वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ — पृष्ठ 181–190
वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 181–190
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बालकाण्डे द्विपञ्चाशः सर्गः १६ ९ तपश्चरणसंसिद्धैरग्निकल्पैर्महात्मभिः ॥
सततं संकुलं श्रीमद्ब्रह्मकल्पैर्महात्मभिः ।
अब्भक्षैर्वायुभक्षैश्च शीर्णपर्णाशनैस्तथा ॥
फलमूलाशनैर्दान्तैर्जितदोषैर्जितेन्द्रियैः ऋषिभिर्वालखिल्यैश्च जपहोमपरायणैः ॥ अन्यैर्वैखानसैश्चैव समन्तादुपशोभितम् ।
वसिष्ठस्याश्रमपदं ब्रह्मलोकमिवापरम् ।
ददर्श जयतां श्रेष्ठो विश्वामित्रो महाबलः ॥
२५ ॥ । आश्रममें भरे रहते थे । उनमेंसे कोई जल पीकर रहता था तो कोई हवा पीकर । कितने ही महात्मा फल- मूल २६ ॥ खाकर अथवा सूखे पत्ते चबाकर रहते थे । राग आदि दोषोंको जीतकर मन और इन्द्रियोंपर काबू रखनेवाले २७ ॥ बहुत - से ऋषि जप- होममें लगे रहते थे । वालखिल्य मुनिगण तथा अन्यान्य वैखानस महात्मा सब ओरसे उस आश्रमकी शोभा बढ़ाते थे । इन सब विशेषताओंके २८ ॥ कारण महर्षि वसिष्ठका वह आश्रम दूसरे ब्रह्मलोकके ' तपस्यासे सिद्ध हुए अग्निके समान तेजस्वी समान जान पड़ता था । विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ महाबली महात्मा तथा ब्रह्माके समान महामहिम महात्मा सदा उस | विश्वामित्रने उसका दर्शन किया ' ॥ २५–२८ ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे एकपञ्चाशः सर्गः ॥ ५१ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें इक्यावनवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५१ ॥
द्विपञ्चाशः सर्गः महर्षि वसिष्ठद्वारा विश्वामित्रका सत्कार और कामधेनुको अभीष्ट वस्तुओंकी सृष्टि करनेका आदेश
तं दृष्ट्वा परमप्रीतो विश्वामित्रो महाबलः ।
प्रणतो विनयाद् वीरो वसिष्ठं जपतां वरम् ॥ १ ॥
' जप करनेवालोंमें श्रेष्ठ वसिष्ठका दर्शन करके महाबली वीर विश्वामित्र बड़े प्रसन्न हुए और विनयपूर्वक उन्होंने उनके चरणोंमें प्रणाम किया ॥ १ ॥
स्वागतं तव चेत्युक्तो वसिष्ठेन महात्मना ।
आसनं चास्य भगवान् वसिष्ठो व्यादिदेश ह ॥ २ ॥
' तब महात्मा वसिष्ठने कहा - ' राजन्! तुम्हारा स्वागत है । ' ऐसा कहकर भगवान् वसिष्ठने उन्हें बैठने के लिये आसन दिया ॥ २ ॥
उपविष्टाय च तदा विश्वामित्राय धीमते ।
यथान्यायं मुनिवरः फलमूलमुपाहरत् ॥ ३ ॥
' जब बुद्धिमान् विश्वामित्र आसनपर विराजमान हुए, तब मुनिवर वसिष्ठने उन्हें विधिपूर्वक फल-मूलका उपहार अर्पित किया ॥ ३ ॥
प्रतिगृह्य तु तां पूजां वसिष्ठाद् राजसत्तमः ।
तपोऽग्निहोत्रशिष्येषु कुशलं पर्यपृच्छत ॥ ४ ॥
विश्वामित्रो महातेजा वनस्पतिगणे तदा ।
सर्वत्र कुशलं प्राह वसिष्ठो राजसत्तमम् ॥ ५ ॥
' वसिष्ठजीसे वह आतिथ्य सत्कार ग्रहण करके राजशिरोमणि महातेजस्वी विश्वामित्रने उनके तप, अग्निहोत्र, शिष्यवर्ग और लता - वृक्ष आदिका कुशल -समाचार पूछा । फिर वसिष्ठजीने उन नृपश्रेष्ठसे सबके सकुशल होनेकी बात बतायी ॥४-५ ॥
सुखोपविष्टं राजानं विश्वामित्रं महातपाः ।
पप्रच्छ जपतां श्रेष्ठो वसिष्ठो ब्रह्मणः सुतः ॥ ६ ॥
' फिर जप करनेवालोंमें श्रेष्ठ ब्रह्मकुमार महातपस्वी वसिष्ठने वहाँ सुखपूर्वक बैठे हुए राजा विश्वामित्रसे इस प्रकार पूछा —॥६ ॥
कच्चित्ते कुशलं राजन् कच्चिद् धर्मेण रञ्जयन् ।
प्रजाः पालयसे राजन् राजवृत्तेन धार्मिक ॥७ ॥
' राजन्! तुम सकुशल तो हो न? धर्मात्मा नरेश! क्या तुम धर्मपूर्वक प्रजाको प्रसन्न रखते हुए राजोचित रीति - नीतिसे प्रजावर्गका पालन करते हो? ॥ ७ ॥
कच्चित्ते सम्भृता भृत्याः कच्चित् तिष्ठन्ति शासने ।
कच्चित्ते विजिताः सर्वे रिपवो रिपुसूदन ॥ ८ ॥
' शत्रुसूदन! क्या तुमने अपने भृत्योंका अच्छी तरह भरण - पोषण किया है? क्या वे तुम्हारी आज्ञाके अधीन रहते हैं? क्या तुमने समस्त शत्रुओंपर विजय पा ली है?॥
कच्चिद् बलेषु कोशेषु मित्रेषु च परंतप ।
कुशलं ते नरव्याघ्र पुत्रपौत्रे तथानघ ॥९ ॥
' शत्रुओंको संताप देनेवाले पुरुषसिंह निष्पाप नरेश! क्या तुम्हारी सेना, कोश, मित्रवर्ग तथा पुत्र - पौत्र । आदि सब सकुशल हैं? ' ॥ ९ ॥
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१७० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे
सर्वत्र कुशलं राजा वसिष्ठं प्रत्युदाहरत् ।
विश्वामित्रो महातेजा वसिष्ठं विनयान्वितम् ॥ १० ॥
‘ तब महातेजस्वी राजा विश्वामित्रने विनयशील महर्षि वसिष्ठको उत्तर दिया- ' हाँ भगवन्! मेरे यहाँ सर्वत्र कुशल है? ' ॥ १० ॥
कृत्वा तौ सुचिरं कालं धर्मिष्ठौ ताः कथास्तदा ।
मुदा परमया युक्तौ प्रीयेतां तौ परस्परम् ॥ ११ ॥
' तत्पश्चात् वे दोनों धर्मात्मा पुरुष बड़ी प्रसन्नताके साथ बहुत देरतक परस्पर वार्तालाप करते रहे । उस समय एकका दूसरेके साथ बड़ा प्रेम हो गया ॥ ११ ॥
ततो वसिष्ठो भगवान् कथान्ते रघुनन्दन ।
विश्वामित्रमिदं वाक्यमुवाच प्रहसन्निव ॥ १२ ॥
' रघुनन्दन! बातचीत करनेके पश्चात् भगवान् वसिष्ठने विश्वामित्रसे हँसते हुए - से इस प्रकार कहा- ॥ १२ ॥
आतिथ्यं कर्तुमिच्छामि बलस्यास्य महाबल ।
तव चैवाप्रमेयस्य यथार्हं सम्प्रतीच्छ मे ॥ १३ ॥
' महाबली नरेश! तुम्हारा प्रभाव असीम है । मैं तुम्हारा और तुम्हारी इस सेनाका यथायोग्य आतिथ्य-सत्कार करना चाहता हूँ । तुम मेरे इस अनुरोधको स्वीकार करो ॥ १३ ॥
सत्क्रियां हि भवानेतां प्रतीच्छतु मया कृताम् ।
राजंस्त्वमतिथिश्रेष्ठः पूजनीयः प्रयत्नतः ॥ १४ ॥
' राजन्! तुम अतिथियोंमें श्रेष्ठ हो, इसलिये यत्नपूर्वक तुम्हारा सत्कार करना मेरा कर्तव्य है । अतः मेरे द्वारा किये गये इस सत्कारको तुम ग्रहण करो ' ॥ १४ ॥
एवमुक्तो वसिष्ठेन विश्वामित्रो महामतिः ।
कृतमित्यब्रवीद् राजा पूजावाक्येन मे त्वया ॥ १५ ॥
' वसिष्ठके ऐसा कहनेपर महाबुद्धिमान् राजा विश्वामित्रने कहा — ' मुने! आपके सत्कारपूर्ण वचनोंसे ही मेरा पूर्ण सत्कार हो गया ॥ १५ ॥
फलमूलेन भगवन् विद्यते यत् तवाश्रमे ।
पाद्येनाचमनीयेन भगवद्दर्शनेन च ॥१६ ॥
' भगवन्! आपके आश्रमपर जो विद्यमान हैं, उन फल - मूल, पाद्य और आचमनीय आदि वस्तुओंसे मेरा भलीभाँति आदर - सत्कार हुआ है । सबसे बढ़कर जो आपका दर्शन हुआ, इसीसे मेरी पूजा हो गयी ॥ १६ ॥
सर्वथा च महाप्राज्ञ पूजार्हेण सुपूजितः ।
नमस्तेऽस्तु गमिष्यामि मैत्रेणेक्षस्व चक्षुषा ॥ १७ ॥
' महाज्ञानी महर्षे! आप सर्वथा मेरे पूजनीय हैं तो भी आपने मेरा भलीभाँति पूजन किया । आपको नमस्कार है । अब मैं यहाँसे जाऊँगा । आप मैत्रीपूर्ण दृष्टिसे मेरी ओर देखिये ' ॥ १७ ॥
एवं ब्रुवन्तं राजानं वसिष्ठं पुनरेव हि ।
न्यमन्त्रयत धर्मात्मा पुनः पुनरुदारधीः ॥ १८ ॥
ऐसा कहते हुए राजा विश्वामित्रसे उदारचेता धर्मात्मा वसिष्ठने निमन्त्रण स्वीकार करनेके लिये बारम्बार आग्रह किया ॥१८ ॥
बाढमित्येव गाधेयो वसिष्ठं प्रत्युवाच ह ।
यथाप्रियं भगवतस्तथास्तु मुनिपुंगव ॥ १ ९ ॥
तब गाधिनन्दन विश्वामित्रने उन्हें उत्तर देते हुए कहा- ' बहुत अच्छा । मुझे आपकी आज्ञा स्वीकार है । मुनिप्रवर! आप मेरे पूज्य हैं । आपकी जैसी रुचि हो— आपको जो प्रिय लगे, वही हो ' ॥ १ ९ ॥
एवमुक्तस्तथा तेन वसिष्ठो जपतां वरः ।
आजुहाव ततः प्रीतः कल्माषीं धूतकल्मषाम् ॥ २० ॥
' राजाके ऐसा कहनेपर जप करनेवालोंमें श्रेष्ठ मुनिवर वसिष्ठ बड़े प्रसन्न हुए । उन्होंने अपनी उस चितकबरी होम - धेनुको बुलाया, जिसके पाप ( अथवा मैल ) धुल गये थे ( वह कामधेनु थी ) ॥ २० ॥
एह्येहि शबले क्षिप्रं शृणु चापि वचो मम ।
सबलस्यास्य राजर्षेः कर्तुं व्यवसितोऽस्म्यहम् ।
भोजनेन महार्हेण सत्कारं संविधत्स्व मे ॥ २१ ॥
' ( उसे बुलाकर ऋषिने कहा- ) शबले! शीघ्र आओ, आओ और मेरी यह बात सुनो - मैंने सेनासहित इन राजर्षिका महाराजाओंके योग्य उत्तम भोजन आदि द्वारा आतिथ्य सत्कार करनेका निश्चय किया है । तुम मेरे इस मनोरथको सफल करो ॥ २१ ॥
यस्य यस्य यथाकामं षड्रसेष्वभिपूजितम् ।
तत् सर्वं कामधुग् दिव्ये अभिवर्ष कृते मम ॥ २२ ॥
' षड्स भोजनोंमेंसे जिसको जो - जो पसंद हो, उसके लिये वह सब प्रस्तुत कर दो । दिव्य कामधेनो! आज मेरे कहनेसे इन अतिथियोंके लिये अभीष्ट वस्तुओंकी वर्षा करो ॥ २२ ॥
रसेनान्नेन पानेन लेह्यचोष्येण संयुतम् ।
अन्नानां निचयं सर्वं सृजस्व शबले त्वर ॥ २३ ॥
' शबले! सरस पदार्थ, अन्न, पान, लेह्य ( चटनी
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बालकाण्डे त्रिपञ्चाशः सर्गः १७१ आदि ) और चोष्य ( चूसनेकी वस्तु ) से युक्त भाँति- | वस्तुओंकी सृष्टि कर दो । शीघ्रता करो — विलम्ब न
भाँतिके अन्नोंकी ढेरी लगा दो । सभी आवश्यक । होने पावे ' ॥ २३ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे द्विपञ्चाशः सर्गः ॥ ५२ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें बावनवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५२ ॥
त्रिपञ्चाशः सर्गः कामधेनुकी सहायतासे उत्तम अन्न - पानद्वारा सेनासहित तृप्त हुए विश्वामित्रका वसिष्ठसे उनकी कामधेनुको माँगना
एवमुक्ता वसिष्ठेन शबला शत्रुसूदन ।
विदधे कामधुक् कामान् यस्य यस्येप्सितं यथा ॥ १ ॥
' शत्रुसूदन! महर्षि वसिष्ठके ऐसा कहनेपर चितकबरे रंगकी उस कामधेनुने जिसकी जैसी इच्छा थी, उसके लिये वैसी ही सामग्री जुटा दी ॥ १ ॥
इक्षून् मधूंस्तथा लाजान् मैरेयांश्च वरासवान् ।
पानानि च महार्हाणि भक्ष्यांश्चोच्चावचानपि ॥ २ ॥
' ईख, मधु, लावा, मैरेय, श्रेष्ठ आसव, पानक रस आदि नाना प्रकारके बहुमूल्य भक्ष्य - पदार्थ प्रस्तुत कर दिये ॥ २ ॥
उष्णाढ्यस्यौदनस्यात्र राशयः पर्वतोपमाः ।
मृष्टान्यन्नानि सूपांश्च दधिकुल्यास्तथैव च ॥ ३ ॥
' गरम - गरम भातके पर्वतके सदृश ढेर लग गये । मिष्टान्न ( खीर ) और दाल भी तैयार हो गयी । दूध, दही और घीकी तो नहरें बह चलीं ॥ ३ ॥
नानास्वादुरसानां च खाण्डवानां तथैव च ।
भोजनानि सुपूर्णानि गौडानि च सहस्रशः ॥ ४ ॥
' भाँति - भाँतिके सुस्वादु रस, खाण्डव तथा नाना प्रकारके भोजनोंसे भरी हुई चाँदीकी सहस्रों थालियाँ सज गयीं ॥ ४ ॥
सर्वमासीत् सुसंतुष्टं हृष्टपुष्टजनायुतम् ।
विश्वामित्रबलं राम वसिष्ठेन सुतर्पितम् ॥ ५ ॥
‘ श्रीराम! महर्षि वसिष्ठने विश्वामित्रजीकी सारी सेनाके लोगोंको भलीभाँति तृप्त किया । उस सेनामें बहुत - से हृष्ट - पुष्ट सैनिक थे । उन सबको वह दिव्य भोजन पाकर बड़ा संतोष हुआ ॥५ ॥
विश्वामित्रो हि राजर्षिर्हृष्टपुष्टस्तदाभवत् ।
सान्तःपुरवरो राजा सन्ब्राह्मणपुरोहितः ॥ ६॥
‘ राजर्षि विश्वामित्र भी उस समय अन्तःपुरकी रानियों, ब्राह्मणों और पुरोहितोंके साथ बहुत ही हृष्ट-और उनका देनेसे अस्वीकार करना पुष्ट हो गये ॥६ ॥
सामात्यो मन्त्रिसहितः सभृत्यः पूजितस्तदा ।
युक्तः परमहर्षेण वसिष्ठमिदमब्रवीत् ॥ ७ ॥
' अमात्य, मन्त्री और भृत्योंसहित पूजित हो वे बहुत प्रसन्न हुए और वसिष्ठजीसे इस प्रकार बोले-पूजितोऽहं त्वया ब्रह्मन् पूजार्हेण सुसत्कृतः । श्रूयतामभिधास्यामि वाक्यं वाक्यविशारद ॥ ८ ॥
' ब्रह्मन्! आप स्वयं मेरे पूजनीय हैं तो भी आपने मेरा पूजन किया, भलीभाँति स्वागत - सत्कार किया । बातचीत करनेमें कुशल महर्षे! अब मैं एक बात कहता हूँ, उसे सुनिये ॥ ८ ॥
गवां शतसहस्त्रेण दीयतां शबला मम ।
रत्नं हि भगवन्नेतद् रत्नहारी च पार्थिवः॥९ ॥
तस्मान्मे शबलां देहि ममैषा धर्मतो द्विज । ' भगवन्! आप मुझसे एक लाख गौएँ लेकर यह चितकबरी गाय मुझे दे दीजिये; क्योंकि यह गौ रत्नरूप है और रत्न लेनेका अधिकारी राजा होता है । ब्रह्मन्! मेरे इस कथनपर ध्यान देकर मुझे यह शबला गौ दे दीजिये; क्योंकि यह धर्मतः मेरी ही वस्तु है'॥९ ३ ॥ एवमुक्तस्तु भगवान् वसिष्ठो मुनिपुंगवः ॥ १० ॥
विश्वामित्रेण धर्मात्मा प्रत्युवाच महीपतिम् । ' विश्वामित्रके ऐसा कहनेपर धर्मात्मा मुनिवर भगवान् वसिष्ठ राजाको उत्तर देते हुए बोले— ॥ १०३ ॥
नाहं शतसहस्त्रेण नापि कोटिशतैर्गवाम् ॥११ ॥
। राजन् दास्यामि शबलां राशिभी रजतस्य वा ।
न परित्यागमर्हेयं मत्सकाशादरिंदम ॥१२ ॥
' शत्रुओंका दमन करनेवाले नरेश्वर! मैं एक लाख या सौ करोड़ अथवा चाँदीके ढेर लेकर भी बदलेमें इस शबला गौको नहीं दूँगा । यह मेरे पाससे । अलग होने योग्य नहीं है ॥१२ ॥
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१७२ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे
शाश्वती शबला मह्यं कीर्तिरात्मवतो यथा ।
अस्यां हव्यं च कव्यं च प्राणयात्रा तथैव च ॥ १३ ॥
' जैसे मनस्वी पुरुषकी अक्षय कीर्ति कभी उससे अलग नहीं रह सकती, उसी प्रकार यह सदा मेरे साथ सम्बन्ध रखनेवाली शबला गौ मुझसे पृथक् नहीं रह सकती । मेरा हव्य - कव्य और जीवन - निर्वाह इसीपर निर्भर है ॥१३ ॥
आयत्तमग्निहोत्रं च स्वाहाकारवषट्कारौ ' मेरे अग्निहोत्र, और भाँति - भाँतिकी अधीन हैं ॥ १४ ॥
आयत्तमत्र राजर्षे सर्वस्वमेतत् सत्येन कारणैर्बहुभी राजन्
बलिर्होमस्तथैव च ।
विद्याश्च विविधास्तथा ॥ १४ ॥
बलि, होम, स्वाहा, वषट्कार विद्याएँ इस कामधेनुके ही
सर्वमेतन्न संशयः ।
मम तुष्टिकरी तथा ॥ १५ ॥
न दास्ये शबलां तव । ' राजर्षे! मेरा यह सब कुछ इस गौके ही अधीन है, इसमें संशय नहीं है । मैं सच कहता हूँ- यह गौ ही मेरा सर्वस्व है और यही मुझे सब प्रकारसे संतुष्ट करनेवाली है । राजन्! बहुत - से ऐसे कारण हैं, जिनसे बाध्य होकर मैं यह शबला गौ आपको नहीं दे सकता ' ॥ १५३ ॥
वसिष्ठेनैवमुक्तस्तु विश्वामित्रोऽब्रवीत् तदा ॥ १६ ॥
संरब्धतरमत्यर्थं वाक्यं वाक्यविशारदः । ' वसिष्ठजीके ऐसा कहने पर बोलने में कुशल विश्वामित्र अत्यन्त क्रोधपूर्वक इस प्रकार बोले— ॥ १६३ ॥
हैरण्यकक्षग्रैवेयान् सुवर्णाङ्कुशभूषितान् ॥ १७ ॥
ददामि कुञ्जराणां ते सहस्त्राणि चतुर्दश । ' मुने! मैं आपको चौदह हजार ऐसे हाथी दे रहा हूँ, जिनके कसनेवाले रस्से, गलेके आभूषण और अंकुश भी सोनेके बने होंगे और उन सबसे वे हाथी विभूषित होंगे ॥ १७३ ॥
हैरण्यानां रथानां च श्वेताश्वानां चतुर्युजाम् ॥ १८ ॥
ददामि ते शतान्यष्टौ किंकिणीकविभूषितान् ।
हयानां देशजातानां कुलजानां महौजसाम् ।
सहस्रमेकं दश च ददामि तव सुव्रत ॥१ ९ ॥
नानावर्णविभक्तानां वयःस्थानां तथैव च ।
ददाम्येकां गवां कोटिं शबला दीयतां मम ॥ २० ॥
' उत्तम व्रतका पालन करनेवाले मुनीश्वर! इनके सिवा मैं आठ सौ सुवर्णमय रथ प्रदान करूँगा; जिनमें शोभाके लिये सोनेके घुँघुरू लगे होंगे और हर एक रथमें चार-चार सफेद रंगके घोड़े जुते हुए होंगे तथा अच्छी जाति और उत्तम देशमें उत्पन्न महातेजस्वी ग्यारह हजार घोड़े भी आपकी सेवामें अर्पित करूँगा । इतना ही नहीं, नाना प्रकारके रंगवाली नयी अवस्थाकी एक करोड़ गौएँ भी दूँगा, परंतु यह शबला गौ मुझे दे दीजिये ॥ १८-२० ॥
यावदिच्छसि रत्नानि हिरण्यं वा द्विजोत्तम ।
तावद् ददामि ते सर्वं दीयतां शबला मम ॥ २१ ॥
' द्विजश्रेष्ठ! इनके अतिरिक्त भी आप जितने रत्न या सुवर्ण लेना चाहें, वह सब आपको देनेके लिये मैं तैयार हूँ; किंतु यह चितकबरी गाय मुझे दे दीजिये ' ॥ २१ ॥
एवमुक्तस्तु भगवान् विश्वामित्रेण धीमता ।
न दास्यामीति शबलां प्राह राजन् कथंचन ॥ २२ ॥
' बुद्धिमान् विश्वामित्रके ऐसा कहनेपर भगवान् वसिष्ठ बोले- ' राजन्! मैं यह चितकबरी गाय तुम्हें किसी तरह भी नहीं दूँगा ॥ २२ ॥
एतदेव हि मे रत्नमेतदेव हि मे धनम् ।
एतदेव हि सर्वस्वमेतदेव हि जीवितम् ॥ २३ ॥
' यही मेरा रत्न है, यही मेरा धन है, यही मेरा सर्वस्व है और यही मेरा जीवन है ॥ २३ ॥
दर्शश्च पौर्णमासश्च यज्ञाश्चैवाप्तदक्षिणाः ।
एतदेव हि मे राजन् विविधाश्च क्रियास्तथा ॥ २४ ॥
' राजन्! मेरे दर्श, पौर्णमास, प्रचुर दक्षिणावाले यज्ञ तथा भाँति - भाँतिके पुण्यकर्म - यह गौ ही है । इसीपर ही मेरा सब कुछ निर्भर है ॥ २४ ॥
अतोमूलाः क्रियाः सर्वा मम राजन् न संशयः ।
बहुना किं प्रलापेन न दास्ये कामदोहिनीम् ॥ २५ ॥
' नरेश्वर! मेरे सारे शुभ कर्मोंका मूल यही है,
इसमें संशय नहीं है । बहुत व्यर्थ बात करनेसे क्या लाभ ।
मैं इस कामधेनुको कदापि नहीं दूंगा ' ॥ २५ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे त्रिपञ्चाशः सर्गः ॥ ५३ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें तिरपनवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५३ ॥
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बालकाण्डे चतुःपञ्चाशः सर्गः १७३ चतुःपञ्चाशः सर्गः विश्वामित्रका वसिष्ठजीकी गौको बलपूर्वक ले जाना, गौका दुःखी होकर वसिष्ठजीसे इसका कारण पूछना और उनकी आज्ञासे शक, यवन, पह्नव आदि वीरोंकी सृष्टि करके उनके द्वारा विश्वामित्रजीकी सेनाका संहार करना
कामधेनुं वसिष्ठोऽपि यदा न त्यजते मुनिः ।
तदास्य शबलां राम विश्वामित्रो ऽन्वकर्षत ॥ १ ॥
' श्रीराम! जब वसिष्ठ मुनि किसी तरह भी उस कामधेनु गौको देनेके लिये तैयार न हुए, तब राजा विश्वामित्र उस चितकबरे रंगकी धेनुको बलपूर्वक घसीट ले चले ॥१ ॥
नीयमाना तु शबला राम राज्ञा महात्मना ।
दुःखिता चिन्तयामास रुदन्ती शोककर्शिता ॥ २ ॥
' रघुनन्दन! महामनस्वी राजा विश्वामित्रके द्वारा इस प्रकार ले जायी जाती हुई वह गौ शोकाकुल हो मन - ही - मन रो पड़ी और अत्यन्त दुःखित हो विचार करने लगी- ॥ २ ॥
परित्यक्ता वसिष्ठेन किमहं सुमहात्मना ।
याहं राजभृतैर्दीना हियेय भृशदुःखिता ॥ ३ ॥
' अहो! क्या महात्मा वसिष्ठने मुझे त्याग दिया है, जो ये राजाके सिपाही मुझ दीन और अत्यन्त दुःखिया गौको इस तरह बलपूर्वक लिये जा रहे हैं? ॥ ३ ॥
किं मयापकृतं तस्य महर्षेर्भावितात्मनः ।
यन्मामनागसं दृष्ट्वा भक्तां त्यजति धार्मिकः ॥ ४ ॥
' पवित्र अन्तःकरणवाले उन महर्षिका मैंने क्या अपराध किया है कि वे धर्मात्मा मुनि मुझे निरपराध और अपना भक्त जानकर भी त्याग रहे हैं? ' ॥ ४ ॥
इति संचिन्तयित्वा तु निःश्वस्य च पुनः पुनः ।
जगाम वेगेन तदा वसिष्ठं परमौजसम् ॥ ५ ॥
निर्धूय तांस्तदा भृत्यान् शतशः शत्रुसूदन । ‘ शत्रुसूदन! यह सोचकर वह गौ बारम्बार लंबी साँस लेने लगी और राजाके उन सैकड़ों सेवकोंको झटककर उस समय महातेजस्वी वसिष्ठ मुनिके पास बड़े वेगसे जा पहुँची ॥५ जगामानिलवेगेन पादमूलं महात्मनः ॥ ६ ॥
शबला सा रुदन्ती च क्रोशन्ती चेदमब्रवीत् ।
वसिष्ठस्याग्रतः स्थित्वा रुदन्ती मेघनिःस्वना ॥ ७ ॥
' वह शबला गौ वायुके समान वेगसे उन महात्माके चरणोंके समीप गयी और उनके सामने खड़ी हो मेघके
समान गम्भीर स्वरसे रोती- चीत्कार करती हुई उनसे ।
इस प्रकार बोली- ॥६-७ ॥
भगवन् किं परित्यक्ता त्वयाहं ब्रह्मणः सुत ।
यस्माद् राजभटा मां हि नयन्ते त्वत्सकाशतः ॥ ८ ॥
' भगवन्! ब्रह्मकुमार! क्या आपने मुझे त्याग दिया, जो ये राजाके सैनिक मुझे आपके पाससे दूर लिये जा रहे हैं? ' ॥ ८ ॥
एवमुक्तस्तु ब्रह्मर्षिरिदं वचनमब्रवीत् ।
शोकसंतप्तहृदयां स्वसारमिव दुःखिताम् ॥ ९ ॥
' उसके ऐसा कहनेपर ब्रह्मर्षि वसिष्ठ शोकसे संतप्त हृदयवाली दुःखिया बहिनके समान उस गौसे इस प्रकार बोले - ॥९ ॥
न त्वां त्यजामि शबले नापि मेऽपकृतं त्वया ।
एष त्वां नयते राजा बलान्मत्तो महाबलः ॥ १० ॥
' शबले! मैं तुम्हारा त्याग नहीं करता । तुमने मेरा कोई अपराध नहीं किया है । ये महाबली राजा अपने बलसे मतवाले होकर तुमको मुझसे छीनकर ले जा रहे हैं ॥ १० ॥
नहि तुल्यं बलं मह्यं राजा त्वद्य विशेषतः ।
बली राजा क्षत्रियश्च पृथिव्याः पतिरेव च ॥ ११ ॥
' मेरा बल इनके समान नहीं है । विशेषतः आजकल ये राजाके पदपर प्रतिष्ठित हैं । राजा, क्षत्रिय तथा इस पृथ्वीके पालक होनेके कारण ये बलवान् हैं ॥ ११ ॥
इयमक्षौहिणी पूर्णा गजवाजिरथाकुला ।
हस्तिध्वजसमाकीर्णा तेनासौ बलवत्तरः ॥ १२ ॥
' इनके पास हाथी, घोड़े और रथोंसे भरी हुई यह अक्षौहिणी सेना है, जिसमें हाथियोंके हौदोंपर लगे हुए ध्वज सब ओर फहरा रहे हैं । इस सेनाके कारण भी ये मुझसे प्रबल हैं ' ॥ १२ ॥
एवमुक्ता वसिष्ठेन प्रत्युवाच विनीतवत् ।
वचनं वचनज्ञा सा ब्रह्मर्षिमतुलप्रभम् ॥ १३ ॥
' वसिष्ठजीके ऐसा कहनेपर बातचीतके मर्मको समझनेवाली उस कामधेनुने उन अनुपम तेजस्वी ब्रह्मर्षिसे यह विनययुक्त बात कही —॥१३ ॥
न बलं क्षत्रियस्याहुर्ब्राह्मणा बलवत्तराः ।
ब्रह्मन् ब्रह्मबलं दिव्यं क्षात्राच्च बलवत्तरम् ॥१४ ॥
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१७४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे “ ब्रह्मन्! क्षत्रियका बल कोई बल नहीं है । ब्राह्मण ही क्षत्रिय आदिसे अधिक बलवान् होते हैं । ब्राह्मणका बल दिव्य है । वह क्षत्रिय - बलसे अधिक प्रबल होता है ॥
अप्रमेयं बलं तुभ्यं न त्वया बलवत्तरः ।
विश्वामित्रो महावीर्यस्तेजस्तव दुरासदम् ॥ १५ ॥
" आपका बल अप्रमेय है । महापराक्रमी विश्वामित्र आपसे अधिक बलवान् नहीं हैं । आपका तेज दुर्धर्ष है ॥ १५ ॥
नियुङ्क्ष्व मां महातेजस्त्वं ब्रह्मबलसम्भृताम् ।
तस्य दर्पं बलं यत्नं नाशयामि दुरात्मनः ॥ १६ ॥
“ महातेजस्वी महर्षे! मैं आपके ब्रह्मबलसे परिपुष्ट हुई हूँ । अतः आप केवल मुझे आज्ञा दे दीजिये । । मैं इस दुरात्मा राजाके बल, प्रयत्न और अभिमानको अभी चूर्ण किये देती हूँ ' ॥ १६ ॥
इत्युक्तस्तु तया राम वसिष्ठस्तु महायशाः ।
सृजस्वेति तदोवाच बलं परबलार्दनम् ॥ १७ ॥
' श्रीराम! कामधेनुके ऐसा कहनेपर महायशस्वी वसिष्ठने कहा — ' इस शत्रु - सेनाको नष्ट करनेवाले सैनिकोंकी सृष्टि करो ' ॥ १७ ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा सुरभिः सासृजत् तदा ।
तस्या हुंभारवोत्सृष्टाः पह्नवाः शतशो नृप ॥ १८ ॥
' राजकुमार! उनका वह आदेश सुनकर उस गौने उस समय वैसा ही किया । उसके हुंकार करते ही सैकड़ों पह्नव जातिके वीर पैदा हो गये ॥ १८ ॥
नाशयन्ति बलं सर्वं विश्वामित्रस्य पश्यतः ।
स राजा परमक्रुद्धः क्रोधविस्फारितेक्षणः ॥ १ ९ ॥
' वे सब विश्वामित्रके देखते - देखते उनकी सारी । सेनाका नाश करने लगे । इससे राजा विश्वामित्रको बड़ा क्रोध हुआ । वे रोषसे आँखें फाड़ - फाड़कर देखने लगे ॥ १ ९ ॥
पह्नवान् नाशयामास शस्त्रैरुच्चावचैरपि ।
विश्वामित्रार्दितान् दृष्ट्वा पह्नवान् शतशस्तदा ॥ २० ॥
भूय एवासृजद् घोरान् शकान् यवनमिश्रितान् ।
तैरासीत् संवृता भूमिः शकैर्यवनमिश्रितैः ॥ २१ ॥
' उन्होंने छोटे - बड़े कई तरहके अस्त्रोंका प्रयोग करके उन पह्लवोंका संहार कर डाला । विश्वामित्रद्वारा उन सैकड़ों पह्लवोंको पीड़ित एवं नष्ट हुआ देख उस समय उस शबला गौने पुनः यवनमिश्रित शक जातिके भयंकर वीरोंको उत्पन्न किया । उन यवनमिश्रित शकोंसे वहाँकी सारी पृथ्वी भर गयी ॥ २०-२१ ॥ प्रभावद्भिर्महावीर्यैर्हेमकिंजल्कसंनिभैः तीक्ष्णासिपट्टिशधरैर्हेमवर्णाम्बरावृतैः ॥ २२ ॥
निर्दग्धं तद्बलं सर्वं प्रदीप्तैरिव पावकैः ।
ततोऽस्त्राणि महातेजा विश्वामित्रो मुमोच ह ।
तैस्ते यवनकाम्बोजा बर्बराश्चाकुलीकृताः ॥ २३ ॥
' वे वीर महापराक्रमी और तेजस्वी थे । उनके शरीरकी कान्ति सुवर्ण तथा केसरके समान थी । वे सुनहरे वस्त्रोंसे अपने शरीरको ढँके हुए थे । उन्होंने हाथोंमें तीखे खड्ग और पट्टिश ले रखे थे । प्रज्वलित अग्रिके समान उद्भासित होनेवाले उन वीरोंने विश्वामित्रकी सारी सेनाको भस्म करना आरम्भ किया । तब महातेजस्वी विश्वामित्रने उनपर बहुत - से अस्त्र छोड़े । उन अस्त्रोंकी चोट खाकर वे यवन, काम्बोज और बर्बर जातिके । योद्धा व्याकुल हो उठे ' ॥ २२-२३ ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे चतुःपञ्चाशः सर्गः ॥ ५४ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें चौवनवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५४ ॥
पञ्चपञ्चाशः सर्गः अपने सौ पुत्रों और सारी सेनाके नष्ट हो जानेपर विश्वामित्रका तपस्या करके महादेवजीसे दिव्यास्त्र पाना तथा उनका वसिष्ठके आश्रमपर प्रयोग करना एवं वसिष्ठजीका ब्रह्मदण्ड लेकर उनके सामने खड़ा होना ततस्तानाकुलान् दृष्ट्वा विश्वामित्रास्त्रमोहितान् । तस्या हुंकारतो जाताः काम्बोजा रविसंनिभाः । वसिष्ठश्चोदयामास कामधुक् सृज योगतः ॥ १ ॥ ऊधसश्चाथ सम्भूता बर्बराः शस्त्रपाणयः ॥ २ ॥
' विश्वामित्रके अस्त्रोंसे घायल होकर उन्हें व्याकुल ' तब उस गौने फिर हुंकार किया । उसके हुंकारसे हुआ देख वसिष्ठजीने फिर आज्ञा दी - ' कामधेनो! अब सूर्यके समान तेजस्वी काम्बोज उत्पन्न हुए । थनसे योगबलसे दूसरे सैनिकोंकी सृष्टि करो ' ॥ १ ॥ शस्त्रधारी बर्बर प्रकट हुए ॥ २ ॥
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बालकाण्डे पञ्चपञ्चाशः सर्गः १७५
योनिदेशाच्च यवनाः शकृद्देशाच्छकाः स्मृताः ।
रोमकूपेषु म्लेच्छाश्च हारीताः सकिरातकाः ॥ ३ ॥
" योनिदेशसे यवन और शकृद्देश ( गोबरके स्थान ) से शक उत्पन्न हुए । रोमकूपोंसे म्लेच्छ, हारीत और किरात प्रकट हुए ॥ ३ ॥
तैस्तन्निषूदितं सर्वं विश्वामित्रस्य तत्क्षणात् ।
सपदातिगजं साश्वं सरथं रघुनन्दन ॥ ४ ॥
‘ रघुनन्दन! उन सब वीरोंने पैदल, हाथी, घोड़े और रथसहित विश्वामित्रकी सारी सेनाका तत्काल संहार कर डाला ॥ ४ ॥
दृष्ट्वा निषूदितं सैन्यं वसिष्ठेन महात्मना ।
विश्वामित्रसुतानां तु शतं नानाविधायुधम् ॥ ५ ॥
अभ्यधावत् सुसंक्रुद्धं वसिष्ठं जपतां वरम् ।
हुंकारेणैव तान् सर्वान् निर्ददाह महानृषिः ॥ ६ ॥
' महात्मा वसिष्ठद्वारा अपनी सेनाका संहार हुआ देख विश्वामित्रके सौ पुत्र अत्यन्त क्रोधमें भर गये और नाना प्रकारके अस्त्र - शस्त्र लेकर जप करनेवालोंमें श्रेष्ठ वसिष्ठमुनिपर टूट पड़े । तब उन महर्षिने हुंकारमात्रसे उन सबको जलाकर भस्म कर डाला ॥ ५-६ ॥
ते साश्वरथपादाता वसिष्ठेन महात्मना ।
भस्मीकृता मुहूर्तेन विश्वामित्रसुतास्तथा ॥ ७ ॥
' महात्मा वसिष्ठद्वारा विश्वामित्रके वे सभी पुत्र दो ही घड़ीमें घोड़े, रथ और पैदल सैनिकोंसहित जलाकर भस्म कर डाले गये ॥७ ॥
दृष्ट्वा विनाशितान् सर्वान् बलं च सुमहायशाः ।
सव्रीडं चिन्तयाविष्टो विश्वामित्रोऽभवत् तदा ॥ ८ ॥
' अपने समस्त पुत्रों तथा सारी सेनाका विनाश हुआ देख महायशस्वी विश्वामित्र लज्जित हो बड़ी चिन्तामें पड़ गये ॥ ८ ॥
समुद्र इव निर्वेगो भग्नद्रंष्ट्र इवोरगः ।
उपरक्त इवादित्यः सद्यो निष्प्रभतां गतः ॥ ९ ॥
' समुद्रके समान उनका सारा वेग शान्त हो गया । जिसके दाँत तोड़ लिये गये हों उस सर्पके समान तथा राहुग्रस्त सूर्यकी भाँति वे तत्काल ही निस्तेज हो गये ॥
हतपुत्रबलो दीनो लूनपक्ष इव द्विजः ।
हतसर्वबलोत्साहो निर्वेदं समपद्यत ॥१० ॥
' पुत्र और सेना दोनोंके मारे जानेसे वे पंख कटे हुए पक्षीके समान दीन हो गये । उनका सारा बल और उत्साह नष्ट हो गया । वे मन - ही - मन बहुत खिन्न हो उठे ॥ १० ॥
स पुत्रमेकं राज्याय पालयेति नियुज्य च ।
पृथिवीं वनमेवाभ्यपद्यत ॥ ११ ॥
' उनके एक ही पुत्र बचा था, उसको उन्होंने राजाके पदपर अभिषिक्त करके राज्यकी रक्षाके लिये नियुक्त कर दिया और क्षत्रिय धर्मके अनुसार पृथ्वीके पालनकी आज्ञा देकर वे वनमें चले गये ॥ ११ ॥
स गत्वा हिमवत्पार्श्वे किंनरोरगसेवितम् ।
महादेवप्रसादार्थं तपस्तेपे महातपाः ॥ १२ ॥
' हिमालयके पार्श्वभागमें, जो किन्नरों और नागों से सेवित प्रदेश है, वहाँ जाकर महादेवजीकी प्रसन्नताके लिये महान् तपस्याका आश्रय ले वे तपमें ही संलग्न हो गये ॥ १२ ॥
केनचित् त्वथ कालेन देवेशो वृषभध्वजः ।
दर्शयामास वरदो विश्वामित्रं महामुनिम् ॥ १३ ॥
' कुछ कालके पश्चात् वरदायक देवेश्वर भगवान् वृषभध्वज ( शिव ) ने महामुनि विश्वामित्रको दर्शन दिया और कहा- ॥ १३ ॥
किमर्थं तप्यसे राजन् ब्रूहि यत् ते विवक्षितम् ।
वरदोऽस्मि वरो यस्ते कांक्षितः सोऽभिधीयताम् ॥१४ ॥
" राजन्! किसलिये तप करते हो? बताओ क्या
कहना चाहते हो? मैं तुम्हें वर देनेके लिये आया हूँ ।
तुम्हें जो वर पाना अभीष्ट हो, उसे कहो ' ॥ १४ ॥
एवमुक्तस्तु देवेन विश्वामित्रो महातपाः ।
प्रणिपत्य महादेवं विश्वामित्रोऽब्रवीदिदम् ॥ १५ ॥
' महादेवजीके ऐसा कहनेपर महातपस्वी विश्वामित्रने उन्हें प्रणाम करके इस प्रकार कहा – ॥ १५ ॥
यदि तुष्टो महादेव धनुर्वेदो ममानघ ।
सांगोपांगोपनिषदः सरहस्यः प्रदीयताम् ॥ १६ ॥
“ निष्पाप महादेव! यदि आप संतुष्ट हों तो अंग, उपांग, उपनिषद् और रहस्योंसहित धनुर्वेद मुझे प्रदान कीजिये ॥
यानि देवेषु चास्त्राणि दानवेषु महर्षिषु ।
गन्धर्वयक्षरक्षः सु प्रतिभान्तु ममानघ ॥ १७ ॥
तव प्रसादाद् भवतु देवदेव ममेप्सितम् । " अनघ! देवताओं, दानवों, महर्षियों, गन्धर्वों, यक्षों तथा राक्षसोंके पास जो - जो अस्त्र हों, वे सब आपकी कृपासे मेरे हृदयमें स्फुरित हो जायँ । देवदेव! यही मेरा मनोरथ है, जो मुझे प्राप्त होना चाहिये ' ॥ १७३ ॥
एवमस्त्विति देवेशो वाक्यमुक्त्वा गतस्तदा ॥ १८ ॥
प्राप्य चास्त्राणि देवेशाद् विश्वामित्रो महाबलः ।
दर्पेण महता युक्तो दर्पपूर्णोऽभवत् तदा ॥ १ ९ ॥
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१७६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे ' तब ' एवमस्तु ' कहकर देवेश्वर भगवान् शङ्कर वहाँसे चले गये । देवेश्वर महादेवसे वे अस्त्र पाकर महाबली विश्वामित्रको बड़ा घमंड हो गया । वे अभिमानमें भर गये ॥ १८-१९ ॥
विवर्धमानो वीर्येण समुद्र इव पर्वणि ।
हतं मेने तदा राम वसिष्ठमृषिसत्तमम् ॥ २० ॥
' जैसे पूर्णिमाको समुद्र बढ़ने लगता है, उसी प्रकार वे पराक्रमद्वारा अपनेको बहुत बढ़ा - चढ़ा मानने लगे । श्रीराम! उन्होंने मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठको उस समय मरा हुआ ही समझा ॥ २० ॥
ततो गत्वाऽऽश्रमपदं मुमोचास्त्राणि पार्थिवः ।
यैस्तत् तपोवनं नाम निर्दग्धं चास्त्रतेजसा ॥ २१ ॥
फिर तो वे पृथ्वीपति विश्वामित्र वसिष्ठके आश्रमपर जाकर भाँति - भाँतिके अस्त्रोंका प्रयोग करने लगे । जिनके तेजसे वह सारा तपोवन दग्ध होने लगा ॥ २१ ॥
उदीर्यमाणमस्त्रं तद् विश्वामित्रस्य धीमतः ।
दृष्ट्वा विप्रद्रुता भीता मुनयः शतशो दिशः ॥ २२ ॥
' बुद्धिमान् विश्वामित्रके उस बढ़ते हुए अस्त्र-तेजको देखकर वहाँ रहनेवाले सैकड़ों मुनि भयभीत हो सम्पूर्ण दिशाओंमें भाग चले ॥ २२ ॥
वसिष्ठस्य च ये शिष्या ये च वै मृगपक्षिणः ।
विद्रवन्ति भयाद् भीता नानादिग्भ्यः सहस्रशः ॥ २३ ॥
' वसिष्ठजीके जो शिष्य थे, जो वहाँके पशु और पक्षी थे, वे सहस्रों प्राणी भयभीत हो नाना दिशाओंकी ओर भाग गये ॥ २३ ॥
। वसिष्ठस्याश्रमपदं शून्यमासीन्महात्मनः ।
मुहूर्तमिव निःशब्दमासीदीरिणसंनिभम् ॥२४ ॥
' महात्मा वसिष्ठका वह आश्रम सूना हो गया । दो ही घड़ीमें ऊसर भूमिके समान उस स्थानपर सन्नाटा छा गया ॥ २४ ॥
वदतो वै वसिष्ठस्य मा भैरिति मुहुर्मुहुः ।
नाशयाम्यद्य गाधेयं नीहारमिव भास्करः ॥ २५ ॥
' वसिष्ठजी बार - बार कहने लगे - ' डरो मत, मैं अभी इस गाधिपुत्रको नष्ट किये देता हूँ । ठीक उसी तरह, जैसे सूर्य कुहासेको मिटा देता है ' ॥ २५ ॥
एवमुक्त्वा महातेजा वसिष्ठो जपतां वरः ।
विश्वामित्रं तदा वाक्यं सरोषमिदमब्रवीत् ॥ २६ ॥
' जपनेवालोंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी वसिष्ठ ऐसा
कहकर उस समय विश्वामित्रजीसे रोषपूर्वक बोले-आश्रमं चिरसंवृद्धं यद् विनाशितवानसि ।
दुराचारो हि यन्मूढस्तस्मात् त्वं न भविष्यसि ॥ २७ ॥
64 ' अरे! तूने चिरकालसे पाले - पोसे तथा हरे - भरे किये हुए इस आश्रमको नष्ट कर दिया - उजाड़ डाला, इसलिये तू दुराचारी और विवेकशून्य है और इस पापके कारण तू कुशलसे नहीं रह सकता ' ॥२७ ॥
इत्युक्त्वा परमक्रुद्धो दण्डमुद्यम्य सत्वरः ।
विधूम इव कालाग्निर्यमदण्डमिवापरम् ॥ २८ ॥
' ऐसा कहकर वे अत्यन्त क्रुद्ध हो धूमरहित कालाग्निके समान उद्दीप्त हो उठे और दूसरे यमदण्डके समान भयंकर डंडा हाथमें उठाकर तुरंत उनका सामना करनेके लिये तैयार हो गये ' ॥ २८ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे पञ्चपञ्चाशः सर्गः ॥ ५५ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें पचपनवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५५ ॥
षट्पञ्चाशः सर्गः विश्वामित्रद्वारा वसिष्ठजीपर नाना प्रकारके दिव्यास्त्रोंका प्रयोग और वसिष्ठद्वारा ब्रह्मदण्डसे ही उनका शमन एवं विश्वामित्रका ब्राह्मणत्वकी प्राप्तिके लिये तप
एवमुक्तो वसिष्ठेन विश्वामित्रो महाबलः ।
आग्नेयमस्त्रमुद्दिश्य तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् ॥ १ ॥
वसिष्ठजीके ऐसा कहनेपर महाबली विश्वामित्र आग्नेयास्त्र लेकर बोले - ' अरे खड़ा रह, खड़ा रह ' ॥ १ ॥
ब्रह्मदण्डं समुद्यम्य कालदण्डमिवापरम् ।
वसिष्ठो भगवान् क्रोधादिदं वचनमब्रवीत् ॥ २ ॥
करनेका निश्चय उस समय द्वितीय कालदण्डके समान ब्रह्मदण्डको उठाकर भगवान् वसिष्ठने क्रोधपूर्वक इस प्रकार कहा- २ ॥
क्षत्रबन्धो स्थितोऽस्म्येष यद् बलं तद् विदर्शय ।
नाशयाम्यद्य ते दर्पं शस्त्रस्य तव गाधिज ॥ ३ ॥
' क्षत्रियाधम! ले, यह मैं खड़ा हूँ । तेरे पास जो
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बालकाण्डे षट्पञ्चाशः सर्गः १७७
बल हो, उसे दिखा । गाधिपुत्र! आज तेरे अस्त्र - शस्त्रोंके ।
ज्ञानका घमंड मैं अभी धूल में मिला दूँगा ॥ ३ ॥
क्व च ते क्षत्रियबलं क्व च ब्रह्मबलं महत् ।
पश्य ब्रह्मबलं दिव्यं मम क्षत्रियपांसन ॥ ४ ॥
' क्षत्रियकुलकलङ्क! कहाँ तेरा क्षात्रबल और कहाँ महान् ब्रह्मबल । मेरे दिव्य ब्रह्मबलको देख ले ' ॥ ४ ॥
तस्यास्त्रं गाधिपुत्रस्य घोरमाग्नेयमुत्तमम् ।
ब्रह्मदण्डेन तच्छान्तमग्नेर्वेग इवाम्भसा ॥ ५ ॥
गाधिपुत्र विश्वामित्रका वह उत्तम एवं भयंकर आग्नेयास्त्र वसिष्ठजीके ब्रह्मदण्डसे उसी प्रकार शान्त हो गया, जैसे पानी पड़नेसे जलती हुई आगका वेग ॥ ५ ॥
वारुणं चैव रौद्रं च ऐन्द्रं पाशुपतं तथा ।
ऐषीकं चापि चिक्षेप कुपितो गाधिनन्दनः ॥ ६ ॥
तब गाधिपुत्र विश्वामित्रने कुपित होकर वारुण, रौद्र, ऐन्द्र, पाशुपत और ऐषीक नामक अस्त्रोंका प्रयोग किया ॥
मानवं मोहनं चैव गान्धर्वं स्वापनं तथा ।
जृम्भणं मादनं चैव संतापनविलापने ॥ ७ ॥
शोषणं दारणं चैव वज्रमस्त्रं सुदुर्जयम् ।
ब्रह्मपाशं कालपाशं वारुणं पाशमेव च ॥ ८ ॥
पिनाकमस्त्रं दयितं शुष्का अशनी तथा ।
दण्डास्त्रमथ पैशाचं क्रौञ्चमस्त्रं तथैव च ॥ ९ ॥
धर्मचक्रं कालचक्रं विष्णुचक्रं तथैव च ।
वायव्यं मथनं चैव अस्त्रं हयशिरस्तथा ॥ १० ॥
शक्तिद्वयं च चिक्षेप कङ्कालं मुसलं तथा ।
वैद्याधरं महास्त्रं च कालास्त्रमथ दारुणम् ॥ ११ ॥
त्रिशूलमस्त्रं घोरं च कापालमथ कङ्कणम् ।
एतान्यस्त्राणि चिक्षेप सर्वाणि रघुनन्दन ॥ १२ ॥
रघुनन्दन! उसके पश्चात् क्रमशः मानव, मोहन, गान्धर्व, स्वापन, जृम्भण, मादन, संतापन, विलापन, शोषण, विदारण, सुदुर्जय वज्रास्त्र, ब्रह्मपाश, कालपाश, वारुणपाश, परमप्रिय पिनाकास्त्र, सूखी - गीली दो प्रकारकी अशनि, दण्डास्त्र, पैशाचास्त्र, क्रौञ्चास्त्र, धर्मचक्र, कालचक्र, विष्णुचक्र, वायव्यास्त्र, मन्थनास्त्र, हयशिरा, दो प्रकारकी शक्ति, कङ्काल, मूसल, महान् वैद्याधरास्त्र, दारुण कालास्त्र, भयंकर त्रिशूलास्त्र, कापालास्त्र और कङ्कणास्त्र — ये सभी अस्त्र उन्होंने वसिष्ठजीके ऊपर चलाये ॥ ७–१२ ॥
वसिष्ठे जपतां श्रेष्ठे तदद्भुतमिवाभवत् ।
तानि सर्वाणि दण्डेन ग्रसते ब्रह्मणः सुतः ॥ १३ ॥
जपनेवालोंमें श्रेष्ठ महर्षि वसिष्ठपर इतने अस्त्रोंका प्रहार वह एक अद्भुत - सी घटना थी, परंतु ब्रह्माके पुत्र वसिष्ठजीने उन सभी अस्त्रोंको केवल अपने डंडेसे ही नष्ट कर दिया ॥ १३ ॥
तेषु शान्तेषु ब्रह्मास्त्रं क्षिप्तवान् गाधिनन्दनः ।
तदस्त्रमुद्यतं दृष्ट्वा देवाः साग्निपुरोगमाः ॥ १४ ॥
देवर्षयश्च सम्भ्रान्ता गन्धर्वाः समहोरगाः ।
त्रैलोक्यमासीत् संत्रस्तं ब्रह्मास्त्रे समुदीरिते ॥ १५ ॥
उन सब अस्त्रोंके शान्त हो जानेपर गाधिनन्दन विश्वामित्रने ब्रह्मास्त्रका प्रयोग किया । ब्रह्मास्त्रको उद्यत देख अग्नि आदि देवता, देवर्षि, गन्धर्व और बड़े - बड़े नाग भी दहल गये । ब्रह्मास्त्रके ऊपर उठते ही तीनों लोकोंके प्राणी थर्रा उठे ॥ १४-१५ ॥
तदप्यस्त्रं महाघोरं ब्राह्मं ब्राह्मेण तेजसा ।
वसिष्ठो ग्रसते सर्वं ब्रह्मदण्डेन राघव ॥ १६ ॥
राघव! वसिष्ठजीने अपने ब्रह्मतेजके प्रभावसे उस महाभयंकर ब्रह्मास्त्रको भी ब्रह्मदण्डके द्वारा ही शान्त कर दिया ॥ १६ ॥
ब्रह्मास्त्रं ग्रसमानस्य वसिष्ठस्य महात्मनः ।
त्रैलोक्यमोहनं रौद्रं रूपमासीत् सुदारुणम् ॥१७ ॥
उस ब्रह्मास्त्रको शान्त करते समय महात्मा वसिष्ठका वह रौद्ररूप तीनों लोकोंको मोहमें डालनेवाला और अत्यन्त भयंकर जान पड़ता था ॥ १७ ॥
रोमकूपेषु सर्वेषु वसिष्ठस्य महात्मनः ।
मरीच्य इव निष्पेतुरग्नेर्धूमाकुलार्चिषः ॥ १८ ॥
महात्मा वसिष्ठके समस्त रोमकूपोंमेंसे किरणोंकी भाँति धूमयुक्त आगकी लपटें निकलने लगीं ॥१८ ॥
प्राज्वलद् ब्रह्मदण्डश्च वसिष्ठस्य करोद्यतः ।
विधूम इव कालाग्नेर्यमदण्ड इवापरः ॥१ ९ ॥
वसिष्ठजीके हाथमें उठा हुआ द्वितीय यमदण्डके समान वह ब्रह्मदण्ड धूमरहित कालाग्निके समान प्रज्वलित हो रहा था ॥ १ ९ ॥
ततोऽस्तुवन् मुनिगणा वसिष्ठं जपतां वरम् ।
अमोघं ते बलं ब्रह्मंस्तेजो धारय तेजसा ॥ २० ॥
उस समय समस्त मुनिगण मन्त्र जपनेवालोंमें श्रेष्ठ वसिष्ठ मुनिकी स्तुति करते हुए बोले- ' ब्रह्मन्! आपका बल अमोघ है । आप अपने तेजको अपनी ही शक्तिसे समेट लीजिये ॥ २० ॥
निगृहीतस्त्वया ब्रह्मन् विश्वामित्रो महाबलः ।
अमोघं ते बलं श्रेष्ठ लोकाः सन्तु गतव्यथाः ॥ २१ ॥
' महाबली विश्वामित्र आपसे पराजित हो गये ।
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१७८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे मुनिश्रेष्ठ! आपका बल अमोघ है । अब आप शान्त हो जाइये, जिससे लोगोंकी व्यथा दूर हो ' ॥ २१ ॥
एवमुक्तो महातेजाः शमं चक्रे महाबलः ।
विश्वामित्रो विनिकृतो विनिःश्वस्येदमब्रवीत् ॥ २२ ॥
महर्षियोंके ऐसा कहनेपर महातेजस्वी महाबली वसिष्ठजी शान्त हो गये और पराजित विश्वामित्र लम्बी साँस खींचकर यों बोले - ॥ २२ ॥
धिग् बलं क्षत्रियबलं ब्रह्मतेजोबलं बलम् ।
एकेन ब्रह्मदण्डेन सर्वास्त्राणि हतानि मे ॥ २३ ॥ ।
' क्षत्रियके बलको धिक्कार है । ब्रह्मतेजसे प्राप्त होनेवाला बल ही वास्तवमें बल है; क्योंकि आज एक ब्रह्मदण्डने मेरे सभी अस्त्र नष्ट कर दिये ॥ २३ ॥
तदेतत् प्रसमीक्ष्याहं प्रसन्नेन्द्रियमानसः ।
तपो महत् समास्थास्ये यद् वै ब्रह्मत्वकारणम् ॥२४ ॥
' इस घटनाको प्रत्यक्ष देखकर अब मैं अपने मन और इन्द्रियोंको निर्मल करके उस महान् तपका अनुष्ठान करूँगा, जो मेरे लिये ब्राह्मणत्वकी प्राप्तिका कारण होगा ' ॥ २४ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे षट्पञ्चाशः सर्गः ॥ ५६ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें छप्पनवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५६ ॥
सप्तपञ्चाशः सर्गः विश्वामित्रकी तपस्या, राजा त्रिशंकुका अपना यज्ञ करानेके लिये पहले वसिष्ठजीसे प्रार्थना करना और उनके इन्कार कर
ततः संतप्तहृदयः स्मरन्निग्रहमात्मनः ।
विनिःश्वस्य विनिःश्वस्य कृतवैरो महात्मना ॥ १ ॥
स दक्षिणां दिशं गत्वा महिष्या सह राघव ।
तताप परमं घोरं विश्वामित्रो महातपाः ॥ २ ॥
श्रीराम! तदनन्तर विश्वामित्र अपनी पराजयको याद करके मन - ही - मन संतप्त होने लगे । महात्मा वसिष्ठके साथ वैर बाँधकर महातपस्वी विश्वामित्र बारम्बार लम्बी साँस खींचते हुए अपनी रानीके साथ दक्षिण दिशामें जाकर अत्यन्त उत्कृष्ट एवं भयंकर तपस्या करने लगे ॥ १-२ ॥
फलमूलाशनो दान्तश्चचार परमं तपः ।
अथास्य जज्ञिरे पुत्राः सत्यधर्मपरायणाः ॥ ३ ॥
हविष्पन्दो मधुष्पन्दो दृढनेत्रो महारथः । वहाँ मन और इन्द्रियोंको वशमें करके वे फल-मूलका आहार करते तथा उत्तम तपस्यामें लगे रहते थे । वहीं उनके हविष्पन्द, मधुष्पन्द, दृढनेत्र और महारथ नामक चार पुत्र उत्पन्न हुए, जो सत्य और धर्ममें तत्पर रहनेवाले थे ॥ ३३ ॥
पूर्णे वर्षसहस्त्रे तु ब्रह्मा लोकपितामहः ॥ ४ ॥
अब्रवीन्मधुरं वाक्यं विश्वामित्रं तपोधनम् ।
जिता राजर्षिलोकास्ते तपसा कुशिकात्मज ॥ ५ ॥
अनेन तपसा त्वां हि राजर्षिरिति विद्महे । एक हजार वर्ष पूरे हो जानेपर लोकपितामह ब्रह्माजीने तपस्याके धनी विश्वामित्रको दर्शन देकर देनेपर उन्हींके पुत्रोंकी शरणमें जाना मधुर वाणीमें कहा - -'कुशिकनन्दन '! तुमने तपस्याके द्वारा राजर्षियोंके लोकोंपर विजय पायी है । इस तपस्याके प्रभावसे हम तुम्हें सच्चा राजर्षि समझते हैं ' ॥ ४ - ५३ ॥ एवमुक्त्वा महातेजा जगाम सह दैवतैः ॥ ६ ॥
त्रिविष्टपं ब्रह्मलोकं लोकानां परमेश्वरः । यह कहकर सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी ब्रह्माजी देवताओंके साथ स्वर्गलोक होते हुए ब्रह्मलोकको चले गये ॥ ६३ ॥
विश्वामित्रोऽपि तच्छ्रुत्वा हिया किंचिदवाङ्मुखः ॥ ७ ॥
दुःखेन महताविष्टः समन्युरिदमब्रवीत् ।
तपश्च सुमहत् तप्तं राजर्षिरिति मां विदुः ॥ ८ ॥
देवाः सर्षिगणाः सर्वे नास्ति मन्ये तपः फलम् । उनकी बात सुनकर विश्वामित्रका मुख लज्जासे कुछ झुक गया । वे बड़े दुःखसे व्यथित हो दीनतापूर्वक मन - ही - मन यों कहने लगे - ' अहो! मैंने इतना बड़ा तप किया तो भी ऋषियोंसहित सम्पूर्ण देवता मुझे राजर्षि ही समझते हैं । मालूम होता है, इस तपस्याका कोई फल नहीं हुआ ' ॥ ७-८३ ॥ एवं निश्चित्य मनसा भूय एव महातपाः ॥ ९ ॥
तपश्चचार धर्मात्मा काकुत्स्थ परमात्मवान् । श्रीराम! मनमें ऐसा सोचकर अपने मनको वशमें रखनेवाले महातपस्वी धर्मात्मा विश्वामित्र पुनः भारी तपस्यामें लग गये॥९ ३ ॥ एतस्मिन्नेव काले तु सत्यवादी जितेन्द्रियः ॥ १० ॥
त्रिशङ्कुरिति विख्यात इक्ष्वाकुकुलवर्धनः ।