प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 371–380
प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 371–380
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir २ ९ ६ न्यायकन्दली संवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ गुणे संख्या-कम्, तदनन्तरक्षणविषयश्च वर्तमानतावभास इति चेत्? कि पुनरिदमस्य ग्राह्यत्वम्? ज्ञानं प्रति हेतुत्वमिति चेत्? पुनरपीन्द्रियस्थ ग्राह्यत्वमापतितम्, हेतुत्वमात्रस्य तत्राप्यविशेषात् । ज्ञानस्य स्वसंवेदनमेवान्यस्य ग्राह्यतेति चेत्? अन्यस्य स्वरूपसंवेदन मन्यस्य ग्राह्यतेत्यतिचित्रमेतत् । न चित्रम्, स्वभावस्या-पर्यनुयोज्यत्वात् । अर्थावग्रहस्वभावं हि विज्ञानम् । तेनास्य स्वरूपसंवेदनमेवार्थस्य ग्रहणं भवति । यदर्थजं चेदं तस्यैवायमवग्रहो न सर्वस्येति नातिप्रसक्तिः? न एकार्थत्वात् । अर्थजत्वं नाम ज्ञानस्यार्थादुत्पत्तिः । सा चैका । न च ज्ञानार्थयोर्धर्म इति नार्थ नियमयेत् । अथार्थस्य न ज्ञानम् अन्यधर्मत्वात्, उभयनियमाच्च तयोः परस्परग्राह्यग्राहकभावव्यवस्था नैकसम्बन्धिनियमात् । न चातीतानागतयोरर्थयोर्ज्ञानं प्रत्यस्ति कारणत्वम् असत्त्वात् । विषयविषयि-भावनियमाद् ग्राह्यग्राहकभावनियम इति चेन्न, अभेदात् । ग्राह्यत्वमेव विषयत्वम्, हैं कि घटादि और इन्द्रियादि इन दोनों प्रकार की वस्तुओं में ज्ञान की कारणता समान रूप से रहने पर भी घटादि वस्तुएँ ही ग्राह्य हैं इन्द्रियादि वस्तुएँ नहीं । एवं वस्तु की उत्पत्ति के अव्यवहित आगे के क्षण का ज्ञान ही वस्तु के वर्तमानत्व का अवभास है । ( प्र ० ) घटादि वस्तुओं में रहनेवाला एवं इन्द्रियादि वस्तुओं में न रहनेवाला यह ' ग्राह्यत्व ' क्या वस्तु है! अगर ( उ ० ) ज्ञान के प्रति कारणत्व ही यह ग्राह्यत्व है तो ( प्र ० ) इन्द्रियादि में फिर ग्राह्यत्व की आपत्ति होगी, क्योंकि ज्ञान का हेतुत्व भर तो इन्द्रियादि में भी समानरूप से है । ( उ ० ) ज्ञान का ' स्वसंवेदन ' ही घटादि वस्तुओं की ग्राह्यता है । ( ० ) यह तो बड़ी विचित्र बात है कि एक वस्तु के स्वरूप का ज्ञान दूसरे की ग्राह्यता हो । ( उ ० ) नहीं, इसमें कोई विचित्रता नहीं है, क्योंकि वस्तुओं का स्वभाव अभियोग की सीमा से बाहर है । विज्ञान अर्थग्रहण स्वरूप ही है अतः विज्ञान के स्वरूप के संवेदन से ही अर्थ का ग्रहण होता है । इनमें से जो अर्थ विज्ञान का ( विषय-विषया कारण होता है, उस अर्थ का ग्रहण ही विज्ञान है, सभी अर्थों का ग्रहण विज्ञान नहीं है, अतः इन्द्रियज्ञान की आपत्ति नहीं है । ( प्र ० ) नहीं, क्योंकि वह एक ही काम कर सकती है । अथं से ज्ञान की उत्पत्ति ही ज्ञान का अर्थजन्बत्व है. अतः वह अर्थ और ज्ञान दोनों का धर्म नहीं हो सकता ( वह ज्ञान का नियमन कर सकता है, अर्थों का नहीं । अगर अर्थ हो धर्म है, अतः ) ज्ञानों का ही का धर्म है तो फिर ज्ञानों का ही नियमन नहीं कर सकता, क्योंकि वह दूसरे का धर्म है । दोनों के नियम से ही ' ग्राह्य-ग्राहक व्यवस्था ' की, अर्थात् घटविषयकज्ञान का ग्राह्य घट ही है, है - इस व्यवस्था की उपपत्ति हो सकती है, किसी एक के भूत और भविष्य अर्थ ज्ञान के कारण मी नहीं हैं, क्योंकि उस घटजन्य ही घटज्ञान नियम से नहीं । एवं समय उनका अस्तित्व For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली २१७ ग्राहकत्वमेव विषयित्वम्, तयोः प्रतिनियमे एव कारणे पृष्टे तदेवोत्तरमुच्यत इति सर्वोत्तरधियां परिस्फुरति । नियतार्थावग्राहितापि ज्ञानस्य स्वभाव इति चेत्? स पुनरस्य स्वभावो यदि निर्हेतुको नियमो न प्राप्नोति । अथ कारण-वशात्? तदेवोच्यतां कि स्वभावपरिघोषणया, न च तदुत्पत्तेरन्यत् पश्यामः । अथोच्यते यदुत्पादयति सरूपयति ज्ञानम्, तदस्य ग्राह्यं नेतरत् । अवश्यं चार्थाकारो ज्ञानेऽप्येषितव्यः, अन्यथा निराकारस्य बोधमात्रस्य सर्वार्थं प्रत्यविशेषाद् नीलस्येदं पीतस्येदमिति व्यवस्थानुपपत्तौ ततोऽर्थविशेषप्रतीत्यभावात् । अत एव विषयाकारं प्रमाणमाहुः । स चासाधारणो ज्ञानमर्थविशेषेण सह घटयति, न साधारण-मिन्द्रियादिकम् । तदुक्तम्-अर्थेन घटयत्येनां नहि मुक्त्वार्थरूपताम् । तस्मात् प्रमेयाधिगतेः प्रमाणं मेयरूपता ॥ अपरत्र चोक्तम्- नहि वित्तिसत्तैव तद्वेदना युक्ता तस्याः सर्वत्रा-ही नहीं है । ( उ ० ) ' विषयविषयिभाव ' से ही ' ग्राह्यग्राहकभाव ' की व्यवस्था होगी । ( प्र ० ) नहीं, क्योंकि दोनों एक ही बात है । ग्राह्यत्व और विषयत्व एक ही वस्तु है । एवं ग्राहकत्व और विषयित्व इन दोनों में भी कोई अन्तर नहीं है । इन दोनों के कारण के पूछने पर उन्हीं दोनों को उपस्थित करते हैं । इस प्रकार का उत्तर तो किसी लोको-तर बुद्धिवाले को ही सूझ सकता है । ( उ ० ) ज्ञान का यह भी स्वभाव है कि वह किसी नियत अर्थ को ही ग्रहण करे ( प्र ० ) यह ( नियतविषयग्राहकत्व ) ज्ञान का स्वभाव तभी हो सकता है जब कि वह बिना किसी कारण के ही ज्ञान में रहे । अगर यह स्वभावनियम भी किसी कारण से ही ज्ञान में रहे तो फिर उसी का उल्लेख क्यों नहीं करते, स्वभाव की घोषणा क्यों करते हैं? अगर ज्ञान की उत्पत्ति को छोड़कर ज्ञान के ( विषय ) नियम का और किसी को कारण ही नहीं समझते? अगर यह कहें कि ( उ ० ) जो जिस ज्ञान को उत्पन्न करती है और आकार प्रदान करती है, वही वस्तु उस ज्ञान की ग्राह्य है और कोई वस्तु नहीं । एवं ज्ञान अर्थाकारता भी माननी ही पड़ेगी, क्योंकि ज्ञान को अगर निराकार मानें तो फिर वह सभी विषयों के प्रति समान ही होगा । इससे ' यह ज्ञान नील विषयक हैं, एवं वह पीत विषयक ' इस व्यवस्था की उपपत्ति नहीं होगी, अत: इस पक्ष में ज्ञानविशेष से अर्थविशेष का बोध नहीं होगा । अतः विषय के आकार को ही प्रमाण कहते हैं । वह असाधारण आकार ही ज्ञान को अर्थविशेष के साथ सम्बद्ध करता है, साधारण इन्द्रियादि नहीं । जैसा कहा है कि इस अर्थरूपता ( अर्थाकारता ) को छोड़कर ज्ञान को अर्थ के साथ कोई सम्बद्ध नहीं करता है, अतः ज्ञान की प्रमेयाकारता को छोड़कर प्रमेय के यथार्थ ज्ञान का कोई दूसरा करण ( प्रमाण ) नहीं है । दूसरी जगह और भी कहा है कि वित्ति ( ज्ञान ) की सत्ता मात्र ३८ For Private And Personal
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www.kobatirth.org Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra न्यायकन्दली संवलितप्रशस्तपादभाष्यम् २ ९ ८ न्यायकन्दली For Private And Personal Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir [ गुणे संख्या-बोधक है, दूसरे ( अर्थात् जिसमें विशेषात् । तां तु सारूप्यमाविशत् सरूपयितुं घटयेदिति । अत्रोच्यते-साकारेण ज्ञानेन किमर्थोऽनुभूयते? किं वा स्वाकारः? किमुतोभयम्? न तावदु-भयम्, नीलमेतदित्येकस्यैवाकारस्य सर्वदा संवेदनात् । अर्थस्य च ज्ञानेनानुभवो न युक्तः, तस्य स्वरूपसत्ताकाले ज्ञानानुत्पादाज्ज्ञानकाले चातीतस्य वर्तमानता -वभासायोगात् । ज्ञानसह भाविनः क्षणस्यायं वर्त्तमानतावभास इति स्वसिद्धान्त -श्रद्धालुतेयम्, तस्य तदग्राह्यत्वात् । कश्चात्र हेतुर्यद्विज्ञानं नियतमर्थं बोधयति न सर्वम्? नहि तयोरस्ति तादात्म्यम्, तदुत्पत्तिश्च न व्यवस्थाहेतुरित्युक्तम् । तदाकारता नियमहेतुरिति चेत्? किमित्येको नीलक्षणः समानाकारं नीलान्तरं न गृह्णाति? ग्राहकत्वं ज्ञानस्यैव स्वभावो नार्थस्येति चेत्? तथाप्येकं नीलज्ञानं सर्वेषां नीलक्षणानां ग्राहकं स्यात्, तदाकारत्वा-विशेषात् । तदुत्पत्तिसारूप्याभ्यां स्वोत्पादकस्यैवार्थक्षणस्य ग्राह्यता न सर्वेषामिति से वस्तुओं का ज्ञान सम्भव नहीं है, क्योंकि वह सभी वस्तुओं में समान रूप से है । किन्तु उसमें विषयाकारता का प्रवेश होने पर उसी से विषयों का अवभास होता है । ( प्र ० ) इस प्रसङ्ग में मेरा कहना है कि आकार से युक्त ज्ञान के द्वारा अर्थ की अनुभूति होती है? या उसके अपने आकार का ही अनुभव होता है? अथवा आकार एवं वस्तु दोनों का ही अनुभव होता है? दोनों का अनुभव तो उससे होता नहीं, क्योंकि ' यह नील है ' इससे एक ही आकार का अनुभव होता है । एवं ज्ञान के द्वारा अर्थ का अनुभव सम्भव भी नहीं है, क्योंकि अर्थ के अस्तित्व के समय ज्ञान को उत्पत्ति नहीं हो सकती । एवं ज्ञान के अस्तित्व के समय वस्तुएं अतीत हो जाती हैं, अतः वर्त्तमानत्व विषयक वस्तुओं की ' घटोऽस्ति ' इत्यादि प्रतीतियाँ असम्भव हैं । ' घटोऽस्ति ' इत्यादि आकार की प्रतीतियों में भासित होनेवाला वर्त्तमानत्व घटादि अर्थों का नहीं, किन्तु ज्ञान के साथ उत्पन्न होनेवाले क्षण का है, यह कहना केवल अपने सिद्धान्त में अत्यन्त श्रद्धा प्रकट करना है क्योंकि वर्तमानत्व उस ज्ञान का ग्राह्य ही नहीं है । एवं इसमें भी कारण कहना पड़ेगा कि एक ज्ञान किसी नियत विषय को ही ग्रहण करे, सभी विषयों को नहीं । पहिले कह चुके हैं कि वस्तु विज्ञान से अभिन्न नहीं है । यह भी कह चुके हैं कि विज्ञान की उत्पत्ति ( यह ज्ञान इसी विषय का ज्ञान का नहीं, इस ) व्यवस्था का कारण नहीं है । ( उ ० ) तदाकारता ही जिस अर्थ की आकारता है, फलतः जो ज्ञान यदाकारक है वही उसका नियामक है ) इस नियम का कारण होगी । ( प्र ० ) तो क्या एक नील क्षण ( का ग्राहक विज्ञान ) समान आकार के दूसरे नील को भी ग्रहण नहीं करता है? ( उ ० ) ग्राहकत्व अर्थात् अर्थ को ग्रहण करना तो ज्ञान का स्वभाव है, अर्थ का नहीं । ( प्र ० ) फिर भी एक ही नील विज्ञान सभी मील क्षणों का ग्राहक होगा, क्योंकि सभी नील क्षणों के आकार में तो कोई अन्तर नहीं है | ( उ ० ) वस्तुओं की उत्पत्ति एवं ( ज्ञान में ) उसका आकारता रूप सादृश्य
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www.kobatirth.org Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra भाषानुवादसहितम् प्रकरणम् ] न्यायकन्दली For Private And Personal Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir २६६ उत्पत्ति का सामर्थ्यं नीलादि आकार का इन्द्रियसमनन्तरप्रत्यययोरपि ग्राह्यतापत्तिः । ताभ्यामपि हि ज्ञानमुत्पद्यते, बिर्भात अथ मतं च तयोर्यथास्वं विषयग्रहणप्रतिनियमं बोधात्मकं च सारूप्यम् । देतद्विषयग्रहणप्रतिनियतत्वमिन्द्रियसारूप्यं विज्ञानस्य यदपि समनन्तरप्रत्यय-सारूप्यं बोधात्मकत्वम्, तदुभयमपि सर्वज्ञानसाधारणम्, असाधारणं तु विषय-सारूप्यम्, नीलजे एव नीलज्ञाने नीलाकारस्य संभवात् । यश्चासाधारणो धर्मः स एव नियामक इत्येतावता विशेषेण ज्ञानमर्थं गृह्णाति नेन्द्रियसमनन्तरप्रत्यया-विति । तदप्यसारम् समानविषयस्य समनन्तरप्रत्ययस्य ग्रहणप्रसङ्गात् । यो विज्ञाने नीलाद्याकारमर्पयति स एव तस्य ग्राह्यः, न च धारावाहिक विज्ञाने समनन्तरप्रत्ययान्नीलाद्याकारस्योत्पत्तिः, किन्त्वर्थादस्यैव, तदुत्पत्तावन्वय-व्यतिरेकाभ्यां सर्वत्र सामर्थ्योपलब्धेर्बोधाकारोत्पत्तावेव बोधस्य सामर्थ्यावगमा-दिति चेत्? नीलाद्याकार समर्पको ग्राह्म इति कस्येयमाज्ञा? नान्यस्य कस्यचित्, तस्यैव तु ग्राह्यत्वस्वभावनियमो नियामकः । एवं चेत् स्वभावनियमादेव नियमो s स्तु, इन दोनों से अर्थ का ग्रहण होता है, अतः ज्ञान अपने उत्पादक अर्थक्षण का ही ग्राहक है और किसी का नहीं । ( प्र ० ) तो फिर इन्द्रिय और समनन्तरप्रत्यय ( मन ) इन दोनों में भी ग्राह्यता आएगी, क्योंकि वे दोनों मिलकर ज्ञान का उत्पादन करते हैं । एवं ज्ञान उन दोनों से ही क्रमशः विषयग्रहण का नियम और बोधात्मकत्वरूप सादृश्य का लाभ करता है । अगर यह कहें कि ( प्र ० ) ज्ञान में नियतविषयग्राहकत्व इन्द्रिय का सादृश्य एवं बोधात्मकत्वरूप समनन्तरप्रत्यय ( मन ) का सादृश्य है, तो फिर ये दोनों तो सभी ज्ञानों में समान रूप से हैं । ज्ञान में विषय से ही असाधारण्य होता है, क्योंकि नीलरूप विपयजन्य ज्ञान में हीनीलाकारता सम्भव है । असाधारण धर्म ही नियामक होता है, इसी विशेष के कारण ज्ञान ( अपने जनकों में ) विषय को ही ग्रहण करता है, इन्द्रिय और समनन्तरप्रत्यय ( मन ) को नहीं, किन्तु इस कथन में भी कुछ तत्त्व नहीं है, क्योंकि ( नीलादिविज्ञान से नीलादि वस्तुओं की तरह समान नीलादि विषयक ) समनन्तरप्रत्यय के ग्रहण की आपत्ति तब भी होगी । ( उ ० ) जो वस्तु विज्ञान में नीलादि विषय के आकार का सम्पादन करती है, वही वस्तु उस विज्ञान की ग्राह्य है । धारा-वाहिक ज्ञान में भी समनन्तरप्रत्यय नीलादि आकार की उत्पत्ति नहीं होती, किन्तु नीलादि अर्थों से ही होती है, क्योंकि आकार के प्रति अर्थ ही कारण है, चूँकि उसी के साथ आकार का अन्वय और व्यतिरेक है । एवं बोध में बोधाकार की भी देखा जाता है । ( प्र ० ) यह किसकी आज्ञा है कि विज्ञान में जो सम्पादक हो वही विज्ञान का ग्राह्य हो? ( उ ० ) विज्ञान के साथ विषय ग्रहण का जो नियम है, वही उक्त नियम का सम्पादक है । किसी की आज्ञा से यह नियम नहीं बनाया गया है । ( प्र ० ) फिर स्वभाव के नियम से हो उक्त नियम मानिए । ज्ञान
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ३०० न्यायकन्दलो संवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ गुणे संख्या-ज्ञानं हि स्वसामग्रीप्रतिनियतार्थ संवेदनात्मकमेवोपजायते । अर्थोऽपि संवेद्यस्वभाव-नियमादेव संवेद्यते, नेन्द्रियादिकमित्यकारणमाकारः । नहि छिदिक्रिया वृक्षाकारवती येनेयं वृक्षेण सह सम्बद्धयते न कुठारेण किन्त्वस्या वृक्षस्य च तादृशः स्वभावो मित्रैव नियम्येत नान्यत्र । अस्येदं संवेदनमिति च व्यवस्था तदवभासमात्र-निबन्धनैवेति तदर्थमप्याकारो न मृग्यः । अथ साकारेण ज्ञानेनार्थो न संवेद्यत एव किन्तु स्वाकारमात्रम् । तदर्थ सद्भावो निष्प्रमाणको न तावदर्थस्य ग्रहणम्, न चाध्यवसायो विकल्पो वशिष्यते स चोत्प्रेक्षामात्रव्यापारो भवन्नपि प्रत्यक्षपृष्ठभावित्वाद्यत्र प्रत्यक्षं प्रवृत्तं तत्र स्वव्यापारं परित्यज्य कारणव्यापारमुपाददानो वस्तु साक्षा-त्करोति । यत्र तु प्रत्यक्षमेवाप्रवृत्तं तत्र विकल्पोऽप्यसमर्थ एव, कारणाभावात् । ज्ञानाकारः स्वसदृशं कारणं व्यवस्थापयन्नर्थसिद्धौ प्रमाणमिति चेत्? तत्किमिदानीं स्थूलाकारस्य समर्पकोऽप्यर्थो बहिरस्ति? का गतिरस्य वचनस्य --तस्मान्नार्थेन विज्ञाने स्थूलाभासस्तदात्मनः । एकत्र प्रतिषिद्धत्वाद् बहुष्वपि न सम्भवः ॥ इति । अपने कारणों से नियमित विषय से ही उत्पन्न होता है । एवं अर्थ भी अपने ग्राह्यत्व रूप स्वभाव से ही विज्ञान के द्वारा गृहीत होता है, अत: विज्ञान में आकार का कोई उत्पादक नहीं है । जैसे कि वृक्ष की कुठारजनित छेदन - क्रिया वृक्ष रूप आकार से युक्त नहीं है, फिर भी वह वृक्ष के साथ ही सम्बद्ध होती है, कुठार के साथ नहीं । अतः यह कल्पना सुलभ है कि छेदनक्रिया और वृक्ष दोनों का ही यह स्वभाव है कि वह छेदनक्रिया वृक्ष में ही नियमित रहे, अतः ' यह ज्ञान इसी विषयक है ' इस नियम के लिए भी किसी आकार को खोजने की आवश्यकता नहीं है । अगर यह कहें कि साकार विज्ञान से अर्थ गृहीत नहीं होता है, केवल विज्ञान का अपना आकार ही गृहीत होता है, अतः अर्थ की सत्ता ही अप्रामाणिक है, क्योंकि अर्थों का ग्रहण ज्ञानरूप भी नहीं हो सकता अध्यवसाय रूप भी नहीं, किन्तु अर्थों का केवल विकल्प रूप ज्ञान ही हो सकता है । वह अगर होता भी है तो प्रत्यक्ष के पीछे होता है जहाँ प्रत्यक्ष प्रवृत्त भी होता है, वहाँ अपने व्यापार को छोड़कर अपने कारणादि के व्यापार को ( विकल्परूप ज्ञान के द्वारा ) ग्रहण कर वस्तु का साक्षात्कार करा देता है । जहां प्रत्यक्ष को प्रवृत्ति नहीं होती है, वहाँ कारण के न रहने से विकल्प भी असमर्थ ही है । ( उ ० ) ज्ञान का आकार ही अपने सदृश कारण को सिद्ध करते हुए अर्थसिद्धि का भी जनक प्रमाण है । प्र ० ) क्या यह कहना चाहते हैं कि घटादि स्थूल आकार का सम्पादक भी बाहर ही है? तो फिर आपके इस वाक्य की क्या गति होगी? अतः विज्ञान में विज्ञानात्मक स्थूल वस्तु का अवभास नहीं होता है । For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली ३०१ अथायमनर्थजः? कुतश्चिन्निमित्तात् कदाचिद्भवति, असन्नेव वा प्रतीयते, तद्वदितराकारोऽपि भविष्यति, असन्नेव वा प्रत्येष्यते, न चाकारवादे ज्ञानाकाराणां भ्रान्ताम्रान्तत्वविवेकः सुगम इति निरूपितप्रायम् । किञ्च तदानीं बोधाकारः सदृशमर्थं कारणं कल्पयति, यदि यादृशो बोधाकारस्तादृश एवाकारस्य कारणमित्यवगतम् । न चार्थस्यासं-वेद्यत्वे तथा प्रतीतिः संभवति हेतुत्वसादृश्ययोविनिश्चयस्यो भयग्रहणाधीनत्वादिति नाकारादर्थसिद्धिः । तदेवं न हेतुत्वं ग्राह्यलक्षणं नाप्याकारार्पणक्षमस्य हेतुत्वम्, तस्माद् ग्राह्यलक्षणाभावाद् बुद्धेरन्योऽनुभाव्यो नास्तीति साधूक्तम् । saise बुद्धिव्यतिरिक्तोऽर्थो नास्ति, यद्यसौ जडो न स्वयं प्रकाशेत । न च तस्य प्रकाशकान्तरमुपलभामहे, सर्वदैवैकस्यैवाकारस्योपलम्भात् । अथास्ति प्रकाशम्, न तत्स्वयमप्रकाशमानमप्रकाशस्वभावं विषयमपि प्रकाशयेत् । यदव्यक्त-प्रकाशं तदव्यक्तम्, यथा कुड्यादिव्यवहितं वस्तु, अव्यक्त प्रकाशश्च परस्य इस प्रकार एक विज्ञान में आकार के खण्डित हो जाने पर वह और विज्ञानों में भी सम्भव नहीं है । ( उ ० ) अगर नीलादि आकार के विज्ञान अर्थ के बिना ही उत्पन्न होते हैं तो फिर औरही किसी कारण से कभी उत्पन्न होते हैं, या नीलादि आकारों के afra के बिना ही प्रतीत होते हैं तो फिर और आकार भी वैसे ही होंगे या बिना अस्तित्व के हो प्रतीत होंगे । यह तो उपपादित सा है कि ' आकारवाद ' में ज्ञान के आकारों से किसी आकार को भ्रान्त या अभ्रान्त समझना सहज नहीं हैं । दूसरी बात यह है कि बोध का आकार अपने सदृश हो कारण की कल्पना करता है तो फिर इससे यह समझा जाय कि ' इस बोध का जो आकार है उसी तरह का आकार उसका कारण है, ' किन्तु यह आकार को अग्राह्य मानने पर सम्भव नहीं है, क्योंकि कारणत्ब और सादृश्य इन दोनों का ग्रहण उनके प्रतियोगी और अनुयोगी रूप दो सम्बन्धियों के ग्रहण के बिना सम्भव नहीं है । एवं विज्ञान का कारण उससे ग्राह्य नहीं हो सकता, एवं विज्ञान में जो आकार को उत्पन्न करेगा वह विज्ञान का कारण नहीं हो सकता । अतः हमने ठीक कहा था कि बुद्धि के ग्राह्य स्वरूप को छोड़कर और कोई बुद्धि का ग्राह्य नहीं है । बुद्धि से भिन्न अर्थ की स्वतन्त्र सत्ता इसलिए भी नहीं है कि अर्थ अगर जड़ है तो फिर स्वयं प्रकाशित नहीं हो सकता, एवं उसके दूसरे प्रकाशक की उपलब्धि होती नहीं है, बराबर एक आकार की ही प्रतीति होती है । अगर कोई दूसरा प्रकाशक है तो फिर वह या तो स्वयं अप्रकाश स्वभाव का होगा? या प्रकाशस्त्रभाववाला होगा? इन दोनों में से किसी से भी अर्थों का प्रकाश सम्भव नहीं है, क्योंकि जो स्वयं अप्रकाश स्वभाव का होगा वह अप्रकाशस्वभाव की ही किसी दूसरी वस्तु को कैसे प्रकाशित कर For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ३०२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ गुणे संख्या-बाह्यर्थः । तथा यत्परस्य प्रकाशकं तत्स्वप्रकाशे सजातीयपरानपेक्षम्, यथा प्रदीपः, प्रकाशकं च परस्य ज्ञानमिति । अतः प्रकाशमानस्यैव बोधस्य विषय-प्रकाशकत्वमिति न्यायादनपेतम् । तथा सति सहोपलम्भनियमात् सर्वज्ञा-सर्वज्ञयोरिव वेद्यवेदकयोरभेदः, भेदस्य सहोपलम्भानियमो व्यापको नीलपीतयो -युगपदुपलम्भनियमाभावात् । सहोपलम्भानियमविरुद्धश्च सहोपलम्भनियम इति व्यापकविरुद्धोपलब्ध्या भेदादनियमव्याप्त्या व्यावर्तमानो नियमोऽभेदे व्यवतिष्ठत प्रतिबन्धसिद्धिः । न च ' सह ' शब्दस्य साहाय्यं यौगपद्यं वार्थः, तयोश्च भेदेन व्याप्तत्वाद्विरुद्ध इति वाच्यम्, आभिमानिकस्य सहभावस्य हेतुविशेषणत्वेनोपादानात् दृष्टान्ते द्विचन्द्रे आभिमानिकः सहभावो न तात्त्विकः, चन्द्रस्यैकत्वात् । सार्वज्ञ्य-सकता है? अगर यह कहें कि विज्ञान और उसके विषय दोनों ही प्रकाशस्वभाव के ही है, किन्तु इनमें विज्ञान का यह स्वभाव व्यक्त है और विषयों का अव्यक्त, अतः प्रकाशस्वभाव वाले विज्ञान में विषयों के प्रकाशस्वभाव अभिव्यक्त होकर विषयों को प्रकाशित करते हैं, तो इस विषय में यह कहना है कि जिसका प्रकाश अव्यक्त रहता है वह स्वयं भी अव्यक्त ही रहता है, जैसे दीवाल से घिरी हुई वस्तु । पूर्व-पक्षवादी के मत से वस्तुओं का प्रकाशस्वभाव अव्यक्त है, अतः उसके मत से वे वस्तु कभी प्रकाशित हो ही नहीं सकतीं । रही विज्ञान के प्रकाशस्वभाव की बात - इस प्रसङ्ग में यह कहना है कि जो दूसरे का प्रकाशक होता है, बह अपने प्रकाश के लिए किसी दूसरे प्रकाशस्वभाववाले की अपेक्षा नहीं रखता है, जैसे कि प्रदीप । ज्ञान भी दूसरे का प्रकाशक है अतः विज्ञान ' स्वयं प्रकाश ' हैं । विज्ञान दूसरे का प्रकाशक है यह बात न्याय से विरुद्ध भी नहीं है | चूँकि ' सहोपलम्भनियम ' के कारण अर्थात् ज्ञान और अर्थ नियमतः साथ ही प्रकाशित होते हैं इस नियम के कारण ( वे दोनों एक ही हैं ) जैसे कि एक ही पुरुष ( काल भेद से ) सर्वज्ञ एवं असर्वज्ञ दोनों होने पर भी अभिन्न ही होता है, सुतराम् सहोपलम्भ का अनियम भेद का व्यापक है ( अर्थात् यह अव्यभिचरित नियम है । कि जिन वस्तुओं का नियमतः साथ साथ प्रकाशन नहीं होता वे अवश्य ही परस्पर भिन्न होती हैं ) जैसे कि नील और पीत नियमतः साथ प्रकाशित नहीं होते और वे दोनों भिन्न होते हैं । सहोपलम्भ का यह अनियम कथित —– सहोपलम्भ नियम का विरोधी है, अतः भेद के ) व्यापक ( सहोपलम्भ के अनियम ) के विरुद्ध ( सहोपलम्भ की ) उपलब्धि ( ज्ञान ) और अर्थों के भेद को मिटाकर दोनों को अभिन्न रूप में व्यवस्थित कर देती है, ( अतः विज्ञान से भिन्न किसी वस्तु की वास्तविक सत्ता नहीं है ), इस प्रकार सहोपलम्भनियम में अभेद की व्याप्ति सिद्ध है । ( उ ० ) सहोपलम्भ शब्द में प्रयुक्त ' सह ' शब्द का साहाय्य अर्थ है? या एककालिकत्व १ ये दोनों ही विषयों के भेद के साथ सम्बद्ध हैं । ( प्र ० ) ' सहोपलम्भ ' में आभिमानिक ( सांवृत, अतात्त्विक ) साहित्य को ही विशेषण मानते हैं । इसके दृष्टान्त द्विचन्द्र ज्ञान में भी सांवृत साहित्य For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली ३०३ वित्तक्षणः स्वेनात्मना सह सर्वान् प्राणिनो युगपदुपलभ्यते । न च तेषां सार्वज्ञ-ज्ञानाभेद इत्यनैकान्तिकत्वमिति चेत्? न, अनियमात् । क्षणाभिप्रायेण तावद् ययोः सहोपलम्भस्तयोरसौ नियत एव, क्षणयोः प्रत्येकं पुनरनुपलम्भात् । किन्तु सन विवक्षितः सन्तानाभिप्रायेण सहोपलम्भनियमः । न च सर्वज्ञसन्तानस्य चित्तान्तरसन्तानेन सह युगपदुपलम्भोऽस्ति, सर्वज्ञस्य कदाचित् स्वात्ममात्रप्रतिष्ठ-स्यापि सम्भवात् । न च तदानीमसर्वज्ञः सर्वज्ञात् सामर्थ्यसम्भवात् । अपचन्नपि पाचको यथा, तथा यद्वेद्यते येन वेदनेन तत्ततो न भिद्यते, यथात्मा ज्ञानस्य, वेद्यन्ते च नीलादयः । भेदे हि ज्ञानेनास्य वेद्यत्वं न स्यात् तादात्म्यस्य नियम-हेतोरभावात्, तदुत्पत्तेरनियामकत्वात् । अन्येनान्यस्यासम्बद्धस्य वेद्यत्वे चाति-प्रसङ्गादिति भेदे नियमहेतोः सम्बन्धस्य व्यापकस्यानुपलब्ध्या भेदाद्विपक्षाद् ही है, तात्त्विक नहीं, क्योंकि चन्द्र वस्तुतः एक ही है । ( उ ० ) सर्वज्ञत्वविषयक ज्ञान का क्षण तो अपने साथ सभी आत्माओं को ग्रहण करता है, किन्तु सर्वज्ञत्वविषयक ज्ञान और आत्माओं में तो अभेद नहीं है, अत: ' सहोपलम्भनियम ' रूप हेतु व्यभि चरित है । ( प्र ० ) यह व्यभिचार दोष नहीं है, क्योंकि यह कोई नियम नहीं है कि सर्वज्ञ - चित्त - विषयक ज्ञान के साथ और सभी चित्त अवश्य ही गृहीत हों । क्षण प्रत्येक विज्ञान में भासित होनेवाले प्रत्येक क्षण में स्थित चित्त या आत्मा ) के अभिप्राय से जिन दोनों ( सन्तानियों के समूह में स्थित प्रत्येक व्यक्ति ) के सहोपलम्भ का नियम है उन दोनों में अभेद भी अवश्य ही है, क्योंकि उन दोनों में से प्रत्येक की अलग से उपलब्धि नहीं होती है । किन्तु सर्वज्ञत्व ज्ञान के समय जो और सभी आत्माओं की उपलब्धि होती हैं, वह सन्तान के अभिप्राय से है, सन्तान ( समूह ) में स्थित प्रत्येक के अभिप्राय से नहीं, क्योंकि कभी सर्वज्ञत्व की प्रतीति अगर आत्माओं को छोड़कर केवल स्वमात्र विषयक भी हो सकती है, किन्तु इससे उस समय भी वह असर्वज्ञ नहीं हो जाता, क्योंकि उस समय भी उस पुरुष से सर्वज्ञ पुरुष से होनेवाले असाधारण कार्य के सम्पादन की सम्भावना बनी रहती है । जैसे कि पाक न करते समय भी रसोइया ' पाचक ' कहलाता ही है । अतः जिस ज्ञान के द्वारा जो गृहीत होता है, वह उससे भिन्न नहीं है । जैसे कि आत्मा ज्ञान से भिन्न नहीं है । नीलादि भी ज्ञात होते हैं । अतः नीलादि और उनके ज्ञान अगर भिन्न हों तो फिर नीलादि उनसे ज्ञात ही नहीं होंगे । ( घट विषयक ज्ञान से घट ही ज्ञात होता है इस ) नियम का कारण ( उक्त ज्ञान और घटादि विषयों का ) तादात्म्य तो है नहीं और उसकी उत्पत्ति भी नियामक नहीं है ( उत्पत्ति और अभेद ये दो ही व्याप्ति के ग्राहक हैं ), परस्पर असम्बद्ध दो वस्तुओं में से एक को अगर दूसरे का ज्ञापक मानें ( घट ज्ञान से पट भी ज्ञात हो इत्यादि ) आपत्तियाँ होंगी, अतः ज्ञान और विषय इन दोनों में भेद का ज्ञापक और For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ३०४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ गुणे संख्या-व्यावर्तमानं वेद्यत्वमभेदेन व्याप्यत इति हेतोः प्रतिबन्धसिद्धिरिति । एतेनाह-मित्याकारस्यापि ज्ञानादभेदः समर्थितः । यश्चायं ग्राह्यग्राहकसंवित्तीनां पृथ-गवभासः स एकस्मिरचन्द्रमसि द्वित्वावभास इव भ्रमः । तत्राप्यनादिरविच्छिन्नप्र-वाहाभेदवानैव निमित्तम् । यथोक्तम्-यथोक्तम्-" भेदश्चाभ्रान्तिविज्ञाने दृश्येतेन्दाविव द्वये " इति । ननु बाह्याभावे येयं नीलाद्याकारवती बुद्धिरुदेति तस्याः किं कारणम्?
अर्थबुद्धिस्तदाकारा सा त्वाकारविशेषणा ।
सा बाह्यादन्यतो वेति विचारमिममर्हति ॥
अत्रापि वदन्ति - बाह्मसद्भावेऽपि तस्याः किं कारणम्? नीलादिरर्थ इति चेत्? न तावदयं दृश्यतेऽर्थस्य सदातीन्द्रियत्वात् । कार्यवैचित्र्येण कल्प-नीयश्चेत्? दृश्यस्य समनन्तरप्रत्ययस्यैव शक्तिवैचित्र्यं कल्प्यताम्, येन स्वप्न-ज्ञानेऽप्याकारवैचित्र्यं तत्र घटते, देशकालव्यवहितानामर्थानां भेद का व्यापक दोनों के सम्बन्ध को उपलब्धि नहीं होती है । ज्ञान के द्वारा समझ में आनेवाले घटादि ज्ञान से भिन्न नहीं हो सकते । इस प्रकार वेद्यत्व भेदरूप विपक्ष से हट जाता है एवं अभेद के साथ व्याप्त हो जाता है । ' अहम् ' इस आकार के ज्ञान का विषय ( आत्मा ) और ज्ञान के अभेद का भी समर्थन हो जाता है । विषय, प्रमाण एवं ज्ञान इनमें जो परस्पर भिन्नत्व की प्रतीति होती है, वह एक ही चन्द्रमा में द्वित्व के अवभास की तरह भ्रम है । इस भ्रम में भी अनादि एवं सतत प्रवाहित होनेवाली वासना ही कारण हैं । जैसा कहा है कि भ्रान्तिरूप ज्ञान में ही चन्द्रमा में द्वित्व की तरह भेद भासित होता है । अगर नीलादि बाह्य विषयों की सत्ता ही नहीं है तो फिर नीलादि आकारों से युक्त इन विविध बुद्धियों का कारण कौन है? जैसा कहा है कि " अर्थ विषयक बुद्धि अर्थाकार होती है, अतः बुद्धि आकार रूप विशेषण से युक्त अवश्य है, अतः यह विचार उठता है कि यह आकार विशिष्ट बुद्धि बाह्य वस्तु से होती है या और किसी वस्तु से? इस विषय में विज्ञानवादी कहते हैं कि ( प्र ० ) बाह्य वस्तुओं की सत्ता मान लेने के पक्ष में आकार-विशिष्ट बुद्धि का कारण कौन होगा? अगर नीलादि अर्थों को कारण मानें तो वह हो नहीं सकता, क्योंकि वे कभी देखे नहीं जाते । क्योंकि अर्थ सदा ही इन्द्रिय के अगोचर हैं । अगर कार्यों की विचित्रता से उसका अनुमान करते हैं तो फिर अतीन्द्रिय अर्थ में उस शक्ति की कल्पना की अपेक्षा दृश्य समनन्तरप्रत्यथ में ही विचित्र शक्ति की कल्पना क्यों नहीं कर लेते? जिससे कि स्वप्नज्ञान में भी आकार की विचित्रता की उपपत्ति हो सके । स्वप्नज्ञान में भासित होनेवाले एवं देश और काल से व्यवहित विषयों में For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra प्रकरणम् ] BT www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir भाषानुवादसहितम् ३०५ न्यायकन्दली For Private And Personal सामर्थ्यम् अविद्यमानत्वात् । नन्वेवं विचित्रप्रत्ययोऽपि न स्याज्ज्ञानस्यैकत्वेन तदव्यतिरेकिणामप्येकत्वप्रसङ्गात् प्रत्याकारं च ज्ञानभेदे ज्ञानानां प्रत्येकं स्वाकारमात्रनियतत्वात्, तेभ्यो व्यतिरिक्तस्य सर्वाकारग्राहकस्याभावात् । अत्र ब्रूमः न तावच्चित्रं रूपं न प्रकाशते? संवित्तिविरोधात् । जडस्य च प्रकाशा-योगः । तेनेदं ज्ञानात्मकमेव रूपम्, न चाकारभेदेन ज्ञानभेद, चित्ररूपस्यैकस्याकार-भेदाभावात् । यथा नीलस्टयैको नीलस्वभाव आकार:, तथा वैचित्र्यस्यैकस्य चित्रस्वभाव एवाकारः । तस्मिश्चात्मभूते ज्ञानं प्रवर्तमानं कृत्स्न एव प्रवर्तते, यदि वा न प्रवर्तत एव । न तु भागेन प्रवर्तते तस्य निर्भागत्वात् । ये त्वमी भागाः परस्परविविक्ताः प्रतिभान्ति, न ते चित्रं रूपमिति न काचिदनुपपत्तिः । स्थूलाकारोऽप्यनयैव दिशा समर्थनीयः । अवयवी त्वेकः स्थूलो वा नोपपद्यते । नानावयववृत्तित्वेन तस्य नानात्वापातात् । ज्ञानाकारस्त्वेकमिन् ज्ञाने वर्तमान एकः स्थूलो भवत्येव । कम्पाकम्पादिविरोधस्तु संविद्विरोधो व्युदसनीय इति केचित् । स्वप्नज्ञान की कारणता सम्भव ही नहीं है, क्योंकि उस समय उनका अस्तित्व ही नहीं है । ( उ ० ) ज्ञान और अर्थ यदि एक हों तो फिर चित्र रूप की प्रतीति नहीं हो सकेगी, क्योंकि चित्र रूप विषयक प्रतीति एक है, उससे अभिन्न रूप भी एक ही होगा । आकार के भेद से यदि ज्ञानों का भेद मानें तो फिर प्रत्येक ज्ञान आकार में नियत होगा, उनसे अतिरिक्त सभी रूपों का एक आकार का कोई एक ग्राहक सम्भव नहीं होगा । ( ० ) यह कहना अनुभव से विरुद्ध है कि चित्र रूप की प्रतीति ही नहीं होती है । चूंकि जड़ में प्रकाश का सम्बन्ध सम्भव नहीं है, अतः प्रकाशित होनेवाला चित्र रूप भी ज्ञान रूप ही है । चित्र रूप एक है, उसके विभिन्न आकार नहीं हैं । अतः यह कहना भी सम्भव नहीं है कि चित्र रूप की प्रतीति वस्तुतः अनेक रूपों की विभिन्न आकार की अनेक प्रतोतियाँ ही हैं । जैसे कि नील का नीलस्वभाव रूप एक ही आकार है, वैसे ही वैचित्र्य का भी चित्र स्वभाव रूप एक ही आकार है । इस स्वतन्त्र एक आकार की वस्तु में यदि ज्ञान प्रवृत्त होगा तो सम्पूर्ण में ही प्रवृत्त होगा अथवा प्रवृत्त ही नहीं होगा, किन्तु उसके किसी एक अंश में प्रवृत्त नहीं हो सकता, क्योंकि वह अंशों से शून्य है, उसके जो परस्पर भिन्न भाग मालूम होते हैं वे चित्र रूप नहीं है । अतः कोई अनुपपत्ति नहीं है । वस्तुओं के स्थूल आकारों का भी समर्थन इसी रास्ते से करना चाहिए । किसी बौद्ध विशेष का मत है कि सभी अवयवों में रहनेवाला एक स्थूल अवयवी का मानना ठीक नहीं जँचता, क्योंकि अनेक अवयवों से सम्बद्ध रहने के कारण उसमें भी अनेकस्व की ही आपत्ति होगी । उसको अगर ज्ञान का आकार मान लेते हैं तो फिर एक आकार के ज्ञान में आरूढ़ वस्तु में स्थूलत्व और एकत्व दोनों का रहना असम्भव नहीं होता । नाना अवयवों से एक स्थूलाकार वस्तु मानने में एक ही वस्तु में कम्प और अकम्प रूप होनेवाले विरोध रूप दोष तो वस्तुतः ज्ञानों का ही विरोध है, जिसका परिहार कर लेना चाहिए ।