वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ — पृष्ठ 231–240
वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 231–240
पृष्ठ 231
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
बालकाण्डे सप्तसप्ततितमः सर्गः २१ ९
वे प्रवेशकालिक होमकर्मसे सुशोभित तथा रेशमी ।
साड़ियोंसे अलंकृत थीं॥११-१२ ॥
देवतायतनान्याशु सर्वास्ताः प्रत्यपूजयन् ।
अभिवाद्याभिवाद्यांश्च सर्वा राजसुतास्तदा ॥ १३ ॥
रेमिरे मुदिताः सर्वा भर्तृभिर्मुदिता रहः । उन सबने देवमन्दिरोंमें ले जाकर उन बहुओंसे देवताओंका पूजन करवाया । तदनन्तर नव - वधूरूपमें आयी हुई उन सभी राजकुमारियोंने वन्दनीय सास-ससुर आदिके चरणोंमें प्रणाम किया और अपने - अपने पतिके साथ एकान्तमें रहकर वे सब - की- - सब बड़े आनन्दसे समय व्यतीत करने लगीं ॥१३३ ॥
कृतदाराः कृतास्त्राश्च सधनाः ससुहृज्जनाः ॥ १४ ॥
शुश्रूषमाणाः पितरं वर्तयन्ति नरर्षभाः ।
कस्यचित्त्वथ कालस्य राजा दशरथः सुतम् ॥ १५ ॥
भरतं कैकयीपुत्रमब्रवीद् रघुनन्दनः । श्रीराम आदि पुरुषश्रेष्ठ चारों भाई अस्त्रविद्यामें निपुण और विवाहित होकर धन और मित्रोंके साथ रहते हुए पिताकी सेवा करने लगे । कुछ कालके बाद रघुकुलनन्दन राजा दशरथने अपने पुत्र कैकेयीकुमार भरतसे कहा – ॥ १४-१५३ ॥ अयं केकयराजस्य पुत्रो वसति पुत्रक ॥ १६ ॥
त्वां नेतुमागतो वीरो युधाजिन्मातुलस्तव । ' बेटा! ये तुम्हारे मामा केकयराजकुमार वीर युधाजित् तुम्हें लेनेके लिये आये हैं और कई दिनोंसे यहाँ ठहरे हुए हैं ' ॥ १६३ ॥
' श्रुत्वा दशरथस्यैतद् भरतः कैकयीसुतः ॥ १७ ॥
गमनायाभिचक्राम शत्रुघ्नसहितस्तदा । दशरथजीकी यह बात सुनकर कैकेयीकुमार भरतने उस समय शत्रुघ्नके साथ मामाके यहाँ जानेका विचार किया ॥ १७३ ॥
आपृच्छ्य पितरं शूरो रामं चाक्लिष्टकारिणम् ॥ १८ ॥
मातृश्चापि नरश्रेष्ठः शत्रुघ्नसहितो ययौ । वे नरश्रेष्ठ शूरवीर भरत अपने पिता राजा दशरथ, अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीराम तथा सभी माताओंसे पूछकर उनकी आज्ञा ले शत्रुघ्नसहित वहाँसे चल दिये ॥ १८३ ॥
युधाजित् प्राप्य भरतं सशत्रुघ्नं प्रहर्षितः ॥ १ ९ ॥ स्वपुरं प्राविशद् वीरः पिता तस्य तुतोष ह । शत्रुघ्नसहित भरतको साथ लेकर वीर युधाजित्ने बड़े हर्षके साथ अपने नगरमें प्रवेश किया, इससे उनके पिताको बड़ा संतोष हुआ ॥ १ ९ ३ ॥ गते च भरते रामो लक्ष्मणश्च महाबलः ॥ २० ॥
पितरं देवसंकाशं पूजयामासतुस्तदा । भरतके चले जानेपर महाबली श्रीराम और लक्ष्मण उन दिनों अपने देवोपम पिताकी सेवा - पूजामें संलग्र रहने लगे ॥ २०३ ॥
पितुराज्ञां पुरस्कृत्य पौरकार्याणि सर्वशः ॥ २१ ॥
चकार रामः सर्वाणि प्रियाणि च हितानि च । पिताकी आज्ञा शिरोधार्य करके वे नगरवासियों के सब काम देखने तथा उनके समस्त प्रिय तथा हितकर कार्य करने लगे ॥ २१३ ॥
मातृभ्यो मातृकार्याणि कृत्वा परमयन्त्रितः ॥ २२ ॥
गुरूणां गुरुकार्याणि काले कालेऽन्ववैक्षत । वे अपनेको बड़े संयममें रखते थे और समय-समयपर माताओंके लिये उनके आवश्यक कार्य पूर्ण करके गुरुजनोंके भारी - से - भारी कार्योंको भी सिद्ध करनेका ध्यान रखते थे ॥२२३ ॥
एवं दशरथः प्रीतो ब्राह्मणा नैगमास्तथा ॥ २३ ॥
रामस्य शीलवृत्तेन सर्वे विषयवासिनः । उनके इस बर्तावसे राजा दशरथ, वेदवेत्ता ब्राह्मण तथा वैश्यवर्ग बड़े प्रसन्न रहते थे; श्रीरामके उत्तम शील और सद् - व्यवहारसे उस राज्यके भीतर निवास करनेवाले सभी मनुष्य बहुत संतुष्ट रहते थे ॥ २३३ ॥
तेषामतियशा लोके रामः सत्यपराक्रमः ॥ २४ ॥
स्वयंभूरिव भूतानां बभूव गुणवत्तरः । राजाके उन चारों पुत्रोंमें सत्यपराक्रमी श्रीराम ही लोकमें अत्यन्त यशस्वी तथा महान् गुणवान् हुए — ठीक उसी तरह जैसे समस्त भूतोंमें स्वयम्भू ब्रह्मा ही अत्यन्त यशस्वी और महान् गुणवान् हैं ॥ २४३ ॥
रामश्च सीतया सार्धं विजहार बहूनृतून् ॥ २५ ॥
मनस्वी तद्गतमनास्तस्या हृदि समर्पितः । श्रीरामचन्द्रजी सदा सीताके हृदयमन्दिरमें विराजमान रहते थे तथा मनस्वी श्रीरामका मन भी सीतामें ही लगा रहता था; श्रीरामने सीताके साथ अनेक ऋतुओंतक विहार किया ॥ २५३ ॥
प्रिया तु सीता रामस्य दाराः पितृकृता इति ॥ २६ ॥
गुणाद्रूपगुणाच्चापि प्रीतिर्भूयोऽभिवर्धते ।
। तस्याश्च भर्ता द्विगुणं हृदये परिवर्तते ॥२७ ॥
पृष्ठ 232
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२२० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे सीता श्रीरामको बहुत ही प्रिय थीं; क्योंकि वे अपने पिता राजा जनकद्वारा श्रीरामके हाथमें पत्नी-रूपसे समर्पित की गयी थीं । सीताके पातिव्रत्य आदि गुणसे तथा उनके सौन्दर्यगुणसे भी श्रीरामका उनके प्रति अधिकाधिक प्रेम बढ़ता रहता था; इसी प्रकार सीताके हृदयमें भी उनके पति श्रीराम अपने गुण और सौन्दर्यके कारण द्विगुण प्रीतिपात्र बनकर रहते
" थे । २६-२७ ॥
अन्तर्गतमपि व्यक्तमाख्याति हृदयं हृदा ।
तस्य भूयो विशेषेण मैथिली जनकात्मजा ।
देवताभिः समा रूपे सीता श्रीरिव रूपिणी ॥ २८ ॥
जनकनन्दिनी मिथिलेशकुमारी सीता श्रीरामके हार्दिक अभिप्रायको भी अपने हृदयसे ही और अधिकरूपसे । जान लेती थीं तथा स्पष्टरूपसे बता भी देती थीं । वे रूपमें देवांगनाओंके समान थीं और मूर्तिमती लक्ष्मी-सी प्रतीत होती थीं ॥ २८ ॥
तया स राजर्षिसुतोऽभिकामया । समेयिवानुत्तमराजकन्यया अतीव रामः शुशुभे मुदान्वितो विभुः श्रिया विष्णुरिवामरेश्वरः ॥ २ ९ ॥ श्रेष्ठ राजकुमारी सीता श्रीरामकी ही कामना रखती थीं और श्रीराम भी एकमात्र उन्हींको चाहते थे; जैसे लक्ष्मीके साथ देवेश्वर भगवान् विष्णुकी शोभा होती है, उसी प्रकार उन सीतादेवीके साथ राजर्षि दशरथकुमार श्रीराम परम प्रसन्न रहकर बड़ी शोभा पाने लगे ॥ २ ९ ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे सप्तसप्ततितमः सर्गः ॥ ७७ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें सतहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ७७ ॥
॥ बालकाण्डं सम्पूर्णम् ॥
पृष्ठ 233
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम् अयोध्याकाण्डम् प्रथमः सर्गः श्रीरामके सद्गुणोंका वर्णन, राजा दशरथका श्रीरामको युवराज बनानेका विचार तथा विभिन्न नरेशों और नगर एवं जनपदके लोगोंको मन्त्रणाके लिये अपने दरबारमें बुलाना
गच्छता मातुलकुलं भरतेन तदानघः ।
शत्रुघ्नो नित्यशत्रुघ्नो नीतः प्रीतिपुरस्कृतः ॥ १ ॥
( पहले यह बताया जा चुका है कि ) भरत अपने मामाके यहाँ जाते समय काम आदि शत्रुओंको सदाके लिये नष्ट कर देनेवाले निष्पाप शत्रुघ्नको भी प्रेमवश अपने साथ लेते गये थे ॥ १ ॥
स तत्र न्यवसद् भ्रात्रा सह सत्कारसत्कृतः ।
मातुलेनाश्वपतिना पुत्रस्नेहेन लालितः ॥ २ ॥
वहाँ भाईसहित उनका बड़ा आदर - सत्कार हुआ और वे वहाँ सुखपूर्वक रहने लगे । उनके मामा युधाजित्, जो अश्वयूथके अधिपति थे, उन दोनोंपर पुत्रसे भी अधिक स्नेह रखते और बड़ा लाड़ - प्यार करते थे ॥२ ॥
तत्रापि निवसन्तौ तौ तर्प्यमाणौ च कामतः ।
भ्रातरौ स्मरतां वीरौ वृद्धं दशरथं नृपम् ॥ ३ ॥
यद्यपि मामाके यहाँ उन दोनों वीर भाइयोंकी सभी इच्छाएँ पूर्ण करके उन्हें पूर्णतः तृप्त किया जाता था, तथापि वहाँ रहते हुए भी उन्हें अपने वृद्ध पिता महाराज दशरथकी याद कभी नहीं भूलती थी ॥ ३ ॥
राजापि तौ महातेजाः सस्मार प्रोषितौ सुतौ ।
उभौ भरत महेन्द्रवरुणोपमौ ॥४ ॥
महातेजस्वी राजा दशरथ भी परदेशमें गये हुए महेन्द्र और वरुणके समान पराक्रमी अपने उन दोनों पुत्र भरत और शत्रुघ्नका सदा स्मरण किया करते थे ॥ ४ ॥
सर्व एव तु तस्येष्टाश्चत्वारः पुरुषर्षभाः ।
स्वशरीराद् विनिर्वृत्ताश्चत्वार इव बाहवः ॥५ ॥
अपने शरीरसे प्रकट हुई चारों भुजाओंके समान वे सब चारों ही पुरुषशिरोमणि पुत्र महाराजको बहुत ही प्रिय थे ॥ ५ ॥
तेषामपि महातेजा रामो रतिकरः पितुः ।
स्वयम्भूरिव भूतानां बभूव गुणवत्तरः ॥ ६ ॥
परंतु उनमें भी महातेजस्वी श्रीराम सबकी अपेक्षा अधिक गुणवान् होनेके कारण समस्त प्राणियोंके लिये ब्रह्माजीकी भाँति पिताके लिये विशेष प्रीतिवर्धक थे ॥६ ॥
स हि देवैरुदीर्णस्य रावणस्य वधार्थिभिः ।
अर्थितो मानुषे लोके जज्ञे विष्णुः सनातनः ॥ ७ ॥
इसका एक कारण और भी था - वे साक्षात् सनातन विष्णु थे और परम प्रचण्ड रावणके वधकी अभिलाषा रखनेवाले देवताओंकी प्रार्थनापर मनुष्यलोकमें अवतीर्ण हुए थे ॥७ ॥
कौसल्या शुशुभे तेन पुत्रेणामिततेजसा ।
यथा वरेण देवानामदितिर्वज्रपाणिना ॥ ८ ॥
उन अमित तेजस्वी पुत्र श्रीरामचन्द्रजीसे महारानी कौसल्याकी वैसी ही शोभा होती थी, जैसे वज्रधारी देवराज इन्द्रसे देवमाता अदिति सुशोभित होती हैं ॥८ ॥
स हि रूपोपपन्नश्च वीर्यवाननसूयकः ।
भूमावनुपमः सूनुर्गुणैर्दशरथोपमः ॥ ९ ॥
श्रीराम बड़े ही रूपवान् और पराक्रमी थे । वे किसीके दोष नहीं देखते थे । भूमण्डलमें उनकी समता करनेवाला कोई नहीं था । वे अपने गुणोंसे पिता दशरथके समान एवं योग्य पुत्र थे॥९॥
स च नित्यं प्रशान्तात्मा मृदुपूर्वं च भाषते ।
उच्यमानोऽपि परुषं नोत्तरं प्रतिपद्यते ॥ १० ॥
वे सदा शान्त चित्त रहते और सान्त्वनापूर्वक मीठे वचन बोलते थे; यदि उनसे कोई कठोर बात भी कह । देता तो वे उसका उत्तर नहीं देते थे ॥१० ॥
पृष्ठ 234
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२२२ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे.
कदाचिदुपकारेण कृतेनैकेन तुष्यति ।
न स्मरत्यपकाराणां शतमप्यात्मवत्तया ॥ ११ ॥
कभी कोई एक बार भी उपकार कर देता तो वे उसके उस एक ही उपकारसे सदा संतुष्ट रहते थे और मनको वशमें रखनेके कारण किसीके सैकड़ों अपराध करनेपर भी उसके अपराधोंको याद नहीं रखते थे ॥
शीलवृद्धैर्ज्ञानवृद्धैर्वयोवृद्धैश्च सज्जनैः ।
कथयन्नास्त वै नित्यमस्त्रयोग्यान्तरेष्वपि ॥१२ ॥
अस्त्र - शस्त्रोंके अभ्यासके लिये उपयुक्त समयमें भी बीच - बीचमें अवसर निकालकर वे उत्तम चरित्रमें, ज्ञानमें तथा अवस्थामें बढ़े - चढ़े सत्पुरुषोंके साथ ही सदा बातचीत करते ( और उनसे शिक्षा लेते थे ) ॥ १२ ॥
बुद्धिमान् मधुराभाषी पूर्वभाषी प्रियंवदः ।
वीर्यवान्न च वीर्येण महता स्वेन विस्मितः ॥ १३ ॥
वे बड़े बुद्धिमान् थे और सदा मीठे वचन बोलते थे । अपने पास आये हुए मनुष्योंसे पहले स्वयं ही बात करते और ऐसी बातें मुँहसे निकालते जो उन्हें प्रिय लगें; बल और पराक्रमसे सम्पन्न होनेपर भी अपने महान् पराक्रमके कारण उन्हें कभी गर्व नहीं होता था ॥ १३ ॥
न चानृतकथो विद्वान् वृद्धानां प्रतिपूजकः ।
अनुरक्तः प्रजाभिश्च प्रजाश्चाप्यनुरज्यते ॥ १४ ॥
झूठी बात तो उनके मुखसे कभी निकलती ही नहीं थी । वे विद्वान् थे और सदा वृद्ध पुरुषोंका सम्मान
किया करते थे । प्रजाका श्रीरामके प्रति और श्रीरामका ।
प्रजाके प्रति बड़ा अनुराग था ॥ १४ ॥
सानुक्रोशो जितक्रोधो ब्राह्मणप्रतिपूजकः ।
दीनानुकम्पी धर्मज्ञो नित्यं प्रग्रहवान् शुचिः ॥ १५ ॥
वे परम दयालु क्रोधको जीतनेवाले और ब्राह्मणोंके पुजारी थे । उनके मनमें दीन - दु: खियोंके प्रति बड़ी दया थी । वे धर्मके रहस्यको जाननेवाले, इन्द्रियोंको सदा वशमें रखनेवाले और बाहर - भीतरसे परम पवित्र थे ।
कुलोचितमतिः क्षात्रं स्वधर्मं बहु मन्यते ।
मन्यते परया प्रीत्या महत् स्वर्गफलं ततः ॥ १६ ॥
अपने कुलोचित आचार, दया, उदारता और शरणागतरक्षा आदिमें ही उनका मन लगता था । वे अपने क्षत्रियधर्मको अधिक महत्त्व देते और मानते थे । वे उस क्षत्रियधर्मके पालनसे महान् स्वर्ग ( परम धाम ) की प्राप्ति मानते थे; अतः बड़ी प्रसन्नताके साथ उसमें संलग्न रहते थे ॥ १६ ॥
नाश्रेयसि रतो यश्च न विरुद्धकथारुचिः ।
उत्तरोत्तरयुक्तीनां वक्ता वाचस्पतिर्यथा ॥१७ ॥
अमङ्गलकारी निषिद्ध कर्ममें उनकी कभी प्रवृत्ति नहीं होती थी; शास्त्रविरुद्ध बातोंको सुननेमें उनकी रुचि नहीं थी; वे अपने न्याययुक्त पक्षके समर्थनमें बृहस्पतिके समान एक - से - एक बढ़कर युक्तियाँ देते थे ॥ १७ ॥
अरोगस्तरुणो वाग्मी वपुष्मान् देशकालवित् ।
लोके पुरुषसारज्ञः साधुरेको विनिर्मितः ॥ १८ ॥
उनका शरीर नीरोग था और अवस्था तरुण । वे अच्छे वक्ता, सुन्दर शरीरसे सुशोभित तथा देश - कालके तत्त्वको समझनेवाले थे । उन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता था कि विधाताने संसारमें समस्त पुरुषोंके सारतत्त्वको समझनेवाले साधु पुरुषके रूपमें एकमात्र श्रीरामको ही प्रकट किया है ॥ १८ ॥
स तु श्रेष्ठैर्गुणैर्युक्तः प्रजानां पार्थिवात्मजः ।
बहिश्चर इव प्राणो बभूव गुणतः प्रियः ॥१ ९ ॥
राजकुमार श्रीराम श्रेष्ठ गुणोंसे युक्त थे । वे अपने सद्गुणोंके कारण प्रजाजनोंको बाहर विचरनेवाले प्राणकी भाँति प्रिय थे ॥ १ ९ ॥
सर्वविद्याव्रतस्नातो यथावत् साङ्गवेदवित् ।
इष्वस्त्रे च पितुः श्रेष्ठो बभूव भरताग्रजः ॥ २० ॥
भरतके बड़े भाई श्रीराम सम्पूर्ण विद्याओंके व्रतमें निष्णात और छहों अङ्गसहित सम्पूर्ण वेदोंके यथार्थ ज्ञाता थे । बाणविद्यामें तो वे अपने पितासे भी बढ़कर थे ॥ २० ॥
कल्याणाभिजनः साधुरदीनः सत्यवागृजुः ।
। वृद्धैरभिविनीतश्च द्विजैर्धर्मार्थदर्शिभिः ॥ २१ ॥
वे कल्याणकी जन्मभूमि, साधु, दैन्यरहित, सत्यवादी और सरल थे; धर्म और अर्थके ज्ञाता वृद्ध ब्राह्मणोंके द्वारा उन्हें उत्तम शिक्षा प्राप्त हुई थी ॥ २१ ॥
धर्मकामार्थतत्त्वज्ञः स्मृतिमान् प्रतिभानवान् ।
लौकिके समयाचारे कृतकल्पो विशारदः ॥ २२ ॥
उन्हें धर्म, काम और अर्थके तत्त्वका सम्यक् ज्ञान था । वे स्मरणशक्तिसे सम्पन्न और प्रतिभाशाली थे । वे लोकव्यवहारके सम्पादनमें समर्थ और समयोचित धर्माचरणमें कुशल थे ॥ २२ ॥
निभृतः संवृताकारो गुप्तमन्त्रः सहायवान् ।
अमोघक्रोधहर्षश्च त्यागसंयमकालवित् ॥ २३ ॥
वे विनयशील, अपने आकार ( अभिप्राय ) -को छिपानेवाले, मन्त्रको गुप्त रखनेवाले और उत्तम सहायकोंसे
पृष्ठ 235
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अयोध्याकाण्डे प्रथमः सर्गः २२३ सम्पन्न थे । उनका क्रोध अथवा हर्ष निष्फल नहीं होता । था । वे वस्तुओंके त्याग और संग्रहके अवसरको भलीभाँति जानते थे ॥ २३ ॥
दृढभक्तिः स्थिरप्रज्ञो नासद्ग्राही न दुर्वचः ।
निस्तन्द्रीरप्रमत्तश्च स्वदोषपरदोषवित् ॥ २४ ॥
गुरुजनोंके प्रति उनकी दृढ़ भक्ति थी । वे स्थितप्रज्ञ थे और असवस्तुओंको कभी ग्रहण नहीं करते थे । उनके मुखसे कभी दुर्वचन नहीं निकलता था । वे आलस्यरहित, प्रमादशून्य तथा अपने और पराये मनुष्योंके दोषोंको अच्छी प्रकार जाननेवाले थे ॥२४ ॥
शास्त्रज्ञश्च कृतज्ञश्च पुरुषान्तरकोविदः ।
यः प्रग्रहानुग्रहयोर्यथान्यायं विचक्षणः ॥ २५ ॥
वे शास्त्रोंके ज्ञाता, उपकारियोंके प्रति कृतज्ञ तथा पुरुषोंके तारतम्यको अथवा दूसरे पुरुषोंके मनोभावको जाननेमें कुशल थे । यथायोग्य निग्रह और अनुग्रह करनेमें वे पूर्ण चतुर थे ॥ २५ ॥
सत्संग्रहानुग्रहणे स्थानविन्निग्रहस्य च ।
आयकर्मण्युपायज्ञः संदृष्टव्ययकर्मवित् ॥ २६ ॥
उन्हें सत्पुरुषोंके संग्रह और पालन तथा दुष्ट पुरुषोंके निग्रहके अवसरोंका ठीक - ठीक ज्ञान था । धनकी आयके उपायोंको वे अच्छी तरह जानते थे ( अर्थात् फूलोंको नष्ट न करके उनसे रस लेनेवाले भ्रमरोंकी भाँति वे प्रजाओंको कष्ट दिये बिना ही उनसे न्यायोचित धनका उपार्जन करनेमें कुशल थे ) तथा शास्त्रवर्णित व्यय कर्मका भी उन्हें ठीक - ठीक ज्ञान था १ ॥ २६ ॥
श्रैष्ठ्यं चास्त्रसमूहेषु प्राप्तो व्यामिश्रकेषु च ।
अर्थधर्मौ च संगृह्य सुखतन्त्रो न चालसः ॥ २७ ॥
उन्होंने सब प्रकारके अस्त्रसमूहों तथा संस्कृत, प्राकृत आदि भाषाओंसे मिश्रित नाटक आदिके ज्ञानमें निपुणता प्राप्त की थी । वे अर्थ और धर्मका संग्रह ( पालन ) करते हुए तदनुकूल कामका सेवन करते थे और कभी आलस्यको पास नहीं फटकने देते थे ॥ २७ ॥
१. शास्त्रमें व्ययका विधान इस प्रकार देखा जाता
वैहारिकाणां शिल्पानां विज्ञातार्थविभागवित् ।
आरोहे विनये चैव युक्तो वारणवाजिनाम् ॥ २८ ॥
विहार ( क्रीडा या मनोरञ्जन ) - के उपयोगमें आनेवाले संगीत, वाद्य और चित्रकारी आदि शिल्पोंके भी वे विशेषज्ञ थे । अर्थोके विभाजनका भी उन्हें सम्यक् ज्ञान था । २ वे हाथियों और घोड़ोंपर चढ़ने और उन्हें भाँति-भाँतिकी चालोंकी शिक्षा देनेमें भी निपुण थे ॥ २८ ॥
धनुर्वेदविदां श्रेष्ठो लोकेऽतिरथसम्मतः ।
अभियाता प्रहर्ता च सेनानयविशारदः ॥ २ ९ ॥
श्रीरामचन्द्रजी इस लोकमें धनुर्वेदके सभी विद्वानोंमें श्रेष्ठ थे । अतिरथी वीर भी उनका विशेष सम्मान करते थे । शत्रुसेनापर आक्रमण और प्रहार करनेमें वे विशेष कुशल थे । सेना - संचालनकी नीतिमें उन्होंने अधिक निपुणता प्राप्त की थी ॥ २ ९ ॥
अप्रधृष्यश्च संग्रामे क्रुद्धैरपि सुरासुरैः ।
अनसूयो जितक्रोधो न दृप्तो न च मत्सरी ॥ ३० ॥
संग्राममें कुपित होकर आये हुए समस्त देवता और असुर भी उनको परास्त नहीं कर सकते थे । उनमें दोषदृष्टिका सर्वथा अभाव था । वे क्रोधको जीत चुके थे । दर्प और ईर्ष्याका उनमें अत्यन्त अभाव था ॥३० ॥
नावज्ञेयश्च भूतानां न च कालवशानुगः ।
एवं श्रेष्ठैर्गुणैर्युक्तः प्रजानां पार्थिवात्मजः ॥ ३१ ॥
सम्मतस्त्रिषु लोकेषु वसुधायाः क्षमागुणैः ।
बुद्ध्या बृहस्पतेस्तुल्यो वीर्ये चापि शचीपतेः ॥ ३२ ॥
किसी भी प्राणीके मनमें उनके प्रति अवहेलनाका भाव नहीं था । वे कालके वशमें होकर उसके पीछे-पीछे चलनेवाले नहीं थे ( काल ही उनके पीछे चलता था ) । इस प्रकार उत्तम गुणोंसे युक्त होनेके कारण राजकुमार श्रीराम समस्त प्रजाओं तथा तीनों लोकोंके प्राणियोंके लिये आदरणीय थे । वे अपने क्षमासम्बन्धी गुणोंके द्वारा पृथ्वीकी समानता करते थे । बुद्धिमें | बृहस्पति और बल - पराक्रममें शचीपति इन्द्रके तुल्य | थे ॥ ३१-३२ ॥ है— कच्चिदायस्य चार्धेन चतुर्भागेन वा पुनः । पादभागैस्त्रिभिर्वापि व्ययः संशुद्ध्यते तव ॥ ( महा ० सभा ० ५।७१ ) नारदजी कहते हैं — युधिष्ठिर! क्या तुम्हारी आयके एक चौथाई या आधे अथवा तीन चौथाई भागसे तुम्हारा सारा खर्च चल जाता है? २. नीचे लिखी पाँच वस्तुओंके लिये अर्थका विभाजन करनेवाला मनुष्य इहलोक और परलोकमें भी सुखी होता है । वे वस्तुएँ हैं — धर्म, यश, अर्थ, आत्मा और स्वजन । यथा— धर्माय यशसेऽर्थाय कामाय स्वजनाय च । पञ्चधा विभजन् वित्तमिहामुत्र च मोदते ॥ ( श्रीमद्भा ० ८ । १ ९ । ३७ )
पृष्ठ 236
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२२४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे
तथा सर्वप्रजाकान्तैः प्रीतिसंजननैः पितुः ।
गुणैर्विरुरुचे रामो दीप्तः सूर्य इवांशुभिः ॥ ३३ ॥
जैसे सूर्यदेव अपनी किरणोंसे प्रकाशित होते हैं । उसी प्रकार श्रीरामचन्द्रजी समस्त प्रजाओंको प्रिय लगनेवाले तथा पिताकी प्रीति बढ़ानेवाले सद्गुणोंसे सुशोभित होते थे ॥ ३३ ॥
तमेवंवृत्तसम्पन्नमप्रधृष्यपराक्रमम् लोकनाथोपमं नाथमकामयत मेदिनी ॥ ३४ ॥
ऐसे सदाचारसम्पन्न, अजेय पराक्रमी और लोकपालोंके समान तेजस्वी श्रीरामचन्द्रजीको पृथ्वी ( भूदेवी और भूमण्डलकी प्रजा ) - ने अपना स्वामी बनानेकी कामना की ॥ ३४ ॥
एतैस्तु बहुभिर्युक्तं गुणैरनुपमैः सुतम् ।
दृष्ट्वा दशरथो राजा चक्रे चिन्तां परंतपः ॥ ३५ ॥
अपने पुत्र श्रीरामको अनेक अनुपम गुणोंसे युक्त देखकर शत्रुओंको संताप देनेवाले राजा दशरथने मन-ही - मन कुछ विचार करना आरम्भ किया ॥ ३५ ॥
अथ राज्ञो बभूवैव वृद्धस्य चिरजीविनः ।
प्रीतिरेषा कथं रामो राजा स्यान्मयि जीवति ॥ ३६ ॥
उन चिरञ्जीवी बूढ़े महाराज दशरथके हृदयमें यह चिन्ता हुई कि किस प्रकार मेरे जीते - जी श्रीरामचन्द्र राजा हो जायँ और उनके राज्याभिषेकसे प्राप्त होनेवाली यह प्रसन्नता मुझे कैसे सुलभ हो ॥ ३६ ॥
एषा ह्यस्य परा प्रीतिर्हृदि सम्परिवर्तते ।
कदा नाम सुतं द्रक्ष्याम्यभिषिक्तमहं प्रियम् ॥ ३७ ॥
उनके हृदयमें यह उत्तम अभिलाषा बारम्बार चक्कर लगाने लगी कि कब मैं अपने प्रिय पुत्र श्रीरामका राज्याभिषेक देखूँगा ॥ ३७ ॥
वृद्धिकामो हि लोकस्य सर्वभूतानुकम्पकः ।
मत्तः प्रियतरो लोके पर्जन्य इव वृष्टिमान् ॥ ३८ ॥
वे सोचने लगे कि ' श्रीराम सब लोगोंके अभ्युदयकी कामना करते और सम्पूर्ण जीवोंपर दया रखते हैं । वे लोकमें वर्षा करनेवाले मेघकी भाँति मुझसे भी बढ़कर प्रिय हो गये हैं ॥ ३८ ॥
यमशक्रसमो वीर्ये बृहस्पतिसमो मतौ ।
महीधरसमो धृत्यां मत्तश्च गुणवत्तरः ॥ ३ ९ ॥
' श्रीराम बल - पराक्रममें यम और इन्द्रके समान, बुद्धिमें बृहस्पतिके समान और धैर्यमें पर्वतके समान हैं । गुणोंमें तो वे मुझसे सर्वथा बढ़े- चढ़े हैं ॥ ३ ९ ॥
महीमहमिमां कृत्स्नामधितिष्ठन्तमात्मजम् ।
अनेन वयसा दृष्ट्वा यथा स्वर्गमवाप्नुयाम् ॥ ४० ॥
' मैं इसी उम्रमें अपने बेटे श्रीरामको इस सारी पृथ्वीका राज्य करते देख यथासमय सुखसे स्वर्ग प्राप्त करूँ, यही मेरे जीवनकी साध है ' ॥ ४० ॥
इत्येवं विविधैस्तैस्तैरन्यपार्थिवदुर्लभैः ।
शिष्टैरपरिमेयैश्च लोके लोकोत्तरैर्गुणैः ॥ ४१ ॥
तं समीक्ष्य तदा राजा युक्तं समुदितैर्गुणैः ।
निश्चित्य सचिवैः सार्धं यौवराज्यममन्यत ॥ ४२ ॥
इस प्रकार विचारकर तथा अपने पुत्र श्रीरामको उन-उन नाना प्रकार के विलक्षण, सज्जनोचित, असंख्य तथा लोकोत्तर गुणोंसे, जो अन्य राजाओंमें दुर्लभ हैं, विभूषित देख राजा दशरथने मन्त्रियोंके साथ सलाह करके उन्हें युवराज बनानेका निश्चय कर लिया ॥ ४१-४२ ॥
दिव्यन्तरिक्षे भूमौ च घोरमुत्पातजं भयम् ।
संचचक्षेऽथ मेधावी शरीरे चात्मनो जराम् ॥४३ ॥
बुद्धिमान् महाराज दशरथने मन्त्रीको स्वर्ग, अन्तरिक्ष तथा भूतलमें दृष्टिगोचर होनेवाले उत्पातोंका घोर भय सूचित किया और अपने शरीरमें वृद्धावस्थाके आगमनकी भी बात बतायी ॥ ४३ ॥
पूर्णचन्द्राननस्याथ शोकापनुदमात्मनः ।
लोके रामस्य बुबुधे सम्प्रियत्वं महात्मनः ॥ ४४ ॥
पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर मुखवाले महात्मा श्रीराम समस्त प्रजाके प्रिय थे । लोकमें उनका सर्वप्रिय होना राजाके अपने आन्तरिक शोकको दूर करनेवाला था, इस बातको राजाने अच्छी तरह समझा ॥४४ ॥
आत्मनश्च प्रजानां च श्रेयसे च प्रियेण च ।
प्राप्ते काले स धर्मात्मा भक्त्या त्वरितवान् नृपः ॥ ४५ ॥
तदनन्तर उपयुक्त समय आनेपर धर्मात्मा राजा दशरथने अपने और प्रजाके कल्याणके लिये मन्त्रियोंको श्रीरामके राज्याभिषेकके लिये शीघ्र तैयारी करनेकी आज्ञा दी । इस उतावलीमें उनके हृदयका प्रेम और प्रजाका अनुराग भी कारण था ॥ ४५ ॥
नानानगरवास्तव्यान् पृथग्जानपदानपि ।
समानिनाय मेदिन्यां प्रधानान् पृथिवीपतिः ॥ ४६ ॥
उन भूपालने भिन्न - भिन्न नगरोंमें निवास करनेवाले प्रधान - प्रधान पुरुषों तथा अन्य जनपदोंके सामन्त राजाओंको भी मन्त्रियोंद्वारा अयोध्यामें बुलवा लिया ॥ ४६ ॥
तान् वेश्मनानाभरणैर्यथार्हं प्रतिपूजितान् ।
ददर्शालंकृतो राजा प्रजापतिरिव प्रजाः ॥ ४७ ॥
पृष्ठ 237
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अयोध्याकाण्डे उन सबको ठहरनेके लिये घर देकर नाना प्रकारके । आभूषणोंद्वारा उनका यथायोग्य सत्कार किया । तत्पश्चात् स्वयं भी अलंकृत होकर राजा दशरथ उन सबसे उसी प्रकार मिले, जैसे प्रजापति ब्रह्मा प्रजावर्गसे मिलते हैं ॥
न तु केकयराजानं जनकं वा नराधिपः ।
त्वरया चानयामास पश्चात्तौ श्रोष्यतः प्रियम् ॥ ४८॥
जल्दीबाजीके कारण राजा दशरथने केकय- । नरेशको तथा मिथिलापति जनकको भी नहीं बुलवाया । * उन्होंने सोचा वे दोनों सम्बन्धी इस प्रिय समाचारको पीछे सुन लेंगे ॥ ४८ ॥
अथोपविष्टे नृपतौ तस्मिन् परपुरार्दने ।
ततः प्रविविशुः शेषा राजानो लोकसम्मताः ॥ ४ ९ ॥
तदनन्तर शत्रुनगरीको पीड़ित करनेवाले राजा दशरथ जब दरबारमें आ बैठे, तब ( केकयराज और जनकको छोड़कर ) शेष सभी लोकप्रिय नरेशोंने । द्वितीयः सर्गः २२५ राजसभामें प्रवेश किया ॥ ४ ९ ॥
अथ राजवितीर्णेषु विविधेष्वासनेषु च ।
राजानमेवाभिमुखा निषेदुर्नियता नृपाः ॥ ५० ॥
वे सभी नरेश राजाद्वारा दिये गये नाना प्रकारके सिंहासनोंपर उन्हींकी ओर मुँह करके विनीतभावसे बैठे थे ॥५० ॥
स लब्धमानैर्विनयान्वितैर्नृपैः पुरालयैर्जानपदैश्च मानवैः । उपोपविष्टैर्नृपतिर्वृतो भौ सहस्रचक्षुर्भगवानिवामरैः ॥५१ ॥
राजासे सम्मानित होकर विनीतभावसे उन्हींके आस - पास बैठे हुए सामन्त नरेशों तथा नगर और जनपदके निवासी मनुष्योंसे घिरे हुए महाराज दशरथ उस समय देवताओंके बीचमें विराजमान सहस्रनेत्रधारी भगवान् इन्द्रके समान शोभा पा रहे थे ॥ ५१ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे प्रथमः सर्गः ॥ १ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें पहला सर्ग पूरा हुआ ॥ १ ॥
द्वितीयः सर्गः राजा दशरथद्वारा श्रीरामके राज्याभिषेकका प्रस्ताव तथा सभासदोंद्वारा श्रीरामके गुणों का वर्णन करते हुए उक्त प्रस्तावका सहर्ष युक्तियुक्त समर्थन
ततः परिषदं सर्वामामन्त्र्य वसुधाधिपः ।
हितमुद्धर्षणं चैवमुवाच प्रथितं वचः ॥ १ ॥
दुन्दुभिस्वरकल्पेन गम्भीरेणानुनादिना ।
स्वरेण महता राजा जीमूत इव नादयन् ॥ २ ॥
उस समय राजसभामें बैठे हुए सब लोगोंको सम्बोधित करके महाराज दशरथने मेघके समान शब्द करते हुए दुन्दुभिकी ध्वनिके सदृश अत्यन्त गम्भीर एवं गूँजते हुए उच्च स्वरसे सबके आनन्दको बढ़ानेवाली यह हितकारक बात कही ॥ १-२ ॥
राजलक्षणयुक्तेन कान्तेनानुपमेन च ।
उवाच रसयुक्तेन स्वरेण नृपतिर्नृपान् ॥ ३॥
राजा दशरथका स्वर राजोचित स्निग्धता और गम्भीरता आदि गुणोंसे युक्त था, अत्यन्त कमनीय और अनुपम था । वे उस अद्भुत रसमय स्वरसे समस्त नरेशोंको सम्बोधित करके बोले - ॥३ ॥
* केकयनरेशके साथ भरत शत्रुघ्न भी आ जाते । इन
। विदितं भवतामेतद् यथा मे राज्यमुत्तमम् ।
पूर्वकैर्मम राजेन्द्रैः सुतवत् परिपालितम् ॥४ ॥
सज्जनो! आपलोगोंको यह तो विदित ही है कि मेरे पूर्वज राजाधिराजोंने इस श्रेष्ठ राज्यका ( यहाँकी प्रजाका ) किस प्रकार पुत्रकी भाँति पालन किया था ॥
सोऽहमिक्ष्वाकुभिः सर्वैर्नरेन्द्रैः प्रतिपालितम् ।
श्रेयसा योक्तुमिच्छामि सुखार्हमखिलं जगत् ॥५ ॥
' समस्त इक्ष्वाकुवंशी नरेशोंने जिसका प्रतिपालन किया है, उस सुख भोगनेके योग्य सम्पूर्ण जगत्को अब मैं भी कल्याणका भागी बनाना चाहता हूँ ॥ ५ ॥
मयाप्याचरितं पूर्वैः पन्थानमनुगच्छता ।
प्रजा नित्यमनिद्रेण यथाशक्त्यभिरक्षिताः ॥६ ॥
' मेरे पूर्वज जिस मार्गपर चलते आये हैं, उसीका अनुसरण करते हुए मैंने भी सदा जागरूक रहकर समस्त प्रजाजनोंकी यथाशक्ति रक्षा की है ॥ ६ ॥
सबके तथा राजा जनकके रहनेसे श्रीरामका राज्याभिषेक सम्पन्न हो जाता और वे वनमें नहीं जाने पाते - इसी डरसे देवताओंने राजा दशरथको इन सबको नहीं बुलानेकी बुद्धि दे दी । 75 Srimad Valmiki Ramayan ( 1 ) _Section_9_1_Front
पृष्ठ 238
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२२६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामाय
इदं शरीरं कृत्स्नस्य लोकस्य चरता हितम् ।
पाण्डुरस्यातपत्रस्य च्छायायां जरितं मया ॥ ७ ॥
' समस्त संसारका हित - साधन करते हुए मैंने इस शरीरको श्वेत राजछत्रकी छायामें बूढ़ा किया है ॥ ७ ॥
प्राप्य वर्षसहस्राणि बहून्यायूंषि जीवतः ।
जीर्णस्यास्य शरीरस्य विश्रान्तिमभिरोचये ॥ ८ ॥
' अनेक सहस्र ( साठ हजार ) वर्षोंकी आयु पाकर जीवित रहते हुए अपने इस जराजीर्ण शरीरको अब मैं विश्राम देना चाहता हूँ ॥ ८ ॥
राजप्रभावजुष्टां च दुर्वहामजितेन्द्रियैः ।
परिश्रान्तोऽस्मि लोकस्य गुर्वी धर्मधुरं वहन् ॥ ९ ॥
' जगत्के धर्मपूर्वक संरक्षणका भारी भार राजाओंके शौर्य आदि प्रभावोंसे ही उठाना सम्भव है । अजितेन्द्रिय पुरुषोंके लिये इस बोझको ढोना अत्यन्त कठिन है । मैं
दीर्घकालसे इस भारी भारको वहन करते - करते थक ।
गया हूँ॥९॥
सोऽहं विश्राममिच्छामि पुत्रं कृत्वा प्रजाहिते ।
संनिकृष्टानिमान् सर्वाननुमान्य द्विजर्षभान् ॥ १० ॥
' इसलिये यहाँ पास बैठे हुए इन सम्पूर्ण श्रेष्ठ द्विजोंकी अनुमति लेकर प्रजाजनोंके हितके कार्यमें अपने पुत्र श्रीरामको नियुक्त करके अब मैं राजकार्यसे विश्राम लेना चाहता हूँ ॥ १० ॥
अनुजातो हि मां सर्वैर्गुणैः श्रेष्ठो ममात्मजः ।
पुरन्दरसमो वीर्ये रामः परपुरंजयः ॥ ११ ॥
' मेरे पुत्र श्रीराम मेरी अपेक्षा सभी गुणोंमें श्रेष्ठ हैं । शत्रुओंकी नगरीपर विजय पानेवाले श्रीरामचन्द्र बल - पराक्रममें देवराज इन्द्रके समान हैं ॥ ११ ॥
तं चन्द्रमिव पुष्येण युक्तं धर्मभृतां वरम् ।
यौवराज्ये नियोक्तास्मि प्रातः पुरुषपुङ्गवम् ॥ १२ ॥
' पुष्य नक्षत्रसे युक्त चन्द्रमाकी भाँति समस्त कार्योंके साधनमें कुशल तथा धर्मात्माओं में श्रेष्ठ उन पुरुषशिरोमणि श्रीरामचन्द्रको मैं कल प्रातः काल पुष्यनक्षत्रमें युवराजके पदपर नियुक्त करूँगा ॥ १२ ॥
अनुरूपः स वो नाथो लक्ष्मीवाँल्लक्ष्मणाग्रजः ।
त्रैलोक्यमपि नाथेन येन स्यान्नाथवत्तरम् ॥ १३ ॥
' लक्ष्मणके बड़े भाई श्रीमान् राम आपलोगोंके लिये योग्य स्वामी सिद्ध होंगे; उनके जैसे स्वामीसे सम्पूर्ण त्रिलोकी भी परम सनाथ हो सकती है ॥ १३ ॥
अनेन श्रेयसा सद्यः संयोक्ष्येऽहमिमां महीम् ।
गतक्लेशो भविष्यामि सुते तस्मिन् निवेश्य वै ॥ १४ ॥
' ये श्रीराम कल्याणस्वरूप हैं; इनका शीघ्र ही अभिषेक करके मैं इस भूमण्डलको तत्काल कल्याणका भागी बनाऊँगा । अपने पुत्र श्रीरामपर राज्यका भार रखकर मैं सर्वथा क्लेशरहित - निश्चिन्त हो जाऊँगा ॥ १४ ॥
यदिदं मेऽनुरूपार्थं मया साधु सुमन्त्रितम् ।
भवन्तो मेऽनुमन्यन्तां कथं वा करवाण्यहम् ॥ १५ ॥
' यदि मेरा यह प्रस्ताव आपलोगोंको अनुकूल जान पड़े और यदि मैंने यह अच्छी बात सोची हो तो आपलोग इसके लिये मुझे सहर्ष अनुमति दें अथवा यह बतावें कि मैं किस प्रकारसे कार्य करूँ ॥ १५ ॥
यद्यप्येषा मम प्रीतिर्हितमन्यद् विचिन्त्यताम् ।
अन्या मध्यस्थचिन्ता तु विमर्दाभ्यधिकोदया ॥१६ ॥
' यद्यपि यह श्रीरामके राज्याभिषेकका विचार मेरे लिये अधिक प्रसन्नताका विषय है तथापि यदि इसके अतिरिक्त भी कोई सबके लिये हितकर बात हो तो आपलोग उसे सोचें; क्योंकि मध्यस्थ पुरुषोंका विचार एकपक्षीय पुरुषकी अपेक्षा विलक्षण होता है, कारण कि वह पूर्वपक्ष और अपरपक्षको लक्ष्य करके किया गया होनेके कारण अधिक अभ्युदय करनेवाला होता है ' ॥ १६ ॥
इति ब्रुवन्तं मुदिताः प्रत्यनन्दन् नृपा नृपम् ।
वृष्टिमन्तं महामेघं नर्दन्त इव बर्हिणः ॥ १७ ॥
राजा दशरथ जब ऐसी बात कह रहे थे, उस समय वहाँ उपस्थित नरेशोंने अत्यन्त प्रसन्न होकर उन महाराजका उसी प्रकार अभिनन्दन किया, जैसे मोर मधुर केकारव फैलाते हुए वर्षा करनेवाले महामेघका अभिनन्दन करते हैं ॥ १७ ॥
स्निग्धोऽनुनाद: संजज्ञे ततो हर्षसमीरितः ।
जनौघोद्धुष्टसंनादो मेदिनीं कम्पयन्निव ॥ १८ ॥
तत्पश्चात् समस्त जनसमुदायकी स्नेहमयी हर्षध्वनि सुनायी पड़ी । वह इतनी प्रबल थी कि समस्त पृथ्वीको कँपाती हुई - सी जान पड़ी ॥१८ ॥
तस्य धर्मार्थविदुषो भावमाज्ञाय सर्वशः ।
ब्राह्मणा बलमुख्याश्च पौरजानपदैः सह ॥ १ ९ ॥
समेत्य ते मन्त्रयितुं समतागतबुद्धयः ।
ऊचुश्च मनसा ज्ञात्वा वृद्धं दशरथं नृपम् ॥ २० ॥
धर्म और अर्थके ज्ञाता महाराज दशरथके अभिप्रायको पूर्णरूपसे जानकर सम्पूर्ण ब्राह्मण और सेनापति नगर और जनपदके प्रधान -प्रधान व्यक्तियोंके साथ मिलकर परस्पर सलाह करनेके लिये बैठे और मनसे सब कुछ 75 Srimad Valmiki Ramayan ( 1 ) _Section_9_1_Back
पृष्ठ 239
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अयोध्याकाण्डे
समझकर जब वे एक निश्चयपर पहुँच गये, तब बूढ़े ।
राजा दशरथसे इस प्रकार बोले- ॥ १ ९ -२० ॥
अनेकवर्षसाहस्त्रो वृद्धस्त्वमसि पार्थिव ।
स रामं युवराजानमभिषिञ्चस्व पार्थिवम् ॥ २१ ॥
' पृथ्वीनाथ! आपकी अवस्था कई हजार वर्षोंकी हो गयी । आप बूढ़े हो गये । अतः पृथ्वीके पालनमें समर्थ अपने पुत्र श्रीरामका अवश्य ही युवराजके पदपर अभिषेक कीजिये ॥ २१ ॥
इच्छामो हि महाबाहुं रघुवीरं महाबलम् ।
गजेन महता यान्तं रामं छत्रावृताननम् ॥ २२ ॥
' रघुकुलके वीर महाबलवान् महाबाहु श्रीराम महान् गजराजपर बैठकर यात्रा करते हों और उनके ऊपर श्वेत छत्र तना हुआ हो - इस रूपमें हम उनकी झाँकी करना चाहते हैं ' ॥ २२ ॥
इति तद्वचनं श्रुत्वा राजा तेषां मनःप्रियम् ।
अजानन्निव जिज्ञासुरिदं वचनमब्रवीत् ॥ २३ ॥
उनकी यह बात राजा दशरथके मनको प्रिय लगनेवाली थी; इसे सुनकर राजा दशरथ अनजान - से बनकर उन सबके मनोभावको जाननेकी इच्छासे इस प्रकार बोले- ॥ २३ ॥
श्रुत्वैतद् वचनं यन्मे राघवं पतिमिच्छ्थ ।
राजानः संशयोऽयं मे तदिदं ब्रूत तत्त्वतः ॥ २४ ॥
' राजागण! मेरी यह बात सुनकर जो आपलोगोंने श्रीरामको राजा बनानेकी इच्छा प्रकट की है, इसमें मुझे यह संशय हो रहा है जिसे आपके समक्ष उपस्थित करता हूँ । आप इसे सुनकर इसका यथार्थ उत्तर दें ॥ २४ ॥
कथं नु मयि धर्मेण पृथिवीमनुशासति ।
भवन्तो द्रष्टुमिच्छन्ति युवराजं महाबलम् ॥ २५ ॥
' मैं धर्मपूर्वक इस पृथ्वीका निरन्तर पालन कर रहा हूँ, फिर मेरे रहते हुए आपलोग महाबली श्रीरामको युवराजके रूपमें क्यों देखना चाहते हैं? ' ॥ २५ ॥
ते तमूचुर्महात्मानः पौरजानपदैः सह ।
बहवो नृप कल्याणगुणाः सन्ति सुतस्य ते ॥ २६ ॥
यह सुनकर वे महात्मा नरेश नगर और जनपदके लोगोंके साथ राजा दशरथसे इस प्रकार बोले-' महाराज! आपके पुत्र श्रीराममें बहुत - से कल्याणकारी सद्गुण हैं ॥ २६ ॥
गुणान् गुणवतो देव देवकल्पस्य धीमतः ।
प्रियानानन्दनान् कृत्स्नान् प्रवक्ष्यामो ऽद्य तान् शृणु ॥ २७॥
75 Srimad Valmiki Ramayan ( 1 ) _Section_9_2_Front द्वितीयः सर्गः २२७ ' देव! देवताओंके तुल्य बुद्धिमान् और गुणवान् श्रीरामचन्द्रजीके सारे गुण सबको प्रिय लगनेवाले और आनन्ददायक हैं, हम इस समय उनका यत्किंचित् वर्णन कर रहे हैं, आप उन्हें सुनिये ॥ २७ ॥
दिव्यैर्गुणैः शक्रसमो रामः सत्यपराक्रमः ।
इक्ष्वाकुभ्योऽपि सर्वेभ्यो ह्यतिरिक्तो विशाम्पते ॥ २८ ॥
‘ प्रजानाथ! सत्यपराक्रमी श्रीराम देवराज इन्द्रके समान दिव्य गुणोंसे सम्पन्न हैं । इक्ष्वाकुकुलमें भी ये सबसे श्रेष्ठ हैं ॥ २८ ॥
रामः सत्पुरुषो लोके सत्यः सत्यपरायणः ।
साक्षाद् रामाद् विनिर्वृत्तो धर्मश्चापि श्रिया सह ॥ २ ९ ॥
' श्रीराम संसारमें सत्यवादी, सत्यपरायण और सत्पुरुष हैं । साक्षात् श्रीरामने ही अर्थके साथ धर्मको भी प्रतिष्ठित किया है ॥ २ ९ ॥
प्रजासुखत्वे चन्द्रस्य वसुधायाः क्षमागुणैः ।
बुद्ध्या बृहस्पतेस्तुल्यो वीर्ये साक्षाच्छ्चीपतेः ॥ ३० ॥
' ये प्रजाको सुख देनेमें चन्द्रमाकी और क्षमारूपी गुणमें पृथ्वीकी समानता करते हैं । बुद्धिमें बृहस्पति और बल - पराक्रममें साक्षात् शचीपति इन्द्रके समान हैं ॥ ३० ॥
धर्मज्ञः सत्यसंधश्च शीलवाननसूयकः ।
क्षान्तः सान्त्वयिता श्लक्ष्णः कृतज्ञो विजितेन्द्रियः ॥ ३१ ॥
मृदुश्च स्थिरचित्तश्च सदा भव्योऽनसूयकः ।
प्रियवादी च भूतानां सत्यवादी च राघवः ॥३२ ॥
' श्रीराम धर्मज्ञ, सत्यप्रतिज्ञ, शीलवान्, अदोषदर्शी, शान्त, दीन - दु: खियोंको सान्त्वना प्रदान करनेवाले, मृदुभाषी, कृतज्ञ, जितेन्द्रिय, कोमल स्वभाववाले, स्थिरबुद्धि, सदा कल्याणकारी, असूयारहित, समस्त प्राणियोंके प्रति प्रिय वचन बोलनेवाले और सत्यवादी हैं ॥ ३१-३२ ॥
बहुश्रुतानां वृद्धानां ब्राह्मणानामुपासिता ।
तेनास्येहातुला कीर्तिर्यशस्तेजश्च वर्धते ॥ ३३ ॥
' वे बहुश्रुत विद्वानों, बड़े - बूढ़ों तथा ब्राह्मणोंके उपासक हैं— सदा ही उनका संग किया करते हैं, इसलिये इस जगत् में श्रीरामकी अनुपम कीर्ति, यश और तेजका विस्तार हो रहा है ॥ ३३ ॥
देवासुर मनुष्याणां सर्वास्त्रेषु विशारदः ।
सम्यग् विद्याव्रतस्नातो यथावत् साङ्गवेदवित् ॥ ३४ ॥
' देवता, असुर और मनुष्योंके सम्पूर्ण अस्त्रोंका उन्हें विशेषरूपसे ज्ञान है । वे साङ्ग वेदके यथार्थ विद्वान् । और सम्पूर्ण विद्याओंमें भलीभाँति निष्णात हैं ॥ ३४ ॥
पृष्ठ 240
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२२८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे
गान्धर्वे च भुवि श्रेष्ठो बभूव भरताग्रजः ।
कल्याणाभिजनः साधुरदीनात्मा महामतिः ॥ ३५ ॥
' भरतके बड़े भाई श्रीराम गान्धर्ववेद ( संगीतशास्त्र ) में भी इस भूतलपर सबसे श्रेष्ठ हैं । कल्याणकी तो वे जन्मभूमि हैं । उनका स्वभाव साधु पुरुषोंके समान है, हृदय उदार और बुद्धि विशाल है ॥ ३५ ॥
द्विजैरभिविनीतश्च श्रेष्ठैर्धर्मार्थनैपुणैः ।
यदा व्रजति संग्रामं ग्रामार्थे नगरस्य वा ॥ ३६ ॥
गत्वा सौमित्रिसहितो नाविजित्य निवर्तते । ' धर्म और अर्थके प्रतिपादनमें कुशल श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने उन्हें उत्तम शिक्षा दी है । वे ग्राम अथवा नगरकी रक्षाके लिये लक्ष्मणके साथ जब संग्रामभूमिमें जाते हैं, उस समय वहाँ जाकर विजय प्राप्त किये बिना पीछे नहीं लौटते ॥ ३६३ ॥
संग्रामात् पुनरागत्य कुञ्जरेण रथेन वा ॥ ३७ ॥
पौरान् स्वजनवन्नित्यं कुशलं परिपृच्छति ।
पुत्रेष्वग्निषु दारेषु प्रेष्यशिष्यगणेषु च ॥ ३८ ॥
' संग्रामभूमिसे हाथी अथवा रथके द्वारा पुनः अयोध्या लौटनेपर वे पुरवासियोंसे स्वजनोंकी भाँति प्रतिदिन उनके पुत्रों, अग्निहोत्रकी अग्नियों, स्त्रियों, सेवकों और शिष्योंका कुशल- समाचार पूछते रहते हैं ॥
निखिलेनानुपूर्व्या च पिता पुत्रानिवौरसान् ।
शुश्रूषन्ते च वः शिष्याः कच्चिद् वर्मसु दंशिताः ॥ ३ ९ ॥
इति वः पुरुषव्याघ्रः सदा रामोऽभिभाषते । ' जैसे पिता अपने औरस पुत्रोंका कुशल-मङ्गल पूछता है, उसी प्रकार वे समस्त पुरवासियोंसे क्रमशः उनका सारा समाचार पूछा करते हैं । पुरुषसिंह श्रीराम ब्राह्मणोंसे सदा पूछते रहते हैं कि ' आपके शिष्य आपलोगोंकी सेवा करते हैं न? ' क्षत्रियोंसे यह जिज्ञासा करते हैं कि ' आपके सेवक कवच आदिसे सुसज्जित हो आपकी सेवामें तत्पर रहते हैं न? ' ॥ ३ ९ ३ ॥ व्यसनेषु मनुष्याणां भृशं भवति दुःखितः ॥ ४० ॥
उत्सवेषु च सर्वेषु पितेव परितुष्यति । ' नगरके मनुष्योंपर संकट आनेपर वे बहुत दुःखी हो जाते हैं और उन सबके घरोंमें सब प्रकारके उत्सव होनेपर उन्हें पिताकी भाँति प्रसन्नता होती है ॥ ४०३ ॥
सत्यवादी महेष्वासो वृद्धसेवी जितेन्द्रियः ॥ ४१ ॥
स्मितपूर्वाभिभाषी च धर्मं सर्वात्मनाश्रितः ।
सम्यग्योक्ता श्रेयसां च न विगृह्यकथारुचिः ॥ ४२ ॥
' वे सत्यवादी, महान् धनुर्धर, वृद्ध पुरुषोंके सेवक और जितेन्द्रिय हैं । श्रीराम पहले मुसकराकर वार्तालाप आरम्भ करते हैं । उन्होंने सम्पूर्ण हृदयसे धर्मका आश्रय ले रखा है । वे कल्याणका सम्यक् आयोजन करनेवाले हैं, निन्दनीय बातोंकी चर्चामें उनकी कभी रुचि नहीं होती है ॥
उत्तरोत्तरयुक्तौ च वक्ता वाचस्पतिर्यथा ।
सुभ्रुरायतताम्राक्षः साक्षाद् विष्णुरिव स्वयम् ॥ ४३ ॥
' उत्तरोत्तर उत्तम युक्ति देते हुए वार्तालाप करनेमें वे साक्षात् बृहस्पतिके समान हैं । उनकी भौंहें सुन्दर हैं, आँखें विशाल और कुछ लालिमा लिये हुए हैं । वे साक्षात् विष्णुकी भाँति शोभा पाते हैं ॥ ४३ ॥
रामो लोकाभिरामोऽयं शौर्यवीर्यपराक्रमैः ।
प्रजापालनसंयुक्तो न रागोपहतेन्द्रियः ॥ ४४ ॥
' सम्पूर्ण लोकोंको आनन्दित करनेवाले ये श्रीराम शूरता, वीरता और पराक्रम आदिके द्वारा सदा प्रजाका पालन करनेमें लगे रहते हैं । उनकी इन्द्रियाँ राग आदि दोषोंसे दूषित नहीं होती हैं ॥४४ ॥
शक्तस्त्रैलोक्यमप्येष भोक्तुं किं नु महीमिमाम् ।
नास्य क्रोधः प्रसादश्च निरर्थोऽस्ति कदाचन ॥ ४५ ॥
' इस पृथ्वीकी तो बात ही क्या है, वे सम्पूर्ण त्रिलोकीकी भी रक्षा कर सकते हैं । उनका क्रोध और । प्रसाद कभी व्यर्थ नहीं होता है ॥ ४५ ॥
हन्त्येष नियमाद् वध्यानवध्येषु न कुप्यति ।
युनक्त्यर्थेः प्रहृष्टश्च तमसौ यत्र तुष्यति ॥ ४६ ॥
' जो शास्त्र के अनुसार प्राणदण्ड पानेके अधिकारी हैं, उनका ये नियमपूर्वक वध कर डालते हैं तथा जो शास्त्रदृष्टिसे अवध्य हैं, उनपर ये कदापि कुपित नहीं होते हैं । जिसपर ये संतुष्ट होते हैं, उसे हर्षमें भरकर धनसे परिपूर्ण कर देते हैं ॥ ४६ ॥
दान्तैः सर्वप्रजाकान्तैः प्रीतिसंजननैर्नृणाम् ।
गुणैर्विरोचते रामो दीप्तः सूर्य इवांशुभिः ॥ ४७ ॥
' समस्त प्रजाओंके लिये कमनीय तथा मनुष्योंका आनन्द बढ़ानेवाले मन और इन्द्रियोंके संयम आदि सद्गुणोंद्वारा श्रीराम वैसे ही शोभा पाते हैं, जैसे तेजस्वी सूर्य अपनी किरणोंसे सुशोभित होते हैं ॥ ४७ ॥
तमेवंगुणसम्पन्नं रामं सत्यपराक्रमम् ।
लोकपालोपमं नाथमकामयत मेदिनी ॥ ४८ ॥
' ऐसे सर्वगुणसम्पन्न, लोकपालोंके समान प्रभावशाली एवं सत्यपराक्रमी श्रीरामको इस पृथ्वीकी जनता अपना स्वामी बनाना चाहती है ॥ ४८ ॥
75 Srimad Valmiki Ramayan ( 1 ) _Section_9_2_Back