वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ — पृष्ठ 171–180
वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 171–180
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बालकाण्डे सप्तचत्वारिंशः सर्गः १५ ९ ' बेटा! मैंने तुम्हारे विनाशके लिये जिस पुत्रकी । याचना की थी, वह जब तुम्हें जीतनेके लिये उत्सुक होगा, उस समय मैं उसे शान्त कर दूँगी - तुम्हारे प्रति उसे वैर - भावसे रहित तथा भ्रातृ - स्नेहसे युक्त बना दूँगी । फिर तुम उसके साथ रहकर उसीके द्वारा की हुई त्रिभुवन - विजयका सुख निश्चिन्त होकर भोगना ॥ १४ ॥
याचितेन सुरश्रेष्ठ पित्रा तव महात्मना ।
वरो वर्षसहस्रान्ते मम दत्तः सुतं प्रति ॥ १५ ॥ ।
' सुरश्रेष्ठ! मेरे प्रार्थना करनेपर तुम्हारे महात्मा पिताने एक हजार वर्षके बाद पुत्र होनेका मुझे वर दिया है ' ॥ १५ ॥
इत्युक्त्वा च दितिस्तत्र प्राप्ते मध्यं दिनेश्वरे ।
निद्रयापहृता देवी पादौ कृत्वाथ शीर्षतः ॥ १६ ॥
ऐसा कहकर दिति नींदसे अचेत हो गयीं । उस समय सूर्यदेव आकाशके मध्य भागमें आ गये थे-दोपहरका समय हो गया था । देवी दिति आसनपर बैठी - बैठी झपकी लेने लगीं । सिर झुक गया और केश पैरोंसे जा लगे । इस प्रकार निद्रावस्थामें उन्होंने पैरोंको सिरसे लगा लिया ॥ १६ ॥
दृष्ट्वा तामशुचिं शक्रः पादयोः कृतमूर्धजाम् ।
शिरः स्थाने कृतौ पादौ जहास च मुमोद च ॥ १७ ॥
उन्होंने अपने केशोंको पैरोंपर डाल रखा था । सिरको टिकानेके लिये दोनों पैरोंको ही आधार बना लिया था । यह देख दितिको अपवित्र हुई जान इन्द्र हँसे और बड़े प्रसन्न हुए ॥ १७ ॥
तस्याः शरीरविवरं प्रविवेश पुरंदरः ।
गर्भं च सप्तधा राम चिच्छेद परमात्मवान् ॥ १८ ॥
श्रीराम! फिर तो सतत सावधान रहनेवाले इन्द्र माता दितिके उदरमें प्रविष्ट हो गये और उसमें स्थित हुए गर्भके उन्होंने सात टुकड़े कर डाले ॥ १८ ॥
भिद्यमानस्ततो गर्भो वज्रेण शतपर्वणा ।
रुरोद सुस्वरं राम ततो दितिरबुध्यत ॥ १ ९ ॥
श्रीराम! उनके द्वारा सौ पर्वोंवाले वज्रसे विदीर्ण किये जाते समय वह गर्भस्थ बालक जोर - जोरसे रोने लगा । इससे दितिकी निद्रा टूट गयी - वे जागकर उठ बैठीं ॥ १ ९ ॥
मा रुदो मा रुदश्चेति गर्भं शक्रोऽभ्यभाषत ।
बिभेद च महातेजा रुदन्तमपि वासवः ॥ २० ॥
तब इन्द्रने उस रोते हुए गर्भसे कहा- ' भाई! मत रो, मत रो ' परंतु महातेजस्वी इन्द्रने रोते रहनेपर भी उस गर्भके टुकड़े कर ही डाले ॥ २० ॥
न हन्तव्यं न हन्तव्यमित्येव दितिरब्रवीत् ।
निष्पपात ततः शक्रो मातुर्वचनगौरवात् ॥ २१ ॥
उस समय दितिने कहा - ' इन्द्र! बच्चेको न मारो, न मारो । ' माताके वचनका गौरव मानकर इन्द्र सहसा उदरसे निकल आये ॥ २१ ॥
प्राञ्जलिर्वज्रसहितो दितिं शक्रोऽभ्यभाषत ।
अशुचिर्देवि सुप्तासि पादयोः कृतमूर्धजा ॥ २२ ॥
तदन्तरमहं लब्ध्वा शक्रहन्तारमाहवे ।
अभिन्दं सप्तधा देवि तन्मे त्वं क्षन्तुमर्हसि ॥ २३ ॥
फिर वज्रसहित इन्द्रने हाथ जोड़कर दितिसे कहा— ' देवि! तुम्हारे सिरके बाल पैरोंसे लगे थे । इस प्रकार तुम अपवित्र अवस्थामें सोयी थीं । यही छिद्र पाकर मैंने इस ' इन्द्रहन्ता ' बालकके सात टुकड़े कर डाले हैं । इसलिये । माँ! तुम मेरे इस अपराधको क्षमा करो ' ॥ २२-२३ ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे षट्चत्वारिंशः सर्गः ॥ ४६ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें छियालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ४६ ॥
सप्तचत्वारिंशः सर्गः दितिका अपने पुत्रोंको मरुद्गण बनाकर देवलोकमें रखनेके लिये इन्द्रसे अनुरोध, इन्द्रद्वारा उसकी स्वीकृति, दितिके तपोवनमें ही इक्ष्वाकु - पुत्र विशालद्वारा विशाला नगरीका निर्माण तथा वहाँके तत्कालीन राजा सुमतिद्वारा विश्वामित्र मुनिका सत्कार सप्तधा तु कृते गर्भे दितिः परमदुःखिता । ममापराधाद् गर्भोऽयं सप्तधा शकलीकृतः । सहस्त्राक्षं दुराधर्षं वाक्यं सानुनयाब्रवीत् ॥ १ ॥ नापराधो हि देवेश तवात्र बलसूदन ॥२ ॥
इन्द्रद्वारा अपने गर्भके सात टुकड़े कर दिये ' देवेश! बलसूदन! मेरे ही अपराधसे इस जानेपर देवी दितिको बड़ा दुःख हुआ । वे दुर्द्धर्ष वीर गर्भके सात टुकड़े हुए हैं । इसमें तुम्हारा कोई दोष सहस्राक्ष इन्द्रसे अनुनयपूर्वक बोलीं- ॥१ ॥ नहीं है ॥२ ॥
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१६० श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे
प्रियं त्वत्कृतमिच्छामि मम गर्भविपर्यये ।
मरुतां सप्त सप्तानां स्थानपाला भवन्तु ते ॥ ३ ॥
' इस गर्भको नष्ट करनेके निमित्त तुमने जो क्रूरतापूर्ण कर्म किया है, वह तुम्हारे और मेरे लिये भी जिस तरह प्रिय हो जाय - जैसे भी उसका परिणाम तुम्हारे और मेरे लिये सुखद हो जाय, वैसा उपाय मैं करना चाहती हूँ । मेरे गर्भके वे सातों खण्ड सात व्यक्ति होकर सातों मरुद्गणोंके स्थानोंका पालन करनेवाले हो जायँ ॥ ३ ॥
वातस्कन्धा इमे सप्त चरन्तु दिवि पुत्रक ।
मारुता इति विख्याता दिव्यरूपा ममात्मजाः ॥ ४ ॥ ।
' बेटा! ये मेरे दिव्य रूपधारी पुत्र ' मारुत ' नामसे प्रसिद्ध होकर आकाशमें जो सुविख्यात सात वातस्कन्ध * हैं, उनमें विचरें ॥ ४ ॥
ब्रह्मलोकं चरत्वेक इन्द्रलोकं तथापरः ।
दिव्यवायुरिति ख्यातस्तृतीयोऽपि महायशाः ॥ ५ ॥
‘ ( ऊपर जो सात मरुत् बताये गये हैं, वे सात-सातके गण हैं । इस प्रकार उनचास मरुत् समझने चाहिये । इनमेंसे ) जो प्रथम गण है, वह ब्रह्मलोकमें विचरे, दूसरा इन्द्रलोकमें विचरण करे तथा तीसरा महायशस्वी मरुद्गण दिव्य वायुके नामसे विख्यात हो अन्तरिक्षमें बहा करे ॥ ५ ॥
चत्वारस्तु सुरश्रेष्ठ दिशो वै तव शासनात् ।
संचरिष्यन्ति भद्रं ते कालेन हि ममात्मजाः ॥ ६ ॥
त्वत्कृतेनैव नाम्ना वै मारुता इति विश्रुताः । ' सुरश्रेष्ठ! तुम्हारा कल्याण हो । मेरे शेष चार पुत्रोंके गण तुम्हारी आज्ञासे समयानुसार सम्पूर्ण दिशाओंमें संचार करेंगे । तुम्हारे ही रखे हुए नामसे ( तुमने जो ' मा रुदः ' कहकर उन्हें रोनेसे मना किया था, उसी ' मा
रुदः ' - इस वाक्यसे ) वे सब - के - सब मारुत कहलायेंगे ।
मारुत नामसे ही उनकी प्रसिद्धि होगी ' ॥ ६३ ॥
तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा सहस्राक्षः पुरंदरः ॥ ७ ॥
उवाच प्राञ्जलिर्वाक्यमितीदं बलसूदनः । दितिका वह वचन सुनकर बल दैत्यको मारनेवाले सहस्राक्ष इन्द्रने हाथ जोड़कर यह बात कही- ॥ ७३ ॥
सर्वमेतद् यथोक्तं ते भविष्यति न संशयः ॥ ८ ॥
विचरिष्यन्ति भद्रं ते देवरूपास्तवात्मजाः । ' मा! तुम्हारा कल्याण हो । तुमने जैसा कहा है, वह सब वैसा ही होगा; इसमें संशय नहीं है । तुम्हारे ये पुत्र देवरूप होकर विचरेंगे ' ॥ ८३ ॥
एवं तौ निश्चयं कृत्वा मातापुत्रौ तपोवने ॥ ९ ॥
जग्मतुस्त्रिदिवं राम कृतार्थाविति नः श्रुतम् । श्रीराम! उस तपोवनमें ऐसा निश्चय करके वे दोनों माता - पुत्र - दिति और इन्द्र कृतकृत्य हो स्वर्गलोकको चले गये- ऐसा हमने सुन रखा है ॥ ९ ३ ॥ एष देशः स काकुत्स्थ महेन्द्राध्युषितः पुरा ॥ १० ॥
दितिं यत्र तपःसिद्धामेवं परिचचार सः । काकुत्स्थ! यही वह देश है, जहाँ पूर्वकालमें रहकर देवराज इन्द्रने तपःसिद्ध दितिकी परिचर्या की थी ॥ १०३ ॥
इक्ष्वाकोस्तु नरव्याघ्र पुत्रः परमधार्मिकः ॥ ११ ॥
अलम्बुषायामुत्पन्नो विशाल इति विश्रुतः ।
तेन चासीदिह स्थाने विशालेति पुरी कृता ॥ १२ ॥
पुरुषसिंह! पूर्वकालमें महाराज इक्ष्वाकुके एक परम धर्मात्मा पुत्र थे, जो विशाल नामसे प्रसिद्ध हुए । उनका जन्म अलम्बुषाके गर्भसे हुआ था । उन्होंने इस स्थानपर विशाला नामकी पुरी बसायी थी ॥ ११-१२ ॥
विशालस्य सुतो राम हेमचन्द्रो महाबलः ।
सुचन्द्र इति विख्यातो हेमचन्द्रादनन्तरः ॥ १३ ॥
श्रीराम! विशालके पुत्रका नाम था हेमचन्द्र, जो बड़े बलवान् थे । हेमचन्द्रके पुत्र सुचन्द्र नामसे विख्यात हुए ॥ १३ ॥
सुचन्द्रतनयो राम धूम्राश्व इति विश्रुतः ।
धूम्राश्वतनयश्चापि सृञ्जयः ` समपद्यत ॥ १४ ॥
श्रीरामचन्द्र! सुचन्द्रके पुत्र धूम्राश्व और धूम्राश्वके पुत्र संजय हुए ॥ १४ ॥
सृञ्जयस्य सुतः श्रीमान् सहदेवः प्रतापवान् ।
कुशाश्वः सहदेवस्य पुत्रः परमधार्मिकः ॥ १५ ॥
संजयके प्रतापी पुत्र श्रीमान् सहदेव हुए । सहदेवके परम धर्मात्मा पुत्रका नाम कुशाश्व था ॥ १५ ॥
कुशाश्वस्य महातेजाः सोमदत्तः प्रतापवान् ।
सोमदत्तस्य पुत्रस्तु काकुत्स्थ इति विश्रुतः ॥ १६ ॥
कुशाश्वके महातेजस्वी पुत्र प्रतापी सोमदत्त हुए और सोमदत्तके पुत्र काकुत्स्थ नामसे विख्यात हुए ॥ १६ ॥
तस्य पुत्रो महातेजाः सम्प्रत्येष पुरीमिमाम् ।
आवसत् परमप्रख्यः सुमतिर्नाम दुर्जयः ॥ १७ ॥
काकुत्स्थके महातेजस्वी पुत्र सुमति नामसे प्रसिद्ध हैं; जो परम कान्तिमान् एवं दुर्जय वीर हैं । वे ही इस समय इस पुरीमें निवास करते हैं ॥ १७ ॥
* आवह, प्रवह, संवह, उद्वह, विवह, परिवह और परावह— ये सात मरुत् हैं । इन्हींको सात वातस्कन्ध कहते हैं ।
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बालकाण्डे अष्टचत्वारिंशः सर्गः १६१
इक्ष्वाकोस्तु प्रसादेन सर्वे वैशालिका नृपाः ।
दीर्घायुषो महात्मानो वीर्यवन्तः सुधार्मिकाः ॥ १८ ॥
महाराज इक्ष्वाकुके प्रसादसे विशालाके सभी नरेश दीर्घायु, महात्मा, पराक्रमी और परम धार्मिक होते आये हैं ॥१८ ॥
इहाद्य रजनीमेकां सुखं स्वप्स्यामहे वयम् ।
श्वः प्रभाते नरश्रेष्ठ जनकं द्रष्टुमर्हसि ॥ १ ९ ॥
नरश्रेष्ठ! आज एक रात हमलोग यहीं सुखपूर्वक शयन करेंगे; फिर कल प्रातःकाल यहाँसे चलकर तुम मिथिलामें राजा जनकका दर्शन करोगे ॥ १ ९ ॥
सुमतिस्तु महातेजा विश्वामित्रमुपागतम् ।
श्रुत्वा नरवरश्रेष्ठः प्रत्यागच्छन्महायशाः ॥ २० ॥
नरेशोंमें श्रेष्ठ, महातेजस्वी, महायशस्वी राजा सुमति विश्वामित्रजीको पुरीके समीप आया हुआ सुनकर उनकी अगवानीके लिये स्वयं आये ॥ २० ॥
पूजां च परमां कृत्वा सोपाध्यायः सबान्धवः ।
प्राञ्जलिः कुशलं पृष्ट्वा विश्वामित्रमथाब्रवीत् ॥ २१ ॥
अपने पुरोहित और बन्धु - बान्धवोंके साथ राजाने विश्वामित्रजीकी उत्तम पूजा करके हाथ जोड़ उनका कुशल- समाचार पूछा और उनसे इस प्रकार कहा— ॥
धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि यस्य मे विषयं मुने ।
सम्प्राप्तो दर्शनं चैव नास्ति धन्यतरो मम ॥ २२ ॥
' मुने! मैं धन्य हूँ । आपका मुझपर बड़ा अनुग्रह है; क्योंकि आपने स्वयं मेरे राज्यमें पधारकर मुझे दर्शन दिया । इस समय मुझसे बढ़कर धन्य पुरुष दूसरा कोई | नहीं है ' ॥ २२ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे सप्तचत्वारिंशः सर्गः ॥ ४७ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें सैंतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ४७ ॥
अष्टचत्वारिंशः सर्गः राजा सुमतिसे सत्कृत हो एक रात विशालामें रहकर मुनियोंसहित श्रीरामका मिथिलापुरीमें पहुँचना और वहाँ सूने आश्रमके विषयमें पूछनेपर विश्वामित्रजीका उनसे अहल्याको शाप प्राप्त
पृष्ट्वा तु कुशलं तत्र परस्परसमागमे ।
कथान्ते सुमतिर्वाक्यं व्याजहार महामुनिम् ॥ १ ॥
वहाँ परस्पर समागमके समय एक - दूसरेका कुशल-मंगल पूछकर बातचीतके अन्तमें राजा सुमतिने महामुनि विश्वामित्रसे कहा —॥१ ॥
इमौ कुमारौ भद्रं ते देवतुल्यपराक्रमौ ।
गजसिंहगती वीरौ शार्दूलवृषभोपमौ ॥ २ ॥
' ब्रह्मन्! आपका कल्याण हो । ये दोनों कुमार देवताओंके तुल्य पराक्रमी जान पड़ते हैं । इनकी चाल-ढाल हाथी और सिंहकी गतिके समान है । ये दोनों वीर | सिंह और साँड़के समान प्रतीत होते हैं ॥२ ॥
पद्मपत्रविशालाक्षौ खड्गतूणधनुर्धरौ ।
अश्विनाविव रूपेण समुपस्थितयौवनौ ॥ ३ ॥
इनके बड़े - बड़े नेत्र विकसित कमलदलके समान शोभा पाते हैं । ये दोनों तलवार, तरकस और धनुष धारण किये हुए हैं । अपने सुन्दर रूपके द्वारा दोनों अश्विनीकुमारोंको लज्जित करते हैं तथा युवावस्थाके निकट आ पहुँचे हैं ॥
यदृच्छयैव गां प्राप्तौ देवलोकादिवामरौ ।
कथं पद्भ्यामिह प्राप्तौ किमर्थं कस्य वा मुने ॥ ४॥ ।
75 Srimad Valmiki Ramayan ( 1 ) _Section_ 7_1_Front होनेकी कथा सुनाना ' इन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता है, मानो दो देवकुमार दैवेच्छावश देवलोकसे पृथ्वीपर आ गये हों । मुने! ये दोनों किसके पुत्र हैं और कैसे, किसलिये यहाँ पैदल ही आये हैं? ॥४ ॥
भूषयन्ताविमं देशं चन्द्रसूर्याविवाम्बरम् ।
परस्परेण सदृशौ प्रमाणेङ्गितचेष्टितैः ॥ ५ ॥
' जैसे चन्द्रमा और सूर्य आकाशकी शोभा बढ़ाते हैं, उसी प्रकार ये दोनों कुमार इस देशको सुशोभित कर रहे हैं । शरीरकी ऊँचाई, मनोभावसूचक संकेत तथा चेष्टा ( बोलचाल ) में ये दोनों एक - दूसरेके समान हैं ॥५ ॥
किमर्थं च नरश्रेष्ठौ सम्प्राप्तौ दुर्गमे पथि ।
वरायुधधरौ वीरौ श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥६ ॥
' श्रेष्ठ आयुध धारण करनेवाले ये दोनों नरश्रेष्ठ वीर इस दुर्गम मार्गमें किसलिये आये हैं? यह मैं यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ'॥६ ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा यथावृत्तं न्यवेदयत् ।
सिद्धाश्रमनिवासं च राक्षसानां वधं यथा ।
विश्वामित्रवचः श्रुत्वा राजा परमविस्मितः ॥७ ॥
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१६२ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे सुमतिका यह वचन सुनकर विश्वामित्रजीने उन्हें । सब वृत्तान्त यथार्थरूपसे निवेदन किया । सिद्धाश्रममें निवास और राक्षसोंके वधका प्रसंग भी यथावत् रूपसे कह सुनाया । विश्वामित्रजीकी बात सुनकर राजा सुमतिको बड़ा विस्मय हुआ ॥ ७ ॥
अतिथी परमं प्राप्तौ पुत्रौ दशरथस्य तौ ।
पूजयामास विधिवत् सत्कारार्हौ महाबलौ ॥ ८ ॥
उन्होंने परम आदरणीय अतिथिके रूपमें आये हुए उन दोनों महाबली दशरथ - पुत्रोंका विधिपूर्वक आतिथ्य सत्कार किया ॥ ८ ॥
ततः परमसत्कारं सुमतेः प्राप्य राघवौ ।
उष्य तत्र निशामेकां जग्मतुर्मिथिलां ततः ॥ ९ ॥
सुमतिसे उत्तम आदर - सत्कार पाकर वे दोनों रघुवंशी कुमार वहाँ एक रात रहे और सबेरे उठकर मिथिलाकी ओर चल दिये ॥ ९ ॥
तां दृष्ट्वा मुनयः सर्वे जनकस्य पुरीं शुभाम् ।
साधु साध्विति शंसन्तो मिथिलां समपूजयन् ॥ १० ॥
मिथिलामें पहुँचकर जनकपुरीकी सुन्दर शोभा देख सभी महर्षि साधु - साधु कहकर उसकी भूरि - भूरि प्रशंसा करने लगे ॥ १० ॥
मिथिलोपवने तत्र आश्रमं दृश्य राघवः ।
पुराणं निर्जनं रम्यं पप्रच्छ मुनिपुंगवम् ॥ ११ ॥
मिथिलाके उपवनमें एक पुराना आश्रम था, जो अत्यन्त रमणीय होकर भी सूनसान दिखायी देता था । उसे देखकर श्रीरामचन्द्रजीने मुनिवर विश्वामित्रजीसे पूछा- ॥ ११ ॥
इदमाश्रमसंकाशं किं न्विदं मुनिवर्जितम् ।
श्रोतुमिच्छामि भगवन् कस्यायं पूर्व आश्रमः ॥ १२ ॥
' भगवन्! यह कैसा स्थान है, जो देखनेमें तो आश्रम - जैसा है; किंतु एक भी मुनि यहाँ दृष्टिगोचर नहीं होते हैं । मैं यह सुनना चाहता हूँ कि पहले यह आश्रम किसका था? ' ॥ १२ ॥
तच्छ्रुत्वा राघवेणोक्तं वाक्यं वाक्यविशारदः ।
प्रत्युवाच महातेजा विश्वामित्रो महामुनिः ॥ १३ ॥
श्रीरामचन्द्रजीका यह प्रश्न सुनकर प्रवचनकुशल महातेजस्वी महामुनि विश्वामित्रने इस प्रकार उत्तर दिया- ॥ १३ ॥
हन्त ते कथयिष्यामि शृणु तत्त्वेन राघव ।
यस्यैतदाश्रमपदं शप्तं कोपान्महात्मनः ॥ १४ ॥
' रघुनन्दन! पूर्वकालमें यह जिस महात्माका आश्रम । था और जिन्होंने क्रोधपूर्वक इसे शाप दे दिया था, उनका तथा उनके इस आश्रमका सब वृत्तान्त तुमसे कहता हूँ । तुम यथार्थरूपसे इसको सुनो ॥ १४ ॥
गौतमस्य नरश्रेष्ठ पूर्वमासीन्महात्मनः ।
आश्रमो दिव्यसंकाशः सुरैरपि सुपूजितः ॥ १५ ॥
' नरश्रेष्ठ! पूर्वकालमें यह स्थान महात्मा गौतमका आश्रम था । उस समय यह आश्रम बड़ा ही दिव्य जान पड़ता था । देवता भी इसकी पूजा एवं प्रशंसा किया करते थे ॥ १५ ॥
स चात्र तप आतिष्ठदहल्यासहितः पुरा ।
वर्षपूगान्यनेकानि राजपुत्र महायशः ॥ १६ ॥
' महायशस्वी राजपुत्र! पूर्वकालमें महर्षि गौतम अपनी पत्नी अहल्याके साथ रहकर यहाँ तपस्या करते थे । उन्होंने बहुत वर्षोंतक यहाँ तप किया था ॥१६ ॥
तस्यान्तरं विदित्वा च सहस्राक्षः शचीपतिः ।
मुनिवेषधरो भूत्वा अहल्यामिदमब्रवीत् ॥ १७ ॥
' एक दिन जब महर्षि गौतम आश्रमपर नहीं थे, उपयुक्त अवसर समझकर शचीपति इन्द्र गौतम मुनिका वेष धारण किये वहाँ आये और अहल्यासे इस प्रकार बोले- - ॥ १७ ॥
ऋतुकालं प्रतीक्षन्ते नार्थिनः सुसमाहिते ।
संगमं त्वहमिच्छामि त्वया सह सुमध्यमे ॥ १८ ॥
" ' सदा सावधान रहनेवाली सुन्दरी! रतिकी इच्छा रखनेवाले प्रार्थी पुरुष ऋतुकालकी प्रतीक्षा नहीं करते हैं । सुन्दर कटिप्रदेशवाली सुन्दरी! मैं ( इन्द्र ) तुम्हारे साथ समागम करना चाहता हूँ ' ॥ १८ ॥
मुनिवेषं सहस्राक्षं विज्ञाय रघुनन्दन ।
मतिं चकार दुर्मेधा देवराजकुतूहलात् ॥ १ ९ ॥
' रघुनन्दन! महर्षि गौतमका वेष धारण करके आये हुए इन्द्रको पहचानकर भी उस दुर्बुद्धि नारीने ' अहो! देवराज इन्द्र मुझे चाहते हैं ' इस कौतूहलवश उनके साथ समागमका निश्चय करके वह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया ॥
अथाब्रवीत् सुरश्रेष्ठं कृतार्थेनान्तरात्मना ।
कृतार्थास्मि सुरश्रेष्ठ गच्छ शीघ्रमितः प्रभो ॥ २० ॥
आत्मानं मां च देवेश सर्वथा रक्ष गौतमात् । ' रतिके पश्चात् उसने देवराज इन्द्रसे संतुष्टचित्त होकर कहा — ' सुरश्रेष्ठ! मैं आपके समागमसे कृतार्थ हो गयी । प्रभो! अब आप शीघ्र यहाँसे चले जाइये । देवेश्वर! महर्षि गौतमके कोपसे आप अपनी और मेरी भी सब प्रकारसे रक्षा कीजिये ' ॥ २०३ ॥
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बालकाण्डे एकोनपञ्चाशः सर्गः.१६३ इन्द्रस्तु प्रहसन् वाक्यमहल्यामिदमब्रवीत् ॥ २१ ॥
सुश्रोणि परितुष्टोऽस्मि गमिष्यामि यथागतम् । ' तब इन्द्रने अहल्यासे हँसते हुए कहा - ' सुन्दरी! मैं भी संतुष्ट हो गया । अब जैसे आया था, उसी तरह चला जाऊँगा ॥ २१३ ॥
एवं संगम्य तु तदा निश्चक्रामोटजात् ततः ॥ २२ ॥
स सम्भ्रमात् त्वरन् राम शङ्कितो गौतमं प्रति । ‘ श्रीराम! इस प्रकार अहल्यासे समागम करके इन्द्र जब उस कुटीसे बाहर निकले, तब गौतमके आ जानेकी आशङ्कासे बड़ी उतावलीके साथ वेगपूर्वक भागनेका प्रयत्न करने लगे ॥ २२३ ॥
गौतमं स ददर्शाथ प्रविशन्तं महामुनिम् ॥ २३ ॥
देवदानवदुर्धर्ष तपोबलसमन्वितम् ।
तीर्थोदकपरिक्लिन्नं दीप्यमानमिवानलम् ॥ २४ ॥
गृहीतसमिधं तत्र सकुशं मुनिपुंगवम् । ' इतनेहीमें उन्होंने देखा, देवताओं और दानवोंके लिये भी दुर्धर्ष, तपोबलसम्पन्न महामुनि गौतम हाथमें समिधा लिये आश्रममें प्रवेश कर रहे हैं । उनका शरीर तीर्थके जलसे भीगा हुआ है और वे प्रज्वलित अग्निके
समान उद्दीप्त हो रहे हैं । २३-२४३ ॥
दृष्ट्वा सुरपतिस्त्रस्तो विषण्णवदनोऽभवत् ॥ २५ ॥
अथ दृष्ट्वा सहस्राक्षं मुनिवेषधरं मुनिः ।
दुर्वृत्तं वृत्तसम्पन्नो रोषाद् वचनमब्रवीत् ॥ २६ ॥
' उनपर दृष्टि पड़ते ही देवराज इन्द्र भयसे थर्रा उठे । उनके मुखपर विषाद छा गया । दुराचारी इन्द्रको मुनिका वेष धारण किये देख सदाचारसम्पन्न मुनिवर गौतमजीने रोषमें भरकर कहा- ॥ २५-२६ ॥
मम रूपं समास्थाय कृतवानसि दुर्मते ।
अकर्तव्यमिदं यस्माद् विफलस्त्वं भविष्यसि ॥ २७ ॥
" दुर्मते! तूने मेरा रूप धारण करके यह न करनेयोग्य पापकर्म किया है, इसलिये तू विफल ( अण्डकोषोंसे रहित ) हो जायगा ' ॥ २७ ॥
गौतमेनैवमुक्तस्य सुरोषेण महात्मना ।
पेततुर्वृषणौ भूमौ सहस्त्राक्षस्य तत्क्षणात् ॥ २८ ॥
' रोषमें भरे हुए महात्मा गौतमके ऐसा कहते ही सहस्राक्ष इन्द्रके दोनों अण्डकोष उसी क्षण पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ २८ ॥
तथा शप्त्वा च वै शक्रं भार्यामपि च शप्तवान् ।
इह वर्षसहस्राणि बहूनि निवसिष्यसि ॥ २ ९ ॥
वातभक्षा निराहारा तप्यन्ती भस्मशायिनी ।
अदृश्या सर्वभूतानामाश्रमेऽस्मिन् वसिष्यसि ॥ ३० ॥
यदा त्वेतद् वनं घोरं रामो दशरथात्मजः ।
आगमिष्यति दुर्धर्षस्तदा पूता भविष्यसि ॥ ३१ ॥
तस्यातिथ्येन दुर्वृत्ते लोभमोहविवर्जिता ।
मत्सकाशं मुदा युक्ता स्वं वपुर्धारयिष्यसि ॥ ३२ ॥
इन्द्रको इस प्रकार शाप देकर गौतमने अपनी पत्नीको भी शाप दिया- ' दुराचारिणी! तू भी यहाँ कई हजार वर्षोंतक केवल हवा पीकर या उपवास करके कष्ट उठाती हुई राखमें पड़ी रहेगी । समस्त प्राणियोंसे अदृश्य रहकर इस आश्रममें निवास करेगी । जब दुर्धर्ष दशरथ - कुमार राम इस घोर वनमें पदार्पण करेंगे, उस समय तू पवित्र होगी । उनका आतिथ्य - सत्कार करनेसे तेरे लोभ - मोह आदि दोष दूर हो जायँगे और तू प्रसन्नतापूर्वक मेरे पास पहुँचकर अपना पूर्व शरीर धारण कर लेगी ' ॥ २ ९ - ३२ ॥ एवमुक्त्वा महातेजा गौतमो दुष्टचारिणीम् ।
इममाश्रममुत्सृज्य सिद्धचारण सेविते ।
हिमवच्छिखरे रम्ये तपस्तेपे महातपाः ॥ ३३ ॥
' अपनी दुराचारिणी पत्नीसे ऐसा कहकर महातेजस्वी, महातपस्वी गौतम इस आश्रमको छोड़कर चले गये और सिद्धों तथा चारणोंसे सेवित हिमालयके रमणीय शिखरपर । रहकर तपस्या करने लगे ' ॥ ३३ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डेऽष्टचत्वारिंशः सर्गः ॥ ४८ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें अड़तालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ४८ ॥
एकोनपञ्चाशः सर्गः पितृदेवताओंद्वारा इन्द्रको भेड़ेके अण्डकोषसे युक्त करना तथा भगवान् श्रीरामके द्वारा अहल्याका उद्धार एवं उन दोनों दम्पतिके द्वारा इनका सत्कार अफलस्तु ततः शक्रो देवानग्निपुरोगमान् । तदनन्तर इन्द्र अण्डकोषसे रहित होकर बहुत अब्रवीत् त्रस्तनयनः सिद्धगन्धर्वचारणान् ॥ १ ॥ डर गये । उनके नेत्रोंमें त्रास छा
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१६४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे आदि देवताओं, सिद्धों, गन्धर्वों और चारणोंसे इस प्रकार बोले- ॥ १ ॥
कुर्वता तपसो विघ्नं गौतमस्य महात्मनः ।
क्रोधमुत्पाद्य हि मया सुरकार्यमिदं कृतम् ॥ २ ॥
' देवताओ! महात्मा गौतमकी तपस्यामें विघ्न डालनेके लिये मैंने उन्हें क्रोध दिलाया है । ऐसा करके मैंने यह देवताओंका कार्य ही सिद्ध किया है ॥ २ ॥
अफलोऽस्मि कृतस्तेन क्रोधात् सा च निराकृता ।
शापमोक्षेण महता तपोऽस्यापहृतं मया ॥ ३ ॥
' मुनिने क्रोधपूर्वक भारी शाप देकर मुझे अण्डकोषसे रहित कर दिया और अपनी पत्नीका भी परित्याग कर दिया । इससे मेरे द्वारा उनकी तपस्याका अपहरण हुआ है ।
तन्मां सुरवराः सर्वे सर्षिसङ्घाः सचारणाः ।
सुरकार्यकरं यूयं सफलं कर्तुमर्हथ ॥ ४ ॥
‘ ( यदि मैं उनकी तपस्यामें विघ्न नहीं डालता तो वे देवताओंका राज्य ही छीन लेते । अतः ऐसा करके ) मैंने देवताओंका ही कार्य सिद्ध किया है । इसलिये श्रेष्ठ देवताओ! तुम सब लोग, ऋषिसमुदाय और चारणगण मिलकर मुझे अण्डकोषसे युक्त करनेका प्रयत्न करो ' ॥ ४ ॥
शतक्रतोर्वचः श्रुत्वा देवाः साग्निपुरोगमाः ।
पितृदेवानुपेत्याहुः सर्वे सह मरुद्गणैः ॥ ५ ॥
इन्द्रका यह वचन सुनकर मरुद्गणोंसहित अग्नि आदि समस्त देवता कव्यवाहन आदि पितृदेवताओंके पास जाकर बोले— ॥ ५ ॥
अयं मेषः सवृषणः शक्रो ह्यवृषणः कृतः ।
मेषस्य वृषणौ गृह्य शक्रायाशु प्रयच्छत ॥ ६ ॥
' पितृगण! यह आपका भेड़ा अण्डकोषसे युक्त है और इन्द्र अण्डकोषरहित कर दिये गये हैं । अतः इस भेड़ेके दोनों अण्डकोषोंको लेकर आप शीघ्र ही इन्द्रको अर्पित कर दें ॥ ६ ॥
अफलस्तु कृतो मेषः परां तुष्टिं प्रदास्यति ।
भवतां हर्षणार्थं च ये च दास्यन्ति मानवाः ।
अक्षयं हि फलं तेषां यूयं दास्यथ पुष्कलम् ॥ ७ ॥
' अण्डकोषसे रहित किया हुआ यह भेड़ा इसी स्थानमें आपलोगोंको परम संतोष प्रदान करेगा । अतः जो मनुष्य आपलोगोंकी प्रसन्नताके लिये अण्डकोषरहित भेड़ा दान करेंगे, उन्हें आपलोग उस दानका उत्तम एवं पूर्ण फल प्रदान करेंगे ' ॥ ७ ॥
अग्नेस्तु वचनं श्रुत्वा पितृदेवाः समागताः ।
उत्पाट्य मेषवृषणौ सहस्त्राक्षे न्यवेशयन् ॥ ८ ॥ ।
अग्निकी यह बात सुनकर पितृदेवताओंने एकत्र हो भेड़ेके अण्डकोषोंको उखाड़कर इन्द्रके शरीरमें उचित स्थानपर जोड़ दिया ॥ ८ ॥
तदाप्रभृति काकुत्स्थ पितृदेवाः समागताः ।
अफलान् भुञ्जते मेषान् फलैस्तेषामयोजयन् ॥ ९ ॥
ककुत्स्थनन्दन श्रीराम! तभीसे वहाँ आये हुए समस्त पितृ - देवता अण्डकोषरहित भेड़ोंको ही उपयोगमें लाते हैं और दाताओंको उनके दानजनित फलोंके भागी बनाते हैं ॥ ९ ॥
इन्द्रस्तु मेषवृषणस्तदाप्रभृति राघव ।
गौतमस्य प्रभावेण तपसा च महात्मनः ॥ १० ॥
रघुनन्दन! उसी समयसे महात्मा गौतमके तपस्याजनित प्रभावसे इन्द्रको भेड़ोंके अण्डकोष धारण करने पड़े ॥ १० ॥
तदागच्छ महातेज आश्रमं पुण्यकर्मणः ।
तारयैनां महाभागामहल्यां देवरूपिणीम् ॥११ ॥
महातेजस्वी श्रीराम! अब तुम पुण्यकर्मा महर्षि गौतमके इस आश्रमपर चलो और इन देवरूपिणी महाभागा अहल्याका उद्धार करो ॥११ ॥
विश्वामित्रवचः श्रुत्वा राघवः सहलक्ष्मणः ।
विश्वामित्रं पुरस्कृत्य आश्रमं प्रविवेश ह ॥ १२ ॥
विश्वामित्रजीका यह वचन सुनकर लक्ष्मणसहित श्रीरामने उन महर्षिको आगे करके उस आश्रममें प्रवेश किया ॥ १२ ॥
ददर्श च महाभागां तपसा द्योतितप्रभान् ।
लोकैरपि समागम्य दुर्निरीक्ष्यां सुरासुरैः ॥ १३ ॥
वहाँ जाकर उन्होंने देखा - महासौभाग्यशालिनी अहल्या अपनी तपस्यासे देदीप्यमान हो रही हैं । इस लोकके मनुष्य तथा सम्पूर्ण देवता और असुर भी वहाँ आकर उन्हें देख नहीं सकते थे ॥ १३ ॥
प्रयत्नान्निर्मितां धात्रा दिव्यां मायामयीमिव ।
धूमेनाभिपरीतांगीं दीप्तामग्निशिखामिव ॥ १४ ॥
सतुषारावृतां साभ्रां पूर्णचन्द्रप्रभामिव ।
मध्येऽम्भसो दुराधर्षां दीप्तां सूर्यप्रभामिव ॥ १५ ॥
उनका स्वरूप दिव्य था । विधाताने बड़े प्रयत्नसे उनके अंगोंका निर्माण किया था । वे मायामयी - सी प्रतीत होती थीं । धूमसे घिरी हुई प्रज्वलित अग्निशिखा-सी जान पड़ती थीं । ओले और बादलोंसे ढकी हुई पूर्ण चन्द्रमाकी प्रभा - सी दिखायी देती थीं तथा जलके भीतर उद्भासित होनेवाली सूर्यकी दुर्धर्ष प्रभाके समान दृष्टिगोचर होती थीं ॥ १४-१५ ॥ 75 Srimad Valmiki Ramayan ( 1 ) _Section_7_2_Back
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बालकाण्डे सा हि गौतमवाक्येन दुर्निरीक्ष्या बभूव ह ।
त्रयाणामपि लोकानां यावद् रामस्य दर्शनम् ।
शापस्यान्तमुपागम्य तेषां दर्शनमागता ॥ १६ ॥
गौतमके शापवश श्रीरामचन्द्रजीका दर्शन होनेसे पहले तीनों लोकोंके किसी भी प्राणीके लिये उनका दर्शन होना कठिन था । श्रीरामका दर्शन मिल जानेसे जब उनके शापका अन्त हो गया, तब वे उन सबको दिखायी देने लगीं ॥
राघवौ तु तदा तस्याः पादौ जगृहतुर्मुदा ।
स्मरन्ती गौतमवचः प्रतिजग्राह सा हि तौ ॥ १७ ॥
पाद्यमर्घ्यं तथाऽऽतिथ्यं चकार सुसमाहिता ।
प्रतिजग्राह काकुत्स्थो विधिदृष्टेन कर्मणा ॥ १८ ॥
उस समय श्रीराम और लक्ष्मणने बड़ी प्रसन्नताके साथ अहल्याके दोनों चरणोंका स्पर्श किया । महर्षि गौतमके वचनोंका स्मरण करके अहल्याने बड़ी सावधानीके साथ उन दोनों भाइयोंको आदरणीय अतिथिके रूपमें अपनाया और पाद्य, अर्घ्य आदि अर्पित करके उनका आतिथ्य -सत्कार किया । श्रीरामचन्द्रजीने शास्त्रीय विधिके अनुसार अहल्याका वह आतिथ्य ग्रहण किया ॥ १७ - १८ ॥
पुष्पवृष्टिर्महत्यासीद् देवदुन्दुभिनिःस्वनैः ।
गन्धर्वाप्सरसां चैव महानासीत् समुत्सवः ॥ १ ९ ॥
पञ्चाशः सर्गः १६५ उस समय देवताओंकी दुन्दुभि बज उठी । साथ ही आकाशसे फूलोंकी बड़ी भारी वर्षा होने लगी । गन्धर्वों और अप्सराओंद्वारा महान् उत्सव मनाया जाने लगा ॥ १ ९ ॥
साधु साध्विति देवास्तामहल्यां समपूजयन् ।
तपोबलविशुद्धांगीं गौतमस्य वशानुगाम् ॥ २० ॥
महर्षि गौतमके अधीन रहनेवाली अहल्या अपनी तप: शक्तिसे विशुद्ध स्वरूपको प्राप्त हुईं- यह देख सम्पूर्ण देवता उन्हें साधुवाद देते हुए उनकी भूरि - भूरि प्रशंसा करने लगे ॥ २० ॥
गौतमोऽपि महातेजा अहल्यासहितः सुखी ।
रामं सम्पूज्य विधिवत् तपस्तेपे महातपाः ॥ २१ ॥
महातेजस्वी, महातपस्वी गौतम भी अहल्याको अपने साथ पाकर सुखी हो गये । उन्होंने श्रीरामकी विधिवत् पूजा करके तपस्या आरम्भ की ॥ २१ ॥
रामोऽपि परमां पूजां गौतमस्य महामुनेः ।
सकाशाद् विधिवत् प्राप्य जगाम मिथिलां ततः ॥ २२ ॥
महामुनि गौतमकी ओरसे विधिपूर्वक उत्तम पूजा— आदर - सत्कार पाकर श्रीराम भी मुनिवर विश्वामित्रजीके । साथ मिथिलापुरीको चले गये ॥२२ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे एकोनपञ्चाशः सर्गः ॥ ४ ९ ॥ इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें उनचासवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ४ ९ ॥ पञ्चाशः सर्गः श्रीराम आदिका मिथिला - गमन, राजा जनकद्वारा विश्वामित्रका सत्कार तथा उनका श्रीराम और लक्ष्मणके विषयमें जिज्ञासा करना एवं परिचय पाना
ततः प्रागुत्तरां गत्वा रामः सौमित्रिणा सह ।
विश्वामित्रं पुरस्कृत्य यज्ञवाटमुपागमत् ॥१ ॥
तदनन्तर लक्ष्मणसहित श्रीराम विश्वामित्रजीको आगे करके महर्षि गौतमके आश्रमसे ईशानकोणकी ओर चले और मिथिलानरेशके यज्ञमण्डपमें जा पहुँचे ॥ १ ॥
रामस्तु मुनिशार्दूलमुवाच सहलक्ष्मणः ।
साध्वी यज्ञसमृद्धिर्हि जनकस्य महात्मनः ॥ २ ॥
बहूनीह सहस्राणि नानादेशनिवासिनाम् ।
ब्राह्मणानां महाभाग वेदाध्ययनशालिनाम् ॥ ३ ॥
वहाँ लक्ष्मणसहित श्रीरामने मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्रसे कहा — ' महाभाग! महात्मा जनकके यज्ञका समारोह तो बड़ा सुन्दर दिखायी दे रहा है । यहाँ नाना देशोंके निवासी सहस्रों ब्राह्मण जुटे हुए हैं, जो वेदोंके स्वाध्यायसे शोभा पा रहे हैं॥२-३ ॥
ऋषिवाटाश्च दृश्यन्ते शकटीशतसंकुलाः ।
देशो विधीयतां ब्रह्मन् यत्र वत्स्यामहे वयम् ॥ ४ ॥
' ऋषियोंके बाड़े सैकड़ों छकड़ोंसे भरे दिखायी दे रहे हैं । ब्रह्मन्! अब ऐसा कोई स्थान निश्चित कीजिये, जहाँ हमलोग भी ठहरें ' ॥ ४ ॥
रामस्य वचनं श्रुत्वा विश्वामित्रो महामुनिः ।
निवासमकरोद् देशे विविक्ते सलिलान्विते ॥ ५ ॥
श्रीरामचन्द्रजीका यह वचन सुनकर महामुनि विश्वामित्रने एकान्त स्थानमें डेरा डाला, जहाँ पानीका सुभीता था ॥ ५ ॥
विश्वामित्रमनुप्राप्तं श्रुत्वा नृपवरस्तदा ।
शतानन्दं पुरस्कृत्य पुरोहितमनिन्दितः ॥ ६ ॥
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१६६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे अनिन्द्य ( उत्तम ) आचार - विचारवाले नृपश्रेष्ठ महाराज जनकने जब सुना कि विश्वामित्रजी पधारे हैं, तब वे तुरंत अपने पुरोहित शतानन्दको आगे करके [ अर्घ्य लिये विनीतभावसे उनका स्वागत करनेको चल दिये ] ॥ ।
ऋत्विजोऽपि महात्मानस्त्वर्घ्यमादाय सत्वरम् ।
प्रत्युज्जगाम सहसा विनयेन समन्वितः ॥ ७ ॥
विश्वामित्राय धर्मेण ददौ धर्मपुरस्कृतम् । उनके साथ अर्घ्य लिये महात्मा ऋत्विज् भ शीघ्रतापूर्वक चले । राजाने विनीतभावसे सहसा आगे बढ़कर महर्षिकी अगवानी की तथा धर्मशास्त्र के अनुसार विश्वामित्रको धर्मयुक्त अर्घ्य समर्पित किया ॥ ७३ ॥
प्रतिगृह्य तु तां पूजां जनकस्य महात्मनः ॥ ८ ॥
पप्रच्छ कुशलं राज्ञो यज्ञस्य च निरामयम् । महात्मा राजा जनककी वह पूजा ग्रहण करके मुनिने उनका कुशल- समाचार पूछा तथा उनके यज्ञकी निर्बाध स्थितिके विषयमें जिज्ञासा की ॥ ८३ ॥
स तांश्चाथ मुनीन् पृष्ट्वा सोपाध्यायपुरोधसः ॥ ९ ॥
यथार्हमृषिभिः सर्वैः समागच्छत् प्रहृष्टवत् । राजाके साथ जो मुनि, उपाध्याय और पुरोहित आये थे, उनसे भी कुशल - मंगल पूछकर विश्वामित्रजी बड़े हर्षके साथ उन सभी महर्षियोंसे यथायोग्य मिले ॥ ९ ३ ॥ अथ राजा मुनिश्रेष्ठं कृताञ्जलिरभाषत ॥ १० ॥
आसने भगवानास्तां सहैभिर्मुनिपुंगवैः । इसके बाद राजा जनकने मुनिवर विश्वामित्रसे हाथ जोड़कर कहा- ' भगवन्! आप इन मुनीश्वरोंके साथ आसनपर विराजमान होइये ' ॥ १०३ ॥
जनकस्य वचः श्रुत्वा निषसाद महामुनिः ॥ ११ ॥
पुरोधा ऋत्विजश्चैव राजा च सहमन्त्रिभिः ।
आसनेषु यथान्यायमुपविष्टाः समन्ततः ॥ १२ ॥
यह बात सुनकर महामुनि विश्वामित्र आसनपर बैठ गये । फिर पुरोहित, ऋत्विज् तथा मन्त्रियोंसहित राजा भी सब ओर यथायोग्य आसनोंपर विराजमान हो गये ॥
दृष्ट्वा स नृपतिस्तत्र विश्वामित्रमथाब्रवीत् ।
अद्य यज्ञसमृद्धिर्मे सफला दैवतैः कृता ॥ १३ ॥
तत्पश्चात् राजा जनकने विश्वामित्रजीकी ओर देखकर कहा- ' भगवन्! आज देवताओंने मेरे यज्ञकी आयोजना सफल कर दी ॥ १३ ॥
अद्य यज्ञफलं प्राप्तं भगवद्दर्शनान्मया ।
धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि यस्य मे मुनिपुंगवः ॥ १४ ॥
यज्ञोपसदनं ब्रह्मन् प्राप्तोऽसि मुनिभिः सह । 4 ' आज पूज्य चरणोंके दर्शनसे मैंने यज्ञका फल पा लिया । ब्रह्मन्! आप मुनियोंमें श्रेष्ठ हैं । आपने इतने महर्षियोंके साथ मेरे यज्ञमण्डपमें पदार्पण किया, इससे मैं धन्य हो गया । यह मेरे ऊपर आपका बहुत बड़ा अनुग्रह है ॥ १४३ ॥
द्वादशाहं तु ब्रह्मर्षे दीक्षामाहुर्मनीषिणः ॥ १५ ॥
ततो भागार्थिनो देवान् द्रष्टुमर्हसि कौशिक । ' ब्रह्मर्षे! मनीषी ऋत्विजोंका कहना है कि ' मेरी यज्ञदीक्षाके बारह दिन ही शेष रह गये हैं । अतः कुशिकनन्दन! बारह दिनोंके बाद यहाँ भाग ग्रहण करनेके लिये आये हुए देवताओंका दर्शन कीजियेगा ' ॥ इत्युक्त्वा मुनिशार्दूलं प्रहृष्टवदनस्तदा ॥ १६ ॥
पुनस्तं परिपप्रच्छ प्राञ्जलिः प्रयतो नृपः । मुनिवर विश्वामित्रसे ऐसा कहकर उस समय प्रसन्नमुख हुए जितेन्द्रिय राजा जनकने पुनः उनसे हाथ जोड़कर पूछा- ॥ १६३ ॥
इमौ कुमारौ भद्रं ते देवतुल्यपराक्रमौ ॥ १७ ॥
गजतुल्यगती वीरौ शार्दूलवृषभोपमौ ।
पद्मपत्रविशालाक्षौ खड्गतूणीधनुर्धरौ ।
अश्विनाविव रूपेण समुपस्थितयौवनौ ॥ १८ ॥
यदृच्छयेव गां प्राप्तौ देवलोकादिवामरौ ।
कथं पद्भ्यामिह प्राप्तौ किमर्थं कस्य वा मुने ॥ १ ९ ॥
वरायुधधरौ भूषयन्ताविमं परस्परस्य काकपक्षधरौ ' महामुने पराक्रमी और वीर राजकुमार
वीरौ कस्य पुत्रौ महामुने ।
देशं चन्द्रसूर्याविवाम्बरम् ॥ २० ॥
सदृशौ प्रमाणेङ्गितचेष्टितैः ।
वीरौ श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥ २१ ॥
! आपका कल्याण हो । देवताके समान सुन्दर आयुध धारण करनेवाले ये दोनों जो हाथीके समान मन्दगतिसे चलते हैं, सिंह और साँड़के समान जान पड़ते हैं, प्रफुल्ल कमलदलके समान सुशोभित हैं, तलवार, तरकस और धनुष धारण किये हुए हैं, अपने मनोहर रूपसे अश्विनीकुमारोंको भी लज्जित कर रहे हैं, जिन्होंने अभी - अभी यौवनावस्था में प्रवेश किया है तथा जो स्वेच्छानुसार देवलोकसे उतरकर पृथ्वीपर आये हुए दो देवताओंके समान जान पड़ते हैं, किसके पुत्र हैं? और यहाँ कैसे, किसलिये अथवा किस उद्देश्यसे पैदल ही पधारे हैं? जैसे चन्द्रमा और सूर्य आकाशकी शोभा बढ़ाते हैं, उसी प्रकार ये अपनी उपस्थितिसे इस देशको विभूषित कर रहे हैं । ये दोनों एक - दूसरेसे बहुत मिलते - जुलते हैं । इनके शरीरकी
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बालकाण्डे एकपञ्चाशः सर्गः १६७ ऊँचाई, संकेत और चेष्टाएँ प्रायः एक - सी हैं । मैं । इन दोनों काकपक्षधारी वीरोंका परिचय एवं वृत्तान्त यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ'॥१७–२१ ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा जनकस्य महात्मनः ।
न्यवेदयदमेयात्मा पुत्रौ दशरथस्य तौ ॥ २२ ॥
महात्मा जनकका यह प्रश्न सुनकर अमित आत्मबलसे सम्पन्न विश्वामित्रजीने कहा- ' राजन्! ये दोनों महाराज दशरथके पुत्र हैं ' ॥ २२ ॥
सिद्धाश्रमनिवासं च राक्षसानां वधं तथा ।
तन्त्रागमनमव्यग्रं विशालायाश्च दर्शनम् ॥ २३ ॥
अहल्यादर्शनं चैव गौतमेन समागमम् ।
महाधनुषि जिज्ञासां कर्तुमागमनं तथा ॥ २४ ॥
इसके बाद उन्होंने उन दोनोंके सिद्धाश्रममें निवास, राक्षसोंके वध, बिना किसी घबराहटके मिथिलातक आगमन, विशालापुरीके दर्शन, अहल्या के साक्षात्कार तथा महर्षि गौतमके साथ समागम आदिका विस्तारपूर्वक वर्णन किया । फिर अन्तमें यह भी बताया कि ' ये आपके यहाँ रखे हुए महान् धनुषके सम्बन्धमें कुछ जाननेकी इच्छासे यहाँतक आये हैं ' ॥ २३-२४ ॥
एतत् सर्वं महातेजा जनकाय महात्मने ।
निवेद्य विररामाथ विश्वामित्रो महामुनिः ॥ २५ ॥
महात्मा राजा जनकसे ये सब बातें निवेदन करके । महातेजस्वी महामुनि विश्वामित्र चुप हो गये ॥ २५ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे पञ्चाशः सर्गः ॥ ५० ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें पचासवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५० ॥
एकपञ्चाशः सर्गः शतानन्दके पूछनेपर विश्वामित्रका उन्हें श्रीरामके द्वारा अहल्याके उद्धारका समाचार बताना तथा शतानन्दद्वारा श्रीरामका अभिनन्दन करते हुए विश्वामित्रजीके पूर्वचरित्रका वर्णन
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा विश्वामित्रस्य धीमतः ।
हृष्टरोमा महातेजाः शतानन्दो महातपाः ॥ १ ॥
परम बुद्धिमान् विश्वामित्रजीकी वह बात सुनकर महातेजस्वी महातपस्वी शतानन्दजीके शरीरमें रोमाञ्च हो आया ॥ १ ॥
गौतमस्य सुतो ज्येष्ठस्तपसा द्योतितप्रभः ।
रामसंदर्शनादेव परं विस्मयमागतः ॥ २ ॥
वे गौतमके ज्येष्ठ पुत्र थे । तपस्यासे उनकी कान्ति प्रकाशित हो रही थी । वे श्रीरामचन्द्रजीके दर्शनमात्रसे ही बड़े विस्मित हुए ॥ २ ॥
एतौ निषण्णौ सम्प्रेक्ष्य शतानन्दो नृपात्मजौ ।
सुखासीनौ मुनिश्रेष्ठं विश्वामित्रमथाब्रवीत् ॥ ३ ॥
उन दोनों राजकुमारोंको सुखपूर्वक बैठे देख शतानन्दने मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्रजीसे पूछा- ॥३ ॥
अपि ते मुनिशार्दूल मम माता दर्शिता राजपुत्राय तपोदीर्घमुपागता ॥ ४ ॥
' मुनिप्रवर! मेरी यशस्विनी माता अहल्या बहुत दिनोंसे तपस्या कर रही थीं । क्या आपने राजकुमार श्रीरामको उनका दर्शन कराया? ॥ ४ ॥
अपि रामे महातेजा मम माता यशस्विनी ।
वन्यैरुपाहरत् पूजां पूजार्हे सर्वदेहिनाम् ॥५ ॥
' क्या मेरी महातेजस्विनी एवं यशस्विनी माता अहल्याने वनमें होनेवाले फल - फूल आदिसे समस्त देहधारियोंके लिये पूजनीय श्रीरामचन्द्रजीका पूजन ( आदर - सत्कार ) किया था? ॥ ५ ॥
अपि रामाय कथितं यद् वृत्तं तत् पुरातनम् ।
मम मातुर्महातेजो देवेन दुरनुष्ठितम् ॥ ६ ॥
' महातेजस्वी मुने! क्या आपने श्रीरामसे वह प्राचीन वृत्तान्त कहा था, जो मेरी माताके प्रति देवराज इन्द्रद्वारा किये गये छल - कपट एवं दुराचारद्वारा घटित हुआ था? ॥
अपि कौशिक भद्रं ते गुरुणा मम संगता ।
मम माता मुनिश्रेष्ठ रामसंदर्शनादितः ॥ ७ ॥
' मुनिश्रेष्ठ कौशिक! आपका कल्याण हो । क्या श्रीरामचन्द्रजीके दर्शन आदिके प्रभावसे मेरी माता शापमुक्त हो पिताजीसे जा मिलीं? ॥७ ॥
अपि मे गुरुणा रामः पूजितः कुशिकात्मज ।
इहागतो महातेजाः पूजां प्राप्य महात्मनः ॥ ८ ॥
' कुशिकनन्दन! क्या मेरे पिताने श्रीरामका पूजन किया था? क्या उन महात्माकी पूजा ग्रहण करके ये महातेजस्वी श्रीराम यहाँ पधारे हैं? ॥ ८ ॥
अपि शान्तेन मनसा गुरुर्मे कुशिकात्मज ।
इहागतेन मे पूजितेनाभिवादितः ॥ ९ ॥
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१६८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे ' विश्वामित्रजी! क्या यहाँ आकर मेरे माता - । पिताद्वारा सम्मानित हुए श्रीरामने मेरे पूज्य पिताका शान्त चित्तसे अभिवादन किया था? ' ॥ ९ ॥
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य विश्वामित्रो महामुनिः ।
प्रत्युवाच शतानन्दं वाक्यज्ञो वाक्यकोविदम् ॥ १० ॥
शतानन्दका यह प्रश्न सुनकर बोलनेकी कला जाननेवाले महामुनि विश्वामित्रने बातचीत करनेमें कुशल शतानन्दको इस प्रकार उत्तर दिया- ॥ १० ॥
नातिक्रान्तं मुनिश्रेष्ठ यत्कर्तव्यं कृतं मया ।
संगता मुनिना पत्नी भार्गवेणेव रेणुका ॥ ११ ॥
' मुनिश्रेष्ठ! मैंने कुछ उठा नहीं रखा है । मेरा जो कर्तव्य था, उसे मैंने पूरा किया । महर्षि गौतमसे उनकी पत्नी अहल्या उसी प्रकार जा मिली हैं, जैसे भृगुवंशी जमदग्निसे रेणुका मिली है ' ॥ ११ ॥
वचनं तस्य विश्वामित्रस्य धीमतः ।
शतानन्दो महातेजा रामं वचनमब्रवीत् ॥ १२ ॥
बुद्धिमान् विश्वामित्रकी यह बात सुनकर महातेजस्वी शतानन्दने श्रीरामचन्द्रजीसे यह बात कही - ॥ १२ ॥
स्वागतं ते नरश्रेष्ठ दिष्ट्या प्राप्तोऽसि राघव ।
विश्वामित्रं पुरस्कृत्य महर्षिमपराजितम् ॥ १३ ॥
' नरश्रेष्ठ! आपका स्वागत है । रघुनन्दन! मेरा अहोभाग्य जो आपने किसीसे पराजित न होनेवाले महर्षि विश्वामित्रको आगे करके यहाँतक पधारनेका कष्ट उठाया ॥ १३ ॥
अचिन्त्यकर्मा तपसा ब्रह्मर्षिरमितप्रभः ।
विश्वामित्रो महातेजा वेद्म्येनं परमां गतिम् ॥ १४ ॥
' महर्षि विश्वामित्रके कर्म अचिन्त्य हैं । ये तपस्यासे ब्रह्मर्षिपदको प्राप्त हुए हैं । इनकी कान्ति असीम है और ये महातेजस्वी हैं । मैं इनको जानता हूँ । ये जगत्के परम आश्रय ( हितैषी ) हैं ॥ १४ ॥
नास्ति धन्यतरो राम त्वत्तोऽन्यो भुवि कश्चन ।
गोप्ता कुशिकपुत्रस्ते येन तप्तं महत्तपः ॥ १५ ॥
' श्रीराम! इस पृथ्वीपर आपसे बढ़कर धन्यातिधन्य पुरुष दूसरा कोई नहीं है; क्योंकि कुशिकनन्दन विश्वामित्र आपके रक्षक हैं, जिन्होंने बड़ी भारी तपस्या की है ।
श्रूयतां चाभिधास्यामि कौशिकस्य महात्मनः ।
यथाबलं यथातत्त्वं तन्मे निगदतः शृणु ॥ १६ ॥
' मैं महात्मा कौशिकके बल और स्वरूपका यथार्थ वर्णन करता हूँ । आप ध्यान देकर मुझसे यह सब सुनिये ॥ १६ ॥
राजाऽऽसीदेष धर्मात्मा दीर्घकालमरिंदमः ।
धर्मज्ञः कृतविद्यश्च प्रजानां च हिते रतः ॥ १७ ॥
' ये विश्वामित्र पहले एक धर्मात्मा राजा थे । इन्होंने शत्रुओंके दमनपूर्वक दीर्घकालतक राज्य किया था । ये धर्मज्ञ और विद्वान् होनेके साथ ही प्रजावर्गके हितसाधनमें तत्पर रहते थे ॥ १७ ॥
प्रजापतिसुतस्त्वासीत् कुशो नाम महीपतिः ।
कुशस्य पुत्रो बलवान् कुशनाभः सुधार्मिकः ॥ १८ ॥
' प्राचीनकालमें कुश नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं । वे प्रजापतिके पुत्र थे । कुशके बलवान् पुत्रका
नाम कुशनाभ हुआ । वह बड़ा ही धर्मात्मा था ॥ १८ ॥
कुशनाभसुतस्त्वासीद् गाधिरित्येव विश्रुतः ।
गाधेः पुत्रो महातेजा विश्वामित्रो महामुनिः ॥ १ ९ ॥
' कुशनाभके पुत्र गाधि नामसे विख्यात थे । उन्हीं गाधिके महातेजस्वी पुत्र ये महामुनि विश्वामित्र हैं ॥ १ ९ ॥
विश्वामित्रो महातेजाः पालयामास मेदिनीम् ।
बहुवर्षसहस्त्राणि राजा राज्यमकारयत् ॥ २० ॥
' महातेजस्वी राजा विश्वामित्रने कई हजार वर्षोंतक इस पृथ्वीका पालन तथा राज्यका शासन किया ॥ २० ॥
कदाचित् तु महातेजा योजयित्वा वरूथिनीम् ।
अक्षौहिणीपरिवृतः परिचक्राम मेदिनीम् ॥ २१ ॥
' एक समयकी बात है महातेजस्वी राजा विश्वामित्र सेना एकत्र करके एक अक्षौहिणी सेनाके साथ पृथ्वीपर विचरने लगे ॥२१ ॥
नगराणि च राष्ट्राणि सरितश्च महागिरीन् ।
आश्रमान् क्रमशो राजा विचरन्नाजगाम ह ॥२२ ॥
वसिष्ठस्याश्रमपदं नानापुष्पलताद्गुमम् ।
नानामृगगणाकीर्णं सिद्धचारणसेवितम् ॥ २३ ॥
' वे अनेकानेक नगरों, राष्ट्रों, नदियों, बड़े - बड़े पर्वतों और आश्रमोंमें क्रमशः विचरते हुए महर्षि वसिष्ठके आश्रमपर आ पहुँचे, जो नाना प्रकारके फूलों, लताओं और वृक्षोंसे शोभा पा रहा था । नाना प्रकारके मृग ( वन्यपशु ) वहाँ सब ओर फैले हुए थे तथा सिद्ध और चारण उस आश्रममें निवास करते थे॥२२-२३ ॥
देवदानवगन्धर्वैः किंनरैरुपशोभितम् ।
प्रशान्तहरिणाकीर्ण द्विजसङ्घनिषेवितम् ॥ २४ ॥
ब्रह्मर्षिगणसंकीर्णं देवर्षिगणसेवितम् । ' देवता, दानव, गन्धर्व और किन्नर उसकी शोभा बढ़ाते थे । शान्त मृग वहाँ भरे रहते थे । बहुत - से ब्राह्मणों, ब्रह्मर्षियों और देवर्षियोंके समुदाय उसका सेवन करते थे ॥ २४३ ॥