प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 381–390
प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 381–390
पृष्ठ 381
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir २०६ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ गुणे संख्या-अपरे तु ज्ञानाकारस्याप्यनादिवासनावशेन प्रतिभासमानस्य विचारा. क्षमत्वमलीकत्वमेव तत्त्वमाहुः । तथा च यः प्रत्यय: स बाह्यांनालम्बनो यथा स्वप्नादिप्रत्ययः प्रत्ययश्चायं जाग्रतः स्तम्भादिप्रत्ययः, निरालम्बनता हि प्रत्य-यत्वमात्रानुबन्धिनी स्वप्नादिषु दृष्टा, जाग्रतः प्रत्ययस्यापि प्रत्ययत्वमेव स्वभावः, यदि निरालम्बनत्वं परित्यजति तदा स्वभावमेव परित्यजेत् । ननु सर्व-प्रत्ययानामनालम्बनत्वे धर्महेतुदृष्टान्तादिप्रत्ययानामनालम्बनत्वम्, ततश्च धर्महेत्वाद्यभावान्नानुमानप्रवृत्तिः । अथ ते सालम्बनास्तैरेवास्य हेतोर्व्यभिचारः? नैवम् तेषां बहिरनालम्बनानां संवृतिमात्रेणानुमानप्रवृत्तिहेतुत्वात् । दृष्टा विद्यात विद्याप्राप्तिः, यथा लिप्यक्षरेभ्यो वर्णप्रतीतिः, वर्णप्रतिपादक रेखादयोऽपि कोई ( माध्यमिक ) बोद्ध मतावलम्बी कहते हैं कि ज्ञानाकार से प्रतिभास भी अनादि वासना से ही होता है, अतः इसका निर्वाचन भी वस्तुओं का असम्भव है । अतः ' विचारक्षमत्व ' रूप ' शून्यत्व ' ही तत्त्व है । जितने भी ज्ञान हैं, उनका कोई बाह्य वस्तु विषय नहीं है 1 । जैसे कि स्वप्न ज्ञान का कोई बाह्य विषय नहीं होता । जाग्रद-वस्था के पुरुषों का स्तम्भादि विषयक ज्ञान भी केवल ज्ञान होने के नाते ही बाह्य विषय शून्य है । क्योंकि स्वप्नज्ञान को केवल ज्ञान होने के नाते ही विषयशून्य और ज्ञान दोनों समझा जाता है । अतः जागते हुए व्यक्ति का ज्ञान भी केवल ज्ञानत्व स्वभाव का ही है, उसका भी स्वभाव सविषयकत्व नहीं है, ( अर्थात् स्वप्न ज्ञान की तरह जाग्रदवस्था का ज्ञान भी निर्विषयक ही है, जिससे सभी विषयों की सत्ता नहीं सिद्ध की जा सकती ) अतः स्तम्भादि विषयक ज्ञान यदि निर्विषयकत्व को छोड़ेगा तो अपने ज्ञानत्व को भी खो बैठेगा | ( प्र ० ) अगर सभी ज्ञान निर्विषयक ही हों उो ( आपके अभिमत का साधक ) पक्ष, हेतु, दृष्टान्तादि विषयक ज्ञान भी विषय शून्य ही होंगे, फिर पक्ष साध्य प्रभृति के अभाव से ( आपकी अभिमत ) अनुमिति की ही प्रवृत्ति नहीं हो सकेगी । वे पक्षादि यदि सविषयक हैं तो फिर उन्हीं ज्ञानों में ( निर्विषयकत्व का साधक ज्ञानत्व रूप ) आपका हेतु व्यभिचरित होगा । ( उ ० ) नहीं, यह बात नहीं है, क्योंकि वे पक्षादि विषयक ज्ञान वस्तुतः निर्विषयक होने पर भी केवल संवृति ( अविद्या ) के कारण ही अनुमानप्रवृत्ति के कारण हैं । अविद्या से भी विद्या ( यथार्थज्ञान ) की उत्पत्ति देखी जाती है । जैसे कि लिपि से वर्णों की प्रतीति होती है । ( प्र ० ) वर्ण की ज्ञापक रेखादि रूप वे लिपियाँ भी तो स्वरूपतः सत्य ही हैं? ( उ ० ) यह सत्य है कि वे रेखादि रूप से सत्य हैं, किन्तु वे अपने रेखात्व रूप से तो वर्णों के ज्ञापक नहीं हैं । उन रेखाओं में जब ककार दि वर्णों का आरोप किया जाता है, तब उसी आरोपित रूप से वे वर्ण की प्रतीति को उत्पन्न करती हैं । अतः स्वरूपतः सत्य होते हुए भी For Private And Personal
पृष्ठ 382
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली २०७ स्वरूपेण सत्याः । सत्यं सत्याः, न तु तेन रूपेण प्रतिपादकाः । ककारादि-रूपाध्यारोपेण प्रतिपादकाः, तदेषां कार्योपयोगित्वमसत्यमेवेति पूर्वपक्षसंक्षेपः । यत्तावदुक्तं ग्राह्यलक्षणायोगादिति न तदर्थाभावसाधनसमर्थम्, ग्राह्य-लक्षणो ह्यर्थो ग्राह्यो न भवेन्न तु तस्यासद्भावः, ग्रहणाभावस्य पिशाचादिवत् स्वरूपविप्रकर्षेणाप्युपपत्तेः । ग्रहणयोग्ये सत्यग्रहणादभावसिद्धिरिति चेत्? कथं पुनरस्य योग्यता संप्रधारिता? नहि तस्य ग्रहणं क्वचिदभूत्, भूतं चेन्न ग्राह्य-लक्षणायोगः । किञ्च, ग्राहकाधीनं ग्रहणम्, ग्राहकं च ज्ञानं स्वात्ममात्रनियतमित्ये-तावतैव तदन्यस्याग्राह्यता, ग्राह्याभावादेव चेदमग्रहणमिति साध्याविशिष्टम् । अपि चेदं भवान् पृष्टो व्याचष्टां का ज्ञानाकारस्य ग्राह्यता? नहि तस्यास्ति ज्ञानहेतुत्वं तदव्यतिरेकात् । नाप्याकाराधायकत्वम्, आकारद्वयाननुभवात् । न च कार्योपयोगित्व रूप से असत्य ही हैं । इतना तक बाह्य अर्थ की यथार्थ सत्ता माननेवाले हम लोगों पर बाह्य अर्थ की यथार्थ सत्ता को न माननेवाले बौद्धों के आक्षेप रूप पूर्वपक्ष का संक्षेप में वर्णन ( अब इस प्रसङ्ग में हम लोगों का उत्तर सुनिये ) यह जो कहा गया है कि ' ग्राह्यलक्षण ' के अयोग से बाह्य वस्तुओं की सत्ता नहीं हैं यह इसलिए गलत है कि ग्राह्यलक्षण का अयोग रूप यह हेतु बाह्य वस्तु के स्वतन्त्र अस्तित्व के खण्डन का सामर्थ्य नहीं रखता है । इससे इतना ही हो सकता है कि बाह्य वस्तुएँ ज्ञात न हो सकेंगी, किन्तु इससे इनके अस्तित्व का लोप नहीं हो सकता, क्योंकि वस्तुओं के ग्रहण ( ज्ञान ) का न होना स्वरूपविप्रकर्ष ( ज्ञान होने की योग्यता के अभाव ) से भी हो सकता है । जैसे कि पिशाचादि की सत्ता रहते हुए भी उनका ग्रहण नहीं होता । ( प्र ० ) ग्रहण की योग्यता रहने पर भी कभी - कभी कोई विषय गृहीत नहीं होता है, इससे समझते हैं कि उसकी सत्ता नहीं है । ( उ ० ) आपने इसकी योग्यता कैसे निश्चित की? क्योंकि आपको तो उसका भी ज्ञान नहीं है । अगर है तो फिर उसमें ग्राह्यलक्षण रूप हेतु ही नहीं है । और भी बात है, ग्रहण ग्राहक से होता है । ज्ञान ही ग्राहक है । वह केवल अपने स्वरूप में ही नियत है, ( अर्थात् उसमें किसी बाह्य वस्तु का सम्बन्ध नहीं है ), केवल इसीलिए ज्ञान से अतिरिक्त वस्तुको आप अग्राह्य कहते हैं । एवं ( आप ही कहते हैं कि ) वस्तुओं का ग्रहण इसलिए नहीं होता कि वह अग्राह्य हैं । अतः यह ग्राह्यलक्षण का अयोग रूप हेतु साध्यावि-शिष्ट है, ( अर्थात् सिद्ध नहीं है, किन्तु हेतु को सिद्ध होना चाहिए ) । और भी मुझे पूछना है कि ज्ञानाकार में यह ग्राह्यता क्या है? उस आकार में ज्ञान की कारणता तो ग्राह्यता नहीं है, क्योंकि वह आकार ज्ञान से अभिन्न है | ( अतः उक्त ग्राह्यता ज्ञानकारणत्व रूप नहीं है ) । ज्ञान में आकार सम्पादन की क्षमता भी ग्राह्यता नहीं हो सकती, क्योंकि विषयों के आकार से भिन्न ज्ञानाकार नाम की किसी दूसरी वस्तु का अनुभव नहीं For Private And Personal
पृष्ठ 383
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ३०८ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ गुणेसंख्या-ज्ञानात्मकत्वमेव ग्राह्यत्वम्, सुषुप्तावस्थायां ज्ञानात्मभूतस्य ज्ञानसन्तानवदनुवर्त-मानस्यापि ग्रहणाभावात् । अवभासमानत्वमेव तस्य ग्राह्यत्वमिति चेत्? कोऽयमा-कारस्यावभासः? ज्ञानप्रतिबद्धहाना दिव्यवहारयोग्यतापत्तिश्चेत्? बाह्यस्यापि सेव योग्यता । तथा हि - नीलं पीतमेतदिति संवादिना बाह्यमेवोपाददते जहत्युपेक्षन्ते वा, नान्तरमाकारमित्यसिद्धो ग्राह्यलक्षणायोगः, कथमन्यस्योत्पत्त्यान्यस्य व्यवहार-योग्यतेति चेत्? तस्य स्वरूपकारणसामग्रीनियमेन तद्विषयव्यवहारानुगुणस्वभाव-स्योत्पादनादिति यत्किञ्चिदेतत् । एतेन प्रत्युक्तम् । वेद्यत्वमपि भेदेऽपि ज्ञानस्वभावकारणसामग्री-नियमादेव तस्योपपत्तेः, सन्दिग्धविपक्षव्यावृत्तिकत्वात् । यदपि जडस्य प्रकाशायोग इति, तदपि प्रकाशानात्मकत्वाभिप्रायेण । सिद्धसाधनं संसर्गाभिप्रायेण निरुपपत्तिकम् । नहि जडस्य प्रकाशसंसर्गेण न भवितव्यमित्यस्ति राजाज्ञा, यथा होता । ज्ञान रूपत्व भी ग्राह्यत्व नहीं है, क्योंकि सुषुप्ति अवस्था में ज्ञान रूप ज्ञान है । समूह की तरह बराबर रहनेवाले विषय रूप ज्ञान की भी उपलब्धि नहीं होती यदि अवभासमानत्व को ही ग्राह्यत्व कहें तो फिर यह पूछना है कि आकारों का यह अवभासमानत्व क्या वस्तु है? यदि वह ज्ञान के साथ नियमित रूप से सम्बद्ध ग्रहण करने की योग्यता या त्याग करने की योग्यता ही है तो फिर बाह्य वस्तुओं में • अर्थात् वस्तुओं को बाह्य मान लेने पर ) भी उक्त दोनों प्रकार की योग्यतायें हैं ही, क्योंकि “ यह नील है, यह पीत है " इत्यादि यथार्थ ज्ञानों से युक्त पुरुष उन ज्ञानों से बाह्य वस्तुओं को ही लेता है, छोड़ता है, या उपेक्षा कर देता है, किसी आन्तर वस्तु से नहीं । तस्मात् ' ग्राह्यलक्षण ' का अयोग रूप आपका हेतु ही सिद्ध नहीं है । ( प्र ० ) एक ( ज्ञान ) की उत्पत्ति से दूसरे ( उस ज्ञान के विषय बाह्य वस्तु ) में व्यवहार की योग्यता कैसे होती है? ( प्र ० ) इसमें कोई बात नहीं है, क्योंकि अपनी सामग्री रूप नियमित कारणों से जो ज्ञान उत्पन्न होता है, वह उसके विषय में व्यवहार योग्यता सम्पादन की क्षमता रूप स्वभाव को लेकर ही उत्पन्न होता है । इसी से ज्ञान और विषय के अभेद का साधक वेद्यत्व हेतु भी खण्डित हो गया, क्योंकि ज्ञान और विषय को भिन्न मान लेने पर भी ज्ञान का स्वभाव और सामग्री का नियम इन दोनों से ही ( घटज्ञान से ही घट समझा जाय ) इस नियम की उपपत्ति हो जाएगी । उक्त वेद्यत्व हेतु में विपक्ष की व्यावृत्ति भी सन्दिग्ध है । एवं प्रकाश का ' योग ' सम्बन्ध ) असम्भव है, इस कथन से ( योग शब्द के द्वारा ) यदि जड़ और प्रकाश का अभेद ( सम्बन्ध ) आपको अभीष्ट है, तो फिर यह सिद्धसाधन है । यदि इससे जड़ में प्रकाश के सम्बन्ध का असम्भव कहना अभिप्रेत है, तो फिर इस प्रसङ्ग में यह कहना है कि यह युक्ति से शून्य है, एवं For Private And Personal
पृष्ठ 384
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली ३०६ छिदिक्रिया छेद्येन सम्बध्यते भिद्यते च, तथा ज्ञानक्रियापि ज्ञेयेन सह संभन्त्स्यते भेत्स्यते च । सहोपलम्भनियमस्यापि विपक्षाद् व्यावृत्तिः सन्दिग्धा, ज्ञानस्य स्वपर-संवेद्यतामात्रेणैव नीलतद्धियोर्युगपद्ग्रहणनियमस्योपपत्तेः । बाह्याभावाज्ज्ञानं परस्य संवेदकं न भवतीति चेत्? बाह्याभावसिद्धौ हेतोर्विपक्षाद् व्यावृत्तिसिद्धिः, तत्सिद्धौ चास्य विपक्षाभावं प्रति हेतुत्वमित्यन्योन्यापेक्षित्वम्? तदेवास्तु किमनेन? असिद्धश्च सहोपलम्भनियमो नीलमेतदिति बहिर्मुखतयार्थऽनुभूयमाने तदानीमेवा-न्तरस्य तदनुभवस्यानुभवात् । ज्ञानस्य स्वसंवेदनता सिद्धौ सहोपलम्भनियम सिद्धि-रिति चेत्? स्वसंवेदनसिद्धौ किं प्रमाणम्? यत्प्रकाशं तत्स्वप्रकाशे परानपेक्षं यथा प्रदीप इति चेत्? प्रदीपस्य तद्देशवर्तितमोपनयने व्यापारः, स चानेन स्वयमेव कृत इति तदर्थं प्रदीपान्तरं नापेक्षते, वैयर्थ्यात् । स्वप्रतिपत्तौ तु चक्षुरादिकमपेक्षत एवेति साध्यविकलता दृष्टान्तस्य । अथ प्रकाशकत्वं ज्ञानत्वमभिप्रेतम्? तस्मात् परानपेक्षा, तदानीमसाधारणो हेतुः । किसी राजा की आज्ञा भी नहीं है कि जड़ और प्रकाश में सम्बन्ध न हो । जैसे कि छेदन किया छेद्य वस्तु से भिन्न होती हुई भी उसके साथ सम्बद्ध होती है, उसी प्रकार ज्ञान रूप क्रिया भी ज्ञेय वस्तु से भिन्न होने पर भी उसके साथ सम्बद्ध होगी । एवं कथित ' सहोपलम्भनियम ' रूप हेतु में भी विपक्ष की व्यावृत्ति सन्दिग्ध ही है, क्योंकि ज्ञान को ' स्व ' एवं ' स्व ' से भिन्न ( अपना विषय ) दोनों का प्रकाशक मान लेने से ही उक्त ' सहोपलम्भ ' नियम की उपपत्ति हो जाएगी । ( प्र ० ) बाह्य वस्तु की तो सत्ता ही नहीं हैं, फिर ज्ञान दूसरे का ज्ञापक कैसे होगा । ( उ ० ) यह कहना तो स्पष्ट ही अन्योन्याश्रय से दूषित है, क्योंकि बाह्य वस्तु को सत्ता के उठ जाने पर सहोपलम्भ रूप हेतु में विपक्षव्यावृत्ति का निश्चय होगा, और विषक्षव्यावृत्ति के सिद्ध हो जाने पर सहोपलम्भनियम रूप हेतु के विपक्ष । बाह्य वस्तु ) के अभाव की सिद्धि होगी । ( प्र ० ) उक्त हेतु में विपक्ष की व्यावृत्ति के न रहने से ही क्या? ( उ ० ) वस्तुतः सहोपलम्भ-नियम रूप हेतु ही असिद्ध है, क्योंकि नील और नीलविषयक ज्ञान इन दोनों का अनुभव एक समय में नहीं होता । नील को बहिर्मुख प्रतीति हो जाने के अव्यवहित उत्तर क्षण में नील ज्ञान की अन्तर्मुखतया उपलब्धि होती है । ( प्र ० ) ज्ञान को स्वतः प्रकाश मान लेने से ही सहोपलम्भनियम की सिद्धि होगी । ( उ ० ) ज्ञान को स्वसंवेदन ( स्वतः प्रकाश ) मानने में ही क्या युक्ति है? ( प्र ० ) जो प्रकाश रूप होता है वह अपने प्रकाश के लिए दूसरे की अपेक्षा नहीं रखता, जैसे कि प्रदीप | ( उ ० ) प्रत्यक्ष के उत्पादन में प्रदीप का इतना ही उपयोग है कि वह विषयदेश के अन्धकार को हटाता है । प्रदीप अपने प्रत्यक्ष के लिए भी अन्धकार को हटाने का काम स्वयं कर लेता है, अतः प्रदीप के प्रत्यक्ष में दूसरे प्रदीप की आवश्यकता नहीं होती है, किन्तु चक्षुरादि For Private And Personal
पृष्ठ 385
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ३१० न्याय कन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ गुणे संख्या-चोक्तं यस्याव्यक्तः प्रकाशः तत्स्वयमव्यक्तं यथा पिहितं वस्त्विति, तत्र पिहितस्याव्यक्तता अप्रकाशः, तन्न, स्वयमव्यक्तत्वात् किन्त्वभावादेवेति व्याप्त्य-सिद्धिः । यच्च प्रत्ययत्वादिति तदप्यसारं दृष्टान्तासिद्धेः । स्वप्नादिप्रत्यया अपि समारोपित बाह्यालम्बना न स्वात्ममात्रपर्यवसायिनः, जाग्रदवस्थोपयुक्तानामेवा-र्थानां संस्कारवशेन तथा प्रतिभासनात्, अन्यथा दृष्टश्रुतानुभूतेष्वर्थेषु तदुत्पत्ति-नियमायोगात् । किञ्च, यदि बाह्यं नास्ति किमिदानीं नियताकारं प्रतीयते नीलमेतदिति । विज्ञानाकारोऽयमिति चेन्न, ज्ञानाद्वहिर्भूतस्य संवेदनात् । ज्ञानाकारत्वे त्वहं नीलमिति प्रतीतिः स्यान्न त्विदं नीलमिति । ज्ञानानां प्रत्येकमाकारभेदात् कस्यचिदहमिति प्रतीतिः कस्यचिदिदं नीलमिति चेत्? नीलाद्याकारवदहमित्या-को अपेक्षा तो रहती ही हैं । अतः प्रदीप रूप दृष्टान्त में स्वतः प्रकाशकत्व का ज्ञापक परानपेक्षत्व रूप हेतु नहीं है । यदि ज्ञानत्व को ही प्रकाशकत्व रूप मानें तो फिर ' स्वतः प्रकाशत्व ' का साधक परानपेक्षत्व हेतु उस समय असाधारण नाम का हेत्वाभास होगा । यह जो आप ने कहा कि- ' ढँकी हुई चीज की तरह जिसका प्रकाश अव्यक्त रहता है वह स्वयं भी अव्यक्त ही रहता है । " इस प्रसङ्ग में कहना है कि आवृत वस्तु का अप्रकाश ही उसकी अव्यक्तता है, जो वस्तुतः उस वस्तु के प्रकाश का अभाव मात्र है । उस वस्तु के प्रकाशक की अव्यक्तता उस वस्तु की अव्यक्तता नहीं है । अतः ज्ञान के स्वतः प्रकाशत्व की साधक उक्त व्यतिरेक व्याप्ति भी सिद्ध नहीं है । ( बाह्य वस्तुओं की असत्ता के साधक या ज्ञान में विषय शून्यत्व या निराल -म्बनत्व का साधक ) प्रत्यक्षत्व ( ज्ञानत्व ) हेतु में भी कुछ बल नहीं है, क्योंकि इस हेतु का ( स्वप्न ज्ञान रूप ) दृष्टान्त ही असिद्ध है । स्वप्नज्ञान भी बाह्य विषयक है ही । वहाँ वे केवल अपने स्वरूप में नहीं हैं । जाग्रत् अवस्था के ज्ञान में भासित होने योग्य विषयों का ही संस्कारवश स्वप्नज्ञान में भान होता है । अगर यह बात न हो तो स्वप्नज्ञान में नियमतः उसी विषय का भान कैसे हो जो वस्तु पहिले से ही श्रुत या दृष्ट हो । दूसरी बात यह है कि अगर बाह्य वस्तु नहीं है तो फिर यह नील है ' इत्यादि प्रतीतियों में नियमित रूप से किसका भान होता है? ( प्र ० ) प्रतीतियों में भासित होनेवाले आकार विज्ञान के हैं? ( उ ० ) ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि उक्त प्रतीतियाँ ज्ञान से भिन्न अर्थ विषयक ही होती हैं । अगर उक्त प्रतीतियों में भासित होनेवाले आकार भी विज्ञान के ही हों तो फिर उन प्रतीतियों का अभिलाप " यह नील है " इस प्रकार का न होकर ' मैं नील हूँ ' इत्यादि आकार का होगा । ( प्र ० ) ज्ञानों के प्रत्येक आकार भिन्न भिन्न हैं । इनमें से किसी आकार को प्रताति ' अहम् ' के साथ होती है, एवं किसी आकार की प्रतीति ' इदम् ' के साथ । ( उ ० ) ऐसी बात नहीं है, क्योंकि नीलादि आकारों की तरह ' अहम् ' आकार नियमित For Private And Personal
पृष्ठ 386
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली ३११ कारस्य व्यवस्थितत्वाभावात् । तथा च यदेकेनाहमिति प्रतीयते तदपरेण त्वमिति प्रतीयते, स्वयं स्वस्य संवेदनेऽहमिति प्रतिभास इति चेत्? कि वै परस्यापि संवेदनमस्ति? स्वरूपस्यापि भ्रान्त्या भेदप्रतीतिरिति चेत्? प्रत्यक्षेण प्रतीतो भेदो वास्तवो न कस्मात्? भ्रान्तं प्रत्यक्षमिति चेत्? यथोक्तम्-परिच्छेदान्तरं योऽयं भागो बहिरवस्थितः । ज्ञानस्याभेदिनो भेदप्रतिभासो ह्यपप्लवः ॥ इति । कुत एतत्? अनुमानेनाभेदसाधनादिति चेत्? प्रत्यक्षस्य भ्रान्तत्वेना-बाधितविषयत्वादनुमानस्यात्मलाभः, लब्धात्मके चानुमाने प्रत्यक्षस्य भ्रान्तत्व-मित्यन्योन्यापेक्षितादोषः । अस्तु वा भेदो विप्लवो नियतदेशाधिकरणप्रतीतिः, कुतः? नहि तत्रायमारोपयितव्यो नान्यत्रेत्यस्ति नियमहेतुः । वासनानियमात् तदापनियमः स्यादिति चेन्न तस्या अपि तद्देशनियमकारणाभावात् । सति ह्यर्थसद्भावे यद्देशोऽर्थस्तद्देशानुभवस्तद्देशा च तत्पूर्विका वासना, बाह्याभावे नहीं है । जिसको एक आकार की प्रतीति ' अहम् ' रूप से होती है, उसी आकार की प्रतीति किसी दूसरे को ' त्वम् ' रूप से या ' इदम् ' रूप से होती है । ( प्र ० ) ( यह नियम है कि ) स्वयं की प्रतीति अपने को ' अहम् ' आकार से होती है । ( उ ० ) ' स्वयं ' से भिन्न का भी तो संवेदन होता है । ( प्र ० ) वह संवेदन भी वस्तुतः ' स्व ' रूप का ही है, किन्तु भ्रान्तिवश उसमें भेद की प्रतीति होती है । ( उ ० ) प्रत्यक्ष के द्वारा ज्ञात होनेवाला यह भेद वास्तविक ही क्यों नहीं है । ( प्र ० ) चूँकि प्रत्यक्ष भ्रान्त है । जैसा कहा है कि जो अंश ज्ञान से भिन्न एवं बाह्य मालूम होता है, वह भी ज्ञान से अभिश्न ही है, उसमें ज्ञान भेद की प्रतीति भ्रान्ति है । ( उ ० ) यह क्यों? ( प्र ० ) चूँकि अनुमान से ज्ञान और अर्थ का अभेद सिद्ध है । ( उ ० ) उक्त कथन असङ्गत है, क्योंकि यह अन्योन्याश्रय से दूषित है । कथित अभेद का साधक अनुमान इस लिए प्रमाण है भेद का साधक प्रत्यक्ष भ्रान्त है । प्रत्यक्ष इसलिये भ्रान्त है कि अभेद का साधक अनुमान प्रमाण है । अगर यहमान भी लें कि उक्त भेद की प्रतीति भ्रान्ति है, फिर भी नियमित देश रूप अधिकरणकी प्रतीति इसका नियामक कोई नहीं है कि अमुक आकार के के विज्ञान में ही हो, विज्ञान के दूसरे आकारों में आरोप का नियम होगा? ( उ ० ) वासना में मी नहीं है । बाह्य वस्तुएँ जब रहती हैं, तब जो अर्थ विशिष्ट उस देश का अनुभव होता है, एवं उस देश विषयक ' वासना ' ( संस्कार ) उत्पन्नहोती है । अगर बाह्य अर्थ ही न रहेंगे तो फिर वासना में भी यह विशेष किससे उपपन्न होगा? विना विशेष कारण के विशेष कैसे उपपन्न होगी? क्योंकि विज्ञान का आरोप अमुक आकार नीं? ( प्र ० ) वासना के नियम से तद्देशविषयकत्व का कोई नियामक जिस देश में रहता है उस अर्थ देश विषयक इस अनुभव से ही उस For Private And Personal
पृष्ठ 387
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ३१२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ गुणे संख्या-तु तस्याः किंकृतो देशनियम:? न च कारणविशेषमन्तरेण कार्यविशेषो घटते, बाह्यचार्थो नास्ति । तेन वासनानामेव वैचित्र्यं तद्वैचित्र्यस्यार्थवत्तत्कारणानां वैचित्र्यादित्यनादिरिति चेत्? वासनावैचित्र्यं यदि बोधाकारादनन्यत् कस्तासां परस्परतो विशेषः? अथान्यदर्थे कः प्रद्वेषः? येन सर्वलोकप्रतीतिरपह्वयते । न चायमाकारो बहिरारोप्यते? ज्ञानेन चेत्? किं तस्य स्वात्मन्याकारसंवित्तिरेव बहिरारोपस्तदन्यो वा? आद्ये कल्पे संव तस्य सम्यक्प्रतीतिः, सैव च मिथ्ये-त्यापतितम्, ज्ञानगतत्वेनाकारग्रहणस्य सत्यत्वात्, बाह्यतासंवित्तेश्चायथार्थत्वात् । अन्यत्वे तु तयोर्न क्रमेण भावः, तत्कारणस्य ज्ञानस्य क्षणिकत्वात् । न चैकस्य युगपत्सत्यत्वेन मिथ्यात्वेन च प्रतीतिसम्भवः । न च क्रमयौगपद्याभ्यामन्यः प्रकारो-s स्ति, यत्र वर्तमानं ज्ञानं स्वात्मन्याकारं गृह्णीयाद्व हिश्च तमारोपयति । अपि च यदि ज्ञानाकारी नीलादिरर्थो यस्यैवायमाकारः स एव तं प्रतीयात् न पुरुषान्तरं प्रतीयात् । प्रतीयते चायं बहुभिरेकः, सर्वेषां तदाभिमुख्येन कार्य की उत्पत्ति नहीं हो सकती । ( प्र ० ) चूँकि बाह्य वस्तुओं की सत्ता नहीं है, अतः वासना में ही वैचित्र्य की कल्पना करते हैं । प्रयोजन से युक्त ( उस पहिलो वासना में स्थित ) कारणों का वैचित्र्य ही उक्त वासना के वैचित्र्य का कारण है | ( उ ० ) वासनाओं के ये वैचित्र्य भी अगर केवल विज्ञान रूप ही हैं तो फिर उनमें परस्पर भेद क्या है? अगर ये वैचित्र्य विज्ञान से भिन्न हैं तो फिर नीलादि वस्तुओं को ही विज्ञान से भिन्न मानने में आपको क्यों द्वेष है १ जिससे कि सर्वजनीन प्रतीतियों का आप अपलाप करते हैं । ( एवं ) विज्ञान के आकारों का यह आरोप कौन करता है? अगर ज्ञान ही? अगर आकार से अभिन्न विज्ञान में ही आकार का भान होता है और वही आरोप कहलाता है, तो फिर इस पक्ष में एक ही ज्ञान को सत्य और मिथ्या दोनों ही कहने को आपत्ति होगी, क्योंकि ज्ञान हो आकार के ग्रहण रूप होने से सत्य है, एवं उसमें बाह्यत्व का आरोप होने से मिथ्या है । अगर आकार विज्ञान और आकाराधायक विज्ञान दोनों को भिन्न मानें तो फिर उक्त कारणविज्ञान और कार्यविज्ञान दोनों की क्रमशः सत्ता नहीं रहेगी, क्योंकि कारणविज्ञान क्षणिक है । ( अगर दोनों विज्ञानों को एक मानें तो फिर ) एक ही विज्ञान एक ही समय सत्य और मिथ्या दोनों नहीं हो सकता । क्रम और यौगपद्य को छोड़कर कोई तीसरा प्रकार नहीं है कि जिस रूप में विद्यमान आकार अपने से अभिन्न आकार का भी ग्रहण करे और अपने आकार को बाहर आरोपित भी करे । और भी बात है । अगर ये नीलादि वस्तुएँ विज्ञान के ही आकार हों तो फिर जिस पुरुष के विज्ञान के ये आकार होंगे केवल उसी पुरुष से गृहीत हो सकेंगे, दूसरे पुरुषों से नहीं, किन्तु एक ही वस्तु अनेक पुरुषों से गृहीत होती है, क्योंकि एक For Private And Personal
पृष्ठ 388
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra प्रकरणम् ] ज्ञानाकारः । Iø www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir भाषानुवादसहितम् ३१२ न्यायकन्दली आमोदकता ये ये चोपार्जितमोदकाः । रसवीर्यविपाकादि तेषां तुल्यं प्रसज्यते ॥ इति । For Private And Personal युगपत्प्रवृत्तेः, यस्त्वया दृष्टः स मयापीति प्रतिसन्धानात् । तस्मादर्थोऽयं न ये तु ज्ञानाकारमप्यपहृवाना अलीका एव नीलादयः प्रतिभासन्ते इत्याहुः, तेषां कारणनियमादुत्पत्तिनियमोऽर्थ क्रियानियमश्च न प्राप्नोति, अर्थाभावेन किञ्चित् कस्यचित् कारणम्, सर्वं वा सर्वस्य, नार्थक्रियासंवादो न वा विसंवादो विशेषाभावात् । यथोक्तं गुरुभिः-वासनाविशेषात् तद्विशेषसिद्धिरिति चेत्? सा यदि बाह्यार्थक्रियाविशेष-हेतुः? संज्ञाभेदमात्रम्, अर्थो वासनेति । अथ ज्ञानात्मिका? अर्थाभावे तस्या विशेष निर्निबन्धनो बोधमात्रस्योपादानस्य सर्वत्राविशेषात् बोधाकारस्य व्यति-रिक्तस्य च विशेषस्याभ्युपगमेऽर्थ सद्भावाभ्युपगमप्रसङ्गादित्युक्तम् । न चास्मिन् पक्ष नीलादिप्रत्ययस्य कादाचित्कत्वं स्यात्, तज्जननसमर्थक्षणसन्तानस्य सर्वदा -नुवृत्तेः, अननुवृत्तौ वा कालान्तरेऽपि तत्प्रत्ययानुपपत्तिः स्वव्यतिरिक्तस्यापेक्षणी ही वस्तु की ओर एक हो समय अनेक व्यक्ति प्रवृत्त दीख पड़ते हैं । एवं इस प्रकार की प्रतीति भी होती है कि ' जिसको मैंने देखा था उसी को तुमने भी देखा है ' अतः नीलादि ( कोई भी ) बाह्य वस्तु ज्ञान रूप नहीं है । जो कोई ( माध्यमिक ) विज्ञान के इस आकार का भी अपलाप करते हुए ' अलीक ' ( शून्य ) वस्तु को ही नीलादिबुद्धि का विषय मानते हैं, उनके मत से कारण के नियम से ( कपालादि कारण समूह से घट की ही उत्पत्ति हो पटादि की नहीं ) कार्य ( इस ) नियम की उपपत्ति नहीं होगी । एवं अर्थ - क्रिया ( प्रवृत्ति ) का नियम भी अनुपपन्न हो जाएगा, क्योंकि अर्थक्रिया की सत्ता ही नहीं है । अतः यही कहना पड़ेगा कि किसी का कोई कारण नहीं है या सभी वस्तुएं सभी वस्तुओं के कारण हैं । एवं अर्थक्रिया की सफलता भी नहीं होगी विफलता भी नहीं होगी, क्योंकि दोनों में कोई अन्तर नहीं है । जैसा कि गुरुओं ने कहा है कि ( अगर शून्यता ही तत्त्व हो तो ) मन के लड्डू खाने से तृप्त पुरुष के एवं यथार्थ मोदक का उपार्जन कर उसे खानेवाले पुरुष के रस, वीर्य और विपाकादि सभी समान ही होने चाहिए । ( प्र ० ) वासना के विशेष से दोनों में जो विशेष है, उससे उन दोनों पुरुषों के रस वीर्यादि के अन्तर की उपपत्ति होगी । ( उ ० ) वासना अगर प्रयोजन विशेष के सम्पादन में समर्थ है? तो फिर नाम का ही अन्तर रह जाता है कि हम उसे अर्थ कहते हैं और आप वासना कहते हैं । अगर वह भी ज्ञान स्वरूप ही है तो अर्थों के न रहने के कारण उसमें वैशिष्ट्य असम्भव है, क्योंकि बोधरूप कारण सभी जगह समान है । पहिले कहा जा चुका है कि बोधाकार से भिन्न किसी विशेष को प्रयोजक मानना वस्तुतः बाह्य वस्तुओं
पृष्ठ 389
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ३१४ परिमाणं न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् मानव्यवहारकारणम् [ गुणे परिमाण-तच्चतुर्विधम् - अणु महद् दीर्घं ह्रस्वं चेति । तत्र महद् द्विविधम् - नित्यमनित्यं च । नित्यमा-मान ( तौल और नाप ) के व्यवहार का असाधारण कारण ही ' परिमाण ' है । वह अणु, महत्, दीर्घ और ह्रस्व भेद से चार प्रकार का है । न्यायकन्दली यस्याभावात् । कारणपरिपाकस्य कादाचित्कत्वात् तत्कार्यस्य कादाचित्कत्वमिति चेत्? कारणस्य परिपाकः कार्यः, कार्यजननं प्रत्याभिमुख्यम्, सोऽपि स्वसंवेदन-मात्राधीनो न कादाचित्को भवितुमर्हति । अस्ति चायं कादाचित्कः प्रत्यक्षप्रतिभासः, स एव प्रतीतिविषयं देशकालकारणस्वभावनियतं बाह्यं वस्तु व्यवस्थापयंस्तदभावसाधनं बाधत इति कालात्ययापदिष्टत्वमपि हेतुनामि-त्युरम्यते । समधिगता संख्या । सम्प्रति परिमाणनिरूपणार्थमाह- परिमाणं मानव्यवहारकारण-मिति । मानव्यवहारोऽणु महद् दीर्घं ह्रस्वमित्यादिज्ञानं शब्दश्व, तस्य कारणं परिमाणमित्यनेन प्रत्यक्षसिद्धस्यापि परिमाणस्य विप्रतिपन्नं प्रति कार्येण सत्तां दर्शयति । यथा तावज्ज्ञानस्य ज्ञेयप्रसाधकत्वं तथोक्तम् । को ही मानना है । एवं इस पक्ष में नीलादि प्रतीतियों का कादाचित्कत्व ( कभी होना कभी न होना ) को उपपत्ति भी ठीक नहीं बैठती है, क्योंकि नीलादि विज्ञान के प्रयोजक क्षणसन्तान की सत्ता तो बराबर है ही । अगर सदा उसकी अनुवृत्ति नहीं रहती है तो फिर आगे नीलादि की प्रतीतियाँ नहीं होंगी । ( प्र ० ) ( यद्यपि ) कार्य को अपने भिन्न किसी की अपेक्षा नहीं है फिर भी कारण का परिपाक कदाचित् ही होता है, अतः कार्य भी कभी होता है कभी नहीं । ( उ ० ) कार्य के प्रति उन्मुख होना हो कारणों का परिपाक है, वह भी स्वसंवेदन रूप विज्ञान से भिन्न कुछ भी नहीं है, अतः उसका भी कादाचित्कत्व उचित नहीं है । किन्तु कार्यों का कादाचित्कत्व प्रत्यक्ष से सिद्ध है । यह प्रत्यक्ष ज्ञान देश, काल और स्वभाव से नियत अपने बाह्य विषय का स्थापन करते हुए उसके अभाव के साधक को भी बाधित करता है । इस प्रकार बाह्य अर्थ को सत्ता का लोप करनेवाले ये सभी हेतु कालात्ययापदिष्ट हैं । ( इस प्रकार ) संख्या को अच्छी तरह समझा । ' परिमाणं मानव्यवहारकारणम् ' इत्यादि पक्ति से अब परिमाण का निरूपण करते हैं । अणु, महत्, दीर्घ, ह्रस्व इन सबों के ज्ञान एवं इन सबों के प्रतिपादक शब्दों के प्रयोग ये दोनों ही प्रकृत ' मानव्यवहार ' शब्द से अभिप्रेत हैं । प्रत्यक्ष के द्वारा सिद्ध परिमाण को जो नहीं मानना चाहते, उन्हें ( परिमाण के उक्त व्यवहार रूप ) कार्य लिङ्गक अनुमान की सूचना ' तस्य परिमाणम् ' इत्यादि से देते हैं । जिस प्रकार ज्ञान अपने ज्ञेय अर्थ का सोधक है उसे ( संख्याप्रकरण में ) दिखला चुके हैं । For Private And Personal
पृष्ठ 390
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भावानुवादसहितम् न्यायकन्दली शब्दस्य तु कथम्? न सावर्थात्मा, ३१५ अन्नाग्न्यसिशब्दोच्चारणे भुखस्य पूरणदाहपाटनप्रसङ्गात् । नाप्यर्थजः, कौष्ठयवायुकण्ठाद्यभिघात-जत्वात् अतदात्मनोऽतदुत्पन्नस्य प्रतिपादकत्वे चातिप्रसङ्गात् । तदयुक्तम्, यदि कण्ठाद्यभिघातमात्रज एव शब्दो न वक्तुविवक्षामपि प्रतिपादयेत् तदुत्पत्त्यभावात् । तथा च वक्तुविवक्षामपि न सूचयेयुः शब्द इति प्रमत्तगीतं स्यात् । पारम्पर्येण विवक्षापूर्वकत्वाच्छन्दस्य विवक्षा-प्रतिपादकत्वमिति चेत्? एवमर्थानुभवप्रतिपादकत्वमपि विवक्षाया अर्थानुभव-पूर्वकत्वात् । असत्यप्यर्थानुभवे विप्रलम्भकस्य तदर्थविवक्षाप्रतीतिरिति चेत्? असत्यामपि तदर्थविवक्षायां भ्रान्तस्य तदर्थविषयं वाक्यमुपलब्धम् । यथाहु राचार्या: --' भ्रान्तस्यान्यविवक्षायामन्यद् वाक्यं हि दृश्यते । ' इति । नान्यविवक्षातोऽन्याभिधानसम्भवः, अन्वयव्यतिरेकाभ्यां यद् यस्य कारणमव-गतं तस्य तद्वयभिचारे विश्वस्याकस्मिकत्वप्रसङ्गात्, अतो भ्रान्तस्याप्रतीयमानापि ( प्र ० ) किन्तु ' शब्द ' अपने बोध्य अर्थ का साधक किस तरह से है? शब्द स्वयं अर्थ स्वरूप नहीं है, अगर ऐसी बात हो तो अन्य शब्द के उच्चारण से ही पेट भर जाय, ' अग्नि ' शब्द के उच्चारण से मुँह जल जाय, एवं असि ( तलवार ) शब्द के उच्चारण से मुँह कट जाय । अर्थ से शब्द की उत्पत्ति भी नहीं होती है, क्योंकि कोष्ठसम्बन्धी वायु के कण्ठादि देशों के साथ अभिघात से शब्द की उत्पत्ति होती है । शब्द से भिन्न होने पर भी एवं शब्द का कारण न होने पर भी अगर शब्द से अर्थ का प्रतिपादन माना जाय तो अतिप्रसङ्ग होगा । ( उ ० ) किन्तु यह ठीक नहीं है, क्योंकि अगर शब्द की उत्पत्ति कण्ठादि के अभिघात से ही हो ( विवक्षा वक्ता के अर्थ प्रतिपादन की इच्छा से नहीं ) तो फिर शब्द विवक्षा का भी ज्ञापक नहीं होगा, क्योंकि विवक्षा सूचना भी शब्दों से नहीं होगी तो से उसकी उत्पत्ति नहीं होती है । अगर विवक्षा की फिर शब्दों का प्रयोग केवल पागल का प्रलाप ही होगा । ( प्र ० ) ( विवक्षा साक्षात् शब्द का उत्पादक न होने पर भी ) परम्परा से शब्द का उत्पादक है, अतः शब्द विवक्षा का ज्ञापक है | ( उ ० ) इस प्रकार तो शब्द अर्थानुभव का भी सूचक है ही, क्योंकि विवक्षा अर्थानुभव से ही उत्पन्न होती है । ( प्र ० ) अर्थ का अनुभव न रहने पर भी में अर्थ की विवक्षा देखी जाती है । ( उ ० ) विवक्षा के न रहने पर भी वक पुरुष भ्रान्त व्यक्ति के द्वारा उस अर्थ के बोधक शब्द का प्रयोग भी तो देखा जाता है । जैसा कि आचार्यों ने कहा है कि ' भ्रान्तपुरुष कहना कुछ चाहता है, किन्तु कहता कुछ और ही है ' ( प्र ० ) एक की विवक्षा से दूसरा पुरुष शब्द का प्रयोग नहीं कर सकता, क्योंकि अन्वय और व्यतिरेक से जिसमें कारणता निश्चित है, उसके रहते हुए भी अगर कार्य की उत्पत्ति कभी न भी हो तो फिर संसार की सभी रचनाएँ अनियमित हो जाएँगी । For Private And Personal