प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 851–860

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 851–860

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ७७६ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् कर्मादिनिमित्तासम्भवात् कर्तव्ययोरेव भावादिति । प्रशस्तपादभाष्यम् विभागान्तत्वादर्शनात्, [ समवायनिरूपण -अधिकरणाधि भाववल्लक्षणभेदात् । स्वाधारेषु आत्मानुरूपप्रत्यय-स ' च द्रव्यादिभ्यः पदार्थान्तरं यथा भावस्य द्रव्यत्वादीनां कारण नहीं हो सकते । एवं विभाग से इस सम्बन्ध का नाश भी नहीं देखा जाता एवं यह ( समवाय ) अधिकरण एवं आधेय रूप दो वस्तुओं में ही देखा जाता है, ( अतः उन प्रतीतियों की उपपत्ति संयोग से नहीं हो सकती ) । यह ( समवाय ) द्रव्यादि पाँचों पदार्थों से ( सर्वथा भिन्न ) स्वतन्त्र पदार्थ ही क्योंकि जिस प्रकार सत्ता रूप सामान्य या द्रव्यत्वादि रूप सामान्य स्वसदृश ( यह सद् है, यह द्रव्य है, यह गुण है ) इत्यादि प्रतीतियों के उत्पादक होने के कारण द्रव्यादि अपने आश्रयों से भिन्न हैं, उसी प्रकार न्यायकन्दली सिद्धत्वादिति । संयोगो हि युतसिद्धानामेव भवति । अयं त्वयुतसि-द्वानामिति । तथा संयोगोऽन्यतरकर्मज उभयकर्मजः संयोगजो वा स्यादिति । इह तु अन्यतरकर्मादीनां निमित्तानामभावो भावोत्पादककारणसामर्थ्य भावि-त्वात् । संयोगस्य विभागान्तत्वं विभागविनाश्यत्वं दृश्यते न समवायस्य । संयोगः स्वतन्त्रयोरपि भवति, ययोर्ध्वावस्थितयोरगुल्योः । अयं त्वधिकर-नाधिकर्तव्योरेव भवति, तस्मान्नायं संयोगः, किन्तु तस्मात् पृथगेव । एवं स्थिते समवाये तस्य द्रव्यादिभ्यो भेदं प्रतिपादयति -- स च द्रव्यादिभ्यः पदार्थान्तरमिति । कुत इत्यत आह- भाववल्लक्षणभेदादिति । के कर्म से होगा, अथवा संयोग से ही होगा । तन्तु एवं पट के इस सम्बन्ध के लिए कथित अन्यतर कर्म प्रभृति कारणों में से किसी की भी अपेक्षा नहीं होती है । यह तो अपने श्रीभूत पदार्थों के उत्पादक कारणों की सत्ता से स्थिति को लाभ करता है । संयोग का अन्त अर्थात् विनाश विभाग से देखा जाता है, किन्तु समवाय विनाश का ही नहीं होता, ( अतः संयोग से समवाय गतार्थ नहीं हो सकता ) एवं संयोग स्वतन्त्र ( आधा राधेयभावानापन्न ) वस्तुओं में भी होता है, जैसे कि ऊपर उठी हुई दो अङ्गलियों में संयोग होता है । समवाय सम्बन्ध आधार और आधेयभूत दो वस्तुओं में ही होता है । तस्मात् समवाय संयोग नहीं हैं, उससे अलग ही वस्तु है । इस प्रकार संयोग से समवाय की स्वतन्त्र सत्ता के सिद्ध हो जाने पर ' स द्रव्यादिभ्यः पदार्थान्तरम् ' इस वाक्य के द्वारा समवाय में द्रव्यादि पदार्थों के भेद का उपपादन करते हैं । समवाय द्रव्यादि - पदार्थों से भिन्न क्यों है? इस For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra प्रकरणम् ] ६५ www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir भाषानुवादसहितम् ७७७ प्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली For Private And Personal कर्तृत्वात् स्वाथयादिभ्यः परस्परतश्चार्थान्तरभावः, तथा समवाय-स्यापि पञ्चसु पदार्थेष्विहेति प्रत्ययदर्शनात् तेभ्यः पदार्थान्तरत्व-मिति । न च संयोगवन्नानात्वम्, भाववल्लिङ्गाविशेषाद् विशेष-लिङ्गाभावाच्च । तस्माद् भाववत् सर्वत्रैकः समवाय इति । समवाय के अनुयोगी द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य और विशेष इन पाँचों पदार्थों में यथासम्भव ' यह यहाँ है ' इस आकार की प्रतीतियाँ होती हैं, अतः समवाय भी द्रव्यादि पाँचों पदार्थो से भिन्न स्वतन्त्र पदार्थ ही है । संयोग की तरह यह ( समवाय ) अनेक भी नहीं है, क्योंकि जिस प्रकार द्रव्य, गुण और कर्म सभी में ' यह सत् है यह सत् है ' इस साधारण आकार की प्रतीति होती है और इसी कारण द्रव्य गुण और कर्म इन तीनों में रहनेवाला ' सत्ता ' नाम का सामान्य एक ही है, उसी प्रकार द्रव्यादि अपने अनुयोगियों में अपने प्रतियोगियों का ' यह यहाँ है ' इस एक प्रकार की एतद् विवृणोति - यथेति । भाव इति सत्तासामान्यमुच्यते । द्रव्यत्वादीत्या-दिपदेन गुणत्वादिपरिग्रहः । यथा भावस्य स्वाधारेषु द्रव्यगुणकर्मसु आत्मानु-रूपः प्रत्ययः सत्सदितिप्रत्ययः, द्रव्यत्वस्य स्वाश्रयेषु द्रव्येष्वात्मानुरूपः प्रत्ययः द्रव्यं द्रव्यमितिप्रत्ययः, गुणत्वस्य स्वाश्रयेषु गुणेष्वात्मानुरूपः प्रत्ययो गुण इति प्रत्ययः कर्मत्वस्य स्वाश्रयेषु कर्मसु आत्मानुरूपः प्रत्ययः कर्मेति-प्रश्न का उत्तर ' भाववल्लक्षणभेदात् ' इस सन्दर्भ के द्वारा दिया गया है । इस सन्दर्भ के ' भावस्य ' इस पद का ' भाव ' शब्द सत्ता रूप जाति का बोधक है । एवं ' द्रव्यत्वादि ' पद में प्रयुक्त ' आदि ' शब्द से गुणत्वादिजातियों का संग्रह समझना चाहिए | ( तदनुसार उक्त सन्दर्भ का यह अभिप्राय है कि ) सत्ता रूप जाति का स्वाधार में अर्थात् द्रव्य, गुण और कर्म इन तीनों में आत्मानुरूप प्रत्यय अर्थात् द्रव्य सत् है, गुण सत् है, कर्म सत् है इत्यादि आकार के ज्ञान होते हैं, एवं द्रव्यत्व का अपने आश्रय में अर्थात् सभी द्रव्यों में ' इदं द्रव्यम् ' इस आकार की प्रतीति होती है, एवं गुणत्व जाति की ' आत्मानुरूप ' प्रतीति अर्थात् सभी गुणों में ' यह गुण है ' इस आकार की प्रतीति होती है । एवं कर्मस्व जाति का अपने आश्रय सभी कर्मों में ' आत्मा-नुरूपप्रत्यय ' अर्थात् ' यह कर्म है ' इस आकार की प्रतीति होती है । इन आत्मानुरूप

पृष्ठ 853

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ७७८ ननु यद्येकः स्वकर्मत्वादिविशेषणैः न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ समवायनिरूपण-समवायः १ द्रव्यगुणकर्मणां द्रव्यत्वगुण-सह सम्बन्धैकत्वात् पदार्थसङ्करप्रसङ्ग प्रतीति ही है । एवं समवाय में का कारण होने से समवाय भी एक अवान्तर भेद का ज्ञापक कोई प्रमाण भी उपलब्ध नहीं होता है । अतः अपने सभी अनुयोगियों में रहनेवाला समवाय एक ही है । ( प्र ० ) ( यदि अपने सभी अनुयोगियों में रहनेवाला ) समवाय एक ही है, तो फिर द्रव्य गुण और कर्म इन तीनों में से प्रत्येक का द्रव्यत्वादि सभी विशेषों के साथ समवाय सम्बन्ध एक ही है, अतः द्रव्यादि में भी यह गुण हे या कर्म है इस प्रकार के अनियमित व्यवहार होने लगेंगे । न्यायकन्दली प्रत्ययः, तस्य कर्तृत्वाद् भावद्रव्यत्वादीनां स्वाश्रयादिभ्यः परस्परतश्चार्थान्तर-भाव:, तथा समवायस्यापि पञ्चसु पदार्थ ष्विहेति प्रत्ययदर्शनात् तेभ्यः पञ्चभ्यः पदार्थान्तरत्वम् । किमयमेक आहोस्विदनेक इत्यत्राह - न च संयोगवन्नानात्वमिति । यथा संयोगो नाना नैवं समवायः । कुत इत्यत्राह - भाववल्लिङ्गाविशेषाद् विशेषलिङ्गाभावाच्च । यथा सत्सदितिज्ञानस्य लक्षणस्य सर्वत्राविशेषादवल-क्षण्याद् विशेषे भेदे लक्षणस्य प्रमाणस्याभावाच्च सर्वत्रको भावः, तद्वदिति-प्रत्ययों का कर्त्ता रूप कारण होते से जिस प्रकार सत्ता और द्रव्यत्वादि जातियों में से प्रत्येक में परस्पर एक दूसरे से भेद की सिद्धि होती है, एवं उनके द्रव्यादि आश्रय से भी उन जातियो में भेद की प्रतीति होती है, उसी प्रकार समवाय भी द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य और विशेष इन पांच पदार्थों में ' इह प्रत्यय ' का कर्त्ता रूप कारण है, अतः समवाय इन पाँचों पदार्थों से भिन्न पदार्थ है । इस प्रकार से सिद्ध समवाय रूप स्वतन्त्र पदार्थ एक है? या अनेक? इसी प्रश्न का उत्तर ' न च संयोगवन्नानात्वम् ' इस वाक्य से दिया गया है । अर्थात् संयोग की तरह समवाय अनेक नहीं है । क्यों अनेक नहीं है? इस प्रश्न का उत्तर ' भाववल्लि -ङ्गा विशेषालिङ्गाभावाच्च ' इन दोनों वाक्यों से दिया गया है । अर्थात् द्रव्य, गुण और कर्म इन तीनों में ' सत् ' इस आकार का ज्ञान रूप लिङ्ग अर्थात् लक्षण समान रहने से जिस प्रकार तीनों में रहनेवाली रहनेवाली सत्ता जाति में समझते हैं कि सत्ता जाति एक ही सत्ता जाति की सिद्धि होती है । एवं उन तीनों में परस्पर भेद के साधक किसी प्रमाण के उपलब्ध न होने से सर्वत्र एक ही है । उसी प्रकार द्रव्यादि पाँचों पदार्थों में कथित ' इह प्रत्यय ' रूप लक्षण समान रूप से है एवं प्रत्येक में रहनेवाले समवाय में परस्पर भेद का साधक कोई प्रमाण भी उपलब्ध नहीं है । अतः समझते हैं कि अपने For Private And Personal

पृष्ठ 854

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् ७७६ इति । न, आधाराधेय नियमात् । यद्यप्येकः समवायः सर्वत्र स्वतन्त्रः, तथाप्याधाराधेय नियमोऽस्ति । कथं द्रव्येष्वेव द्रव्यत्वम्, गुणेष्वेव ( उ ० ) समवाय को एक मान लेने पर भी पदार्थों का उक्त साङ्कर्य नहीं होगा ( क्योंकि एक ही समवाय सम्बन्ध से ) कौन किसका आधार है और कौन किसका आधेय है? ये दोनों नियमित हैं । विशदार्थ यह है कि द्रव्यादि सभी अनुयोगियों में यद्यपि एक ही समवाय स्वतन्त्र रूप से है फिर भी इस सम्बन्ध से आधेय और आवार नियमित हैं । ( प्र ० ) सभी में न्यायकन्दली प्रत्ययस्य लक्षणस्य सवत्रावैलक्षण्याद् भेदे प्रमाणाभावाच्च सर्वत्रैकः समवाय इति । उपसंहरति- तस्मादिति । चोदयदि - यद्येक इति । समवायस्यैकत्वे य एव द्रव्यत्वस्य पृथिव्या-दिषु योगः, स एव गुणत्वस्य गुणेषु, कर्मत्वस्य च कर्मसु । तत्र यथा द्रव्यत्वस्य योगः पृथिव्यादिष्वस्तीति तेषां द्रव्यत्वम्, तथा तद्योगस्य गुणादिष्वपि सम्भवात् तेषामपि द्रव्यत्वम् । यथा च गुणत्वस्य योगो रूपादिष्वस्तीति रूपादीनां तथा, तद्योगस्य द्रव्यकर्मणोरपि भावात् तयोरपि गुणत्वं स्यात् । एवं च कर्मस्वपि पदार्थानां सङ्कीर्णता दर्शयितव्या । समाधत्ते - नेति । न च पदार्थानां सङ्कीर्णता, कुतः? आधाराधेयनियमात् । न समवायसद्भावमात्रेण द्रव्यत्वम्, सभी अनुयोगियों में रहनेवाला समवाय एक ही है । ' तस्मात् ' इत्यादि वाक्य के द्वारा इसी प्रसङ्ग का उपसंहार करते हैं । ' यद्येकः ' इत्यादि वाक्यों के द्वारा एक ही समवाय के मानने पर यह आक्षेप किया गया है कि यदि समवाय एक ही है तो यह मानना पड़ेगा कि पृथिवी प्रभृति द्रव्यों में द्रव्यत्व का जो समवाय है, वही समवाय गुणों में गुणत्व का भी है । एवं कर्मों में कर्मत्व का भी है । ऐसी स्थिति में जिस प्रकार पृथिव्यादि में द्रव्यत्व के समवाय रूप सम्बन्ध ( योग ) के कारण ( पृथिव्यादि में ) द्रव्यत्व की सत्ता रहती है, उसी प्रकार गुरगादि में भी द्रव्यत्व का समवाय रूप योग के कारण गुणादि में भी द्रव्यत्व की सत्ता माननी पड़ेगी । एवं जैसे कि रूपादि में गुणत्व के समवाय रूप योग के कारण गुणत्व की सत्ता रहती है उसी प्रकार द्रव्य में और कर्म में भी गुणत्व की सत्ता माननी पड़ेगी, क्योंकि उनमें भी गुणत्व का समवाय है । इसी प्रकार कर्मादि पदार्थों में भी द्रव्यत्व कर्मत्वादि का साङ्कर्य दिखलाया जा सकता है । ' न ' इत्यादि से इसी आक्षेप का समा-धान करते हैं । अर्थात् समवाय को एक मानने पर भी पदार्थों का उक्त साङ्कर्य दोष नहीं है, क्योंकि ( समवाय एक होने पर भी ) उसका आधाराधेयभाव नियमित है । For Private And Personal

पृष्ठ 855

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ७८० न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ समवायनिरूपण-गुणत्वम्, कर्मस्वेव कर्मत्वमिति । एवमादि कस्मात्? अन्वयव्यतिरेक-दर्शनात् । इहेति समवाय निमित्तस्य ज्ञानस्यान्वयदर्शनात् सर्वत्रैकः समवाय इति गम्यते । द्रव्यत्वादिनिमित्तानां व्यतिरेकदर्शनात् समवाय के एक होने पर नियम ( क्यों कर है? ) यतः द्रव्यों में ही द्रव्यत्व है ( गुणादि में नहीं ) गुणों में ही गुणत्व हे, एवं कर्मों में ही कर्मत्व है: ( प्र ० ) इस प्रकार का अवधारण किस हेतु से सिद्ध होता है? ( उ ० ) प्रतीतियों के अन्वय और व्यतिरेक से ही उसकी सिद्धि होती है । ( विशदार्थ यह है कि ) द्रव्यादि सभी अनुयोगियों में एक ही समवाय है ' इसका हेतु है सभी अनुयोगियों में ' यह यहाँ है ' इस एक प्रकार की आकार की प्रतीतियों की सत्ता या अन्वय, इस अन्वय से ही समझते हैं कि समवाय अपने सभी आश्रयों में एक ही है । एवं ' गुणादि में द्रव्यत्व है ' इस प्रकार की प्रतीतियों के अभाव रूप व्यतिरेक से भी समझते हैं कि द्रव्यत्वादि किन्तु द्रव्यसमवायाद् द्रव्यत्वम्, द्रव्यत्वम् । एवं गुणकर्मस्वपि यद्यप्येकः समवाय इत्यादिना । इत्यर्थः । व्यक्तमपरम् । न्यायकन्दली समवायश्च द्रव्ये एव न गुणकर्मसु अतो न तेषां व्याख्येयम् । एतत्सङ्ग्रहवाक्यं विवृणोति-स्वतन्त्रः संयोगवत् सम्बन्धान्तरेण न वर्तत पुनश्चोदयति - एवमादि कस्मादिति । द्रव्येष्वेव द्रव्यत्वं वर्तते, गुणेष्वेव गुणत्वम्, कर्मस्वेव कर्मत्वमित्येवमादि कस्मात् त्वया ज्ञातमित्यर्थः । गुणादि में द्रव्यत्व के समवाय के रहने से ही द्रव्यत्व की सत्ता नहीं मानी जा सकती, क्योंकि ( द्रव्यत्व की सत्ता का नियामक ) द्रव्यानुयोगिक समवाय है, केवल समवाय नहीं । ( अतः गुणादि में केवल समवाय के रहने पर भी द्रव्यानुयोगिकत्वविशिष्ट समवाय के न रहने के कारण गुणादि में द्रव्यत्व की आपत्ति नहीं दी जा सकती ) इसी प्रकार द्रव्य में गुणकमादि के और कर्म में गुणद्रव्यादि के दिये गये साङ्कर्य दोष का भी परि-हार करना चाहिए । ' यद्यप्येकः समवायः ' इत्यादि ग्रन्थ के द्वारा उक्त अर्थ के बोक ( यद्येकः समवाय इत्यादि ) संक्षिप्त वाक्य का ही विवरण दिया गया है । समवाय ' स्वतन्त्र ' है अर्थात् संयोग की तरह किसी दूसरे सम्बन्ध के द्वारा अपने आश्रय में नहीं रहता है ( वह अपने स्वरूप से ही द्रव्यादि आश्रयों में रहता है ) । ( उक्त स्वपद वर्णन रूप भाष्य के ) और अंश स्पष्ट हैं । ' एवमादि कस्मात् ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा इसी प्रसङ्ग में पुनः आक्षेप करते हैं । अर्थात् किस हेतु से तुमने ये सब बातें समझों कि द्रव्यत्व द्रव्यों में ही रहता है, गुणत्व गुणों में ही रहता है, एवं For Private And Personal

पृष्ठ 856

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 856 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७८८१ प्रशस्तपादभाष्यम् प्रतिनियमो ज्ञायते । यथा कुण्डदघ्नोः संयोगैकत्वे भवत्याश्रया-श्रयिभावनियमः । तथा द्रव्यत्वादीनामपि समवायैकत्वेऽपि व्यङ्ग्य-व्यञ्जकशक्तिभेदादाधाराधेय नियम इति । समवाय सम्बन्ध से अपने द्रव्यादि आश्रयों में ही हैं, गुणादि में नहीं । जिस प्रकार कुण्ड और दधि दोनों में एक ही संयोग के रहते हुए भी आधार कुण्ड ही होता है दधि नहीं, एवं आधेय दधि ही होता है कुण्ड नहीं, उसी प्रकार द्रव्यत्वादि सभी ( समवेत ) वस्तुओं का समवाय एक होने पर भी कथित संयोग की तरह अभिव्यक्त करनेवाले एवं अभिव्यक्त होनेवाले की विभिन्न शक्ति के कारण प्रत्येक समवेत वस्तुओं का आधार आधेय भाव नियमित होता है । न्यायकन्दली उत्तरमाह - अन्वयव्यतिरेकदर्शनादिति । द्रव्यत्वनिमित्तस्य प्रत्ययस्य द्रव्ये -cara यो गुणकर्मभ्यश्च व्यतिरेकः, गुणत्वनिमित्तस्य प्रत्ययस्य गुणेष्वन्वयो द्रव्यकर्मभ्यश्च व्यतिरेकः, तथा कर्मत्वनिमित्तस्य प्रत्ययस्य कर्मस्वन्वयो द्रव्यगुणेभ्यश्च व्यतिरेको दृश्यते, तस्मादन्वयव्यतिरेकदर्शनाद् द्रव्यत्वादीनां नियमो ज्ञायते । अस्य विवरणं सुगमम् । समवायाविशेषे कुत एवायं नियमो द्रव्यत्वस्य पृथिव्यादिष्वेव समवायो गुणत्वस्य रूपादिष्वेव कर्मत्वस्योत्क्षेपणा-दिष्वेव, नान्यत्र? इत्यत आह - यथेति । संयोगस्यैकत्वेऽपि कुण्डदघ्नोराश्रयाश्रयि-कर्मस्व क्रियाओं में ही रहता है । ' अन्वयव्यतिरेकदर्शनात् ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा इसी प्रश्न का उत्तर दिया गया है । अभिप्राय यह है कि द्रव्यत्व के द्वारा उत्पन्न ( द्रव्यत्व विषयक ) प्रत्यय का ' अन्वय ' ( विशेष्यता सम्बन्ध से ) द्रव्यों में ही देखा जाता हैं, एवं द्रव्यत्व के उक्त प्रत्यय का ' व्यतिरेक ' भी गुणकर्मादि में देखा जाता है । इसी प्रकार गुणत्वजनित ( गुणत्वविषयक ) प्रतीति का अन्वय गुणो में ही देखा जाता है, और द्रव्यकर्मादि में गुणत्वविषयक उक्त प्रतीति का व्यतिरेक भी देखा जाता है । एवं कर्मत्व से होनेवाली ( कर्मत्व विषयक ) प्रतीति का अन्वय कर्मों में ही देखा जाता है, और उक्त प्रतीति का ब्यतिरेक भी द्रव्यगुणादि में देखा जाता है । इन अन्वयों और व्यति-रेकों के दर्शन से समझते हैं कि द्रव्यादि तत्तत् आश्रयों में ही समवाय सम्बन्ध से द्रव्यत्वादि नियमित हैं | ( इहेति समवायनिमित्तस्य इत्यादि स्वपदवर्णन रूप भाष्य का ) अभिप्राय समझना सुगम है । द्रव्यत्वादि सभी जातियों में यदि समवाय एक ही है तो फिर यह नियम किस प्रकार उपपन्न होगा कि ब्रव्यत्व का समवाय पृथिव्यादि द्रव्यों में ही रहे, एवं गुणत्व का समवाय रूपादि गुणों में ही रहे, एवं कर्मत्व का समवाय उत्क्षेपणादि कर्मों में ही रहे, पृथिव्यादि से अन्यत्र द्रव्यत्व का समवाय न रहे, एवं गुणत्व For Private And Personal

पृष्ठ 857

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 857 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ७८२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ समवायनिरूपण-सम्बन्ध्यनित्यत्वेऽपि प्रशस्तपादभाष्यम् न संयोगवदनित्यत्वं भाववद-कारणत्वात् । यथा प्रमाणतः कारणानुपलब्धेर्नित्यो भाव इत्युक्तं तथा समवायोऽपीति । नास्य किञ्चित् कारणं प्रमाणत उप-प्रतियोगियों और अनुयोगियों के अनित्य होने पर भी संयोग की तरह समवाय अनित्य नहीं है, क्योंकि सत्ता जाति की तरह उसके भी कारण नहीं दीखते हैं । ( विशदार्थ यह है कि ) जिस प्रकार किसी भी प्रमाण से कारणों की उपलब्धि न होने से सत्ता जाति में नित्यत्व का व्यवहार न्यायकन्दली भावस्य नियमो दृष्टः, शक्तिनियमात् । कुण्डमेवाश्रयो दध्येवाश्रयि । एवं द्रव्यत्वादीनामाधाराधेयनियमो व्यङ्ग्यव्यञ्जकशक्तिभेदात् । किमुक्तं स्यात्? द्रव्यत्वाभिव्यञ्जिका शक्तिद्रव्याणामेव, तेन द्रव्येष्वेव द्रव्यत्वं समवैति नान्यत्रेति । एवं गुणकर्मस्वपि व्याख्येयम् । किं पुनरयमनित्य आहोस्विन्नित्यः? इति संशये सत्याह- सम्बन्ध्यनि-त्यत्वेऽपीति । यथा सम्बन्धिनोरनित्यत्वे संयोगस्यानित्यत्वम्, न तथा समवा-यिनोरनित्यत्वे समवायस्यानित्यत्वं भाववदकारणत्वादिति । एतद् विवृणोति -यथेत्यादिना । का समवाय रूपादि से अन्यत्र न रहे और कर्मत्व का समवाय उत्क्षेपणादि से भिन्न वस्तुओं में न रहे । इन्हीं प्रश्नों का समाधान ' यथा ' इत्यादि से किया गया है । अर्थात् मटका और दही दोनों में संयोग बराबर है, फिर भी मटका ही दही का आश्रय कह-लाता है, एवं दही आधेय ही कहलाता है । इस सार्वजनिक प्रतीति से जिस प्रकार उक्त एक ही संयोग से मटके में आश्रयत्व व्यवहार को उत्पन्न करने की एक शक्ति और दही में आधेयत्व व्यवहार की उससे भिन्न शक्ति की कल्पना की जाती है । उसी प्रकार द्रव्यत्वादि सभी जातियों में यद्यपि एक ही समवाय है, फिर भी पृथिव्यादि में ही द्रव्यत्व की अभिव्यक्ति होती है, अन्यत्र नहीं । अतः पृथिव्यादि में ही द्रव्यत्व को अभिव्यक्त करने की शक्ति माननी पड़ती है एवं पृथिव्यादि में द्रव्यत्व ही अभिव्यक्त होता है, अतः पृथिव्यादि में ही अभिव्यक्त होने की शक्ति की वल्पना द्रव्यत्व में ही करनी पड़ती है । एवं गुणत्व की अभिव्यक्ति रूपादि में ही होती है, अतः गुणत्व को अभि-व्यक्त करने की शक्ति रूपादि में ही माननी पड़ती है, अन्यत्र नहीं । एवं रूपादि में ही गुणत्व अभिव्यक्त होता है, अतः रूपादि में अभिव्यक्ति होने की शक्ति की कल्पना गुणत्व में करनी पड़ती है अन्य जातियों में नहीं । उपर्युक्त भाष्य की इस प्रकार से व्याख्या करनी चाहिए । For Private And Personal

पृष्ठ 858

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 858 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् ७८३ लभ्यत इति । कया पुनर्वृच्या द्रव्यादिषु समवायो वर्तते? न संयोगः सम्भवति, तस्य गुणत्वेन द्रव्याश्रितत्वात् । नापि समवा-यः, तस्यैकत्वात् । न चान्या वृत्तिरस्तीति? न, तादात्म्यात् । होता है, उसी प्रकार समवाय में भी समझना चाहिए | ( प्र ० ) समवाय कौन से सम्बन्ध से अपने अनुयोगी में रहता है? अपने आश्रय के साथ संयोग सम्बन्ध तो उसका हो नहीं सकता क्योंकि संयोग गुण है, अतः संयोग केवल द्रव्यों में ही रह सकता है । समवाय सम्बन्ध से भी समवाय नहीं रह सकता, क्योंकि समवाय एक है. संयोग और समवाय को छोड़कर कोई तीसरा सम्बन्ध नहीं है ( अतः समवाय है ही नहीं ) | ( उ ० ) ऐसी बात नहीं है, क्योंकि समवाय स्वरूप ( तादात्म्य ) सम्बन्ध से ही न्यायकन्दली युक्तो हि सम्बन्धिविनाशे संयोगस्य विनाशः, तदुत्पादे सम्बन्धिनोः समवायिकारणत्वात् । समवायस्य तु सम्बन्धिनौ न कारणम्, सम्बन्धिमात्र-त्वात् । यथा न कारणं तथोपपादितम् । तस्मादेतस्य सम्बन्धिविनाशेऽप्य-विनाशः, सत्तावदाश्रयान्तरेपि प्रत्यभिज्ञेयमानत्वात् । किमसम्बद्ध एव समवायः सम्बन्धिनौ सम्बन्धयति? सम्बद्धो वा? यह समवाय नित्य है? अथवा अनित्य? इस संशय के उपस्थित होने पर ( उसकी निवृत्ति के लिए ) ' सम्बन्धनित्यत्वेऽपि ' इत्यादि सन्दर्भ लिखा गया है । अर्थात् जिस प्रकार संयोग के सम्बन्धियों ( अनुयोगी और प्रतियोगी ) के अनित्य होने पर संयोग भी अनित्य होता है, उसी प्रकार सम्बन्धियों के अनित्य होने पर समवाय अनित्य नहीं होता | क्योंकि भाव सत्ता जाति ) की तरह समवाय का भी कोई उत्पादक कारण नहीं है । ' यथा ' इत्यादि सन्दर्भ से उक्त भाष्य सन्दर्भ की ( स्वपदवर्णन रूप ) व्याख्या की गयी है । यह ठीक है कि सम्बन्धियों के विनाश से संयोग का विनाश हो, क्योंकि वे ही संयोग के समवायिकारण हैं । समवाय के अनुयोगी और प्रतियोगी तो उसके केवल सम्बन्धी हैं, उसके कारण नहीं ( अतः उनके विनाश से समवाय का विनाश संभव नहीं है ) । ये समवाय के कारण क्यों नहीं हैं? इस प्रश्न का उत्तर दे चुके हैं । अतः समवाय के सम्बन्धियों के विनष्ट होने पर भी समवाय का विनाश नहीं होता, क्योंकि जिस प्रकार सत्ता जाति के आश्रय के विनष्ट होने पर भी दूसरे आश्रयों में प्रतीति के कारण सत्ता जाति को अविनाशी मानना पड़ता है, उसी प्रकार समवाय के एक या दोनों आश्रयों के विनष्ट होने पर भी दूसरे सम्बन्धियों में समवाय की प्रतीति होती है, अतः उसे भी अविनाशी मानना आवश्यक है । For Private And Personal

पृष्ठ 859

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 859 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ७८४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ समवायनिरूपण-प्रशस्तपादभाष्यम् यथा द्रव्यगुणकर्मणां सदात्मकस्य भावस्य नान्यः सत्तायोगोऽस्ति । एवमविभागिनो वृत्यात्मकस्य समवायस्य वृत्तिरस्ति, तस्मात् स्वात्मवृत्तिः । अत एवातीन्द्रियः नान्या सत्ता-अपने सम्बन्धियों में रहता है । जैसे कि द्रव्य गुण और कर्म में सत्ता जाति के लिए दूसरे सत्तासम्बन्ध की आवश्यकता नहीं होती है, इसी प्रकार एक ही स्वरूप के एवं सम्बन्धाभिन्न समवाय की सत्ता के लिए दूसरे सम्बन्ध की आवश्यकता नहीं होती है । अतः यह स्वरूप सम्बन्ध से ही रहता है । यतः प्रत्यक्ष होनेवाले पदार्थो में सत्तादि सामान्यों की तरह कोई अलग सम्बन्ध नहीं है, अतः समवाय का प्रत्यक्ष नहीं होता है । न्यायकन्दली न तावदसम्बद्धस्य सम्बन्धकत्वं युक्तम्, अतिप्रसङ्गात् । सम्बन्धश्चास्य न संयोगरूपः सम्भवति, तस्य द्रव्याश्रितत्वात् । नापि समवायः, एकत्वात् । न च संयोगसमवायाभ्यां वृत्त्यन्तरमस्ति । तत् कथमस्य वृत्तिरित्यत आह-कया पुनर्वृत्त्या द्रव्यादिषु समवायो वर्तत इति । वृत्त्यभावान्न वर्तत इत्य-भिप्रायः । समाधत्ते नेति । वृत्त्यभावान्न वर्तत इत्येतन्न, तादात्म्याद् वृत्त्यात्मकत्वात् ' कया पुनर्वृत्त्या ' इत्यादि ग्रन्थ से आक्षेप करते हैं कि क्या समवाय अपने सम्ब-न्धियों में किसी दूसरे सम्बन्ध से न रह कर ही अपने दोनों सम्बन्धियों को परस्पर सम्बद्ध करता है? अथवा अपने सम्बन्धियों में किसी अन्य सम्बन्ध से रहकर ही ( संयोग की तरह ) अपने सम्बन्धियों को सम्बद्ध करता है? इन दोनों में ' सम्बन्धियों में न रहकर ही उन्हें परस्पर सम्बद्ध करता है ' यह पहिला पक्ष अति प्रसङ्ग के कारण ( अर्थात् पट और तन्तु की तरह कपास और पट एवं तन्तु और पट भी परस्पर सम्बद्ध हों इस आपत्ति के कारण असङ्गत है ) क्योंकि सर्वत्र समवाय की असत्ता समान है । समवाय का अपने सम्बन्धियों में रहने के लिए संयोग सम्बन्ध उपयोगी नहीं हो सकता, क्योंकि संयोग द्रव्यों में ही हो सकता है । समवाय भी उसके लिए पर्याप्त नहीं है, क्योंकि समवाय एक ही है । सम्बन्ध को ( सम्बन्धियों से भिन्न होना चाहिए, अतः एक ही समवाय सम्बन्ध और उसका प्रतियोगी दोनों नहीं हो सकता ) संयोग और समवाय को छोड़कर दूसरी कोई ' वृत्ति ' सम्बन्ध ) नहीं है, तो फिर कौन सो ' वृत्ति ' से समवाय की सत्ता द्रव्यादि में रहती है? अर्थात् समवाय को रहने के लिए जब किसी सम्बन्ध की सम्भावना नहीं है तो समचाय है ही नहीं । ( पूर्व पक्षी से ) ' पर ' अर्थात् सिद्धान्ती उक्त आक्षेप का समाधान ' न ' इत्यादि सन्दर्भ से करते हैं । अर्थात् द्रव्यादि में समवाय के रहने के लिए किसी सम्बन्ध की सम्भावना For Private And Personal

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प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 860 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७८५ प्रशस्तपादभाष्यम् प्रत्यक्षेषु वृश्यभावात्, स्वात्मगतसंवेदनाभावाच्च । तस्मादिह बुद्धयनुमेयः समवाय इति । इति प्रशस्तपादभाष्ये समवायपदार्थः समाप्तः ॥ इसके प्रत्यक्ष न होने का यह हेतु भी है कि ( संयोगादि की तरह अनुयोगी और प्रतियोगी से भिन्न रूप में इसका ) भान नहीं होता है । तस्मात् ' यह यहीं है ' इस कथित प्रतीति से समवाय का अनुमान ही होता है । प्रशस्तपादभाष्य में समवाय पदार्थ का निरूपण समाप्त हुआ । न्यायकन्दली स्वत एवायं वृत्तिरिति । कृतको हि संयोगस्तस्य वृत्त्यात्मकस्यापि वृत्यन्तरमस्ति, कारणसमवायस्य कार्यलक्षणत्वात् । समवायस्य वृत्त्यन्तरं नास्ति । तस्मादस्य स्वात्मना स्वरूपेणैव वृत्तिर्न वृत्त्यन्तरेणेत्यर्थः । अत एवातीन्द्रियः सत्ता-दीनामिव प्रत्यक्षेषु वृत्त्यभावात् । यथा सत्तादीनां प्रत्यक्षेष्वर्थेषु वृत्तिरस्ति तेन ते संयुक्तसमवायादिन्द्रियेषु गृह्यन्ते, नैवं समवायस्य वृत्तिसम्भवः । अतोऽतीन्द्रियोऽयम्, संयोगसमवायापेक्षस्यैवेन्द्रियस्य भावग्रहणसामर्थ्योपलम्भात् । नहीं है, इससे समवाय द्रव्यादि में नहीं है सो बात नहीं । क्योंकि समवाय में ' सम्बन्ध ' का ' तादात्म्य ' है, अर्थात् वह स्वयं ' वृत्त्यात्मक ' है, फलतः समवाय स्वयं ही सम्बन्ध स्वरूप है । संयोग यतः उत्पत्तिशील वस्तु है, अतः सम्बन्धात्मक होने पर भी उसके रहने के लिए दूसरा सम्बन्ध आवश्यक है । क्योंकि उपादान में समवाय ही कार्य का स्वरूप है, अतः समवायि-कारण रूप सम्बन्धियों में संयोग का समवाय रूप दूसरा सम्बन्ध न मानें तो संयोग समवाय सम्बन्ध से उत्पन्न होनेवाला कार्य ही नहीं रह जाएगा । समवाय तो नित्य हैं, उसके लिए दूसरे सम्बन्ध की आवश्यकता नहीं है । अतः समवाय स्वात्मक सम्बन्ध से ही फलतः स्वरूप-सम्बन्ध से ही अपने सम्बन्धियों में रहता है, किसी दूसरे सम्बन्ध से नहीं । ' अत एवातीन्द्रियः सत्तादीनामिव प्रत्यक्षेषु वृत्त्यभावात् ' अर्थात् प्रत्यक्ष दीखनेवाले घटादि विषयों के साथ सत्तादि पदार्थों का ( स्वभिन्न समवाय नाम की ) वृत्ति ( सम्बन्ध ) है, अतः संयुक्तसमवाय सन्निकर्ष से उनका प्रत्यक्ष होता है । इस प्रकार समवाय का कोई भी स्वभिन्न एवं प्रत्यक्ष-प्रयोजक सम्बन्ध अपने सम्बन्धियों के साथ नहीं है, अतः समवाय अतीन्द्रिय है । क्योंकि संयोग और समवाय इन दोनों में से किसी एक की सहायता से ही इन्द्रियों में किसी भावपदार्थं को ग्रहण करने का सामर्थ्य है । ( प्र ० ) यदि समवाय का इन्द्रियों से ६६ For Private And Personal