वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ — पृष्ठ 201–210
वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 201–210
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बालकाण्डे त्रिषष्टितमः सर्गः १८ ९
नेत्रधारी इन्द्र बड़े प्रसन्न हुए । उस समय उन्होंने प्राप्त किया ॥ २७ ॥
शुनःशेपको दीर्घायु प्रदान की ॥ २६ ॥ विश्वामित्रोऽपि धर्मात्मा भूयस्तेपे महातपाः ।
स च राजा नरश्रेष्ठ यज्ञस्य च समाप्तवान् । पुष्करेषु नरश्रेष्ठ दशवर्षशतानि च ॥ २८ ॥
फलं बहुगुणं राम सहस्त्राक्षप्रसादजम् ॥ २७ ॥ | पुरुषप्रवर! इसके बाद महातपस्वी धर्मात्मा
नरश्रेष्ठ श्रीराम! राजा अम्बरीषने भी देवराज विश्वामित्रने भी पुष्कर तीर्थमें पुनः एक हजार वर्षोंतक
इन्द्रकी कृपासे उस यज्ञका बहुगुणसम्पन्न उत्तम फल । तीव्र तपस्या की ॥२८ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे द्विषष्टितमः सर्गः ॥ ६२ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें बासठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६२ ॥
त्रिषष्टितमः सर्गः विश्वामित्रको ऋषि एवं महर्षिपदकी तथा ब्रह्मर्षिपदकी प्राप्तिके
पूर्णे वर्षसहस्त्रे तु व्रतस्नातं महामुनिम् ।
अभ्यगच्छन् सुराः सर्वे तपः फलचिकीर्षवः ॥ १ ॥
[ शतानन्दजी कहते हैं— श्रीराम! ] जब एक हजार वर्ष पूरे हो गये, तब उन्होंने व्रतकी समाप्तिका स्नान किया । स्नान कर लेनेपर महामुनि विश्वामित्रके पास सम्पूर्ण देवता उन्हें तपस्याका फल देनेकी इच्छासे आये ॥
अब्रवीत् सुमहातेजा ब्रह्मा सुरुचिरं वचः ।
ऋषिस्त्वमसि भद्रं ते स्वार्जितैः कर्मभिः शुभैः ॥ २ ॥
उस समय महातेजस्वी ब्रह्माजीने मधुर वाणीमें कहा- - ' मुने! तुम्हारा कल्याण हो । अब तुम अपने द्वारा उपार्जित शुभकर्मोंके प्रभावसे ऋषि हो गये ' ॥ २ ॥
तमेवमुक्त्वा देवेशस्त्रिदिवं पुनरभ्यगात् ।
विश्वामित्रो महातेजा भूयस्तेपे महत् तपः ॥ ३ ॥
उनसे ऐसा कहकर देवेश्वर ब्रह्माजी पुनः स्वर्गको चले गये । इधर महातेजस्वी विश्वामित्र पुनः बड़ी भारी तपस्यामें लग गये ॥ ३ ॥
ततः कालेन महता मेनका परमाप्सराः ।
पुष्करेषु नरश्रेष्ठ स्नातुं समुपचक्रमे ॥४ ॥
नरश्रेष्ठ! तदनन्तर बहुत समय व्यतीत होनेपर परम सुन्दरी अप्सरा मेनका पुष्करमें आयी और वहाँ स्नानकी तैयारी करने लगी ॥४ तां ददर्श महातेजा मेनकां रूपेणाप्रतिमां तत्र विद्युतं महातेजस्वी कुशिकनन्दन मेनकाको देखा । उसके रूप तुलना नहीं थी । जैसे बादलमें उसी प्रकार वह पुष्करके जलमें ॥
कुशिकात्मजः ।
जलदे यथा ॥ ५ ॥
विश्वामित्रने वहाँ उस और लावण्यकी कहीं बिजली चमकती हो, शोभा पा रही थी ॥ ५ ॥
प्राप्ति, मेनकाद्वारा उनका तपोभंग लिये उनकी घोर तपस्या
कन्दर्पदर्पवशगो मुनिस्तामिदमब्रवीत् ।
अप्सरः स्वागतं तेऽस्तु वस चेह ममाश्रमे ॥ ६ ॥
उसे देखकर विश्वामित्र मुनि कामके अधीन हो गये और उससे इस प्रकार बोले- ' अप्सरा! तेरा स्वागत है, तू मेरे इस आश्रममें निवास कर ॥६ ॥
अनुगृह्णीष्व भद्रं ते मदनेन विमोहितम् ।
इत्युक्ता सा वरारोहा तत्र वासमथाकरोत् ॥७ ॥
' तेरा भला हो । मैं कामसे मोहित हो रहा हूँ । मुझपर कृपा कर । ' उनके ऐसा कहनेपर सुन्दर कटिप्रदेशवाली मेनका वहाँ निवास करने लगी ॥७ ॥
तपसो हि महाविघ्नो विश्वामित्रमुपागमत् ।
तस्यां वसन्त्यां वर्षाणि पञ्च पञ्च च राघव ॥ ८ ॥
विश्वामित्राश्रमे सौम्ये सुखेन व्यतिचक्रमुः । इस प्रकार तपस्याका बहुत बड़ा विघ्न विश्वामित्रजीके पास स्वयं उपस्थित हो गया । रघुनन्दन! मेनकाको विश्वामित्रजीके उस सौम्य आश्रमपर रहते हुए दस वर्ष बड़े सुखसे बीते ॥ ८३ ॥
अथ काले गते तस्मिन् विश्वामित्रो महामुनिः ॥९ ॥
सव्रीड इव संवृत्तश्चिन्ताशोकपरायणः । इतना समय बीत जानेपर महामुनि विश्वामित्र
लज्जित - से हो गये । चिन्ता और शोकमें डूब गये ॥ ९ ३ ॥
बुद्धिर्मुनेः समुत्पन्ना सामर्षा रघुनन्दन ॥ १० ॥
सर्वं सुराणां कर्मैतत् तपोऽपहरणं महत् । रघुनन्दन! मुनिके मनमें रोषपूर्वक यह विचार उत्पन्न हुआ कि ' यह सब देवताओंकी करतूत है । उन्होंने हमारी तपस्याका अपहरण करनेके लिये यह महान् प्रयास किया है ॥१०३ ॥
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१ ९ ० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे... अहोरात्रापदेशेन गताः संवत्सरा दश ॥ ११ ॥
काममोहाभिभूतस्य विघ्नोऽयं प्रत्युपस्थितः । ‘ मैं कामजनित मोहसे ऐसा आक्रान्त हो गया कि मेरे दस वर्ष एक दिन - रातके समान बीत गये । यह मेरी तपस्यामें बहुत बड़ा विघ्न उपस्थित हो गया ' ॥ ११३ ॥
स निःश्वसन् मुनिवरः पश्चात्तापेन दुःखितः ॥ १२ ॥
ऐसा विचारकर मुनिवर विश्वामित्र लम्बी साँस खींचते हुए पश्चात्तापसे दुःखित हो गये ॥ १२ ॥
भीतामप्सरसं दृष्ट्वा वेपन्तीं प्राञ्जलिं स्थिताम् ।
मेनकां मधुरैर्वाक्यैर्विसृज्य कुशिकात्मजः ॥ १३ ॥
उत्तरं पर्वतं राम विश्वामित्रो जगाम ह । उस समय मेनका अप्सरा भयभीत हो थर - थर काँपती हुई हाथ जोड़कर उनके सामने खड़ी हो गयी । उसकी ओर देखकर कुशिकनन्दन विश्वामित्रने मधुर वचनोंद्वारा उसे विदा कर दिया और स्वयं वे उत्तर पर्वत ( हिमवान् ) पर चले गये ॥ १३३ ॥
स कृत्वा नैष्ठिकीं बुद्धिं जेतुकामो महायशाः ॥ १४ ॥
कौशिकीतीरमासाद्य तपस्तेपे दुरासदम् । वहाँ उन महायशस्वी मुनिने निश्चयात्मक बुद्धि आश्रय ले कामदेवको जीतनेके लिये कौशिकी - तटपर जाकर दुर्जय तपस्या आरम्भ की ॥ १४३ ॥
तस्य वर्षसहस्त्राणि घोरं तप उपासतः ॥ १५ ॥
उत्तरे पर्वते राम देवतानामभूद् भयम् । श्रीराम! वहाँ उत्तर पर्वतपर एक हजार वर्षोंतक घोर तपस्यामें लगे हुए विश्वामित्रसे देवताओंको बड़ा भय हुआ ॥ १५३ ॥
आमन्त्रयन् समागम्य सर्वे सर्षिगणाः सुराः ॥ १६ ॥
महर्षिशब्दं लभतां साध्वयं कुशिकात्मजः । सब देवता और ऋषि परस्पर मिलकर सलाह करने लगे- ' ये कुशिकनन्दन विश्वामित्र महर्षिकी पदवी प्राप्त करें, यही इनके लिये उत्तम बात होगी ' ॥ १६३ ॥
देवतानां वचः श्रुत्वा सर्वलोकपितामहः ॥ १७ ॥
अब्रवीन्मधुरं वाक्यं विश्वामित्रं तपोधनम् ।
महर्षे स्वागतं वत्स तपसोग्रेण तोषितः ॥ १८ ॥
महत्त्वमृषिमुख्यत्वं ददामि तव कौशिक । देवताओंकी बात सुनकर सर्वलोकपितामह ब्रह्माजी तपोधन विश्वामित्रके पास जा मधुर वाणीमें बोले-' महर्षे! तुम्हारा स्वागत है । वत्स कौशिक! मैं तुम्हारी | | उग्र तपस्यासे बहुत संतुष्ट हूँ और तुम्हें महत्ता एवं ऋषियोंमें श्रेष्ठता प्रदान करता हूँ ' ॥ १७-१८३ ॥ ब्रह्मणस्तु वचः श्रुत्वा विश्वामित्रस्तपोधनः ॥ १ ९ ॥
प्राञ्जलिः प्रणतो भूत्वा प्रत्युवाच पितामहम् ।
ब्रह्मर्षिशब्दमतुलं स्वार्जितैः कर्मभिः शुभैः ॥ २० ॥
यदि मे भगवन्नाह ततोऽहं विजितेन्द्रियः । ब्रह्माजीका यह वचन सुनकर तपोधन विश्वामित्र हाथ जोड़ प्रणाम करके उनसे बोले – ' भगवन्! यदि अपने द्वारा उपार्जित शुभकर्मोंके फलसे मुझे आप ब्रह्मर्षिका अनुपम पद प्रदान कर सकें तो मैं अपनेको जितेन्द्रिय समझँगा ' ॥ १ ९ -२० ३ ॥ तमुवाच ततो ब्रह्मा न तावत् त्वं जितेन्द्रियः ॥ २१ ॥
यतस्व मुनिशार्दूल इत्युक्त्वा त्रिदिवं गतः । तब ब्रह्माजीने उनसे कहा- - ' ' मुनिश्रेष्ठ! अभी तुम जितेन्द्रिय नहीं हुए हो । इसके लिये प्रयत्न करो । ' ऐसा कहकर वे स्वर्गलोकको चले गये ॥ २१३ ॥
विप्रस्थितेषु देवेषु विश्वामित्रो महामुनिः ॥ २२ ॥
ऊर्ध्वबाहुर्निरालम्बो वायुभक्षस्तपश्चरन् । देवताओंके चले जानेपर महामुनि विश्वामित्रने पुनः घोर तपस्या आरम्भ की । वे दोनों भुजाएँ ऊपर उठाये बिना किसी आधारके खड़े होकर केवल वायु पीकर रहते हुए तपमें संलग्न हो गये ॥ २२३ ॥
घर्मे पञ्चतपा भूत्वा वर्षास्वाकाशसंश्रयः ॥ २३ ॥
शिशिरे सलिलेशायी रात्र्यहानि तपोधनः ।
एवं वर्षसहस्त्रं हि तपो घोरमुपागमत् ॥ २४ ॥
गर्मी के दिनोंमें पञ्चाग्निका सेवन करते, वर्षाकालमें खुले आकाशके नीचे रहते और जाड़ेके समय रात - दिन पानीमें खड़े रहते थे । इस प्रकार उन तपोधनने एक हजार वर्षोंतक घोर तपस्या की । २३-२४ ॥
तस्मिन् संतप्यमाने तु विश्वामित्रे महामुनौ ।
संतापः सुमहानासीत् सुराणां वासवस्य च ॥ २५ ॥
महामुनि विश्वामित्रके इस प्रकार तपस्या करते समय देवताओं और इन्द्रके मनमें बड़ा भारी संताप हुआ ॥
रम्भामप्सरसं शक्रः सर्वैः सह मरुद्गणैः ।
उवाचात्महितं वाक्यमहितं कौशिकस्य च ॥ २६ ॥
समस्त मरुद्गणोंसहित इन्द्रने उस समय रम्भा अप्सरासे ऐसी बात कही, जो अपने लिये हितकर और विश्वामित्रके लिये अहितकर थी ॥ २६ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे त्रिषष्टितमः सर्गः ॥ ६३ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें तिरसठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६३ ॥
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बालकाण्डे चतुःषष्टितमः सर्गः १ ९ १ चतुःषष्टितमः सर्गः विश्वामित्रका रम्भाको शाप देकर पुनः घोर तपस्याके लिये दीक्षा लेना
सुरकार्यमिदं रम्भे कर्तव्यं सुमहत् त्वया ।
लोभनं कौशिकस्येह काममोहसमन्वितम् ॥ १ ॥
( इन्द्र बोले— ) रम्भे! देवताओंका एक बहुत बड़ा कार्य उपस्थित हुआ है । इसे तुम्हें ही पूरा करना है । तू महर्षि विश्वामित्रको इस प्रकार लुभा, जिससे वे काम और मोहके वशीभूत हो जायँ ॥ १ ॥
तथोक्ता साप्सरा राम सहस्त्राक्षेण धीमता ।
व्रीडिता प्राञ्जलिर्वाक्यं प्रत्युवाच सुरेश्वरम् ॥ २ ॥
श्रीराम! बुद्धिमान् इन्द्रके ऐसा कहनेपर वह अप्सरा लज्जित हो हाथ जोड़कर देवेश्वर इन्द्रसे बोली - ॥ २ ॥
अयं सुरपते घोरो विश्वामित्रो महामुनिः ।
क्रोधमुत्स्त्रक्ष्यते घोरं मयि देव न संशयः ॥ ३ ॥
' सुरपते! ये महामुनि विश्वामित्र बड़े भयंकर हैं । देव! इसमें संदेह नहीं कि ये मुझपर भयानक क्रोधका प्रयोग करेंगे ॥ ३ ॥
ततो हि मे भयं देव प्रसादं कर्तुमर्हसि ।
एवमुक्तस्तया राम सभयं भीतया तदा ॥ ४ ॥
तामुवाच सहस्त्राक्षो वेपमानां कृताञ्जलिम् ।
मा भैषी रम्भे भद्रं ते कुरुष्व मम शासनम् ॥ ५ ॥
' अतः देवेश्वर! मुझे उनसे बड़ा डर लगता है, आप मुझपर कृपा करें । ' श्रीराम! डरी हुई रम्भाके इस प्रकार भयपूर्वक कहनेपर सहस्र नेत्रधारी इन्द्र हाथ जोड़कर खड़ी और थर - थर काँपती हुई रम्भासे इस प्रकार बोले — ' रम्भे! तू भय न कर, तेरा भला हो, तू मेरी आज्ञा मान ले ॥ ४-५ ॥
कोकिलो हृदयग्राही माधवे रुचिरद्रुमे ।
अहं कन्दर्पसहितः स्थास्यामि तव पार्श्वतः ॥ ६ ॥
' वैशाख मासमें जब कि प्रत्येक वृक्ष नवपल्लवोंसे परम सुन्दर शोभा धारण कर लेता है, अपनी मधुर काकलीसे सबके हृदयको खींचनेवाले कोकिल और कामदेवके साथ मैं भी तेरे पास रहूँगा ॥ ६ ॥
त्वं हि रूपं बहुगुणं कृत्वा परमभास्वरम् ।
तमृषिं कौशिकं भद्रे भेदयस्व तपस्विनम् ॥ ७ ॥
' भद्रे! तू अपने परम कान्तिमान् रूपको हाव-भाव आदि विविध गुणोंसे सम्पन्न करके उसके द्वारा विश्वामित्र मुनिको तपस्यासे विचलित कर दे ' ॥ ७ ॥
सा श्रुत्वा वचनं तस्य कृत्वा रूपमनुत्तमम् ।
लोभयामास ललिता विश्वामित्रं शुचिस्मिता ॥ ८ ॥
देवराजका यह वचन सुनकर उस मधुर मुसकानवाली सुन्दरी अप्सराने परम उत्तम रूप बनाकर विश्वामित्रको लुभाना आरम्भ किया ॥८ ॥
कोकिलस्य तु शुश्राव वल्गु व्याहरतः स्वनम् ।
सम्प्रहृ मनसा स चैनामन्ववैक्षत ॥ ९ ॥
विश्वामित्रने मीठी बोली बोलनेवाले कोकिलकी मधुर काकली सुनी । उन्होंने प्रसन्नचित्त होकर जब उस ओर दृष्टिपात किया, तब सामने रम्भा खड़ी दिखायी दी ॥ ९ ॥
अथ तस्य च शब्देन गीतेनाप्रतिमेन च ।
दर्शनेन च रम्भाया मुनिः संदेहमागतः ॥ १० ॥
कोकिलके कलरव, रम्भाके अनुपम गीत और अप्रत्याशित दर्शनसे मुनिके मनमें संदेह हो गया ॥१० ॥
सहस्त्राक्षस्य तत्सर्वं विज्ञाय मुनिपुंगवः ।
रम्भां क्रोधसमाविष्टः शशाप कुशिकात्मजः ॥ ११ ॥
देवराजका वह सारा कुचक्र उनकी समझमें आ गया । फिर तो मुनिवर विश्वामित्रने क्रोधमें भरकर रम्भाको शाप देते हुए कहा – ॥ ११ ॥
यन्मां लोभयसे रम्भे कामक्रोधजयैषिणम् ।
दशवर्षसहस्राणि शैली स्थास्यसि दुर्भगे ॥१२ ॥
' दुर्भगे रम्भे! मैं काम और क्रोधपर विजय पाना चाहता हूँ और तू आकर मुझे लुभाती है । अतः इस अपराधके कारण तू दस हजार वर्षोंतक पत्थरकी प्रतिमा बनकर खड़ी रहेगी ॥ १२ ॥
ब्राह्मणः सुमहातेजास्तपोबलसमन्वितः ।
उद्धरिष्यति रम्भे त्वां मत्क्रोधकलुषीकृताम् ॥ १३ ॥
' रम्भे! शापका समय पूरा हो जानेके बाद एक महान् तेजस्वी और तपोबलसम्पन्न ब्राह्मण ( ब्रह्माजीके पुत्र वसिष्ठ ) मेरे क्रोधसे कलुषित तेरा उद्धार करेंगे ' ॥
एवमुक्त्वा महातेजा विश्वामित्रो महामुनिः ।
अशक्नुवन् धारयितुं कोपं संतापमात्मनः ॥ १४ ॥
ऐसा कहकर महातेजस्वी महामुनि विश्वामित्र अपना क्रोध न रोक सकनेके कारण मन - ही - मन संतप्त हो उठे ॥ १४ ॥
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१ ९ २ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे
तस्य शापेन महता रम्भा शैली तदाभवत् ।
वचः श्रुत्वा च कन्दर्पो महर्षेः स च निर्गतः ॥ १५ ॥
मुनिके उस महाशापसे रम्भा तत्काल पत्थरकी प्रतिमा बन गयी । महर्षिका वह शापयुक्त वचन सुनकर कन्दर्प और इन्द्र वहाँसे खिसक गये ॥ १५ ॥
कोपेन च महातेजास्तपोऽपहरणे कृते ।
इन्द्रियैरजितै राम न लेभे शान्तिमात्मनः ॥ १६ ॥
श्रीराम! क्रोधसे तपस्याका क्षय हो गया और इन्द्रियाँ अभीतक काबूमें न आ सकीं, यह विचारकर उन महातेजस्वी मुनिके चित्तको शान्ति नहीं मिलती थी ॥ १६ ॥
बभूवास्य मनश्चिन्ता तपोऽपहरणे कृते ।
नैवं क्रोधं गमिष्यामि न च वक्ष्ये कथंचन ॥ १७ ॥
तपस्याका अपहरण हो जानेपर उनके मनमें यह विचार उत्पन्न हुआ कि ‘ अबसे न तो क्रोध करूँगा और न किसी भी अवस्थामें मुँहसे कुछ बोलूँगा ॥ १७ ॥
अथवा नोच्छ्वसिष्यामि संवत्सरशतान्यपि ।
अहं हि शोषयिष्यामि आत्मानं विजितेन्द्रियः ॥ १८ ॥
' अथवा सौ वर्षोंतक मैं श्वास भी न लूँगा ।
इन्द्रियोंको जीतकर इस शरीरको सुखा डालूँगा ॥ १८ ॥
तावद् यावद्धि मे प्राप्तं ब्राह्मण्यं तपसार्जितम् ।
अनुच्छ्वसन्नभुञ्जानस्तिष्ठेयं शाश्वतीः समाः ॥ १ ९ ॥
' जबतक अपनी तपस्यासे उपार्जित ब्राह्मणत्व मुझे प्राप्त न होगा, तबतक चाहे अनन्त वर्ष बीत जायँ, मैं बिना खाये - पीये खड़ा रहूँगा और साँसतक न लूँगा ॥ १ ९ ॥ नहि मे तप्यमानस्य क्षयं यास्यन्ति मूर्तयः ।
एवं वर्षसहस्त्रस्य दीक्षां स मुनिपुंगवः ।
चकाराप्रतिमां लोके प्रतिज्ञां रघुनन्दन ॥ २० ॥
' तपस्या करते समय मेरे शरीरके अवयव कदापि नष्ट नहीं होंगे । ' रघुनन्दन! ऐसा निश्चय करके मुनिवर विश्वामित्रने पुनः एक हजार वर्षोंतक तपस्या करनेके लिये दीक्षा ग्रहण की । उन्होंने जो प्रतिज्ञा की थी, उसकी संसारमें कहीं तुलना नहीं | है ॥ २० ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे चतुःषष्टितमः सर्गः ॥ ६४ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें चौंसठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६४ ॥
पञ्चषष्टितमः सर्गः विश्वामित्रकी घोर तपस्या, उन्हें ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति तथा राजा जनकका उनकी प्रशंसा करके उनसे
अथ हैमवतीं राम दिशं त्यक्त्वा महामुनिः ।
पूर्वां दिशमनुप्राप्य तपस्तेपे सुदारुणम् ॥ १ ॥
( शतानन्दजी कहते हैं— ) श्रीराम! पूर्वोक्त प्रतिज्ञाके अनन्तर महामुनि विश्वामित्र उत्तर दिशाको त्यागकर पूर्व दिशामें चले गये और वहीं रहकर अत्यन्त कठोर तपस्या करने लगे ॥ १ ॥
मौनं वर्षसहस्त्रस्य कृत्वा व्रतमनुत्तमम् ।
चकाराप्रतिमं राम तपः परमदुष्करम् ॥ २ ॥
रघुनन्दन! एक सहस्र वर्षोंतक परम उत्तम मौन-व्रत धारण करके वे परम दुष्कर तपस्यामें लगे रहे । उनके उस तपकी कहीं तुलना न थी ॥ २ ॥
पूर्णे वर्षसहस्त्रे तु काष्ठभूतं महामुनिम् ।
विधैर्बहुभिराधूतं क्रो नान्तरमाविशत् ॥ ३ ॥
एक हजार वर्ष पूर्ण होनेतक वे महामुनि काष्ठकी भाँति निश्चेष्ट बने रहे । बीच - बीचमें उनपर बहुत - से विघ्नोंका आक्रमण हुआ, परंतु क्रोध उनके विदा ले राजभवनको लौटना भीतर नहीं घुसने पाया ॥ ३ ॥
स कृत्वा निश्चयं राम तप आतिष्ठताव्ययम् ।
तस्य वर्षसहस्त्रस्य व्रते पूर्णे महाव्रतः ॥४ ॥
भोक्तुमारब्धवानन्नं तस्मिन् काले रघूत्तम ।
इन्द्रो द्विजातिर्भूत्वा तं सिद्धमन्नमयाचत ॥५ ॥
श्रीराम! अपने निश्चयपर अटल रहकर उन्होंने अक्षय तपका अनुष्ठान किया । उनका एक सहस्र | वर्षोंका व्रत पूर्ण होनेपर वे महान् व्रतधारी महर्षि व्रत समाप्त करके अन्न ग्रहण करनेको उद्यत हुए । रघुकुलभूषण! इसी समय इन्द्रने ब्राह्मणके वेषमें आकर उनसे तैयार अन्नकी याचना की ॥ ४-५ ॥
तस्मै दत्त्वा तदा सिद्धं सर्वं विप्राय निश्चितः ।
निःशेषितेऽन्ने भगवानभुक्त्वैव महातपाः ॥ ६ ॥
तब उन्होंने वह सारा तैयार किया हुआ भोजन उस ब्राह्मणको देनेका निश्चय करके दे डाला । । उस अन्नमेंसे कुछ भी शेष नहीं बचा । इसलिये वे
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बालकाण्डे पञ्चषष्टितमः सर्गः १ ९ ३
महातपस्वी भगवान् विश्वामित्र बिना खाये - पीये ही ।
रह गये ॥ ६ ॥
न किंचिदवदद् विप्रं मौनव्रतमुपास्थितः ।
तथैवासीत् पुनर्मौनमनुच्छ्वासं चकार ह ॥ ७ ॥
फिर भी उन्होंने उस ब्राह्मणसे कुछ कहा नहीं । अपने मौन - व्रतका यथार्थरूपसे पालन किया । इसके बाद पुनः पहलेकी ही भाँति श्वासोच्छ्वाससे रहित मौन - व्रतका अनुष्ठान आरम्भ किया ॥ ७ ॥
अथ वर्षसहस्त्रं च नोच्छ्वसन् मुनिपुंगवः ।
तस्यानुच्छ्वसमानस्य मूर्ध्नि धूमो व्यजायत ॥ ८ ॥
पूरे एक हजार वर्षोंतक उन मुनिश्रेष्ठने साँसतक नहीं ली । इस तरह साँस न लेनेके कारण उनके मस्तकसे धुआँ उठने लगा ॥ ८ ॥
त्रैलोक्यं येन सम्भ्रान्तमातापितमिवाभवत् ।
ततो देवर्षिगन्धर्वाः पन्नगोरगराक्षसाः ॥ ९ ॥
मोहितास्तपसा तस्य तेजसा मन्दरश्मयः ।
कश्मलोपहताः सर्वे पितामहमथाब्रुवन् ॥ १० ॥
उससे तीनों लोकोंके प्राणी घबरा उठे, सभी संतप्त - से होने लगे । उस समय देवता, ऋषि, गन्धर्व, नाग, सर्प और राक्षस सब मुनिकी तपस्यासे मोहित हो । गये । उनके तेजसे सबकी कान्ति फीकी पड़ गयी । वे सब - के - सब दुःखसे व्याकुल हो पितामह ब्रह्माजीसे बोले - ॥ ९ -१० ॥
बहुभिः कारणैर्देव विश्वामित्रो महामुनिः ।
लोभितः क्रोधितश्चैव तपसा चाभिवर्धते ॥ ११ ॥
' देव! अनेक प्रकारके निमित्तोंद्वारा महामुनि विश्वामित्रको लोभ और क्रोध दिलानेकी चेष्टा की गयी; किंतु वे अपनी तपस्याके प्रभावसे निरन्तर आगे बढ़ते जा रहे हैं ॥ ११ ॥
नह्यस्य वृजिनं किंचिद् दृश्यते सूक्ष्ममप्युत ।
न दीयते यदि त्वस्य मनसा यदभीप्सितम् ॥ १२ ॥
विनाशयति त्रैलोक्यं तपसा सचराचरम् ।
व्याकुलाश्च दिशः सर्वा न च किंचित् प्रकाशते ॥ १३ ॥
' हमें उनमें कोई छोटा - सा भी दोष नहीं दिखायी देता । यदि इन्हें इनकी मनचाही वस्तु नहीं दी गयी तो ये अपनी तपस्यासे चराचर प्राणियोंसहित तीनों लोकोंका नाश कर डालेंगे । इस समय सारी दिशाएँ धूमसे आच्छादित हो गयी हैं, कहीं कुछ भी सूझता नहीं है ॥
सागराः क्षुभिताः सर्वे विशीर्यन्ते च पर्वताः ।
प्रकम्पते च वसुधा वायुवतीह संकुलः ॥ १४ ॥
75 Srimad Valmiki Ramayan ( 1 ) _Section_8_1_Front ' समुद्र क्षुब्ध हो उठे हैं, सारे पर्वत विदीर्ण हुए जाते हैं, धरती डगमग हो रही है और प्रचण्ड आँधी चलने लगी है ॥ १४ ॥
ब्रह्मन् न प्रतिजानीमो नास्तिको जायते जनः ।
सम्मूढमिव त्रैलोक्यं सम्प्रक्षुभितमानसम् ॥ १५ ॥
' ब्रह्मन्! हमें इस उपद्रवके निवारणका कोई उपाय नहीं समझमें आता है । सब लोग नास्तिककी भाँति कर्मानुष्ठानसे शून्य हो रहे हैं । तीनों लोकोंके प्राणियोंका मन क्षुब्ध हो गया है । सभी किंकर्तव्यविमूढ़— से हो रहे हैं ॥ १५ ॥
भास्करो निष्प्रभश्चैव महर्षेस्तस्य तेजसा ।
बुद्धिं न कुरुते यावन्नाशे देव महामुनिः ॥ १६ ॥
तावत् प्रसादो भगवन्नग्निरूपो महाद्युतिः । ' महर्षि विश्वामित्रके तेजसे सूर्यकी प्रभा फीकी पड़ गयी है । भगवन्! ये महाकान्तिमान् मुनि अग्निस्वरूप हो रहे हैं । देव! महामुनि विश्वामित्र जबतक जगत्के विनाशका विचार नहीं करते तबतक ही इन्हें प्रसन्न कर लेना चाहिये ॥ १६३ ॥
कालाग्निना यथा पूर्वं त्रैलोक्यं दह्यतेऽखिलम् ॥ १७ ॥
देवराज्यं चिकीर्षेत दीयतामस्य यन्मनः । ' जैसे पूर्वकालमें प्रलयकालिक अग्निने सम्पूर्ण त्रिलोकीको दग्ध कर डाला था, उसी प्रकार ये भी सबको जलाकर भस्म कर देंगे । यदि ये देवताओंका
राज्य प्राप्त करना चाहें तो वह भी इन्हें दे दिया जाय ।
इनके मनमें जो भी अभिलाषा हो, उसे पूर्ण किया जाय ' ॥
ततः सुरगणाः सर्वे पितामहपुरोगमाः ॥ १८ ॥
विश्वामित्रं महात्मानं वाक्यं मधुरमब्रुवन् । तदनन्तर ब्रह्मा आदि सब देवता महात्मा विश्वामित्रके पास जाकर मधुर वाणीमें बोले – ॥ १८३ ॥
ब्रह्मर्षे स्वागतं तेऽस्तु तपसा स्म सुतोषिताः ॥ १ ९ ॥ ब्राह्मण्यं तपसोग्रेण प्राप्तवानसि कौशिक । ' ब्रह्मर्षे! तुम्हारा स्वागत है, हम तुम्हारी तपस्यासे बहुत संतुष्ट हुए हैं । कुशिकनन्दन! तुमने अपनी उग्र तपस्यासे ब्राह्मणत्व प्राप्त कर लिया ॥ १ ९ ३ ॥ दीर्घमायुश्च ते ब्रह्मन् ददामि समरुद्गणः ॥२० ॥
स्वस्ति प्राप्नुहि भद्रं ते गच्छ सौम्य यथासुखम् । ' ब्रह्मन्! मरुद्गणोंसहित मैं तुम्हें दीर्घायु प्रदान करता हूँ । तुम्हारा कल्याण हो । सौम्य! तुम मंगलके भागी बनो और तुम्हारी जहाँ इच्छा हो वहाँ सुखपूर्वक जाओ ' ॥ २०३ ॥
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१ ९ ४ ' श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे पितामहवचः श्रुत्वा सर्वेषां त्रिदिवौकसाम् ॥ २१ ॥
कृत्वा प्रणामं मुदितो व्याजहार महामुनिः । पितामह ब्रह्माजीकी यह बात सुनकर महामुनि विश्वामित्रने अत्यन्त प्रसन्न होकर सम्पूर्ण देवताओंको प्रणाम किया और कहा- ॥ २१३ ॥
ब्राह्मण्यं यदि मे प्राप्तं दीर्घमायुस्तथैव च ॥ २२ ॥
ॐकारोऽथ वषट्कारो वेदाश्च वरयन्तु माम् ।
क्षत्रवेदविदां श्रेष्ठो ब्रह्मवेदविदामपि ॥ २३ ॥
ब्रह्मपुत्रो वसिष्ठो मामेवं वदतु देवताः ।
यद्येवं परमः कामः कृतो यान्तु सुरर्षभाः ॥ २४ ॥
' देवगण! यदि मुझे ( आपकी कृपासे ) ब्राह्मणत्व मिल गया और दीर्घ आयुकी भी प्राप्ति हो गयी तो ॐकार, वषट्कार और चारों वेद स्वयं आकर मेरा वरण करें । आदि ) तथा ज्ञाताओंमें भी आकर मुझसे ऐसा हो जाय हो गया । उस जा सकते हैं इसके सिवा जो क्षत्रिय - वेद ( धनुर्वेद ब्रह्मवेद ( ऋक् आदि चारों वेद ) के सबसे श्रेष्ठ हैं, वे ब्रह्मपुत्र वसिष्ठ स्वयं ऐसा कहें ( कि तुम ब्राह्मण हो गये ), यदि तो मैं समझँगा कि मेरा उत्तम मनोरथ पूर्ण अवस्थामें आप सभी श्रेष्ठ देवगण यहाँसे ' ॥ २२–२४ ॥
ततः प्रसादितो देवैर्वसिष्ठो जपतां वरः ।
सख्यं चकार ब्रह्मर्षिरेवमस्त्विति चाब्रवीत् ॥ २५ ॥
तब देवताओंने मन्त्रजप करनेवालोंमें श्रेष्ठ वसिष्ठ मुनिको प्रसन्न किया । इसके बाद ब्रह्मर्षि वसिष्ठने ' एवमस्तु ' कहकर विश्वामित्रका ब्रह्मर्षि होना स्वीकार कर लिया और उनके साथ मित्रता स्थापित कर ली ॥ २५ ॥
ब्रह्मर्षिस्त्वं न संदेहः सर्वं सम्पद्यते तव ।
इत्युक्त्वा देवताश्चापि सर्वा जग्मुर्यथागतम् ॥ २६ ॥
' मुने! तुम ब्रह्मर्षि हो गये, इसमें संदेह नहीं है । तुम्हारा सब ब्राह्मणोचित संस्कार सम्पन्न हो गया । ' ऐसा कहकर सम्पूर्ण देवता जैसे आये थे वैसे लौट गये ॥ २६ ॥
विश्वामित्रो ऽपि धर्मात्मा लब्ध्वा ब्राह्मण्यमुत्तमम् ।
पूजयामास ब्रह्मर्षि वसिष्ठं जपतां वरम् ॥ २७ ॥
इस प्रकार उत्तम ब्राह्मणत्व प्राप्त करके धर्मात्मा विश्वामित्रजीने भी मन्त्र जप करनेवालोंमें श्रेष्ठ ब्रह्मर्षि वसिष्ठका पूजन किया ॥ २७ ॥
कृतकामो महीं सर्वां चचार तपसि स्थितः ।
एवं त्वनेन ब्राह्मण्यं प्राप्तं राम महात्मना ॥ २८ ॥
इस तरह अपना मनोरथ सफल करके तपस्यामें । लगे रहकर ही ये सम्पूर्ण पृथ्वीपर विचरने लगे । श्रीराम! इस प्रकार कठोर तपस्या करके इन महात्माने ब्राह्मणत्व प्राप्त किया ॥ २८ ॥
एष राम मुनिश्रेष्ठ एष विग्रहवांस्तपः ।
एष धर्मः परो नित्यं वीर्यस्यैष परायणम् ॥ २ ९ ॥
रघुनन्दन! ये विश्वामित्रजी समस्त मुनियोंमें श्रेष्ठ हैं, ये तपस्याके मूर्तिमान् स्वरूप हैं, उत्तम धर्मके साक्षात् विग्रह हैं और पराक्रमकी परम निधि हैं ॥ २ ९ ॥
एवमुक्त्वा महातेजा विरराम द्विजोत्तमः ।
शतानन्दवचः श्रुत्वा रामलक्ष्मणसंनिधौ ॥ ३० ॥
जनकः प्राञ्जलिर्वाक्यमुवाच कुशिकात्मजम् । ऐसा कहकर महातेजस्वी विप्रवर शतानन्दजी चुप हो गये । शतानन्दजीके मुखसे यह कथा सुनकर महाराज जनकने श्रीराम और लक्ष्मणके समीप विश्वामित्रजीसे हाथ जोड़कर कहा- ॥ ३०३ ॥
धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि यस्य मे मुनिपुंगव ॥ ३१ ॥
यज्ञं काकुत्स्थसहितः प्राप्तवानसि कौशिक ।
पावितोऽहं त्वया ब्रह्मन् दर्शनेन महामुने ॥ ३२ ॥
' मुनिप्रवर कौशिक! आप ककुत्स्थकुलनन्दन श्रीराम और लक्ष्मणके साथ मेरे यज्ञमें पधारे, इससे मैं धन्य हो गया । आपने मुझपर बड़ी कृपा की । महामुने! ब्रह्मन्! आपने दर्शन देकर मुझे पवित्र कर दिया ॥
गुणा बहुविधाः प्राप्तास्तव संदर्शनान्मया ।
विस्तरेण च वै ब्रह्मन् कीर्त्यमानं महत्तपः ॥ ३३ ॥
श्रुतं मया महातेजो रामेण च महात्मना ।
सदस्यैः प्राप्य च सदः श्रुतास्ते बहवो गुणाः ॥ ३४ ॥
' आपके दर्शनसे मुझे बड़ा लाभ हुआ, अनेक प्रकारके गुण उपलब्ध हुए । ब्रह्मन्! आज इस सभा में आकर मैंने महात्मा राम तथा अन्य सदस्योंके साथ आपके महान् तेज ( प्रभाव ) का वर्णन सुना है, बहुत-से गुण सुने हैं । ब्रह्मन्! शतानन्दजीने आपके महान् तपका वृत्तान्त विस्तारपूर्वक बताया है ॥ ३३-३४ ॥
अप्रमेयं तपस्तुभ्यमप्रमेयं च ते बलम् ।
अप्रमेया गुणाश्चैव नित्यं ते कुशिकात्मज ॥ ३५ ॥
' कुशिकनन्दन! आपकी तपस्या अप्रमेय है, आपका बल अनन्त है तथा आपके गुण भ सदा ही माप और संख्यासे परे हैं ॥ ३५ ॥
तृप्तिराश्चर्यभूतानां कथानां नास्ति मे विभो ।
कर्मकालो मुनिश्रेष्ठ लम्बते रविमण्डलम् ॥ ३६ ॥
। ' प्रभो! आपकी आश्चर्यमयी कथाओंके श्रवणंसे 75 Srimad Valmiki Ramayan ( 1 ) _Section_8_1_Back
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बालकाण्डे षट्षष्टितमः सर्गः.१.१५
मुझे तृप्ति नहीं होती है; किंतु मुनिश्रेष्ठ! यज्ञका समय ।
हो गया है, सूर्यदेव ढलने लगे हैं ॥ ३६ ॥
श्वः प्रभाते महातेजो द्रष्टुमर्हसि मां पुनः ।
स्वागतं जपतां श्रेष्ठ मामनुज्ञातुमर्हसि ॥ ३७ ॥
‘ जप करनेवालोंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी मुने! आपका स्वागत है । कल प्रात: काल फिर मुझे दर्शन दें, इस समय मुझे जानेकी आज्ञा प्रदान करें ' ॥ ३७ ॥
एवमुक्तो मुनिवरः प्रशस्य पुरुषर्षभम् ।
विससर्जाशु जनकं प्रीतं प्रीतमनास्तदा ॥ ३८ ॥
राजाके ऐसा कहनेपर मुनिवर विश्वामित्रजी मन - ही - मन बड़े प्रसन्न हुए । उन्होंने प्रीतियुक्त नरश्रेष्ठ राजा जनककी प्रशंसा करके शीघ्र ही उन्हें विदा कर दिया ॥ ३८ ॥
एवमुक्त्वा मुनिश्रेष्ठं वैदेहो मिथिलाधिपः ।
प्रदक्षिणं चकाराशु सोपाध्यायः सबान्धवः ॥ ३ ९ ॥
उस समय मिथिलापति विदेहराज जनकने मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्रसे पूर्वोक्त बात कहकर अपने उपाध्याय और
बन्धु - बान्धवोंके साथ उनकी शीघ्र ही परिक्रमा की ।
फिर वहाँसे वे चल दिये ॥ ३ ९ ॥
विश्वामित्रो ऽपि धर्मात्मा सहरामः सलक्ष्मणः ।
स्ववासमभिचक्राम पूज्यमानो महात्मभिः ॥ ४० ॥
तत्पश्चात् धर्मात्मा विश्वामित्र भी महात्माओंसे
पूजित होकर श्रीराम और लक्ष्मणके साथ अपने विश्राम-। स्थानपर लौट आये ॥ ४० ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे पञ्चषष्टितमः सर्गः ॥ ६५ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें पैंसठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६५ ॥।
षट्षष्टितमः सर्गः राजा जनकका विश्वामित्र और राम - लक्ष्मणका सत्कार करके उन्हें अपने यहाँ रखे हुए धनुषका परिचय देना और धनुष चढ़ा देनेपर श्रीरामके साथ उनके ब्याहका
ततः प्रभाते विमले कृतकर्मा नराधिपः ।
विश्वामित्रं महात्मानमाजुहाव सराघवम् ॥ १ ॥
तमर्चयित्वा धर्मात्मा शास्त्रदृष्टेन कर्मणा ।
राघवौ च महात्मानौ तदा वाक्यमुवाच ह ॥ २ ॥
तदनन्तर दूसरे दिन निर्मल प्रभातकाल आनेपर • धर्मात्मा राजा जनकने अपना नित्य नियम पूरा करके श्रीराम और लक्ष्मणसहित महात्मा विश्वामित्रजीको बुलाया और शास्त्रीय विधिके अनुसार मुनि तथा ` उन दोनों महामनस्वी राजकुमारोंका पूजन करके इस प्रकार कहा- ॥ १-२ ॥
भगवन् स्वागतं तेऽस्तु किं करोमि तवानघ ।
भवानाज्ञापयतु मामाज्ञाप्यो भवता ह्यहम् ॥ ३ ॥
‘ भगवन्! आपका स्वागत है । निष्पाप महर्षे! आप मुझे आज्ञा दीजिये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ; क्योंकि मैं आपका आज्ञापालक हूँ ' ॥ ३ ॥
एवमुक्तः स धर्मात्मा जनकेन महात्मना ।
प्रत्युवाच मुनिश्रेष्ठो वाक्यं वाक्यविशारदः ॥ ४ ॥
महात्मा जनकके ऐसा कहनेपर बोलनेमें कुशल धर्मात्मा मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्रने उनसे यह बात कही - ॥ ४ ॥
75 Srimad Valmiki Ramayan ( 1 ) _Section_8_2_Front निश्चय प्रकट करना
पुत्रौ दशरथस्येमा क्षत्रियौ लोकविश्रुतौ ।
द्रष्टुकामौ धनुःश्रेष्ठं यदेतत्त्वयि तिष्ठति ॥ ५ ॥
' महाराज! राजा दशरथके ये दोनों पुत्र विश्वविख्यात क्षत्रिय वीर हैं और आपके यहाँ जो यह श्रेष्ठ धनुष रखा है, उसे देखनेकी इच्छा रखते हैं ॥५ ॥
एतद् दर्शय भद्रं ते कृतकामौ नृपात्मजौ ।
दर्शनादस्य धनुषो यथेष्टं प्रतियास्यतः ॥ ६ ॥
' आपका कल्याण हो, वह धनुष इन्हें दिखा दीजिये । इससे इनकी इच्छा पूरी हो जायगी । फिर ये दोनों राजकुमार उस धनुषके दर्शनमात्रसे संतुष्ट हो इच्छानुसार अपनी राजधानीको लौट एवमुक्तस्तु जनकः प्रत्युवाच श्रूयतामस्य धनुषो यदर्थमिह मुनिके ऐसा कहनेपर राजा विश्वामित्रसे बोले – ' मुनिवर! इस सुनिये । जिस उद्देश्यसे यह धनुष वह सब बताता हूँ ॥७ ॥
देवरात इति ख्यातो निमेर्ज्येष्ठो जायँगे ' ॥ ६ ॥
महामुनिम् ।
तिष्ठति ॥ ७ ॥
जनक महामुनि धनुषका वृत्तान्त यहाँ रखा गया,
महीपतिः ।
न्यासोऽयं तस्य भगवन् हस्ते दत्तो महात्मनः ॥८ ॥
' भगवन्! निमिके ज्येष्ठ पुत्र राजा देवरातके
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१ ९ ६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे नामसे विख्यात थे । उन्हीं महात्माके हाथमें यह धनुष धरोहरके रूपमें दिया गया था ॥ ८ ॥
दक्षयज्ञवधे पूर्वं धनुरायम्य वीर्यवान् ।
विध्वंस्य त्रिदशान् रोषात् सलीलमिदमब्रवीत् ॥ ९ ॥
यस्माद् भागार्थिनो भागं नाकल्पयत मे सुराः ।
वरांगानि महार्हाणि धनुषा शातयामि वः ॥ १० ॥
' कहते हैं, पूर्वकालमें दक्षयज्ञ - विध्वंसके समय परम पराक्रमी भगवान् शङ्करने खेल - खेलमें ही रोषपूर्वक इस धनुषको उठाकर यज्ञ - विध्वंसके पश्चात् देवताओंसे कहा — ' देवगण! मैं यज्ञमें भाग प्राप्त करना चाहता था, किंतु तुमलोगोंने नहीं दिया । इसलिये इस धनुषसे मैं तुम सब लोगोंके परम पूजनीय श्रेष्ठ अंग - मस्तक काट डालूँगा ' ॥ ९ -१० ॥
ततो विमनसः सर्वे देवा वै मुनिपुंगव ।
प्रसादयन्त देवेशं तेषां प्रीतोऽभवद् भवः ॥ ११ ॥
' मुनिश्रेष्ठ! यह सुनकर सम्पूर्ण देवता उदास हो गये और स्तुतिके द्वारा देवाधिदेव महादेवजीको प्रसन्न करने लगे । अन्तमें उनपर भगवान् शिव प्रसन्न हो गये ॥ ११ ॥
प्रीतियुक्तस्तु सर्वेषां ददौ तेषां महात्मनाम् ।
तदेतद् देवदेवस्य धनूरत्नं महात्मनः ॥ १२ ॥
न्यासभूतं तदा न्यस्तमस्माकं पूर्वजे विभौ । ' प्रसन्न होकर उन्होंने उन सब महामनस्वी देवताओंको यह धनुष अर्पण कर दिया । वही यह देवाधिदेव महात्मा भगवान् शङ्करका धनुष - रत्न है, जो मेरे पूर्वज महाराज देवरातके पास धरोहरके रूपमें रखा गया था ॥ १२३ ॥
अथ मे कृषतः क्षेत्रं लांगलादुत्थिता ततः ॥ १३ ॥
क्षेत्रं शोधयता लब्धा नाम्ना सीतेति विश्रुता ।
भूतलादुत्थिता सा तु व्यवर्धत ममात्मजा ॥ १४ ॥
' एक दिन मैं यज्ञके लिये भूमिशोधन करते समय खेतमें हल चला रहा था । उसी समय हलके अग्रभागसे जोती गयी भूमि ( हराई या सीता ) से एक कन्या प्रकट हुई । सीता ( हलद्वारा खींची गयी रेखा ) से उत्पन्न होनेके कारण उसका नाम सीता रखा गया । पृथ्वीसे प्रकट हुई वह मेरी कन्या क्रमशः बढ़कर सयानी हुई ॥ १३-१४ ॥
वीर्यशुल्केति मे कन्या स्थापितेयमयोनिजा ।
भूतलादुत्थितां तां तु वर्धमानां ममात्मजाम् ॥ १५ ॥
वरयामासुरागत्य राजानो मुनिपुंगव । ‘ अपनी इस अयोनिजा कन्याके विषयमें मैंने यह निश्चय किया कि जो अपने पराक्रमसे इस धनुषको चढ़ा । देगा, उसीके साथ मैं इसका ब्याह करूँगा । इस तरह इसे वीर्यशुल्का ( पराक्रमरूप शुल्कवाली ) बनाकर अपने घरमें रख छोड़ा है । मुनिश्रेष्ठ! भूतलसे प्रकट होकर दिनों - दिन बढ़नेवाली मेरी पुत्री सीताको कई राजाओंने यहाँ आकर माँगा ॥ १५३ ॥
तेषां वरयतां कन्यां सर्वेषां पृथिवीक्षिताम् ॥ १६ ॥
वीर्यशुल्केति भगवन् न ददामि सुतामहम् । ' परंतु भगवन्! कन्याका वरण करनेवाले उन सभी राजाओंको मैंने यह बता दिया कि मेरी कन्या वीर्यशुल्का है । ( उचित पराक्रम प्रकट करनेपर ही कोई पुरुष उसके साथ विवाह करनेका अधिकारी हो सकता है । ) यही कारण है कि मैंने आजतक किसीको अपनी कन्या नहीं दी ॥ १६३ ॥
ततः सर्वे नृपतयः समेत्य मुनिपुंगव ॥ १७ ॥
मिथिलामप्युपागम्य वीर्यं जिज्ञासवस्तदा । ' मुनिपुंगव! तब सभी राजा मिलकर मिथिलामें आये और पूछने लगे कि राजकुमारी सीताको प्राप्त करनेके लिये कौन - सा पराक्रम निश्चित किया गया है ॥ तेषां जिज्ञासमानानां शैवं धनुरुपाहृतम् ॥ १८ ॥
न शेकुर्ग्रहणे तस्य धनुषस्तोलनेऽपि वा । ' मैंने पराक्रमकी जिज्ञासा करनेवाले उन राजाओंके सामने यह शिवजीका धनुष रख दिया; परंतु वे लोग इसे उठाने या हिलानेमें भी समर्थ न हो सके ॥ १८३ ॥
तेषां वीर्यवतां वीर्यमल्पं ज्ञात्वा महामुने ॥१ ९ ॥ प्रत्याख्याता नृपतयस्तन्निबोध तपोधन । ' महामुने! उन पराक्रमी नरेशोंकी शक्ति बहुत थोड़ी जानकर मैंने उन्हें कन्या देनेसे इनकार कर दिया । तपोधन! इसके बाद जो घटना घटी, उसे भी आप सुन लीजिये ॥ १ ९ ३ ॥ ततः परमकोपेन राजानो मुनिपुंगव ॥२० ॥
अरुन्धन् मिथिलां सर्वे वीर्यसंदेहमागताः । ' मुनिप्रवर! मेरे इनकार करनेपर ये सब राजा अत्यन्त कुपित हो उठे और अपने पराक्रमके विषयमें संशयापन्न हो मिथिलाको चारों ओरसे घेरकर खड़े हो गये ॥ २०३ ॥
आत्मानमवधूतं मे विज्ञाय नृपपुंगवाः ॥ २१ ॥
रोषेण महताविष्टाः पीडयन् मिथिलां पुरीम् । ' मेरे द्वारा अपना तिरस्कार हुआ मानकर उन श्रेष्ठ नरेशोंने अत्यन्त रुष्ट हो मिथिलापुरीको सब ओरसे पीड़ा देना प्रारम्भ कर दिया ॥ २१३ ॥
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बालकाण्डे सप्तषष्टितमः सर्गः १ ९ ७ ततः संवत्सरे पूर्णे क्षयं यातानि सर्वशः ॥ २२ ॥ ।
साधनानि मुनिश्रेष्ठ ततोऽहं भृशदुःखितः । ' मुनिश्रेष्ठ! पूरे एक वर्षतक वे घेरा डाले रहे । इस बीचमें युद्धके सारे साधन क्षीण हो गये । इससे मुझे बड़ा दुःख हुआ ॥ २२३ ॥
ततो देवगणान् सर्वांस्तपसाहं प्रसादयम् ॥ २३ ॥
ददुश्च परमप्रीताश्चतुरंगबलं सुराः । ' तब मैंने तपस्याके द्वारा समस्त देवताओंको प्रसन्न करनेकी चेष्टा की । देवता बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने मुझे चतुरंगिणी सेना प्रदान की ॥ २३३ ॥
ततो भग्ना नृपतयो हन्यमाना दिशो ययुः ॥ २४ ॥
अवीर्या वीर्यसंदिग्धाः सामात्याः पापकारिणः । ' फिर तो हमारे सैनिकोंकी मार खाकर वे सभी पापाचारी राजा, जो बलहीन थे अथवा जिनके बलवान् होनेमें संदेह था, मन्त्रियोंसहित भागकर विभिन्न दिशाओं में चले गये ॥२४३ ॥
तदेतन्मुनिशार्दूल धनुः परमभास्वरम् ॥ २५ ॥
रामलक्ष्मणयोश्चापि दर्शयिष्यामि सुव्रत । ' मुनिश्रेष्ठ! यही वह परम प्रकाशमान धनुष है । उत्तम व्रतका पालन करनेवाले महर्षे! मैं उसे श्रीराम और लक्ष्मणको भी दिखाऊँगा ॥ २५३ ॥
यद्यस्य धनुषो रामः कुर्यादारोपणं मुने ।
सुतामयोनिजां सीतां दद्यां दाशरथेरहम् ॥ २६ ॥
' मुने! यदि श्रीराम इस धनुषकी प्रत्यञ्चा चढ़ा दें तो मैं अपनी अयोनिजा कन्या सीताको इन दशरथकुमार । हाथमें दे दूँ ' ॥ २६ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे षट्षष्टितमः सर्गः ॥ ६६ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें छाछठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६६ ॥
सप्तषष्टितमः सर्गः श्रीरामके द्वारा धनुर्भंग तथा राजा राजा दशरथको बुलानेके
जनकस्य वचः श्रुत्वा विश्वामित्रो महामुनिः ।
धनुर्दर्शय रामाय इति होवाच पार्थिवम् ॥ १ ॥
जनककी यह बात सुनकर महामुनि विश्वामित्र बोले — ' राजन्! आप श्रीरामको अपना धनुष दिखाइये ' ॥
ततः स राजा जनकः सचिवान् व्यादिदेश ह ।
धनुरानीयतां दिव्यं गन्धमाल्यानुलेपितम् ॥ २ ॥
तब राजा जनकने मन्त्रियोंको आज्ञा दी - ' चन्दन और मालाओंसे सुशोभित वह दिव्य धनुष यहाँ ले आओ ' ॥ २ ॥
जनकेन समादिष्टाः सचिवाः प्राविशन् पुरम् ।
तद्धनुः पुरतः कृत्वा निर्जग्मुरमितौजसः ॥ ३ ॥
राजा जनककी आज्ञा पाकर वे अमित तेजस्वी मन्त्री नगरमें गये और उस धनुषको आगे करके पुरीसे बाहर निकले ॥ ३ ॥
नृणां शतानि पञ्चाशद् व्यायतानां महात्मनाम् ।
मञ्जूषामष्टचक्रां तां समूहस्ते कथंचन ॥ ४ ॥
वह धनुष आठ पहियोंवाली लोहेकी बहुत बड़ी संदूकमें रखा गया था । उसे मोटे - ताजे पाँच हजार महामनस्वी वीर किसी तरह ठेलकर वहाँतक ला सके ॥ ४ ॥
जनकका विश्वामित्रकी आज्ञासे लिये मन्त्रियोंको भेजना
तामादाय सुमञ्जूषामायसीं यत्र तद्धनुः ।
सुरोपमं जनकमूचुर्नृपतिमन्त्रिणः ॥ ५ ॥
लोहेकी वह संदूक, जिसमें धनुष रखा गया था, लाकर उन मन्त्रियोंने देवोपम राजा जनकसे कहा— ॥
इदं धनुर्वरं राजन् पूजितं सर्वराजभिः ।
मिथिलाधिप राजेन्द्र दर्शनीयं यदीच्छसि ॥ ६ ॥
' राजन्! मिथिलापते! राजेन्द्र! यह समस्त राजाओंद्वारा सम्मानित श्रेष्ठ धनुष है । यदि आप इन दोनों राजकुमारोंको दिखाना चाहते हैं तो दिखाइये ' ॥ ६ ॥
तेषां नृपो वचः श्रुत्वा कृताञ्जलिरभाषत ।
विश्वामित्रं महात्मानं तावुभौ रामलक्ष्मणौ ॥७ ॥
उनकी बात सुनकर राजा जनकने हाथ जोड़कर महात्मा विश्वामित्र तथा दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मणसे कहा- ॥ ७ ॥
इदं धनुर्वरं ब्रह्मञ्जनकैरभिपूजितम् ।
राजभिश्च महावीर्यैरशक्तैः पूरितं तदा ॥८ ॥
' ब्रह्मन्! यही वह श्रेष्ठ धनुष है, जिसका जनकवंशी नरेशोंने सदा ही पूजन किया है तथा जो इसे उठानेमें समर्थ न हो सके, उन महापराक्रमी नरेशोंने भी इसका पूर्वकालमें सम्मान किया है ॥८ ॥
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१ ९ ८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे -नैतत् सुरगणाः सर्वे सासुरा न च राक्षसाः ।
गन्धर्वयक्षप्रवराः सकिन्नरमहोरगाः ॥ ९ ॥
' इसे समस्त देवता, असुर, राक्षस, गन्धर्व, बड़े-बड़े यक्ष, किन्नर और महानाग भी नहीं चढ़ा सके हैं ॥ ९ ॥
क्व गतिर्मानुषाणां च धनुषोऽस्य प्रपूरणे ।
आरोपणे समायोगे वेपने तोलने तथा ॥ १० ॥
' फिर इस धनुषको खींचने, चढ़ाने, इसपर बाण संधान करने, इसकी प्रत्यञ्चापर टङ्कार देने तथा इसे उठाकर इधर - उधर हिलानेमें मनुष्योंकी कहाँ शक्ति है? ॥१० ॥
तदेतद् धनुषां श्रेष्ठमानीतं मुनिपुंगव ।
दर्शयैतन्महाभाग अनयो राजपुत्रयोः ॥ ११ ॥
' मुनिप्रवर! यह श्रेष्ठ धनुष यहाँ लाया गया है ।
महाभाग! आप इसे इन दोनों राजकुमारोंको दिखाइये ' ॥
विश्वामित्रः सरामस्तु श्रुत्वा जनकभाषितम् ।
वत्स राम धनुः पश्य इति राघवमब्रवीत् ॥ १२ ॥
श्रीरामसहित विश्वामित्रने जनकका वह कथन सुनकर रघुनन्दनसे कहा - ' वत्स राम! इस धनुषको देखो ' ॥ १२ ॥
महर्षेर्वचनाद् रामो यत्र तिष्ठति तद्धनुः ।
मञ्जूषां तामपावृत्य दृष्ट्वा धनुरथाब्रवीत् ॥ १३ ॥ ।
महर्षिकी आज्ञासे श्रीरामने जिसमें वह धनुष था उस संदूकको खोलकर उस धनुषको देखा और कहा- ॥ १३ ॥
इदं धनुर्वरं दिव्यं संस्पृशामीह पाणिना ।
यत्नवांश्च भविष्यामि तोलने पूरणेऽपि वा ॥ १४ ॥
' अच्छा अब मैं इस दिव्य एवं श्रेष्ठ धनुषमें हाथ लगाता हूँ । मैं इसे उठाने और चढ़ानेका भी प्रयत्न करूँगा ' ॥ १४ ॥
बाढमित्यब्रवीद् राजा मुनिश्च समभाषत ।
लीलया स धनुर्मध्ये जग्राह वचनान्मुनेः ॥ १५ ॥
पश्यतां नृसहस्राणां बहूनां रघुनन्दनः ।
आरोपयत् स धर्मात्मा सलीलमिव तद्धनुः ॥ १६ ॥
तब राजा और मुनिने एक स्वरसे कहा - ' हाँ, ऐसा ही करो । ' मुनिकी आज्ञासे रघुकुलनन्दन धर्मात्मा श्रीरामने उस धनुषको बीचसे पकड़कर लीलापूर्वक उठा लिया और खेल - सा करते हुए उसपर प्रत्यञ्चा चढ़ा दी । उस समय कई हजार मनुष्योंकी दृष्टि उनपर लगी थी ॥ १५-१६ ॥
आरोपयित्वा मौर्वी च पूरयामास तद्धनुः ।
तद् बभञ्ज धनुर्मध्ये नरश्रेष्ठो महायशाः ॥ १७ ॥
प्रत्यञ्चा चढ़ाकर महायशस्वी नरश्रेष्ठ श्रीरामने ज्यों ही उस धनुषको कानतक खींचा त्यों ही वह बीच ही टूट गया ॥ १७ ॥
तस्य शब्दो महानासीन्निर्घातसमनिःस्वनः ।
भूमिकम्पश्च सुमहान् पर्वतस्येव दीर्यतः ॥ १८ ॥
टूटते समय उससे वज्रपातके समान बड़ी भारी
आवाज हुई । ऐसा जान पड़ा मानो पर्वत फट पड़ा हो ।
उस समय महान् भूकम्प आ गया ॥ १८ ॥
निपेतुश्च नराः सर्वे तेन शब्देन मोहिताः ।
वर्जयित्वा मुनिवरं राजानं तौ च राघवौ ॥ १ ९ ॥
मुनिवर विश्वामित्र, राजा जनक तथा रघुकुलभूषण दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मणको छोड़कर शेष जितने लोग वहाँ खड़े थे, वे सब धनुष टूटनेके उस भयंकर शब्दसे मूर्च्छित होकर गिर पड़े ॥ १ ९ ॥
प्रत्याश्वस्ते जने तस्मिन् राजा विगतसाध्वसः ।
उवाच प्राञ्जलिर्वाक्यं वाक्यज्ञो मुनिपुंगवम् ॥ २० ॥
थोड़ी देरमें जब सबको चेत हुआ, तब निर्भय हुए राजा जनकने, जो बोलनेमें कुशल और वाक्यके मर्मको समझनेवाले थे, हाथ जोड़कर मुनिवर विश्वामित्रसे कहा— ॥ २० ॥
भगवन् दृष्टवीर्यो मे रामो दशरथात्मजः ।
अत्यद्भुतमचिन्त्यं च अतर्कितमिदं मया ॥ २१ ॥
' भगवन्! मैंने दशरथनन्दन श्रीरामका पराक्रम आज अपनी आँखों देख लिया । महादेवजीके धनुषको चढ़ाना-यह अत्यन्त अद्भुत, अचिन्त्य और अतर्कित घटना है ॥
जनकानां कुले कीर्तिमाहरिष्यति मे सुता ।
सीता भर्तारमासाद्य रामं दशरथात्मजम् ॥ २२ ॥
' मेरी पुत्री सीता दशरथकुमार श्रीरामको पतिरूपमें प्राप्त करके जनकवंशकी कीर्तिका विस्तार करेगी ॥ २२ ॥
मम सत्या प्रतिज्ञा सा वीर्यशुल्केति कौशिक ।
सीता प्राणैर्बहुमता देया रामाय मे सुता ॥ २३ ॥
' कुशिकनन्दन! मैंने सीताको वीर्यशुल्का ( पराक्रमरूपी शुल्कसे ही प्राप्त होनेवाली ) बताकर जो प्रतिज्ञा की थी, वह आज सत्य एवं सफल हो गयी । सीता मेरे लिये प्राणोंसे भी बढ़कर है । अपनी यह पुत्री मैं श्रीरामको समर्पित करूँगा ॥ २३ ॥
भवतोऽनुमते ब्रह्मन् शीघ्रं गच्छन्तु मन्त्रिणः ।
मम कौशिक भद्रं ते अयोध्यां त्वरिता रथैः ॥ २४ ॥