वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ — पृष्ठ 241–250

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 241–250

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अयोध्याकाण्डे तृतीयः सर्गः २२ ९

वत्सः श्रेयसि जातस्ते दिष्ट्यासौ तव राघवः ।

दिष्ट्या पुत्रगुणैर्युक्तो मारीच इव कश्यपः ॥ ४ ९ ॥

' हमारे सौभाग्यसे आपके वे पुत्र श्रीरघुनाथजी प्रजाका कल्याण करनेमें समर्थ हो गये हैं तथा आपके सौभाग्यसे वे मरीचिनन्दन कश्यपकी भाँति पुत्रोचित गुणोंसे सम्पन्न हैं ॥ ४ ९ ॥

बलमारोग्यमायुश्च रामस्य विदितात्मनः ।

देवासुरमनुष्येषु सगन्धर्वोरगेषु च ॥५० ॥ ।

आशंसते जनः सर्वो राष्ट्रे पुरवरे तथा ।

आभ्यन्तरश्च बाह्यश्च पौरजानपदो जनः ॥ ५१ ॥

' देवताओं, असुरों, मनुष्यों, गन्धर्वों और नागोंमेंसे प्रत्येक वर्गके लोग तथा इस राज्य और राजधानीमें भी बाहर - भीतर आने - जानेवाले नगर और जनपदके सभी लोग सुविख्यात शीलस्वभाववाले श्रीरामचन्द्रजीके लिये सदा ही बल, आरोग्य और आयुकी शुभ कामना करते हैं ॥ स्त्रियो वृद्धास्तरुण्यश्च सायं प्रातः समाहिताः ।

सर्वा देवान्नमस्यन्ति रामस्यार्थे मनस्विनः ।

तेषां तद् याचितं देव त्वत्प्रसादात्समृद्ध्यताम् ॥ ५२ ॥

' इस नगरकी बूढ़ी और युवती - सब तरहकी | स्त्रियाँ सबेरे और सायंकालमें एकाग्रचित्त होकर परम उदार श्रीरामचन्द्रजीके युवराज होनेके लिये देवताओंसे नमस्कारपूर्वक प्रार्थना किया करती हैं । देव! उनकी वह प्रार्थना आपके कृपा - प्रसादसे अब पूर्ण होनी चाहिये ॥ ५२ ॥

राममिन्दीवरश्यामं सर्वशत्रुनिबर्हणम् ।

पश्यामो यौवराज्यस्थं तव राजोत्तमात्मजम् ॥ ५३ ॥

' नृपश्रेष्ठ! जो नीलकमलके समान श्यामकान्तिसे सुशोभित तथा समस्त शत्रुओंका संहार करनेमें समर्थ हैं, आपके उन ज्येष्ठ पुत्र श्रीरामको हम युवराज - पदपर विराजमान देखना चाहते हैं ॥५३ ॥

तं देवदेवोपममात्मजं ते सर्वस्य लोकस्य हिते निविष्टम् । हिताय नः क्षिप्रमुदारजुष्टं मुदाभिषेक्तुं वरद त्वमर्हसि ॥ ५४ ॥

' अतः वरदायक महाराज! आप देवाधिदेव श्रीविष्णुके समान पराक्रमी, सम्पूर्ण लोकोंके हितमें संलग्न रहनेवाले और महापुरुषद्वारा सेवित अपने पुत्र श्रीरामचन्द्रजीका जितना शीघ्र हो सके प्रसन्नतापूर्वक राज्याभिषेक कीजिये, । इसीमें हमलोगोंका हित है ' ॥ ५४ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे द्वितीयः सर्गः ॥ २ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें दूसरा सर्ग पूरा हुआ ॥ २ ॥

तृतीयः सर्गः राजा दशरथका वसिष्ठ और वामदेवजीको श्रीरामके राज्याभिषेककी तैयारी करनेके लिये कहना और उनका सेवकोंको तदनुरूप आदेश देना; राजाकी आज्ञासे सुमन्त्रका श्रीरामको राजसभामें बुला लाना और राजाका अपने पुत्र श्रीरामको हितकर राजनीतिकी बातें बताना

तेषामञ्जलिपद्मानि प्रगृहीतानि सर्वशः ।

प्रतिगृह्याब्रवीद् राजा तेभ्यः प्रियहितं वचः ॥ १ ॥

सभासदोंने कमलपुष्पकी - सी आकृतिवाली अपनी अञ्जलियोंको सिरसे लगाकर सब प्रकारसे महाराजके प्रस्तावका समर्थन किया; उनकी वह पद्माञ्जलि स्वीकार करके राजा दशरथ उन सबसे प्रिय और हितकारी वचन बोले - ॥१ ॥

अहोऽस्मि परमप्रीतः प्रभावश्चातुलो मम ।

यन्मे ज्येष्ठं प्रियं पुत्रं यौवराज्यस्थमिच्छ्थ ॥ २ ॥

' अहो! आपलोग जो मेरे परमप्रिय ज्येष्ठ पुत्र श्रीरामको युवराजके पदपर प्रतिष्ठित देखना चाहते हैं इससे मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है तथा मेरा प्रभाव अनुपम | हो गया है'॥२ ॥

इति प्रत्यर्चितान् राजा ब्राह्मणानिदमब्रवीत् ।

वसिष्ठं वामदेवं च तेषामेवोपशृण्वताम् ॥ ३ ॥

इस प्रकारकी बातोंसे पुरवासी तथा अन्यान्य सभासदोंका सत्कार करके राजाने उनके सुनते हुए ही वामदेव और वसिष्ठ आदि ब्राह्मणोंसे इस प्रकार कहा- ॥ ३ ॥

चैत्रः श्रीमानयं मासः पुण्यः पुष्पितकाननः ।

यौवराज्याय रामस्य सर्वमेवोपकल्प्यताम् ॥४ ॥

' यह चैत्रमास बड़ा सुन्दर और पवित्र है, इसमें

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२३० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे सारे वन - उपवन खिल उठे हैं; अतः इस समय श्रीरामका युवराजपदपर अभिषेक करनेके लिये आपलोग सब सामग्री एकत्र कराइये'॥४ ॥

राज्ञस्तूपरते वाक्ये जनघोषो महानभूत् ।

शनैस्तस्मिन् प्रशान्ते च जनघोषे जनाधिपः ॥ ५ ॥

वसिष्ठं मुनिशार्दूलं राजा वचनमब्रवीत् । राजाकी यह बात समाप्त होनेपर सब लोग हर्षके कारण महान् कोलाहल करने लगे । धीरे - धीरे उस जनरवके शान्त होनेपर प्रजापालक नरेश दशरथने मुनिप्रवर वसिष्ठसे यह बात कही - ॥ ५३ ॥

अभिषेकाय रामस्य यत् कर्म सपरिच्छदम् ॥ ६ ॥

तदद्य भगवन् सर्वमाज्ञापयितुमर्हसि । ' भगवन्! श्रीरामके अभिषेकके लिये जो कर्म आवश्यक हो, उसे साङ्गोपाङ्ग बताइये और आज ही उस सबकी तैयारी करनेके लिये सेवकोंको आज्ञा दीजिये ' ॥ ६३ ॥

तच्छ्रुत्वा भूमिपालस्य वसिष्ठो मुनिसत्तमः ॥७ ॥

आदिदेशाग्रतो राज्ञः स्थितान् युक्तान् कृताञ्जलीन् । महाराजका यह वचन सुनकर मुनिवर वसिष्ठने राजाके सामने ही हाथ जोड़कर खड़े हुए आज्ञापालनके लिये तैयार रहनेवाले सेवकोंसे कहा- - ॥७३ । ॥ सुवर्णादीनि रत्नानि बलीन् सर्वौषधीरपि ॥ ८ ॥

शुक्लमाल्यानि लाजांश्च पृथक् च मधुसर्पिषी ।

अहतानि च वासांसि रथं सर्वायुधान्यपि ॥ ९ ॥

चतुरङ्गबलं चैव गजं च शुभलक्षणम् ।

चामरव्यजने चोभे ध्वजं छत्रं च पाण्डुरम् ॥ १० ॥

शतं च शातकुम्भानां कुम्भानामग्निवर्चसाम् ।

हिरण्यशृङ्गमृषभं समग्रं व्याघ्रचर्म च ॥ ११ ॥

यच्चान्यत् किंचिदेष्टव्यं तत् सर्वमुपकल्प्यताम् ।

उपस्थापयत प्रातरग्न्यगारे महीपतेः ॥ १२ ॥

' तुमलोग सुवर्ण आदि रत्न, देवपूजनकी सामग्री, सब प्रकारकी ओषधियाँ, श्वेत पुष्पोंकी मालाएँ, खील, अलग - अलग पात्रोंमें शहद और घी, नये वस्त्र, रथ, सब प्रकारके अस्त्र - शस्त्र, चतुरङ्गिणी सेना, उत्तम लक्षणोंसे युक्त हाथी, चमरी गायकी पूँछके बालोंसे बने हुए दो व्यजन, ध्वज, श्वेत छत्र, अग्निके समान देदीप्यमान सोनेके सौ कलश, सुवर्णसे मढ़े हुए सींगोंवाला एक साँड, समूचा व्याघ्रचर्म तथा और जो कुछ भी वांछनीय वस्तुएँ हैं, उन सबको एकत्र करो और प्रातः काल महाराजकी अग्निशालामें पहुँचा दो ॥ ८-१२ ॥

। अन्तःपुरस्य द्वाराणि सर्वस्य नगरस्य च ।

चन्दनस्त्रग्भिरर्च्यन्तां धूपैश्च घ्राणहारिभिः ॥ १३ ॥

' अन्तःपुर तथा समस्त नगरके सभी दरवाजों चन्दन और मालाओंसे सजा दो तथा वहाँ ऐसे धूप सुलगा दो जो अपनी सुगन्धसे लोगोंको आकर्षित कर लें ॥ १३ ॥

प्रशस्तमन्नं गुणवद् दधिक्षीरोपसेचनम् ।

द्विजानां शतसाहस्त्रं यत्प्रकाममलं भवेत् ॥ १४ ॥

' दही, दूध और घी आदिसे संयुक्त अत्यन्त उत्तम एवं गुणकारी अन्न तैयार कराओ, जो एक लाख ब्राह्मणोंके भोजनके लिये पर्याप्त हो ॥१४ ॥

सत्कृत्य द्विजमुख्यानां श्वः प्रभाते प्रदीयताम् ।

घृतं दधि च लाजाश्च दक्षिणाश्चापि पुष्कलाः ॥ १५ ॥

' कल प्रातःकाल श्रेष्ठ ब्राह्मणोंका सत्कार करके उन्हें वह अन्न प्रदान करो; साथ ही घी, दही, खील और पर्याप्त दक्षिणाएँ भी दो ॥ १५ ॥

सूर्येऽभ्युदितमात्रे श्वो भविता स्वस्तिवाचनम् ।

ब्राह्मणाश्च निमन्त्र्यन्तां कल्प्यन्तामासनानि च ॥ १६ ॥

' कल सूर्योदय होते ही स्वस्तिवाचन होगा, इसके लिये ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करो और उनके लिये आसनोंका प्रबन्ध कर लो ॥१६ ॥

आबध्यन्तां पताकाश्च राजमार्गश्च सिच्यताम् ।

सर्वे च तालापचरा गणिकाश्च स्वलंकृताः ॥ १७ ॥

कक्ष्यां द्वितीयामासाद्य तिष्ठन्तु नृपवेश्मनः । ' नगरमें सब ओर पताकाएँ फहरायी जायँ तथा राजमार्गोंपर छिड़काव कराया जाय । समस्त तालजीवी ( संगीतनिपुण ) पुरुष और सुन्दर वेष - भूषासे विभूषित वाराङ्गनाएँ ( नर्तकियाँ ) राजमहलकी दूसरी कक्षा ( ड्यौढ़ी ) में पहुँचकर खड़ी रहें ॥ १७३ ॥

देवायतनचैत्येषु सान्नभक्ष्याः सदक्षिणाः ॥ १८ ॥

उपस्थापयितव्याः स्युर्माल्ययोग्याः पृथक्पृथक् । ' देव - मन्दिरोंमें तथा चैत्यवृक्षोंके नीचे या चौराहोंपर जो पूजनीय देवता हैं, उन्हें पृथक् - पृथक् भक्ष्य- भोज्य पदार्थ एवं दक्षिणा प्रस्तुत करनी चाहिये ॥ १८३ ॥

दीर्घासिबद्धगोधाश्च संनद्धा मृष्टवाससः ॥ १ ९ ॥ महाराजाङ्गनं शूराः प्रविशन्तु महोदयम् । ' लंबी तलवार लिये और गोधाचर्मके बने दस्ता पहने और कमर कसकर तैयार रहनेवाले शूर- र - वीर योद्धा स्वच्छ वस्त्र धारण किये महाराजके महान् अभ्युदयशाली आँगनमें प्रवेश करें ' ॥ १ ९ ३ ॥

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अयोध्याकाण्डे एवं व्यादिश्य विप्रौ तु क्रियास्तत्र विनिष्ठितौ ॥ २० ॥ ।

चक्रतुश्चैव यच्छेषं पार्थिवाय निवेद्य च । सेवकोंको इस प्रकार कार्य करनेका आदेश देकर दोनों ब्राह्मण वसिष्ठ और वामदेवने पुरोहितद्वारा सम्पादित होने योग्य क्रियाओंको स्वयं पूर्ण किया । राजाके बताये हुए कार्योंके अतिरिक्त भी जो शेष आवश्यक कर्तव्य था उसे भी उन दोनोंने राजासे पूछकर स्वयं ही सम्पन्न किया ॥२०३ ॥

कृतमित्येव चाब्रूतामभिगम्य जगत्पतिम् ॥ २१ ॥

यथोक्तवचनं प्रीतौ हर्षयुक्तौ द्विजोत्तमौ । तदनन्तर महाराजके पास जाकर प्रसन्नता और हर्षसे भरे हुए वे दोनों श्रेष्ठ द्विज बोले- ' राजन्! आपने जैसा कहा था, उसके अनुसार सब कार्य सम्पन्न हो गया ' ॥ २१३ ॥

ततः सुमन्त्रं द्युतिमान् राजा वचनमब्रवीत् ॥ २२ ॥

रामः कृतात्मा भवता शीघ्रमानीयतामिति । इसके बाद तेजस्वी राजा दशरथने सुमन्त्रसे कहा - ' सखे! पवित्रात्मा श्रीरामको तुम शीघ्र यहाँ बुला लाओ ' ॥ २२३ ॥

स तथेति प्रतिज्ञाय सुमन्त्रो राजशासनात् ॥ २३ ॥

रामं तत्रानयांचक्रे रथेन रथिनां वरम् । तब ' जो आज्ञा ' कहकर सुमन्त्र गये तथा राजाके आदेशानुसार रथियोंमें श्रेष्ठ श्रीरामको रथपर बिठाकर ले आये ॥ २३३ ॥

अथ तत्र सहासीनास्तदा दशरथं नृपम् ॥ २४ ॥

प्राच्योदीच्या प्रतीच्याश्च दाक्षिणात्याश्च भूमिपाः ।

म्लेच्छाश्चार्याश्च ये चान्ये वनशैलान्तवासिनः ॥ २५ ॥

उपासांचक्रिरे सर्वे तं देवा वासवं यथा । उस राजभवनमें साथ बैठे हुए पूर्व, उत्तर, पश्चिम और दक्षिणके भूपाल, म्लेच्छ, आर्य तथा वनों और पर्वतोंमें रहनेवाले अन्यान्य मनुष्य सब - के - सब उस समय राजा दशरथकी उसी प्रकार उपासना कर रहे थे जैसे देवता देवराज इन्द्रकी ॥ २४-२५३ ॥ तेषां मध्ये स राजर्षिर्मरुतामिव वासवः ॥ २६ ॥

प्रासादस्थो दशरथो ददर्शायान्तमात्मजम् ।

गन्धर्वराजप्रतिमं लोके विख्यातपौरुषम् ॥ २७ ॥

उनके बीच अट्टालिकाके भीतर बैठे हुए राजा दशरथ मरुद्गणोंके मध्य देवराज इन्द्रकी भाँति शोभा पा रहे थे; उन्होंने वहींसे अपने पुत्र श्रीरामको अपने पास आते देखा, जो गन्धर्वराजके समान तेजस्वी थे, उनका तृतीयः सर्गः २३१ पौरुष समस्त संसारमें विख्यात था ॥ २६-२७ ॥

दीर्घबाहुं महासत्त्वं मत्तमातङ्गगामिनम् ।

चन्द्रकान्ताननं राममतीव प्रियदर्शनम् ॥ २८ ॥

रूपौदार्यगुणैः पुंसां दृष्टिचित्तापहारिणम् । घर्माभितप्ताः पर्जन्यं ह्लादयन्तमिव उनकी भुजाएँ बड़ी और बल मतवाले गजराजके समान बड़ी मस्तीके थे । उनका मुख चन्द्रमासे भी अधिक श्रीरामका दर्शन सबको अत्यन्त प्रिय अपने रूप और उदारता आदि गुणोंसे और मन आकर्षित कर लेते थे । जैसे प्राणियोंको मेघ आनन्द प्रदान करता है, समस्त प्रजाको परम आह्लाद देते रहते प्रजाः ॥ २ ९ ॥ महान् था । वे साथ चल रहे कान्तिमान् था । लगता था । वे लोगोंकी दृष्टि धूपमें तपे हुए उसी प्रकार वे थे ॥ २८-२९ ॥

न ततर्प समायान्तं पश्यमानो नराधिपः ।

अवतार्य सुमन्त्रस्तु राघवं स्यन्दनोत्तमात् ॥ ३० ॥

पितुः समीपं गच्छन्तं प्राञ्जलिः पृष्ठतोऽन्वगात् । आते हुए श्रीरामचन्द्रकी ओर एकटक देखते हुए राजा दशरथको तृप्ति नहीं होती थी । सुमन्त्रने उस श्रेष्ठ रथसे श्रीरामचन्द्रजीको उतारा और जब वे पिताके समीप जाने लगे, तब सुमन्त्र भी उनके पीछे - पीछे हाथ जोड़े हुए गये ॥ ३०३ ॥

स तं कैलासशृङ्गाभं प्रासादं रघुनन्दनः ॥ ३१ ॥

आरुरोह नृपं द्रष्टुं सहसा तेन राघवः । वह राजमहल कैलासशिखरके समान उज्ज्वल और ऊँचा था, रघुकुलको आनन्दित करनेवाले श्रीराम महाराजका दर्शन करनेके लिये सुमन्त्रके साथ सहसा उसपर चढ़ गये ॥ ३१३ ॥

स प्राञ्जलिरभिप्रेत्य प्रणतः पितुरन्तिके ॥ ३२ ॥

नाम स्वं श्रावयन् रामो ववन्दे चरणौ पितुः । श्रीराम दोनों हाथ जोड़कर विनीतभावसे पिताके पास गये और अपना नाम सुनाते हुए उन्होंने उनके दोनों चरणोंमें प्रणाम किया ॥ ३२३ ॥

तं दृष्ट्वा प्रणतं पार्श्वे कृताञ्जलिपुटं नृपः ॥ ३३ ॥

गृह्याञ्जलौ समाकृष्य सस्वजे प्रियमात्मजम् । श्रीरामको पास आकर हाथ जोड़ प्रणाम करते देख राजाने उनके दोनों हाथ पकड़ लिये और अपने प्रिय पुत्रको पास खींचकर छाती से लगा लिया ॥ ३३३ ॥

तस्मै चाभ्युद्यतं सम्यङ्मणिकाञ्चनभूषितम् ॥ ३४ ॥

दिदेश राजा रुचिरं रामाय परमासनम् । उस समय राजाने उन श्रीरामचन्द्रजीको मणिजटित

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२३२ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे सुवर्णसे भूषित एक परम सुन्दर सिंहासनपर बैठनेकी आज्ञा दी, जो पहलेसे उन्हींके लिये वहाँ उपस्थित किया गया था ॥३४३ ॥

तथाऽऽसनवरं प्राप्य व्यदीपयत राघवः ॥ ३५ ॥

स्वयैव प्रभया मेरुमुदये विमलो रविः । जैसे निर्मल सूर्य उदयकालमें मेरुपर्वतको अपनी किरणोंसे उद्भासित कर देते हैं उसी प्रकार श्रीरघुनाथजी उस श्रेष्ठ आसनको ग्रहण करके अपनी ही प्रभासे उसे प्रकाशित करने लगे ॥ ३५३ ॥

तेन विभ्राजिता तत्र सा सभापि व्यरोचत ॥ ३६ ॥

विमलग्रहनक्षत्रा शारदी द्यौरिवेन्दुना । उनसे प्रकाशित हुई वह सभा भी बड़ी शोभा पा रही थी । ठीक उसी तरह जैसे निर्मल ग्रह और नक्षत्रोंसे

भरा हुआ शरत् - कालका आकाश चन्द्रमासे उद्भासित हो ।

उठता है ॥ ३६३ ॥

तं पश्यमानो नृपतिस्तुतोष प्रियमात्मजम् ॥ ३७॥

अलंकृतमिवात्मानमादर्शतलसंस्थितम् 1 जैसे सुन्दर वेश - भूषासे अलंकृत हुए अपने ही प्रतिबिम्बको दर्पणमें देखकर मनुष्यको बड़ा संतोष प्राप्त होता है, उसी प्रकार अपने शोभाशाली प्रिय पुत्र उन श्रीरामको देखकर राजा बड़े प्रसन्न हुए ॥ ३७३ ॥

स तं सुस्थितमाभाष्य पुत्रं पुत्रवतां वरः ॥ ३८ ॥

उवाचेदं वचो राजा देवेन्द्रमिव कश्यपः । जैसे कश्यप देवराज इन्द्रको पुकारते हैं, उसी प्रकार पुत्रवानोंमें श्रेष्ठ राजा दशरथ सिंहासनपर बैठे हुए अपने पुत्र श्रीरामको सम्बोधित करके उनसे इस प्रकार बोले-ज्येष्ठायामसि मे पल्यां सदृश्यां सदृशः सुतः ॥ ३ ९ ॥

उत्पन्नस्त्वं गुणज्येष्ठो मम रामात्मजः प्रियः ।

त्वया यतः प्रजाश्चेमाः स्वगुणैरनुरञ्जिताः ॥ ४० ॥

तस्मात् त्वं पुष्ययोगेन यौवराज्यमवाप्नुहि । ' बेटा! तुम्हारा जन्म मेरी बड़ी महारानी कौसल्याके गर्भसे हुआ है । तुम अपनी माताके अनुरूप ही उत्पन्न हुए हो । श्रीराम! तुम गुणोंमें मुझसे भी बढ़कर हो, अतः मेरे परम प्रिय पुत्र हो; तुमने अपने गुणोंसे इन समस्त प्रजाओंको प्रसन्न कर लिया है, इसलिये कल पुष्यनक्षत्रके योगमें युवराजका पद ग्रहण करो ॥ ३ ९ -४० ३ ॥ कामतस्त्वं प्रकृत्यैव निर्णीतो गुणवानिति ॥ ४१ ॥

गुणवत्यपि तु स्नेहात् पुत्र वक्ष्यामि ते हितम् ।

भूयो विनयमास्थाय भव नित्यं जितेन्द्रियः ॥ ४२ ॥ ।

' बेटा! यद्यपि तुम स्वभावसे ही गुणवान् हो और तुम्हारे विषयमें यही सबका निर्णय है तथापि मैं स्नेहवश सद्गुणसम्पन्न होनेपर भी तुम्हें कुछ हितकी बातें बताता हूँ । तुम और भी अधिक विनयका आश्रय लेकर सदा जितेन्द्रिय बने रहो ॥ ४१-४२ ॥

कामक्रोधसमुत्थानि त्यजस्व व्यसनानि च ।

परोक्षया वर्तमानो वृत्त्या प्रत्यक्षया तथा ॥ ४३ ॥

' काम और क्रोधसे उत्पन्न होनेवाले दुर्व्यसनोंका सर्वथा त्याग कर दो, परोक्षवृत्तिसे ( अर्थात् गुप्तचरोंद्वारा यथार्थ बातोंका पता लगाकर ) तथा प्रत्यक्षवृत्तिसे ( अर्थात् दरबारमें सामने आकर कहनेवाली जनताके मुख उसके वृत्तान्तोंको प्रत्यक्ष देख - सुनकर ) ठीक - ठीक न्यायविचारमें तत्पर रहो ॥ ४३ ॥

अमात्यप्रभृतीः सर्वाः प्रजाश्चैवानुरञ्जय ।

कोष्ठागारायुधागारैः कृत्वा संनिचयान् बहून् ॥ ४४ ॥

इष्टानुरक्तप्रकृतिर्यः पालयति मेदिनीम् ।

तस्य नन्दन्ति मित्राणि लब्ध्वामृतमिवामराः ॥ ४५ ॥

' मन्त्री, सेनापति आदि समस्त अधिकारियों तथा प्रजाजनोंको सदा प्रसन्न रखना । जो राजा कोष्ठागार ( भण्डारगृह ) तथा शस्त्रागार आदिके द्वारा उपयोगी वस्तुओंका बहुत बड़ा संग्रह करके मन्त्री, सेनापति और प्रजा आदि समस्त प्रकृतियोंको प्रिय मानकर उन्हें अपने प्रति अनुरक्त एवं प्रसन्न रखते हुए पृथ्वीका पालन करता है, उसके मित्र उसी प्रकार आनन्दित होते हैं, जैसे अमृतको पाकर देवता प्रसन्न हुए थे ॥ ४४-४५ ॥

तस्मात् पुत्र त्वमात्मानं नियम्यैवं समाचर ।

तच्छ्रुत्वा सुहृदस्तस्य रामस्य प्रियकारिणः ॥ ४६ ॥

त्वरिताः शीघ्रमागत्य कौसल्यायै न्यवेदयन् । ' इसलिये बेटा! तुम अपने चित्तको वशमें रखकर इस प्रकारके उत्तम आचरणोंका पालन करते रहो । ' राजाकी ये बातें सुनकर श्रीरामचन्द्रजीका प्रिय करनेवाले सुहृदोंने तुरंत माता कौसल्याके पास जाकर उन्हें यह शुभ समाचार निवेदन किया ॥ ४६३ ॥

सा हिरण्यं च गाश्चैव रत्नानि विविधानि च ॥ ४७ ॥

व्यादिदेश प्रियाख्येभ्यः कौसल्या प्रमदोत्तमा । नारियोंमें श्रेष्ठ कौसल्याने वह प्रिय संवाद सुनानेवाले उन सुहृदोंको तरह - तरहके रत्न, सुवर्ण और गौएँ पुरस्काररूपमें दीं ॥ ४७३ ॥

पृष्ठ 245

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अयोध्याकाण्डे

अथाभिवाद्य राजानं रथमारुह्य राघवः ।

ययौ स्वं द्युतिमद् वेश्म जनौघैः प्रतिपूजितः ॥ ४८ ॥

इसके बाद श्रीरामचन्द्रजी राजाको प्रणाम करके रथपर बैठे और प्रजाजनोंसे सम्मानित होते हुए वे अपने शोभाशाली भवनमें चले गये ॥ ४८ ॥

ते चापि पौरा नृपतेर्वचस्त-च्छ्रुत्वा तदा लाभमिवेष्टमाशु । चतुर्थः सर्गः २३३ नरेन्द्रमामन्त्र्य गृहाणि गत्वा देवान् समानर्चुरभिप्रहृष्टाः ॥ ४ ९ ॥ नगरनिवासी मनुष्योंने राजाकी बातें सुनकर मन-ही मन यह अनुभव किया कि हमें शीघ्र ही अभीष्ट, वस्तुकी प्राप्ति होगी, फिर भी महाराजकी आज्ञा लेकर अपने घरोंको गये और अत्यन्त हर्षसे भरकर अभीष्ट-सिद्धिके उपलक्ष्यमें देवताओंकी पूजा करने लगे ॥ ४ ९ ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे तृतीयः सर्गः ॥ ३ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें तीसरा सर्ग पूरा हुआ ॥ ३ ॥

चतुर्थः सर्गः श्रीरामको राज्य देनेका निश्चय करके राजाका सुमन्त्रद्वारा पुनः श्रीरामको बुलवाकर उन्हें आवश्यक बातें बताना, श्रीरामका कौसल्याके भवनमें जाकर माताको यह समाचार बताना और मातासे आशीर्वाद पाकर लक्ष्मणसे प्रेमपूर्वक वार्तालाप करके अपने महलमें जाना

गतेष्वथ नृपो भूयः पौरेषु सह मन्त्रिभिः ।

मन्त्रयित्वा ततश्चक्रे निश्चयज्ञः स निश्चयम् ॥ १ ॥

श्व एव पुष्यो भविता श्वोऽभिषेच्यस्तु मे सुतः ।

रामो राजीवपत्राक्षो युवराज इति प्रभुः ॥ २ ॥

राजसभासे पुरवासियोंके चले जानेपर कार्यसिद्धिके योग्य देश - कालके नियमको जाननेवाले प्रभावशाली नरेशने पुनः मन्त्रियोंके साथ सलाह करके यह निश्चय किया कि ' कल ही पुष्य नक्षत्र होगा, अतः कल ही मुझे अपने पुत्र कमलनयन श्रीरामका युवराजके पदपर अभिषेक कर देना चाहिये ' ॥ १-२ ॥

अथान्तर्गृहमाविश्य राजा दशरथस्तदा ।

सूतमामन्त्रयामास रामं पुनरिहानय ॥ ३ ॥

तदनन्तर अन्तःपुरमें जाकर महाराज दशरथने सूतको बुलाया और आज्ञा दी - ' जाओ, श्रीरामको एक बार फिर यहाँ बुला लाओ ' ॥ ३ ॥

प्रतिगृह्य तु तद्वाक्यं सूतः पुनरुपाययौ ।

रामस्य भवनं शीघ्रं राममानयितुं पुनः ॥ ४ ॥

उनकी आज्ञा शिरोधार्य करके सुमन्त्र श्रीरामको शीघ्र बुला लानेके लिये पुनः उनके महलमें गये ॥४ ॥

द्वाःस्थैरावेदितं तस्य रामायागमनं पुनः ।

श्रुत्वैव चापि रामस्तं प्राप्तं शङ्कान्वितोऽभवत् ॥ ५ ॥

द्वारपालोंने श्रीरामको सुमन्त्रके पुनः आगमनकी सूचना दी । उनका आगमन सुनते ही श्रीरामके मनमें संदेह हो गया ॥५ ॥

प्रवेश्य चैनं त्वरितो रामो वचनमब्रवीत् ।

यदागमनकृत्यं भूयस्तद्ब्रह्यशेषतः ॥ ६ ॥

उन्हें भीतर बुलाकर श्रीरामने उनसे बड़ी उतावलीके साथ पूछा - ' आपको पुनः यहाँ आनेकी क्या आवश्यकता पड़ी? ' यह पूर्णरूपसे बताइये ॥ ६ ॥

तमुवाच ततः सूतो राजा त्वां द्रष्टुमिच्छति ।

श्रुत्वा प्रमाणं तत्र त्वं गमनायेतराय वा ॥७ ॥

तब सूतने उनसे कहा- ' महाराज आपसे मिलना चाहते हैं । मेरी इस बातको सुनकर वहाँ जाने या न जानेका निर्णय आप स्वयं करें'॥७ ॥

इति सूतवचः श्रुत्वा रामोऽपि त्वरयान्वितः ।

प्रययौ राजभवनं पुनर्द्रष्टुं नरेश्वरम् ॥ ८ ॥

सूतका यह वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजी महाराज दशरथका पुनः दर्शन करनेके लिये तुरंत उनके महलकी ओर चल दिये ॥ ८ ॥

तं श्रुत्वा समनुप्राप्तं रामं दशरथो नृपः ।

प्रवेशयामास गृहं विवक्षुः प्रियमुत्तमम्॥९ ॥

श्रीरामको आया हुआ सुनकर राजा दशरथने उनसे प्रिय तथा उत्तम बात कहनेके लिये उन्हें महलके भीतर बुला लिया॥९॥

प्रविशन्नेव च श्रीमान् राघवो भवनं पितुः ।

। ददर्श पितरं दूरात् प्रणिपत्य कृताञ्जलिः ॥१० ॥

पृष्ठ 246

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२३४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे पिताके भवनमें प्रवेश करते ही श्रीमान् रघुनाथजीने उन्हें देखा और दूरसे ही हाथ जोड़कर वे उनके चरणोंमें पड़ गये ॥१० ॥

प्रणमन्तं तमुत्थाप्य सम्परिष्वज्य भूमिपः ।

प्रदिश्य चासनं चास्मै रामं च पुनरब्रवीत् ॥ ११ ॥

प्रणाम करते हुए श्रीरामको उठाकर महाराजने छातीसे लगा लिया और उन्हें बैठनेके लिये आसन देकर पुनः उनसे इस प्रकार कहना आरम्भ किया - ॥११ ॥

राम वृद्धोऽस्मि दीर्घायुर्भुक्ता भोगा यथेप्सिताः ।

अन्नवद्भिः क्रतुशतैर्यथेष्टं भूरिदक्षिणैः ॥ १२ ॥

' श्रीराम! अब मैं बूढ़ा हुआ । मेरी आयु बहुत अधिक हो गयी । मैंने बहुत - से मनोवाञ्छित भोग भोग लिये, अन्न और बहुत - सी दक्षिणाओंसे युक्त सैकड़ों यज्ञ भी कर लिये ॥ १२ ॥

जातमिष्टमपत्यं मे त्वमद्यानुपमं भुवि ।

दत्तमिष्टमधीतं च मया पुरुषसत्तम ॥ १३ ॥

' पुरुषोत्तम! तुम मेरे परम प्रिय अभीष्ट संतानके रूपमें प्राप्त हुए जिसकी इस भूमण्डलमें कहीं उपमा नहीं है, मैंने दान, यज्ञ और स्वाध्याय भी कर लिये ॥ १३ ॥

अनुभूतानि चेष्टानि मया वीर सुखान्यपि ।

देवर्षिपितृविप्राणामनृणोऽस्मि तथाऽऽत्मनः ॥ १४ ॥

' वीर! मैंने अभीष्ट सुखोंका भी अनुभव कर लिया । मैं देवता, ऋषि, पितर और ब्राह्मणोंके तथा अपने ऋणसे भी उऋण हो गया ॥ १४ ॥

न किंचिन्मम कर्तव्यं तवान्यत्राभिषेचनात् ।

अतो यत्त्वामहं ब्रूयां तन्मे त्वं कर्तुमर्हसि ॥ १५ ॥

' अब तुम्हें युवराज - पदपर अभिषिक्त करनेके । सिवा और कोई कर्तव्य मेरे लिये शेष नहीं रह गया है, अतः मैं तुमसे जो कुछ कहूँ, मेरी उस आज्ञाका तुम्हें पालन करना चाहिये ॥ १५ ॥

अद्य प्रकृतयः सर्वास्त्वामिच्छन्ति नराधिपम् ।

अतस्त्वां युवराजानमभिषेक्ष्यामि पुत्रक ॥ १६ ॥

' बेटा! अब सारी प्रजा तुम्हें अपना राजा बनाना चाहती है, अतः मैं तुम्हें युवराजपदपर अभिषिक्त करूँगा ॥ १६ ॥

अपि चाद्याशुभान् राम स्वजान् पश्यामि राघव ।

सनिर्घाता दिवोल्काश्च पतन्ति हि महास्वनाः ॥ १७ ॥

' रघुकुलनन्दन श्रीराम! आजकल मुझे बड़े बुरे सपने दिखायी देते हैं । दिनमें वज्रपातके साथ - साथ बड़ा भयंकर शब्द करनेवाली उल्काएँ भी गिर रही हैं ॥ १७ ॥

। अवष्टब्धं च मे राम नक्षत्रं दारुणग्रहैः ।

आवेदयन्ति दैवज्ञाः सूर्याङ्गारकराहुभिः ॥ १८ ॥

' श्रीराम! ज्योतिषियोंका कहना है कि मेरे जन्म-नक्षत्रको सूर्य, मङ्गल और राहु नामक भयंकर ग्रहोंने आक्रान्त कर लिया है ॥ १८ ॥

प्रायेण च निमित्तानामीदृशानां समुद्भवे ।

राजा हि मृत्युमाप्नोति घोरां चापदमृच्छति ॥ १ ९ ॥

' ऐसे अशुभ लक्षणोंका प्राकट्य होनेपर प्रायः राजा घोर आपत्तिमें पड़ जाता है और अन्ततोगत्वा उसकी मृत्यु भी हो जाती है ॥१ ९ ॥

तद् यावदेव मे चेतो न विमुह्यति राघव ।

तावदेवाभिषिञ्चस्व चला हि प्राणिनां मतिः ॥ २० ॥

' अतः रघुनन्दन! जबतक मेरे चित्तमें मोह नहीं छा जाता, तबतक ही तुम युवराज - पदपर अपना अभिषेक करा लो; क्योंकि प्राणियोंकी बुद्धि चञ्चल होती है ॥

अद्य चन्द्रोऽभ्युपगमत् पुष्यात् पूर्वं पुनर्वसुम् ।

श्वः पुष्ययोगं नियतं वक्ष्यन्ते दैवचिन्तकाः ॥२१ ॥

' आज चन्द्रमा पुष्यसे एक नक्षत्र पहले पुनर्वसुपर विराजमान हैं, अतः निश्चय ही कल वे पुष्य नक्षत्रपर रहेंगे - ऐसा ज्योतिषी कहते हैं ॥ २१ ॥

तत्र पुष्येऽभिषिञ्चस्व मनस्त्वरयतीव माम् ।

श्वस्त्वाहमभिषेक्ष्यामि यौवराज्ये परंतप ॥ २२ ॥

' इसलिये उस पुष्यनक्षत्रमें ही तुम अपना अभिषेक करा लो । शत्रुओंको संताप देनेवाले वीर! मेरा मन इस कार्यमें बहुत शीघ्रता करनेको कहता है । इस कारण कल अवश्य ही मैं तुम्हारा युवराजपदपर अभिषेक कर दूँगा ॥ २२ ॥

तस्मात् त्वयाद्यप्रभृति निशेयं नियतात्मना ।

सह वध्वोपवस्तव्या दर्भप्रस्तरशायिना ॥ २३ ॥

' अतः तुम इस समयसे लेकर सारी रात इन्द्रियसंयमपूर्वक रहते हुए वधू सीताके साथ उपवास करो और कुशकी शय्यापर सोओ ॥ २३ ॥

सुहृदश्चाप्रमत्तास्त्वां रक्षन्त्वद्य समन्ततः ।

भवन्ति बहुविघ्नानि कार्याण्येवंविधानि हि ॥ २४ ॥

' आज तुम्हारे सुहृद् सावधान रहकर सब ओरसे तुम्हारी रक्षा करें; क्योंकि इस प्रकारके शुभ कार्योंमें बहुत - से विघ्न आनेकी सम्भावना रहती है ॥ २४ ॥

विप्रोषितश्च भरतो यावदेव पुरादितः ।

तावदेवाभिषेकस्ते प्राप्तकालो मतो मम ॥ २५ ॥

" जबतक भरत इस नगरसे बाहर अपने मामा

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अयोध्याकाण्डे

यहाँ निवास करते हैं, तबतक ही तुम्हारा अभिषेक हो ।

जाना मुझे उचित प्रतीत होता है ॥ २५ ॥

कामं खलु सतां वृत्ते भ्राता ते भरतः स्थितः ।

ज्येष्ठानुवर्ती धर्मात्मा सानुक्रोशो जितेन्द्रियः ॥ २६ ॥

किं नु चित्तं मनुष्याणामनित्यमिति मे मतम् ।

सतां च धर्मनित्यानां कृतशोभि च राघव ॥ २७ ॥

' इसमें संदेह नहीं कि तुम्हारे भाई भरत सत्पुरुषोंके आचार - व्यवहारमें स्थित हैं, अपने बड़े भाईका अनुसरण करनेवाले, धर्मात्मा, दयालु और जितेन्द्रिय हैं तथापि मनुष्योंका चित्त प्रायः स्थिर नहीं रहता - ऐसा मेरा मत है । रघुनन्दन! धर्मपरायण सत्पुरुषोंका मन भी विभिन्न कारणोंसे राग - द्वेषादिसे संयुक्त हो जाता है ' ॥ २६-२७ ॥

इत्युक्तः सोऽभ्यनुज्ञातः श्वोभाविन्यभिषेचने ।

व्रजेति रामः पितरमभिवाद्याभ्ययाद् गृहम् ॥ २८ ॥

राजाके इस प्रकार कहने और कल होनेवाले राज्याभिषेकके निमित्त व्रतपालनके लिये जानेकी आज्ञा देनेपर श्रीरामचन्द्रजी पिताको प्रणाम करके अपने महलमें गये ॥२८ ॥

प्रविश्य चात्मनो वेश्म राज्ञाऽऽदिष्टेऽभिषेचने ।

तत्क्षणादेव निष्क्रम्य मातुरन्तः पुरं ययौ ॥ २ ९ ॥

राजाने राज्याभिषेकके लिये व्रतपालनके निमित्त जो आज्ञा दी थी, उसे सीताको बतानेके लिये अपने महलके भीतर प्रवेश करके जब श्रीरामने वहाँ सीताको नहीं देखा, तब वे तत्काल ही वहाँसे निकलकर माताके अन्तः पुरमें चले गये ॥ २ ९ ॥

तत्र तां प्रवणामेव मातरं क्षौमवासिनीम् ।

वाग्यतां देवतागारे ददर्शायाचतीं श्रियम् ॥ ३० ॥

वहाँ जाकर उन्होंने देखा माता कौसल्या रेशमी वस्त्र पहने मौन हो देवमन्दिरमें बैठकर देवताकी आराधनामें लगी हैं और पुत्रके लिये राजलक्ष्मीकी याचना कर रही हैं ॥ ३० ॥

प्रागेव चागता तत्र सुमित्रा लक्ष्मणस्तथा ।

सीता चानयिता श्रुत्वा प्रियं रामाभिषेचनम् ॥ ३१ ॥

श्रीरामके राज्याभिषेकका प्रिय समाचार सुनकर सुमित्रा और लक्ष्मण वहाँ पहलेसे ही आ गये थे तथा बादमें सीता वहीं बुला ली गयी थीं ॥ ३१ ॥

तस्मिन् कालेऽपि कौसल्या तस्थावामीलितेक्षणा ।

सुमित्रयान्वास्यमाना सीतया लक्ष्मणेन च ॥ ३२ ॥

श्रीरामचन्द्रजी जब वहाँ पहुँचे, उस समय भी कौसल्या नेत्र बंद किये ध्यान लगाये बैठी थीं और चतुर्थः सर्गः २३५ सुमित्रा, सीता तथा लक्ष्मण उनकी सेवामें खड़े थे ॥ ३२ ॥

श्रुत्वा पुष्ये च पुत्रस्य यौवराज्येऽभिषेचनम् ।

प्राणायामेन पुरुषं ध्यायमाना जनार्दनम् ॥ ३३ ॥

पुष्यनक्षत्रके योगमें पुत्रके युवराजपदपर अभिषिक्त होनेकी बात सुनकर वे उसकी मङ्गलकामनासे प्राणायामके द्वारा परमपुरुष नारायणका ध्यान कर रही थीं ॥ ३३ ॥

तथा सनियमामेव सोऽभिगम्याभिवाद्य च ।

उवाच वचनं रामो हर्षयंस्तामिदं वरम् ॥ ३४ ॥

इस प्रकार नियममें लगी हुई माताके निकट उसी अवस्थामें जाकर श्रीरामने उनको प्रणाम किया और उन्हें हर्ष प्रदान करते हुए यह श्रेष्ठ बात कही - ॥३४ ॥

अम्ब पित्रा नियुक्तोऽस्मि प्रजापालनकर्मणि ।

भविता श्वोऽभिषेको मे यथा मे शासनं पितुः ॥ ३५ ॥

सीतयाप्युपवस्तव्या रजनीयं मया सह ।

एवमुक्तमुपाध्यायैः स हि मामुक्तवान् पिता ॥ ३६ ॥

' माँ! पिताजीने मुझे प्रजापालनके कर्ममें नियुक्त किया है । कल मेरा अभिषेक होगा । जैसा कि मेरे लिये पिताजीका आदेश है, उसके अनुसार सीताको भी मेरे साथ इस रातमें उपवास करना होगा । उपाध्यायोंने ऐसी ही बात बतायी थी, जिसे पिताजीने मुझसे कहा है ॥

यानि यान्यत्र योग्यानि श्वोभाविन्यभिषेचने ।

तानि मे मङ्गलान्यद्य वैदेह्याश्चैव कारय ॥३७ ॥

4 ' अतः कल होनेवाले अभिषेकके निमित्तसे आज मेरे और सीताके लिये जो - जो मङ्गलकार्य आवश्यक हों, वे सब कराओ ' ॥ ३७ ॥

एतच्छ्रुत्वा तु कौसल्या चिरकालाभिकांक्षितम् ।

हर्षबाष्पाकुलं वाक्यमिदं राममभाषत ॥ ३८ ॥

चिरकालसे माताके हृदयमें जिस बातकी अभिलाषा थी, उसकी पूर्तिको सूचित करनेवाली यह बात सुनकर माता कौसल्याने आनन्दके आँसू बहाते हुए गद्गद कण्ठसे इस प्रकार कहा- ॥ ३८ ॥

वत्स राम चिरं जीव हतास्ते परिपन्थिनः ।

ज्ञातीन् मे त्वं श्रिया युक्तः सुमित्रायाश्च नन्दय ॥ ३ ९ ॥

‘ बेटा श्रीराम! चिरञ्जीवी होओ । तुम्हारे मार्गमें विघ्न डालनेवाले शत्रु नष्ट हो जायँ । तुम राजलक्ष्मीसे युक्त होकर मेरे और सुमित्राके बन्धु - बान्धवोंको आनन्दित करो ॥

कल्याणे बत नक्षत्रे मया जातोऽसि पुत्रक ।

येन त्वया दशरथो गुणैराराधितः पिता ॥ ४० ॥

' बेटा! तुम मेरे द्वारा किसी मङ्गलमय नक्षत्रमें उत्पन्न हुए थे, जिससे तुमने अपने गुणद्वारा पिता

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२३६ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे दशरथको प्रसन्न कर लिया ॥ ४० ॥

अमोघं बत मे क्षान्तं पुरुषे पुष्करेक्षणे ।

येयमिक्ष्वाकुराजश्रीः पुत्र त्वां संश्रयिष्यति ॥ ४१ ॥

' बड़े हर्षकी बात है कि मैंने कमलनयन भगवान् विष्णुकी प्रसन्नताके लिये जो व्रत - उपवास आदि किया था, वह आज सफल हो गया । बेटा! उसीके फलसे यह ' इक्ष्वाकुकुलकी राजलक्ष्मी तुम्हें प्राप्त होनेवाली है ' ॥ ४१ ॥

इत्येवमुक्तो मात्रा तु रामो भ्रातरमब्रवीत् ।

प्राञ्जलिं प्रह्वमासीनमभिवीक्ष्य स्मयन्निव ॥ ४२ ॥

माताके ऐसा कहनेपर श्रीरामने विनीतभावसे हाथ जोड़कर खड़े हुए अपने भाई लक्ष्मणकी ओर देखकर मुसकराते हुए - से कहा— ॥ ४२ ॥

लक्ष्मणेमां मया सार्धं प्रशाधि त्वं वसुंधराम् ।

द्वितीयं मेऽन्तरात्मानं त्वामियं श्रीरुपस्थिता ॥ ४३ ॥ ।

' लक्ष्मण! तुम मेरे साथ इस पृथ्वीके राज्यका

शासन ( पालन ) करो । तुम मेरे द्वितीय अन्तरात्मा हो ।

यह राजलक्ष्मी तुम्हींको प्राप्त हो रही है ॥ ४३ ॥

सौमित्रे भुङ्क्ष्व भोगांस्त्वमिष्टान् राज्यफलानि च ।

जीवितं चापि राज्यं च त्वदर्थमभिकामये ॥ ४४ ॥

' सुमित्रानन्दन! तुम अभीष्ट भोगों और राज्यके श्रेष्ठ फलोंका उपभोग करो । तुम्हारे लिये ही मैं इस जीवन तथा राज्यकी अभिलाषा करता हूँ ' ॥ ४४ ॥

इत्युक्त्वा लक्ष्मणं रामो मातरावभिवाद्य च ।

अभ्यनुज्ञाप्य सीतां च ययौ स्वं च निवेशनम् ॥ ४५ ॥

लक्ष्मणसे ऐसा कहकर श्रीरामने दोनों माताओंको प्रणाम किया और सीताको भी साथ | चलनेकी आज्ञा दिलाकर वे उनको लिये हुए अपने महलमें चले गये ॥ ४५ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे चतुर्थः सर्गः ॥ ४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें चौथा सर्ग पूरा हुआ ॥ ४ ॥

पञ्चमः सर्गः राजा दशरथके अनुरोधसे वसिष्ठजीका सीतासहित श्रीरामको उपवासव्रतकी दीक्षा देकर आना और राजाको इस समाचारसे अवगत कराना; राजाका अन्तःपुरमें प्रवेश

संदिश्य रामं नृपतिः श्वोभाविन्यभिषेचने ।

पुरोहितं समाहूय वसिष्ठमिदमब्रवीत् ॥ १ ॥

उधर महाराज दशरथ जब श्रीरामचन्द्रजीको दूसरे दिन होनेवाले अभिषेकके विषयमें आवश्यक संदेश दे चुके, तब अपने पुरोहित वसिष्ठजीको बुलाकर बोले - ॥ १ ॥

गच्छोपवासं काकुत्स्थं कारयाद्य तपोधन ।

श्रेयसे राज्यलाभाय वध्वा सह यतव्रत ॥ २ ॥

' नियमपूर्वक व्रतका पालन करनेवाले तपोधन! आप जाइये और विघ्ननिवारणरूप कल्याणकी सिद्धि तथा राज्यकी प्राप्तिके लिये बहूसहित श्रीरामसे उपवासव्रतका पालन कराइये ' ॥ २ ॥

तथेति च स राजानमुक्त्वा वेदविदां वरः ।

स्वयं वसिष्ठो भगवान् ययौ रामनिवेशनम् ॥ ३ ॥

उपवासयितुं वीरं मन्त्रविन्मन्त्रकोविदम् ।

ब्राह्मं रथवरं युक्तमास्थाय सुधृतव्रतः ॥ ४ ॥

तब राजासे ' तथास्तु ' कहकर वेदवेत्ता विद्वानोंमें श्रेष्ठ तथा उत्तम व्रतधारी स्वयं भगवान् वसिष्ठ मन्त्रवेत्ता वीर श्रीरामको उपवास- व्रतकी दीक्षा देनेके । लिये ब्राह्मणके चढ़नेयोग्य जुते - जुताये श्रेष्ठ रथपर आरूढ़ हो श्रीरामके महलकी ओर चल दिये ॥ ३-४ ॥

स रामभवनं प्राप्य पाण्डुराभ्रघनप्रभम् ।

तिस्त्रः कक्ष्या रथेनैव विवेश मुनिसत्तमः ॥ ५ ॥

श्रीरामका भवन श्वेत बादलोंके समान उज्ज्वल था, उसके पास पहुँचकर मुनिवर वसिष्ठने उसकी तीन ड्योढ़ियोंमें रथके द्वारा ही प्रवेश किया ॥ ५ ॥

तमागतमृषिं रामस्त्वन्निव ससम्भ्रमम् ।

मानयिष्यन् स मानार्हं निश्चक्राम निवेशनात् ॥ ६ ॥

वहाँ पधारे हुए उन सम्माननीय महर्षिका सम्मान करनेके लिये श्रीरामचन्द्रजी बड़ी उतावलीके साथ वेगपूर्वक घरसे बाहर निकले ॥ ६ ॥

अभ्येत्य त्वरमाणोऽथ रथाभ्याशं मनीषिणः ।

ततोऽवतारयामास परिगृह्य रथात् स्वयम् ॥ ७ ॥

उन मनीषी महर्षिके रथके समीप शीघ्रतापूर्वक जाकर श्रीरामने स्वयं उनका हाथ ह पकड़कर उन्हें रथसे नीचे उतारा ॥ ७ ॥

स चैनं प्रश्रितं दृष्ट्वा सम्भाष्याभिप्रसाद्य च ।

प्रियार्हं हर्षयन् राममित्युवाच पुरोहितः ॥ ८ ॥

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अयोध्याकाण्डे श्रीराम प्रिय वचन सुननेके योग्य थे । उन्हें इतना । विनीत देखकर पुरोहितजीने ' वत्स! ' कहकर पुकारा और उन्हें प्रसन्न करके उनका हर्ष बढ़ाते हुए इस प्रकार कहा- ॥ ८ ॥

प्रसन्नस्ते पिता राम यत्त्वं राज्यमवाप्स्यसि ।

उपवासं भवानद्य करोतु सह सीतया ॥ ९ ॥

' श्रीराम! तुम्हारे पिता तुमपर बहुत प्रसन्न हैं, क्योंकि तुम्हें उनसे राज्य प्राप्त होगा; अतः आजकी रातमें तुम वधू सीताके साथ उपवास करो॥९॥

प्रातस्त्वामभिषेक्ता हि यौवराज्ये नराधिपः ।

पिता दशरथः प्रीत्या ययातिं नहुषो यथा ॥ १० ॥

‘ रघुनन्दन! जैसे नहुषने ययातिका अभिषेक किया था, उसी प्रकार तुम्हारे पिता महाराज दशरथ कल प्रात: काल बड़े प्रेमसे तुम्हारा युवराज - पदपर अभिषेक करेंगे ' ॥ १० ॥

इत्युक्त्वा स तदा राममुपवासं यतव्रतः ।

मन्त्रवत् कारयामास वैदेह्या सहितं शुचिः ॥ ११ ॥

ऐसा कहकर उन व्रतधारी एवं पवित्र महर्षिने मन्त्रोच्चारणपूर्वक सीतासहित श्रीरामको उस समय उपवास - व्रतकी दीक्षा दी ॥ ११ ॥

ततो यथावद् रामेण स राज्ञो गुरुरर्चितः ।

अभ्यनुज्ञाप्य काकुत्स्थं ययौ रामनिवेशनात् ॥ १२ ॥

तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजीने महाराजके भी गुरु वसिष्ठका यथावत् पूजन किया; फिर वे मुनि श्रीरामकी अनुमति ले उनके महलसे बाहर निकले ॥१२ ॥

सुहृद्भिस्तत्र रामोऽपि सहासीनः प्रियंवदैः ।

सभाजितो विवेशाथ ताननुज्ञाप्य सर्वशः ॥ १३ ॥

श्रीराम भी वहाँ प्रियवचन बोलनेवाले सुहृदोंके साथ कुछ देरतक बैठे रहे; फिर उनसे सम्मानित हो उन सबकी अनुमति ले पुनः अपने महलके भीतर चले गये ॥ १३ ॥

हृष्टनारीनरयुतं रामवेश्म तदा बभौ ।

यथा मत्तद्विजगणं प्रफुल्लनलिनं सरः ॥ १४ ॥

उस समय श्रीरामका भवन हर्षोत्फुल्ल नर-नारियोंसे भरा हुआ था और मतवाले पक्षियोंके कलरवोंसे युक्त खिले हुए कमलवाले तालाबके समान शोभा पा रहा था ॥ १४ ॥

स राजभवनप्रख्यात् तस्माद् रामनिवेशनात् ।

निर्गत्य ददृशे मार्गं वसिष्ठो जनसंवृतम् ॥ १५ ॥

राजभवनोंमें श्रेष्ठ श्रीरामके महलसे बाहर आकर पञ्चमः सर्गः २३७ वसिष्ठजीने सारे मार्ग मनुष्योंकी भीड़से भरे हुए देखे ॥ १५ ॥

वृन्दवृन्दैरयोध्यायां राजमार्गाः समन्ततः ।

बभूवुरभिसम्बाधाः कुतूहलजनैर्वृताः ॥ १६ ॥

अयोध्याकी सड़कोंपर सब ओर झुंड के झुंड मनुष्य, जो श्रीरामका राज्याभिषेक देखनेके लिये उत्सुक थे, खचाखच भरे हुए थे; सारे राजमार्ग उनसे घिरे हुए थे । जनवृन्दोर्मिसंघर्षहर्षस्वनवृतस्तदा बभूव राजमार्गस्य सागरस्येव निःस्वनः ॥ १७ ॥

जनसमुदायरूपी लहरोंके परस्पर टकरानेसे उस समय जो हर्षध्वनि प्रकट होती थी, उससे व्याप्त हुआ राजमार्गका कोलाहल समुद्रकी गर्जनाकी भाँति सुनायी देता था ॥ १७ ॥

सिक्तसम्मृष्टरथ्या हि तथा च वनमालिनी ।

आसीदयोध्या तदहः समुच्छ्रितगृहध्वजा ॥ १८ ॥

उस दिन वन और उपवनोंकी पंक्तियोंसे सुशोभित हुई अयोध्यापुरीके घर - घरमें ऊँची - ऊँची ध्वजाएँ फहरा रही थीं; वहाँकी सभी गलियों और सड़कोंको झाड़-बुहारकर वहाँ छिड़काव किया गया था ॥ १८ ॥

तदा ह्ययोध्यानिलयः सस्त्रीबालाकुलो जनः ।

रामाभिषेकमाकांक्षन्नाकांक्षन्नुदयं रवेः ॥ १ ९ ॥

स्त्रियों और बालकोंसहित अयोध्यावासी जनसमुदाय श्रीरामके राज्याभिषेकको देखनेकी इच्छासे उस समय शीघ्र सूर्योदय होनेकी कामना कर रहा था ॥१ ९ ॥

प्रालंकारभूतं च जनस्यानन्दवर्धनम् ।

उत्सुकोऽभूज्जनो द्रष्टुं तमयोध्यामहोत्सवम् ॥ २० ॥

अयोध्याका वह महान् उत्सव प्रजाओंके लिये अलंकाररूप और सब लोगोंके आनन्दको बढ़ानेवाला था; वहाँके सभी मनुष्य उसे देखनेके लिये उत्कण्ठित हो रहे थे ॥ २० ॥

एवं तज्जनसम्बाधं राजमार्गं पुरोहितः ।

व्यूहन्निव जनौघं तं शनै राजकुलं ययौ ॥ २१ ॥

इस प्रकार मनुष्योंकी भीड़से भरे हुए राजमार्गपर पहुँचकर पुरोहितजी उस जनसमूहको एक ओर करते हुए - से धीरे - धीरे राजमहलकी ओर गये ॥ २१ ॥

सिताभ्रशिखरप्रख्यं प्रासादमधिरुह्य च ।

समीयाय नरेन्द्रेण शक्रेणेव बृहस्पतिः ॥ २२ ॥

श्वेत जलद - खण्डके समान सुशोभित होनेवाले महलके ऊपर चढ़कर वसिष्ठजी राजा दशरथसे उसी प्रकार । मिले, जैसे बृहस्पति देवराज इन्द्रसे मिल रहे हों ॥ २२ ॥

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२३८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामाय

तमागतमभिप्रेक्ष्य हित्वा राजासनं नृपः ।

पप्रच्छ स्वमतं तस्मै कृतमित्यभिवेदयत् ॥ २३ ॥

उन्हें आया देख राजा सिंहासन छोड़कर खड़े हो गये और पूछने लगे- ' मुने! क्या आपने मेरा अभिप्राय सिद्ध किया । ' वसिष्ठजीने उत्तर दिया-' हाँ! कर दिया ' ॥ २३ ॥

तेन चैव तदा तुल्यं सहासीनाः सभासदः ।

आसनेभ्यः समुत्तस्थुः पूजयन्तः पुरोहितम् ॥ २४ ॥

उनके साथ ही उस समय वहाँ बैठे हुए अन्य सभासद् भी पुरोहितका समादर करते हुए अपने - अपने आसनोंसे उठकर खड़े हो गये ॥ २४ ॥

गुरुणा त्वभ्यनुज्ञातो मनुजौघं विसृज्य तम् ।

विवेशान्तःपुरं राजा सिंहो गिरिगुहामिव ॥ २५ ॥

तदनन्तर गुरुजीकी आज्ञा ले राजा दशरथने उस जनसमुदायको विदा करके पर्वतकी कन्दरा में घुसनेवाले सिंहके समान अपने अन्तः पुरमें प्रवेश किया ॥ २५ ॥

तदग्र्यवेषप्रमदाजनाकुलं महेन्द्रवेश्मप्रतिमं निवेशनम् । व्यदीपयंश्चारु विवेश पार्थिवः शशीव तारागणसंकुलं नभः ॥ २६ ॥

सुन्दर वेश - भूषा धारण करनेवाली सुन्दरियोंसे भरे हुए इन्द्रसदनके समान उस मनोहर राजभवनको अपनी शोभासे प्रकाशित करते हुए राजा दशरथने उसके भीतर उसी प्रकार प्रवेश किया, जैसे चन्द्रमा ताराओंसे । भरे हुए आकाशमें पदार्पण करते हैं ॥ २६ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे पञ्चमः सर्गः ॥ ५ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें पाँचवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५ ॥

षष्ठः सर्गः सीतासहित श्रीरामका नियमपरायण होना, हर्षमें भरे पुरवासियोंद्वारा नगरकी सजावट, राजाके प्रति कृतज्ञता प्रकट करना तथा अयोध्यापुरीमें जनपदवासी मनुष्योंकी भीड़का एकत्र होना

गते पुरोहिते रामः स्नातो नियतमानसः ।

सह पल्या विशालाक्ष्या नारायणमुपागमत् ॥ १ ॥

पुरोहितजीके चले जानेपर मनको संयममें रखनेवाले श्रीरामने स्नान करके अपनी विशाललोचना पत्नीके साथ श्रीनारायणकी * उपासना आरम्भ की ॥ १ ॥

प्रगृह्य शिरसा पात्रीं हविषो विधिवत् ततः ।

महते दैवतायाज्यं जुहाव ज्वलितानले ॥ २ ॥

उन्होंने हविष्य - पात्रको सिर झुकाकर नमस्कार किया और प्रज्वलित अग्निमें महान् देवता ( शेषशायी नारायण ) की प्रसन्नताके लिये विधिपूर्वक उस हविष्यकी आहुति दी ॥ २ ॥

शेषं च हविषस्तस्य प्राश्याशास्यात्मनः प्रियम् ।

ध्यायन्नारायणं देवं स्वास्तीर्णे कुशसंस्तरे ॥ ३ ॥

वाग्यतः सह वैदेह्या भूत्वा नियतमानसः ।

श्रीमत्यायतने विष्णोः शिश्ये नरवरात्मजः ॥ ४ ॥ ।

तत्पश्चात् अपने प्रिय मनोरथकी सिद्धिका संकल्प लेकर उन्होंने उस यज्ञशेष हविष्यका भक्षण किया और मनको संयममें रखकर मौन हो वे राजकुमार श्रीराम विदेहनन्दिनी सीताके साथ भगवान् विष्णुके सुन्दर मन्दिरमें श्रीनारायण देवका ध्यान करते हुए वहाँ अच्छी तरह बिछी हुई कुशकी चटाईपर सोये ॥ ३-४ ॥

एकयामावशिष्टायां रात्र्यां प्रतिविबुध्य सः ।

अलंकारविधिं सम्यक् कारयामास वेश्मनः ॥ ५ ॥

जब तीन पहर बीतकर एक ही पहर रात शेष रह गयी, तब वे शयनसे उठ बैठे । उस समय उन्होंने सभामण्डपको सजानेके लिये सेवकोंको आज्ञा दी ॥ ५ ॥

तत्र शृण्वन् सुखा वाचः सूतमागधवन्दिनाम् ।

पूर्वां संध्यामुपासीनो जजाप सुसमाहितः ॥ ६ ॥

वहाँ सूत, मागध और बंदियोंकी श्रवणसुखद * * ऐसा माना जाता है कि यहाँ नारायण शब्दसे श्रीरङ्गनाथजीकी वह अर्चा - मूर्ति अभिप्रेत है; जो कि पूर्वजोंके समयसे ही दीर्घकालतक अयोध्यामें उपास्य देवताके रूपमें रही । बादमें श्रीरामजीने वह मूर्ति विभीषणको दे दी थी, जिससे वह वर्तमान श्रीरंगक्षेत्रमें पहुँची । इसकी विस्तृत कथा पद्मपुराणमें है ।