प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 341–350
प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 341–350
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir २६६ ग्यायकन्दलीसंवलित प्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे रूपादीनां पाकजोत्पत्ति-न्यायकन्दली रक्तादीनामुत्पादः, श्यामाद्युच्छेदकाग्निसंयोगस्य विनाशः, द्वितीयपरमाणौ द्रव्यारम्भकक्रियाया उत्पद्यमानतेत्येकः कालः । ततस्तत्कार्यस्य विनाशः, तत्कार्यस्य विनश्यत्ता, उत्तरसंयोगस्योत्पादः, क्रियाविभागविभागजविभागानां विनश्यत्ता, द्वितीयपरमाणौ क्रियाया उत्पादः, विभागस्योत्पद्यमानतेत्येकः कालः । ततस्तत्कार्यस्य विनाशः, तत्कार्यस्य विनश्यत्ता, क्रियाविभागविभागजविभागानां विनाशः, द्वितीयपरमाण्वाकाशाविभागस्योत्पादः, तत्संयोगस्य विनश्यत्तेत्येकः कालः । ततस्तत्कार्यस्य विनाशः, तत्कार्यस्य विनश्यत्ता, परमाण्वाकाशसंयोगविनाशः, उत्तरसंयोगस्योत्पद्यमानतेत्येकः कालः । ततस्तत्कार्यस्य विनाशः, तत्कार्यस्य विनश्यत्ता, परमाणोः परमाण्वन्तरेण सहोत्तरसंयोगोत्पादः, द्वद्यणुकस्योत्पद्यमानता, विभागकर्म णोविनश्यत्तेत्येकः कालः । ततस्तत्कार्यस्य विनाशः, तत्कार्यस्य विनश्यत्ता, द्वयणुकस्योत्पादः, तद्गतानां रूपादीनामुत्पद्यमानता, विभागकर्मणोविनाशः, ततः क्षणान्तरे कारणगुणप्रक्रमेण द्व्यणुके गुणान्तरोत्पाद: । एवं सर्वत्र द्वयणुकेषु कल्पना । त्र्यणुकाद्युत्पत्तौ तु कर्म न चिन्तनीयम्, युगपद् बहूनां परमाणूनां रक्तरूपादि की उत्पत्ति, श्यामरूपादि के नाशक अग्नि के संयोग का विनाश, दूसरे ( पके हुए ) परमाणुओं में द्रव्य को उत्पन्न करनेवाली क्रिया की सम्भावना ये पाँच काम एक समय में होते हैं । ( ४ ) इसके बाद व्यसरेणुजनित द्रव्य से उत्पन्न कार्यद्रव्य का विनाश, एवं इस कार्यद्रव्य से उत्पन्न द्रव्य के विनाश की सम्भावना, क्रिया और विभागज-विभागों का विनाश, द्वितीय परमाणु के आकाश के साथ विभाग की उत्पत्ति, द्वितीय परमाणु एवं आकाश के पहिले संयोग के विनाश की सम्भावना ये छः काम एक समय में बाद प्रकृत कार्य का नाश होता है । इससे विनष्ट कार्यद्रव्य से होते हैं । ( ५ ) इसके उत्पन्न द्रव्य के विनाश की सम्भावना, एक संयोग की उत्पत्ति, ( पके हुए ) द्वघण्क की क्रिया के विनाश की सम्भावना ये छः काम परमाणु का दूसरे परमाणु के साथ उत्तर-उत्पत्ति की सम्भावना, एवं विभाग और एक समय में होते हैं । ( ६ ) इसके बाद ( उक्त सम्भावित विनाश के प्रतियोगी ) कार्यद्रव्य का विनाश एवं इस कार्यद्रव्य से उत्पन्न कार्यद्रव्य के विनाश की सम्भावना, ( पके हुए ) द्वणुक की उत्पत्ति, द्वथणुक में उत्पन्न होनेवाले ( रक्त ) रूपादि गुणों की उत्पत्ति की सम्भावना, विभाग एवं क्रिया का समय में होते हैं । इसके बाद अगले क्षण में दूसरे रक्त रूपादि विनाश ये छ: काम एक गुणों की उत्पत्ति होती है । भी कल्पना करनी चाहिए । इसी प्रकार नवीन घटादिके प्रयोजकीभूत और द्वयणुकों में यसरेणु की उत्पत्ति में क्रिया की चिन्ता अनावश्यक है, क्योंकि बहुत से परमा-For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् एकादिव्यवहारहेतुः संख्या २६७ ' यह एक है, ये दो हैं ' इत्यादि व्यवहारों का कारण ही ' संख्या ' है । न्यायकन्दली संयोगादुत्पन्नेषु द्वयणुकान्तरकारणस्य परमाणोद्वर्घणुकान्तरकारणेन परमाणुना सह संयोगाद् द्व्यणुकस्य द्व्यणुकान्तरकारणपरमाणुना संयोग:, ततोऽपि द्रयणुकयोः संयोग इत्यनेन क्रमेण संयोगजसंयोगेभ्य एतेषामुत्पादात् । एवं यथोपदेशं यथा-प्रज्ञं च व्याख्यातमस्माभिः । सिद्धे s पि सङ्ख्यास्वरूपे ये केचिदत्यन्तदुर्दर्शनाभ्यासतिरोहित-बुद्धयो विप्रतिपद्यन्ते तान् प्रत्याह – एकादीति । व्यवहृतिर्व्यवहारो ज्ञेयज्ञानं व्यवह्रियतेऽनेनेति व्यवहारः शब्दः, एकादिव्यवहार एकं द्वे त्रीणीत्यादि-प्रत्ययः शब्दश्च तयोर्हेतुः सङ्खयेति । एकं त्रीणीत्यादिप्रत्ययो विशेषणकृतो विशिष्टप्रत्ययत्वाद् दण्डीतिप्रत्ययवत् । एवं शब्दमपि पक्षीकृत्य विशिष्टप्रत्ययत्वादिति हेतुरवगन्तव्यः । णुओं के संयोग से द्वयणुकों की उत्पत्ति हो जाने पर दूसरे द्रयणुक के कारणीभूत परमाणु का तीसरे द्वणुक के कारणीभूत परमाणु के साथ भी संयोग होगा । इस संयोग से एक द्वथणुक का दूसरे द्वणुक के कारणीभूत परमाणु के साथ भी संयोग होगा । परमाणु एवं द्वणुक के इस संयोग से इस परमाणु के कार्यरूप द्वयणुक एवं पहिले के द्वयणुक इन दोनों में संयोगजसंयोग होगा । इन द्वयणुकों के संयोगजसंयोग के द्वारा भी यसरेणु की उत्पत्ति हो सकती है । इस विषय में हमलोगों को जैसी शिक्षा है और जितनी बुद्धि हैं, तदनुसार व्याख्या लिखी है । संख्या को यद्यपि सभी लोग जानते हैं फिर भी अत्यन्त दुष्ट दर्शनों के अभ्यास से जिनकी बुद्धि मारी गयी है, वे इसमें भी विवाद ठानते हैं अतः उनको समझाने के लिए ही ' एकादि ' इत्यादि सन्दर्भ लिखते हैं । ' व्यवहृतिर्व्यवहार: ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार ' व्यवहार ' शब्द का अर्थ ज्ञान है । एवं ' व्यवह्रियते अनेन ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार इसी का शब्दप्रयोग अर्थ भी है । ( तदनुसार ) ' एकादिव्यवहारः ' अर्थात् एक, दो, तीन इत्यादि की प्रतीतियाँ एवं एक, दो, तीन इत्यादि शब्दों के प्रयोग इन दोनों की हेतु ही ' संख्या ' है । ( प्रतीति की हेतुता संख्या में इस प्रकार है कि ) जैसे कि ' दण्डी पुरुष: ' इस विशिष्ट प्रतोति के प्रति दण्ड केवल इसीलिए कारण है कि वह भी विशिष्ट प्रतीति ( अर्थात् विशेषण से युक्त विशेष्य की प्रतीति ) है, वैसे ही ' यह एक है, ये दो हैं ये तीन हैं ' इत्यादि प्रतीतियाँ भी विशिष्ट प्रतीति होने के कारण ही एकत्वादि संख्या रूप विशेषणों से उत्पन्न होती है । इसी प्रकार शब्द को पक्ष बनाकर विशिष्ट शब्दत्व For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir २६८ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली नन्वयं प्रत्ययो रूपादिविषयः? हि प्रत्ययो नीलं पीतमित्येवं [ गुणे संख्या-न तत्प्रत्ययविलक्षणत्वात् । रूपनिमित्तो स्यान्न त्वेकं द्वे इत्यादि । अस्तु तहि निर्विषयो रूपादिव्यतिरिक्तस्यार्थस्याभावात् । कुतोऽस्मिन्नेकद्वित्रीणीत्या-Marat जातः? आलयविज्ञानप्रतिबद्धवासनापरिपाकादिति चेत्? नीलाद्याकारोऽपि तत एवास्तु, नहि ज्ञानारूढस्य तस्य सङ्ख्याकारस्य वा कश्चिदनुभवकृतो विशेषो ये कोऽर्थजोऽनर्थजश्चापर इति प्रतिपद्यामहे । अथायं विशेषोऽयमभ्रान्तो नीलाकारः, सङ्ख्याकारस्तु विप्लुत इति । तदसारम्, नीलाकारस्याप्यत्राभ्रान्तत्वे प्रमाणाभावात् । न तावत् क्वचिदस्यास्ति संवाद:: तदेकज्ञाननियतत्वात् क्षणिकत्वाच्च । अत एव नार्थक्रियापि । न च प्रत्येकं सर्वज्ञानेषु स्वाकारमात्रसमाहितेषु पूर्वापरज्ञानवर्तिनामाकाराणां सादृश्यप्रतिपत्ति-को संख्या का साधक हेतु समझना चाहिए ' । ( प्र ० ) ये ( ' एक, द्वो ' इत्यादि ) प्रतीतियाँ तो रूपादि विषयक हैं? ( उ ०! रूपादि विषयक प्रतीतियाँ ' यह नील है, यह पोत है ' इत्यादि आकारों की होती हैं, ' एकः द्वौ ' इत्यादि प्रतीतियाँ उनसे भिन्न आकार की हैं । अतः ये रूपादि विषयक नहीं हैं | ( प्र ० ) ( प्रत्यक्ष से दीखने वाले ) रूपादि पदार्थों से भिन्न किसी वस्तु की सत्ता नहीं है । अत: ' एकः द्वौ ' इत्यादि प्रतीतियाँ ( अगर रूपादि विषयक नहीं हैं तो फिर बिना विषय के ही ( निर्विषयक ) ही मानी जायँ? ( उ ० ) तो फिर इस प्रताति में ' एकः द्वौ ' इत्यादि आकार किससे उत्पन्न होते हैं । ( प्र ० ) आलयविज्ञान में नियत रूप से सम्बद्ध वासना के परिपाक से ही ( उक्त आकार उत्पन्न होते हैं ) ( उ ० ) इस प्रकार तो नीलाकार पीताकारादि ज्ञान भी उस वासना से ही उत्पन्न होंगे ( फलतः निर्विषयक होंगे ), क्योंकि ज्ञानों में सम्बद्ध संख्या के आकारों में एवं नीलादि के आकारों में कोई अन्तर नहीं है । अतः नीलादि विषयक प्रतीतियों को अर्थ ( नीलादि ) जन्य मानें एवं संख्या विषयक प्रतीति को अनर्थ ( केवल वासना ) जन्य मानें इसमें काई विशेष युक्ति नहीं है । ( प्र ० ) यही दोनों में अन्तर है कि नीलादि आकार अभ्रान्त हैं और संख्यादि आकार भ्रान्त हैं । ( उ ० ) यह समाधान ठीक नहीं है, क्योंकि इसमें कोई प्रमाण नहीं है कि नीलादि आकार अभ्रान्त हैं । एवं प्रत्येक आकार क्षणिक है, अतः एक आकार नियमतः एक ही ज्ञान से गृहीत हो सकता है । सुतरामु नीलादि आकारों की अभ्रान्तता किसी प्रमाण से निश्चित नहीं हो सकती । प्रत्येक ज्ञान क्षणिक होने के कारण अर्थक्रियाकारी ( कार्यजनक ) होने पर भी नीलाकारादि का १. अर्थात् जिस प्रकार ' दण्डी पुरुष: ' विशेष प्रकार के इस शब्द के प्रयोग में दण्ड कारण है उसी प्रकार एकः द्वौ त्रीणि ' इत्यादि प्रयोगों का भी कोई कारण अवश्य है | वही है संख्या । For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली २६ ९ रस्ति, येन तत्सदृशाकार प्रवाहोपलब्धिनिबन्धनः संवादो व्यवस्थाप्येत, नापि सदृशाकारोपलम्भ एव सर्वत्र, विलक्षणाकारोपलम्भस्यापि क्वचिद् भावात् । न चार्थजत्वादेव नीलाकारस्याभ्रान्तत्वसिद्धिः, अर्थस्याप्रतीतौ तज्जन्यत्व-विनिश्चयायोगात्, अन्यतश्च प्रमाणादर्थप्रतीतावाकारकल्पनावैयर्थ्यात्, आकार-संवेदना देवार्थसिद्धयभ्युपगमे वा अभ्रान्ताकारसंवेदनादर्थसिद्धिः सिद्धे चार्थे तज्जन्यत्व विनिश्चयादाकारस्याभ्रान्तत्वमिद्धिरित्यन्योन्यापेक्षित्वम् । अबाधित-त्वं च नीलाकारवज्ज्ञानारूढस्य सङ्ख्याकारस्याप्यस्ति, अर्थगतत्वेन च बाधाया असम्भवो नीलादिष्वपि दुरधिगमः, तेषां स्वरूपविप्रकृष्टत्वात् । तस्मादाकार-मात्र संवेदनमेव सर्वत्र, न चेदेकत्राऽनर्थजोऽन्यत्रापि तथैवेति न नीलादिसिद्धिः । अभ्रान्तता का ज्ञापक प्रमाण नहीं हो सकता । ( प्र ० ) नीलादि आकारों के समूह ( प्रवाह ) का प्रत्येक आकार परस्पर भिन्न होते हुए भी सभी एक से हैं । इस सादृश्य के ज्ञान से इस ' संवाद ' का निश्चय होगा, अर्थात् यह निश्चय होगा कि अत्यन्त सदृश ये सभी ज्ञान अभ्रान्त नीलाकारादि से अभिन्न ज्ञानसमूह के हैं । इस संवाद निश्चय से सभी आकारों में अभ्रान्तत्व का निश्चय होगा । ( उ ० ) ( इस पक्ष के खण्डन में प्रथम युक्ति यह है कि ) ( १ ) प्रत्येक आकार अपने विलक्षण ज्ञान से ही गृहीत होता है, अत: आकार के समूहों में परस्पर सादृश्य का ग्रहण ही असम्भव है । ( २ ) यह बात भी नहीं कि सभी आकार सदृश ही उत्पन्न हों, क्योंकि कहीं कहीं एक ही वस्तु विभिन्न आकारों से भी गृहीत होती है । ( ३ ) यह कहना भी सम्भव नहीं है कि चूँकि नीलादि आकार ' अर्थ ' से उत्पन्न होते हैं, अतः वे अभ्रान्त हैं, क्योंकि अर्थनिश्चय के बिना अर्थजन्यत्व का निश्चय सम्भव नहीं है । यदि अर्थ का निश्चय किसी और ही प्रमाण से मान लें तो फिर आकार की कल्पना व्यर्थ हो जाती है । अगर आकार के ही अभ्रान्त ज्ञान से अर्थ का निश्चय मानें तो अन्योन्याश्रय दोष अनिवार्य होगा, क्योंकि आकार के अभ्रान्त ज्ञान से अर्थ की सिद्धि होगी, एवं इसकी सिद्धि हो जाने पर आकार ज्ञान के अर्थ-जन्य होने के कारण उस में अभ्रान्तत्व को सिद्धि होगी । ( यदि आकार की अबाधित प्रतीति को ही नीलादि अर्थों का साधक माने तो फिर ) वह जिस प्रकार नीलादि आकार के विज्ञानों में है, वैसे ही संख्याविज्ञान के आकार मे भी है हो । ( एवं बौद्धों के मत से ) नीलादि आकारों के बाधित न होने से भी उनकी सत्ता नहीं सिद्ध की जा सकती, क्योंकि नीलादि आकारों की वस्तुतः सत्ता न रहने के कारण नीलादि आकारो के बाधित न होने को प्रतीत ही असम्भव है । अतः सभी जगह केवल आकार का ही ज्ञान होता है, उन ज्ञानों में अगर एक बिना अर्थ के ही होता है तो और ज्ञान भी बिना अर्थ के ही हो सकते हैं । संख्या के सम्बन्ध में इस प्रकार के आक्षेपों से नीलादि आकारों की सिद्धि भी सङ्कट में पड़ जायगी । ( प्र ० ) यदि For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir २७० न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संख्या-च । तत्रैकद्रव्यायाः नित्यानित्यत्वनिष्पत्तयः! सा पुनरेकद्रव्या चानेकद्रव्या सलिलादिपरमाणुरूपादीनामिव अनेकद्रव्या तु द्वित्वादिका परार्द्धान्ता । वह एकद्रव्या एकद्रव्य मात्र में रहनेवाली ) एवं अनेकद्रव्या ( अनेक ( द्रव्यों में ही रहने वाली ) भेद से दो प्रकार की है । इनमें एकद्रव्या संख्या के नित्यत्व और अनित्यत्व का निर्णय परमाणुरूप जल एवं कार्यरूप जल के रूपादि की तरह है । अनेकद्रव्या संख्या द्वित्व से लेकर परार्द्ध पर्यन्त है । न्यायकन्दली असति बाह्ये वस्तुनि स्वसन्तानमात्राधीनजन्मनो वासनापरिपाकस्य कादाचित्क-त्वानुपपत्तौ तन्मात्र हेतोर्नीलाद्याकारस्य कादाचित्कत्वासम्भवान्नीलादिकल्पनेति चेत्, एकद्वित्र्याकारस्यापि बाह्यवस्त्वननुरोधिनो न कादाचित्कत्वमुपपद्यत इति सङ्ख्यापि कल्पनीया, उपपत्तेरुभयत्राप्यविशेषात् । यदपि द्रव्यव्यतिरिक्ता सङ्ख्या न विद्यते, भेदेनाग्रहणादित्युक्तम्, तदप्ययुक्तम्, परस्परप्रत्यासन्नानां वृक्षाणां दूरादेकत्वाद्यग्रहणेऽपि स्वरूप-ग्रहणस्य सम्भवात् । एवं रूपादिव्यतिरेकोऽपि व्याख्यातः, दूरे रूपस्याग्रहणेऽपि द्रव्यप्रत्ययदर्शनात् । एवं सिद्धे सङ्ख्यास्वरूपे तस्या भेदं प्रतिपादयति - सा पुनरेकद्रव्या बाह्य वस्तुओं की सत्ता बिलकुल ही न मानी जाय तो अपने समुदाय मात्र से उत्पन्न होनेवाली वासना का परिपाक कभी होता है कभी नहीं, यह ' कादाचित त्व ' असम्भव हो जायगा । एवं केवल वासना के परिपाक से ही उत्पन्न होनेवाले नीलादि का कादाचित्कत्व भी अनुपपन्न हो जायगा । अतः नीलादि की कल्पना करते हैं । ( उ ० ) उसी प्रकार नीलादि आकारों की प्रतीति की तरह एकाकार द्वित्वाकार, त्रित्वाकारादि प्रतीतियों का भी कादाचित्कत्व की अनुपपत्ति के कारण समान युक्ति से संख्या की कल्पना भी आवश्यक है । कोई कहते हैं कि ( प्र ० ) द्रव्य की प्रतीति को छोड़कर अलग से संख्या की कोई प्रतीति नहीं होती, अतः द्रव्य से भिन्न संख्या नाम की कोई वस्तु नहीं है । ( उ ० ) किन्तु यह कहना भी असत्य है, क्योंकि आपस में सटे हुए बृक्षों में संख्या का भान न होने पर भी उनके स्वरूपो ( द्रव्यों ) का ग्रहण होता है ' । इस प्रकार संख्या की सिद्धि हो जाने पर १. द्रव्य और संख्या अगर अभिन्न होती तो ग्रहण होता है वहाँ वृक्ष से अभिन्न संख्या का भी ग्रहण ' सा पुनः ' इत्यादि से इसके भेदों का फिर टूटे हुए वृक्षों के स्वरूप का जहाँ अवश्य ही होता । For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] प्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली -२७१ चानेकद्रव्या चेति । एकं द्रव्यमाश्रयो यस्याः सा एकद्रव्या । अनेकं द्रव्यमाश्रयो यस्याः सा अनेकद्रव्या | ' च ' शब्दावेकद्रव्याने कद्रव्ययोरन्योन्यसमुच्चयं प्रदर्शयन्तौ प्रकारान्तराभावं कथयतः । तत्रैकद्रव्यानेकद्रव्ययोर्मध्ये एकद्रव्याया: सलिलादिपरमाणुरूपादीनामिव नित्यानित्यत्वनिष्पत्तयः यथा सलिलपरमाणौ रूपरसस्पर्शा नित्यास्तथैकत्वसङ्कायपि । यथा च कार्यसलिलस्य रूपादयोऽनित्या आश्रयविनाशाद्विनश्यन्ति कारणगुणप्रक्रमेण च निष्पद्यन्ते, तथैकत्वसङ्ख्यापि । अनेकद्रव्य तु द्वित्वादिका परार्द्धान्ता । द्वित्वमादिर्यस्याः सा द्वित्वादिका, परार्धोऽन्तो यस्याः सा परार्धान्ता । यस्मिन्नियत्ताव्यवहारः समाप्यते स परार्द्धः । एकद्रव्यवत्तया एकत्वसङ्ख्यायाः सकाशाद् द्वित्वादेरनेकवृत्तित्वविशेषप्रतिपाद-नार्थः ' तु ' शब्दः । निरूपण करते हैं । ' एकं द्रव्यमाश्रयो यस्या: ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार एक द्रव्य में ही रहने वाली संख्या को ' एकद्रव्या ' कहते हैं । ' अनेकद्रव्यमाश्रयो यस्याः " इस विग्रह के अनुसार अनेक द्रव्यों में ही रहनेवाली संख्या को ' अनेकद्रव्या ' कहते हैं । दोनों ही ' च ' शब्द से एक द्रव्य और अनेक द्रव्य इन दोनों के समुच्चय का बोध होता है एवं इन दोनों से तीसरी तरह की संख्या की सम्भावना का खण्डन भी होता है । ' तत्र ' अर्थात् एकद्रव्या और अनेकद्रव्या इन दोनों प्रकारें की संख्याओं में, एकद्रव्या संख्या का निर्णय ( कार्यरूप ) जलादि और परमाणु रूप जलादि की तरह समझना चाहिए । अर्थात् जिस प्रकार जलादि के परमाणुओं के रूपरसादि नित्य हैं, वैसे ही उनमें रहनेवाली एकद्रव्या संख्या भी नित्य है । एवं जिस प्रकार कार्यरूप जलादि के रूप रसादि अनित्य हैं ( अर्थात् ) आश्रय के नाश से उनका नाश एवं कारणगुणक्रम से उत्पत्ति होती है, वैसे ही कार्यरूप जलादि में रहनेवाली एकत्व ( एकद्रव्या ) संख्या भी आश्रय के नाश से ) विनष्ट होती है, एवं ( कारणगुणक्रम से ) उत्पन्न भी होती है । ' अनेकद्रव्या तु द्वित्वादिका परार्द्धान्ता ' ( इस वाक्य में प्रयुक्त ) ' द्वित्वादिका ' शब्द का अर्थ वह संख्या समूह है जिस समूह के पहिले व्यक्ति का नाम द्वित्व है, क्योंकि ' द्वित्वा-दिका ' इस समस्त वाक्य का विग्रह वाक्य ' द्वित्वमादिर्यस्याः ' इस प्रकार का है । जिस संख्या ( परम्परा ) की समाप्ति परार्द्ध में हो वही ( संख्यासमूह ) ' परार्द्धान्त ' शब्द का अर्थ है, क्योंकि ' परार्द्धान्ता ' इस समस्त वाक्य का विग्रह वाक्य ' परार्दोऽन्तं यस्या: ' इस प्रकार है | जहाँ संख्या के व्यवहार की समाप्ति हो उसी सख्या को ' परार्द्ध ' कहते हैं | एकत्व संख्या केवल एक ही द्रव्य में रहती है, द्वित्वादि संख्यायें अनेक द्रव्यों में ही रहती हैं, अनेकद्रव्या संख्या में एकद्रव्या संख्या से इसी अन्तर को समझाने के लिए प्रकृत वाक्य में तु ' शब्द है । For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir २७२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संख्या-तस्याः खल्वेकत्वेभ्योऽनेकविषयबुद्धिसहितेभ्यो निष्पत्तिरपेक्षा-बुद्धिविनाशाद् विनाश इति । कथम् १ यदा बोद्धुश्चक्षुषा समानासमान-जातीययोर्द्रव्योः सन्निकर्षे सति तत्संयुक्तसमवेतसमवेतैकत्वसामान्य ज्ञानो-त्पत्तावेकत्वसामान्य तत्सम्बन्धज्ञानेभ्य एकगुणयोरनेकविषयिण्येका अनेक एकत्व की बुद्धि एवं अनेक एकत्व इन सबों से इसकी उत्पत्ति होती है । ( प्र ० ) कैसे ( उ ० ) चक्षु के साथ सम्बद्ध उक्त दोनों द्रव्यों में से प्रत्येक में समवाय सम्बन्ध से रहनेवाली ' एक ' संख्या में समवाय सम्बन्ध से रहनेवाली एकत्व जाति का ज्ञान होता है । इसके हो जाने पर एकत्व सामान्य एवं इसके ( दोनों ' एक ' संख्या रूप गुणों के साथ ) सम्बन्ध एवं ( इन संख्यारूप गुणों में ) उस सामान्य का ज्ञान इन सबों से दोनों ' एक संख्याओं में अनेक ( एकसंख्या ) विषयक एक बुद्धि उत्पन्न होती न्यायकन्दली तस्याः खल्वेकत्वेभ्योऽनेकविषयबुद्धि सहितेभ्यो निष्पत्तिरपेक्षाबुद्धिविना-शाद्विनाशः । खत्वित्यवधारणे तस्या एकत्वेभ्यो निष्पत्तिरेव, न त्वकैक-गुणसमुच्चयमात्रत्वमित्यर्थः । एकत्वे चैकत्वानि चेति समासाश्रयणम्, अन्यथा द्वित्वोत्पत्तिकारणं न कथितं स्यात् । अनेकविषयबुद्धिसहितेभ्य इति । अनेकशब्द एको न भवतीति व्युत्पत्त्या द्वयोर्बहुषु च द्रष्टव्यः, अ विषयेषु या बुद्धिस्तत्सहितेभ्य इति 1 एतदेव प्रश्नपूर्वकं प्रतिपादयति कथमित्यादिना । यदा यस्मिन् काले बोद्धुरात्मनश्चक्षुषा समानजातीययोर्घटयो-' तस्याः खल्वेकत्वेभ्योऽनेकबुद्धिसहितेभ्यो निष्पत्तिरपेक्षाबुद्धि विनाशाद्विनाश: ' ( इस वाक्य में प्रयुक्त ) ' खलु ' शब्द का प्रयोग इस अवधारण के लिए हुआ है कि अनेकद्रव्या संख्या अनेक एकत्व संख्याओं का समूहमात्र नहीं है, किन्तु अनेक एकत्वों से उत्पन्न होने-वाली ( एकत्व से भिन्न ) अनेकद्रव्या संख्या । स्वतन्त्र ) ही है । ' एकत्वेभ्य: ' इस पद की निष्पत्ति के लिए ' एकत्वे च एकत्वानि च ' इसी समास का अवलम्बन करना चाहिए, ऐसा न करने पर ( ' एकत्वञ्च एकत्वञ्च एकत्वञ्च एकत्वानि ' ऐसा समास मानने पर ) ' एकत्वेभ्य: ' इस पद से द्विश्व के कारणीभूत दो एकत्वों में द्वित्व की कारणता नहीं कही जायगी । ' अनेकविषयबुद्धिसहितेभ्य: ' इस वाक्य में प्रयुक्त ' अनेक ' शब्द से दो एवं उससे आगे की सभी संख्याओं का बोध होता है, क्योंकि ' अनेक ' शब्द की ' एको न भवति ' इस प्रकार की व्युत्पत्ति है । अनेक विषयों में जो ( अनेक एकत्वों की ) बुद्धि है, उससे ( द्वित्वादि ) अनेकद्रव्या संख्याओं की उत्पत्ति होती है । ' कथम् ' इस पद के द्वारा प्रश्न कर इसी विषय को समझाने का उपक्रम करते हैं I । ' यदा ' अर्थात् जिस समय ' बोद्धुः ' अर्थात् For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली २७३ रसमानजातीययोर्घटपटयोर्वा सन्निकर्षै संयोगे सति चक्षुः संयुक्तयोर्द्रव्ययोः प्रत्येकं समवेतौ यावेकगुणौ तयोः समवेतं यदेकत्वं सामान्यं तस्मिन् ज्ञानमुत्पद्यते । विशेषणज्ञानं विशेष्यज्ञानस्य कारणम् । एकगुणयोश्च विशेष्योरेकत्व सामान्यं विशेषणम्, तेनादौ तत्रैव ज्ञानं चिन्त्यते । न च प्रत्यासत्तिमन्तरेण चाक्षुषं ज्ञानं जायत इत्येकत्वसामान्यस्येन्द्रियेण संयुक्तसमवेतसमवायलक्षणः सम्बन्धो दर्शितः । एवं ज्ञानोत्पत्तौ भूतायामेकत्वसामान्यात् तस्यैकत्वस्यैकगुणाभ्यां सम्बन्धाज्ज्ञानाच्च एकगुणयोरनेकविषयिण्युभयैकगुणालम्बिन्येका बुद्धिरुत्पद्यत इति, एकं चक्षु-रिन्द्रियमन्तःकरणेन युगपदुभयोरधिष्ठानासम्भवादेकस्यैव सर्वदा विषयग्राहकत्वे द्वितीयस्य कल्पना वैयर्थ्यात् । तस्योभाभ्यां गोलकाभ्यां रश्मयो निस्सरन्ति विष-यैश्च सह सम्बन्ध्यन्ते, प्रदीपस्येव गुहान्तर्गतस्य गवाक्षविवराभ्याम् । तत्रान्तःकरणं साक्षाच्चक्षुरधितिष्ठति, न विषयसम्बन्धात्, बहिर्निर्गमनाभावात्, चक्षुरधिष्ठानादेव आत्मा को आँखों से समान जाति के दो द्रव्यों में अर्थात् दो घटों में ( अथवा ) असमान-जातीय दो द्रव्यों अर्थात् घट और पट के ' संनिकर्ष ' अर्थात् संयोग होने के बाद कथित समानजातीय एवं असमानजातीय दोनों प्रकार के दोनों द्रव्यों के प्रत्येक में समवाय सम्बन्ध से रहनेवाली एकत्वसंख्यागत जाति रूप एकत्व ( अर्थात् एकत्वत्व ) का ज्ञान होता है । विशेषण का ज्ञान विशेष्यज्ञान विशिष्ट ज्ञान ) का कारण है । संख्यारूप दोनों एकत्वों से अभिन्न विशेष्य का जातिरूप एकत्व एकत्वस्व ) विशेषण है, अतः सब से पहिले उसी का विचार करते हैं । ( विषयों के साथ ) चक्षु का सम्बन्ध रहे बिना चाक्षुष ज्ञान नहीं हो सकता, अतः सब से पहिले जातिरूप एकत्व के साथ ( चक्षु का ) संयुक्तसमवेतसमवायरूप सम्बन्ध ही दिखलाया गया है । इस प्रकार जाति रूप एकत्वविषयक ज्ञान की उत्पत्ति हो जाने पर उस सामान्य का अपने आभयों के साथ सम्बन्ध एवं इस सम्बन्ध के ज्ञान, इन दोनों से दोनों ' एक ' नाम की संख्याओं में ( अलग अलग ) ' एक ' ( संख्या ) गुण विषयक एकबुद्धि ( अर्थात् ' अयमेकः ' अयमेक: ' इस आकार ) को बुद्धि की उत्पत्ति होती है । एक ही समय एक ही चक्षु-रिन्द्रिय अन्तःकरण के द्वारा दो विषयों का अधिष्ठान नहीं हो सकती । एवं अगर एक ही चक्षु से प्रत्यक्ष की उत्पत्ति मानें तो दूसरे चक्षु की कल्पना हो व्यर्थ हो जायगी । अतः ( यही जानना पड़ेगा कि ) जिस प्रकार गवाक्ष के छिद्रों से घर के भीतर के दीप की रश्मियाँ घटादि के साथ सम्बद्ध होती हैं, दोनों गोलकों से रश्मियाँ निकल कर का साक्षात् सम्बन्ध चक्षु के साथ ही वह किसी भी प्रकार बाहर नहीं निकल विषयों के साथ सम्बद्ध उसी प्रकार चक्षु के होती हैं । अन्तःकरण होता हैं, विषयों के साथ नहीं । क्योंकि सकता । ( विषयों सेसम्बद्ध ) चक्षु स्वरूप ३५ For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir २७४ न्यायकन्दलीसंवलित प्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संख्या-बुद्धिरुत्पद्यते तदा तामपेक्ष्यैकत्वाभ्यां स्वाश्रययोद्वित्वमारभ्यते । ततः पुनस्तस्मिन् द्वित्वसामान्यज्ञानमुत्पद्यते । तस्माद् द्वित्वसामान्यज्ञानाद-है ( इसे ही अपेक्षाबुद्धि कहते हैं ) । उस समय उसी बुद्धि की ' अपेक्षा ' करके उन दोनों एकत्व नाम के गुणों से उनके आश्रयरूप दोनों द्रव्यों में द्वित्व संख्या की उत्पत्ति होती है । इसके बाद द्वित्व संख्या में द्वित्वसामान्य ( द्वित्वत्व ) का ज्ञान उत्पन्न होता है । द्वित्वसामान्यविषयक इस ज्ञान से न्यायकन्दली च तस्य सम्बन्धा ज्ञानोत्पत्तिहेतवः । एवं च सति युगपदनेकेषु विषयेषु ज्ञानं भवत्येव, कारणसामर्थ्यात् । तच्च भवदेकमेव प्रभवति, आत्मान्तःकरणसंयोगस्यै-कस्यैकज्ञानोत्पत्तावेव सामर्थ्यात् । अत एव सविकल्पोत्पत्तिरपि, युगदभि-व्यक्तेष्वनेकसङ्केतविषयेषु संस्कारेषु स्मृतिहेतुष्वात्मान्तःकरणसंयोगस्य सामर्थ्या-देकस्यानेकविषयस्मरणस्योत्पादात् । यदि नामानेकगुणालम्बनेका बुद्धिरुपजाता ततः किमेतावता? तदेतां बुद्धिमपेक्ष्यैकत्वाभ्यामेकगुणाभ्यां स्वाश्रयोर्द्रव्ययद्वित्व-मारभ्यते । स्वाश्रययोः समवायिकारणत्वम्, एकगुणयोरसमवायिकारणत्वम्, अनेक विषयाया बुद्धेनिमित्तकारणत्वम् । यदैकगुणयोरेका बुद्धिरुत्पद्यते तदेकत्वाभ्यां अधिष्ठान के साथ अन्तःकरण का सम्बन्ध ही ज्ञान का कारण है । ऐसी स्थिति में अनेक विषयों का ज्ञान सुलभ होगा, क्योंकि अनुरूप कारणों का संवलन है । अनेक विषयों का यह एक ही ज्ञान हो सकता है, क्योंकि आत्मा और अन्तःकरण के एक संयोग में एक ही ज्ञान को उत्पन्न करने का सामर्थ्य है । इसी हेतु से सवि-कल्पोत्पत्ति अर्थात् अनेक विषयों की एक स्मृति की उत्पत्ति भी सङ्गत होती है, क्योंकि पहिले का अनुभव जितने विषयों का होगा उससे संस्कार भी उतने ही विषयक उत्पन्न होंगे । इसके अनुसार अनेकविषयक या एकविषयक अनुभव से जहाँ स्मृति में कारणीभूत अनेक विषयक संस्कार उत्पन्न होते हैं, एवं एक ही समय उबुद्ध होते हैं, वहीं अनेक विषयों की एक ही स्मृति उत्पन्न हो सकती है, चूंकि आत्मा और अन्तः-करण के उक्त संयोग में उक्त प्रकार के स्मरण को भी उत्पन्न करने का सामर्थ्यं है । ( प्र ० ) अनेक विषयक एक बुद्धि की यदि उत्पत्ति मान ली गयी तो प्रकृत में इसका क्या उपयोग है? ( उ ० ) यही उपयोग है कि अनेक विषयक एक बुद्धि की सहायता से दो संख्याविषयक एक बुद्धि ( ' अयमेकः, अयमेक: ' इस प्रकार की एक बुद्धि ) उत्पन्न होती है । उक्त रीति से ज्ञात इन्हीं दो एकत्वों से द्वित्व की उत्पत्ति होती है । दोनों एकत्वों के आश्रयीभूत दोनों द्रव्य द्वित्व के समवायिकारण हैं । दोनों एकत्व संस्थायें असम-For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली २७५ द्वित्वमारभ्यत इत्येककालनिर्देशः क्षणद्वयात्मकलवाख्यकालाभिप्रायेण । क्षणाभि-प्रायेण तु कालभेद एव, कार्यकारणयोः पूर्वापरकालभावात् । ज्ञानादर्थस्योत्पाद इति नालौकिकमिदं सुखादीनां तस्मादुत्पत्तिदर्शनात् । बाह्यार्थस्योत्पादो न दृष्ट इति न वैधर्म्यमात्रम्, तदन्वयव्यतिरेकानुविधायित्वस्योभयत्राविशेषात् । उभय-गुणालम्बनस्य द्वित्वाभिव्यञ्जकत्वे सिद्धे सति ज्ञानस्य तदा नानन्तर्य्य-नियमोपपत्तिरिति चेन्न, अनियमप्रसङ्गात् । यदि हि द्वित्वमबुद्धिजं स्याद्रूपादिवत्पुरुषान्तरेणापि प्रतीयेत, नियमहेतोरभावात् । बुद्धिजत्वे तु यस्य बुद्धया यज्जन्यते तत् तेनैवोपलभ्यत इति नियमोपपत्तिः । प्रयोगस्तु द्वित्वं बुद्धिजं नियमेनैकप्रतिपत्तृवेद्यत्वाद्, यन्नियमेनैकप्रतिपत्तवेद्यं तद् बुद्धिजं यथा सुखादिक्रम् । नियमेनैकप्रतिपत्तवेद्यं च द्वित्वं तस्मादिदमपि बुद्धिजम् । वायिकारण हैं । दोनों एकत्व रूप अनेकविषयक एकबुद्धि ( अपेक्षा बुद्धि ) निमित्त -कारण है । जिस समय दोनों एकत्व संख्याओं की एकबुद्धि ( अपेक्षाबुद्धि ) उत्पन्न होती है, उसी समय दोनों एकत्वसंख्याओं से द्वित्व की उत्पत्ति होती । इसी अभिप्राय से ' इत्येकः कालः ' इस वाक्य से एककाल का निर्देश किया गया है । इस निर्देश वाक्य के ' एक काल ' शब्द से दो क्षणात्मक ' लव ' रूप काल अभिप्रेत है । क्षणात्मक काल के अनुसार वस्तुतः वे क्रियायें क्रमशः हो होती हैं, क्योंकि कारण को पहिले एवं कार्य को पीछे रहना आवश्यक है । ज्ञान से वस्तु की उत्पत्ति कोई अलौकिक घटना नहीं है, क्योंकि ज्ञान से सुखादि की उत्पत्ति देखी जाती है । ' ज्ञान से बाह्य वस्तु की सृष्टि नहीं होती है ' यहकहना केवल बाह्य और आन्तर दोनों वस्तुओं के भेद को ही प्रकट करता है, क्योंकि दोनों ही प्रकार की अवस्थाओं के साथ ज्ञान को अन्वय और व्यतिरेक दोनों ही समान रूप से देखे जाते हैं । ( प्र ० ) ( द्वित्व के ) दोनों आश्रयों में रहनेवाले दोनों एकत्वों से द्वित्व की उत्पत्ति हो ही जायगी, फिर उस के लिए अपेक्षाबुद्धि को भी कारण मानने की क्या आवश्यकता है? ( उ ० ) द्वित्व को अगर बुद्धिजन्य न मानें तो साधारण्यरूप अनियम की आपत्ति होगी, क्योंकि रूपादि साधारण विषयों की तरह सभी द्वित्व सभी पुरुषों से गृहीत नहीं होते, किन्तु जिस पुरुष की अपेक्षा बुद्धि से जिस द्वित्व की उत्पत्ति होती, वह द्वित्व उसी पुरुष से गृहीत होता है और किसी पुरुष से नहीं । इस प्रकार द्वित्व असाधारण है, साधारण नहीं । अतः अपेक्षाबुद्धि भी द्वित्व का कारण है । ( इस प्रसङ्ग में अनुमान का प्रयोग इस प्रकार है कि ) नियमतः सुखादि की तरह जो कोई भी वस्तु नियमतः किसी एक ही पुरुष के द्वारा गृहीत होती है, उसकी उत्पत्ति अवश्य ही बुद्धि से होती है । द्वित्व का ग्रहण भी किसी एक ही पुरुष से होता है, अतः द्वित्व भी बुद्धि से उत्पन्न होता है । For Private And Personal