वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ — पृष्ठ 291–300
वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 291–300
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अयोध्याकाण्डे षोडशः सर्गः २७ ९ ततो वादित्रशब्दाश्च स्तुतिशब्दाश्च वन्दिनाम् ॥ ३६ ॥ ।
सिंहनादाश्च शूराणां ततः शुश्रुविरे पथि ।
हर्म्य वातायनस्थाभिर्भूषिताभिः समन्ततः ॥ ३७ ॥
कीर्यमाणः सुपुष्पौधैर्ययौ स्त्रीभिररिंदमः । तदनन्तर मार्गमें वाद्योंकी ध्वनि, वन्दीजनोंके स्तुतिपाठके शब्द तथा शूरवीरोंके सिंहनाद सुनायी देने लगे । महलोंकी खिड़कियोंमें बैठी हुई वस्त्राभूषणोंसे विभूषित वनिताएँ सब ओरसे शत्रुदमन श्रीरामपर ढेर-के - ढेर सुन्दर पुष्प बिखेर रही थीं । इस अवस्थामें श्रीराम आगे बढ़ते चले जा रहे थे ॥ ३६-३७३ ॥ रामं सर्वानवद्याङ्ग्यो रामपिप्रीषया ततः ॥ ३८ ॥
वचोभिरग्र्यैर्हर्म्यस्थाः क्षितिस्थाश्च ववन्दिरे । उस समय अट्टालिकाओं और भूतलपर खड़ी हुई सर्वाङ्गसुन्दरी युवतियाँ श्रीरामका प्रिय करनेकी इच्छासे श्रेष्ठ वचनोंद्वारा उनकी स्तुति गाने लगीं ॥ ३८३ ॥
नूनं नन्दति ते माता कौसल्या मातृनन्दन ॥ ३ ९ ॥ पश्यन्ती सिद्धयात्रं त्वां पित्र्यं राज्यमुपस्थितम् । ' माताको आनन्द प्रदान करनेवाले रघुवीर! आपकी यह यात्रा सफल होगी और आपको पैतृक राज्य प्राप्त होगा । इस अवस्थामें आपको देखती हुई आपकी माता कौसल्या निश्चय ही आनन्दित हो रही होंगी ॥ ३ ९ ३ ॥ सर्वसीमन्तिनीभ्यश्च सीतां सीमन्तिनीं वराम् ॥ ४० ॥
अमन्यन्त हि ता नार्यो रामस्य हृदयप्रियाम् ।
तया सुचरितं देव्या पुरा नूनं महत् तपः ॥ ४१ ॥
रोहिणीव शशाङ्केन रामसंयोगमाप या । ' वे नारियाँ श्रीरामकी हृदयवल्लभा सीमन्तिनी सीताको संसारकी समस्त सौभाग्यवती स्त्रियोंसे श्रेष्ठ मानती हुई कहने लगीं- ' उन देवी सीताने पूर्वकालमें निश्चय ही बड़ा भारी तप किया होगा, तभी उन्होंने चन्द्रमासे संयुक्त हुई रोहिणीकी भाँति श्रीरामका संयोग प्राप्त किया है ' ॥ ४०-४१३ ॥
इति प्रासादशृङ्गेषु प्रमदाभिर्नरोत्तमः ।
शुश्राव राजमार्गस्थः प्रिया वाच उदाहृताः ॥ ४२ ॥
इस प्रकार राजमार्गपर रथपर बैठे हुए श्रीरामचन्द्रजी प्रासादशिखरोंपर बैठी हुई युवती स्त्रियोंके द्वारा कही गयी ये प्यारी बातें सुन रहे थे ॥ ४२ ॥
स राघवस्तत्र तदा प्रलापान् शुश्राव लोकस्य समागतस्य । आत्माधिकारा विविधाश्च वाचः प्रहृष्टरूपस्य पुरे जनस्य ॥ ४३ ॥
उस समय अयोध्यामें आये हुए दूर - दूरके लोग अत्यन्त हर्षसे भरकर वहाँ श्रीरामचन्द्रजीके विषयमें जो वार्तालाप और तरह - तरहकी बातें करते थे, अपने विषयमें कही गयी उन सभी बातोंको श्रीरघुनाथजी सुनते जा रहे थे ॥४३ ॥
एष श्रियं गच्छति राघवोऽद्य राजप्रसादाद् विपुलां गमिष्यन् । एते वयं सर्वसमृद्धकामा येषामयं नो भविता प्रशास्ता ॥ ४४ । वे कहते थे— ' इस समय ये श्रीरामचन्द्रजी महाराज दशरथकी कृपासे बहुत बड़ी सम्पत्तिके अधिकारी होने जा रहे हैं । अब हम सब लोगोंकी समस्त कामनाएँ पूर्ण हो जायँगी, क्योंकि ये श्रीराम हमारे शासक होंगे ॥ ४४ ॥
लाभो जनस्यास्य यदेष सर्वं प्रपत्स्यते राष्ट्रमिदं चिराय । न ह्यप्रियं किंचन जातु कश्चित् पश्येन्न दुःखं मनुजाधिपेऽस्मिन् ॥ ४५ ॥
यदि यह सारा राज्य चिरकालके लिये इनके हाथमें आ जाय तो इस जगत्की समस्त जनताके लिये यह महान् लाभ होगा । इनके राजा होनेपर कभी किसीका अप्रिय नहीं होगा और किसीको कोई दुःख भी नहीं देखना पड़ेगा ' ॥ ४५ ॥
| स घोषवद्भिश्च हयैः सनागैः
पुरःसरैः स्वस्तिकसूतमागधैः ।
महीयमानः प्रवरैश्च वादकै-रभिष्टुतो वैश्रवणो यथा ययौ ॥ ४६ ॥
हिनहिनाते हुए घोड़ों, चिग्घाड़ते हुए हाथियों, जय - जयकार करते हुए आगे - आगे चलनेवाले वन्दियों, स्तुतिपाठ करनेवाले सूतों, वंशकी विरुदावलि बखाननेवाले मागधों तथा सर्वश्रेष्ठ गुणगायकोंके तुमुल घोषके बीच उन वन्दी आदिसे पूजित एवं प्रशंसित होते हुए श्रीरामचन्द्रजी कुबेरके समान चल रहे थे ॥ ४६ ॥
करेणुमातङ्गरथाश्वसंकुलं महाजनौघैः परिपूर्णचत्वरम् । प्रभूतरत्नं बहुपण्यसंचयं ददर्श रामो विमलं महापथम् ॥४७ ॥
यात्रा करते हुए श्रीरामने उस विशाल राजमार्गको
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२८० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे देखा, जो हथिनियों, मतवाले हाथियों, रथों और घोड़ोंसे | प्रचुर रत्नोंसे भरी हुई दुकानें थीं तथा विक्रयके योग्य खचाखच भरा हुआ था । उसके प्रत्येक चौराहेपर मनुष्योंकी और भी बहुत - से द्रव्योंके ढेर वहाँ दिखायी देते थे । वह भारी भीड़ इकट्ठी हो रही थी । उसके दोनों पार्श्वभागोंमें | राजमार्ग बहुत साफ - सुथरा था ॥४७ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे षोडशः सर्गः ॥ १६ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें सोलहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १६ ॥
सप्तदशः सर्गः श्रीरामका राजपथकी शोभा देखते और सुहृदोंकी बातें सुनते हुए पिताके भवनमें प्रवेश
स रामो रथमास्थाय सम्प्रहृष्टसुहृज्जनः ।
पताकाध्वजसम्पन्नं. महार्हागुरुधूपितम् ॥ १ ॥
अपश्यन्नगरं श्रीमान् नानाजनसमन्वितम् ।
स गृहैरभ्रसंकाशैः पाण्डुरैरुपशोभितम् ॥ २ ॥
राजमार्ग ययौ रामो मध्येनागुरुधूपितम् । इस प्रकार श्रीमान् रामचन्द्रजी अपने सुहृदोंको आनन्द प्रदान करते हुए रथपर बैठे राजमार्गके बीचसे चले जा रहे थे; उन्होंने देखा - सारा नगर ध्वजा और पताकाओंसे सुशोभित हो रहा है, चारों ओर बहुमूल्य अगुरु नामक धूपकी सुगन्ध छा रही है और सब ओर असंख्य मनुष्योंकी भीड़ दिखायी देती है । वह राजमार्ग श्वेत बादलोंके समान उज्ज्वल भव्य भवनोंसे सुशोभित तथा अगुरुकी सुगन्धसे व्याप्त हो रहा था ॥ २३ ॥
चन्दनानां च मुख्यानामगुरूणां च संचयैः ॥ ३ ॥
उत्तमानां च गन्धानां क्षौमकौशाम्बरस्य च ।
अविद्धाभिश्च मुक्ताभिरुत्तमैः स्फाटिकैरपि ॥ ४ ॥
शोभमानमसम्बाधं राजपथमुत्तमम् ।
संवृतं विविधैः पुष्पैर्भक्ष्यैरुच्चावचैरपि ॥ ५ ॥
ददर्श तं राजपथं दिवि देवपतिर्यथा ।
दध्यक्षतहविर्लाजैर्धूपैरगुरुचन्दनैः ॥ ६ ॥
नानामाल्योपगन्धैश्च सदाभ्यर्चितचत्वरम् । अच्छी श्रेणीके चन्दनों, अगुरु नामक धूपों, उत्तम गन्धद्रव्यों, अलसी या सन आदिके रेशोंसे बने हुए कपड़ों तथा रेशमी वस्त्रोंके ढेर, अनबिंधे मोती और उत्तमोत्तम स्फटिक रत्न उस विस्तृत एवं उत्तम राजमार्गकी शोभा बढ़ा रहे थे । वह नाना प्रकारके पुष्पों तथा भाँति - भाँतिके भक्ष्य पदार्थोंसे भरा हुआ था । उसके चौराहोंकी दही, अक्षत, हविष्य, लावा, धूप, अगर, चन्दन, नाना प्रकारके पुष्पहार और गन्धद्रव्योंसे सदा पूजा की जाती थी । स्वर्गलोकमें बैठे हुए देवराज इन्द्रकी भाँति रथारूढ़ श्रीरामने उस राजमार्गको देखा ॥ ३-६३ ॥ आशीर्वादान् बहून् शृण्वन् सुहृद्भिः समुदीरितान् ॥ ७ ॥
यथार्हं चापि सम्पूज्य सर्वानेव नरान् ययौ । वे अपने सुहृदोंके मुखसे कहे गये बहुत - से आशीर्वादोंको सुनते और यथायोग्य उन सब लोगोंका सम्मान करते हुए चले जा रहे थे ॥ ७३ ॥
पितामहैराचरितं तथैव प्रपितामहैः ॥ ८ ॥
अद्योपादाय तं मार्गमभिषिक्तोऽनुपालय । ( उनके हितैषी सुहृद् कहते थे — ) ' रघुनन्दन! तुम्हारे पितामह और प्रपितामह ( दादे और परदादे ) जिसपर चलते आये हैं, आज उसी मार्गको ग्रहण करके युवराज - पदपर अभिषिक्त हो आप हम सब लोगोंका निरन्तर पालन करें ' ॥ ८३ ॥
यथा स्म पोषिताः पित्रा यथा सर्वैः पितामहैः ।
ततः सुखतरं सर्वे रामे वत्स्याम राजनि ॥ ९ ॥
( फिर वे आपसमें कहने लगे - ) ' भाइयो! श्रीरामके पिता तथा समस्त पितामहोंद्वारा जिस प्रकार हमलोगोंका पालन - पोषण हुआ है, श्रीरामके राजा होनेपर हम उससे भी अधिक सुखी रहेंगे ॥ ९ ॥
अलमद्य हि भुक्तेन परमार्थैरलं च नः ।
यदि पश्याम निर्यान्तं रामं राज्ये प्रतिष्ठितम् ॥ १० ॥
' यदि हम राज्यपर प्रतिष्ठित हुए श्रीरामको पिताके घरसे निकलते हुए देख लें - यदि राजा रामका दर्शन कर लें तो अब हमें इहलोकके भोग और परमार्थस्वरूप मोक्ष लेकर क्या करना है ॥ १० ॥
ततो हि नः प्रियतरं नान्यत् किंचिद् भविष्यति ।
यथाभिषेको रामस्य राज्येनामिततेजसः ॥ ११ ॥
' अमित तेजस्वी श्रीरामका यदि राज्यपर अभिषेक हो जाय तो वह हमारे लिये जैसा प्रियतर कार्य होगा, उससे बढ़कर दूसरा कोई परम प्रिय कार्य नहीं होगा ' ॥
एताश्चान्याश्च सुहृदामुदासीनः शुभाः कथाः ।
आत्मसम्पूजनीः शृण्वन् ययौ रामो महापथम् ॥ १२ ॥
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अयोध्याकाण्डे सुहृदोंके मुँहसे निकली हुई ये तथा और भी कई तरहकी अपनी प्रशंसासे सम्बन्ध रखनेवाली सुन्दर बातें सुनते हुए श्रीरामचन्द्रजी राजपथपर बढ़े चले जा रहे थे ॥
न हि तस्मान्मनः कश्चिच्चक्षुषी वा नरोत्तमात् ।
नरः शक्नोत्यपाक्रष्टुमतिक्रान्तेऽपि राघवे ॥ १३ ॥
( जो श्रीरामकी ओर एक बार देख लेता, वह उन्हें देखता ही रह जाता था । ) श्रीरघुनाथजीके दूर चले जानेपर भी कोई उन पुरुषोत्तमकी ओरसे अपना मन या दृष्टि नहीं हटा पाता था ॥ १३ ॥
यश्च रामं न पश्येत्तु यं च रामो न पश्यति ।
निन्दितः सर्वलोकेषु स्वात्माप्येनं विगर्हते ॥ १४ ॥
उस समय जो श्रीरामको नहीं देखता और जिसे श्रीराम नहीं देख लेते थे, वह समस्त लोकोंमें निन्दित समझा जाता था तथा स्वयं उसकी अन्तरात्मा भी उसे धिक्कारती थी ॥ १५ ॥
सर्वेषु स हि धर्मात्मा वर्णानां कुरुते दयाम् ।
चतुर्णां हि वयःस्थानां तेन ते तमनुव्रताः ॥ १६ ॥
धर्मात्मा श्रीराम चारों वर्णोंके सभी मनुष्योंपर उनकी अवस्थाके अनुरूप दया करते थे, इसलिये वे सभी उनके भक्त थे ॥ १६ ॥
चतुष्पथान् देवपथांश्चैत्यांश्चायतनानि च ।
प्रदक्षिणं परिहरज्जगाम नृपतेः सुतः ॥ १६ ॥
राजकुमार श्रीराम चौराहों, देवमार्गों, चैत्यवृक्षों तथा देवमन्दिरोंको अपने दाहिने छोड़ते हुए आगे बढ़ रहे थे ॥
स राजकुलमासाद्य मेघसङ्घोपमैः शुभैः ।
प्रासादशृङ्गैर्विविधैः कैलासशिखरोपमैः ॥ १७ ॥
आवारयद्भिर्गगनं विमानैरिव पाण्डुरैः ।
• वर्धमानगृहैश्चापि रत्नजालपरिष्कृतैः ॥ १८ ॥
तत् पृथिव्यां गृहवरं महेन्द्रसदनोपमम् ।
राजपुत्रः पितुर्वेश्म प्रविवेश श्रिया ज्वलन् ॥ १ ९ ॥
अष्टादशः सर्गः २८१ राजा दशरथका भवन मेघसमूहोंके समान शोभा पानेवाले, सुन्दर अनेक रूप - रंगवाले कैलासशिखरके समान उज्ज्वल प्रासादशिखरों ( अट्टालिकाओं ) से सुशोभित था । उसमें रत्नोंकी जालीसे विभूषित तथा विमानाकार क्रीड़ागृह भी बने हुए थे, जो अपनी श्वेत आभासे प्रकाशित होते थे । वे अपनी ऊँचाईसे आकाशको भी लाँघते हुए - से प्रतीत होते थे; ऐसे गृहोंसे युक्त वह श्रेष्ठ भवन इस भूतलपर इन्द्रसदनके समान शोभा पाता था । उस राजभवनके पास पहुँचकर अपनी शोभासे प्रकाशित होनेवाले राजकुमार श्रीरामने पिताके महलमें प्रवेश | किया ॥ १७–१९ ॥
स कक्ष्या धन्विभिर्गुप्तास्तिस्त्रोऽतिक्रम्य वाजिभिः ।
पदातिरपरे कक्ष्ये द्वे जगाम नरोत्तमः ॥ २० ॥
उन्होंने धनुर्धर वीरोंद्वारा सुरक्षित महलकी तीन ड्यौढ़ियोंको तो घोड़े जुते हुए रथसे ही पार किया, फिर दो ड्यौढ़ियोंमें वे पुरुषोत्तम राम पैदल ही गये ॥ २० ॥
स सर्वाः समतिक्रम्य कक्ष्या दशरथात्मजः ।
संनिवर्त्य जनं सर्वं शुद्धान्तः पुरमत्यगात् ॥ २१ ॥
इस प्रकार सारी ड्यौढ़ियोंको पार करके दशरथनन्दन श्रीराम साथ आये हुए सब लोगोंको लौटाकर स्वयं अन्तःपुरमें गये ॥२१ ॥
तस्मिन् प्रविष्टे पितुरन्तिकं तदा जनः स सर्वो मुदितो नृपात्मजे । प्रतीक्षते तस्य पुनः स्म निर्गमं यथोदयं चन्द्रमसः सरित्पतिः ॥ २२ ॥
जब राजकुमार श्रीराम पिताके पास जानेके लिये अन्तःपुरमें प्रविष्ट हुए, तब आनन्दमग्न हुए सब लोग बाहर खड़े होकर उनके पुनः निकलनेकी प्रतीक्षा करने लगे, ठीक उसी तरह जैसे सरिताओंका स्वामी समुद्र । चन्द्रोदयकी प्रतीक्षा करता रहता है ॥ २२ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे सप्तदशः सर्गः ॥ १७ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें सत्रहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १७ ॥
अष्टादशः सर्गः श्रीरामका कैकेयीसे पिताके चिन्तित होनेका कारण पूछना और कैकेयीका कठोरतापूर्वक अपने माँगे हुए वृत्तान्त बताकर श्रीरामको वनवासके लिये प्रेरित करना स ददर्शासने रामो विषण्णं पितरं शुभे । एक सुन्दर आसनपर बैठे देखा । वे विषादमें डूबे हुए कैकेय्या सहितं दीनं मुखेन परिशुष्यता ॥ १ ॥ थे, उनका मुँह सूख गया था और वे बड़े दयनीय
महलमें जाकर श्रीरामने पिताको कैकेयीके साथ । दिखायी देते थे ॥ २ ॥
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२८२ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे
स पितुश्चरणौ पूर्वमभिवाद्य विनीतवत् ।
ततो ववन्दे चरणौ कैकेय्याः सुसमाहितः ॥ २ ॥
निकट पहुँचनेपर श्रीरामने विनीतभावसे पहले अपने पिताके चरणोंमें प्रणाम किया; उसके बाद बड़ी सावधानीके साथ उन्होंने कैकेयीके चरणोंमें भी मस्तक झुकाया ॥ २ ॥
रामेत्युक्त्वा तु वचनं बाष्पपर्याकुलेक्षणः ।
शशाक नृपतिर्दीनो नेक्षितुं नाभिभाषितुम् ॥ ३ ॥
उस समय दीनदशामें पड़े हुए राजा दशरथ एक बार ' राम! ' ऐसा कहकर चुप हो गये ( इससे आगे उनसे बोला नहीं गया ) । उनके नेत्रोंमें आँसू भर आये, अतः वे श्रीरामकी ओर न तो देख सके और न उनसे कोई बात ही कर सके ॥ ३ ॥
तदपूर्वं नरपतेर्दृष्ट्वा रूपं भयावहम् ।
रामोऽपि भयमापन्नः पदा स्पृष्ट्वेव पन्नगम् ॥ ४ ॥
राजाका वह अभूतपूर्व भयंकर रूप देखकर श्रीरामको भी भय हो गया, मानो उन्होंने पैरसे किसी सर्पको छू दिया हो ॥४ ॥
इन्द्रियैरप्रहृष्टैस्तं शोकसंतापकर्शितम् ।
निःश्वसन्तं महाराजं व्यथिताकुलचेतसम् ॥ ५ ॥
ऊर्मिमालिनमक्षोभ्यं क्षुभ्यन्तमिव सागरम् ।
उपप्लुतमिवादित्यमुक्तानृतमृषिं यथा ॥ ६ ॥ ।
राजाकी इन्द्रियोंमें प्रसन्नता नहीं थी; वे शोक और संतापसे दुर्बल हो रहे थे, बारंबार लंबी साँसें भरते थे तथा उनके चित्तमें बड़ी व्यथा और व्याकुलता थी । वे ऐसे दीखते थे, मानो तरङ्गमालाओंसे उपलक्षित अक्षोभ्य समुद्र क्षुब्ध हो उठा हो, सूर्यको राहुने ग्रस लिया हो अथवा किसी महर्षिने झूठ बोल दिया हो ॥ ६ ॥
अचिन्त्यकल्पं नृपतेस्तं शोकमुपधारयन् ।
बभूव संरब्धतरः समुद्र इव पर्वणि ॥ ७ ॥
राजाका वह शोक सम्भावनासे परे था । इस शोकका क्या कारण है — यह सोचते हुए श्रीरामचन्द्रजी पूर्णिमाके समुद्रकी भाँति अत्यन्त विक्षुब्ध हो उठे ॥ ७ ॥
चिन्तयामास चतुरो रामः पितृहिते रतः ।
किंस्विदद्यैव नृपतिर्न मां प्रत्यभिनन्दति ॥ ८ ॥
पिताके हितमें तत्पर रहनेवाले परम चतुर श्रीराम सोचने लगे कि ' आज ही ऐसी क्या बात हो गयी ' जिससे महाराज मुझसे प्रसन्न होकर बोलते नहीं हैं ॥ ८ ॥
अन्यदा मां पिता दृष्ट्वा कुपितोऽपि प्रसीदति ।
तस्य मामद्य सम्प्रेक्ष्य किमायासः प्रवर्तते ॥ ९ ॥ ।
' और दिन तो पिताजी कुपित होनेपर भी मुझे देखते ही प्रसन्न हो जाते थे, आज मेरी ओर दृष्टिपात करके इन्हें क्लेश क्यों हो रहा है ' ॥ ९ ॥
स दीन इव शोकार्तो विषण्णवदनद्युतिः ।
कैकेयीमभिवाद्यैव रामो वचनमब्रवीत् ॥ १० ॥
` यह सब सोचकर श्रीराम दीन - से हो गये, शोकसे कातर हो उठे, विषादके कारण उनके मुखकी कान्ति फीकी पड़ गयी । वे कैकेयीको प्रणाम करके उसीसे पूछने लगे - ॥ १० ॥
कच्चिन्मया नापराद्धमज्ञानाद् येन मे पिता ।
कुपितस्तन्ममाचक्ष्व त्वमेवैनं प्रसादय ॥ ११ ॥
' मा! मुझसे अनजानमें कोई अपराध तो नहीं हो गया, जिससे पिताजी मुझपर नाराज हो गये हैं । तुम यह बात मुझे बताओ और तुम्हीं इन्हें मना दो ॥ ११ ॥
अप्रसन्नमनाः किं नु सदा मां प्रति वत्सलः ।
विषण्णवदनो दीनः नहि मां प्रति भाषते ॥ १२ ॥
' ये तो सदा मुझे प्यार करते थे, आज इनका मन अप्रसन्न क्यों हो गया? देखता हूँ, ये आज मुझसे बोलतेतक नहीं हैं, इनके मुखपर विषाद छा रहा है और ये अत्यन्त दुःखी हो रहे हैं ॥१२ ॥
शारीरो मानसो वापि कच्चिदेनं न बाधते ।
संतापो वाभितापो वा दुर्लभं हि सदा सुखम् ॥ १३ ॥
' कोई शारीरिक व्याधिजनित संताप अथवा मानसिक अभिताप ( चिन्ता ) तो इन्हें पीड़ित नहीं कर रहा है? क्योंकि मनुष्यको सदा सुख - ही - सुख मिले-ऐसा सुयोग प्रायः दुर्लभ होता है ॥१३ ॥
कच्चिन्न किंचिद् भरते कुमारे प्रियदर्शने ।
शत्रुघ्ने वा महासत्त्वे मातॄणां वा ममाशुभम् ॥ १४ ॥
' प्रियदर्शन कुमार भरत, महाबली शत्रुघ्न अथवा मेरी माताओंका तो कोई अमङ्गल नहीं हुआ है? ॥ १४ ॥
अतोषयन् महाराजमकुर्वन् वा पितुर्वचः ।
मुहूर्तमपि नेच्छेयं जीवितुं कुपिते नृपे ॥ १५ ॥
' महाराजको असंतुष्ट करके अथवा इनकी आज्ञा न मानकर इन्हें कुपित कर देनेपर मैं दो घड़ी भी जीवित रहना नहीं चाहूँगा ॥ १५ ॥
यतोमूलं नरः पश्येत् प्रादुर्भावमिहात्मनः ।
कथं तस्मिन् न वर्तेत प्रत्यक्षे सति दैवते ॥ १६ ॥
‘ मनुष्य जिसके कारण इस जगत्में अपना प्रादुर्भाव ( जन्म ) देखता है, उस प्रत्यक्ष देवता पिताके जीते - जी वह उसके अनुकूल बर्ताव क्यों न करेगा? ॥१६ ॥
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अयोध्याकाण्डे
कच्चित्ते परुषं किंचिदभिमानात् पिता मम ।
उक्तो भवत्या रोषेण येनास्य लुलितं मनः ॥ १७ ॥
' कहीं तुमने तो अभिमान या रोषके कारण मेरे पिताजीसे कोई कठोर बात नहीं कह डाली, जिससे इनका मन दुःखी हो गया है? ॥ १७ ॥
एतदाचक्ष्व मे देवि तत्त्वेन परिपृच्छतः ।
किंनिमित्तमपूर्वोऽयं विकारो मनुजाधिपे ॥ १८ ॥
' देवि! मैं सच्ची बात पूछता हूँ, बताओ, किस कारणसे महाराजके मनमें आज इतना विकार ( संताप ) है? इनकी ऐसी अवस्था तो पहले कभी नहीं देखी गयी थी ' ॥ १८ ॥
एवमुक्ता तु कैकेयी राघवेण महात्मना ।
उवाचेदं सुनिर्लज्जा धृष्टमात्महितं वचः ॥ १ ९ ॥
महात्मा श्रीरामके इस प्रकार पूछनेपर अत्यन्त निर्लज्ज कैकेयी बड़ी ढिठाईके साथ अपने मतलबकी बात इस प्रकार बोली- ॥ १ ९ ॥
न राजा कुपितो राम व्यसनं नास्य किंचन ।
किंचिन्मनोगतं त्वस्य त्वद्भयान्नानुभाषते ॥ २० ॥
' राम! महाराज कुपित नहीं हैं और न इन्हें कोई कष्ट ही हुआ है । इनके मनमें कोई बात है, जिसे तुम्हारे डरसे ये कह नहीं पा रहे हैं ॥ २० ॥
प्रियं त्वामप्रियं वक्तुं वाणी नास्य प्रवर्तते ।
तदवश्यं त्वया कार्यं यदनेनाश्रुतं मम ॥ २१ ॥
' तुम इनके प्रिय हो, तुमसे कोई अप्रिय बात कहनेके लिये इनकी जबान नहीं खुलती; किंतु इन्होंने जिस कार्यके लिये मेरे सामने प्रतिज्ञा की है, उसका तुम्हें अवश्य पालन करना चाहिये ॥ २१ ॥
एष मह्यं वरं दत्त्वा पुरा मामभिपूज्य च ।
स पश्चात् तप्यते राजा यथान्यः प्राकृतस्तथा ॥ २२ ॥
' इन्होंने पहले तो मेरा सत्कार करते हुए मुझे मुँहमाँगा वरदान दे दिया और अब ये दूसरे गँवार मनुष्योंकी भाँति उसके लिये पश्चात्ताप करते हैं ॥ २२ ॥
अतिसृज्य ददानीति वरं मम विशाम्पतिः ।
स निरर्थं गतजले सेतुं बन्धितुमिच्छति ॥ २३ ॥
‘ ये प्रजानाथ पहले ‘ मैं दूँगा ' - ऐसी प्रतिज्ञा करके मुझे वर दे चुके हैं और अब उसके निवारणके लिये व्यर्थ प्रयत्न कर रहे हैं, पानी निकल जानेपर उसे रोकनेके लिये बाँध बाँधनेकी निरर्थक चेष्टा करते हैं ॥ २३ ॥
धर्ममूलमिदं राम विदितं च सतामपि ।
तत् सत्यं न त्यजेद् राजा कुपितस्त्वत्कृते यथा ॥ २४ ॥
अष्टादशः सर्गः २८३ ' राम! सत्य ही धर्मकी जड़ है, यह सत्पुरुषोंका भी निश्चय है । कहीं ऐसा न हो कि ये महाराज तुम्हारे कारण मुझपर कुपित होकर अपने उस सत्यको ही छोड़ बैठें । जैसे भी इनके सत्यका पालन हो, वैसा तुम्हें करना चाहिये ॥ २४ ॥
यदि तद् वक्ष्यते राजा शुभं वा यदि वाशुभम् ।
करिष्यसि ततः सर्वमाख्यास्यामि पुनस्त्वहम् ॥ २५ ॥
' यदि राजा जिस बातको कहना चाहते हैं, वह शुभ हो या अशुभ, तुम सर्वथा उसका पालन करो तो मैं सारी बात पुनः तुमसे कहूँगी ॥२५ ॥
यदि त्वभिहितं राज्ञा त्वयि तन्न विपत्स्यते ।
ततोऽहमभिधास्यामि न ह्येष त्वयि वक्ष्यति ॥ २६ ॥
' यदि राजाकी कही हुई बात तुम्हारे कानों में पड़कर वहीं नष्ट न हो जाय – यदि तुम उनकी प्रत्येक आज्ञाका पालन कर सको तो मैं तुमसे सब कुछ खोलकर बता दूँगी, ये स्वयं तुमसे कुछ नहीं कहेंगे ' ॥
एतत् तु वचनं श्रुत्वा कैकेय्या समुदाहृतम् ।
उवाच व्यथितो रामस्तां देवीं नृपसंनिधौ ॥ २७ ॥
कैकेयीकी कही हुई यह बात सुनकर श्रीरामके मनमें बड़ी व्यथा हुई । उन्होंने राजाके समीप ही देवी कैकेयीसे इस प्रकार कहा— ॥ २७ ॥
अहो धिङ् नार्हसे देवि वक्तुं मामीदृशं वचः ।
अहं हि वचनाद् राज्ञः पतेयमपि पावके ॥ २८ ॥
भक्षयेयं विषं तीक्ष्णं पतेयमपि चार्णवे ।
नियुक्तो गुरुणा पित्रा नृपेण च हितेन च ॥ २ ९ ॥
तद् ब्रूहि वचनं देवि राज्ञो यदभिकांक्षितम् ।
करिष्ये प्रतिजाने च रामो द्विर्नाभिभाषते ॥ ३० ॥
' अहो! धिक्कार है! देवि! तुम्हें मेरे प्रति ऐसी बात मुँहसे नहीं निकालनी चाहिये । मैं महाराजके कहनेसे आगमें भी कूद सकता हूँ, तीव्र विषका भी भक्षण कर सकता हूँ और समुद्रमें भी गिर सकता हूँ! महाराज मेरे गुरु, पिता और हितैषी हैं, मैं उनकी आज्ञा पाकर क्या नहीं कर सकता? इसलिये देवि! राजाको जो अभीष्ट है, वह
बात मुझे बताओ! मैं प्रतिज्ञा करता हूँ, उसे पूर्ण करूँगा ।
राम दो तरहकी बात नहीं करता है ' ॥ २८-३० ॥
तमार्जवसमायुक्तमनार्या सत्यवादिनम् ।
उवाच रामं कैकेयी वचनं भृशदारुणम् ॥३१ ॥
श्रीराम सरल स्वभावसे युक्त और सत्यवादी थे, उनकी बात सुनकर अनार्या कैकेयीने अत्यन्त दारुण । वचन कहना आरम्भ किया —॥३१ ॥
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२८४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे
पुरा देवासुरे युद्धे पित्रा ते मम राघव ।
रक्षितेन वरौ दत्तौ सशल्येन महारणे ॥ ३२ ॥
' रघुनन्दन! पहलेकी बात है, देवासुरसंग्राममें तुम्हारे पिता शत्रुओंके बाणोंसे बिंध गये थे, उस महासमरमें मैंने इनकी रक्षा की थी, उससे प्रसन्न होकर इन्होंने मुझे दो वर दिये थे ॥ ३२ ॥
तत्र मे याचितो राजा भरतस्याभिषेचनम् ।
गमनं दण्डकारण्ये तव चाद्यैव राघव ॥ ३३ ॥
' राघव! उन्हींमेंसे एक वरके द्वारा तो मैंने महाराजसे यह याचना की है कि भरतका राज्याभिषेक हो और दूसरा वर यह माँगा है कि तुम्हें आज ही दण्डकारण्यमें भेज दिया जाय ॥ ३३ ॥
यदि सत्यप्रतिज्ञं त्वं पितरं कर्तुमिच्छसि ।
आत्मानं च नरश्रेष्ठ मम वाक्यमिदं शृणु ॥ ३४ ॥
' नरश्रेष्ठ! यदि तुम अपने पिताको सत्यप्रतिज्ञ बनाना चाहते हो और अपनेको भी सत्यवादी सिद्ध करनेकी इच्छा रखते हो तो मेरी यह बात सुनो ॥ ३४ ॥
संनिदेशे पितुस्तिष्ठ यथानेन प्रतिश्रुतम् ।
त्वयारण्यं प्रवेष्टव्यं नव वर्षाणि पञ्च च ॥ ३५ ॥
' तुम पिताकी आज्ञाके अधीन रहो, जैसी इन्होंने प्रतिज्ञा की है, उसके अनुसार तुम्हें चौदह वर्षोंके लिये वनमें प्रवेश करना चाहिये ॥ ३५ ॥
भरतश्चाभिषिच्येत यदेतदभिषेचनम् ।
त्वदर्थे विहितं राज्ञा तेन सर्वेण राघव ॥ ३६ ॥
‘ रघुनन्दन! राजाने तुम्हारे लिये जो यह अभिषेकका सामान जुटाया है, उस सबके द्वारा यहाँ भरतका अभिषेक किया जाय ॥ ३६ ॥
सप्त सप्त च वर्षाणि दण्डकारण्यमाश्रितः ।
अभिषेकमिदं त्यक्त्वा जटाचीरधरो भव ॥ ३७ ॥
' और तुम इस अभिषेकको त्यागकर चौदह वर्षोंतक दण्डकारण्यमें रहते हुए जटा और चीर धारण करो ॥
भरतः कोसलपतेः प्रशास्तु वसुधामिमाम् ।
नानारत्नसमाकीर्णां सवाजिरथसंकुलाम् ॥ ३८ ॥
' कोसलनरेशकी इस वसुधाका, जो नाना प्रकार रत्नोंसे भरी - पूरी और घोड़े तथा रथोंसे व्याप्त है, भरत शासन करें ॥ ३८ ॥
एतेन त्वां नरेन्द्रोऽयं कारुण्येन समाप्लुतः ।
शोकैः संक्लिष्टवदनो न शक्नोति निरीक्षितुम् ॥ ३ ९ ॥
' बस इतनी ही बात है, ऐसा करनेसे तुम्हारे वियोगका कष्ट सहन करना पड़ेगा, यह सोचकर महाराज करुणामें डूब रहे हैं । इसी शोकसे इनका मुख सूख गया है और इन्हें तुम्हारी ओर देखनेका साहस नहीं होता ॥
एतत् कुरु नरेन्द्रस्य वचनं रघुनन्दन ।
सत्येन महता राम तारयस्व नरेश्वरम् ॥ ४० ॥
' रघुनन्दन राम! तुम राजाकी इस आज्ञाका पालन करो और इनके महान् सत्यकी रक्षा करके इन नरेशको संकटसे उबार लो ' ॥४० ॥
इतीव तस्यां परुषं वदन्त्यां न चैव रामः प्रविवेश शोकम् । प्रविव्यथे चापि महानुभावो राजा च पुत्रव्यसनाभितप्तः ॥ ४१ ॥
कैकेयीके इस प्रकार कठोर वचन कहनेपर भी श्रीरामके हृदयमें शोक नहीं हुआ, परंतु महानुभाव राजा दशरथ पुत्रके भावी वियोगजनित दुःखसे संतप्त एवं व्यथित हो उठे ॥ ४१ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डेऽष्टादशः सर्गः ॥ १८ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें अठारहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १८ ॥
एकोनविंशः सर्गः श्रीरामकी कैकेयीके साथ बातचीत और वनमें जाना स्वीकार करके उनका माता कौसल्याके पास आज्ञा लेनेके लिये जाना तदप्रियममित्रघ्नो वचनं मरणोपमम् । एवमस्तु गमिष्यामि वनं वस्तुमहं त्वितः । श्रुत्वा न विव्यथे रामः कैकेयीं चेदमब्रवीत् ॥ १ ॥ जटाचीरधरो राज्ञः प्रतिज्ञामनुपालयन् ॥ २ ॥
वह अप्रिय तथा मृत्युके समान कष्टदायक ' मा! बहुत अच्छा! ऐसा ही हो । मैं महाराजकी वचन सुनकर भी शत्रुसूदन श्रीराम व्यथित नहीं हुए । प्रतिज्ञाका पालन करनेके लिये जटा और चीर धारण करके उन्होंने कैकेयीसे इस प्रकार कहा— ॥१ ॥ वनमें रहनेके निमित्त अवश्य यहाँसे चला जाऊँगा ॥ २ ॥
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अयोध्याकाण्डे एकोनविंशः सर्गः २८५
इदं तु ज्ञातुमिच्छामि किमर्थं मां महीपतिः ।
नाभिनन्दति दुर्धर्षो यथापूर्वमरिंदमः ॥ ॥
‘ परंतु मैं यह जानना चाहता हूँ कि आज दुर्जय तथा शत्रुओंका दमन करनेवाले महाराज मुझसे पहलेकी तरह प्रसन्नतापूर्वक बोलते क्यों नहीं हैं? ॥ ३ ॥
मन्युर्न च त्वया कार्यों देवि ब्रूमि तवाग्रतः ।
यास्यामि भव सुप्रीता वनं चीरजटाधरः ॥ ४ ॥
' देवि! मैं तुम्हारे सामने ऐसी बात पूछ रहा हूँ, इसलिये तुम्हें क्रोध नहीं करना चाहिये । निश्चय चीर और जटा धारण करके मैं वनको चला जाऊँगा, तुम प्रसन्न रहो ॥४ ॥
हितेन गुरुणा पित्रा कृतज्ञेन नृपेण च ।
नियुज्यमानो विस्रब्धः किं न कुर्यामहं प्रियम् ॥ ५ ॥ ।
' राजा मेरे हितैषी, गुरु, पिता और कृतज्ञ हैं । इनकी आज्ञा होनेपर मैं इनका कौन - सा ऐसा प्रिय कार्य है, जिसे निःशङ्क होकर न कर सकूँ? ॥ ५ ॥
अलीकं मानसं त्वेकं हृदयं दहते मम ।
स्वयं यन्नाह मां राजा भरतस्याभिषेचनम् ॥ ६ ॥
' किंतु मेरे मनको एक ही हार्दिक दुःख अधिक जला रहा है कि स्वयं महाराजने मुझसे भरतके अभिषेककी बात नहीं कही ॥ ६ ॥
अहं हि सीतां राज्यं च प्राणानिष्टान् धनानि च ।
हृष्टो भ्रात्रे स्वयं दद्यां भरतायाप्रचोदितः ॥ ७ ॥
' मैं केवल तुम्हारे कहनेसे भी अपने भाई भरतके लिये इस राज्यको, सीताको, प्यारे प्राणोंको तथा सारी सम्पत्तिको भी प्रसन्नतापूर्वक स्वयं ही दे सकता हूँ ॥
किं पुनर्मनुजेन्द्रेण स्वयं पित्रा प्रचोदितः ।
तव च प्रियकामार्थं प्रतिज्ञामनुपालयन् ॥ ८ ॥
' फिर यदि स्वयं महाराज- मेरे पिताजी आज्ञा दें और वह भी तुम्हारा प्रिय कार्य करनेके लिये, तो मैं प्रतिज्ञाका पालन करते हुए उस कार्यको क्यों नहीं करूँगा? ॥८ ॥
तथाश्वासय ह्रीमन्तं किं त्विदं यन्महीपतिः ।
वसुधासक्तनयनो मन्दमश्रूणि मुञ्चति ॥ ९ ॥
' तुम मेरी ओरसे विश्वास दिलाकर इन लज्जाशील महाराजको आश्वासन दो । ये पृथ्वीनाथ पृथ्वीकी ओर दृष्टि किये धीरे - धीरे आँसू क्यों बहा रहे हैं? ॥ ९ ॥
गच्छन्तु चैवानयितुं दूताः शीघ्रजवैर्हयैः ।
भरतं मातुलकुलादद्यैव नृपशासनात् ॥ १०॥
' आज ही महाराजकी आज्ञासे दूत शीघ्रगामी घोड़ोंपर सवार होकर भरतको मामाके यहाँसे बुलाने के लिये चले जायँ ॥ १० ॥
दण्डकारण्यमेषोऽहं गच्छाम्येव हि सत्वरः ।
अविचार्य पितुर्वाक्यं समा वस्तुं चतुर्दश ॥ ११ ॥
' मैं अभी पिताकी बातपर कोई विचार न करके चौदह वर्षोंतक वनमें रहनेके लिये तुरंत दण्डकारण्यको चला ही जाता हूँ ॥ ११ ॥
सा हृष्टा तस्य तद् वाक्यं श्रुत्वा रामस्य कैकयी ।
प्रस्थानं श्रद्दधाना सा त्वरयामास राघवम् ॥ १२ ॥
श्रीरामकी वह बात सुनकर कैकेयी बहुत प्रसन्न हुई । उसे विश्वास हो गया कि ये वनको चले जायँगे । अतः श्रीरामको जल्दी जानेकी प्रेरणा देती हुई वह बोली – ॥ १२ ॥
एवं भवतु यास्यन्ति दूताः शीघ्रजवैर्हयैः ।
भरतं मातुलकुलादिहावर्तयितुं नराः ॥ १३ ॥
' तुम ठीक कहते हो, ऐसा ही होना चाहिये । भरतको मामाके यहाँसे बुला लानेके लिये दूतलोग शीघ्रगामी घोड़ोंपर सवार होकर अवश्य जायँगे ॥ १३ ॥
तव त्वहं क्षमं मन्ये नोत्सुकस्य विलम्बनम् ।
राम तस्मादितः शीघ्रं वनं त्वं गन्तुमर्हसि ॥१४ ॥
' परंतु राम! तुम वनमें जानेके लिये स्वयं ही उत्सुक जान पड़ते हो; अतः तुम्हारा विलम्ब करना मैं ठीक नहीं समझती । जितना शीघ्र सम्भव हो, तुम्हें यहाँसे वनको चल देना चाहिये ॥ १४ ॥
व्रीडान्वितः स्वयं यच्च नृपस्त्वां नाभिभाषते ।
नैतत् किंचिन्नरश्रेष्ठ मन्युरेषोऽपनीयताम् ॥ १५ ॥
' नरश्रेष्ठ! राजा लज्जित होनेके कारण जो स्वयं
तुमसे नहीं कहते हैं, यह कोई विचारणीय बात नहीं है ।
अतः इसका दुःख तुम अपने मनसे निकाल दो ॥ १५ ॥
यावत्त्वं न वनं यातः पुरादस्मादतित्वरम् ।
पिता तावन्न ते राम स्नास्यते भोक्ष्यतेऽपि वा ॥ १६ ॥
' श्रीराम! तुम जबतक अत्यन्त उतावलीके साथ इस नगरसे वनको नहीं चले जाते, तबतक तुम्हारे पिता स्नान अथवा भोजन नहीं करेंगे ' ॥ १६ ॥
धिक्कष्टमिति निःश्वस्य राजा शोकपरिप्लुतः ।
मूच्छितो न्यपतत् तस्मिन् पर्यङ्के हेमभूषिते ॥ १७ ॥
कैकेयीकी यह बात सुनकर शोकमें डूबे हुए राजा दशरथ लंबी साँस खींचकर बोले- ' धिक्कार है! हाय! बड़ा कष्ट हुआ! ' इतना कहकर वे मूर्च्छित हो उस । सुवर्णभूषित पलंगपर गिर पड़े ॥१७ ॥
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२८६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे
रामोऽप्युत्थाप्य राजानं कैकेय्याभिप्रचोदितः ।
कशयेव हतो वाजी वनं गन्तुं कृतत्वरः ॥ १८ ॥ ।
उस समय श्रीरामने राजाको उठाकर बैठा दिया और कैकेयीसे प्रेरित हो कोड़ेकी चोट खाये हुए घोड़ेकी भाँति वे शीघ्रतापूर्वक वनको जानेके लिये उतावले हो उठे ॥ १८ ॥
तदप्रियमनार्याया वचनं दारुणोदयम् ।
श्रुत्वा गतव्यथो रामः कैकेयीं वाक्यमब्रवीत् ॥ १ ९ ॥
अनार्या कैकेयीके उस अप्रिय एवं दारुण वचनको सुनकर भी श्रीरामके मनमें व्यथा नहीं हुई । वे कैकेयीसे बोले - ॥ १ ९ ॥
नाहमर्थप देवि लोकमावस्तुमुत्सहे ।
विद्धि मामृषिभिस्तुल्यं विमलं धर्ममास्थितम् ॥ २० ॥
' देवि! मैं धनका उपासक होकर संसारमें नहीं रहना चाहता । तुम विश्वास रखो! मैंने भी ऋषियोंकी ही भाँति निर्मल धर्मका आश्रय ले रखा है ॥ २० ॥
यत् तत्रभवतः किंचिच्छक्यं कर्तुं प्रियं मया ।
प्राणानपि परित्यज्य सर्वथा कृतमेव तत् ॥ २१ ॥
' पूज्य पिताजीका जो भी प्रिय कार्य मैं कर सकता हूँ, उसे प्राण देकर भी करूँगा । तुम उसे सर्वथा मेरे द्वारा हुआ ही समझो ॥ २१ ॥
न ह्यतो धर्मचरणं किंचिदस्ति महत्तरम् ।
यथा पितरि शुश्रूषा तस्य वा वचनक्रिया ॥ २२ ॥
‘ पिताकी सेवा अथवा उनकी आज्ञाका पालन करना, जैसा महत्त्वपूर्ण धर्म है, उससे बढ़कर संसारमें दूसरा कोई धर्माचरण नहीं है ॥ २२ ॥
अनुक्तोऽप्यत्रभवता भवत्या वचनादहम् ।
वने वत्स्यामि विजने वर्षाणीह चतुर्दश ॥ २३ ॥
' यद्यपि पूज्य पिताजीने स्वयं मुझसे नहीं कहा है, तथापि मैं तुम्हारे ही कहनेसे चौदह वर्षोंतक इस भूतलपर निर्जन वनमें निवास करूँगा ॥ २३ ॥
न नूनं मयि कैकेय किंचिदाशंससे गुणान् ।
यद् राजानमवोचस्त्वं ममेश्वरतरा सती ॥ २४ ॥
' कैकेयि! तुम्हारा मुझपर पूरा अधिकार है । मैं तुम्हारी प्रत्येक आज्ञाका पालन कर सकता हूँ; फिर भी तुमने स्वयं मुझसे न कहकर इस कार्यके लिये महाराजसे कहा - इनको कष्ट दिया । इससे जान पड़ता है कि तुम मुझमें कोई गुण नहीं देखती हो ॥ २४ ॥
यावन्मातरमापृच्छे सीतां चानुनयाम्यहम् ।
ततोऽद्यैव गमिष्यामि दण्डकानां महद् वनम् ॥ २५ ॥
' अच्छा! अब मैं माता कौसल्यासे आज्ञा ले लूँ और सीताको भी समझा - बुझा लूँ, इसके बाद आज ही विशाल दण्डकवनकी यात्रा करूँगा ॥ २५ ॥
भरतः पालयेद् राज्यं शुश्रूषेच्च पितुर्यथा ।
तथा भवत्या कर्तव्यं स हि धर्मः सनातनः ॥ २६ ॥
' तुम ऐसा प्रयत्न करना, जिससे भरत इस राज्यका पालन और पिताजीकी सेवा करते रहें; क्योंकि यही सनातन धर्म है ' ॥ २६ ॥
रामस्य तु वचः श्रुत्वा भृशं दुःखगतः पिता ।
शोकादशक्नुवन् वक्तुं प्ररुरोद महास्वनम् ॥ २७ ॥
श्रीरामका यह वचन सुनकर पिताको बहुत दुःख हुआ । वे शोकके आवेगसे कुछ बोल न सके, केवल फूट - फूटकर रोने लगे ॥२७ ॥
वन्दित्वा चरणौ राज्ञो विसंज्ञस्य पितुस्तदा ।
कैकेय्याश्चाप्यनार्यांया निष्पपात महाद्युतिः ॥ २८ ॥
महातेजस्वी श्रीराम उस समय अचेत पड़े हुए पिता महाराज दशरथ तथा अनार्या कैकेयीके भी चरणोंमें प्रणाम करके उस भवनसे निकले ॥ २८ ॥
स रामः पितरं कृत्वा कैकेयीं च प्रदक्षिणम् ।
निष्क्रम्यान्तःपुरात् तस्मात् स्वं ददर्श सुहृज्जनम् ॥ २ ९ ॥
पिता दशरथ और माता कैकेयीकी परिक्रमा करके उस अन्तःपुरसे बाहर निकलकर श्रीराम अपने सुहृदोंसे मिले ॥ २ ९ ॥
तं बाष्पपरिपूर्णाक्षः पृष्ठतोऽनुजगाम ह ।
। लक्ष्मणः परमक्रुद्धः सुमित्रानन्दवर्धनः ॥ ३० ॥
सुमित्राका आनन्द बढ़ानेवाले लक्ष्मण उस अन्यायको देखकर अत्यन्त कुपित हो उठे थे, तथापि दोनों नेत्रोंमें आँसू भरकर वे चुपचाप श्रीरामचन्द्रजीके पीछे - पीछे चले गये ॥ ३० ॥
आभिषेचनिकं भाण्डं कृत्वा रामः प्रदक्षिणम् ।
शनैर्जगाम सापेक्षो दृष्टिं तत्राविचालयन् ॥ ३१ ॥
श्रीरामचन्द्रजीके मनमें अब वन जानेकी आकांक्षाका उदय हो गया था, अतः अभिषेकके लिये एकत्र की हुई सामग्रियोंकी प्रदक्षिणा करते हुए वे धीरे - धीरे आगे बढ़ गये । उनकी ओर उन्होंने दृष्टिपात नहीं किया ॥ ३१ ॥
न चास्य महतीं लक्ष्मीं राज्यनाशोऽपकर्षति ।
लोककान्तस्य कान्तत्वाच्छीतरश्मेरिव क्षयः ॥ ३२ ॥
श्रीराम अविनाशी कान्तिसे युक्त थे, इसलिये उस समय राज्यका न मिलना उन लोककमनीय श्रीरामकी महती शोभामें कोई अन्तर न डाल सका; जैसे
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अयोध्याकाण्डे विंशः सर्गः २८७
चन्द्रमाका क्षीण होना उसकी सहज शोभाका अपकर्ष ।
नहीं कर पाता है ॥ ३२ ॥
न वनं गन्तुकामस्य त्यजतश्च वसुंधराम् ।
सर्वलोकातिगस्येव लक्ष्यते चित्तविक्रिया ॥ ३३ ॥
वे वनमें जानेको उत्सुक थे और सारी पृथ्वीका राज्य छोड़ रहे थे; फिर भी उनके चित्तमें सर्वलोकातीत जीवन्मुक्त महात्माकी भाँति कोई विकार नहीं देखा गया ॥ ३३ ॥
प्रतिषिध्य शुभं छत्रं व्यजने च स्वलंकृते ।
विसर्जयित्वा स्वजनं रथं पौरांस्तथा जनान् ॥ ३४ ॥
धारयन् मनसा दुःखमिन्द्रियाणि निगृह्य च ।
प्रविवेशात्मवान् वेश्म मातुरप्रियशंसिवान् ॥ ३५ ॥
श्रीरामने अपने ऊपर सुन्दर छत्र लगानेकी मनाही कर दी । डुलाये जानेवाले सुसज्जित चँवर भी रोक दिये । वे रथको लौटाकर स्वजनों तथा पुरवासी मनुष्योंको भी बिदा करके ( आत्मीय जनोंके दुःखसे होनेवाले ) दुःखको मनमें ही दबाकर इन्द्रियोंको काबूमें करके यह अप्रिय समाचार सुनानेके लिये माता कौसल्याके महलमें गये । उस समय उन्होंने मनको पूर्णतः वशमें कर रखा था ॥ ३४-३५ ॥
सर्वोऽप्यभिजनः श्रीमान् श्रीमतः सत्यवादिनः ।
नालक्षयत रामस्य कंचिदाकारमानने ॥ ३६ ॥
जो शोभाशाली मनुष्य सदा सत्यवादी श्रीमान् रामके निकट रहा करते थे, उन्होंने भी उनके मुखपर कोई विकार नहीं देखा ॥ ३६ ॥
उचितं च महाबाहुर्न जहाँ हर्षमात्मवान् ।
शारदः समुदीर्णांशुश्चन्द्रस्तेज इवात्मजम् ॥ ३७ ॥
मनको वशमें रखनेवाले महाबाहु श्रीरामने अपनी स्वाभाविक प्रसन्नता उसी तरह नहीं छोड़ी थी, जैसे शरद् - कालका उद्दीप्त किरणोंवाला चन्द्रमा अपने सहज तेजका परित्याग नहीं करता है ॥ ३७ ॥
वाचा मधुरया रामः सर्वं सम्मानयञ्जनम् ।
मातुः समीपं धर्मात्मा प्रविवेश महायशाः ॥ ३८ ॥
महायशस्वी धर्मात्मा श्रीराम मधुर वाणीसे सब लोगोंका सम्मान करते हुए अपनी माताके समीप गये ॥ ३८ ॥
तं गुणैः समतां प्राप्तो भ्राता विपुलविक्रमः ।
सौमित्रिरनुवव्राज धारयन् दुःखमात्मजम् ॥ ३ ९ ॥
उस समय गुणोंमें श्रीरामकी ही समानता करनेवाले महापराक्रमी भ्राता सुमित्राकुमार लक्ष्मण भी अपने मानसिक दुःखको मनमें ही धारण किये हुए श्रीरामके पीछे - पीछे गये ॥ ३ ९ ॥ प्रविश्य वेश्मातिभृशं मुदा युतं समीक्ष्य तां चार्थविपत्तिमागताम् । न चैव रामोऽत्र जगाम विक्रियां सुहृज्जनस्यात्मविपत्तिशङ्कया ॥ ४० ॥
अत्यन्त आनन्दसे भरे हुए उस भवनमें प्रवेश करके लौकिक दृष्टिसे अपने अभीष्ट अर्थका विनाश हुआ देखकर भी हितैषी सुहृदोंके प्राणोंपर संकट आ जानेकी आशङ्कासे श्रीरामने यहाँ अपने मुखपर कोई विकार नहीं प्रकट होने दिया ॥ ४० ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकोनविंशः सर्गः ॥ १ ९ ॥ इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें उन्नीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १ ९ ॥ विंशः सर्गः राजा दशरथकी अन्य रानियोंका विलाप, श्रीरामका कौसल्याजीके भवनमें जाना और उन्हें अपने वनवासकी बात बताना, कौसल्याका अचेत होकर गिरना और श्रीरामके उठा देनेपर उनकी ओर देखकर विलाप करना
तस्मिंस्तु पुरुषव्याघ्रे निष्क्रामति कृताञ्जलौ ।
आर्तशब्दो महान् जज्ञे स्त्रीणामन्तः पुरे तदा ॥ १ ॥
उधर पुरुषसिंह श्रीराम हाथ जोड़े हुए ज्यों ही कैकेयीके महलसे बाहर निकलने लगे, त्यों ही अन्तःपुरमें रहनेवाली राजमहिलाओंका महान् आर्तनाद प्रकट हुआ ॥
कृत्येष्वचोदितः पित्रा सर्वस्यान्तःपुरस्य च ।
गतिश्च शरणं चासीत् स रामोऽद्य प्रवत्स्यति ॥ २ ॥
वे कह रही थीं- ' हाय! जो पिताके आज्ञा न देनेपर भी समस्त अन्तः पुरके आवश्यक कार्योंमें स्वतः संलग्न रहते थे, जो हमलोगोंके सहारे और रक्षक थे, वे श्रीराम आज वनको चले जायँगे ॥२ ॥
कौसल्यायां यथा युक्तो जनन्यां वर्तते सदा ।
तथैव वर्ततेऽस्मासु जन्मप्रभृति राघवः ॥ ३ ॥
' वे रघुनाथजी जन्मसे ही अपनी माता कौसल्याके
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२८८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे
प्रति सदा जैसा बर्ताव करते थे, वैसा ही हमारे साथ भी ।
करते थे ॥३ ॥
न क्रुध्यत्यभिशप्तोऽपि क्रोधनीयानि वर्जयन् ।
क्रुद्धान् प्रसादयन् सर्वान् स इतोऽद्य प्रवत्स्यति ॥ ४ ॥
' जो कठोर बात कह देनेपर भी कुपित नहीं होते थे, दूसरोंके मनमें क्रोध उत्पन्न करनेवाली बातें नहीं बोलते थे तथा जो सभी रूठे हुए व्यक्तियोंको मना लिया करते थे, वे ही श्रीराम आज यहाँसे वनको चले जायँगे ॥
अबुद्धिर्बत नो राजा जीवलोकं चरत्ययम् ।
यो गतिं सर्वभूतानां परित्यजति राघवम् ॥ ५ ॥
' बड़े खेदकी बात है कि हमारे महाराजकी बुद्धि मारी गयी । ये इस समय सम्पूर्ण जीव - जगत्का विनाश करनेपर तुले हुए हैं, तभी तो ये समस्त प्राणियोंके जीवनाधार श्रीरामका परित्याग कर रहे हैं ' ॥ ५ ॥
इति सर्वा महिष्यस्ता विवत्सा इव धेनवः ।
पतिमाचुकुशुश्चापि सस्वनं चापि चुकुशुः ॥ ६ ॥
इस प्रकार समस्त रानियाँ अपने पतिको कोसने लगीं और बछड़ोंसे बिछुड़ी हुई गौओंकी तरह उच्च स्वरसे क्रन्दन करने लगीं ॥ ६ ॥
स हि चान्तःपुरे घोरमार्तशब्दं महीपतिः ।
पुत्रशोकाभिसंतप्तः श्रुत्वा व्यालीयतासने ॥ ७ ॥
अन्तःपुरका वह भयङ्कर आर्तनाद सुनकर महाराज दशरथने पुत्रशोकसे संतप्त हो लज्जाके मारे बिछौनेमें ही अपनेको छिपा लिया ॥ ७ ॥
रामस्तु भृशमायस्तो निःश्वसन्निव कुञ्जरः ।
जगाम सहितो भ्रात्रा मातुरन्तःपुरं वशी ॥ ८ ॥
इधर जितेन्द्रिय श्रीरामचन्द्रजी स्वजनोंके दुःखसे अधिक खिन्न होकर हाथीके समान लंबी साँस खींचते हुए भाई लक्ष्मणके साथ माताके अन्तः पुरमें गये ॥ ८ ॥
सोऽपश्यत् पुरुषं तत्र वृद्धं परमपूजितम् ।
उपविष्टं गृहद्वारि तिष्ठतश्चापरान् बहून् ॥ ९ ॥
वहीँ उन्होंने उस घरके दरवाजेपर एक परम पूजित वृद्ध पुरुषको बैठा हुआ देखा और दूसरे भी बहुत - से मनुष्य वहाँ खड़े दिखायी दिये ॥ ९ ॥
दृष्ट्वैव तु तदा रामं ते सर्वे समुपस्थिताः ।
जयेन जयतां श्रेष्ठं वर्धयन्ति स्म राघवम् ॥ १० ॥
वे सब - के - सब विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ रघुनन्दन श्रीरामको देखते ही जय - जयकार करते हुए उनकी सेवामें उपस्थित हुए और उन्हें बधाई देने लगे ॥ १० ॥
प्रविश्य प्रथमां कक्ष्यां द्वितीयायां ददर्श सः ।
ब्राह्मणान् वेदसम्पन्नान् वृद्धान् राज्ञाभिसत्कृतान् ॥ ११ ॥
पहली ड्योढ़ी पार करके जब वे दूसरीमें पहुँचे, तब वहाँ उन्हें राजाके द्वारा सम्मानित बहुत - से वैद ब्राह्मण दिखायी दिये ॥ ११ ॥
प्रणम्य रामस्तान् वृद्धांस्तृतीयायां ददर्श सः ।
स्त्रियो बालाश्च वृद्धाश्च द्वाररक्षणतत्पराः ॥१२ ॥
उन वृद्ध ब्राह्मणोंको प्रणाम करके श्रीरामचन्द्रजी जब तीसरी ड्योढ़ीमें पहुँचे, तब वहाँ उन्हें द्वाररक्षा कार्यमें लगी हुई बहुत - सी नववयस्का एवं वृद्ध अवस्थावाली स्त्रियाँ दिखायी दीं ॥ १२ ॥
वर्धयित्वा प्रहृष्टास्ताः प्रविश्य च गृहं स्त्रियः ।
न्यवेदयन्त त्वरितं राममातुः प्रियं तदा ॥ १३ ॥
उन्हें देखकर उन स्त्रियोंको बड़ा हर्ष हुआ । श्रीरामको बधाई देकर उन स्त्रियोंने तत्काल महलके भीतर प्रवेश किया और तुरंत ही श्रीरामचन्द्रजीकी माताको उनके आगमनका प्रिय समाचार सुनाया ॥१३ ॥
कौसल्यापि तदा देवी रात्रिं स्थित्वा समाहिता ।
प्रभाते चाकरोत् पूजां विष्णोः पुत्रहितैषिणी ॥१४ ॥
उस समय देवी कौसल्या पुत्रकी मङ्गलकामनासे रातभर जागकर सबेरे एकाग्रचित्त हो भगवान् विष्णुकी पूजा कर रही थीं ॥ १४ ॥
सा क्षौमवसना हृष्टा नित्यं व्रतपरायणा ।
अग्निं जुहोति स्म तदा मन्त्रवत् कृतमङ्गला ॥। १५ ॥
वे रेशमी वस्त्र पहनकर बड़ी प्रसन्नताके साथ निरन्तर व्रतपरायण होकर मङ्गलकृत्य पूर्ण करने पश्चात् मन्त्रोच्चारणपूर्वक उस समय अग्निमें आहुति दे रही थीं ॥ १५ ॥
प्रविश्य तु तदा रामो मातुरन्तःपुरं शुभम् ।
ददर्श मातरं तत्र हावयन्तीं हुताशनम् ॥ १६ ॥
उसी समय श्रीरामने माताके शुभ अन्तःपुरमें प्रवेश करके वहाँ माताको देखा । वे अग्निमें हवन करा रही थीं ॥ १६ ॥
देवकार्यनिमित्तं च तत्रापश्यत् समुद्यतम् ।
दध्यक्षतघृतं चैव मोदकान् हविषस्तथा ॥ १७ ॥
लाजान् माल्यानि शुक्लानि पायसं कृसरं तथा ।
समिधः पूर्णकुम्भांश्च ददर्श रघुनन्दनः ॥ १८ ॥
रघुनन्दनने देखा तो वहाँ देव - कार्यके लिये बहुत-सी सामग्री संग्रह करके रखी हुई है । दही, अक्षत, घी, मोदक, हविष्य, धानका लावा, सफेद माला, खीर,