्वे द्रव्ये ' इस प्रकार के ) द्रव्य विषयक ज्ञान का उत्पादक भी है । अतः गुण स्वरूप द्वित्व विषयक बुद्धि की उत्पत्ति एक ( सामान्य रूप द्वित्व विषयक ज्ञान ) की ' विनश्यत्ता ' एवं दूसरे ( ' द्वे द्रव्ये इस द्रव्य ज्ञान ' ) को ' उत्पद्यमानता ' दोनों ही होंगी । ' द्वित्वगुणज्ञानसम्बन्धेभ्यः ' इस समस्त वाक्य का विग्रह इस प्रकार है -- द्वित्वगुणश्च, तस्य ज्ञानश्च सम्बन्धश्च | इसके बाद के एक समय में ' द्वे द्रव्ये ' इस द्रव्यज्ञान की उत्पत्ति, द्वित्व का विनाश एवं गुणस्वरूप द्वित्वविषयक बुद्धि की विनश्यता ये तीन काम होते हैं । यद्यपि ' द्वे द्रव्ये ' इस ज्ञान के उत्पत्तिकाल में द्वित्व की सत्ता नहीं रहती, फिर भी द्वित्व उस ज्ञान का कारण अवश्य है । कारण होने के लिए यह आवश्यक नहीं है कि वह कार्य के उत्पत्ति क्षण तक रहे ही, क्योंकि कार्य के उत्पादन में उस समय तक कारण की सत्ता का कुछ भी उपयोग नहीं है । कारण का इतना ही स्वरूप है कि कार्य की उत्पत्ति के अनुकूल किसी व्यापार को वह उत्पन्न कर दे । यह ( व्यापारोत्पादन-रूप ) काम अगर इस ( द्वित्व ) ने कर दिया तो फिर कार्य की उत्पत्ति के समय उसकी सत्ता रहे ही इससे क्या प्रयोजन? द्वित्व से उत्पन्न व्यापार के द्वारा ' द्वे द्रव्ये ' इस ज्ञान-स्वरूप कार्य की उत्पत्ति तो हो ही जाएगी, किन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि वह ( व्यापारी द्वित्व ) कारण ही नहीं है, वह भी ( उत्पत्तिक्षण के अव्यवहित पूर्व क्षण में न रहने पर भी ) व्यापार के उत्पादन के द्वारा कारण अवश्य हैं । ( प्र ० ) तो फिर द्वित्व में व्यापार के द्वारा कारणत्व के रहने से कारकत्व का प्रयोग गौण है ( उ ० ) नहीं, क्योंकि मध्य में
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir २८२ न्यायकन्दली संवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संख्या-प्रशस्तपादभाष्यम् एतेन त्रित्वाद्युत्पत्तिरपि व्याख्याता | एकत्वेभ्योऽनेक विषय बुद्धिसहितेभ्यो निष्पत्तिरपेक्षा बुद्धिविनाशाच्च विनाश इति । इसी से ( अनेक द्रव्यों में रहनेवाली ) त्रित्वादि संख्याओं की भी व्याख्या समझनी चाहिए । ( फलतः अनेक द्रव्यों में रहनेवाली संख्याओं की उत्पत्ति ) अनेक विषयक बुद्धि का साथ रहने पर अनेक एकत्वों से होती है, एवं अपेक्षा बुद्धि विनाश से इन ( अनेकद्रव्या संख्याओं ) का विनाश होता है । न्यायकन्दली भावात् । अन्यथा शरमुक्तिसमकालं निष्ठुरपृष्ठाभिघातादभिपतितस्य धन्विनः क्षणान्तरभाविनि लक्ष्यव्यतिभेदे कर्त त्वं न स्यात् । तदनन्तरं द्रव्यज्ञानाद् गुणबुद्धेविनाशः, संस्कारस्योत्पद्यमानता, ततः संस्कारस्योत्पादो द्रव्यबुद्धे-विनश्यत्ता, क्षणान्तरे संस्काराद् द्रव्यबुद्धे विनाशः, द्रव्यबुद्धिविनाशकारणत्वं च, संस्कारस्य नद्भावभावित्वादन्यथाऽसम्भवाच्च । एतेन त्वाद्युत्पत्तिरपि व्याख्याता । एतेन द्वित्वोत्पत्तिविनाशनिरूपण-प्रक्रमेण त्रित्वादीनामुत्पत्तिर्व्याख्याता । तमेव प्रकारं दर्शयति - एकत्वेभ्योऽ-विषय बुद्धिसहितेभ्यो निष्पत्तिरपेक्षाबुद्धिविनाशाच्च विनाश इति । व्यापार के रहने से भी व्यवधान नहीं माना जाता । अगर ऐसी बात न हो तो फिर तीर छोड़ने के समय यदि कोई धनुषधारी पीठ में पाये हुए किसी निष्ठुर आघात से गिर जाय और उस छोड़े हुए तीर से आगे क्षण में लक्ष्य का छेदन भी हो जाय, तब उस धनुषधारी में उस छेदन क्रिया के कर्तृत्व का व्यवहार न होगा, ( क्योंकि छेदन क्रिया की उत्पत्ति के समय उसकी सत्ता नहीं है ) । इसके बाद ' द्वे द्रव्ये ' इस आकार के द्रव्यज्ञान से गुण ( द्वित्व ) बुद्धि का नाश होता है, एवं संस्कार के कारण ऐकत्र होते हैं । इसके दूसरे क्षण में संस्कार की उत्पत्ति होती है, एवं उक्त द्रव्यबुद्धि के विनाशक और कारणों का संवलन होता है । इसके बाद के क्षण में संस्कार से उक्त ' द्वे द्रव्ये ' इस बुद्धि का विनाश होता हैं । संस्कार के रहने से ही उक्त बुद्धि का नाश होता है, एवं संस्कार को छोड़ कर और कोई उसके विनाश का कारण सम्भव भी महीं है । इन्हीं दोनों से यह समझना चाहिए कि संस्कार ही उक्त द्वित्वविषयक बुद्धि के विनाश का कारण है । एतेन त्रित्वाद्युत्पत्तिरपि व्याख्याता | ' एतेन ' द्वित्व की उत्पत्ति एवं विनाश के उक्त उपपादनक्रम से त्रित्वादि और अनेक द्रव्यों में ही रहनेवाली ( अनेकद्रव्या ) और संख्याओं की भी व्याख्या हो गयी समझनी चाहिए । त्रित्वादि संख्याओं की उत्पत्ति की ही रीति ' एकत्वेभ्योऽनेकबुद्धिसहितेभ्यो निष्पत्तिरपेक्षा बुद्धिविनाशाच्च विनाश: ' इत्यादि से दिखलायी गयी है । For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषावादसहितम् २८३ एतेन शतसङ्ख्याद्युत्पत्तिरपि समर्थता । प्रत्येकमनुभूतेष्वेकैकगुणेषु क्रमभाविनां संस्काराणामन्त्यगुणानुभवानन्तरं शतव्यवहारसंवर्तकादृष्टा-युगपदभिव्यक्तौ संयोगकत्वादनेक विषयैकस्मरणोत्पादे सत्यनुभवस्मरणाभ्या-मपेक्षा बुद्धिभ्यां स्वाश्रयेषु शतसङ्ख्या जन्यते । सा च सर्वद्रव्ये संस्कारसचिवा अन्त्यद्रव्यसंयुक्तेन्द्रियज्ञानविषयत्वात् प्रत्यक्षैव । यत्र विनष्टेषु सङ्ख्येष्वन्ते सङ्कलनात्मकः प्रत्ययो जायते, शतं पिपीलिकानां मया निहतमिति, तत्र कथं शतसङ्ख्याया उत्पत्तिः? आश्रयाभावात् नोत्पद्यत एव तत्र सा, कारणाभावात् । शतव्यवहारस्तु रूपादिष्विव गौण इत्येके समर्थयन्ति । अपरे तु प्रतीतेस्तुल्यत्वादुपचारकल्पनामनादृत्यातीतानामेव द्रव्याणां संस्का रोपनीतत्वादाश्रयता मिच्छन्ति । यदत्यन्तममत् खपुष्पादि, तदकारणम्, निःस्व-भावत्वात् । अतीतानां तु वर्तमानकालसम्बन्धो नास्ति, न तु स्वरूपम्, तेषां इससे सौ प्रभृति संख्याओं को उत्पत्ति का भी समर्थन होता है । सौ द्रव्यों में से प्रत्येक में क्रमश: ( यह एक है ) होता है । उन अनुभवों से क्रमशः उत्पत्ति होती है । इस आकार के ' एक ' गुण का अनुभव एकत्व गुण विषयक संस्कारों की अन्तिम ' एक ' रूप गुणविषयक अनुभव के बाद सौ विषयक व्यवहार के सम्पादक अदृष्ट से वे सभी संस्कार उबुद्ध हो जाते हैं । ( किन्तु उन सभी संस्कारों से ) आत्मा और उनके एक ही संयोग के कारण अनेक एकत्व गुण विषयक एक ही स्मरण उत्पन्न होता है । इसके बाद अनुभव और स्मरण दोनों प्रकार की अपेक्षाबुद्धियों से उन श्रीभूत द्रव्यों में ' सौ नाम की संख्या उत्पन्न होती है । कथित सभी द्रव्य विषयक संस्कारों से उत्पन्न होनेवाली ' सौ ' नाम की इस संख्या को सत्ता में प्रत्यक्ष ही प्रमाण है, क्योंकि उन द्रव्यों में से अन्तिम द्रव्य एवं इन्द्रिय इन दोनों के संयोग से उत्पन्न ज्ञान के द्वारा ही वह गृहीत होता है | ( प्र ० ) संख्येयों ( द्रव्यों ) के विनष्ट होने के बाद जोड़ कर जहाँ संख्या की प्रतीति " मैंने सो कोड़ों को मारा " इत्यादि आकार की होती है, वहाँ ' सौ ' संख्या की उत्पत्ति किस प्रकार से होगी? क्योंकि उसके आश्रय ही विनष्ट हो गये हैं । इस प्रश्न का उत्तर कोई इस प्रकार देते हैं, कि ऐसे स्थलों में ' सौ ' संख्या को उत्पत्ति ही नहीं होती, अतः ऐसे स्थलों में सौ संख्या का व्यवहार रूपादि गुणों में संख्या के व्यवहार की तरह गौण है । कोई कहते हैं कि दोनों ही प्रकार के ( जहाँ सो संख्या का आश्रयीभूत द्रव्य हैं, एवं जहाँ उनका विनाश हो गया है ) स्थलों में संख्या की उक्त प्रतीति समान रूप से होती है, अतः इन प्रतीतियों में से एक प्रतीति को मुख्य और दूसरी को गौण नहीं मान सकते, अतः उक्त स्थल में विनष्ट अथ च संस्कार के द्वारा समीप tata front ही उक्त सौ संख्या का आश्रय है | आकाशकुसुमादि की किसी भी काल में सत्ता नहीं है, अतः वे कभी किसी के भी कारण नहीं होते, विनष्ट पिपीलिकादि में तो केवल वर्त्तमानकाल का ही सम्बन्ध नहीं है, उनके स्वरूप के अस्तित्व का तो अभाव नहीं है । For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir २८४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ गुणे संख्या-स्मृतिसन्निहितानां तर्कानुगुणसहकारिलाभात् समवायिकारणत्वमविरुद्धम् । न चैवं सति सर्वत्र तथाभाव:, यथादर्शनं व्यवस्थापनात् । अतीतस्य जनकत्वे-S नुभवस्यैव स्मृतिहेतुत्वसम्भवे संस्कारकल्पनावैयर्थ्यमिति चेन्न, निरन्वयप्रध्वस्त-स्यानुपस्थितस्यापि कारकत्वात्, तदुपस्थापनाकल्पनायां तु संस्कारसिद्धिः । तथा चान्त्यवर्णप्रतीतिकाले पूर्ववर्णानां विनष्टानामपि स्मृत्युपनीतत्वादर्थप्रतीतौ निमित्तकारणत्वमस्त्येव । यथेदं तथा समवायिकारणत्वमपि केषाञ्चिद्भविष्यति । यथा च संस्कारसचिवस्य मनसो बाह्ये स्मृत्युत्पादनसामर्थ्यमेवं प्रत्यक्षानुभव-जननसामर्थ्यमपि दृष्टत्वादेषितव्यम् । एवं च सति नान्धबधिराद्यभावो बाह्येन्द्रियप्रवृत्त्यनुविधायित्वात् । यत्र विनष्ट एव तत्र पराश्रये स्मृत्युपनीते द्वित्वमुत्पद्यते, स्मृतिलक्षणापेक्षा बुद्धिविनाशादेवास्य विनाशः, यत्र त्वाश्रये विद्यमाने तदुत्पन्नं अतः स्मृति के द्वारा समीप आयी हुई विनष्ट पिपीलिकादि वस्तुओं को भी अगर तर्कसम्मत सहकारी मिले तो वे भी समवायिकारण हो सकती हैं । इसमें कोई विरोध नहीं है । वस्तुस्थिति के अनुसार ही कल्पना की जाती है अतः उपर्युक्त दृष्टन्ति ( मात्र ) से यह कल्पना करना सङ्गत नहीं है कि विनष्ट हुए समवायिकारणों से ही सभी कार्य हों । ( ० ) अतीत वस्तु भी अगर कारण हो तो फिर अतीत अनुभव से ही स्मृति की उत्पत्ति हो ही जाएगी, इसके लिए संस्कार की कल्पना ही व्यर्थ है । ( 30 ) जड़मूल सेविनष्ट वस्तुओं को जब तक कोई विद्यमान दूसरी वस्तु ( कारण होने के लिए ) उपस्थित न करे तब तक वह कारण नहीं हो सकती । प्रकृत में अगर अनुभव को उपस्थित करनेवाले की कल्पना करें तो फिर संस्कार की ही कल्पना होगी । ( नाम में विवाद की सम्भावना रहने पर भी ) संस्कार ( वस्तु ) की सिद्धि हो ही जाएगी, अतः जिस प्रकार ज्ञान के समय विनष्ट भी पहिले के वर्णं वाक्य के अन्तिम अक्षर से स्मृति के द्वारा समीप लाये जाने पर शाब्दबोध के निमित्तकारण होते हैं, वैसे ही कुछ विनष्ट वस्तु समवायिकारण भी होंगे । वस्तुस्थिति के अनुसार ही तो कल्पना की जाती है, अतः प्रकृत में भी ऐसी कल्पना करेंगे कि संस्कार का साहाय्य पाकर मन जिस प्रकार बाह्य वस्तुओं के स्मरण को उत्पन्न करता है उसी प्रकार बाह्य वस्तुविषयक प्रत्यक्ष रूप अनुभव को भी ( मन ) उत्पन्न कर सकता है । इस ( मन से बाह्य वस्तु विषयक प्रत्यक्ष मान लेने ) से संसार से अन्धे और बहरों का लोप नहीं होगा, क्योंकि मन की प्रवृत्ति बाह्य इन्द्रियों के पीछे चलनेवाली है । जहाँ किसी आश्रयरूप वस्तुओं के नष्ट होने पर भी स्मृति के द्वारा उन्हें समीप लाये जाने पर उन विनष्ट वस्तुओं में द्वित्व उत्पन्न होता है, ऐसे स्थलों में स्मृति रूप अपेक्षाबुद्धि के नाश से ही द्वित्व का नाश होता है । किन्तु जहाँ विद्यमान वस्तुओं For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् क्वचिच्चाश्रय विनाशादिति । क कथम्? तदैवैकत्वसामान्यज्ञानमुत्पद्यते, २८५ करवा कर्म चावयवान्तराद्विभागः क्रियते, अपेक्षाबुद्धेश्चोत्पत्तिः । ततो यस्मिन्नेव कहीं आश्रय के विनाश से भी संख्यायें विनष्ट होती हैं । ( प्र ० ) कैसे? ( उ ० ) ( जिस स्थल विशेष में ) जिस समय संख्यारूप एकत्व के आधारभूत द्रव्य के अवयवों में क्रिया उत्पन्न होती है, उसी समय जातिरूप एकत्व का ज्ञान भी होता है । क्रिया एक अवयव से दूसरे अवयव को विभक्त करती है और अपेक्षाबुद्धि की उत्पत्ति होती है । इससे जिस समय विभाग से न्यायकन्दली तत्र न केवलमपेक्षा बुद्धिविनाशादस्य विनाशः क्वचिदाश्रयविनाशादपि स्यात् । एकस्य द्रव्यस्य द्वयोर्वा द्रव्ययोरभावाद् द्वे इति प्रत्ययाभावादित्याह - क्वचिच्चा-श्रयविनाशादिति । कथमित्यज्ञेन पृष्टस्तुदुपपादयन्नाह - यदेति । यस्मिन् काले एकगुणाश्रयस्य द्रव्यस्यावयवे क्रियोत्पद्यते तस्मिन् काले एकगुणवत्तन्ये-कत्वसामान्ये ज्ञानमुत्पद्यते, क्षणान्तरे कर्मणावयवान्तराद्विभागः क्रियते, एकत्व-सामान्यज्ञानादपेक्षाबुद्धेश्चोत्पत्तिः, यस्मिन्नेव कालेऽवयवद्रव्यविभागाद् द्रव्या-रम्भकसंयोगविनाशस्तदापेक्षा बुद्धद्वित्वमुत्पद्यते, ततः संयोगविनाशाद् द्रव्यस्य विनाशः, द्वित्वसामान्यबुद्धेश्वोत्पाद इत्येकः कालः । ततो यस्मिन् में ही द्वित्व उत्पन्न होता है, ऐसे स्थलों में अपेक्षा बुद्धि के नाश से ही द्वित्व का नाश नहीं होता है, ऐसे स्थलों में 4 कहीं आश्रय के नाश से भी द्वित्व का नाश होता है, क्योंकि एक ही द्रव्य के रहने पर या दोनों द्रव्यों के न रहने पर ' ये दो हैं ' इस प्रकार की प्रतीति नहीं हो सकती है । यही बात ' क्वचिच्चाश्रयविनाशात् ' इत्यादि से कहते हैं । ' कैसे? ' इस विषय में किसी अनजान के इस प्रश्न का उत्तर देते हुए ' यदा ' इत्यादि वाक्य लिखते हैं । जिस समय ' एक संख्या ' रूप गुण के आश्रयीभूत द्रव्य के अवयव में क्रिया होती है, उसी समय एक संख्या रूल गुण में रहनेवाला एकत्व रूप जाति विषयक ज्ञान भी उत्पन्न होता है । इसक े दूसरे क्षण में उस क्रिया से ( क्रियाश्रय अवयव का ) दूसरे अवयव से विभाग उत्पन्न होता है, एवं जातिरूप एकत्व के ज्ञान से अपेक्षा बुद्धि उत्पन्न होती है । इसके बाद जिस समय अवयव रूप द्रयों के विभाग से ( अवयवी ) ब्रव्य के उत्पादक संयोग का विनाश होता हैं, उसी समय अपेक्षांबुद्धि से द्वित्व की उत्पत्ति होती है । उसके बाद द्रव्य के आरम्भक संयोग के नाश से द्रव्य का नाश होता है एवं जाति रूप द्वित्व ( द्वित्वत्व ) विषयक बुद्धि की उत्पत्ति होती है । इतने काम एक समय में होते हैं । इसके बाद जिस समय द्वित्वत्व जाति के ज्ञान से For Private And Personal