वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ — पृष्ठ 211–220
वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 211–220
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बालकाण्डे अष्टषष्टितमः सर्गः १ ९९
राजानं प्रश्रितैर्वाक्यैरानयन्तु पुरं मम ।
प्रदानं वीर्यशुल्कायाः कथयन्तु च सर्वशः ॥ २५ ॥
' ब्रह्मन्! कुशिकनन्दन! आपका कल्याण हो । यदि आपकी आज्ञा हो तो मेरे मन्त्री रथपर सवार होकर बड़ी उतावलीके साथ शीघ्र ही अयोध्याको जायँ और विनययुक्त वचनोंद्वारा महाराज दशरथको मेरे नगरमें लिवा लायें । साथ ही यहाँका सब समाचार बताकर यह निवेदन करें कि जिसके लिये पराक्रमका ही शुल्क नियत किया गया था, उस जनककुमारी सीताका विवाह श्रीरामचन्द्रजीके साथ होने जा रहा है ॥ २४-२५ ॥
मुनिगुप्तौ च काकुत्स्थौ कथयन्तु नृपाय वै ।
प्रीतियुक्तं तु राजानमानयन्तु सुशीघ्रगाः ॥ २६ ॥
' ये लोग महाराज दशरथसे यह भी कह दें कि आपके दोनों पुत्र श्रीराम और लक्ष्मण विश्वामित्रजीके द्वारा सुरक्षित हो मिथिलामें पहुँच गये हैं । इस प्रकार प्रीतियुक्त हुए राजा दशरथको ये शीघ्रगामी सचिव जल्दी यहाँ बुला लायें ॥ २६ ॥
कौशिकस्तु तथेत्याह राजा चाभाष्य मन्त्रिणः ।
अयोध्यां प्रेषयामास धर्मात्मा कृतशासनान् ।
यथावृत्तं समाख्यातुमानेतुं च नृपं तथा ॥ २७ ॥
विश्वामित्रने ' तथास्तु ' कहकर राजाकी बातका समर्थन किया । तब धर्मात्मा राजा जनकने अपनी आज्ञाका पालन करनेवाले मन्त्रियोंको समझा - बुझाकर यहाँका ठीक - ठीक समाचार महाराज दशरथको बताने और उन्हें । मिथिलापुरीमें ले आनेके लिये भेज दिया ॥ २७ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे सप्तषष्टितमः सर्गः ॥ ६७ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें सरसठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६७ ॥
अष्टषष्टितमः सर्गः राजा जनकका संदेश पाकर मन्त्रियोंसहित महाराज दशरथक मिथिला जानेके
जनकेन समादिष्टा दूतास्ते क्लान्तवाहनाः ।
त्रिरात्रमुषिता मार्गे तेऽयोध्यां प्राविशन् पुरीम् ॥ १ ॥
राजा जनककी आज्ञा पाकर उनके दूत अयोध्याके ' लिये प्रस्थित हुए । रास्तेमें वाहनोंके थक जानेके कारण तीन रात विश्राम करके चौथे दिन वे अयोध्यापुरीमें जा पहुँचे ॥१ ॥
` राजवचनाद् गत्वा राजवेश्म प्रवेशिताः ।
ददृशुर्देवसंकाशं वृद्धं दशरथं नृपम् ॥ २ ॥
राजाकी आज्ञासे उनका राजमहलमें प्रवेश हुआ । वहाँ जाकर उन्होंने देवतुल्य तेजस्वी बूढ़े महाराज दशरथका दर्शन किया ॥ २ ॥
बद्धाञ्जलिपुटाः सर्वे दूता विगतसाध्वसाः ।
राजानं प्रश्रितं वाक्यमब्रुवन् मधुराक्षरम् ॥ ३ ॥
मैथिलो जनको राजा साग्निहोत्रपुरस्कृतः ।
मुहुर्मुहुर्मधुरया स्नेहसंरक्तया गिरा ॥४ ॥
कुशलं चाव्ययं चैव सोपाध्यायपुरोहितम् ।
जनकस्त्वां महाराज पृच्छते सपुरःसरम् ॥ ५ ॥
उन सभी दूतोंने दोनों हाथ जोड़ निर्भय हो राजासे मधुर वाणीमें यह विनययुक्त बात कही - ' महाराज! मिथिलापति राजा जनकने अग्निहोत्रकी अग्निको सामने लिये उद्यत होना रखकर स्नेहयुक्त मधुर वाणीमें सेवकोंसहित आपका तथा आपके उपाध्याय और पुरोहितोंका बारम्बार कुशल - मंगल पूछा है॥३–५ ॥
पृष्ट्वा कुशलमव्यग्रं वैदेहो मिथिलाधिपः ।
कौशिकानुमते वाक्यं भवन्तमिदमब्रवीत् ॥ ६ ॥
' इस प्रकार व्यग्रतारहित कुशल पूछकर मिथिलापति विदेहराजने महर्षि विश्वामित्रकी आज्ञासे आपको यह संदेश दिया है ॥६ ॥
पूर्वं प्रतिज्ञा विदिता वीर्यशुल्का ममात्मजा ।
राजानश्च कृतामर्षा निर्वीर्या विमुखीकृताः ॥ ७ ॥
' राजन्! आपको मेरी पहले की हुई प्रतिज्ञाका हाल मालूम होगा । मैंने अपनी पुत्रीके विवाहके लिये पराक्रमका ही शुल्क नियत किया था । उसे सुनकर कितने ही राजा अमर्षमें भरे हुए आये; किंतु यहाँ पराक्रमहीन सिद्ध हुए और विमुख होकर घर लौट गये ॥७ ॥
सेयं मम सुता राजन् विश्वामित्रपुरस्कृतैः ।
यदृच्छ्यागतै राजन् निर्जिता तव पुत्रकैः ॥ ८ ॥
' नरेश्वर! मेरी इस कन्याको विश्वामित्रजीके साथ | अकस्मात् घूमते - फिरते आये हुए आपके पुत्र श्रीरामने
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२०० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे अपने पराक्रमसे जीत लिया है ॥ ८ ॥
तच्च रत्नं धनुर्दिव्यं मध्ये भग्नं महात्मना ।
रामेण हि महाबाहो महत्यां जनसंसदि ॥ ९ ॥
' महाबाहो! महात्मा श्रीरामने महान् जनसमुदायके मध्य मेरे यहाँ रखे हुए रत्नस्वरूप दिव्य धनुषको बीचसे तोड़ डाला है॥९॥
अस्मै देया मया सीता वीर्यशुल्का महात्मने ।
प्रतिज्ञां तर्तुमिच्छामि तदनुज्ञातुमर्हसि ॥ १० ॥
' अतः मैं इन महात्मा श्रीरामचन्द्रजीको अपनी वीर्यशुल्का कन्या सीता प्रदान करूँगा । ऐसा करके मैं अपनी प्रतिज्ञासे पार होना चाहता हूँ । आप इसके लिये मुझे आज्ञा देनेकी कृपा करें ॥ १० ॥
सोपाध्यायो महाराज पुरोहितपुरस्कृतः ।
शीघ्रमागच्छ भद्रं ते द्रष्टुमर्हसि राघवौ ॥ ११ ॥
' महाराज! आप अपने गुरु एवं पुरोहितके साथ यहाँ शीघ्र पधारें और अपने दोनों पुत्र रघुकुलभूषण
श्रीराम और लक्ष्मणको देखें । आपका भला हो ॥ ११ ॥
प्रतिज्ञां मम राजेन्द्र निर्वर्तयितुमर्हसि ।
पुत्रयोरुभयोरेव प्रीतिं त्वमुपलप्स्यसे ॥ १२ ॥
' राजेन्द्र! यहाँ पधारकर आप मेरी प्रतिज्ञा पूर्ण करें । यहाँ आनेसे आपको अपने दोनों पुत्रोंके विवाहजनित आनन्दकी प्राप्ति होगी ॥ १२ ॥
एवं विदेहाधिपतिर्मधुरं वाक्यमब्रवीत् ।
विश्वामित्राभ्यनुज्ञातः शतानन्दमते स्थितः ॥ १३ ॥
' राजन्! इस तरह विदेहराजने आपके पास यह मधुर संदेश भेजा था । इसके लिये उन्हें विश्वामित्रजीकी आज्ञा और शतानन्दजीकी सम्मति भी प्राप्त हुई थी ' ॥ १३ ॥
दूतवाक्यं तु तच्छ्रुत्वा राजा परमहर्षितः ।
वसिष्ठं वामदेवं च मन्त्रिणश्चैवमब्रवीत् ॥ १४ ॥
संदेशवाहक मन्त्रियोंका यह वचन सुनकर राजा दशरथ बड़े प्रसन्न हुए । उन्होंने महर्षि वसिष्ठ, वामदेव तथा अन्य मन्त्रियोंसे कहा- ॥ १४ ॥
गुप्तः कुशिकपुत्रेण कौसल्यानन्दवर्धनः ।
लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा विदेहेषु वसत्यसौ ॥ १५ ॥
' कुशिकनन्दन विश्वामित्रसे सुरक्षित हो कौसल्याका आनन्दवर्धन करनेवाले श्रीराम अपने छोटे भाई लक्ष्मण साथ विदेहदेशमें निवास करते हैं ॥ १५ ॥
दृष्टवीर्यस्तु काकुत्स्थो जनकेन महात्मना ।
सम्प्रदानं सुतायास्तु राघवे कर्तुमिच्छति ॥ १६ ॥
‘ वहाँ महात्मा राजा जनकने ककुत्स्थकुलभूषण श्रीरामके पराक्रमको प्रत्यक्ष देखा है । इसलिये वे अपनी पुत्री सीताका विवाह रघुकुलरत्न रामके साथ करना चाहते हैं ॥ १६ ॥
यदि वो रोचते वृत्तं जनकस्य महात्मनः ।
पुरीं गच्छामहे शीघ्रं मा भूत् कालस्य पर्ययः ॥ १७ ॥
' यदि आपलोगोंकी रुचि एवं सम्मति हो तो हमलोग शीघ्र ही महात्मा जनककी मिथिलापुरीको चलें । इसमें विलम्ब न हो ' ॥ १७ ॥
मन्त्रिणो बाढमित्याहुः सह सर्वैर्महर्षिभिः ।
सुप्रीतश्चाब्रवीद् राजा श्वो यात्रेति च मन्त्रिणः ॥ १८ ॥
यह सुनकर समस्त महर्षियोंसहित मन्त्रियोंने ' बहुत अच्छा ' कहकर एक स्वरसे चलनेकी सम्मति दी । राजा बड़े प्रसन्न हुए और मन्त्रियोंसे बोले - ' कल सबेरे ही यात्रा कर देनी चाहिये ' ॥ १८ ॥
मन्त्रिणस्तु नरेन्द्रस्य रात्रिं परमसत्कृताः ।
ऊषुः प्रमुदिताः सर्वे गुणैः सर्वैः समन्विताः ॥ १ ९ ॥
महाराज दशरथके सभी मन्त्री समस्त सद्गुणोंसे सम्पन्न थे । राजाने उनका बड़ा सत्कार किया । अतः बारात चलनेकी बात सुनकर उन्होंने बड़े आनन्दसे वह । रात्रि व्यतीत की ॥ १ ९ ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डेऽष्टषष्टितमः सर्गः ॥ ६८ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें अड़सठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६८ ॥
एकोनसप्ततितमः सर्गः दल - बलसहित राजा दशरथकी मिथिला- यात्रा और वहाँ राजा जनकके द्वारा उनका स्वागत - सत्कार
ततो रात्र्यां व्यतीतायां सोपाध्यायः सबान्धवः । इस प्रकार बोले- ॥१ ॥
राजा दशरथो हृष्टः सुमन्त्रमिदमब्रवीत् ॥ १ ॥ अद्य सर्वे धनाध्यक्षा धनमादाय पुष्कलम् ।
तदनन्तर रात्रि व्यतीत होनेपर उपाध्याय और व्रजन्त्वग्रे सुविहिता नानारत्नसमन्विताः ॥ २ ॥
बन्धु - बान्धवोंसहित राजा दशरथ हर्षमें भरकर सुमन्त्रसे ' आज हमारे सभी धनाध्यक्ष ( खजांची ) बहुत - सा
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बालकाण्डे एकोनसप्ततितमः सर्गः २०१ धन लेकर नाना प्रकारके रत्नोंसे सम्पन्न हो सबसे आगे । चलें । उनकी रक्षाके लिये हर तरहकी सुव्यवस्था होनी चाहिये ॥ २ ॥
चतुरंगबलं चापि शीघ्रं निर्यातु सर्वशः ।
ममाज्ञासमकालं च यानं युग्यमनुत्तमम् ॥ ३ ॥
' सारी चतुरंगिणी सेना भी यहाँसे शीघ्र ही कूच कर दे । अभी मेरी आज्ञा सुनते ही सुन्दर - सुन्दर पालकियाँ और अच्छे - अच्छे घोड़े आदि वाहन तैयार होकर चल दें ॥
वसिष्ठो वामदेवश्च जाबालिरथ कश्यपः ।
मार्कण्डेयस्तु दीर्घायुर्ऋषिः कात्यायनस्तथा ॥ ४ ॥
एते द्विजाः प्रयान्त्वग्रे स्यन्दनं योजयस्व मे ।
यथा कालात्ययो न स्याद् दूता हि त्वरयन्ति माम् ॥ ५ ॥
' वसिष्ठ, वामदेव, जाबालि कश्यप, दीर्घजीवी मार्कण्डेय मुनि तथा कात्यायन- ये सभी ब्रह्मर्षि आगे-आगे चलें । मेरा रथ भी तैयार करो । देर नहीं होनी चाहिये । राजा जनकके दूत मुझे जल्दी करनेके लिये प्रेरित कर रहे हैं'॥४-५ ॥
वचनाच्च नरेन्द्रस्य सेना च चतुरंगिणी ।
राजानमृषिभिः सार्धं व्रजन्तं पृष्ठतोऽन्वयात् ॥ ६ ॥
राजाकी इस आज्ञाके अनुसार चतुरंगिणी सेना तैयार हो गयी और ऋषियोंके साथ यात्रा करते हुए महाराज दशरथके पीछे - पीछे चली ॥ ६ ॥
गत्वा चतुरहं मार्गं विदेहानभ्युपेयिवान् ।
राजा च जनकः श्रीमान् श्रुत्वा पूजामकल्पयत् ॥ ७ ॥
चार दिनका मार्ग तय करके वे सब लोग विदेह-देशमें जा पहुँचे । उनके आगमनका समाचार सुनकर श्रीमान् राजा जनकने स्वागत - सत्कारकी तैयारी की ॥ ७ ॥
ततो राजानमासाद्य वृद्धं दशरथं नृपम् ।
मुदितो जनको राजा प्रहर्षं परमं ययौ ॥ ८ ॥
तत्पश्चात् आनन्दमग्न हुए राजा जनक बूढ़े महाराज दशरथके पास पहुँचे । उनसे मिलकर उन्हें बड़ा हर्ष हुआ ।
उवाच वचनं श्रेष्ठो नरश्रेष्ठं मुदान्वितम् ।
स्वागतं ते नरश्रेष्ठ दिष्ट्या प्राप्तोऽसि राघव ॥ ९ ॥
राजाओंमें श्रेष्ठ मिथिलानरेशने आनन्दमग्न हुए पुरुषप्रवर राजा दशरथसे कहा - ' नरश्रेष्ठ रघुनन्दन! आपका स्वागत है । मेरे बड़े भाग्य, जो आप यहाँ पधारे ॥ ९ ॥
पुत्रयोरुभयोः प्रीतिं लप्स्यसे वीर्यनिर्जिताम् ।
दिष्ट्या प्राप्तो महातेजा वसिष्ठो भगवानृषिः ॥ १० ॥
सह सर्वैर्द्विजश्रेष्ठैर्देवैरिव शतक्रतुः । ' आप यहाँ अपने दोनों पुत्रोंकी प्रीति प्राप्त करेंगे, जो उन्होंने अपने पराक्रमसे जीतकर पायी है । महातेजस्व भगवान् वसिष्ठ मुनिने भी हमारे सौभाग्यसे ही यहाँ पदार्पण किया है । ये इन सभी श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके साथ वैसी ही शोभा पा रहे हैं, जैसे देवताओंके साथ इन्द्र सुशोभित होते हैं ॥ १०३ ॥
दिष्ट्या मे निर्जिता विघ्ना दिष्ट्या मे पूजितं कुलम् ॥ ११ ॥
राघवैः सह सम्बन्धाद् वीर्यश्रेष्ठैर्महाबलैः । ' सौभाग्यसे मेरी सारी विघ्न - बाधाएँ पराजित हो गयीं । रघुकुलके महापुरुष महान् बलसे सम्पन्न और पराक्रममें सबसे श्रेष्ठ होते हैं । इस कुलके साथ सम्बन्ध होनेके कारण आज मेरे कुलका सम्मान बढ़ गया ॥ ११३ ॥
श्वः प्रभाते नरेन्द्र त्वं संवर्तयितुमर्हसि ॥ १२ ॥
यज्ञस्यान्ते नरश्रेष्ठ विवाहमृषिसत्तमैः । ' नरश्रेष्ठ नरेन्द्र! कल सबेरे इन सभी महर्षियोंके साथ उपस्थित हो मेरे यज्ञकी समाप्तिके बाद आप श्रीरामके विवाहका शुभकार्य सम्पन्न करें ' ॥ १२३ ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा ऋषिमध्ये नराधिपः ॥ १३ ॥
वाक्यं वाक्यविदां श्रेष्ठः प्रत्युवाच महीपतिम् । ऋषियोंकी मण्डलीमें राजा जनककी यह बात सुनकर बोलनेकी कला जाननेवाले विद्वानोंमें श्रेष्ठ एवं वाक्यमर्मज्ञ महाराज दशरथने मिथिलानरेशको इस प्रकार उत्तर दिया – ॥ १३३ ॥
प्रतिग्रहो दातृवशः श्रुतमेतन्मया पुरा ॥ १४ ॥
यथा वक्ष्यसि धर्मज्ञ तत् करिष्यामहे वयम् । ' धर्मज्ञ! मैंने पहलेसे यह सुन रखा है कि प्रतिग्रह दाताके अधीन होता है । अतः आप जैसा कहेंगे, हम वैसा ही करेंगे ' ॥ १४३ ॥
तद् धर्मिष्ठं यशस्यं च वचनं सत्यवादिनः ॥ १५ ॥
श्रुत्वा विदेहाधिपतिः परं विस्मयमागतः । सत्यवादी राजा दशरथका वह धर्मानुकूल तथा यशोवर्धक वचन सुनकर विदेहराज जनकको बड़ा विस्मय हुआ ॥ १५३ ॥
ततः सर्वे मुनिगणाः परस्परसमागमे ॥ १६ ॥
हर्षेण महता युक्तास्तां तदनन्तर सभी बहुत प्रसन्न हुए और बितायी ॥ १६३ ॥
अथ रामो महातेजा विश्वामित्रं पुरस्कृत्य इधर महातेजस्वी रात्रिमवसन् सुखम् । महर्षि एक - दूसरे से मिलकर सबने बड़े सुखसे वह रात लक्ष्मणेन समं ययौ ॥ १७ ॥
पितुः पादावुपस्पृशन् । श्रीराम विश्वामित्रजीको आगे
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२०२ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे
करके लक्ष्मणके साथ पिताजीके पास गये और उनके ।
चरणोंका स्पर्श किया ॥ १७३ ॥
राजा च राघवौ पुत्रौ निशाम्य परिहर्षितः ॥ १८ ॥
उवास परमप्रीतो जनकेनाभिपूजितः । राजा दशरथने भी जनकके द्वारा आदर - सत्कार पाकर बड़ी प्रसन्नताका अनुभव किया तथा अपने दोनों रघुकुल- रत्न पुत्रोंको सकुशल देखकर उन्हें अपार हर्ष । इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये हुआ । वे रातमें बड़े सुखसे वहाँ रहे ॥ १८३ ॥
जनकोऽपि महातेजाः क्रिया धर्मेण तत्त्ववित् ।
यज्ञस्य च सुताभ्यां च कृत्वा रात्रिमुवास ह ॥ १ ९ ॥
महातेजस्वी तत्त्वज्ञ राजा जनकने भी धर्म अनुसार यज्ञकार्य सम्पन्न किया तथा अपनी दोनों कन्याओंके लिये मंगलाचारका सम्पादन करके सुखसे वह रात्रि व्यतीत की ॥ १ ९ ॥ बालकाण्डे एकोनसप्ततितमः सर्गः ॥ ६ ९ ॥ इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें उनहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६ ९ ॥ सप्ततितमः सर्गः राजा जनकका अपने भाई कुशध्वजको सांकाश्या नगरीसे बुलवाना, राजा दशरथके अनुरोधसे वसिष्ठजीका और लक्ष्मणके लिये सीता
ततः प्रभाते जनकः कृतकर्मा महर्षिभिः ।
उवाच वाक्यं वाक्यज्ञः शतानन्दं पुरोहितम् ॥ १ ॥
तदनन्तर जब सबेरा हुआ और राजा जनक महर्षियोंके सहयोगसे अपना यज्ञ - कार्य सम्पन्न कर चुके, तब वे वाक्यमर्मज्ञ नरेश अपने पुरोहित शतानन्दजीसे इस प्रकार बोले- ॥१ ॥
भ्राता मम महातेजा वीर्यवानतिधार्मिकः ।
कुशध्वज इति ख्यातः पुरीमध्यवसच्छुभाम् ॥ २ ॥
वार्याफलकपर्यन्तां पिबन्त्रिक्षुमतीं नदीम् ।
सांकाश्यां पुण्यसंकाशां विमानमिव पुष्पकम् ॥ ३ ॥
' ब्रह्मन्! मेरे महातेजस्वी और पराक्रमी भाई कुशध्वज जो अत्यन्त धर्मात्मा हैं, इस समय इक्षुमती नदीका जल पीते हुए उसके किनारे बसी हुई कल्याणमयी सांकाश्या नगरीमें निवास करते हैं । उसके चारों ओरके परकोटोंकी रक्षाके लिये शत्रुओंके निवारणमें समर्थ बड़े - बड़े यन्त्र लगाये गये हैं । वह पुरी पुष्पकविमानके समान विस्तृत तथा पुण्यसे उपलब्ध होनेवाले स्वर्गलोकके सदृश सुन्दर है ॥ २-३ ॥
तमहं द्रष्टुमिच्छामि यज्ञगोप्ता स मे मतः ।
प्रीतिं सोऽपि महातेजा इमां भोक्ता मया सह ॥ ४ ॥
' वहाँ रहनेवाले अपने भाईको इस शुभ अवसरपर मैं यहाँ उपस्थित देखना चाहता हूँ; क्योंकि मेरी दृष्टिमें वे मेरे इस यज्ञके संरक्षक हैं । महातेजस्वी कुशध्वज भी मेरे साथ श्रीसीता - रामके विवाहसम्बन्धी इस मंगल समारोहका सुख उठावेंगे ' ॥ ४ ॥
सूर्यवंशका परिचय देते हुए श्रीराम तथा ऊर्मिलाको वरण करना
एवमुक्ते तु वचने शतानन्दस्य संनिधौ ।
आगताः केचिदव्यग्रा जनकस्तान् समादिशत् ॥ ५ ॥
राजाके इस प्रकार कहनेपर शतानन्दजीके समीप कुछ धीर स्वभावके पुरुष आये और राजा जनकने उन्हें पूर्वोक्त आदेश सुनाया ॥५ ॥
शासनात् तु नरेन्द्रस्य प्रययुः शीघ्रवाजिभिः ।
समानेतुं नरव्याघ्रं विष्णुमिन्द्राज्ञया यथा ॥ ६ ॥
राजाकी आज्ञासे वे श्रेष्ठ दूत तेज चलनेवाले घोड़ोंपर सवार हो पुरुषसिंह कुशध्वजको बुला लाने लिये चल दिये । मानो इन्द्रकी आज्ञासे उनके दूत भगवान् विष्णुको बुलाने जा रहे हों ॥६ ॥
सांकाश्यां ते समागम्य ददृशुश्च कुशध्वजम् ।
न्यवेदयन् यथावृत्तं जनकस्य च चिन्तितम् ॥ ७ ॥
सांकाश्यामें पहुँचकर उन्होंने कुशध्वजसे भेंट की और मिथिलाका यथार्थ समाचार एवं जनकका अभिप्राय भी निवेदन किया ॥ ७ ॥
तद्वृत्तं नृपतिः श्रुत्वा दूतश्रेष्ठैर्महाजवैः ।
आज्ञया तु नरेन्द्रस्य आजगाम कुशध्वजः ॥ ८ ॥
उन महावेगशाली श्रेष्ठ दूतोंके मुखसे मिथिलाका सारा वृत्तान्त सुनकर राजा कुशध्वज महाराज जनककी आज्ञाके अनुसार मिथिलामें आये ॥ ८ ॥
स ददर्श महात्मानं जनकं धर्मवत्सलम् ।
सोऽभिवाद्य शतानन्दं जनकं चातिधार्मिकम् ॥ ९ ॥
राजार्ह परमं दिव्यमासनं सोऽध्यरोहत । वहाँ उन्होंने धर्मवत्सल महात्मा जनकका दर्शन
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बालकाण्डे सप्ततितमः सर्गः २०३ किया । फिर शतानन्दजी तथा अत्यन्त धार्मिक जनकको । प्रणाम करके वे राजाके योग्य परम दिव्य सिंहासनपर विराजमान हुए॥९ ३ ॥ उपविष्टावुभौ तौ तु भ्रातरावमितद्युती ॥ १० ॥
प्रेषयामासतुर्वीरौ मन्त्रिश्रेष्ठं सुदामनम् ।
गच्छ मन्त्रिपते शीघ्रमिक्ष्वाकुममितप्रभम् ॥ ११ ॥
आत्मजैः सह दुर्धर्षमानयस्व समन्त्रिणम् । सिंहासनपर बैठे हुए उन दोनों अमिततेजस्वी वीरबन्धुओंने मन्त्रिप्रवर सुदामनको भेजा और कहा— ' मन्त्रिवर! आप शीघ्र ही अमिततेजस्वी इक्ष्वाकुकुलभूषण महाराज दशरथके पास जाइये और पुत्रों तथा मन्त्रियोंसहित उन दुर्जय नरेशको यहाँ बुला लाइये ' ॥ १०-११३ ॥ औपकार्यां स गत्वा तु रघूणां कुलवर्धनम् ॥ १२ ॥
ददर्श शिरसा चैनमभिवाद्येदमब्रवीत् । आज्ञा पाकर मन्त्री सुदामन महाराज दशरथके खेमेमें जाकर रघुकुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले उन नरेशसे मिले और मस्तक झुकाकर उन्हें प्रणाम करनेके पश्चात् इस प्रकार बोले— ॥ १२३ ॥
अयोध्याधिपते वीर वैदेहो मिथिलाधिपः ॥ १३ ॥
स त्वां द्रष्टुं व्यवसितः सोपाध्यायपुरोहितम् । ' वीर अयोध्यानरेश! मिथिलापति विदेहराज जनक इस समय उपाध्याय और पुरोहितसहित आपका दर्शन करना चाहते हैं ' ॥ १३३ ॥
मन्त्रि श्रेष्ठवचः श्रुत्वा राजा सर्षिगणस्तथा ॥ १४ ॥
सबन्धुरगमत् तत्र जनको यत्र वर्तते । मन्त्रिवर सुदामनकी बात सुनकर राजा दशरथ ऋषियों और बन्धु - बान्धवोंके साथ उस स्थानपर गये जहाँ राजा जनक विद्यमान थे ॥ १४३ ॥
राजा च मन्त्रिसहितः सोपाध्यायः सबान्धवः ॥ १५ ॥
वाक्यं वाक्यविदां श्रेष्ठो वैदेहमिदमब्रवीत् । मन्त्री, उपाध्याय और भाई - बन्धुओंसहित राजा दशरथ, जो बोलनेकी कला जाननेवाले विद्वानोंमें श्रेष्ठ थे, विदेहराज जनकसे इस प्रकार बोले - ॥ १५३ ॥
विदितं ते महाराज इक्ष्वाकुकुलदैवतम् ॥ १६ ॥
वक्ता सर्वेषु कृत्येषु वसिष्ठो भगवानृषिः । ' महाराज! आपको तो विदित ही होगा कि इक्ष्वाकुकुलके देवता ये महर्षि वसिष्ठजी हैं । हमारे यहाँ सभी कार्योंमें ये भगवान् वसिष्ठ मुनि ही कर्तव्यका उपदेश करते हैं और इन्हींकी आज्ञाका पालन किया जाता है ॥ १६३ ॥
विश्वामित्राभ्यनुज्ञातः सह सर्वैर्महर्षिभिः ॥ १७ ॥
एष वक्ष्यति धर्मात्मा वसिष्ठो मे यथाक्रमम् । ' यदि सम्पूर्ण महर्षियोंसहित विश्वामित्रजीकी आज्ञा हो तो ये धर्मात्मा वसिष्ठ ही पहले मेरी कुल-परम्पराका क्रमशः परिचय देंगे ' ॥ १७३ ॥
तूष्णींभूते दशरथे वसिष्ठो भगवानृषिः ॥ १८ ॥
उवाच वाक्यं वाक्यज्ञो वैदेहं सपुरोधसम् । यों कहकर जब राजा दशरथ चुप हो गये, तब वाक्यवेत्ता भगवान् वसिष्ठ मुनि पुरोहितसहित विदेहराजसे इस प्रकार बोले - ॥ १८३ ॥
अव्यक्तप्रभवो ब्रह्मा शाश्वतो नित्य अव्ययः ॥ १ ९ ॥
तस्मान्मरीचिः संजज्ञे मरीचेः कश्यपः सुतः ।
विवस्वान् कश्यपाज्जज्ञे मनुर्वैवस्वतः स्मृतः ॥ २० ॥
' ब्रह्माजीकी उत्पत्तिका कारण अव्यक्त है— ये स्वयम्भू हैं । नित्य, शाश्वत और अविनाशी हैं । उनसे मरीचिकी उत्पत्ति हुई । मरीचिके पुत्र कश्यप हैं, कश्यपसे विवस्वान्का और विवस्वान्से वैवस्वत मनुका जन्म हुआ ॥ १ ९ -२० ॥
मनुः प्रजापतिः पूर्वमिक्ष्वाकुश्च मनोः सुतः ।
तमिक्ष्वाकुमयोध्यायां राजानं विद्धि पूर्वकम् ॥ २१ ॥
' मनु पहले प्रजापति थे, उनसे इक्ष्वाकु नामक पुत्र हुआ । उन इक्ष्वाकुको ही आप अयोध्याके प्रथम राजा समझें ॥ २१ ॥
इक्ष्वाकोस्तु सुतः श्रीमान् कुक्षिरित्येव विश्रुतः ।
कुक्षेरथात्मजः श्रीमान् विकुक्षिरुदपद्यत ॥ २२ ॥
' इक्ष्वाकुके पुत्रका नाम कुक्षि था । वे बड़े तेजस्वी थे । कुक्षिसे विकुक्षि नामक कान्तिमान् पुत्रका जन्म हुआ ॥ २२ ॥
विकुक्षेस्तु महातेजा बाणः पुत्रः प्रतापवान् ।
बाणस्य तु महातेजा अनरण्यः प्रतापवान् ॥ २३ ॥
' विकुक्षिके पुत्र महातेजस्वी और प्रतापी बाण हुए । बाणके पुत्रका नाम अनरण्य था । वे भी बड़े तेजस्वी और प्रतापी थे ॥ २३ ॥
अनरण्यात् पृथुर्जज्ञे त्रिशङ्कुस्तु पृथोरपि ।
त्रिशङ्कोरभवत् पुत्रो धुन्धुमारो महायशाः ॥ २४ ॥
' अनरण्यसे पृथु और पृथुसे त्रिशंकुका जन्म हुआ ।
त्रिशंकुके पुत्र महायशस्वी धुन्धुमार थे ॥२४ ॥
धुन्धुमारान्महातेजा युवनाश्वो महारथः ।
युवनाश्वसुतश्चासीन्मान्धाता पृथिवीपतिः ॥ २५ ॥
' धुन्धुमारसे महातेजस्वी महारथी युवनाश्वका
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२०४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे जन्म हुआ । युवनाश्वके पुत्र मान्धाता हुए, जो समस्त भूमण्डलके स्वामी थे ॥ २५ ॥
मान्धातुस्तु सुतः श्रीमान् सुसन्धिरुदपद्यत ।
सुसन्धेरपि पुत्रौ द्वौ ध्रुवसन्धिः प्रसेनजित् ॥ २६ ॥
' मान्धातासे सुसन्धि नामक कान्तिमान् पुत्रका जन्म हुआ । सुसन्धिके भी दो पुत्र हुए- ध्रुवसन्धि और प्रसेनजित् ॥ २६ ॥
यशस्वी ध्रुवसन्धेस्तु भरतो नाम नामतः ।
भरतात् तु महातेजा असितो नाम जायत ॥ २७ ॥
' ध्रुवसन्धिसे भरत नामक यशस्वी पुत्रका जन्म हुआ । भरतसे महातेजस्वी असितकी उत्पत्ति हुई ॥ २७ ॥
यस्यैते प्रतिराजान उदपद्यन्त शत्रवः ।
हैहयास्तालजङ्घाश्च शूराश्च शशबिन्दवः ॥ २८ ॥
' राजा असितके साथ हैहय, तालजङ्घ और शशबिन्दु – इन तीन राजवंशोंके लोग शत्रुता रखने लगे थे ॥ २८ ॥
तांश्च स प्रतियुध्यन् वै युद्धे राजा प्रवासितः ।
हिमवन्तमुपागम्य भार्याभ्यां सहितस्तदा ॥ २ ९ ॥
' युद्धमें इन तीनों शत्रुओंका सामना करते हुए राजा असित प्रवासी हो गये । वे अपनी दो रानियोंके साथ हिमालयपर आकर रहने लगे ॥ २ ९ ॥
असितोऽल्पबलो राजा कालधर्ममुपेयिवान् ।
द्वे चास्य भार्ये गर्भिण्यौ बभूवतुरिति श्रुतिः ॥ ३० ॥
' राजा असितके पास बहुत थोड़ी सेना शेष रह गयी थी । वे हिमालयपर ही मृत्युको प्राप्त हो गये । उस समय उनकी दोनों रानियाँ गर्भवती थीं, ऐसा सुना गया है ॥ ३० ॥
एका गर्भविनाशार्थं सपल्यै सगरं ददौ । ' उनमेंसे एक रानीने अपनी सौतका गर्भ नष्ट करनेके लिये उसे विषयुक्त भोजन दे दिया ॥ ३०३ ॥
ततः शैलवरे रम्ये बभूवाभिरतो मुनिः ॥ ३१ ॥
भार्गवश्च्यवनो नाम हिमवन्तमुपाश्रितः ।
तत्र चैका महाभागा भार्गवं देववर्चसम् ॥ ३२ ॥
ववन्दे पद्मपत्राक्षी कांक्षन्ती सुतमुत्तमम् ।
तमृषिं साभ्युपागम्य कालिन्दी चाभ्यवादयत् ॥ ३३ ॥
' उस समय उस रमणीय एवं श्रेष्ठ पर्वतपर भृगुकुलमें उत्पन्न हुए महामुनि च्यवन तपस्यामें लगे हुए थे । हिमालयपर ही उनका आश्रम था । उन दोनों । रानियोंमेंसे एक ( जिसे जहर दिया गया था ) कालिन्दीनामसे प्रसिद्ध थी । विकसित कमलदलके समान नेत्रोंवाली | महाभागा कालिन्दी एक उत्तम पुत्र पानेकी इच्छा रखती थी । उसने देवतुल्य तेजस्वी भृगुनन्दन च्यवनके पास जाकर उन्हें प्रणाम किया ॥ ३१–३३ ॥
स तामभ्यवदद् विप्रः पुत्रेप्सुं पुत्रजन्मनि ।
तव कुक्षौ महाभागे सुपुत्रः सुमहाबलः ॥ ३४ ॥
महावीर्यो महातेजा अचिरात् संजनिष्यति ।
गरेण सहितः श्रीमान् मा शुचः कमलेक्षणे ॥ ३५ ॥
' उस समय ब्रह्मर्षि च्यवनने पुत्रकी अभिलाषा रखनेवाली कालिन्दीसे पुत्र - जन्मके विषयमें कहा-' महाभागे! तुम्हारे उदरमें एक महान् बलवान्, महातेजस्वी और महापराक्रमी उत्तम पुत्र है, वह कान्तिमान् बालक थोड़े ही दिनोंमें गर ( जहर ) के साथ उत्पन्न होगा । अतः कमललोचने! तुम पुत्रके लिये चिन्ता न करो ' ॥
च्यवनं च नमस्कृत्य राजपुत्री पतिव्रता ।
पत्या विरहिता तस्मात् पुत्रं देवी व्यजायत ॥ ३६ ॥
' वह विधवा राजकुमारी कालिन्दी बड़ी पतिव्रता थी । महर्षि च्यवनको नमस्कार करके वह देवी अपने आश्रमपर लौट आयी । फिर समय आनेपर उसने एक पुत्रको जन्म दिया ॥ ३६ ॥
सपल्या तु गरस्तस्यै दत्तो गर्भजिघांसया ।
सह तेन गरेणैव संजातः सगरोऽभवत् ॥ ३७ ॥
' उसकी सौतने उसके गर्भको नष्ट कर देनेके लिये जो गर ( विष ) दिया था, उसके साथ ही उत्पन्न होनेके कारण वह राजकुमार ' सगर ' नामसे विख्यात हुआ ॥ ३७ ॥
सगरस्यासमञ्जस्तु असमञ्जादथांशुमान् ।
दिलीपोंऽशुमतः पुत्रो दिलीपस्य भगीरथः ॥ ३८ ॥
' सगरके पुत्र असमंज और असमंजके पुत्र अंशुमान् हुए । अंशुमान्के पुत्र दिलीप और दिलीपके पुत्र भगीरथ हुए ॥ ३८ ॥
भगीरथात् ककुत्स्थश्च ककुत्स्थाच्च रघुस्तथा ।
रघोस्तु पुत्रस्तेजस्वी प्रवृद्धः पुरुषादकः ॥ ३ ९ ॥
' भगीरथसे ककुत्स्थ और ककुत्स्थसे रघुका जन्म हुआ । रघुके तेजस्वी पुत्र प्रवृद्ध हुए, जो शापसे राक्षस हो गये थे ॥ ३ ९ ॥
कल्माषपादोऽप्यभवत् तस्माज्जातस्तु शङ्खणः ।
सुदर्शनः शङ्खणस्य अग्निवर्णः सुदर्शनात् ॥ ४० ॥
' वे ही कल्माषपाद नामसे भी प्रसिद्ध हुए थे । उनसे शङ्खण नामक पुत्रका जन्म हुआ था । शङ्खणके पुत्र सुदर्शन और सुदर्शनके अग्निवर्ण हुए ॥ ४० ॥
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बालकाण्डे एकसप्ततितमः सर्गः २०५
शीघ्रगस्त्वग्निवर्णस्य शीघ्रगस्य मरुः सुतः ।
मरोः प्रशुश्रुकस्त्वासीदम्बरीषः प्रशुश्रुकात् ॥ ४१ ॥
' अग्निवर्णके शीघ्रग और शीघ्रगके पुत्र मरु थे । मरुसे प्रशुश्रुक और प्रशुश्रुकसे अम्बरीषकी उत्पत्ति हुई
अम्बरीषस्य पुत्रोऽभून्नहुषश्च महीपतिः ।
नहुषस्य ययातिस्तु नाभागस्तु ययातिजः ॥ ४२ ॥
नाभागस्य बभूवाज अजाद् दशरथोऽभवत् ।
अस्माद् दशरथाज्जातौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥ ४३ ॥
' अम्बरीषके पुत्र राजा नहुष हुए । नहुषके ययाति और ययातिके पुत्र नाभाग थे । नाभागके अज हुए । अजसे दशरथका जन्म हुआ । इन्हीं महाराज दशरथसे ये दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण उत्पन्न हुए हैं ॥ ४२-४३ ॥
आदिवंशविशुद्धानां राज्ञां परमधर्मिणाम् ।
इक्ष्वाकुकुलजातानां वीराणां सत्यवादिनाम् ॥ ४४ ॥
' इक्ष्वाकुकुलमें उत्पन्न हुए राजाओंका वंश आदिकालसे ही शुद्ध रहा है । ये सब - के - सब परम धर्मात्मा, वीर और सत्यवादी होते आये हैं ॥ ४४ ॥
रामलक्ष्मणयोरर्थे त्वत्सुते वरये नृप ।
सदृशाभ्यां नरश्रेष्ठ सदृशे दातुमर्हसि ॥। ४५ ॥
' नरश्रेष्ठ! नरेश्वर! इसी इक्ष्वाकुकुलमें उत्पन्न हुए श्रीराम और लक्ष्मणके लिये मैं आपकी दो कन्याओंका वरण करता हूँ । ये आपकी कन्याओंके योग्य हैं और आपकी कन्याएँ इनके योग्य । अतः आप इन्हें कन्यादान करें ' ॥ ४५ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे सप्ततितमः सर्गः ॥ ७० ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें सत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ७० ॥
एकसप्ततितमः सर्गः राजा जनकका अपने कुलका परिचय देते हुए श्रीराम और लक्ष्मणके लिये क्रमशः सीता और ऊर्मिलाको देनेकी प्रतिज्ञा करना
एवं ब्रुवाणं जनकः प्रत्युवाच कृताञ्जलिः ।
श्रोतुमर्हसि भद्रं ते कुलं नः परिकीर्तितम् ॥ १ ॥
प्रदाने हि मुनिश्रेष्ठ कुलं निरवशेषतः ।
वक्तव्यं कुलजातेन तन्निबोध महामते ॥ २ ॥
महर्षि वसिष्ठ जब इस प्रकार इक्ष्वाकुवंशका परिचय दे चुके, तब राजा जनकने हाथ जोड़कर उनसे कहा— ‘ मुनिश्रेष्ठ! आपका भला हो । अब हम भी अपने कुलका परिचय दे रहे हैं, सुनिये । महामते! कुलीन पुरुषके लिये कन्यादानके समय अपने कुलका पूर्णरूपेण परिचय देना आवश्यक है; अतः आप सुननेकी कृपा करें ॥ १-२ ॥
राजाभूत् त्रिषु लोकेषु विश्रुतः स्वेन कर्मणा ।
निमिः परमधर्मात्मा सर्वसत्त्ववतां वरः ॥ ३ ॥
' प्राचीन कालमें निमि नामक एक परम धर्मात्मा राजा हुए हैं, जो सम्पूर्ण धैर्यशाली महापुरुषोंमें श्रेष्ठ तथा अपने पराक्रमसे तीनों लोकोंमें विख्यात थे ॥ ३ ॥
तस्य पुत्रो मिथिर्नाम जनको मिथिपुत्रकः ।
प्रथमो जनको राजा जनकादप्युदावसुः ॥ ४ ॥
' उनके मिथि नामक एक पुत्र हुआ । मिथिके पुत्रका नाम जनक हुआ । ये ही हमारे कुलमें पहले जनक हुए हैं ( इन्हींके नामपर हमारे वंशका प्रत्येक राजा मिथिलानग ' जनक ' कहलाता है ) । जनकसे उदावसुका जन्म हुआ ॥ ४ ॥
उदावसोस्तु धर्मात्मा जातो वै नन्दिवर्धनः ।
नन्दिवर्धसुतः शूरः सुकेतुर्नाम नामतः ॥ ५ ॥
' उदावसुसे धर्मात्मा नन्दिवर्धन उत्पन्न हुए ।
नन्दिवर्धनके शूरवीर पुत्रका नाम सुकेतु हुआ ॥ ५ ॥
सुकेतोरपि धर्मात्मा देवरातो महाबलः ।
देवरातस्य राजर्षेर्बृहद्रथ इति स्मृतः ॥ ६ ॥
' सुकेतुके भी देवरात नामक पुत्र हुआ । देवरात महान् बलवान् और धर्मात्मा थे । राजर्षि देवरातके बृहद्रथ नामसे प्रसिद्ध एक पुत्र हुआ ॥६ ॥
बृहद्रथस्य शूरोऽभून्महावीरः प्रतापवान् ।
महावीरस्य धृतिमान् सुधृतिः सत्यविक्रमः ॥ ७ ॥
' बृहद्रथके पुत्र महावीर हुए, जो शूर और प्रतापी थे । महावीरके सुधृति हुए, जो धैर्यवान् और सत्यपराक्रमी थे ॥७ ॥
सुधृतेरपि धर्मात्मा धृष्टकेतुः सुधार्मिकः ।
धृष्टकेतोश्च राजर्षेर्हर्यश्व इति विश्रुतः ॥८ ॥
' सुधृतिके भी धर्मात्मा धृष्टकेतु हुए, जो परम धार्मिक थे । राजर्षि धृष्टकेतुका पुत्र हर्यश्व नामसे विख्यात हुआ ॥ ८ ॥
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२०६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे
हर्यश्वस्य मरुः पुत्रो मरोः पुत्रः प्रतीन्धकः ।
प्रतीन्धकस्य धर्मात्मा राजा कीर्तिरथः सुतः ॥ ९ ॥
' हर्यश्वके पुत्र मरु, मरुके पुत्र प्रतीन्धक तथा प्रतीन्धकके पुत्र धर्मात्मा राजा कीर्तिरथ हुए ॥ ९ ॥
पुत्रः कीर्तिरथस्यापि देवमीढ इति स्मृतः ।
देवमीढस्य विबुधो विबुधस्य महीधकः ॥ १० ॥
' कीर्तिरथके पुत्र देवमीढ नामसे विख्यात हुए ।
देवमीढके विबुध और विबुधके पुत्र महीभ्रक हुए ॥ १० ॥
महीधकसुतो राजा कीर्तिरातो महाबलः ।
कीर्तिरातस्य राजर्षेर्महारोमा व्यजायत ॥ ११ ॥
' महीध्रकके पुत्र महाबली राजा कीर्तिरात हुए ।
राजर्षि कीर्तिरातके महारोमा नामक पुत्र उत्पन्न हुआ ॥
महारोम्णस्तु धर्मात्मा स्वर्णरोमा व्यजायत ।
स्वर्णरोम्णस्तु राजर्षेर्हस्वरोमा व्यजायत ॥ १२ ॥
' महारोमासे धर्मात्मा स्वर्णरोमाका जन्म हुआ ।
राजर्षि स्वर्णरोमासे ह्रस्वरोमा उत्पन्न हुए ॥ १२ ॥
तस्य पुत्रद्वयं राज्ञो धर्मज्ञस्य महात्मनः ।
ज्येष्ठोऽहमनुजो भ्राता मम वीरः कुशध्वजः ॥ १३ ॥
' धर्मज्ञ महात्मा राजा ह्रस्वरोमाके दो पुत्र उत्पन्न हुए, जिनमें ज्येष्ठ तो मैं ही हूँ और कनिष्ठ मेरा छोटा भाई वीर कुशध्वज है ॥ १३ ॥
मां तु ज्येष्ठं पिता राज्ये सोऽभिषिच्य पिता मम ।
कुशध्वजं समावेश्य भारं मयि वनं गतः ॥ १४ ॥
‘ मेरे पिता मुझ ज्येष्ठ पुत्रको राज्यपर अभिषिक्त करके कुशध्वजका सारा भार मुझे सौंपकर वनमें चले गये ॥
वृद्धे पितरि स्वर्याते धर्मेण धुरमावहम् ।
भ्रातरं देवसंकाशं स्नेहात् पश्यन् कुशध्वजम् ॥ १५ ॥
' वृद्ध पिताके स्वर्गगामी हो जानेपर अपने देवतुल्य भाई कुशध्वजको स्नेह - दृष्टिसे देखता हुआ मैं इस राज्यका भार धर्मके अनुसार वहन करने लगा ॥ १५ ॥
कस्यचित्त्वथ कालस्य सांकाश्यादागतः पुरात् ।
सुधन्वा वीर्यवान् राजा मिथिलामवरोधकः ॥ १६ ॥
' कुछ कालके अनन्तर पराक्रमी राजा सुधन्वाने सांकाश्य नगरसे आकर मिथिलाको चारों ओरसे घेर लिया ॥ १६ ॥
स च मे प्रेषयामास शैवं धनुरनुत्तमम् ।
सीता च कन्या पद्माक्षी मह्यं वै दीयतामिति ॥ १७ ॥
' उसने मेरे पास दूत भेजकर कहलाया कि ' तुम शिवजीके परम उत्तम धनुष तथा अपनी कमलनयनी कन्या सीताको मेरे हवाले कर दो ' ॥ १७ ॥
तस्याप्रदानान्महर्षे युद्धमासीन्मया सह ।
स हतोऽभिमुखो राजा सुधन्वा तु मया रणे ॥ १८ ॥
' महर्षे! मैंने उसकी माँग पूरी नहीं की । इसलिये मेरे साथ उसका युद्ध हुआ । उस संग्राममें सम्मुख युद्ध करता हुआ राजा सुधन्वा मेरे हाथसे मारा गया ॥ १८ ॥
निहत्य तं मुनिश्रेष्ठ सुधन्वानं नराधिपम् ।
सांकाश्ये भ्रातरं शूरमभ्यषिञ्चं कुशध्वजम् ॥ १ ९ ॥
' मुनिश्रेष्ठ! राजा सुधन्वाका वध करके मैंने सांकाश्य नगरके राज्यपर अपने शूरवीर भ्राता कुशध्वजको अभिषिक्त कर दिया ॥ १ ९ ॥
कनीयानेष मे भ्राता अहं ज्येष्ठो महामुने ।
ददामि परमप्रीतो वध्वौ ते मुनिपुंगव ॥२० ॥
' महामुने! ये मेरे छोटे भाई कुशध्वज हैं और मैं इनका बड़ा भाई हूँ । मुनिवर! मैं बड़ी प्रसन्नताके साथ आपको दो बहुएँ प्रदान करता हूँ ॥ २० ॥
सीतां रामाय भद्रं ते ऊर्मिलां लक्ष्मणाय वै ।
वीर्यशुल्कां मम सुतां सीतां सुरसुतोपमाम् ॥ २१ ॥
द्वितीयामूर्मिलां चैव त्रिर्वदामि न संशयः ।
ददामि परमप्रीतो वध्वौ ते मुनिपुंगव ॥ २२ ॥
4 ' आपका भला हो! मैं सीताको श्रीरामके लिये और ऊर्मिलाको लक्ष्मणके लिये समर्पित करता हूँ । पराक्रम ही जिसको पानेका शुल्क ( शर्त ) था, उस देवकन्याके समान सुन्दरी अपनी प्रथम पुत्री सीताको श्रीरामके लिये तथा दूसरी पुत्री ऊर्मिलाको लक्ष्मणके लिये दे रहा हूँ । मैं इस बातको तीन बार दुहराता हूँ, इसमें संशय नहीं है । मुनिप्रवर! मैं परम प्रसन्न होकर आपको दो बहुएँ दे रहा हूँ ' ॥ २१-२२ ॥
रामलक्ष्मणयो राजन् गोदानं कारयस्व ह ।
पितृकार्यं च भद्रं ते ततो वैवाहिकं कुरु ॥ २३ ॥
( वसिष्ठजीसे ऐसा कहकर राजा जनकने महाराज दशरथसे कहा— ) ' राजन्! अब आप श्रीराम और लक्ष्मणके मंगलके लिये इनसे गोदान करवाइये, आपका कल्याण हो । नान्दीमुख श्राद्धका कार्य भी सम्पन्न कीजिये । इसके बाद विवाहका कार्य आरम्भ कीजियेगा ॥ २३ ॥
मघा ह्यद्य महाबाहो तृतीयदिवसे प्रभो ।
फल्गुन्यामुत्तरे राजंस्तस्मिन् वैवाहिकं कुरु ।
रामलक्ष्मणयोरर्थे दानं कार्यं सुखोदयम् ॥ २४ ॥
' महाबाहो! प्रभो! आज मघा नक्षत्र है । राजन्! आजके तीसरे दिन उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्रमें वैवाहिक
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बालकाण्डे द्विसप्ततितमः सर्गः २०७ कार्य कीजियेगा । आज श्रीराम और लक्ष्मणके | दान कराना चाहिये; क्योंकि वह भविष्यमें सुख
अभ्युदयके लिये ( गो, भूमि, तिल और सुवर्ण आदिका ) । देनेवाला होता है ' ॥ २४ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे एकसप्ततितमः सर्गः ॥ ७१ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें इकहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ७१ ॥
द्विसप्ततितमः सर्गः विश्वामित्रद्वारा भरत और शत्रुघ्नके लिये कुशध्वजकी कन्याओंका वरण, राजा जनकद्वारा इसकी स्वीकृति तथा राजा दशरथका अपने पुत्रोंके मंगलके लिये नान्दीश्राद्ध एवं गोदान करना
तमुक्तवन्तं वैदेहं विश्वामित्रो महामुनिः ।
उवाच वचनं वीरं वसिष्ठसहितो नृपम् ॥ १ ॥
विदेहराज जनक जब अपनी बात समाप्त कर चुके, तब वसिष्ठसहित महामुनि विश्वामित्र उन वीर नरेशसे इस प्रकार बोले - ॥ १ ॥
अचिन्त्यान्यप्रमेयाणि कुलानि नरपुंगव ।
इक्ष्वाकूणां विदेहानां नैषां तुल्योऽस्ति कश्चन ॥ २ ॥
' नरश्रेष्ठ! इक्ष्वाकु और विदेह दोनों ही राजाओंके वंश अचिन्तनीय हैं । दोनोंके ही प्रभावकी कोई सीमा नहीं है । इन दोनोंकी समानता करनेवाला दूसरा कोई राजवंश नहीं है ॥२ ॥
सदृशो धर्मसम्बन्धः सदृशो रूपसम्पदा ।
रामलक्ष्मणयो राजन् सीता चोर्मिलया सह ॥ ३ ॥
' राजन्! इन दोनों कुलोंमें जो यह धर्म-सम्बन्ध स्थापित होने जा रहा है, सर्वथा एक - दूसरेके योग्य है । रूप - वैभवकी दृष्टिसे भी समान योग्यताका है; क्योंकि ऊर्मिलासहित सीता श्रीराम और लक्ष्मणके अनुरूप है ॥ ३ ॥
वक्तव्यं च नरश्रेष्ठ श्रूयतां वचनं मम ।
भ्राता यवीयान् धर्मज्ञ एष राजा कुशध्वजः ॥ ४॥ ।
अस्य धर्मात्मनो राजन् रूपेणाप्रतिमं भुवि ।
सुताद्वयं नरश्रेष्ठ पत्यर्थं वरयामहे ॥ ५ ॥
भरतस्य कुमारस्य शत्रुघ्नस्य च धीमतः ।
वरये ते सुते राजंस्तयोरर्थे महात्मनोः ॥ ६ ॥
' नरश्रेष्ठ! इसके बाद मुझे भी कुछ कहना है; आप मेरी बात सुनिये । राजन्! आपके छोटे भाई जो ये धर्मज्ञ राजा कुशध्वज बैठे हैं, इन धर्मात्मा नरेशके भी दो कन्याएँ हैं, जो इस भूमण्डलमें अनुपम सुन्दरी । हैं । नरश्रेष्ठ! भूपाल! मैं आपकी उन दोनों कन्याओंका कुमार भरत और बुद्धिमान् शत्रुघ्न इन दोनों महामनस्वी राजकुमारोंके लिये इनकी धर्मपत्नी बनानेके उद्देश्यसे वरण करता हूँ॥४-६ ॥
पुत्रा दशरथस्येमे रूपयौवनशालिनः ।
लोकपालसमाः सर्वे देवतुल्यपराक्रमाः ॥ ७ ॥
' राजा दशरथके ये सभी पुत्र रूप और यौवनसे सुशोभित, लोकपालोंके समान तेजस्वी तथा देवताओंके तुल्य पराक्रमी हैं ॥७ ॥
उभयोरपि राजेन्द्र सम्बन्धेनानुबध्यताम् ।
इक्ष्वाकुकुलमव्यग्रं भवतः पुण्यकर्मणः ॥ ८ ॥
' राजेन्द्र! इन दोनों भाइयों ( भरत और शत्रुघ्न ) को भी कन्यादान करके आप इस समस्त इक्ष्वाकुकुलको अपने सम्बन्धसे बाँध लीजिये । आप पुण्यकर्मा पुरुष हैं; आपके चित्तमें व्यग्रता नहीं आनी चाहिये ( अर्थात् आप यह सोचकर व्यग्र न हों कि ऐसे महान् सम्राट्के साथ मैं एक ही समय चार वैवाहिक सम्बन्धोंका निर्वाह कैसे
कर सकता हूँ । ) ' ॥ ८ ॥
विश्वामित्रवचः श्रुत्वा वसिष्ठस्य मते तदा ।
जनकः प्राञ्जलिर्वाक्यमुवाच मुनिपुंगवौ ॥९ ॥
वसिष्ठजीकी सम्मतिके अनुसार विश्वामित्रजीका यह वचन सुनकर उस समय राजा जनकने हाथ जोड़कर उन दोनों मुनिवरोंसे कहा – ॥ ९ ॥
कुलं धन्यमिदं मन्ये येषां तौ मुनिपुंगवौ ।
सदृशं कुलसम्बन्धं यदाज्ञापयतः स्वयम् ॥१० ॥
' मुनिपुंगवो! मैं अपने इस कुलको धन्य मानता हूँ, जिसे आप दोनों इक्ष्वाकुवंशके योग्य समझकर इसके साथ सम्बन्ध जोड़नेके लिये स्वयं आज्ञा दे रहे हैं ॥
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२०८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे
एवं भवतु भद्रं वः कुशध्वजसुते इमे ।
पल्यौ भजेतां सहितौ शत्रुघ्नभरतावुभौ ॥ ११ ॥
' आपका कल्याण हो । आप जैसा कहते हैं, ऐसा ही हो । ये सदा साथ रहनेवाले दोनों भाई भरत और शत्रुघ्न कुशध्वजकी इन दोनों कन्याओं ( मेंसे एक-एक ) को अपनी - अपनी धर्मपत्नीके रूपमें ग्रहण करें ॥ ११ ॥
एकाह्य राजपुत्रीणां चतसृणां महामुने ।
पाणीन् गृह्णन्तु चत्वारो राजपुत्रा महाबलाः ॥ १२ ॥
' महामुने! ये चारों महाबली राजकुमार एक ही दिन हमारी चारों राजकुमारियोंका पाणिग्रहण करें ॥ १२ ॥
उत्तरे दिवसे ब्रह्मन् फल्गुनीभ्यां मनीषिणः ।
वैवाहिकं प्रशंसन्ति भगो यत्र प्रजापतिः ॥ १३ ॥
' ब्रह्मन्! अगले दो दिन फाल्गुनी नामक नक्षत्रोंसे युक्त हैं । इनमें ( पहले दिन तो पूर्वा फाल्गुनी है और ) दूसरे दिन ( अर्थात् परसों ) उत्तरा फाल्गुनी नामक नक्षत्र होगा, जिसके देवता प्रजापति भग ( तथा अर्यमा ) हैं । मनीषी पुरुष उस नक्षत्रमें वैवाहिक कार्य करना बहुत उत्तम बताते हैं ' ॥ १३ ॥
एवमुक्त्वा वचः सौम्यं प्रत्युत्थाय कृताञ्जलिः ।
उभौ मुनिवरौ राजा जनको वाक्यमब्रवीत् ॥ १४ ॥
इस प्रकार सौम्य ( मनोहर ) वचन कहकर राजा जनक ठठकर खड़े हो गये और उन दोनों मुनिवरोंसे हाथ जोड़कर बोले— ॥ १४ ॥
परो धर्मः कृतो मह्यं शिष्योऽस्मि भवतोस्तथा ।
इमान्यासनमुख्यानि आस्यतां मुनिपुंगवौ ॥ १५ ॥
' आपलोगोंने कन्याओंका विवाह निश्चित करके मेरे लिये महान् धर्मका सम्पादन कर दिया; मैं आप दोनोंका शिष्य हूँ । मुनिवरो! इन श्रेष्ठ आसनोंपर आप दोनों विराजमान हों ॥ १५ ॥
यथा दशरथस्येयं तथायोध्या पुरी मम ।
प्रभुत्वे नास्ति संदेहो यथार्हं कर्तुमर्हथ ॥ १६ ॥
' आपके लिये जैसी राजा दशरथकी अयोध्या है, वैसी ही यह मेरी मिथिलापुरी भी है । आपका इसपर पूरा अधिकार है, इसमें संदेह नहीं; अतः आप हमें यथायोग्य आज्ञा प्रदान करते रहें ' ॥ १६ ॥
तथा ब्रुवति वैदेहे जनके रघुनन्दनः ।
राजा दशरथो हृष्टः प्रत्युवाच महीपतिम् ॥ १७ ॥
विदेहराज जनकके ऐसा कहनेपर रघुकुलका आनन्द बढ़ानेवाले राजा दशरथने प्रसन्न होकर उन मिथिलानरेशको इस प्रकार उत्तर दिया- ॥ १७ ॥
युवामसंख्येयगुणौ भ्रातरौ मिथिलेश्वरौ ।
ऋषयो राजसङ्घाश्च भवद्भयामभिपूजिताः ॥ १८ ॥
' मिथिलेश्वर! आप दोनों भाइयोंके गुण असंख्य हैं; आपलोगोंने ऋषियों तथा राजसमूहोंका भलीभाँति सत्कार किया है ॥ १८ ॥
स्वस्ति प्राप्नुहि भद्रं ते गमिष्यामः स्वमालयम् ।
श्राद्धकर्माणि विधिवद्विधास्य इति चाब्रवीत् ॥ १ ९ ॥
' आपका कल्याण हो, आप मंगलके भागी हों । अब हम अपने विश्रामस्थानको जायँगे । वहाँ जाकर मैं विधिपूर्वक नान्दीमुखश्राद्धका कार्य सम्पन्न करूँगा । ' यह बात भी राजा दशरथने कही ॥ १ ९ ॥
तमापृष्ट्वा नरपतिं राजा दशरथस्तदा ।
मुनीन्द्रौ तौ पुरस्कृत्य जगामाशु महायशाः ॥ २० ॥
तदनन्तर मिथिलानरेशकी अनुमति ले महायशस्वी राजा दशरथ मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्र और वसिष्ठको आगे करके तुरंत अपने आवासस्थानपर चले गये ॥२० ॥
स गत्वा निलयं राजा श्राद्धं कृत्वा विधानतः ।
प्रभाते काल्यमुत्थाय चक्रे गोदानमुत्तमम् ॥ २१ ॥
डेरेपर जाकर राजा दशरथने ( अपराह्नकालमें ) विधिपूर्वक आभ्युदयिक श्राद्ध सम्पन्न किया । तत्पश्चात् ( रात बीतनेपर ) प्रातःकाल उठकर राजाने तत्कालोचित उत्तम गोदान - कर्म किया ॥ २१ ॥
गवां शतसहस्त्रं च ब्राह्मणेभ्यो नराधिपः ।
एकैकशो ददौ राजा पुत्रानुद्दिश्य धर्मतः ॥ २२ ॥
राजा दशरथने अपने एक - एक पुत्रके मंगलके लिये धर्मानुसार एक - एक लाख गौएँ ब्राह्मणोंको दान कीं ॥ २२ ॥
सुवर्णशृङ्ग्यः सम्पन्नाः सवत्साः कांस्यदोहनाः ।
गवां शतसहस्त्राणि चत्वारि पुरुषर्षभः ॥ २३ ॥
वित्तमन्यच्च सुबहु द्विजेभ्यो रघुनन्दनः ।
ददौ गोदानमुद्दिश्य पुत्राणां पुत्रवत्सलः ॥ २४ ॥
उन सबके सींग सोनेसे मढ़े हुए थे । उन सबके साथ बछड़े और काँसेके दुग्धपात्र थे । इस प्रकार पुत्रवत्सल रघुकुलनन्दन पुरुषशिरोमणि राजा दशरथने चार लाख गौओंका दान किया तथा और भी बहुत-सा धन पुत्रोंके लिये गोदानके उद्देश्यसे ब्राह्मणोंको दिया ॥ २३-२४ ॥