वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ — पृष्ठ 301–310

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 301–310

पृष्ठ 301

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अयोध्याकाण्डे विंशः सर्गः २८ ९

खिचड़ी, समिधा और भरे हुए कलश - ये सब वहाँ ।

दृष्टिगोचर हुए ॥ १७-१८ ॥

तां शुक्लक्षौमसंवीतां व्रतयोगेन कर्शिताम् ।

तर्पयन्तीं ददर्शाद्भिर्देवतां वरवर्णिनीम् ॥ १ ९ ॥

उत्तम कान्तिवाली माता कौसल्या सफेद रंगकी रेशमी साड़ी पहने हुए थीं । वे व्रतके अनुष्ठानसे दुर्बल हो गयी थीं और इष्टदेवताका तर्पण कर रही थीं । इस अवस्थामें श्रीरामने उन्हें देखा ॥ १ ९ ॥

सा चिरस्यात्मजं दृष्ट्वा मातृनन्दनमागतम् ।

अभिचक्राम संहृष्टा किशोरं वडवा यथा ॥ २० ॥

माताका आनन्द बढ़ानेवाले प्रिय पुत्रको बहुत देरके बाद सामने उपस्थित देख कौसल्यादेवी बड़े हर्षमें भरकर उसकी ओर चलीं, मानो कोई घोड़ी अपने बछेड़ेको देखकर बड़े हर्षसे उसके पास आयी हो ॥ २० ॥

स मातरमुपक्रान्तामुपसंगृह्य राघवः ।

परिष्वक्तश्च बाहुभ्यामवघ्घ्रातश्च मूर्धनि ॥ २१ ॥

श्रीरघुनाथजीने निकट आयी हुई माताके चरणोंमें प्रणाम किया और माता कौसल्याने उन्हें दोनों भुजाओंसे कसकर छातीसे लगा लिया तथा बड़े प्यारसे उनका मस्तक सूँघा ॥२१ ॥

तमुवाच दुराधर्षं राघवं सुतमात्मनः ।

कौसल्या पुत्रवात्सल्यादिदं प्रियहितं वचः ॥ २२ ॥

उस समय कौसल्यादेवीने अपने दुर्जय पुत्र श्रीरामचन्द्रजीसे पुत्रस्नेहवश यह प्रिय एवं हितकर बात कही- ॥ २२ ॥

वृद्धानां धर्मशीलानां राजर्षीणां महात्मनाम् ।

प्राप्नुह्यायुश्च कीर्ति च धर्मं चाप्युचितं कुले ॥ २३ ॥

' बेटा! तुम धर्मशील, वृद्ध एवं महात्मा राजर्षियोंके समान आयु, कीर्ति और कुलोचित धर्म प्राप्त करो ॥ २३ ॥

सत्यप्रतिज्ञं पितरं राजानं पश्य राघव ।

अद्यैव त्वां स धर्मात्मा यौवराज्येऽभिषेक्ष्यति ॥ २४ ॥

' रघुनन्दन! अब तुम जाकर अपने सत्यप्रतिज्ञ पिता राजाका दर्शन करो । वे धर्मात्मा नरेश आज ही तुम्हारा युवराजके पदपर अभिषेक करेंगे ' ॥ २४ ॥

दत्तमासनमालभ्य भोजनेन निमन्त्रितः ।

मातरं राघवः किंचित् प्रसार्याञ्जलिमब्रवीत् ॥ २५ ॥

यह कहकर माताने उन्हें बैठनेके लिये आसन दिया और भोजन करनेको कहा । भोजनके लिये निमन्त्रित होकर श्रीरामने उस आसनका स्पर्शमात्र कर लिया । फिर वे अञ्जलि फैलाकर मातासे कुछ कहनेको उद्यत हुए ॥

स स्वभावविनीतश्च गौरवाच्च तथानतः ।

प्रस्थितो दण्डकारण्यमाप्रष्टुमुपचक्रमे ॥ २६ ॥

वे स्वभावसे ही विनयशील थे तथा माताके गौरवसे भी उनके सामने नतमस्तक हो गये थे । उन्हें दण्डकारण्यको प्रस्थान करना था, अतः वे उसके लिये आज्ञा लेनेका उपक्रम करने लगे ॥ २६ ॥

देवि नूनं न जानीषे महद् भयमुपस्थितम् ।

इदं तव च दुःखाय वैदेह्या लक्ष्मणस्य च ॥ २७ ॥

उन्होंने कहा — ' देवि! निश्चय ही तुम्हें मालूम नहीं है, तुम्हारे ऊपर महान् भय उपस्थित हो गया है । इस समय मैं जो बात कहने जा रहा हूँ, उसे सुनकर तुमको, सीताको और लक्ष्मणको भी दुःख होगा; तथापि कहूँगा ॥

गमिष्ये दण्डकारण्यं किमनेनासनेन मे ।

विष्टरासनयोग्यो हि कालोऽयं मामुपस्थितः ॥ २८ ॥

' अब तो मैं दण्डकारण्यमें जाऊँगा, अतः ऐसे बहुमूल्य आसनकी मुझे क्या आवश्यकता है? अब मेरे लिये यह कुशकी चटाईपर बैठनेका समय आया है ॥

चतुर्दश हि वर्षाणि वत्स्यामि विजने वने ।

कन्दमूलफलैर्जीवन् हित्वा मुनिवदामिषम् ॥ २ ९ ॥

‘ मैं राजभोग्य वस्तुका त्याग करके मुनिकी भाँति कन्द, मूल और फलोंसे जीवन - निर्वाह करता हुआ चौदह वर्षोंतक निर्जन वनमें निवास करूँगा ॥ २ ९ ॥

भरताय महाराजो यौवराज्यं प्रयच्छति ।

मां पुनर्दण्डकारण्यं विवासयति तापसम् ॥ ३० ॥

' महाराज युवराजका पद भरतको दे रहे हैं और मुझे तपस्वी बनाकर दण्डकारण्यमें भेज रहे हैं ॥ ३० ॥

स षट् चाष्टौ च वर्षाणि वत्स्यामि विजने वने ।

आसेवमानो वन्यानि फलमूलैश्च वर्तयन् ॥ ३१ ॥

' अतः चौदह वर्षोंतक निर्जन वनमें रहूँगा और | जंगलमें सुलभ होनेवाले वल्कल आदिको धारण करके फल -I - मूलके आहारसे ही जीवन - निर्वाह करता रहूँगा ' ॥

सा निकृत्तेव सालस्य यष्टिः परशुना वने ।

पपात सहसा देवी देवतेव दिवश्च्युता ॥ ३२ ॥

यह अप्रिय बात सुनकर वनमें फरसेसे काटी हुई शालवृक्षकी शाखाके समान कौसल्या देवी सहसा पृथ्वीपर गिर पड़ीं, मानो स्वर्गसे कोई देवाङ्गना भूतलपर आ गिरी हो ॥ ३२ ॥

तामदुःखोचितां दृष्ट्वा पतितां कदलीमिव ।

रामस्तूत्थापयामास मातरं गतचेतसम् ॥ ३३ ॥

जिन्होंने जीवनमें कभी दुःख नहीं देखा था - जो 75 Srimad Valmiki Ramayan ( 1 ) Section_11_1_Front

पृष्ठ 302

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२ ९ ० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे दुःख भोगने के योग्य थीं ही नहीं, उन्हीं माता कौसल्याको । कटी हुई कदलीकी भाँति अचेत अवस्थामें भूमिपर पड़ी देख श्रीरामने हाथका सहारा देकर उठाया ॥ ३३ ॥

उपावृत्योत्थितां दीनां वडवामिव वाहिताम् ।

पांसुगुण्ठितसर्वाङ्गीं विममर्श च पाणिना ॥ ३४ ॥

जैसे कोई घोड़ी पहले बड़ा भारी बोझ ढो चुकी हो और थकावट दूर करनेके लिये धरतीपर लोट-पोटकर उठी हो, उसी तरह उठी हुई कौसल्याजीके समस्त अङ्गोंमें धूल लिपट गयी थी और वे अत्यन्त दीन दशाको पहुँच गयी थीं । उस अवस्थामें श्रीरामने अपने हाथसे उनके अङ्गोंकी धूल पोंछी ॥ ३४ ॥

सा राघवमुपासीनमसुखार्ता सुखोचिता ।

उवाच पुरुषव्याघ्रमुपशृण्वति लक्ष्मणे ॥ ३५ ॥

कौसल्याजीने जीवनमें पहले सदा सुख ही देखा था और उसीके योग्य थीं, परंतु उस समय वे दुःखसे कातर हो उठी थीं । उन्होंने लक्ष्मणके सुनते हुए अपने पास बैठे पुरुषसिंह श्रीरामसे इस प्रकार कहा- ॥ ३५ ॥

यदि पुत्र न जायेथा मम शोकाय राघव ।

न स्म दुःखमतो भूयः पश्येयमहमप्रजाः ॥ ३६ ॥

' बेटा रघुनन्दन । यदि तुम्हारा जन्म न हुआ होता तो मुझे इस एक ही बातका शोक रहता । आज जो मुझपर इतना भारी दुःख आ पड़ा है, इसे वन्ध्या होनेपर मुझे नहीं देखना पड़ता ॥ ३६ ॥

एक एव हि वन्ध्यायाः शोको भवति मानसः ।

अप्रजास्मीति संतापो न ह्यन्यः पुत्र विद्यते ॥ ३७ ॥

' बेटा! वन्ध्याको एक मानसिक शोक होता है । उसके मनमें यह संताप बना रहता है कि मुझे कोई संतान नहीं है, इसके सिवा दूसरा कोई दुःख उसे नहीं होता ॥

न दृष्टपूर्वं कल्याणं सुखं वा पतिपौरुषे ।

अपि पुत्रे विपश्येयमिति रामास्थितं मया ॥ ३८ ॥

' बेटा राम! पतिके प्रभुत्वकालमें एक ज्येष्ठ पत्नीको जो कल्याण या सुख प्राप्त होना चाहिये, वह मुझे पहले कभी नहीं देखनेको मिला । सोचती थी, पुत्रके राज्यमें मैं सब सुख देख लूँगी और इसी आशासे मैं अबतक जीती रही ॥ ३८ ॥

सा बहून्यमनोज्ञानि वाक्यानि हृदयच्छिदाम् ।

अहं श्रोष्ये सपत्नीनामवराणां परा सती ॥ ३ ९ ॥

‘ बड़ी रानी होकर भी मुझे अपनी बातोंसे हृदयको विदीर्ण कर देनेवाली छोटी सौतोंके बहुत - से अप्रिय वचन सुनने पड़ेंगे ॥ ३ ९ ॥

अतो दुःखतरं किं नु प्रमदानां भविष्यति ।

मम शोको विलापश्च यादृशोऽयमनन्तकः ॥४० ॥

' स्त्रियोंके लिये इससे बढ़कर महान् दुःख और क्या होगा; अतः मेरा शोक और विलाप जैसा है, उसका कभी अन्त नहीं है ॥ ४० ॥

त्वयि संनिहितेऽप्येवमहमासं निराकृता ।

किं पुनः प्रोषिते तात ध्रुवं मरणमेव हि ॥ ४१ ॥

' तात! तुम्हारे निकट रहनेपर भी मैं इस प्रकार सौतोंसे तिरस्कृत रही हूँ, फिर तुम्हारे परदेश चले जानेपर मेरी क्या दशा होगी? उस दशामें तो मेरा मरण ही निश्चित है ॥४१ ॥

अत्यन्तं निगृहीतास्मि भर्तुर्नित्यमसम्मता ।

परिवारेण कैकेय्याः समा वाप्यथवावरा ॥ ४२ ॥

' पतिकी ओरसे मुझे सदा अत्यन्त तिरस्कार अथवा कड़ी फटकार ही मिली है, कभी प्यार और सम्मान नहीं प्राप्त हुआ है । मैं कैकेयीकी दासियोंके बराबर अथवा उनसे भी गयी - बीती समझी जाती हूँ ॥

यो हि मां सेवते कश्चिदपि वाप्यनुवर्तते ।

कैकेय्याः पुत्रमन्वीक्ष्य स जनो नाभिभाषते ॥ ४३ ॥

' जो कोई मेरी सेवामें रहता या मेरा अनुसरण करता है, वह भी कैकेयीके बेटेको देखकर चुप हो जाता है, मुझसे बात नहीं करता है ॥ ४३ ॥

नित्यक्रोधतया तस्याः कथं नु खरवादि तत् ।

कैकेय्या वदनं द्रष्टुं पुत्र शक्ष्यामि दुर्गता ॥ ४४ ॥

' बेटा! इस दुर्गतिमें पड़कर मैं सदा क्रोधी स्वभावके कारण कटुवचन बोलनेवाले उस कैकेयीके मुखको कैसे देख सकूँगी ॥ ४४ ॥

दश सप्त च वर्षाणि जातस्य तव राघव ।

अतीतानि प्रकांक्षन्त्या मया दुःखपरिक्षयम् ॥ ४५ ॥

' रघुनन्दन! तुम्हारे उपनयनरूप द्वितीय जन्म लिये सत्रह वर्ष बीत गये ( अर्थात् तुम अब सत्ताईस वर्षके हो गये ) । अबतक मैं यही आशा लगाये चली आ रही थी कि अब मेरा दुःख दूर हो जायगा ॥ ४५ ॥

तदक्षयं महद्दुःखं नोत्सहे सहितुं चिरात् ।

विप्रकारं सपत्नीनामेवं जीर्णापि राघव ॥ ४६ ॥

' राघव! अब इस बुढ़ापेमें इस तरह सौतोंका तिरस्कार और उससे होनेवाले महान् अक्षय दुःखको मैं अधिक कालतक नहीं सह सकती ॥ ४६ ॥

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पृष्ठ 303

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अयोध्याकाण्डे विंशः सर्गः २ ९ १

अपश्यन्ती तव मुखं परिपूर्णशशिप्रभम् ।

कृपणा वर्तयिष्यामि कथं कृपणजीविका ॥४७ ॥

' पूर्ण चन्द्रमाके समान तुम्हारे मनोहर मुखको देखे बिना मैं दुःखिनी दयनीय जीवनवृत्तिसे रहकर कैसे निर्वाह करूँगी ॥ ४७ ॥

उपवासैश्च योगैश्च बहुभिश्च परिश्रमैः ।

दुःखसंवर्धितो मोघं त्वं हि दुर्गतया मया ॥ ४८ ॥

' बेटा! ( यदि तुझे इस देशसे निकल ही जाना है तो ) मुझ भाग्यहीनाने बारंबार उपवास, देवताओंका ध्यान तथा बहुत - से परिश्रमजनक उपाय करके व्यर्थ ही तुम्हारा इतने कष्टसे पालन - पोषण किया है ॥ ४८ ॥

स्थिरं नु हृदयं मन्ये ममेदं यन्न दीर्यते ।

प्रावृषीव महानद्याः स्पृष्टं कूलं नवाम्भसा ॥ ४ ९ ॥

' मैं समझती हूँ कि निश्चय ही यह मेरा हृदय बड़ा कठोर है, जो तुम्हारे बिछोहकी बात सुनकर भी वर्षाकालके नूतन जलके प्रवाहसे टकराये हुए महानदीके कगारकी भाँति फट नहीं जाता है ॥ ४ ९ ॥ ममैव नूनं मरणं न विद्यते न चावकाशोऽस्ति यमक्षये मम । यदन्तकोऽद्यैव न मां जिहीर्षति प्रसह्य सिंहो रुदतीं मृगीमिव ॥ ५० ॥

निश्चय ही मेरे लिये कहीं मौत नहीं है, यमराजके घरमें भी मेरे लिये जगह नहीं है, तभी तो जैसे किसी रोती हुई मृगीको सिंह जबरदस्ती उठा ले जाता है, उसी प्रकार यमराज मुझे आज ही उठा ले जाना नहीं चाहता है ॥ ५० ॥

स्थिरं हि नूनं हृदयं ममायसं न भिद्यते यद् भुवि नो विदीर्यते । अनेन दुःखेन च देहमर्पितं ध्रुवं काले मरणं न विद्यते ॥ ५१ ॥

' अवश्य ही मेरा कठोर हृदय लोहेका बना हुआ है, जो पृथिवीपर पड़नेपर भी न तो फटता है और न टूक - टूक हो जाता है । इसी दुःखसे व्याप्त हुए इस शरीरके भी टुकड़े - टुकड़े नहीं हो जाते हैं । निश्चय ही, मृत्युकाल आये बिना किसीका मरण नहीं होता है ॥ इदं तु दुःखं यदनर्थकानि मे व्रतानि दानानि च संयमाश्च हि । तपश्च तप्तं यदपत्यकाम्यया सुनिष्फलं बीजमिवोप्तमूषरे ॥ ५२ ॥

‘ सबसे अधिक दुःखकी बात तो यह है कि पुत्रके सुखके लिये मेरे द्वारा किये गये व्रत, दान और संयम सब व्यर्थ हो गये । मैंने संतानकी हित - कामनासे जो तप किया है, वह भी ऊसरमें बोये हुए बीजकी भाँति निष्फल हो गया ॥५२ ॥

यदि ह्यकाले मरणं यदृच्छया लभेत कश्चिद् गुरुदुःखकर्शितः । गताहमद्यैव परेतसंसदं विना त्वया धेनुरिवात्मजेन वै ॥ ५३ ॥

' यदि कोई मनुष्य भारी दुःखसे पीड़ित हो असमयमें भी अपनी इच्छाके अनुसार मृत्यु पा सके तो मैं तुम्हारे बिना अपने बछड़ेसे बिछुड़ी हुई गायकी भाँति आज ही यमराजकी सभामें चली जाऊँ ॥ ५३ ॥

अथापि किं जीवितमद्य मे वृथा त्वया विना चन्द्रनिभाननप्रभ । अनुवजिष्यामि वनं त्वयैव गौः सुदुर्बला वत्समिवाभिकांक्षया ॥ ५४ ॥

‘ चन्द्रमाके समान मनोहर मुख - कान्तिवाले श्रीराम! यदि मेरी मृत्यु नहीं होती है तो तुम्हारे बिना यहाँ व्यर्थ कुत्सित जीवन क्यों बिताऊँ? बेटा! जैसे गौ दुर्बल होनेपर भी अपने बछड़े लोभसे उसके पीछे - पीछे चली जाती है, उसी प्रकार मैं भी तुम्हारे साथ ही वनको चली चलूँगी ' ॥ भृशमसुखममर्षिता तदा बहु विललाप समीक्ष्य राघवम् । व्यसनमुपनिशाम्य सा महत् सुतमिव बद्धमवेक्ष्य किंनरी ॥ ५५ ॥

आनेवाले भारी दुःखको सहनेमें असमर्थ हो महान् संकटका विचार करके सत्यके ध्यानमें बँधे हुए अपने पुत्र श्रीरघुनाथजीकी ओर देखकर माता कौसल्या उस समय बहुत विलाप करने लगीं, मानो कोई किन्नरी अपने । पुत्रको बन्धनमें पड़ा हुआ देखकर बिलख रही हो ॥ ५५ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे विंशः सर्गः ॥ २० ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें बीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ २० ॥

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पृष्ठ 304

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२ ९ २ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे एकविंशः सर्गः लक्ष्मणका रोष, उनका श्रीरामको बलपूर्वक राज्यपर अधिकार कर लेनेके लिये प्रेरित करना तथा श्रीरामका पिताकी आज्ञाके पालनको ही धर्म बताकर माता और लक्ष्मणको समझाना

तथा तु विलपन्तीं तां कौसल्यां राममातरम् ।

उवाच लक्ष्मणो दीनस्तत्कालसदृशं वचः ॥ १ ॥

इस प्रकार विलाप करती हुई श्रीराममाता कौसल्यासे अत्यन्त दुःखी हुए लक्ष्मणने उस समयके योग्य बात कही— ॥ १ ॥

न रोचते ममाप्येतदार्ये यद् राघवो वनम् ।

त्यक्त्वा राज्यश्रियं गच्छेत् स्त्रिया वाक्यवशंगतः ॥ २ ॥

विपरीतश्च वृद्धश्च विषयैश्च प्रधर्षितः ।

नृपः किमिव न ब्रूयाच्चोद्यमानः समन्मथः ॥ ३ ॥

' बड़ी माँ! मुझे भी यह अच्छा नहीं लगता कि श्रीराम राज्यलक्ष्मीका परित्याग करके वनमें जायँ । महाराज तो इस समय स्त्रीकी बातमें आ गये हैं, इसलिये उनकी प्रकृति विपरीत हो गयी है । एक तो वे बूढ़े हैं, दूसरे विषयोंने उन्हें वशमें कर लिया है; अतः कामदेवके वशीभूत हुए वे नरेश कैकेयी - जैसी स्त्रीकी प्रेरणासे क्या नहीं कह सकते हैं? ॥ २-३ ॥

नास्यापराधं पश्यामि नापि दोषं तथाविधम् ।

येन निर्वास्यते राष्ट्राद् वनवासाय राघवः ॥ ४ ॥

' मैं श्रीरघुनाथजीका ऐसा कोई अपराध या दोष नहीं देखता, जिससे इन्हें राज्यसे निकाला जाय और वनमें रहनेके लिये विवश किया जाय ॥४ ॥

न तं पश्याम्यहं लोके परोक्षमपि यो नरः ।

स्वमित्रोऽपि निरस्तोऽपि योऽस्य दोषमुदाहरेत् ॥ ५ ॥

' मैं संसारमें एक मनुष्यको भी ऐसा नहीं देखता, जो अत्यन्त शत्रु एवं तिरस्कृत होनेपर भी परोक्षमें भी इनका कोई दोष बता सके ॥ ५ ॥

देवकल्पमृजुं दान्तं रिपूणामपि वत्सलम् ।

अवेक्षमाणः को धर्मं त्यजेत् पुत्रमकारणात् ॥ ६ ॥

' धर्मपर दृष्टि रखनेवाला कौन ऐसा राजा होगा, जो देवताके समान शुद्ध, सरल, जितेन्द्रिय और शत्रुओंपर भी स्नेह रखनेवाले ( श्रीराम - जैसे ) पुत्रका अकारण परित्याग करेगा? ॥ ६ ॥

तदिदं वचनं राज्ञः पुनर्बाल्यमुपेयुषः ।

पुत्रः को हृदये कुर्याद् राजवृत्तमनुस्मरन् ॥ ७ ॥

' जो पुनः बालभाव ( विवेकशून्यता ) को प्राप्त हो गये हैं, ऐसे राजाके इस वचनको राजनीतिका ध्यान रखनेवाला कौन पुत्र अपने हृदयमें स्थान दे सकता है? ॥

यावदेव न जानाति कश्चिदर्थमिमं नरः ।

तावदेव मया सार्धमात्मस्थं कुरु शासनम् ॥ ८ ॥

' रघुनन्दन! जबतक कोई भी मनुष्य आपके वनवासकी बातको नहीं जानता है, तबतक ही, आप मेरी सहायतासे इस राज्यके शासनकी बागडोर अपने हाथमें ले लीजिये ॥ ८ ॥

मया पार्श्वे सधनुषा तव गुप्तस्य राघव ।

कः समर्थोऽधिकं कर्तुं कृतान्तस्येव तिष्ठतः॥९ ॥

' रघुवीर! जब मैं धनुष लिये आपके पास रहकर आपकी रक्षा करता रहूँ और आप कालके समान युद्धके लिये डट जायँ, उस समय आपसे अधिक पौरुष प्रकट करनेमें कौन समर्थ हो सकता है? ॥ ९ ॥

निर्मनुष्यामिमां सर्वामयोध्यां मनुजर्षभ ।

करिष्यामि शरैस्तीक्ष्णैर्यदि स्थास्यति विप्रिये ॥ १० ॥

' नरश्रेष्ठ! यदि नगरके लोग विरोधमें खड़े होंगे तो मैं अपने तीखे बाणोंसे सारी अयोध्याको मनुष्योंसे सूनी कर दूँगा ॥ १० ॥

भरतस्याथ पक्ष्यो वा यो वास्य हितमिच्छति ।

सर्वांस्तांश्च वधिष्यामि मृदुर्हि परिभूयते ॥ ११ ॥

' जो - जो भरतका पक्ष लेगा अथवा केवल जो उन्हींका हित चाहेगा, उन सबका मैं वध कर डालूँगा; क्योंकि जो कोमल या नम्र होता है, उसका सभी तिरस्कार करते हैं ॥ ११ ॥

प्रोत्साहितोऽयं कैकेय्या संतुष्टो यदि नः पिता ।

अमित्रभूतो निःसङ्गं वध्यतां वध्यतामपि ॥१२ ॥

' यदि कैकेयीके प्रोत्साहन देनेपर उसके ऊपर संतुष्ट हो पिताजी हमारे शत्रु बन रहे हैं तो हमें भी मोह-ममता छोड़कर इन्हें कैद कर लेना या मार डालना चाहिये ॥ १२ ॥

गुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानतः ।

उत्पथं प्रतिपन्नस्य कार्यं भवति शासनम् ॥ १३ ॥

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पृष्ठ 305

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अयोध्याकाण्डे ‘ क्योंकि यदि गुरु भी घमंडमें आकर कर्तव्याकर्तव्यका । ज्ञान खो बैठे और कुमार्गपर चलने लगे तो उसे भी दण्ड देना आवश्यक हो जाता है ॥ १३ ॥

बलमेष किमाश्रित्य हेतुं वा पुरुषोत्तम ।

दातुमिच्छति कैकेय्यै उपस्थितमिदं तव ॥ १४ ॥

' पुरुषोत्तम! राजा किस बलका सहारा लेकर अथवा किस कारणको सामने रखकर आपको न्यायतः प्राप्त हुआ यह राज्य अब कैकेयीको देना चाहते हैं? ।

त्वया चैव मया चैव कृत्वा वैरमनुत्तमम् ।

कास्य शक्तिः श्रियं दातुं भरतायारिशासन ॥ १५ ॥

‘ शत्रुदमन श्रीराम! आपके और मेरे साथ भारी वैर बाँधकर इनकी क्या शक्ति है कि यह राज्यलक्ष्मी ये भरतको दे दें? ॥ १५ ॥

अनुरक्तोऽस्मि भावेन भ्रातरं देवि तत्त्वतः ।

सत्येन धनुषा चैव दत्तेनेष्टेन ते शपे ॥ १६ ॥

' देवि! ( बड़ी माँ! ) मैं सत्य, धनुष, दान तथा यज्ञ आदिकी शपथ खाकर तुमसे सच्ची बात कहता हूँ कि मेरा अपने पूज्य भ्राता श्रीराममें हार्दिक अनुराग है ॥ १६ ॥

दीप्तमग्निमरण्यं वा यदि रामः प्रवेक्ष्यति ।

प्रविष्टं तत्र मां देवि त्वं पूर्वमवधारय ॥ १७ ॥

‘ देवि! आप विश्वास रखें, यदि श्रीराम जलती हुई आगमें या घोर वनमें प्रवेश करनेवाले होंगे तो मैं इनसे भी पहले उसमें प्रविष्ट हो जाऊँगा ॥ १७ ॥

हरामि वीर्याद् दुःखं ते तमः सूर्य इवोदितः ।

देवी पश्यतु मे वीर्यं राघवश्चैव पश्यतु ॥ १८ ॥

' इस समय आप, रघुनाथजी तथा अन्य सब लोग भी मेरे पराक्रमको देखें । जैसे सूर्य उदित होकर अन्धकारका नाश कर देता है, उसी प्रकार मैं भी अपनी शक्तिसे आपके सब दुःख दूर कर दूँगा ॥१८ ॥

हनिष्ये पितरं वृद्धं कैकेय्यासक्तमानसम् ।

कृपणं च स्थितं बाल्ये वृद्धभावेन गर्हितम् ॥ १ ९ ॥

' जो कैकेयीमें आसक्तचित्त होकर दीन बन गये हैं, बालभाव ( अविवेक ) में स्थित हैं और अधिक बुढ़ापेके कारण निन्दित हो रहे हैं, उन वृद्ध पिताको मैं अवश्य मार डालूँगा ' ॥ १ ९ ॥

एतत् तु वचनं श्रुत्वा लक्ष्मणस्य महात्मनः ।

उवाच रामं कौसल्या रुदती शोकलालसा ॥ २० ॥

महामनस्वी लक्ष्मणके ये ओजस्वी वचन सुनकर शोकमग्न कौसल्या श्रीरामसे रोती हुई बोलीं- ॥ २० ॥

एकविंशः सर्गः २ ९ ३

भ्रातुस्ते वदतः पुत्र लक्ष्मणस्य श्रुतं त्वया ।

यदत्रानन्तरं तत्त्वं कुरुष्व यदि रोचते ॥ २१ ॥

' बेटा! तुमने अपने भाई लक्ष्मणकी कही हुई सारी बातें सुन लीं, यदि जँचे तो अब इसके बाद तुम जो कुछ करना उचित समझो, उसे करो ॥ २१ ॥

न चाधर्म्यं वचः श्रुत्वा सपल्या मम भाषितम् ।

विहाय शोकसंतप्तां गन्तुमर्हसि मामितः ॥ २२ ॥

' मेरी सौतकी कही हुई अधर्मयुक्त बात सुनकर मुझ शोकसे संतप्त हुई माताको छोड़कर तुम्हें यहाँसे नहीं जाना चाहिये ॥ २२ ॥

धर्मज्ञ इति धर्मिष्ठ धर्मं चरितुमिच्छसि ।

शुश्रूष मामिहस्थस्त्वं चर धर्ममनुत्तमम् ॥ २३ ॥

4 ' धर्मिष्ठ! तुम धर्मको जाननेवाले हो, इसलिये यदि धर्मका पालन करना चाहो तो यहीं रहकर मेरी सेवा करो और इस प्रकार परम उत्तम धर्मका आचरण करो ॥

शुश्रूषुर्जननीं पुत्र स्वगृहे नियतो वसन् ।

परेण तपसा युक्तः काश्यपस्त्रिदिवं गतः ॥ २४ ॥

' वत्स! अपने घरमें नियमपूर्वक रहकर माताकी सेवा करनेवाले काश्यप उत्तम तपस्यासे युक्त हो स्वर्गलोकमें चले गये थे ॥ २४ ॥

यथैव राजा पूज्यस्ते गौरवेण तथा ह्यहम् ।

त्वां साहं नानुजानामि न गन्तव्यमितो वनम् ॥ २५ ॥

' जैसे गौरवके कारण राजा तुम्हारे पूज्य हैं, उसी प्रकार मैं भी हूँ । मैं तुम्हें वन जानेकी आज्ञा नहीं देती, अतः तुम्हें यहाँसे वनको नहीं जाना चाहिये ॥ २५ ॥

त्वद्वियोगान्न मे कार्यं जीवितेन सुखेन च ।

त्वया सह मम श्रेयस्तृणानामपि भक्षणम् ॥ २६ ॥

' तुम्हारे साथ तिनके चबाकर रहना भी मेरे लिये श्रेयस्कर है, परंतु तुमसे विलग हो जानेपर न मुझे इस जीवनसे कोई प्रयोजन है और न सुखसे ॥ २६ ॥

यदि त्वं यास्यसि वनं त्यक्त्वा मां शोकलालसाम् ।

अहं प्रायमिहासिष्ये न च शक्ष्यामि जीवितुम् ॥ २७ ॥

' यदि तुम मुझे शोकमें डूबी हुई छोड़कर वनको चले जाओगे तो मैं उपवास करके प्राण त्याग दूँगी, जीवित नहीं रह सकूँगी ॥ २७ ॥

ततस्त्वं प्राप्स्यसे पुत्र निरयं लोकविश्रुतम् ।

ब्रह्महत्यामिवाधर्मात् समुद्रः सरितां पतिः ॥ २८ ॥

' बेटा! ऐसा होनेपर तुम संसारप्रसिद्ध वह नरक– तुल्य कष्ट पाओगे, जो ब्रह्महत्याके समान है और जिसे

पृष्ठ 306

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२ ९ ४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे

सरिताओंके स्वामी समुद्रने अपने अधर्मके फलरूपसे ।

प्राप्त किया था ' * ॥ २८ ॥

विलपन्तीं तथा दीनां कौसल्यां जननीं ततः ।

उवाच रामो धर्मात्मा वचनं धर्मसंहितम् ॥ २ ९ ॥

माता कौसल्याको इस प्रकार दीन होकर विलाप करती देख धर्मात्मा श्रीरामचन्द्रने यह धर्मयुक्त वचन कहा- ॥ २ ९ ॥

नास्ति शक्तिः पितुर्वाक्यं समतिक्रमितुं मम ।

प्रसादये त्वां शिरसा गन्तुमिच्छाम्यहं वनम् ॥ ३० ॥

' माता! मैं तुम्हारे चरणोंमें सिर झुकाकर तुम्हें प्रसन्न करना चाहता हूँ । मुझमें पिताजीकी आज्ञाका उल्लङ्घन करनेकी शक्ति नहीं है, अतः मैं वनको ही जाना चाहता हूँ ॥३० ॥

ऋषिणा च पितुर्वाक्यं कुर्वता वनचारिणा ।

गौर्हता जानताधर्मं कण्डुना च विपश्चिता ॥ ३१ ॥

' वनवासी विद्वान् कण्डु मुनिने पिताकी आज्ञाका पालन करनेके लिये अधर्म समझते हुए भी गौका वध कर डाला था ॥ ३१ ॥

अस्माकं तु कुले पूर्वं सगरस्याज्ञया पितुः ।

खनद्भिः सागरैर्भूमिमवाप्तः सुमहान् वधः ॥ ३२ ॥

' हमारे कुलमें भी पहले राजा सगरके पुत्र ऐसे हो गये हैं, जो पिताकी आज्ञासे पृथ्वी खोदते हुए बुरी तरहसे मारे गये ॥ ३२ ॥

जामदग्न्येन रामेण रेणुका जननी स्वयम् ।

कृत्ता परशुनारण्ये पितुर्वचनकारणात् ॥ ३३ ॥

' जमदग्निके पुत्र परशुरामने पिताकी आज्ञाका पालन करनेके लिये ही वनमें फरसेसे अपनी माता रेणुकाका गला काट डाला था ॥ ३३ ॥

एतैरन्यैश्च बहुभिर्देवि देवसमैः कृतम् ।

पितुर्वचनमक्लीबं करिष्यामि पितुर्हितम् ॥ ३४ ॥

' देवि! इन्होंने तथा और भी बहुत - से देवतुल्य मनुष्योंने उत्साहके साथ पिताके आदेशका पालन किया है । अतः मैं भी कायरता छोड़कर पिताका हित - साधन करूँगा ॥ ३४ ॥

न खल्वेतन्मयैकेन क्रियते पितृशासनम् ।

एतैरपि कृतं देवि ये मया परिकीर्तिताः ॥ ३५ ॥

‘ देवि! केवल मैं ही इस प्रकार पिताके आदेशका पालन नहीं कर रहा हूँ । जिनकी मैंने अभी चर्चा की है, उन सबने भी पिताके आदेशका पालन किया है ॥

नाहं धर्ममपूर्वं ते प्रतिकूलं प्रवर्तये ।

पूर्वैरयमभिप्रेतो गतो मार्गोऽनुगम्यते ॥ ३६ ॥

' मा! मैं तुम्हारे प्रतिकूल किसी नवीन धर्म प्रचार नहीं कर रहा हूँ । पूर्वकालके धर्मात्मा पुरुषोंको भी यह अभीष्ट था । मैं तो उनके चले हुए मार्गका ही अनुसरण करता हूँ ॥ ३६ ॥

तदेतत् तु मया कार्यं पितुर्हि वचनं कुर्वन् ' इस भूमण्डलपर वही मैं भी करने जा करनेयोग्य काम नहीं पालन करनेवाला कोई तामेवमुक्त्वा जननीं

क्रियते भुवि नान्यथा ।

न कश्चिन्नाम हीयते ॥ ३७ ॥

जो सबके लिये करनेयोग्य है, रहा हूँ । इसके विपरीत कोई न कर रहा हूँ । पिताकी आज्ञाका भी पुरुष धर्मसे भ्रष्ट नहीं होता ' ॥

लक्ष्मणं पुनरब्रवीत् ।

वाक्यं वाक्यविदां श्रेष्ठः श्रेष्ठः सर्वधनुष्मताम् ॥ ३८ ॥

अपनी मातासे ऐसा कहकर वाक्यवेत्ताओंमें श्रेष्ठ समस्त धनुर्धरशिरोमणि श्रीरामने पुनः लक्ष्मणसे कहा- ॥ ३८ ॥

तव लक्ष्मण जानामि मयि स्नेहमनुत्तमम् ।

विक्रमं चैव सत्त्वं च तेजश्च सुदुरासदम् ॥ ३ ९ ॥

' लक्ष्मण! मेरे प्रति तुम्हारा जो परम उत्तम स्नेह है, उसे मैं जानता हूँ । तुम्हारे पराक्रम, धैर्य और दुर्धर्ष तेजका भी मुझे ज्ञान है ॥३ ९ ॥

मम मातुर्महद् दुःखमतुलं शुभलक्षण ।

अभिप्रायं न विज्ञाय सत्यस्य च शमस्य च ॥४० ॥

' शुभलक्षण लक्ष्मण! मेरी माताको जो अनुपम एवं महान् दुःख हो रहा है, वह सत्य और शमके विषयमें मेरे अभिप्रायको न समझनेके कारण है ॥ ४० ॥

धर्मो हि परमो लोके धर्मे सत्यं प्रतिष्ठितम् ।

धर्मसंश्रितमप्येतत् पितुर्वचनमुत्तमम् ॥ ४१ ॥

' संसारमें धर्म ही सबसे श्रेष्ठ है । धर्ममें ही सत्यकी प्रतिष्ठा है । पिताजीका यह वचन भी धर्म आश्रित होनेके कारण परम उत्तम है ॥ ४१ ॥

संश्रुत्य च पितुर्वाक्यं मातुर्वा ब्राह्मणस्य वा ।

न कर्तव्यं वृथा वीर धर्ममाश्रित्य तिष्ठता ॥ ४२ ॥

' वीर! धर्मका आश्रय लेकर रहनेवाले पुरुषको पिता, माता अथवा ब्राह्मणके वचनोंका पालन करनेकी प्रतिज्ञा करके उसे मिथ्या नहीं करना चाहिये ॥ ४२ ॥

* किसी कल्पमें समुद्रने अपनी माताको दुःख दिया था, उससे पिप्पलाद नामक ब्रह्मर्षिने उस अधर्मका दण्ड देनेके लिये उसके ऊपर एक कृत्याका प्रयोग किया । इससे समुद्रको नरकवासतुल्य महान् दुःख भोगना पड़ा था ।

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अयोध्याकाण्डे

सोऽहं न शक्ष्यामि पुनर्नियोगमतिवर्तितुम् ।

पितुर्हि वचनाद् वीर कैकेय्याहं प्रचोदितः ॥ ४३ ॥

' वीर! अतः मैं पिताजीकी आज्ञाका उल्लङ्घन नहीं कर सकता; क्योंकि पिताजीके कहनेसे ही कैकेयीने मुझे वनमें जानेकी आज्ञा दी है ॥ ४३ ॥

तदेतां विसृजानार्यां क्षत्रधर्माश्रितां मतिम् ।

धर्ममाश्रय मा तैक्ष्ण्यं मद्बुद्धिरनुगम्यताम् ॥ ४४ ॥

‘ इसलिये केवल क्षात्रधर्मका अवलम्बन करनेवाली इस ओछी बुद्धिका त्याग करो, धर्मका आश्रय लो, कठोरता छोड़ो और मेरे विचारके अनुसार चलो ' ॥ ४४ ॥

तमेवमुक्त्वा सौहार्दाद् भ्रातरं लक्ष्मणाग्रजः ।

उवाच भूयः कौसल्यां प्राञ्जलिः शिरसा नतः ॥ ४५ ॥

अपने भाई लक्ष्मणसे सौहार्दवश ऐसी बात कहकर उनके बड़े भ्राता श्रीरामने पुनः कौसल्याके चरणोंमें मस्तक झुकाया और हाथ जोड़कर कहा- ॥ ४५ ॥

अनुमन्यस्व मां देवि गमिष्यन्तमितो वनम् ।

शापितासि मम प्राणैः कुरु स्वस्त्ययनानि मे ॥ ४६ ॥

‘ देवि! मैं यहाँसे वनको जाऊँगा । तुम मुझे आज्ञा दो और स्वस्तिवाचन कराओ । यह बात मैं अपने प्राणोंकी शपथ दिलाकर कहता हूँ ॥ ४६ ॥

तीर्णप्रतिज्ञश्च वनात् पुनरेष्याम्यहं पुरीम् ।

ययातिरिव राजर्षिः पुरा हित्वा पुनर्दिवम् ॥ ४७ ॥

' जैसे पूर्वकालमें राजर्षि ययाति स्वर्गलोकका त्याग करके पुनः भूतलपर उतर आये थे, उसी प्रकार मैं भी प्रतिज्ञा पूर्ण करके पुनः वनसे अयोध्यापुरीको लौट आऊँगा ॥ ४७ ॥

शोकः संधार्यतां मातर्हृदये साधु मा शुचः ।

वनवासादिहैष्यामि पुनः कृत्वा पितुर्वचः ॥ ४८ ॥

' मा! शोकको अपने हृदयमें ही अच्छी तरह दबाये रखो । शोक न करो । पिताकी आज्ञाका पालन करके मैं फिर वनवाससे यहाँ लौट आऊँगा ॥ ४८ ॥

त्वया मया च वैदेह्या लक्ष्मणेन सुमित्रया ।

पितुर्नियोगे स्थातव्यमेष धर्मः सनातनः ॥ ४ ९ ॥

' तुमको, मुझको, सीताको, लक्ष्मणको और माता सुमित्राको भी पिताजीकी आज्ञामें ही रहना चाहिये । यही सनातन धर्म है ॥ ४ ९ ॥

अम्ब सम्भृत्य सम्भारान् दुःखं हृदि निगृह्य च ।

वनवासकृता बुद्धिर्मम धर्म्यानुवर्त्यताम् ॥ ५० ॥

' मा! यह अभिषेककी सामग्री ले जाकर रख दो । अपने मनका दुःख मनमें ही दबा लो और वनवासके एकविंशः सर्गः २ ९ ५ सम्बन्धमें जो मेरा धर्मानुकूल विचार है, उसका अनुसरण करो - मुझे जानेकी आज्ञा दो ' ॥५० ॥

एतद् वचस्तस्य निशम्य माता सुधर्म्यमव्यग्रमविक्लवं च । मृ संज्ञां प्रतिलभ्य देवी समीक्ष्य रामं पुनरित्युवाच ॥ ५१ ॥

श्रीरामचन्द्रजीकी यह धर्मानुकूल तथा व्यग्रता और आकुलतासे रहित बात सुनकर जैसे मरे हुए मनुष्यमें प्राण आ जाय, उसी प्रकार देवी कौसल्या मूर्च्छा त्यागकर होशमें आ गयीं तथा अपने पुत्र श्रीराम की ओर देखकर इस प्रकार कहने लगीं - ॥ ५१ ॥

यथैव ते पुत्र पिता तथाहं गुरुः स्वधर्मेण सुहृत्तया च । न त्वानुजानामि न मां विहाय सुदुःखितामर्हसि पुत्र गन्तुम् ॥ ५२ ॥

' बेटा! धर्म और सौहार्दके नाते जैसे पिता तुम्हारे लिये आदरणीय गुरुजन हैं, वैसी ही मैं भी हूँ । मैं तुम्हें वनमें जानेकी आज्ञा नहीं देती । वत्स! मुझ दुःखियाको छोड़कर तुम्हें कहीं नहीं जाना चाहिये ॥ ५२ ॥

किं जीवितेनेह विना त्वया मे लोकेन वा किं स्वधयामृतेन । श्रेो मुहूर्तं तव संनिधानं ममैव कृत्स्नादपि जीवलोकात् ॥ ५३ ॥

' तुम्हारे बिना मुझे यहाँ इस जीवनसे क्या लाभ है? इन स्वजनोंसे, देवता तथा पितरोंकी पूजासे और अमृतसे भी क्या लेना है? तुम दो घड़ी भी मेरे पास रहो तो वही मेरे लिये सम्पूर्ण संसारके राज्यसे भी बढ़कर सुख देनेवाला है ' ॥ ५३ ॥

नरैरिवोल्काभिरपोद्यमानो महागजो ध्वान्तमभिप्रविष्टः । भूयः प्रजज्वाल विलापमेवं निशम्य रामः करुणं जनन्याः ॥ ५४ ॥

जैसे कोई विशाल गजराज किसी अन्धकूपमें पड़ जाय और लोग उसे जलते लुआठोंसे मार - मारकर पीड़ित करने लगें, उस दशामें वह क्रोधसे जल उठे; उसी प्रकार श्रीराम भी माताका बारंबार करुण - विलाप सुनकर ( इसे स्वधर्मपालनमें बाधा मानकर ) आवेशमें भर गये । ( वनमें जानेका ही दृढ़ निश्चय कर लिया ) ॥५४ ॥

स मातरं चैव विसंज्ञकल्पा-मार्तं च सौमित्रिमभिप्रतप्तम् ।

पृष्ठ 308

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२ ९ ६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे धर्मे स्थितो धर्म्यमुवाच वाक्यं यथा स एवार्हति तत्र वक्तुम् ॥५५ ॥

उन्होंने धर्ममें ही दृढ़तापूर्वक स्थित रहकर अचेत-सी हो रही मातासे और आर्त एवं संतप्त हुए सुमित्राकुमार लक्ष्मणसे भी ऐसी धर्मानुकूल बात कही, जैसी उस अवसरपर वे ही कह सकते थे ॥ ५५ ॥

अहं हि ते लक्ष्मण नित्यमेव जानामि भक्तिं च पराक्रमं च । मम त्वभिप्रायमसंनिरीक्ष्य मात्रा सहाभ्यर्दसि मा सुदुःखम् ॥ ५६ ॥

' लक्ष्मण! मैं जानता हूँ, तुम सदा ही मुझमें भक्ति रखते हो और तुम्हारा पराक्रम कितना महान् है, यह भी मुझसे छिपा नहीं है; तथापि तुम मेरे अभिप्रायकी ओर ध्यान न देकर माताजीके साथ स्वयं भी मुझे पीड़ा दे रहे हो । इस तरह मुझे अत्यन्त दुःखमें न डालो ॥ ५६ ॥

धर्मार्थकामाः खलु जीवलोके समीक्षिता धर्मफलोदयेषु । ये तत्र सर्वे स्युरसंशयं मे भार्येव वश्याभिमता सपुत्रा ॥ ५७ ॥

' इस जीवजगत्में पूर्वकृत धर्मके फलकी प्राप्तिके अवसरोंपर जो धर्म, अर्थ और काम तीनों देखे गये हैं, वे सब - के- 5- सब जहाँ धर्म है, वहाँ अवश्य प्राप्त होते हैं - इसमें संशय नहीं है; ठीक उसी तरह जैसे भार्या धर्म, अर्थ और काम तीनोंकी साधन होती है । वह पतिके वशीभूत या अनुकूल रहकर अतिथि सत्कार आदि धर्मके पालनमें सहायक होती है । प्रेयसीरूपसे कामका साधन बनती है और पुत्रवती होकर उत्तम लोककी प्राप्तिरूप अर्थकी साधिका होती है ॥ ५७ ॥

यस्मिंस्तु सर्वे स्युरसंनिविष्टा धर्मो यतः स्यात् तदुपक्रमेत । द्वेष्यो भवत्यर्थपरो हि लोके कामात्मता खल्वपि न प्रशस्ता ॥ ५८ ॥

‘ जिस कर्ममें धर्म आदि सब पुरुषार्थोंका समावेश न हो, उसको नहीं करना चाहिये । जिससे धर्मकी सिद्धि होती हो, उसीका आरम्भ करना चाहिये । जो केवल अर्थपरायण होता है, वह लोकमें सबके द्वेषका पात्र बन जाता है तथा धर्मविरुद्ध काममें अत्यन्त आसक्त होना प्रशंसा नहीं, निन्दाकी बात है ॥ ५८ ॥

गुरुश्च राजा च पिता च वृद्धः क्रोधात् प्रहर्षादथवापि कामात् । यद् व्यादिशेत् कार्यमवेक्ष्य धर्मं कस्तं न कुर्यादनृशंसवृत्तिः ॥ ५ ९ ॥ ' महाराज हमलोगोंके गुरु, राजा और पिता होनेके साथ ही बड़े - बूढ़े माननीय पुरुष हैं । वे क्रोधसे, हर्षसे अथवा कामसे प्रेरित होकर भी यदि किसी कार्यके लिये आज्ञा दें तो हमें धर्म समझकर उसका पालन करना चाहिये । जिसके आचरणोंमें क्रूरता नहीं है, ऐसा कौन पुरुष पिताकी आज्ञाके पालनरूप धर्मका आचरण नहीं करेगा ॥ ५ ९ ॥ न तेन शक्नोमि पितुः प्रतिज्ञा-मिमां न कर्तुं सकलां यथावत् । यस्त गुरुर्नियोगे देव्याश्च भर्ता स गतिश्च धर्मः ॥ ६० ॥

' इसलिये मैं पिताकी इस सम्पूर्ण प्रतिज्ञाका यथावत् पालन करनेसे मुँह नहीं मोड़ सकता । तात लक्ष्मण! वे हम दोनोंको आज्ञा देनेमें समर्थ गुरु हैं और माताजीके तो वे ही पति, गति तथा धर्म हैं ॥ ६० ॥

तस्मिन् पुनर्जीवति धर्मराजे विशेषतः स्वे पथि वर्तमाने । देवी मया सार्धमितोऽभिगच्छेत् कथंस्विदन्या विधवेव नारी ॥ ६१ ॥

' वे धर्मके प्रवर्तक महाराज अभी जीवित हैं और विशेषतः अपने धर्ममय मार्गपर स्थित हैं, ऐसी दशामें माताजी, जैसे दूसरी कोई विधवा स्त्री बेटेके साथ रहती है, उस प्रकार मेरे साथ यहाँसे वनमें कैसे चल सकती हैं? ॥ ६१ ॥

सा मानुमन्यस्व वनं व्रजन्तं कुरुष्व नः स्वस्त्ययनानि देवि । यथा समा पुनराव्रजेयं यथा हि सत्येन पुनर्ययातिः ॥ ६२ ॥

' अतः देवि! तुम मुझे वनमें जानेकी आज्ञा दो और हमारे मङ्गलके लिये स्वस्तिवाचन कराओ, जिससे वनवासकी अवधि समाप्त होनेपर मैं फिर तुम्हारी सेवामें आ जाऊँ । जैसे राजा ययाति सत्यके प्रभावसे फिर स्वर्गमें लौट आये थे ॥ ६२ ॥

यशो ह्यहं केवलराज्यकारणा-न्न पृष्ठतः कर्तुमलं महोदयम् । अदीर्घकालेन तु देवि जीविते वृणेऽवरामद्य महीमधर्मतः ॥ ६३ ॥

पृष्ठ 309

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अयोध्याकाण्डे ' केवल धर्महीन राज्यके लिये मैं महान् फलदायक । धर्मपालनरूप सुयशको पीछे नहीं ढकेल सकता । मा! जीवन अधिक कालतक रहनेवाला नहीं है; इसके लिये मैं आज अधर्मपूर्वक इस तुच्छ पृथ्वीका राज्य लेना नहीं चाहता ' ॥ ६३ ॥

प्रसादयन्नरवृषभः स मातरं पराक्रमाज्जिगमिषुरेव दण्डकान् । द्वाविंशः सर्गः २ ९ ७ अथानुजं भृशमनुशास्य दर्शनं चकार तां हृदि जननीं प्रदक्षिणम् ॥ ६४ ॥

इस प्रकार नरश्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीने धैर्यपूर्वक दण्डकारण्यमें जानेकी इच्छासे माताको प्रसन्न करनेका प्रयत्न किया तथा अपने छोटे भाई लक्ष्मणको भी अपने विचारके अनुसार भलीभाँति धर्मका रहस्य समझाकर मन - ही - मन माताकी परिक्रमा करनेका संकल्प किया ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकविंशः सर्गः ॥ २१ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें इक्कीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ २१ ॥

द्वाविंशः सर्गः श्रीरामका लक्ष्मणको समझाते हुए अपने वनवासमें दैवको ही कारण बताना और अभिषेककी सामग्रीको हटा लेनेका आदेश देना

अथ तं व्यथया दीनं सविशेषममर्षितम् ।

सरोषमिव नागेन्द्रं रोषविस्फारितेक्षणम् ॥ १ ॥

आसाद्य रामः सौमित्रिं सुहृदं भ्रातरं प्रियम् ।

उवाचेदं स धैर्येण धारयन् सत्त्वमात्मवान् ॥२ ॥

( श्रीरामके राज्याभिषेकमें विघ्न पड़नेके कारण ) सुमित्राकुमार लक्ष्मण मानसिक व्यथासे बहुत दुःखी थे । उनके मनमें विशेष अमर्ष भरा हुआ था । वे रोषसे भरे हुए गजराजकी भाँति क्रोधसे आँखें फाड़ - फाड़कर देख रहे थे । अपने मनको वशमें रखनेवाले श्रीराम धैर्यपूर्वक चित्तको निर्विकाररूपसे काबूमें रखते हुए अपने हितैषी सुहृद् प्रिय भाई लक्ष्मणके पास जाकर इस प्रकार बोले- ॥ १-२ ॥

निगृह्य रोषं शोकं च धैर्यमाश्रित्य केवलम् ।

अवमानं निरस्यैनं गृहीत्वा हर्षमुत्तमम् ॥ ३ ॥

उपक्लृप्तं दै अभिषेकार्थमुत्तमम् ।

सर्व निवर्तय क्षिप्रं कुरु कार्यं निरव्ययम् ॥ ४ ॥

' लक्ष्मण! केवल धैर्यका आश्रय लेकर अपने मनके क्रोध और शोकको दूर करो, चित्तसे अपमानकी भावना निकाल दो और हृदयमें भलीभाँति हर्ष भरकर मेरे अभिषेकके लिये यह जो उत्तम सामग्री एकत्र की गयी है, इसे शीघ्र हटा दो और ऐसा कार्य करो, जिससे मेरे वनगमनमें बाधा उपस्थित न हो ॥ ३-४ ॥

सौमित्रे योऽभिषेकार्थे मम सम्भारसम्भ्रमः ।

अभिषेकनिवृत्त्यर्थे सोऽस्तु सम्भारसम्भ्रमः ॥ ५ ॥

' सुमित्रानन्दन! अबतक अभिषेकके लिये सामग्री

जुटानेमें जो तुम्हारा उत्साह था, वह इसे रोकने और मेरे ।

वन जानेकी तैयारी करनेमें होना चाहिये ॥ ५ ॥

यस्या मदभिषेकार्थे मानसं परितप्यते ।

माता नः सा यथा न स्यात् सविशङ्का तथा कुरु ॥ ६ ॥

' मेरे अभिषेकके कारण जिसके चित्तमें संताप हो रहा है, उस हमारी माता कैकेयीको जिससे किसी तरह की शङ्का न रह जाय, वही काम करो ॥ ६ ॥

तस्याः शङ्कामयं दुःखं मुहूर्तमपि नोत्सहे ।

मनसि प्रतिसंजातं सौमित्रेऽहमुपेक्षितुम् ॥ ७ ॥

' लक्ष्मण! उसके मनमें संदेहके कारण दुःख उत्पन्न हो, इस बातको मैं दो घड़ीके लिये भी नहीं सह सकता और न इसकी उपेक्षा ही कर सकता हूँ ॥

न बुद्धिपूर्वं नाबुद्धं स्मरामीह कदाचन ।

मातॄणां वा पितुर्वाहं कृतमल्पं च विप्रियम् ॥ ८ ॥

' मैंने यहाँ कभी जान - बूझकर या अनजानमें माताओंका अथवा पिताजीका कोई छोटा - सा भी अपराध किया हो, ऐसा याद नहीं आता ॥ ८ ॥

सत्यः सत्याभिसंधश्च नित्यं सत्यपराक्रमः ।

परलोकभयाद् भीतो निर्भयोऽस्तु पिता मम ॥ ९ ॥

' पिताजी सदा सत्यवादी और सत्यपराक्रमी रहे हैं । वे परलोकके भयसे सदा डरते रहते हैं; इसलिये मुझे वही काम करना चाहिये, जिससे मेरे पिताजीका पारलौकिक भय दूर हो जाय ॥ ९ ॥

तस्यापि हि भवेदस्मिन् कर्मण्यप्रतिसंहृते ।

सत्यं नेति मनस्तापस्तस्य तापस्तपेच्च माम् ॥ १० ॥

' यदि इस अभिषेकसम्बन्धी कार्यको रोक नहीं दिया गया तो पिताजीको भी मन - ही - मन यह सोचकर

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२ ९ ८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे

संताप होगा कि मेरी बात सच्ची नहीं हुई और उनका ।

वह मनस्ताप मुझे सदा संतप्त करता रहेगा ॥ १० ॥

अभिषेकविधानं तु तस्मात् संहृत्य लक्ष्मण ।

अन्वगेवाहमिच्छामि वनं गन्तुमितः पुरः ॥ ११ ॥ ।

‘ लक्ष्मण! इन्हीं सब कारणोंसे मैं अपने अभिषेकका कार्य रोककर शीघ्र ही इस नगरसे वनको चला जाना चाहता हूँ ॥ ११ ॥

मम प्रव्राजनादद्य कृतकृत्या नृपात्मजा ।

सुतं भरतमव्यग्रमभिषेचयतां ततः ॥ १२ ॥

' आज मेरे चले जानेसे कृतकृत्य हुई राजकुमारी कैकेयी अपने पुत्र भरतका निर्भय एवं निश्चिन्त होकर अभिषेक करावे ॥ १२ ॥

मयि चीराजिनधरे जटामण्डलधारिणि ।

गतेऽरण्यं च कैकेय्या भविष्यति मनः सुखम् ॥ १३ ॥

' मैं वल्कल और मृगचर्म धारण करके सिरपर जटाजूट बाँधे जब वनको चला जाऊँगा, तभी कैकेयीके मनको सुख प्राप्त होगा ॥ १३ ॥

बुद्धिः प्रणीता येनेयं मनश्च सुसमाहितम् ।

तं नु नार्हामि संक्लेष्टुं प्रव्रजिष्यामि मा चिरम् ॥ १४ ॥

' जिस विधाताने कैकेयीको ऐसी बुद्धि प्रदान की है तथा जिसकी प्रेरणासे उसका मन मुझे वन भेजनेमें अत्यन्त दृढ़ हो गया है, उसे विफलमनोरथ करके कष्ट देना मेरे लिये उचित नहीं है ॥१४ ॥

कृतान्त एव सौमित्रे द्रष्टव्यो मत्प्रवासने ।

राज्यस्य च वितीर्णस्य पुनरेव निवर्तने ॥ १५ ॥

' सुमित्राकुमार! मेरे इस प्रवासमें तथा पिताद्वारा दिये हुए राज्यके फिर हाथसे निकल जानेमें दैवको ही कारण समझना चाहिये ॥ १५ ॥

कैकेय्याः प्रतिपत्तिर्हि कथं स्यान्मम वेदने ।

यदि तस्या न भावोऽयं कृतान्तविहितो भवेत् ॥ १६ ॥

' मेरी समझसे कैकेयीका यह विपरीत मनोभाव दैवका ही विधान है । यदि ऐसा न होता तो वह मुझे वनमें भेजकर पीड़ा देनेका विचार क्यों करती ॥ १६ ॥

जानासि हि यथा सौम्य न मातृषु ममान्तरम् ।

भूतपूर्वं विशेषो वा तस्या मयि सुतेऽपि वा ॥ १७ ॥

' सौम्य! तुम तो जानते ही हो कि मेरे मनमें पहले भी कभी माताओंके प्रति भेदभाव नहीं हुआ और कैकेयी भी पहले मुझमें या अपने पुत्रमें कोई अन्तर नहीं समझती थी ॥ १७ ॥

सोऽभिषेकनिवृत्त्यर्थैः प्रवासार्थैश्च दुर्वचैः ।

उग्रैर्वाक्यैरहं तस्या नान्यद् दैवात् समर्थये ॥ १८ ॥

' मेरे अभिषेकको रोकने और मुझे वनमें भेजने के लिये उसने राजाको प्रेरित करनेके निमित्त जिन भयंकर और कटुवचनोंका प्रयोग किया है, उन्हें साधारण मनुष्योंके लिये भी मुँहसे निकालना कठिन है । उस ऐसी चेष्टामें मैं दैवके सिवा दूसरे किसी कारणका समर्थन नहीं करता ॥ १८ ॥

कथं प्रकृतिसम्पन्ना राजपुत्री तथागुणा ।

ब्रूयात् सा प्राकृतेव स्त्री मत्पीड्यं भर्तृसंनिधौ ॥ १ ९ ॥

' यदि ऐसी बात न होती तो वैसे उत्तम स्वभाव और श्रेष्ठ गुणोंसे युक्त राजकुमारी कैकेयी एक साधारण स्त्रीकी भाँति अपने पतिके समीप मुझे पीड़ा देनेवाली बात कैसे कहती - मुझे कष्ट देनेके लिये रामको वनमें भेजनेका प्रस्ताव कैसे उपस्थित करती ॥ १ ९ ॥

। यदचिन्त्यं तु तद् दैवं भूतेष्वपि न हन्यते ।

व्यक्तं मयि च तस्यां च पतितो हि विपर्ययः ॥ २० ॥

' जिसके विषयमें कभी कुछ सोचा न गया हो, वही दैवका विधान है । प्राणियोंमें अथवा उनके अधिष्ठाता देवताओंमें भी कोई ऐसा नहीं है, जो उस दैवके विधानको मेट सके; अतः निश्चय ही उसीकी प्रेरणासे मुझमें और कैकेयीमें यह भारी उलट - फेर हुआ है ( मेरे हाथमें आया हुआ राज्य चला गया और कैकेयीकी बुद्धि बदल गयी ) ॥ २० ॥

कश्च दैवेन सौमित्रे योद्धुमुत्सहते पुमान् ।

यस्य नु ग्रहणं किंचित् कर्मणोऽन्यन्न दृश्यते ॥ २१ ॥

' सुमित्रानन्दन! कर्मोंके सुख - दुःखादिरूप फल प्राप्त होनेपर ही जिसका ज्ञान होता है, कर्मफलसे अन्यत्र कहीं भी जिसका पता नहीं चलता, उस दैवके साथ कौन पुरुष युद्ध कर सकता है? ॥२१ ॥

सुखदुःखे भयक्रोधौ लाभालाभौ भवाभवौ ।

यस्य किंचित् तथाभूतं ननु दैवस्य कर्म तत् ॥ २२ ॥

' सुख - दुःख, भय - क्रोध ( क्षोभ ), लाभ - हानि, उत्पत्ति और विनाश तथा इस प्रकारके और भी जितने परिणाम प्राप्त होते हैं, जिनका कोई कारण समझमें नहीं आता, वे सब दैवके ही कर्म हैं ॥ २२ ॥

ऋषयोऽप्युग्रतपसो दैवेनाभिप्रचोदिताः ।

उत्सृज्य नियमांस्तीव्रान् भ्रश्यन्ते काममन्युभिः ॥ २३ ॥

' उग्र तपस्वी ऋषि भी दैवसे प्रेरित होकर अपने