वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ — पृष्ठ 331–340
वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 331–340
पृष्ठ 331
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अयोध्याकाण्डे त्रिंशः सर्गः ३१ ९
स मामनादाय वनं न त्वं प्रस्थितुमर्हसि ।
तपो वा यदि वारण्यं स्वर्गो वा स्यात् त्वया सह ॥ १० ॥
' इसलिये आपका मुझे अपने साथ लिये बिना वनकी ओर प्रस्थान करना उचित नहीं है । यदि तपस्या करनी हो, वनमें रहना हो अथवा स्वर्गमें जाना हो तो सभी जगह मैं आपके साथ रहना चाहती हूँ ॥ १० ॥
न च मे भविता तत्र कश्चित् पथि परिश्रमः ।
पृष्ठतस्तव गच्छन्त्या विहारशयनेष्विव ॥ ११ ॥
' जैसे बगीचेमें घूमने और पलंगपर सोनेमें कोई कष्ट नहीं होता, उसी प्रकार आपके पीछे - पीछे वनके मार्गपर चलनेमें भी मुझे कोई परिश्रम नहीं जान पड़ेगा ॥
कुशकाशशरेषीका ये च कण्टकिनो द्रुमाः ।
तूलाजिनसमस्पर्शा मार्गे मम सह त्वया ॥ १२ ॥
' रास्तेमें जो कुश - कास, सरकंडे, सींक और काँटेदार वृक्ष मिलेंगे, उनका स्पर्श मुझे आपके साथ रहनेसे रूई और मृगचर्मके समान सुखद प्रतीत होगा ॥
महावातसमुद्भूतं यन्मामवकरिष्यति ।
रजो रमण तन्मन्ये परार्घ्यमिव चन्दनम् ॥ १३ ॥
‘ प्राणवल्लभ! प्रचण्ड आँधीसे उड़कर मेरे शरीरपर जो धूल पड़ेगी, उसे मैं उत्तम चन्दनके समान समझँगी ॥
शाद्वलेषु यदा शिश्ये वनान्तर्वनगोचरा ।
कुथास्तरणयुक्तेषु किं स्यात् सुखतरं ततः ॥ १४ ॥
' जब वनके भीतर रहूँगी, तब आपके साथ घासोंपर भी सो लूँगी । रंग - बिरंगे कालीनों और मुलायम बिछौनोंसे युक्त पलंगों पर क्या उससे अधिक सुख हो सकता है? ॥ १४ ॥
पत्रं मूलं फलं यत्तु अल्पं वा यदि वा बहु ।
दास्यसे स्वयमाहृत्य तन्मेऽमृतरसोपमम् ॥ १५ ॥
' आप अपने हाथसे लाकर थोड़ा या बहुत फल, मूल या पत्ता, जो कुछ दे देंगे, वही मेरे लिये अमृत-रसके समान होगा ॥ १५ ॥
न मातुर्न पितुस्तत्र स्मरिष्यामि न वेश्मनः ।
आर्तवान्युपभुञ्जाना पुष्पाणि च फलानि च ॥ १६ ॥
' ऋतुके अनुकूल जो भी फल - फूल प्राप्त होंगे, उन्हें खाकर रहूँगी और माता - पिता अथवा महलको कभी याद नहीं करूँगी ॥ १६ ॥
न च तत्र ततः किंचिद् द्रष्टुमर्हसि विप्रियम् ।
मत्कृते न च ते शोको न भविष्यामि दुर्भरा ॥ १७ ॥
' वहाँ रहते समय मेरा कोई भी प्रतिकूल व्यवहार आप नहीं देख सकेंगे । मेरे लिये आपको कोई कष्ट नहीं उठाना पड़ेगा । मेरा निर्वाह आपके लिये दूभर नहीं होगा ॥ १७ ॥
यस्त्वया सह स स्वर्गों निरयो यस्त्वया विना ।
इति जानन् परां प्रीतिं गच्छ राम मया सह ॥ १८ ॥
‘ आपके साथ जहाँ भी रहना पड़े, वही मेरे लिये स्वर्ग है और आपके बिना जो कोई भी स्थान हो, वह मेरे लिये नरकके समान है । श्रीराम! मेरे इस निश्चयको जानकर आप मेरे साथ अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक वनको चलें ॥ १८ ॥
अथ मामेवमव्यग्रां वनं नैव नयिष्यसे ।
विषमद्यैव पास्यामि मा वशं द्विषतां गमम् ॥ १ ९ ॥
' मुझे वनवासके कष्टसे कोई घबराहट नहीं है । यदि इस दशामें भी आप अपने साथ मुझे वनमें नहीं ले चलेंगे तो मैं आज ही विष पी लूँगी, परंतु शत्रुओंके अधीन होकर नहीं रहूँगी ॥ १ ९ ॥
पश्चादपि हि दुःखेन मम नैवास्ति जीवितम् ।
। उज्झितायास्त्वया नाथ तदैव मरणं वरम् ॥ २० ॥
नाथ! यदि आप मुझे त्यागकर वनको चले जायँगे तो पीछे भी इस भारी दुःखके कारण मेरा जीवित रहना सम्भव नहीं है; ऐसी दशामें मैं इसी समय आपके जाते ही अपना प्राण त्याग देना अच्छा समझती हूँ ॥ २० ॥
इमं हि सहितुं शोकं मुहूर्तमपि नोत्सहे ।
किं पुनर्दश वर्षाणि त्रीणि चैकं च दुःखिता ॥ २१ ॥
' आपके विरहका यह शोक मैं दो घड़ी भी नहीं सह सकूँगी । फिर मुझ दुःखियासे यह चौदह वर्षोंतक कैसे सहा जायगा? ' ॥ २१ ॥
इति सा शोकसंतप्ता विलप्य करुणं बहु ।
चुक्रोश पतिमायस्ता भृशमालिङ्गय सस्वरम् ॥ २२ ॥
इस प्रकार बहुत देरतक करुणाजनक विलाप करके शोकसे संतप्त हुई सीता शिथिल हो अपने पतिको जोरसे पकड़कर — उनका गाढ़ आलिङ्गन करके फूट-फूटकर रोने लगीं ॥ २२ ॥
सा विद्धा बहुभिर्वाक्यैर्दिग्धैरिव गजाङ्गना ।
चिरसंनियतं बाष्पं मुमोचाग्निमिवारणिः ॥ २३ ॥
जैसे कोई हथिनी विषमें बुझे हुए बहुसंख्यक बाणोंद्वारा घायल कर दी गयी हो, उसी प्रकार सीता श्रीरामचन्द्रजीके पूर्वोक्त अनेकानेक वचनोंद्वारा मर्माहत हो उठी थीं; अतः जैसे अरणी आग प्रकट करती है, उसी प्रकार वे बहुत देरसे रोके हुए आँसुओंको | बरसाने लगीं ॥ २३ ॥
पृष्ठ 332
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
३२० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे
तस्याः स्फटिकसंकाशं वारि संतापसम्भवम् ।
नेत्राभ्यां परिसुत्राव पङ्कजाभ्यामिवोदकम् ॥ २४ ॥
उनके दोनों नेत्रोंसे स्फटिकके समान निर्मल संतापजनित अश्रुजल झर रहा था, मानो दो कमलोंसे जलकी धारा गिर रही हो ॥ २४ ॥
तत्सितामलचन्द्राभं मुखमायतलोचनम् ।
पर्यशुष्यत बाष्पेण जलोद्धृतमिवाम्बुजम् ॥ २५ ॥
बड़े - बड़े नेत्रोंसे सुशोभित और पूर्णिमाके निर्मल चन्द्रमाके समान कान्तिमान् उनका वह मनोहर मुख संतापजनित तापके कारण पानीसे बाहर निकाले हुए कमलके समान सूख - सा गया था ॥ २५ ॥
तां परिष्वज्य बाहुभ्यां विसंज्ञामिव दुःखिताम् ।
उवाच वचनं रामः परिविश्वासयंस्तदा ॥ २६ ॥
सीताजी दुःखके मारे अचेत -सी हो रही थीं । श्रीरामचन्द्रजीने उन्हें दोनों हाथोंसे सँभालकर हृदयसे लगा लिया और उस समय उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा- ॥ २६ ॥
न देवि बत दुःखेन स्वर्गमप्यभिरोचये ।
नहि मेऽस्ति भयं किंचित् स्वयम्भोरिव सर्वतः ॥ २७ ॥
' देवि! तुम्हें दुःख देकर मुझे स्वर्गका सुख मिलता हो तो मैं उसे भी लेना नहीं चाहूँगा । स्वयम्भू ब्रह्माजीकी भाँति मुझे किसीसे किञ्चित् भी भय नहीं है ॥ २७ ॥
तव सर्वमभिप्रायमविज्ञाय शुभानने ।
वासं न रोचयेऽरण्ये शक्तिमानपि रक्षणे ॥ २८ ॥
' शुभानने! यद्यपि वनमें तुम्हारी रक्षा करनेके लिये मैं सर्वथा समर्थ हूँ तो भी तुम्हारे हार्दिक अभिप्रायको पूर्णरूपसे जाने बिना तुमको वनवासिनी बनाना मैं उचित नहीं समझता था ॥ २८ ॥
यत् सृष्टासि मया सार्धं वनवासाय मैथिलि ।
न विहातुं मया शक्या प्रीतिरात्मवता यथा ॥ २ ९ ॥
' मिथिलेशकुमारी! जब तुम मेरे साथ वनमें रहनेके लिये ही उत्पन्न हुई हो तो मैं तुम्हें छोड़ नहीं सकता, ठीक उसी तरह जैसे आत्मज्ञानी पुरुष अपनी स्वाभाविक प्रसन्नताका त्याग नहीं करते ॥ २ ९ ॥
धर्मस्तु गजनासोरु सद्भिराचरितः पुरा ।
तं चाहमनुवर्तिष्ये यथा सूर्य सुवर्चला ॥ ३० ॥
' हाथीकी सूँड़के समान जाँघवाली जनककिशोरी! पूर्वकालके सत्पुरुषोंने अपनी पत्नीके साथ रहकर जिस धर्मका आचरण किया था, उसीका मैं भी तुम्हारे साथ रहकर अनुसरण करूँगा तथा जैसे सुवर्चला ( संज्ञा ) अपने पति सूर्यका अनुगमन करती है, उसी प्रकार तुम भी मेरा अनुसरण करो ॥३० ॥
न खल्वहं न गच्छेयं वनं जनकनन्दिनि ।
वचनं तन्नयति मां पितुः सत्योपबृंहितम् ॥ ३१ ॥
‘ जनकनन्दिनि! यह तो किसी प्रकार सम्भव ही नहीं है कि मैं वनको न जाऊँ; क्योंकि पिताजीका वह सत्ययुक्त वचन ही मुझे वनकी ओर ले जा रहा है ॥
एष धर्मश्च सुश्रोणि पितुर्मातुश्च वश्यता ।
आज्ञां चाहं व्यतिक्रम्य नाहं जीवितुमुत्सहे ॥ ३२ ॥
' सुश्रोणि! पिता और माताकी आज्ञाके अधीन रहना पुत्रका धर्म है, इसलिये मैं उनकी आज्ञाका उल्लङ्घन करके जीवित नहीं रह सकता ॥ ३२ ॥
अस्वाधीनं कथं दैवं प्रकारैरभिराध्यते ।
स्वाधीनं समतिक्रम्य मातरं पितरं गुरुम् ॥ ३३ ॥
' जो अपनी सेवाके अधीन हैं, उन प्रत्यक्ष देवता माता, पिता एवं गुरुका उल्लङ्घन करके जो सेवाके अधीन नहीं है, उस अप्रत्यक्ष देवता दैवकी विभिन्न प्रकारसे किस तरह आराधना की जा सकती है ॥ ३३ ॥
यत्र त्र्यं त्रयो लोकाः पवित्रं तत्समं भुवि ।
नान्यदस्ति शुभापाङ्गे तेनेदमभिराध्यते ॥ ३४ ॥
' सुन्दर नेत्रप्रान्तवाली सीते! जिनकी आराधना करनेपर धर्म, अर्थ और काम तीनों प्राप्त होते हैं तथा तीनों लोकोंकी आराधना सम्पन्न हो जाती है, उन माता, पिता और गुरुके समान दूसरा कोई पवित्र देवता इस भूतलपर नहीं है । इसीलिये भूतलके निवासी इन तीनों देवताओंकी आराधना करते हैं ॥३४ ॥
न सत्यं दानमानौ वा यज्ञो वाप्याप्तदक्षिणाः ।
तथा बलकराः सीते यथा सेवा पितुर्मता ॥ ३५ ॥
' सीते! पिताकी सेवा करना कल्याणकी प्राप्तिका जैसा प्रबल साधन माना गया है, वैसा न सत्य है, न दान है, न मान है और न पर्याप्त दक्षिणावाले यज्ञ ही हैं ॥ ३५ ॥
स्वर्गों धनं वा धान्यं वा विद्या पुत्राः सुखानि च ।
गुरुवृत्त्यनुरोधेन न किंचिदपि दुर्लभम् ॥ ३६ ॥
' गुरुजनोंकी सेवाका अनुसरण करनेसे स्वर्ग, धन - धान्य, विद्या, पुत्र और सुख - कुछ भी दुर्लभ नहीं है ॥ ३६ ॥
देवगन्धर्वगोलोकान् ब्रह्मलोकांस्तथापरान् ।
प्राप्नुवन्ति महात्मानो मातापितृपरायणाः ॥ ३७ ॥
' माता - पिताकी सेवामें लगे रहनेवाले महात्मा
पृष्ठ 333
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अयोध्याकाण्डे
पुरुष देवलोक, गन्धर्वलोक, ब्रह्मलोक, गोलोक तथा ।
अन्य लोकोंको भी प्राप्त कर लेते हैं ॥ ३७ ॥
स मा पिता यथा शास्ति सत्यधर्मपथे स्थितः ।
तथा वर्तितुमिच्छामि स हि धर्मः सनातनः ॥ ३८ ॥
' इसीलिये सत्य और धर्मके मार्गपर स्थित रहनेवाले पूज्य पिताजी मुझे जैसी आज्ञा दे रहे हैं, मैं वैसा ही बर्ताव करना चाहता हूँ; क्योंकि वह सनातनधर्म है ॥
मम सन्ना मतिः सीते नेतुं त्वां दण्डकावनम् ।
वसिष्यामीति सा त्वं मामनुयातुं सुनिश्चिता ॥ ३ ९ ॥
' सीते! ' मैं आपके साथ वनमें निवास करूंगी ' ऐसा कहकर तुमने मेरे साथ चलनेका दृढ़ निश्चय कर लिया है, इसलिये तुम्हें दण्डकारण्य ले चलनेके सम्बन्धमें जो मेरा पहला विचार था, वह अब बदल गया है ॥ ३ ९ ॥
सा हि दिष्टानवद्याङ्गि वनाय मदिरेक्षणे ।
अनुगच्छस्व मां भीरु सहधर्मचरी भव ॥ ४० ॥
' मदभरे नेत्रोंवाली सुन्दरी! अब मैं तुम्हें वनमें चलनेके लिये आज्ञा देता हूँ । भीरु! तुम मेरी अनुगामिनी बनो और मेरे साथ रहकर धर्मका आचरण करो ॥ ४० ॥
सर्वथा सदृशं सीते मम स्वस्य कुलस्य च ।
व्यवसायमनुक्रान्ता कान्ते त्वमतिशोभनम् ॥ ४१ ॥
' प्राणवल्लभे सीते! तुमने मेरे साथ चलनेका जो यह परम सुन्दर निश्चय किया है, यह तुम्हारे और मेरे कुलके सर्वथा योग्य ही है ॥ ४१ ॥
आरभस्व शुभश्रोणि वनवासक्षमाः क्रियाः ।
नेदानीं त्वदृते सीते स्वर्गेऽपि मम रोचते ॥। ४२ ॥
' सुश्रोणि! अब तुम वनवासके योग्य दान आदि कर्म प्रारम्भ करो । सीते! इस समय तुम्हारे इस प्रकार दृढ़ निश्चय कर लेने पर तुम्हारे बिना स्वर्ग भी मुझे अच्छा नहीं लगता है ॥ ४२ ॥
एकत्रिंशः सर्गः ३२१
ब्राह्मणेभ्यश्च रत्नानि भिक्षुकेभ्यश्च भोजनम् ।
देहि चाशंसमानेभ्यः संत्वरस्व च मा चिरम् ॥ ४३ ॥
' ब्राह्मणोंको रत्नस्वरूप उत्तम वस्तुएँ दान करो और भोजन माँगनेवाले भिक्षुकोंको भोजन दो । शीघ्रता करो, विलम्ब नहीं होना चाहिये ॥ ४३ ॥
भूषणानि महार्हाणि वरवस्त्राणि यानि च ।
रमणीयाश्च ये केचित् क्रीडार्थाश्चाप्युपस्कराः ॥ ४४ ॥
शयनीयानि यानानि मम चान्यानि यानि च ।
देहि स्वभृत्यवर्गस्य ब्राह्मणानामनन्तरम् ॥ ४५ ॥
तुम्हारे पास जितने बहुमूल्य आभूषण हों, जो - जो अच्छे - अच्छे वस्त्र हों, जो कोई भी रमणीय पदार्थ हों तथा मनोरञ्जनकी जो - जो सुन्दर सामग्रियाँ हों, मेरे और तुम्हारे उपयोगमें आनेवाली जो उत्तमोत्तम शय्याएँ, सवारियाँ तथा अन्य वस्तुएँ हों, उनमेंसे ब्राह्मणोंको दान करनेके पश्चात् जो बचें उन सबको अपने सेवकोंको बाँट दो ' ॥ ४४-४५ ॥
अनुकूलं तु सा भर्तुर्ज्ञात्वा गमनमात्मनः ।
क्षिप्रं प्रमुदिता देवी दातुमेव प्रचक्रमे ॥ ४६ ॥
' स्वामीने वनमें मेरा जाना स्वीकार कर लिया-मेरा वनगमन उनके मनके अनुकूल हो गया ' यह जानकर देवी सीता बहुत प्रसन्न हुईं और शीघ्रतापूर्वक सब वस्तुओंका दान करनेमें जुट गयीं ॥ ४६ ॥
| ततः प्रहृष्टा प्रतिपूर्णमानसा यशस्विनी भर्तुरवेक्ष्य भाषितम् । धनानि रत्नानि च दातुमङ्गना प्रचक्रमे धर्मभृतां मनस्विनी ॥ ४७ ॥
तदनन्तर अपना मनोरथ पूर्ण हो जानेसे अत्यन्त हर्षमें भरी हुई यशस्विनी एवं मनस्विनी सीता देवी स्वामीके आदेशपर विचार करके धर्मात्मा ब्राह्मणोंको धन और रत्नोंका दान करनेके लिये उद्यत हो गयीं ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे त्रिंशः सर्गः ॥ ३० ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३० ॥
एकत्रिंशः सर्गः श्रीराम और लक्ष्मणका संवाद, श्रीरामकी आज्ञासे लक्ष्मणका सुहृदोंसे पूछकर और दिव्य आयुध लाकर वनगमनके लिये तैयार होना, श्रीरामका उनसे ब्राह्मणोंको धन बाँटनेका विचार व्यक्त करना एवं श्रुत्वा स संवादं लक्ष्मणः पूर्वमागतः । जिस समय श्रीराम और सीतामें बातचीत हो रही बाष्पपर्याकुलमुखः शोकं सोढुमशक्नुवन् ॥ १ ॥ | थी, लक्ष्मण वहाँ पहलेसे ही आ गये थे । उन दोनोंका
75 Srimad Valmiki Ramayan ( 1 ) _Section_12_1_Front
पृष्ठ 334
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
३२२ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे ऐसा संवाद सुनकर उनका मुखमण्डल आँसुओंसे भींग । गया । भाईके विरहका शोक अब उनके लिये भी असह्य हो उठा ॥ १ ॥
स भ्रातुश्चरणौ गाढं निपीड्य रघुनन्दनः ।
सीतामुवाचातियशां राघवं च महाव्रतम् ॥ २ ॥
रघुकुलको आनन्दित करनेवाले लक्ष्मणने ज्येष्ठ भ्राता श्रीरामचन्द्रजीके दोनों पैर जोरसे पकड़
लिये और अत्यन्त यशस्विनी सीता तथा महान् व्रतधारी ।
श्रीरघुनाथजीसे कहा - ॥२ ॥
यदि गन्तुं कृता बुद्धिर्वनं मृगगजायुतम् ।
अहं त्वानुगमिष्यामि वनमग्रे धनुर्धरः ॥ ३ ॥
' आर्य! यदि आपने सहस्त्रों वन्य पशुओं तथा हाथियोंसे भरे हुए वनमें जानेका निश्चय कर ही लिया है तो मैं भी आपका अनुसरण करूँगा । धनुष हाथमें लेकर आगे - आगे चलूँगा ॥ ३ ॥
मया समेतोऽरण्यानि रम्याणि विचरिष्यसि ।
पक्षिभिर्मृगयूथैश्च संघुष्टानि समन्ततः ॥ ४ ॥
' आप मेरे साथ पक्षियोंके कलरव और भ्रमर-समूहोंके गुञ्जारवसे गूँजते विचरण कीजियेगा ॥४ ॥
न देवलोकाक्रमणं ऐश्वर्यं चापि लोकानां ' मैं आपके बिना सम्पूर्ण लोकोंका ऐश्वर्य ' रखता ' ॥ ५ ॥
हुए रमणीय वनोंमें सब ओर
नामरत्वमहं वृणे ।
कामये न त्वया विना ॥ ५ ॥
स्वर्गमें जाने, अमर होने तथा प्राप्त करनेकी भी इच्छा नहीं
एवं ब्रुवाणः सौमित्रिर्वनवासाय निश्चितः ।
रामेण बहुभिः सान्त्वैर्निषिद्धः पुनरब्रवीत् ॥ ६ ॥
वनवासके लिये निश्चित विचार करके ऐसी बात कहनेवाले सुमित्राकुमार लक्ष्मणको श्रीरामचन्द्रजीने बहुत-से सान्त्वनापूर्ण वचनोंद्वारा समझाकर जब वनमें चलनेसे मना किया, तब वे फिर बोले- ॥ ६ ॥
अनुज्ञातस्तु भवता पूर्वमेव यदस्म्यहम् ।
किमिदानीं पुनरपि क्रियते मे निवारणम् ॥ ७ ॥
' भैया! आपने तो पहलेसे ही मुझे अपने साथ रहनेकी आज्ञा दे रखी है, फिर इस समय आप मुझे क्यों रोकते हैं? ॥७ ॥
यदर्थं प्रतिषेधो मे क्रियते गन्तुमिच्छतः ।
एतदिच्छामि विज्ञातुं संशयो हि ममानघ ॥ ८ ॥
' निष्पाप रघुनन्दन! जिस कारणसे आपके साथ चलनेकी इच्छावाले मुझको आप मना करते हैं, उस कारणको मैं जानना चाहता हूँ । मेरे हृदयमें इसके लिये बड़ा संशय हो रहा है ' ॥ ८ ॥
ततोऽब्रवीन्महातेजा रामो लक्ष्मणमग्रतः ।
स्थितं प्राग्गामिनं धीरं याचमानं कृताञ्जलिम् ॥ ९ ॥
ऐसा कहकर धीर - वीर लक्ष्मण आगे जानेके लिये तैयार हो भगवान् श्रीरामके सामने खड़े हो गये और हाथ जोड़कर याचना करने लगे । तब महातेजस्वी श्रीरामने उनसे कहा- ॥९ ॥
स्निग्धो धर्मरतो धीरः सततं सत्पथे स्थितः ।
प्रियः प्राणसमो वश्यो विजेयश्च सखा च मे ॥ १० ॥
' लक्ष्मण! तुम मेरे स्नेही, धर्मपरायण, धीर - वीर तथा सदा सन्मार्गमें स्थित रहनेवाले हो । मुझे प्राणोंके समान प्रिय हो तथा मेरे वशमें रहनेवाले आज्ञापालक और सखा हो ॥ १० ॥
मयाद्य सह सौमित्रे त्वयि गच्छति तद्वनम् ।
को भजिष्यति कौसल्यां सुमित्रां वा यशस्विनीम् ॥ ११ ॥
' सुमित्रानन्दन! यदि आज मेरे साथ तुम भी वनको चल दोगे तो परमयशस्विनी माता कौसल्या और सुमित्राकी सेवा कौन करेगा? ॥ ११ ॥
अभिवर्षति कामैर्यः पर्जन्यः पृथिवीमिव ।
स कामपाशपर्यस्तो महातेजा महीपतिः ॥ १२ ॥
' जैसे मेघ पृथ्वीपर जलकी वर्षा करता है, उसी प्रकार जो सबकी कामनाएँ पूर्ण करते थे, वे महातेजस्वी महाराज दशरथ अब कैकेयीके प्रेमपाशमें बँध गये हैं ॥१२ ॥
सा हि राज्यमिदं प्राप्य नृपस्याश्वपतेः सुता ।
दुःखितानां सपत्नीनां न करिष्यति शोभनम् ॥ १३ ॥
' केकयराज अश्वपतिकी पुत्री कैकेयी महाराजके इस राज्यको पाकर मेरे वियोगके दुःखमें डूबी हुई अपनी सौतोंके साथ अच्छा बर्ताव नहीं करेगी ॥ १३ ॥
न भरिष्यति कौसल्यां सुमित्रां च सुदुःखिताम् ।
भरतो राज्यमासाद्य कैकेय्यां पर्यवस्थितः ॥ १४ ॥
4 ' भरत भी राज्य पाकर कैकेयीके अधीन रहनेके कारण दुःखिया कौसल्या और सुमित्राका भरण - पोषण नहीं करेंगे ॥ १४ ॥
तामार्यां स्वयमेवेह राजानुग्रहणेन वा ।
सौमित्रे भर कौसल्यामुक्तमर्थममुं चर ॥ १५ ॥
‘ अतः सुमित्राकुमार! तुम यहीं रहकर अपने प्रयत्नसे अथवा राजाकी कृपा प्राप्त करके माता कौसल्याका पालन करो । मेरे बताये हुए इस प्रयोजनको ही सिद्ध करो ॥ 75 Srimad Valmiki Ramayan ( 1 ) _Section_12_1_Back
पृष्ठ 335
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अयोध्याकाण्डे
एवं मयि च ते भक्तिर्भविष्यति सुदर्शिता ।
धर्मज्ञगुरुपूजायां धर्मश्चाप्यतुलो • महान् ॥ १६ ॥
' ऐसा करनेसे मेरे प्रति जो तुम्हारी भक्ति है, वह भी भलीभाँति प्रकट हो जायगी तथा धर्मज्ञ गुरुजनोंकी पूजा करनेसे जो अनुपम एवं महान् धर्म होता है, वह भी तुम्हें प्राप्त हो जायगा ॥ १६ ॥
एवं कुरुष्व सौमित्रे मत्कृते रघुनन्दन ।
अस्माभिर्विप्रहीणाया मातुर्नो न भवेत् सुखम् ॥ १७ ॥
' रघुकुलको आनन्दित करनेवाले सुमित्राकुमार! तुम मेरे लिये ऐसा ही करो; क्योंकि हमलोगोंसे बिछुड़ी । हुई हमारी माँको कभी सुख नहीं होगा ( वह सदा हमारी ही चिन्तामें डूबी रहेगी ) ' ॥ १७ ॥
एवमुक्तस्तु रामेण लक्ष्मणः श्लक्ष्णया गिरा ।
प्रत्युवाच तदा रामं वाक्यज्ञो वाक्यकोविदम् ॥ १८ ॥
श्रीरामके ऐसा कहनेपर बातचीतके मर्मको समझनेवाले लक्ष्मणने उस समय बातका तात्पर्य समझनेवाले श्रीरामको मधुर वाणीमें उत्तर दिया – ॥ १८ ॥
तवैव तेजसा वीर भरतः पूजयिष्यति ।
कौसल्यां च सुमित्रां च प्रयतो नास्ति संशयः ॥ १ ९ ॥
' वीर! आपके ही तेज ( प्रभाव ) से भरत माता कौसल्या और सुमित्रा दोनोंका पवित्र भावसे पूजन करेंगे, इसमें संशय नहीं है ॥ १ ९ ॥
यदि दुःस्थो न रक्षेत भरतो राज्यमुत्तमम् ।
प्राप्य दुर्मनसा वीर गर्वेण च विशेषतः ॥ २० ॥
तमहं दुर्मतिं क्रूरं वधिष्यामि न संशयः ।
तत्पक्षानपि तान् सर्वांस्त्रैलोक्यमपि किं तु सा ॥ २१ ॥
कौसल्या बिभृयादार्या सहस्त्रं मद्विधानपि ।
यस्याः सहस्त्रं ग्रामाणां सम्प्राप्तमुपजीविनाम् ॥ २२ ॥
' वीरवर! इस उत्तम राज्यको पाकर यदि भरत बुरे रास्तेपर चलेंगे और दूषित हृदय एवं विशेषतः घमण्डके कारण माताओंकी रक्षा नहीं करेंगे तो मैं उन दुर्बुद्धि और क्रूर भरतका तथा उनके पक्षका समर्थन करनेवाले उन सब लोगोंका वध कर डालूँगा; इसमें संशय नहीं है । यदि सारी त्रिलोकी उनका पक्ष करने लगे तो उसे भी अपने प्राणोंसे हाथ धोना पड़ेगा, परंतु बड़ी माता कौसल्या तो स्वयं ही मेरे - जैसे सहस्रों मनुष्योंका भी भरण कर सकती हैं; क्योंकि उन्हें अपने आश्रितोंका पालन करनेके लिये एक सहस्र गाँव मिले हुए हैं ।
तदात्मभरणे चैव मम मातुस्तथैव च ।
पर्याप्ता मद्विधानां च भरणाय मनस्विनी ॥ २३ ॥
75 Srimad Valmiki Ramayan ( 1 ) _Section_12_2_Front एकत्रिंशः सर्गः ३२३ ' इसलिये वे मनस्विनी कौसल्या स्वयं ही अपना, मेरी माताका तथा मेरे - जैसे और भी बहुत - से मनुष्योंका भरण - पोषण करनेमें समर्थ हैं ॥ २३ ॥
कुरुष्व मामनुचरं वैधर्म्यं नेह विद्यते ।
कृतार्थोऽहं भविष्यामि तव चार्थः प्रकल्प्यते ॥ २४ ॥
' अतः आप मुझको अपना अनुगामी बना लीजिये । इसमें कोई धर्मकी हानि नहीं होगी । मैं कृतार्थ हो जाऊँगा तथा आपका भी प्रयोजन मेरे द्वारा सिद्ध हुआ करेगा ॥ २४ ॥
धनुरादाय सगुणं खनित्रपिटकाधरः ।
अग्रतस्ते गमिष्यामि पन्थानं तव दर्शयन् ॥ २५ ॥
' प्रत्यञ्चासहित धनुष लेकर खंती और पिटारी लिये आपको रास्ता दिखाता हुआ मैं आपके आगे - आगे चलूँगा ॥ २५ ॥
आहरिष्यामि ते नित्यं मूलानि च फलानि च ।
वन्यानि च तथान्यानि स्वाहार्हाणि तपस्विनाम् ॥ २६ ॥
' प्रतिदिन आपके लिये फल- मूल लाऊँगा तथा तपस्वीजनोंके लिये वनमें मिलनेवाली तथा अन्यान्य हवन सामग्री जुटाता रहूँगा ॥ २६ ॥
भवांस्तु सह वैदेह्या गिरिसानुषु रंस्यसे ।
अहं सर्वं करिष्यामि जाग्रतः स्वपतश्च ते ॥२७ ॥
' आप विदेहकुमारीके साथ पर्वतशिखरोंपर भ्रमण करेंगे । वहाँ आप जागते हों या सोते, मैं हर समय आपके सभी आवश्यक कार्य पूर्ण करूँगा ' ॥ २७ ॥
रामस्त्वनेन वाक्येन सुप्रीतः प्रत्युवाच तम् ।
व्रजापृच्छस्व सौमित्रे सर्वमेव सुहृज्जनम् ॥ २८ ॥
लक्ष्मणकी इस बातसे श्रीरामचन्द्रजीको बड़ी प्रसन्नता | हुई और उन्होंने उनसे कहा - ' सुमित्रानन्दन! जाओ, माता आदि सभी सुहृदोंसे मिलकर अपनी वनयात्राके विषयमें पूछ लो - उनकी आज्ञा एवं अनुमति ले लो ॥२८ ॥
ये च राज्ञो ददौ दिव्ये महात्मा वरुणः स्वयम् ।
जनकस्य महायज्ञे धनुषी रौद्रदर्शने ॥ २ ९ ॥
अभेद्ये कवचे दिव्ये तूणी चाक्षय्यसायकौ ।
आदित्यविमलाभौ द्वौ खड्गौ हेमपरिष्कृतौ ॥ ३० ॥
सत्कृत्य निहितं सर्वमेतदाचार्यसद्मनि ।
सर्वमायुधमादाय क्षिप्रमाव्रज लक्ष्मण ॥ ३१ ॥
' लक्ष्मण! राजा जनकके महान् यज्ञमें स्वयं महात्मा वरुणने उन्हें जो देखनेमें भयंकर दो दिव्य धनुष दिये थे, साथ ही, जो दो दिव्य अभेद्य कवच, अक्षय | बाणोंसे भरे हुए दो तरकस तथा सूर्यकी भाँति निर्मल
पृष्ठ 336
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
३२४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे दीप्तिसे दमकते हुए जो दो सुवर्णभूषित खड्ग प्रदान । किये थे ( वे सभी दिव्यास्त्र मिथिलानरेशने मुझे दहेजमें दे दिये थे ), उन सबको आचार्यदेवके घरमें सत्कारपूर्वक रखा गया है । तुम उन सारे आयुधोंको लेकर शीघ्र लौट आओ ' ॥ २ ९ - ३१ ॥
स सुहृज्जनमामन्त्र्य वनवासाय निश्चितः ।
इक्ष्वाकुगुरुमागम्य जग्राहायुधमुत्तमम् ॥ ३२ ॥
आज्ञा पाकर लक्ष्मणजी गये और सुहृज्जनोंकी अनुमति लेकर वनवासके लिये निश्चितरूपसे तैयार हो इक्ष्वाकुकुलके गुरु वसिष्ठजीके यहाँ गये । वहाँसे उन्होंने उन उत्तम आयुधों को ले लिया ॥ ३२ ॥ 1
तद् दिव्यं राजशार्दूलः सत्कृतं माल्यभूषितम् ।
रामाय दर्शयामास सौमित्रिः सर्वमायुधम् ॥ ३३ ॥
क्षत्रियशिरोमणि सुमित्राकुमार लक्ष्मणने सत्कारपूर्वक रखे हुए उन माल्यविभूषित समस्त दिव्य आयुधोंको लाकर उन्हें श्रीरामको दिखाया ॥ ३३ ॥
तमुवाचात्मवान् रामः प्रीत्या लक्ष्मणमागतम् ।
काले त्वमागतः सौम्य कांक्षिते मम लक्ष्मण ॥ ३४ ॥
तब मनस्वी श्रीरामने वहाँ आये हुए लक्ष्मणसे प्रसन्न होकर कहा- हा - ' सौम्य! लक्ष्मण! तुम ठीक । समयपर आ गये । इसी समय तुम्हारा आना मुझे अभीष्ट था ॥ ३५ ॥
अहं प्रदातुमिच्छामि यदिदं मामकं धनम् ।
ब्राह्मणेभ्यस्तपस्विभ्यस्त्वया सह परंतप ॥ ३५ ॥
' शत्रुओंको संताप देनेवाले वीर! मेरा जो यह धन है, इसे मैं तुम्हारे साथ रहकर तपस्वी ब्राह्मणोंको बाँटना चाहता हूँ ॥ ३५ ॥
वसन्तीह दृढं भक्त्या गुरुषु द्विजसत्तमाः ।
तेषामपि च मे भूयः सर्वेषां चोपजीविनाम् ॥ ३६ ॥
' गुरुजनोंके प्रति सुदृढ़ भक्तिभावसे युक्त जो श्रेष्ठ ब्राह्मण यहाँ मेरे पास रहते हैं, उनको तथा समस्त आश्रितजनोंको भी मुझे अपना यह धन बाँटना है ॥ ३६ ॥
वसिष्ठपुत्रं तु सुयज्ञमार्यं
त्वमानयाशु प्रवरं द्विजानाम् ।
अपि प्रयास्यामि वनं समस्ता-नभ्यर्च्य शिष्टानपरान् द्विजातीन् ॥ ३७ ॥
‘ वसिष्ठजीके पुत्र जो ब्राह्मणोंमें श्रेष्ठ आर्य सुयज्ञ हैं, उन्हें तुम शीघ्र यहाँ बुला लाओ । मैं इन सबका तथा और जो ब्राह्मण शेष रह गये हों, उनका भी सत्कार करके वनको जाऊँगा ' ॥ ३७ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकत्रिंशः सर्गः ॥ ३१ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें इकतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३१ ॥
द्वात्रिंशः सर्गः सीतासहित श्रीरामका वसिष्ठपुत्र सुयज्ञको बुलाकर उनके तथा उनकी पत्नीके लिये बहुमूल्य आभूषण, रत्न और धन आदिका दान तथा लक्ष्मणसहित श्रीरामद्वारा ब्राह्मणों, ब्रह्मचारियों, सेवकों, त्रिजट ब्राह्मण और सुहृज्जनोंको धनका वितरण
ततः शासनमाज्ञाय भ्रातुः प्रियकरं हितम् ।
गत्वा स प्रविवेशाशु सुयज्ञस्य निवेशनम् ॥ १ ॥
तदनन्तर अपने भाई श्रीरामकी प्रियकारक एवं हितकर आज्ञा पाकर लक्ष्मण वहाँसे चल दिये । उन्होंने शीघ्र ही गुरुपुत्र सुयज्ञके घरमें प्रवेश किया ॥ १ ॥
तं विप्रमग्न्यगारस्थं वन्दित्वा लक्ष्मणोऽब्रवीत् ।
सखेऽभ्यागच्छ पश्य त्वं वेश्म दुष्करकारिणः ॥ २ ॥
उस समय विप्रवर सुयज्ञ अग्निशालामें बैठे हुए थे । लक्ष्मणने उन्हें प्रणाम करके कहा - ' सखे! दुष्कर कर्म करनेवाले श्रीरामचन्द्रजीके घरपर आओ और उनका कार्य देखो ' ॥ २ ॥
ततः संध्यामुपास्थाय गत्वा सौमित्रिणा सह ।
ऋद्धं स प्राविशल्लक्ष्म्या रम्यं रामनिवेशनम् ॥ ३ ॥
सुयज्ञने मध्याह्नकालकी संध्योपासना पूरी करके लक्ष्मणके साथ जाकर श्रीरामके रमणीय भवनमें प्रवेश किया, जो लक्ष्मीसे सम्पन्न था ॥ ३ ॥
तमागतं वेदविदं प्राञ्जलिः सीतया सह ।
सुयज्ञमभिचक्राम राघवोऽग्निमिवार्चितम् ॥४ ॥
होमकालमें पूजित अग्निके समान तेजस्वी वेदवेत्ता सुयज्ञको आया जान सीतासहित श्रीरामने हाथ जोड़कर 75 Srimad Valmiki Ramayan ( 1 ) _Section_12_2_Back
पृष्ठ 337
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अयोध्याकाण्डे उनकी अगवानी की ॥ ४ ॥
जातरूपमयैर्मुख्यैरङ्गदैः कुण्डलैः
कुण्डलैः शुभैः ।
सहेमसूत्रैर्मणिभिः केयूरैर्वलयैरपि ॥ ५ ॥
अन्यैश्च रत्नैर्बहुभिः काकुत्स्थः प्रत्यपूजयत् । तत्पश्चात् ककुत्स्थकुलभूषण श्रीरामने सोनेके बने हुए श्रेष्ठ अङ्गदों, सुन्दर कुण्डलों, सुवर्णमय सूत्रमें पिरोयी हुई मणियों, केयूरों, वलयों तथा अन्य बहुत-से रत्नोंद्वारा उनका पूजन किया ॥ ५३ ॥
सुयज्ञं स तदोवाच रामः सीताप्रचोदितः ॥ ६ ॥
हारं च हेमसूत्रं च भार्यायै सौम्य हारय ।
रशनां चाथ सा सीता दातुमिच्छति ते सखी ॥ ७ ॥
इसके बाद सीताकी प्रेरणासे श्रीरामने सुयज्ञसे कहा — ' सौम्य! तुम्हारी पत्नीकी सखी सीता तुम्हें अपना हार, सुवर्णसूत्र और करधनी देना चाहती है । इन वस्तुओंको अपनी पत्नीके लिये ले जाओ ॥ ६-७ ॥
अङ्गदानि च चित्राणि केयूराणि शुभानि च ।
प्रयच्छति सखी तुभ्यं भार्यायै गच्छती वनम् ॥ ८ ॥
‘ वनको प्रस्थान करनेवाली तुम्हारी स्त्रीकी सखी सीता तुम्हें तुम्हारी पत्नीके लिये विचित्र अङ्गद और सुन्दर केयूर भी देना चाहती है ॥८ ॥
पर्यङ्कमग्र्यास्तरणं नानारत्नविभूषितम् ।
तमपीच्छति वैदेही प्रतिष्ठापयितुं त्वयि ॥ ९ ॥
' उत्तम बिछौनोंसे युक्त तथा नाना प्रकारके रत्नोंसे विभूषित जो पलंग है, उसे भी विदेहनन्दिनी सीता तुम्हारे ही घरमें भेज देना चाहती है॥९॥
नागः शत्रुंजयो नाम मातुलोऽयं ददौ मम ।
तं ते निष्कसहस्त्रेण ददामि द्विजपुङ्गव ॥ १० ॥
' विप्रवर! शत्रुञ्जय नामक जो हाथी है, जिसे मेरे मामाने मुझे भेंट किया था, उसे एक हजार अशर्फियोंके साथ मैं तुम्हें अर्पित करता हूँ'॥१० ॥
इत्युक्तः स तु रामेण सुयज्ञः प्रतिगृह्य तत् ।
रामलक्ष्मणसीतानां प्रयुयोजाशिषः शिवाः ॥ ११॥ ।
श्रीरामके ऐसा कहनेपर सुयज्ञने वे सब वस्तुएँ ग्रहण करके श्रीराम, लक्ष्मण और सीताके लिये मङ्गलमय आशीर्वाद प्रदान किये ॥ ११ ॥
अथ भ्रातरमव्यग्रं प्रियं रामः प्रियंवदम् ।
सौमित्रिं तमुवाचेदं ब्रह्मेव त्रिदशेश्वरम् ॥ १२ ॥
तदनन्तर श्रीरामने शान्तभावसे खड़े हुए और प्रिय वचन बोलनेवाले अपने प्रिय भ्राता सुमित्राकुमार लक्ष्मणसे उसी तरह निम्नाङ्कित बात कही, जैसे ब्रह्मा देवराज । द्वात्रिंशः सर्गः ३२५ इन्द्रसे कुछ कहते हैं ॥ १२ ॥
अगस्त्यं कौशिकं चैव तावुभौ ब्राह्मणोत्तमौ ।
अर्चयाहूय सौमित्रे रत्नैः सस्यमिवाम्बुभिः ॥ १३ ॥
तर्पयस्व महाबाहो गोसहस्त्रेण राघव ।
सुवर्णरजतैश्चैव मणिभिश्च महाधनैः ॥ १४ ॥
“ सुमित्रानन्दन! अगस्त्य और विश्वामित्र दोनों उत्तम ब्राह्मणोंको बुलाकर रत्नोंद्वारा उनकी पूजा करो । महाबाहु रघुनन्दन! जैसे मेघ जलकी वर्षाद्वारा खेतीको तृप्त करता है, उसी प्रकार तुम उन्हें सहस्रों गौओं, सुवर्णमुद्राओं, रजतद्रव्यों और बहुमूल्य मणियोंद्वारा संतुष्ट करो ॥ १३-१४ ॥
कौसल्यां च य आशीर्भिर्भक्तः पर्युपतिष्ठति ।
आचार्यस्तैत्तिरीयाणामभिरूपश्च वेदवित् ॥ १५ ॥
तस्य यानं च दासीश्च सौमित्रे सम्प्रदापय ।
कौशेयानि च वस्त्राणि यावत् तुष्यति स द्विजः ॥ १६ ॥
' लक्ष्मण! यजुर्वेदीय तैत्तिरीय शाखाका अध्ययन करनेवाले ब्राह्मणोंके जो आचार्य और सम्पूर्ण वेदोंके विद्वान् हैं, साथ ही जिनमें दानप्राप्तिकी योग्यता है तथा जो माता कौसल्याके प्रति भक्तिभाव रखकर प्रतिदिन उनके पास आकर उन्हें आशीर्वाद प्रदान करते हैं, उनको सवारी, दास - दासी, रेशमी वस्त्र और जितने धनसे वे ब्राह्मणदेवता संतुष्ट हों, उतना धन खजानेसे दिलवाओ ॥ १५-१६ ॥
सूतश्चित्ररथश्चार्यः सचिवः सुचिरोषितः ।
तोषयैनं महार्हैश्च रत्नैर्वस्त्रैर्धनैस्तथा ॥ १७ ॥
पशुकाभिश्च सर्वाभिर्गवां दशशतेन च । ' चित्ररथ नामक सूत श्रेष्ठ सचिव भी हैं । वे सुदीर्घकालसे यहीं राजकुलकी सेवामें रहते हैं । इनको भी तुम बहुमूल्य रत्न, वस्त्र और धन देकर संतुष्ट करो । साथ ही, इन्हें उत्तम श्रेणीके अज आदि सभी पशु और एक सहस्र गौएँ अर्पित करके पूर्ण संतोष प्रदान करो ॥ १७३ ॥
ये चेमे कठकालापा बहवो दण्डमाणवाः ॥१८ ॥
नित्यस्वाध्यायशीलत्वान्नान्यत् कुर्वन्ति किंचन ।
अलसाः स्वादुकामाश्च महतां चापि सम्मताः ॥ १ ९ ॥
तेषामशीतियानानि रत्नपूर्णानि दापय ।
शालिवाहसहस्त्रं च द्वे शते भद्रकांस्तथा ॥ २० ॥
' मुझसे सम्बन्ध रखनेवाले जो कठशाखा और कलाप - शाखाके अध्येता बहुत - से दण्डधारी ब्रह्मचारी हैं, वे सदा स्वाध्यायमें ही संलग्न रहनेके कारण दूसरा
पृष्ठ 338
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
३२६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे कोई कार्य नहीं कर पाते । भिक्षा माँगनेमें आलसी हैं, । परंतु स्वादिष्ट अन्न खानेकी इच्छा रखते हैं । महान् पुरुष भी उनका सम्मान करते हैं । उनके लिये रत्नोंके बोझसे लदे हुए अस्सी ऊँट, अगहनी चावलका भार ढोनेवाले एक सहस्र बैल तथा भद्रक नामक धान्यविशेष ( चने, मूँग आदि ) का भार लिये हुए दो सौ बैल और दिलवाओ ॥ व्यञ्जनार्थं च सौमित्रे गोसहस्त्रमुपाकुरु ।
मेखलीनां महासङ्घः कौसल्यां समुपस्थितः ।
तेषां सहस्त्रं सौमित्रे प्रत्येकं सम्प्रदापय ॥ २१ ॥
' सुमित्राकुमार! उपर्युक्त वस्तुओंके सिवा उनके लिये दही, घी आदि व्यञ्जनके निमित्त एक सहस्र गौएँ । भी हँकवा दो । माता कौसल्याके पास मेखलाधारी ब्रह्मचारियोंका बहुत बड़ा समुदाय आया है । उनमेंसे प्रत्येकको एक - एक हजार स्वर्णमुद्राएँ दिलवा दो ॥ २१ ॥
अम्बा यथा नो नन्देच्च कौसल्या मम दक्षिणाम् ।
तथा द्विजातींस्तान् सर्वाल्लँक्ष्मणार्चय सर्वशः ॥ २२ ॥
' लक्ष्मण! उन समस्त ब्रह्मचारी ब्राह्मणोंको मेरे द्वारा दिलायी हुई दक्षिणा देखकर जिस प्रकार मेरी माता कौसल्या आनन्दित हो उठे, उसी प्रकार तुम उन सबकी सब प्रकारसे पूजा करो ' ॥ २२ ॥
ततः पुरुषशार्दूलस्तद् धनं लक्ष्मणः स्वयम् ।
यथोक्तं ब्राह्मणेन्द्राणामददाद् धनदो यथा ॥ २३ ॥
इस प्रकार आज्ञा प्राप्त होनेपर पुरुषसिंह लक्ष्मणने स्वयं ही कुबेरकी भाँति श्रीरामके कथनानुसार उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको उस धनका दान किया ॥ २३ ॥
अथाब्रवीद् बाष्पगलांस्तिष्ठतश्चोपजीविनः ।
स प्रदाय बहुद्रव्यमेकैकस्योपजीवनम् ॥ २४ ॥
लक्ष्मणस्य च यद् वेश्म गृहं च यदिदं मम ।
अशून्यं कार्यमेकैकं यावदागमनं मम ॥ २५ ॥
इसके बाद वहाँ खड़े हुए अपने आश्रित सेवकोंको जिनका गला आँसुओंसे रुँधा हुआ था, बुलाकर श्रीरामने उनमेंसे एक - एकको चौदह वर्षोंतक जीविका चलानेयोग्य बहुत - सा द्रव्य प्रदान किया और उन सबसे कहा-' जबतक मैं वनसे लौटकर न आऊँ, तबतक तुमलोग लक्ष्मणके और मेरे इस घरको कभी सूना न करना-छोड़कर अन्यत्र न जाना ' ॥ २४-२५ ॥
इत्युक्त्वा दुःखितं सर्वं जनं तमुपजीविनम् ।
उवाचेदं धनाध्यक्षं धनमानीयतां मम ॥ २६ ॥
वे सब सेवक श्रीरामके वनगमनसे बहुत दुःखी थे । उनसे उपर्युक्त बात कहकर श्रीराम अपने धनाध्यक्ष ( खजांची ) से बोले - ' खजाने में मेरा जितना धन है, वह सब ले आओ ' ॥ २६ ॥
ततोऽस्य धनमाजहुः सर्व एवोपजीविनः ।
स राशिः सुमहांस्तत्र दर्शनीयो ह्यदृश्यत ॥ २७ ॥
यह सुनकर सभी सेवक उनका धन ढो - ढोकर आने लगे । वहाँ उस धनकी बहुत बड़ी राशि एकत्र हुई दिखायी देने लगी, जो देखने ही योग्य थी ॥ २७ ॥
ततः स पुरुषव्याघ्रस्तद् धनं सहलक्ष्मणः ।
द्विजेभ्यो बालवृद्धेभ्यः कृपणेभ्यो ह्यदापयत् ॥ २८ ॥
तब लक्ष्मणसहित पुरुषसिंह श्रीरामने बालक और बूढ़े ब्राह्मणों तथा दीन - दुःखियोंको वह सारा धन बँटवा दिया ॥ २८ ॥
तत्रासीत् पिङ्गलो गार्ग्यस्त्रिजटो नाम वै द्विजः ।
क्षतवृत्तिर्वने नित्यं फालकुद्दाललाङ्गली ॥ २ ९ ॥
उन दिनों वहाँ अयोध्याके आस - पास वनमें त्रिजट नामवाले एक गर्गगोत्रीय ब्राह्मण रहते थे । उनके पास जीविकाका कोई साधन नहीं था, इसलिये उपवास
आदिके कारण उनके शरीरका रंग पीला पड़ गया था ।
वे सदा फाल, कुदाल और हल लिये वनमें फल-मूलकी तलाशमें घूमा करते थे ॥२ ९ ॥
तं वृद्धं तरुणी भार्या बालानादाय दारकान् ।
अब्रवीद् ब्राह्मणं वाक्यं स्त्रीणां भर्ता हि देवता ॥ ३० ॥
अपास्य फालं कुद्दालं कुरुष्व वचनं मम ।
रामं दर्शय धर्मज्ञं यदि किंचिदवाप्स्यसि ॥ ३१ ॥
वे स्वयं तो बूढ़े हो चले थे, परंतु उनकी पत्नी अभी तरुणी थी । उसने छोटे बच्चोंको लेकर ब्राह्मणदेवतासे यह बात कही- ' प्राणनाथ! ( यद्यपि ) स्त्रियोंके लिये पति ही देवता है, ( अतः मुझे आपको आदेश देनेका कोई अधिकार नहीं है, तथापि मैं आपकी भक्त हूँ; इसलिये विनयपूर्वक यह अनुरोध करती हूँ कि— ) आप यह फाल और कुदाल फेंककर मेरा कहना कीजिये । धर्मज्ञ श्रीरामचन्द्रजीसे मिलिये । यदि आप ऐसा करें तो वहाँ अवश्य कुछ पा जायँगे ' ॥ ३०-३१ ॥
स भार्याया वचः श्रुत्वा शाटीमाच्छाद्य दुश्छदाम् ।
स प्रातिष्ठत पन्थानं यत्र रामनिवेशनम् ॥ ३२ ॥
पत्नीकी बात सुनकर ब्राह्मण एक फटी धोती, जिससे मुश्किलसे शरीर ढक पाता था, पहनकर उस मार्गपर चल दिये, जहाँ श्रीरामचन्द्रजीका महल था ॥ ३२ ॥
पृष्ठ 339
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अयोध्याकाण्डे
भृग्वङ्गिरः समं दीप्त्या त्रिजटं जनसंसदि ।
आपञ्चमायाः कक्ष्याया नैतं कश्चिदवारयत् ॥ ३३ ॥
भृगु और अङ्गिराके समान तेजस्वी त्रिजट, जनसमुदायके बीचसे होकर श्रीराम - भवनकी पाँचवीं ड्यौढ़ीतक चले गये, परंतु उनके लिये किसीने रोक-टोक नहीं की ॥ ३३ ॥
स राममासाद्य तदा त्रिजटो वाक्यमब्रवीत् ।
निर्धनो बहुपुत्रोऽस्मि राजपुत्र महाबल ॥ ३४ ॥
क्षतवृत्तिर्वने नित्यं प्रत्यवेक्षस्व मामिति । उस समय श्रीरामके पास पहुँचकर त्रिजटने कहा — ' महाबली राजकुमार! मैं निर्धन हूँ, मेरे बहुत - से पुत्र हैं, जीविका नष्ट हो जानेसे सदा वनमें ही रहता हूँ, आप मुझपर कृपादृष्टि कीजिये'॥३४ ॥
तमुवाच ततो रामः परिहाससमन्वितम् ॥ ३५ ॥
गवां सहस्रमप्येकं न च विश्राणितं मया ।
परिक्षिपसि दण्डेन यावत्तावदवाप्स्यसे ॥ ३६ ॥
तब श्रीरामने विनोदपूर्वक कहा - ' ब्रह्मन्! मेरे पास असंख्य गौएँ हैं, इनमेंसे एक सहस्रका भी मैंने अभीतक किसीको दान नहीं किया है । आप अपना
डंडा जितनी दूर फेंक सकेंगे, वहाँतककी सारी गौएँ ।
आपको मिल जायँगी ' ॥ ३६ ॥
स शार्टी परितः कट्यां सम्भ्रान्तः परिवेष्ट्य ताम् ।
आविध्य दण्डं चिक्षेप सर्वप्राणेन वेगतः ॥ ३७ ॥
यह सुनकर उन्होंने बड़ी तेजीके साथ धोतीके पल्लेको सब ओरसे कमरमें लपेट लिया और अपनी सारी शक्ति लगाकर डंडेको बड़े वेगसे घुमाकर फेंका ॥
स तीर्त्वा सरयूपारं दण्डस्तस्य कराच्च्युतः ।
गोव्रजे बहुसाहस्त्रे पपातोक्षणसंनिधौ ॥ ३८ ॥
ब्राह्मणके हाथसे छूटा हुआ वह डंडा सरयूके उस पार जाकर हजारों गौओंसे भरे हुए गोष्ठमें एक साँड़के पास गिरा ॥ ३८ ॥
तं परिष्वज्य धर्मात्मा आ तस्मात् सरयूतटात् ।
आनयामास ता गावस्त्रिजटस्याश्रमं प्रति ॥ ३ ९ ॥
धर्मात्मा श्रीरामने त्रिजटको छातीसे लगा लिया और उस सरयूतटसे लेकर उस पार गिरे हुए डंडेके स्थानतक जितनी गौएँ थीं, उन सबको मँगवाकर त्रिजटके आश्रमपर भेज दिया ॥ ३ ९ ॥
उवाच च तदा रामस्तं गार्ग्यमभिसान्त्वयन् ।
मन्युर्न खलु कर्तव्यः परिहासो ह्ययं मम ॥ ४० ॥
द्वात्रिंशः सर्गः ३२७ उस समय श्रीरामने गर्गवंशी त्रिजटको सान्त्वना देते हुए कहा- ' ब्रह्मन्! मैंने विनोदमें यह बात कही थी, आप इसके लिये बुरा न मानियेगा ॥ ४० ॥
इदं हि तेजस्तव यद् दुरत्ययं तदेव जिज्ञासितुमिच्छता मया । इमं भवानर्थमभिप्रचोदितो वृणीष्व किंचेदपरं व्यवस्यसि ॥ ४१ ॥
' आपका यह जो दुर्लङ्घ्य तेज है, इसीको जाननेकी इच्छासे मैंने आपको यह डंडा फेंकनेके लिये प्रेरित किया था, यदि आप और कुछ चाहते हों तो माँगिये ॥ ४१ ॥
ब्रवीमि सत्येन न ते स्म यन्त्रणां धनं हि यद्यन्मम विप्रकारणात् । भवत्सु सम्यक्प्रतिपादनेन मयार्जितं चैव यशस्करं भवेत् ॥ ४२ ॥
मैं सच कहता हूँ कि इसमें आपके लिये कोई संकोचकी बात नहीं है । मेरे पास जो - जो धन हैं, वह सब ब्राह्मणोंके लिये ही है । आप जैसे ब्राह्मणोंको शास्त्रीय विधिके अनुसार दान देनेसे मेरे द्वारा उपार्जित किया हुआ धन मेरे यशकी वृद्धि करनेवाला होगा ' ॥
ततः सभार्यस्त्रिजटो महामुनि-र्गवामनीकं प्रतिगृह्य मोदितः ।
यशोबलप्रीतिसुखोपबृंहिणी-स्तदाशिषः प्रत्यवदन्महात्मनः ॥ ४३ ॥
गौओंके उस महान् समूहको पाकर पत्नीसहित महामुनि त्रिजटको बड़ी प्रसन्नता हुई, वे महात्मा श्रीरामको यश, बल, प्रीति तथा सुख बढ़ानेवाले आशीर्वाद देने स चापि नियोजयामास तदनन्तर उपार्जित किये लगे ॥ ४३ ॥
रामः प्रतिपूर्णपौरुषो महाधनं धर्मबलैरुपार्जितम् । सुहृज्जने चिराद् यथार्हसम्मानवचः प्रचोदितः ॥ ४४ ॥
पूर्ण पराक्रमी भगवान् श्रीराम धर्मबलसे हुए उस महान् धनको लोगोंके यथायोग्य सम्मानपूर्ण वचनोंसे प्रेरित हो बहुत देरतक अपने सुहृदोंमें बाँटते रहे ॥४४ ॥
द्विजः सुहृद् भृत्यजनोऽथवा तदा दरिद्रभिक्षाचरणश्च यो भवेत् । न तत्र कश्चिन्न बभूव तर्पितो यथार्हसम्माननदानसम्भ्रमैः ॥ ४५ ॥
पृष्ठ 340
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
३२८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे उस समय वहाँ कोई भी ब्राह्मण, सुहृद्, सेवक, यथायोग्य सम्मान, दान तथा आदर - सत्कारसे तृप्त न
दरिद्र अथवा भिक्षुक ऐसा नहीं था, जो श्रीरामके । किया गया हो ॥ ४५ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे द्वात्रिंशः सर्गः ॥ ३२ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें बत्तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३२ ॥
त्रयस्त्रिंशः सर्गः सीता और लक्ष्मणसहित श्रीरामका दुःखी नगरवासियोंके मुखसे तरह - तरहकी बातें सुनते हुए पिताके दर्शनके
दत्त्वा तु सह वैदेह्या ब्राह्मणेभ्यो धनं बहु ।
जग्मतुः पितरं द्रष्टुं सीतया सह राघवौ ॥ १ ॥
विदेहकुमारी सीताके साथ श्रीराम और लक्ष्मण ब्राह्मणोंको बहुत - सा धन दान करके वन जानेके लिये उद्यत हो पिताका दर्शन करनेके लिये गये ॥ १ ॥
ततो गृहीते प्रेष्याभ्यामशोभेतां तदायुधे ।
मालादामभिरासक्ते सीतया समलंकृते ॥ २ ॥
उनके साथ दो सेवक श्रीराम और लक्ष्मणके वे धनुष आदि आयुध लेकर चले, जिन्हें फूलकी मालाओंसे सजाया गया था और सीताजीने पूजाके लिये चढ़ाये हुए चन्दन आदिसे अलंकृत किया था । उन दोनोंके आयुधोंकी उस समय बड़ी शोभा हो रही थी ॥ २ ॥
ततः प्रासादहर्म्याणि विमानशिखराणि च ।
अभिरुह्य जनः श्रीमानुदासीनो व्यलोकयत् ॥ ३ ॥
उस अवसरपर धनी लोग प्रासादों ( तिमंजिले महलों ), हर्म्यगृहों ( राजभवनों ) तथा विमानों ( सात मंजिले महलों ) की ऊपरी छतोंपर चढ़कर उदासीन भावसे उन तीनोंकी ओर देखने लगे ॥ ३ ॥
न हि रथ्याः सुशक्यन्ते गन्तुं बहुजनाकुलाः ।
आरुह्य तस्मात् प्रासादाद् दीनाः पश्यन्ति राघवम् ॥ ४ ॥
उस समय सड़कें मनुष्योंकी भीड़से भरी थीं । इसलिये उनपर सुगमतापूर्वक चलना कठिन हो गया था । अतः अधिकांश मनुष्य प्रासादों ( तिमंजिले मकानों ) पर चढ़कर वहींसे दुःखी होकर श्रीरामचन्द्रजीकी ओर देख रहे थे ॥ ४ ॥
पदातिं सानुजं दृष्ट्वा ससीतं च जनास्तदा ।
ऊचुर्बहुजना वाचः शोकोपहतचेतसः ॥५ ॥
श्रीरामको अपने छोटे भाई लक्ष्मण और पत्नी सीताके साथ पैदल जाते देख बहुत - से मनुष्योंका हृदय शोकसे व्याकुल हो उठा । वे खेदपूर्वक कहने लगे - ॥५ ॥
लिये कैकेयीके महलमें जाना
यं यान्तमनुयाति स्म चतुरङ्गबलं महत् ।
तमेकं सीतया सार्धमनुयाति स्म लक्ष्मणः ॥ ६ ॥
‘ हाय! यात्राके समय जिनके पीछे विशाल चतुरङ्गिणी सेना चलती थी, वे ही श्रीराम आज अकेले जा रहे हैं और उनके पीछे सीताके साथ लक्ष्मण चल रहे हैं ॥ ६ ॥
ऐश्वर्यस्य रसज्ञः सन् कामानां चाकरो महान् ।
नेच्छत्येवानृतं कर्तुं वचनं धर्मगौरवात् ॥ ७ ॥
' जो ऐश्वर्यके सुखका अनुभव करनेवाले तथा भोग्य वस्तुओंके महान् भण्डार थे - जहाँ सबकी कामनाएँ पूर्ण होती थीं, वे ही श्रीराम आज धर्मका गौरव रखनेके लिये पिताकी बात झूठी करना नहीं चाहते हैं ॥७ ॥
या न शक्या पुरा द्रष्टुं भूतैराकाशगैरपि ।
तामद्य सीतां पश्यन्ति राजमार्गगता जनाः ॥ ८ ॥
' ओह! पहले जिसे आकाशमें विचरनेवाले प्राणी भी नहीं देख पाते थे, उसी सीताको इस समय सड़कोंपर खड़े हुए लोग देख रहे हैं ॥ ८ ॥
अङ्गरागोचितां सीतां रक्तचन्दनसेविनीम् ।____ वर्षमुष्णं च शीतं च नेष्यत्याशु विवर्णताम् ॥९ ॥
' सीता अङ्गराग- सेवनके योग्य हैं, लाल चन्दनका सेवन करनेवाली हैं । अब वर्षा, गर्मी और सर्दी शीघ्र ही इनके अङ्गोंकी कान्ति फीकी कर देगी ॥ ९ ॥
अद्य नूनं दशरथः सत्त्वमाविश्य भाषते ।
नहि राजा प्रियं पुत्रं विवासयितुमर्हति ॥ १० ॥
' निश्चय ही आज राजा दशरथ किसी पिशाचके आवेशमें पड़कर अनुचित बात कह रहे हैं; क्योंकि अपनी स्वाभाविक स्थितिमें रहनेवाला कोई भी राजा अपने प्यारे पुत्रको घरसे निकाल नहीं सकता ॥१० ॥
निर्गुणस्यापि पुत्रस्य कथं स्याद् विनिवासनम् ।
किं पुनर्यस्य लोकोऽयं जितो वृत्तेन केवलम् ॥ ११ ॥
' पुत्र यदि गुणहीन हो तो भी उसे घरसे निकाल देनेका साहस कैसे हो सकता है? फिर जिसके केवल