प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 861–869
प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 861–869
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ७८६ न्यायकन्दली संचलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम्
योगाचारविभूत्या यस्तोषयित्वा महेश्वरम् ।
चक्रे वैशेषिकं शास्त्रं तस्मै कणभुजे नमः ॥
इति प्रशस्तपादविरचितं द्रव्यादिषट-पदार्थभाष्यं समाप्तम् ॥
[ समवायनिरूपण-योग के अभ्यास से उत्पन्न अपनी विभूति के द्वारा उन्होंने महेश्वर को प्रसन्न कर वैशेषिकशास्त्र का निर्माण किया, उन कणाद ऋषि को मैं प्रणाम करता हूँ । प्रशस्तपाद के द्वारा रचित छः पदार्थों के प्रतिपादक वैशेषिक सूत्रों का यह भाष्य समाप्त हुआ । न्यायकन्दली यदि समवायविषयमैन्द्रियकं संवेदनमस्ति? सम्बन्धाभावाभिधानं प्रलापः । अथ नास्ति, तदेव वाच्यमित्यत्राह - स्वात्मगत संवेदनाभावाच्चेति । यथेन्द्रियेण संयोगप्रतिभासो नैवं समवायप्रतिभासः, सम्बन्धिनो: पिण्डी भावोपलम्भात्, अतोऽयमप्रत्यक्षः । उपसंहरति-- तस्मादिति ।
परस्परोपसंश्लेषो भिन्नानां यत्कृतो भवेत् ।
समवायः स विज्ञेयः स्वातन्त्र्यप्रतिरोधकः ॥
श्रीधरकृतायां पदार्थप्रवेशन्यायकन्दलीटीकायां समवायपदार्थः समाप्तः ॥ ज्ञान होता है? तो फिर यह कहना प्रलाप सा ही है कि अपने सम्बन्धियों के साथ उसका ( प्रत्यक्ष के उपयुक्त ) सम्बन्ध नहीं है । यदि इन्द्रियों से उसका ज्ञान नहीं होता है, तो फिर यही कहिए कि समवाय अतीन्द्रिय है । इसी प्रश्न के उत्तर में ' स्वात्मगत संवेदना भावाच्च ' यह वाक्य लिखा गया है । अर्थात् जिस प्रकार इन्द्रियों से संयोग का ग्रहण होता है, उस प्रकार इन्द्रियों से समवाय का ग्रहण नहीं होता है, क्योंकि उसके दोनों सम्बन्धियों की उपलब्धि ऐक्यबद्ध होकर ही होती है ( अर्थात् सम्बन्धियों में समवाय की सत्त्व दशा में सम्बन्धियों की पृथक् से उपलब्धि नहीं होती है, किन्तु सम्बन्ध के प्रत्यक्ष के लिए उसके दोनों सम्बन्धियों का स्वतन्त्र रूप से प्रत्यक्ष होना आवश्यक है, सो प्रकृत में नहीं होता है ), अतः समवाय अतीन्द्रिय है । ' तस्मात् ' इत्यादि से इसी प्रसङ्ग का उपसंहार किया गया है । अपने सम्बन्धियों के स्वातन्त्र्य को अपहरण करनेवाला वही सम्बन्ध ' समवाय ' कहलाता है, जिससे परस्पर भिन्न दो वस्तुओं का परस्पर अति नैकट्य का सम्पादन हो । भट्ट श्री श्रीधर के द्वारा रचित और पदार्थ को समझानेवाली न्यायकन्दली टीका का समवाय निरूपण समाप्त हुआ । 10+ For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली
सुवर्णमयसंस्थानरम्या सर्वोत्तरस्थितिः ।
सुमेरोः शृङ्गवीथीव टीकेयं न्यायकन्दली ॥ १ ॥
अक्षीणनिजपक्षेषु ख्यापयन्ती गुणानसौ ।
परप्रसिद्ध सिद्धान्तान् दलति न्यायकन्दली ॥ २ ॥
आसीद् दक्षिणराढायां द्विजानां भूरिकर्मणाम् ।
भूरिसृष्टिरिति ग्रामो भूरिश्रेष्ठिजनाश्रयः ॥ ३ ॥
अम्भोराशेरिवेतस्माद् बभूव क्षितिचन्द्रमाः ।
जगदानन्दनाद् वन्द्यो बृहस्पतिरिव द्विजः ॥ ४ ॥
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तस्माद् विशुद्धगुणरत्नमहासमुद्रो विद्यालतासमवलम्बनभूरुहोऽभूत् ।
स्वच्छाशयो विविधकीत्तिनदी प्रवाहप्रस्पन्दनोत्तमबलो बलदेवनामा ॥ ५ ॥
तस्याभूद् भूरियशसो विशुद्धकुलसम्भवा ।
realhea गुणा गुणिनो गृहमेधिनी ॥ ६ ॥
( १ ) यह ' न्याय कन्दली ' टीका सुमेरु के शृङ्गों की पङ्क्तियों की तरह मनोरम है, क्योंकि सुमेरु के शृङ्ग भी सुवर्ण ( हिरण्य ) के संस्थानों से णीय हैं । यह टीका भी सुवर्णों अर्थात् सुन्दर अक्षरों के रचित होने के कारण रम-विन्यास से रचित होने के कारण अति रमणीय है । सुमेरु का शृङ्ग भी सभी वस्तुओं की अपेक्षा उत्तर दिशा में रहने के कारण ' सर्वोत्तर स्थिति ' है । यह टीका भी ( प्रशस्तपाद भाष्य की ) अन्य टीकाओं से उत्कृष्ट होने के कारण ' सर्वोत्तरस्थिति ' अर्थात् सर्वातिशायिनी है । ( २ ) इस टीका का नाम ' न्यायकन्दली ' इस लिए है कि इसमें कथित न्याय अपने सिद्धान्तों की पूर्ण रक्षा और विरोधी सिद्धान्तों का सम्यक् रूप से ' दलन ' करते हैं । ( ३ ) राढ़ देश के दक्षिण भाग में ' भूरिसृष्टि ' नाम का एक गाँव था, जिसमें अनेक सत्कर्मों के अनुष्ठान करनेवाले ब्राह्मणों का एवं अनेक सेठों का निवास था । ( ४ ) इसी गाँव में पृथ्वीतल के चन्द्रमा स्वरूप एवं बृहस्पति के समान ( बुद्धि-मानू ) एक द्विज उत्पन्न हुए जो समुद्र से उत्पन्न आकाश के चन्द्रमा की तरह विश्व के सभी प्राणियों को सुख देने के कारण सभी के वन्दनीय थे । यशों की नदी के सतत गतिशील प्रवाह से अन्वर्थ नाम के निर्मल अन्तःकरणवाले आश्रयीभूत वृक्ष के समान एवं विशुद्ध ( ५ ) उन्हीं से अनेक प्रकार के प्राप्त उत्कृष्ट बल से युक्त ( होने के कारण ) ' बलदेव ' उत्पन्न हुए, जो विद्या रूपी लता के अनेक सद्गुण रूपी रत्नों के ( आकर ) महासमुद्र के समान थे । ( ६ ) अत्यन्त यशस्वी और गुणी उन्हीं ( बलदेव ) की अत्यन्त कुलीना, गुणानु-रागिणी एवं गृहकार्यदक्षा ' अब्बोका ' नाम की पत्नी थीं । For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली
सच्छायः स्थूलफलदो बहुशाखो द्विजाश्रयः ।
तस्यां श्रीधर इत्युच्चैरथिकल्पद्रुमोऽभवत् ॥ ७ ॥
असौ विद्याविदग्धानामसूत श्रवणोचिताम् ।
षट्पदार्थहितामेतां रुचिरां न्यायकन्दलीम् ॥ ८ ॥
त्र्यधिकदशोत्तरनवशतशाकाब्दे न्यायकन्दली रचिता श्री पाण्डुदायाचितभट्ट श्रीश्रीधरेणेयम् ॥ ६ ॥
समाप्तेयं पदार्थप्रवेशन्याय कन्दली टीका ।
समाप्तोऽयं ग्रन्थः ॥
[ उपसंहारः ( ७ ) उन्हीं से ' श्रीधर ' उत्पन्न हुए जो ( इन सादृश्यों के कारण ) अर्थियों के लिए कल्पवृक्ष के समान थे । क्योंकि कल्पवृक्ष भी अपनी घनी छाया से अर्थियों के ताप को दूर करता है । इनसे भी अर्थियों के अनेक विघ्न ताप दूर होते थे । कल्पवृक्ष भी बहुत बड़े फल का दाता है, इनसे भी मोक्ष रूप महान् ( उपदेशादि के द्वारा ) फल प्राप्त होता था । कल्पवृक्ष की भी अनेक शाखायें हैं । उनके भी शिष्य प्रशिष्य की अनेक शाखायें थीं । कल्पवृक्ष भी अनेक द्विजों ( पक्षियों ) का आश्रय है, ये भी अनेक द्विजातियों के आश्रय थे । ( ८ ) उन्हीं के द्वारा तत्त्वज्ञान को उत्पन्न करनेवाली और विद्याप्रेमियों के सुनने योग्य यह अतिरमणीय ' न्यायकन्दली ' टीका रची गयी । ( 8 ) श्री पाण्डुदास कायस्थ की प्रार्थना ( से प्रेरित होकर ) भट्ट श्री श्रीधर ने ६ ९ ३ शकाब्द में ' न्यायकन्दली ' की रचना की । षट् पदार्थों के तत्वज्ञान को उत्पन्न करनेवाली न्यायकन्दली टीका समाप्त हुई || For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Ka न्यायकन्दलीसमुद्धृतप्रमाणवचनानाम् अक्षरानुक्रमणी पृष्ठसंख्या अक्षीण निजपक्षेषु ७८७ अग्निहोत्रं त्रयो वेदाः ( टिप्पण्याम् ) ५११ एवं तत्त्वाभ्यासान्नास्मि कर्मणा सत्त्वसंशुद्धिः अत एव च विद्वत्सु २१३ कर्मणां प्रागभावो यः अनयोः संप्रतिबद्धाः ६७६ कर्मेति परमं तत्त्वं अनादिनिधनं १ कार्यकारणभावाद्वा अनाश्वासो ज्ञायमाने ५२५ कार्यान्तरेऽपि सामथ्यं अनित्यत्वं विनाशाख्यं ४६ | कुर्वन्नात्मस्वरूपज्ञो अन्तरालेतु यस्त ४७५ अब्बो केत्य चिगुणा ७८८७ अभावोऽपि प्रमाणाभावः ५५२ अभ्यास वैराग्याभ्यां ६७५ अम्भोराशेरिर्वतस्मात् ७८७ अर्थबुद्धिस्तदाकारा कोहि विप्रतिपन्नायाः गुणबद्धसिद्धान्तो चक्रे वैशेषिकं शास्त्र ( भाष्ये ) छायायाः काष्र्ण्यमित्येवं जगदङ्कुरबीजाय जगदानन्दनाद्वन्द्यो ३०४ अर्थापत्तिरियं त्वन्या ज्ञानस्याभेदिनो भेद ५३६ ज्ञानात्मने अर्थेन घटयश्येनां २१७ अविनाभावनियमो ज्ञानाद्वा ज्ञानहेतोर्वा ४६३ अविपर्ययाद्विशुद्ध ज्ञानं च विमलीकुर्वन् ६७५ असत्त्वान्नास्ति सम्बन्धः ज्ञापकत्वाद्धि सम्बन्धः ३४० असदकरणाद् ३४१ ततोऽपि विकल्पाद असम्बद्धस्य चोत्पत्तिम् ३४० तत्र गौरव वक्तव्यो असिद्धेन कदेशेन ५६ ९ तत्र यत् पूर्वविज्ञानं असौ विद्याविदग्धानां ७८८ तत्सिद्धिर्नान्यथेत्येतत् अस्या अभावे नैवेयं आत्मख्यातिरविप्लवा आत्मनि सति परसंज्ञा आधिक्येऽप्यविरुद्धत्वात् आशा मोदक तृप्ता ये आसीद् दक्षिण ढायां ७६५ | तद्गतैवाभ्युपगन्तव्या ६७४ तदभावे च नास्त्येव ( भाष्ये ) ६७६ | तदभावेऽपि तन्नेति ६०२ | तदुपस्थापनमात्रेण तयोश्च न परार्थत्वं ३१३ ७८७ तस्माद् दृष्टस्य भावस्य इतिकर्तव्यता साध्ये ४१६ तस्मात्प्रमेयाधिगतेः उत्पत्तिमन्ति चत्वारि १२१ तस्मान्नार्थेन विज्ञाने एकत्र प्रतिषिद्धत्वात् ३०० तस्माद्विशुद्धगुण एकधहेतुभावेन ७६१ तस्माद्वैधर्म्य दृष्टान्तो For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra ७६० तस्याभूद् भूरियशशो तस्यां यद्रूपमाभाति तस्यां श्रीधर इत्युच्चैः तानि बध्नन्त्यकुर्वन्तं तिष्ठति संस्कारवशात् तेन निवृत्त प्रसवां तेनासौ विद्यमानोऽपि तेनैषां प्रथमं तावत् शां कर्तृ परीक्षार्थं त्र्यधिकदशोत्तरनवशत दुरासन्न प्रदेशादि देहानुवर्तिनी छाया द्वय सत्त्वविरोधाच्च ध्यानकता नमनसे न च भासामभावस्य न चानर्थकत्वेन न चार्थेनार्थ एवायं नमः पञ्चत्वशून्य । य नमो ज्ञानामृतस्यन्दि नमो जलदनीलाय नहि तत्करणं लोके नहि स्वभावतः शब्दो नास्तीत्यपि न वक्तव्यं नित्य नैमित्तिकैरेव नियम्यत्वनियन्तृत्वे निर्मलज्ञानदेहाय निश्चिते न खलु स्थाणा पदार्थधर्मसंग्रहः परप्रसिद्धसिद्धान्तान् परस्परोपसंश्लेषो पूर्वविज्ञानविषयं प्रकृति पश्यति पुरुषः प्रणम्य हेतुमीश्वरं प्रतियोगिन्यदृष्टेऽपि प्रत्यक्षस्यापि पाराय www.kobatirth.org Acharya Shri Kail न्यायकन्दलीसमुद्धृतप्रमाणवचनानाम् अक्षरानुक्रमणी पृष्ठसंख्या प्रत्यवायो s स्य तेनैव ७८७ ४५६ प्रत्येकमनुवर्तन्ते ७८८ प्रपद्ये सत्यसंकल्पं प्रमाणपञ्चकं यत्र ६८४ प्रमाणान्तरसद्भावः ६८६ प्रमाणेत रसामान्य ६७६ फलाय विहितं कर्म ५१८ फलं तव जनयन्ति ५४० बुद्धिपौरुषहीनानां ( टिप्पण्याम् ) बुद्धेः प्रतिसंवेदी पुरुषः १२१ VEC ब्रह्माण्डलोके जीवानां २५ २५ | ब्राह्मणत्वानहं मानी ५८५ भवेद्विमुक्तिरभ्यासात् भागः कोऽन्यो न दृष्टः स्यात् १ भूरिसृष्टिरिति ग्रामो २५ भेदश्चाभ्रान्तिविज्ञाने ६८४ भ्रान्तस्यान्यविवक्षायां II मुक्ताहार इत्र स्वच्छो ७६५ ६६७ मूले तस्य ह्यनुपपन्ने यत्रासाधारणो धर्मः २२७ यदनुमेयेन सम्बद्ध ४१६ | यद्यपि स्मृतिहेतुत्वं ५१६ यानि काम्यानि कर्माणि ७६० यावच्चाव्यतिरेकित्वं ६८६ यावन्ती यादृशा ये च ६०५ ७७३ | युगकोटिसहस्र ेण ६ ९ ३ | योगाचारविभूत्या यः रसवीर्यविपाकादि १ लक्ष्मीकण्ठग्रहानन्द ७८७ ७८६ वचनस्य परार्थत्वाद् वचनस्य प्रतिज्ञात्वं ६२७ वर्णाः प्रज्ञातसामर्थ्याः ६७६ १ वस्तु प्रत्यभिधातव्यं वाक्यमेव तु वाक्यार्थ विकल्पो वस्तुनिर्भासात् ५३१ ५६४ For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir अक्षरानुक्रमणी ७ ९ १ पृष्ठ संख्या षण्णां समानदेशत्वात् ( टिप्पण्याम् ) १०६ विपक्षस्य कुतस्तावत् विपरीतमतो यत् स्यात् विपरीते प्रतीयेते ४१५ ४८० सच्छायः स्थूलफलदो ७८८८ ६०५ सज्ञेयो जाङ्गलो देशो ( टिप्पण्याम् ) ६३ विरुद्धासिद्धसन्दिग्ध ४८० समवायः स विज्ञेयः ७८६ विशुद्ध विविधन्याय २२६ सम्यग् ज्ञानाधिगमात् ६८६ विश्वस्य परमात्मानो ७४१ सविकल्पकविज्ञान ५४० वैपरीत्यपरिच्छेदे ५७१ | साध्याभिधानात् पक्षोक्तिः ५६६ व्यापकत्वगृहीतस्तु ६०२ सा बाह्यादन्यतो वेति ३०४ व्यावृत्तमिव निस्तत्त्वं ४५६ सामान्यवच्च सादृश्यं ५३१ शक्तस्य शक्य करणात् ३४१ सुवर्णमय संस्थान ७८७ शक्तस्य सूचकं हेतुः ५६६ सुमेरोः शृङ्गवीथीव ७८७ शक्तिः कार्यानुमेया हि ६६३ सेव्यतां द्रव्यजलधिः २२६ शब्दान्तराण्यबुद्ध्वा ५४० संज्ञा हि स्मर्यमाणापि III शब्दे कारणवर्णादि ५१६ संज्ञिनः सा तटस्था हि III शुद्धोऽपि पुरुषः प्रत्ययं ४१२ संस्काराः खलु यद्वस्तु ६५६ श्री पाण्डुदासयाचित ७८८ स्वकाले यदकुर्वस्तत् ६८४ षट्केन युगपद्योगात् ( टिप्पण्याम् ) १०६ स्वच्छाशयो विविधकीत्ति ७८८७ पदार्थ हितामेतां ७८८ | स्वल्पोदकतृणो ( टिप्पण्या ) १३ For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir न्यायकन्दल्यामुद्धृतानां ग्रन्थानां ग्रन्थकाराणां च अक्षरानुक्रमणी पृष्ठसंख्या पृष्ठसंख्या अक्षपादः ६८२ ब्रह्मसिद्धिः ५२५ अत्रके वदन्ति ७४८ भट्टमिश्रा: ५८५ अपरे ६४१ भावनाविवेकः ५२५ आचार्याः ३१५ मण्डन मिश्र: १६-५२५-६२३-६५६ उद्योतकरः ७१ मीमांसागुरुभिः ५३१ कापिलाः ६७५-६८६ यथाह तत्र भवान् ७६२ कापिले: ६७६ यथाहुराचार्याः ५६८ कारिकायाम् ६२७ यथोपदिशन्ति गुरवः ६०२ गुरुभिः ३१३ यथोपदिशन्ति सन्तः ५६६-६५४ तत्त्वप्रबोधः १६७ वार्तिकम् ५५२-६२३ तत्त्वसंवादिनी १६७ वार्त्तिककारमिश्राः २१३-४१५ तथागताः ५६६ विधिविवेकः तटीकायाम् ६६३ ६२७ धर्मोत्तरः विभ्रमविवेकः १८४ ६२३ व्यायभाष्यम् ५६७-६१० शाक्यादीनाम् ५७४ शबरस्वामिशिष्याः न्यायभाष्यकार: ६७३ ५३१ न्यायवादिभिः ६५७ शाबरभाष्यम्? ५३१ न्यायवार्तिककारः ५४६-५८६-६३५ सौगताः ४४८-७५६ पतञ्जलिः १४२-४११-६७५-६८२ सौगतैः ६२३-६७६ परैः ६८६ सर्वोत्तरबुद्धयो गुरवः ६२७ बार्हस्पत्याः ५१० स्फोटसिद्धिः ६५६ For Private And Personal
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adhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir अभिनव प्रकाशनानि सम्पूर्णानन्दसंस्कृत विश्वविद्यालयस्य क्रम सं ० ग्रन्थनाम १. शुक्लयजुर्वेदकाण्वसंहिता [ उत्तरविशतिः ] संहितेयं सायणभाष्य-२. वाक्यपदीयम् मूल्यम् सहिता प्रकाशिता विविधैः खलु गवेषणा-प्रधानैः भूमिका - टिप्पणपरिशिष्टेः समलङ्कृता २६-२५ [ वृत्तिसमुद्देशात्मकम् ] ग्रन्थरत्नमिदं हेलाराज-प्रणीतया प्रकाशव्याख्यया तथा च प ० रघुनाथशर्मविरचितया अम्बाकर्त्रीटीकया विभूषितम् ३. वैयाकरणसिद्धान्तमञ्जूषा [ नागेशभट्टविरचिता ] ग्रन्थोऽयं सर्वतः ६५-५० प्रथमं सम्पादककृतविविधैः सारभूतैः टिप्पण-भूमिका परिशिष्टैः समलङ्कृत्य प्रकाशितः ३६-०० ४. प्रक्रिया कौमुदी [ भागद्वयात्मिका ] रामचन्द्राचार्यप्रणीतेयं प्रक्रियाकौमुदी सर्वतः प्रथमं शेषश्रीकृष्णपण्डित-प्रणीतया प्रकाशव्याख्यया विभूष्य प्रकाशिता । तृतीयो भागोऽप्यचिरादेव प्राकाश्यमेष्यति । ५. सरलत्रिकोणमितिः ६. प्रशस्तपादभाष्यम् ७. रसगङ्गाधरः प्रथमभागस्य ५२-०० द्वितीयभागस्य ६७-०० [ ज्यौतिषम् ] म ० म ० श्रीबापूदेवशास्त्रि-विरचितोऽयं ग्रन्थो गवेषणापूर्णैः उपोद्घात-परिशिष्टैः सम्भूष्य प्रकाशितः २६-०० [ प्रशस्तपादाचार्यप्रणीतम् ] न्यायदर्शनस्य प्राणभूतमिदं ग्रन्थरत्नं श्रीधरभट्टकृतन्याय-कन्दलीव्याख्यया, श्रीदुर्गाघरझाकृतहिन्दी-भाषानुवादेन च समलङ्कृतं पुनः प्रकाशितम् ६८-०० [ पण्डितराजजगन्नाथविरचितः ] साहित्य-शास्त्रग्रन्थोऽयं प ० केदारनाथ ओझा - प्रणीतया रसचन्द्रिकाख्यया व्याख्यया विभूष्य प्रकाशितः । द्वितीय भागोऽपि किलाचिरादेव प्राकाश्यमेष्यति ८. नानक चन्द्रोदयमहाकाव्यम् [ श्रीदेवराजशर्मविरचितम् ] गुरुनानक-६. रसिकजीवनम् २२-०० चरितमुपजीव्यत्वेनाङ्गीकृत्य प्रतिभावता देवराजशर्मणा महाकविना विरचितमिदं महाकाव्यं कामं संस्कृतवाङ्मयस्य श्रियं समेत ७४-६० [ पण्डितश्रीरामानन्दपतित्रिपाठिविरचितम् ] नायिकाभेदनिरूपणपरमिदं काव्यं सर्वतः प्रथमं विस्तृतगवेषणात्मिक या प्रस्तावनया समलङ्कृत्य प्रकाशितम् प्रकाशकः - निदेशकः, अनुसन्धानसंस्थानम्, सम्पूर्णानन्दसंस्कृत विश्वविद्यालयः, वाराणसी -२२१००२. For Private And Personal