वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ — पृष्ठ 341–350
वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 341–350
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अयोध्याकाण्डे चरित्रसे ही यह सारा संसार वशीभूत हो जाता है, उसको वनवास देनेकी तो बात ही कैसे की जा सकती है? ॥
आनृशंस्यमनुक्रोशः श्रुतं शीलं दमः शमः ।
राघवं शोभयन्त्येते षड्गुणाः पुरुषर्षभम् ॥ १२ ॥
' क्रूरताका अभाव, दया, विद्या, शील, दम ( इन्द्रियसंयम ) और शम ( मनोनिग्रह ) – ये छः गुण नरश्रेष्ठ श्रीरामको सदा ही सुशोभित करते हैं ॥ १२ ॥
तस्मात् तस्योपघातेन प्रजाः परमपीडिताः ।
औदकानीव सत्त्वानि ग्रीष्मे सलिलसंक्षयात् ॥ १३ ॥
‘ अतः इनके ऊपर आघात करने — इनके राज्याभिषेकमें विघ्न डालनेसे प्रजाको उसी तरह महान् क्लेश पहुँचा है, जैसे गर्मी में जलाशयका पानी सूख जानेसे उसके भीतर रहनेवाले जीव तड़पने लगते हैं ।
पीडया पीडितं सर्वं जगदस्य जगत्पतेः ।
मूलस्येवोपघातेन वृक्षः पुष्पफलोपगः ॥ १४ ॥
' इन जगदीश्वर श्रीरामकी व्यथासे सम्पूर्ण जगत् व्यथित हो उठा है, जैसे जड़ काट देनेसे पुष्प और फलसहित सारा वृक्ष सूख जाता है ॥ १४ ॥
मूलं ह्येष मनुष्याणां धर्मसारो महाद्युतिः ।
पुष्पं फलं च पत्रं च शाखाश्चास्येतरे जनाः ॥ १५ ॥
' ये महान् तेजस्वी श्रीराम सम्पूर्ण मनुष्योंके मूल हैं, धर्म ही इनका बल है । जगत्के दूसरे प्राणी पत्र, पुष्प, फल और शाखाएँ हैं ॥ १५ ॥
ते लक्ष्मण इव क्षिप्रं सपल्यः सहबान्धवाः ।
गच्छन्तमनुगच्छामो येन गच्छति राघवः ॥ १६ ॥
' अतः हमलोग भी लक्ष्मणकी भाँति पत्नी और बन्धु - बान्धवोंके साथ शीघ्र ही इन जानेवाले श्रीरामके ही पीछे - पीछे चल दें । जिस मार्गसे श्रीरघुनाथजी जा रहे हैं, उसीका हम भी अनुसरण करें ॥ १६ ॥
उद्यानानि परित्यज्य क्षेत्राणि च गृहाणि च ।
एकदुःखसुखा राममनुगच्छाम धार्मिकम् ॥ १७ ॥
' बाग - बगीचे, घर - द्वार और खेती - बारी - सब
छोड़कर धर्मात्मा श्रीरामका अनुगमन करें । इनके दुःख-सुखके साथी बनें ॥ १७ ॥
समुद्धृतनिधानानि परिध्वस्ताजिराणि च ।
उपात्तधनधान्यानि हृतसाराणि सर्वशः ॥ १८ ॥
रजसाभ्यवकीर्णानि परित्यक्तानि दैवतैः ।
मूषकैः परिधावद्भिरुद्विलैरावृतानि च ॥ १ ९ ॥
अपेतोदकधूमानि हीनसम्मार्जनानि च ।
प्रणष्टबलिकर्मेज्यामन्त्रहोमजपानि च ॥ २० ॥
त्रयस्त्रिंशः सर्गः ३२ ९
। दुष्कालेनेव भग्नानि भिन्नभाजनवन्ति च ।
अस्मत्यक्तानि कैकेयी वेश्मानि प्रतिपद्यताम् ॥ २१ ॥
' हम अपने घरोंकी गड़ी हुई निधि निकालें । आँगनकी फर्श खोद डालें । सारा धन - धान्य साथ ले लें । सारी आवश्यक वस्तुएँ हटा लें । इनमें चारों ओर धूल भर जाय । देवता इन घरोंको छोड़कर भाग जायँ । चूहे बिलसे बाहर निकलकर इनमें चारों ओर दौड़ लगाने लगें और उनसे ये घर भर जायँ । इनमें न कभी आग जले, न पानी रहे और न झाडू ही लगे । यहाँ बलिवैश्वदेव, यज्ञ, मन्त्रपाठ, होम और जप बंद हो जाय । मानो बड़ा भारी अकाल पड़ गया हो, इस प्रकार ये सारे घर ढह जायँ । इनमें टूटे बर्तन बिखरे पड़े हों और हम सदाके लिये इन्हें छोड़ दें- ऐसी दशामें इन घरोंपर कैकेयी आकर अधिकार कर ले ॥ १८-२१ ॥
वनं नगरमेवास्तु येन गच्छति राघवः ।
अस्माभिश्च परित्यक्तं पुरं सम्पद्यतां वनम् ॥ २२ ॥
' जहाँ पहुँचनेके लिये ये श्रीरामचन्द्रजी जा रहे हैं, वह वन ही नगर हो जाय और हमारे छोड़ देनेपर यह नगर भी वनके रूपमें परिणत हो जाय ॥ २२ ॥
बिलानि दंष्ट्रिणः सर्वे सानूनि मृगपक्षिणः ।
त्यजन्त्वस्मद्भयाद्भीता गजाः सिंहा वनान्यपि ॥ २३ ॥
' वनमें हमलोगोंके भयसे साँप अपने बिल छोड़कर भाग जायँ । पर्वतपर रहनेवाले मृग और पक्षी उसके शिखरोंको छोड़ दें तथा हाथी और सिंह भी उन वनको त्यागकर दूर चले जायँ ॥ २३ ॥
अस्मत्त्यक्तं प्रपद्यन्तु सेव्यमानं त्यजन्तु च ।
तृणमांसफलादानां देशं व्यालमृगद्विजम् ॥ २४ ॥
प्रपद्यतां हि कैकेयी सपुत्रा सह बान्धवैः ।
राघवेण वयं सर्वे वने वत्स्याम निर्वृताः ॥ २५ ॥
' वे सर्प आदि उन स्थानोंमें चले जायँ, जिन्हें हमलोगोंने छोड़ रखा है और उन स्थानोंको त्याग दें, जिनका हम सेवन करते हैं । यह देश घास चरनेवाले पशुओं, मांसभक्षी हिंसक जन्तुओं और फल खानेवाले पक्षियोंका निवासस्थान बन जाय । यहाँ सर्प, पशु और पक्षी रहने लगें । उस दशामें पुत्र और बन्धु - बान्धवोंसहित कैकेयी इसे अपने अधिकारमें कर ले । हम सब लोग वनमें श्रीरघुनाथजीके साथ बड़े । आनन्दसे रहेंगे ' ॥ २४-२५ ॥
इत्येवं विविधा वाचो नानाजनसमीरिताः ।
। शुश्राव राघवः श्रुत्वा न विचक्रेऽस्य मानसम् ॥ २६ ॥
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३३० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे
स तु वेश्म पुनर्मातुः कैलासशिखरप्रभम् ।
अभिचक्राम धर्मात्मा मत्तमातङ्गविक्रमः ॥ २७ ॥
इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजीने बहुत - से मनुष्योंके मुँहसे निकली हुई तरह - तरहकी बातें सुनीं; किंतु सुनकर भी उनके मनमें कोई विकार नहीं हुआ । मतवाले गजराजके समान पराक्रमी धर्मात्मा श्रीराम पुनः माता कैकेयीके कैलासशिखरके सदृश शुभ्र भवनमें गये ॥ २६-२७ ॥
विनीतवीरपुरुषं प्रविश्य तु नृपालयम् ।
ददर्शावस्थितं दीनं सुमन्त्रमविदूरतः ॥ २८ ॥
विनयशील वीर पुरुषोंसे युक्त उस राजभवनमें प्रवेश करके उन्होंने देखा - सुमन्त्र पास ही दुःखी होकर खड़े हैं ॥ २८ ॥
प्रतीक्षमाणोऽभिजनं तदार्त-मनार्तरूपः प्रहसन्निवाथ । जगाम रामः पितरं दिदृक्षुः पितुर्निदेशं विधिवच्चिकीर्षुः ॥ २ ९ ॥ पूर्वजोंकी निवासभूमि अवधके मनुष्य वहाँ शोकसे आतुर होकर खड़े थे । उन्हें देखकर भी श्रीराम स्वयं शोकसे पीड़ित नहीं हुए- उनके शरीरपर व्यथाका कोई चिह्न प्रकट नहीं हुआ । वे पिताकी आज्ञाका विधिपूर्वक पालन करनेकी इच्छासे उनका दर्शन करनेके लिये हँसते हुए - से आगे बढ़े ॥ २ ९ ॥ तत्पूर्वमैक्ष्वाकसुतो महात्मा रामो गमिष्यन् नृपमार्तरूपम् । व्यतिष्ठत प्रेक्ष्य तदा सुमन्त्रं पितुर्महात्मा प्रतिहारणार्थम् ॥ ३० ॥
शोकाकुलरूपसे पड़े हुए राजाके पास जानेवाले महात्मा महामना इक्ष्वाकुकुलनन्दन श्रीराम वहाँ पहुँचनेसे पहले सुमन्त्रको देखकर पिताके पास अपने आगमनकी सूचना भेजनेके लिये उस समय वहीं ठहर गये ॥३० ॥
पितुर्निदेशेन तु धर्मवत्सल
वनप्रवेशे कृतबुद्धिनिश्चयः ।
राघवः प्रेक्ष्य सुमन्त्रमब्रवी-स न्निवेदयस्वागमनं नृपाय मे ॥ ३१ ॥
पिताके आदेशसे वनमें प्रवेश करनेका बुद्धिपूर्वक निश्चय करके आये हुए धर्मवत्सल श्रीरामचन्द्रजी सुमन्त्रकी ओर देखकर बोले- ' आप महाराजको मेरे । आगमनकी सूचना दे दें ' ॥ ३१ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे त्रयस्त्रिंशः सर्गः ॥ ३३ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें तैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३३ ॥
चतुस्त्रिंशः सर्गः सीता और लक्ष्मणसहित श्रीरामका रानियोंसहित राजा दशरथके पास जाकर वनवासके लिये विदा माँगना, राजाका शोक और मूर्च्छा, श्रीरामका उन्हें समझाना तथा राजाका श्रीरामको हृदयसे लगाकर पुनः मूर्च्छित हो जाना
ततः कमलपत्राक्षः श्यामो निरुपमो महान् ।
उवाच रामस्तं सूतं पितुराख्याहि मामिति ॥ १ ॥
स रामप्रेषितः क्षिप्रं संतापकलुषेन्द्रियम् ।
प्रविश्य नृपतिं सूतो निःश्वसन्तं ददर्श ह ॥ २ ॥
जब कमलनयन श्यामसुन्दर उपमारहित महापुरुष श्रीरामने सूत सुमन्त्रसे कहा - ' आप पिताजीको मेरे आगमनकी सूचना दे दीजिये ' तब श्रीरामकी प्रेरणासे शीघ्र ही भीतर जाकर सारथि सुमन्त्रने राजाका दर्शन किया । उनकी सारी इन्द्रियाँ संतापसे कलुषित हो रही थीं । वे लम्बी साँस खींच रहे थे ॥ १-२ ॥
उपरक्तमिवादित्यं भस्मच्छन्नमिवानलम् ।
तटाकमिव निस्तोयमपश्यज्जगतीपतिम् ॥ ३ ॥
आबोध्य च महाप्राज्ञः परमाकुलचेतनम् ।
राममेवानुशोचन्तं सूतः प्राञ्जलिरब्रवीत् ॥४ ॥
सुमन्त्रने देखा, पृथ्वीपति महाराज दशरथ राहुग्रस्त सूर्य, राखसे ढकी हुई आग तथा जलशून्य तालाबके समान श्रीहीन हो रहे हैं । उनका चित्त अत्यन्त व्याकुल है और वे श्रीरामका ही चिन्तन कर रहे हैं । तब महाप्राज्ञ सूतने महाराजको सम्बोधित करके हाथ जोड़कर कहा ॥
तं वर्धयित्वा राजानं पूर्वं सूतो जयाशिषा ।
भयविक्लवया वाचा मन्दया श्लक्ष्णयाब्रवीत् ॥ ५ ॥
पहले तो सूत सुमन्त्रने विजयसूचक आशीर्वाद देते हुए महाराजकी अभ्युदय - कामना की; फिर भयसे व्याकुल मन्द - मधुर वाणीद्वारा यह बात कही - ॥ ५ ॥
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अयोध्याकाण्डे चतुस्त्रिंशः सर्गः ३३१
अयं स पुरुषव्याघ्रो द्वारि तिष्ठति ते सुतः ।
ब्राह्मणेभ्यो धनं दत्त्वा सर्वं चैवोपजीविनाम् ॥ ६ ॥
स त्वां पश्यतु भद्रं ते रामः सत्यपराक्रमः ।
सर्वान् सुहृद आपृच्छ्य त्वां हीदानीं दिदृक्षते ॥ ७ ॥
गमिष्यति महारण्यं तं पश्य जगतीपते ।
वृतं राजगुणैः सर्वैरादित्यमिव रश्मिभिः ॥ ८ ॥
' पृथ्वीनाथ! आपके पुत्र ये सत्यपराक्रमी पुरुषसिंह श्रीराम ब्राह्मणों तथा आश्रित सेवकोंको अपना सारा धन देकर द्वारपर खड़े हैं । आपका कल्याण हो, ये अपने सब सुहृदोंसे मिलकर — उनसे विदा लेकर इस समय आपका दर्शन करना चाहते हैं । आज्ञा हो तो यहाँ आकर आपका दर्शन करें । राजन्! अब ये विशाल वनमें चले जायँगे, अतः किरणोंसे युक्त सूर्यकी भाँति समस्त राजोचित गुणसे सम्पन्न इन श्रीरामको आप भी जी भरकर देख लीजिये ' ॥ ६-८ ॥
स सत्यवाक्यो धर्मात्मा गाम्भीर्यात् सागरोपमः ।
आकाश इव निष्पङ्को नरेन्द्रः प्रत्युवाच तम् ॥ ९ ॥
यह सुनकर समुद्रके समान गम्भीर तथा आकाशकी भाँति निर्मल, सत्यवादी धर्मात्मा महाराज दशरथने उन्हें उत्तर दिया – ॥ ९ ॥
सुमन्त्रानय मे दारान् ये केचिदिह मामकाः ।
दारैः परिवृतः सर्वैर्द्रष्टुमिच्छामि राघवम् ॥ १० ॥
' सुमन्त्र! यहाँ जो कोई भी मेरी स्त्रियाँ हैं, उन सबको बुलाओ । उन सबके साथ मैं श्रीरामको देखना चाहता हूँ'॥१० ॥
सोऽन्तःपुरमतीत्यैव स्त्रियस्ता वाक्यमब्रवीत् ।
आर्यो ह्वयति वो राजा गम्यतां तत्र मा चिरम् ॥ ११ ॥
तब सुमन्त्रने बड़े वेगसे अन्तःपुरमें जाकर सब स्त्रियोंसे कहा — ' देवियो! आपलोगोंको महाराज बुला रहे हैं, अतः वहाँ शीघ्र चलें ' ॥ ११ ॥
एवमुक्ताः स्त्रियः सर्वाः सुमन्त्रेण नृपाज्ञया ।
प्रचक्रमुस्तद् भवनं भर्तुराज्ञाय शासनम् ॥ १२ ॥
राजाकी आज्ञासे सुमन्त्रके ऐसा कहनेपर वे सब रानियाँ स्वामीका आदेश समझकर उस भवनकी ओर चलीं ॥ १२ ॥
अर्धसप्तशतास्तत्र प्रमदास्ताम्रलोचनाः ।
कौसल्यां परिवार्याथ शनैर्जग्मुर्धृतव्रताः ॥ १३॥
कुछ - कुछ लाल नेत्रोंवाली साढ़े तीन सौ पतिव्रता युवती स्त्रियाँ महारानी कौसल्याको सब ओरसे घेरकर धीरे - धीरे उस भवनमें गयीं ॥ १३ ॥
आगतेषु च दारेषु समवेक्ष्य महीपतिः ।
उवाच राजा तं सूतं सुमन्त्रानय मे सुतम् ॥१४ ॥
उन सबके आ जानेपर उन्हें देखकर पृथ्वीपति राजा दशरथने सूतसे कहा - ' सुमन्त्र! अब मेरे पुत्रको ले आओ ' ॥
स सूतो राममादाय लक्ष्मणं मैथिलीं तथा ।
जगामाभिमुखस्तूर्णं सकाशं जगतीपतेः ॥ १५ ॥
आज्ञा पाकर सुमन्त्र गये और श्रीराम, लक्ष्मण तथा सीताको साथ लेकर शीघ्र ही महाराजके पास लौट आये ॥ १५ ॥
स राजा पुत्रमायान्तं दृष्ट्वा चारात् कृताञ्जलिम् ।
उत्पपातासनात् तूर्णमार्तः स्त्रीजनसंवृतः ॥ १६ ॥
महाराज दूरसे ही अपने पुत्रको हाथ जोड़कर आते देख सहसा अपने आसनसे उठ खड़े हुए । उस समय स्त्रियोंसे घिरे हुए वे नरेश शोकसे आर्त हो रहे थे ॥
सोऽभिदुद्राव वेगेन रामं दृष्ट्वा विशाम्पतिः ।
तमसम्प्राप्य दुःखार्तः पपात भुवि मूच्छितः ॥ १७ ॥
श्रीरामको देखते ही वे प्रजापालक महाराज बड़े वेगसे उनकी ओर दौड़े, किंतु उनके पास पहुँचने के पहले ही दुःखसे व्याकुल हो पृथ्वीपर गिर पड़े और मूच्छित हो गये ॥ १७ ॥
तं रामोऽभ्यपतत् क्षिप्रं लक्ष्मणश्च महारथः ।
विसंज्ञमिव दुःखेन सशोकं नृपतिं तथा ॥ १८ ॥
उस समय श्रीराम और महारथी लक्ष्मण बड़ी तेजीसे चलकर दुःखके कारण अचेत - से हुए शोकमग्न महाराजके पास जा पहुँचे ॥ १८ ॥
स्त्रीसहस्रनिनादश्च संजज्ञे राजवेश्मनि ।
हा हा रामेति सहसा भूषणध्वनिमिश्रितः ॥ १ ९ ॥
इतनेहीमें उस राजभवनके भीतर सहसा आभूषणोंकी ध्वनिके साथ सहस्रों स्त्रियोंका ' हा राम! हा राम! ' यह आर्तनाद गूँज उठा ॥१ ९ ॥
तं परिष्वज्य बाहुभ्यां तावुभौ रामलक्ष्मणौ ।
पर्यङ्के सीतया सार्धं रुदन्तः समवेशयन् ॥२० ॥
श्रीराम और लक्ष्मण दोनों भाई भी सीताके साथ रो पड़े और उन तीनोंने महाराजको दोनों भुजाओंसे उठाकर पलंगपर बिठा दिया ॥ २० ॥
अथ रामो मुहूर्तस्य लब्धसंज्ञं महीपतिम् ।
। उवाच प्राञ्जलिर्बाष्पशोकार्णवपरिप्लुतम् ॥ २१ ॥
शोकाश्रुके सागरमें डूबे हुए महाराज दशरथको दो घड़ीमें जब फिर चेत हुआ, तब श्रीरामने हाथ जोड़कर उनसे कहा- ॥ २१ ॥
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३३२ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे
आपृच्छे त्वां महाराज सर्वेषामीश्वरोऽसि नः ।
प्रस्थितं दण्डकारण्यं पश्य त्वं कुशलेन माम् ॥ २२ ॥
' महाराज! आप हमलोगोंके स्वामी हैं । मैं दण्डकारण्यको जा रहा हूँ और आपसे आज्ञा लेने आया हूँ । आप अपनी कल्याणमयी दृष्टिसे मेरी ओर देखिये ॥
लक्ष्मणं चानुजानीहि सीता चान्वेतु मां वनम् ।
कारणैर्बहुभिस्तथ्यैर्वार्यमाणौ न चेच्छतः ॥ २३ ॥ ।
अनुजानीहि सर्वान् नः शोकमुत्सृज्य मानद ।
लक्ष्मणं मां च सीतां च प्रजापतिरिवात्मजान् ॥ २४ ॥
' मेरे साथ लक्ष्मणको भी वनमें जानेकी आज्ञा दीजिये । साथ ही यह भी स्वीकार कीजिये कि सीता भी मेरे साथ वनको जाय । मैंने बहुत - से सच्चे कारण बताकर इन दोनोंको रोकनेकी चेष्टा की है, परंतु ये यहाँ रहना नहीं चाहते हैं; अतः दूसरोंको मान देनेवाले नरेश! आप शोक छोड़कर हम सबको— मुझको, लक्ष्मणको और सीताको भी उसी तरह वनमें जानेकी आज्ञा दीजिये, जैसे ब्रह्माजीने अपने पुत्र सनकादिकोंको तपके लिये वनमें जानेकी अनुमति दी थी ' ॥ २३-२४ ॥
प्रतीक्षमाणमव्यग्रमनुज्ञां जगतीपतेः ।
उवाच राजा सम्प्रेक्ष्य वनवासाय राघवम् ॥ २५ ॥
इस प्रकार शान्तभावसे वनवासके लिये राजाकी आज्ञाकी प्रतीक्षा करते हुए श्रीरामचन्द्रजीकी ओर देखकर महाराजने उनसे कहा- ॥ २५ ॥
अहं राघव कैकेय्या वरदानेन मोहितः ।
अयोध्यायां त्वमेवाद्य भव राजा निगृह्य माम् ॥ २६ ॥
' रघुनन्दन! मैं कैकेयीको दिये हुए वरके कारण मोहमें पड़ गया हूँ । तुम मुझे कैद करके स्वयं ही अब अयोध्याके राजा बन जाओ ' ॥ २६ ॥
एवमुक्तो नृपतिना रामो धर्मभृतां वरः ।
प्रत्युवाचाञ्जलिं कृत्वा पितरं वाक्यकोविदः ॥ २७ ॥
महाराजके ऐसा कहनेपर बातचीत करनेमें कुशल धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ श्रीरामने दोनों हाथ जोड़कर पिताको इस प्रकार उत्तर दिया- ॥ २७ ॥
भवान् वर्षसहस्त्राय पृथिव्या नृपते पतिः ।
अहं त्वरण्ये वत्स्यामि न मे राज्यस्य कांक्षिता ॥ २८ ॥
' महाराज! आप सहस्रों वर्षोंतक इस पृथ्वीके
अधिपति बने रहें । मैं तो अब वनमें ही निवास करूँगा ।
मुझे राज्य लेनेकी इच्छा नहीं है ॥ २८ ॥
नव पञ्च च वर्षाणि वनवासे विहृत्य ते ।
पुनः पादौ ग्रहीष्यामि प्रतिज्ञान्ते नराधिप ॥ २ ९ ॥
' नरेश्वर! चौदह वर्षोंतक वनमें घूम - फिरकर आपकी प्रतिज्ञा पूरी कर लेनेके पश्चात् मैं पुनः आपके युगल चरणोंमें मस्तक झुकाऊँगा ' ॥२ ९ ॥
रुदन्नार्तः प्रियं पुत्रं सत्यपाशेन संयुतः ।
कैकेय्या चोद्यमानस्तु मिथो राजा तमब्रवीत् ॥ ३० ॥
राजा दशरथ एक तो सत्यके बन्धनमें बँधे हुए थे, दूसरे एकान्तमें कैकेयी उन्हें श्रीरामको वनमें तुरंत भेजनेके लिये बाध्य कर रही थी - इस अवस्थामें वे आर्तभावसे रोते हुए वहाँ अपने प्रिय पुत्र श्रीरामसे बोले - ॥ ३० ॥
श्रेयसे वृद्धये तात पुनरागमनाय च ।
गच्छस्वारिष्टमव्यग्रः पन्थानमकुतोभयम् ॥ ३१ ॥
' तात! तुम कल्याणके लिये, वृद्धिके लिये और फिर लौट आनेके लिये शान्तभावसे जाओ । तुम्हारा मार्ग विघ्न - बाधाओंसे रहित और निर्भय हो ॥ ३१ ॥
न हि सत्यात्मनस्तात धर्माभिमनसस्तव ।
संनिवर्तयितुं बुद्धिः शक्यते रघुनन्दन ॥ ३२ ॥
अद्य त्विदानीं रजनीं पुत्र मा गच्छ सर्वथा ।
एकाहं दर्शनेनापि साधु तावच्चराम्यहम् ॥ ३३ ॥
' बेटा रघुनन्दन! तुम सत्यस्वरूप और धर्मात्मा हो । तुम्हारे विचारको पलटना तो असम्भव है; परंतु रातभर और रह जाओ । सिर्फ एक रातके लिये सर्वथा अपनी यात्रा रोक दो । केवल एक दिन भी तो तुम्हें देखनेका सुख उठा लूँ ॥ ३२-३३ ॥
मातरं मां च सम्पश्यन् वसेमामद्य शर्वरीम् ।
तर्पितः सर्वकामैस्त्वं श्वः काल्ये साधयिष्यसि ॥ ३४ ॥
‘ अपनी माताको और मुझको इस अवस्थामें देखकर आजकी इस रातमें यहीं रह जाओ । मेरे द्वारा सम्पूर्ण अभिलषित वस्तुओंसे तृप्त होकर कल प्रातःकाल यहाँसे जाना ॥
दुष्करं क्रियते पुत्र सर्वथा राघव प्रिय ।
त्वया हि मत्प्रियार्थं तु वनमेवमुपाश्रितम् ॥ ३५ ॥
‘ मेरे प्रिय पुत्र श्रीराम! तुम सर्वथा दुष्कर कार्य कर रहे हो । मेरा प्रिय करनेके लिये ही तुमने इस प्रकार वनका आश्रय लिया है ॥ ३५ ॥
न चैतन्मे प्रियं पुत्र शपे सत्येन राघव ।
छन्नया चलितस्त्वस्मि स्त्रिया भस्माग्निकल्पया ॥ ३६ ॥
वञ्चना या तु लब्धा मे तां त्वं निस्तर्तुमिच्छसि ।
अनया वृत्तसादिन्या कैकेय्याभिप्रचोदितः ॥ ३७ ॥
' परंतु बेटा रघुनन्दन! मैं सत्यकी शपथ खाकर कहता हूँ कि यह मुझे प्रिय नहीं है । मुझे तुम्हारा वनमें जाना अच्छा नहीं लगता । यह मेरी स्त्री कैकेयी राखमें
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अयोध्याकाण्डे छिपी हुई आगके समान भयंकर है । इसने अपने क्रूर अभिप्रायको छिपा रखा था । इसीने आज मुझे मेरे अभीष्ट संकल्पसे विचलित कर दिया है । कुलोचित सदाचारका विनाश करनेवाली इस कैकेयीने मुझे वरदानके लिये प्रेरित करके मेरे साथ बहुत बड़ा धोखा । किया है । इसके द्वारा जो वञ्चना मुझे प्राप्त हुई है, उसीको तुम पार करना चाहते हो ॥ ३६-३७ ॥
न चैतदाश्चर्यतमं यत् त्वं ज्येष्ठः सुतो मम ।
अपानृतकथं पुत्र पितरं कर्तुमिच्छसि ॥ ३८ ॥
' पुत्र! तुम अपने पिताको सत्यवादी बनाना चाहते हो । तुम्हारे लिये यह कोई अधिक आश्चर्यकी बात नहीं है; क्योंकि तुम गुण और अवस्था दोनों ही दृष्टियोंसे मेरे ज्येष्ठ पुत्र हो ' ॥ ३८ ॥
अथ रामस्तदा श्रुत्वा पितुरार्तस्य भाषितम् ।
लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा दीनो वचनमब्रवीत् ॥ ३ ९ ॥
अपने शोकाकुल पिताका यह कथन सुनकर उस समय छोटे भाई लक्ष्मणसहित श्रीरामने दुःखी होकर कहा- ॥ ३ ९ ॥
प्राप्स्यामि यानद्य गुणान् को मे श्वस्तान् प्रदास्यति ।
अपक्रमणमेवातः सर्वकामैरहं वृणे ॥ ४० ॥
' महाराज! आज यात्रा करके मैं जिन गुणों ( लाभों ) को पाऊँगा, उन्हें कल कौन मुझे देगा? * अतः मैं सम्पूर्ण कामनाओंके बदले आज यहाँसे निकल जाना ही अच्छा समझता हूँ और इसीका वरण करता हूँ ।
इयं सराष्ट्रा सजना धनधान्यसमाकुला ।
मया विसृष्टा वसुधा भरताय प्रदीयताम् ॥ ४१ ॥
' राष्ट्र और यहाँके निवासी मनुष्योंसहित
धनधान्यसे सम्पन्न यह सारी पृथ्वी मैंने छोड़ दी ।
आप इसे भरतको दे दें ॥ ४१ ॥
वनवासकृता बुद्धिर्न च मेऽद्य चलिष्यति ।
यस्तु युद्धे वरो दत्तः कैकेय्यै वरद त्वया ॥ ४२ ॥
दीयतां निखिलेनैव सत्यस्त्वं भव पार्थिव । ' मेरा वनवासविषयक निश्चय अब बदल नहीं सकेगा । वरदायक नरेश! आपने देवासुर संग्राममें कैकेयीको जो वर देनेकी प्रतिज्ञा की थी, उसे पूर्णरूपसे दीजिये और सत्यवादी बनिये ॥ ४२३ ॥
* ' प्राप्स्यामि ' ' ' ' ' ' इस आधे श्लोकका अर्थ यह भी पदार्थोंको मैं पाऊँगा, उन्हें कलसे कौन देगा? चतुस्त्रिंशः सर्गः ३३३ । अहं निदेशं भवतो यथोक्तमनुपालयन् ॥ ४३ ॥
चतुर्दश समा वत्स्ये वने वनचरैः सह ।
मा विमर्शो वसुमती भरताय प्रदीयताम् ॥ ४४ ॥
" मैं आपकी उक्त आज्ञाका पालन करता हुआ चौदह वर्षोंतक वनमें वनचारी प्राणियोंके साथ निवास करूँगा । आपके मनमें कोई अन्यथा विचार नहीं होना चाहिये । आप यह सारी पृथ्वी भरतको दे दीजिये ॥
नहि मे कांक्षितं राज्यं सुखमात्मनि वा प्रियम् ।
यथानिदेशं कर्तुं वै तवैव रघुनन्दन ॥ ४५ ॥
' रघुनन्दन! मैंने अपने मनको सुख देने अथवा स्वजनोंका प्रिय करनेके उद्देश्यसे राज्य लेनेकी इच्छा नहीं की थी । आपकी आज्ञाका यथावत्रूपसे पालन करनेके लिये ही मैंने उसे ग्रहण करनेकी
अभिलाषा की थी ॥। ४५ ॥
अपगच्छतु ते दुःखं मा भूर्बाष्पपरिप्लुतः ।
नहि क्षुभ्यति दुर्धर्षः समुद्रः सरितां पतिः ॥ ४६ ॥
' आपका दुःख दूर हो जाय, आप इस प्रकार आँसू न बहावें । सरिताओंका स्वामी दुर्धर्ष समुद्र क्षुब्ध नहीं होता है - अपनी मर्यादाका त्याग नहीं करता है ( इसी तरह आपको भी क्षुब्ध नहीं होना चाहिये ) ॥ ४६ ॥
नैवाहं राज्यमिच्छामि न सुखं न च मेदिनीम् ।
नैव सर्वानिमान् कामान् न स्वर्गं न च जीवितुम् ॥ ४७ ॥
' मुझे न तो इस राज्यकी, न सुखकी, न पृथ्वीकी, न इन सम्पूर्ण भोगोंकी, न स्वर्गकी और न जीवनकी ही इच्छा है ॥ ४७ ॥
त्वामहं सत्यमिच्छामि नानृतं पुरुषर्षभ ।
प्रत्यक्षं तव सत्येन सुकृतेन च ते शपे ॥ ४८ ॥
' पुरुषशिरोमणे! मेरे मनमें यदि कोई इच्छा है तो यही कि आप सत्यवादी बनें । आपका वचन मिथ्या न होने पावे । यह बात मैं आपके सामने सत्य और शुभ कर्मोंकी शपथ खाकर कहता हूँ ॥४८ ॥
न च शक्यं मया तात स्थातुं क्षणमपि प्रभो ।
स शोकं धारयस्वेमं नहि मेऽस्ति विपर्ययः ॥ ४ ९ ॥
' तात! प्रभो! अब मैं यहाँ एक क्षण भी नहीं ठहर सकता । अतः आप इस शोकको अपने भीतर ही दबा लें । मैं अपने निश्चयके विपरीत कुछ नहीं कर सकता ॥ हो सकता है कि आज यहाँ रहकर जिन उत्तमोत्तम अभीष्ट
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३३४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे
अर्थितो ह्यस्मि कैकेय्या वनं गच्छेति राघव ।
मया चोक्तं व्रजामीति तत्सत्यमनुपालये ॥ ५० ॥
' रघुनन्दन! कैकेयीने मुझसे यह याचना की कि ' राम! तुम वनको चले जाओ ' मैंने वचन दिया था कि 4 ' अवश्य जाऊँगा ' उस सत्यका मुझे पालन करना है ।
मा चोत्कण्ठां कृथा देव वने रंस्यामहे वयम् ।
प्रशान्तहरिणाकीर्णे नानाशकुनिनादिते ॥ ५१ ॥
' देव! बीचमें हमें देखने या हमसे मिलनेके लिये आप उत्कण्ठित न होंगे । शान्तस्वभाववाले मृगोंसे भरे हुए और भाँति - भाँतिके पक्षियोंके कलरवोंसे गूँजते हुए उस वनमें हमलोग बड़े आनन्दसे रहेंगे ॥ ५१ ॥
पिता हि दैवतं तात देवतानामपि स्मृतम् ।
तस्माद् दैवतमित्येव करिष्यामि पितुर्वचः ॥ ५२ ॥
' तात! पिता देवताओंके भी देवता माने गये हैं । अतः मैं देवता समझकर ही पिता ( आप ) की आज्ञाका पालन करूँगा ॥५२ ॥
चतुर्दशसु वर्षेषु गतेषु नृपसत्तम ।
पुनर्द्रक्ष्यसि मां प्राप्तं संतापोऽयं विमुच्यताम् ॥ ५३ ॥
' नृपश्रेष्ठ! अब यह संताप छोड़िये । चौदह वर्ष बीत जानेपर आप फिर मुझे आया हुआ देखेंगे ॥ ५३ ॥
येन संस्तम्भनीयोऽयं सर्वो बाष्पकलो जनः ।
स त्वं पुरुषशार्दूल किमर्थं विक्रियां गतः ॥ ५४ ॥
‘ पुरुषसिंह! यहाँ जितने लोग आँसू बहा रहे हैं, इन सबको धैर्य बँधाना आपका कर्तव्य है; फिर आप स्वयं ही इतने विकल कैसे हो रहे हैं? ॥ ५४ ॥
पुरं च राष्ट्रं च मही च केवला मया विसृष्टा भरताय दीयताम् । अहं निदेशं भवतोऽनुपालयन् वनं गमिष्यामि चिराय सेवितुम् ॥ ५५ ॥
' यह नगर, यह राज्य और यह सारी पृथ्वी मैंने छोड़ दी । आप यह सब कुछ भरतको दे दीजिये । अब मैं आपके आदेशका पालन करता हुआ दीर्घकालतक वनमें निवास करनेके लिये यहाँसे यात्रा कर रहा हूँ ॥ मया विसृष्टां भरतो महीमिमां सशैलखण्डां सपुरोपकाननाम् । शिवासु सीमास्वनुशास्तु केवलं त्वया यदुक्तं नृपते तथास्तु तत् ॥ ५६ ॥
' मेरी छोड़ी हुई पर्वतखण्डों, नगरों और उपवनसहित इस सारी पृथ्वीका भरत कल्याणकारिणी मर्यादाओंमें स्थित रहकर पालन करें । नरेश्वर! आपने जो वचन दिया है, वह पूर्ण हो ॥५६ ॥
न मे तथा पार्थिव धीयते मनो महत्सु कामेषु न चात्मनः प्रिये । यथा निदेशे तव शिष्टसम्म व्यपैतु दुःखं तव मत्कृतेऽनघ ॥ ५७ ॥
' पृथ्वीनाथ! निष्पाप महाराज! सत्पुरुषोंद्वारा अनुमोदित आपकी आज्ञाका पालन करनेमें मेरा मन जैसा लगता है, वैसा बड़े - बड़े भोगों में तथा अपने किसी प्रिय पदार्थमें भी नहीं लगता; अतः मेरे लिये आपके मनमें जो दुःख है, वह दूर हो जाना चाहिये ॥ ५७ ॥
तदद्य नैवानध राज्यमव्ययं न सर्वकामान् वसुधां न मैथिलीम् । न चिन्तितं त्वामनृतेन योजयन् वृणीय सत्यं व्रतमस्तु ते तथा ॥ ५८ ॥
' निष्पाप नरेश! आज आपको मिथ्यावादी बनाकर मैं अक्षय राज्य, सब प्रकारके भोग, वसुधाका आधिपत्य, मिथिलेशकुमारी सीता तथा अन्य किसी अभिलषित पदार्थको भी स्वीकार नहीं कर सकता । मेरी एकमात्र इच्छा यही है कि ' आपकी प्रतिज्ञा सत्य हो'॥५८ ॥
फलानि मूलानि च भक्षयन् वने गिरींश्च पश्यन् सरितः सरांसि च । वनं प्रविश्यैव विचित्रपादपं सुखी भविष्यामि तवास्तु निर्वृतिः ॥ ५ ९ ॥ ' मैं विचित्र वृक्षोंसे युक्त वनमें प्रवेश करके फल-| मूलका भोजन करता हुआ वहाँके पर्वतों, नदियों और | सरोवरोंको देख - देखकर सुखी होऊँगा; इसलिये आप अपने मनको शान्त कीजिये ' ॥ ५ ९ ॥ एवं स राजा व्यसनाभिपन्न-स्तापेन दुःखेन च पीड्यमानः । आलिङ्ग्य पुत्रं सुविनष्टसंज्ञो भूमिं गतो नैव चिचेष्ट किंचित् ॥ ६० ॥
श्रीरामके ऐसा कहनेपर पुत्र- बिछोहके संकटमें पड़े हुए राजा दशरथने दुःख और संतापसे पीड़ित हो उन्हें छातीसे लगाया और फिर अचेत होकर वे पृथ्वीपर गिर पड़े । उस समय उनका शरीर जडकी भाँति कुछ भी चेष्टा न कर सका ॥ ६० ॥
देव्यः समस्ता रुरुदुः समेता-स्तां वर्जयित्वा नरदेवपत्नीम् ।
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अयोध्याकाण्डे पञ्चत्रिंशः सर्गः ३३५ रुदन् सुमन्त्रोऽपि जगाम मूर्च्छा एकत्र हुई अन्य सभी रानियाँ रो पड़ीं । सुमन्त्र भी हाहाकृतं तत्र बभूव सर्वम् ॥ ६१ ॥ रोते - रोते मूच्छित हो गये तथा वहाँ सब ओर हाहाकार
यह देख राजरानी कैकेयीको छोड़कर वहाँ । मच गया ॥ ६१ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे चतुस्त्रिंशः सर्गः ॥ ३४ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें चौंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३४ ॥
पञ्चत्रिंशः सर्गः सुमन्त्रके समझाने और फटकारनेपर
ततो निधूय सहसा शिरो निःश्वस्य चासकृत् ।
पाणिं पाणौ विनिष्पिष्य दन्तान् कटकटाय्य च ॥ १ ॥
लोचने कोपसंरक्ते वर्णं पूर्वोचितं जहत् ।
कोपाभिभूतः सहसा संतापमशुभं गतः ॥ २ ॥
मनः समीक्षमाणश्च सूतो दशरथस्य च ।
कम्पयन्निव कैकेय्या हृदयं वाक्शरैः शितैः ॥ ३ ॥
तदनन्तर होशमें आनेपर सारथि सुमन्त्र सहसा उठकर खड़े हो गये । उनके मनमें बड़ा संताप हुआ, जो अमङ्गलकारी था । वे क्रोधके मारे काँपने लगे । उनके शरीर और मुखकी पहली स्वाभाविक कान्ति बदल गयी । वे क्रोधसे आँखें लाल करके दोनों हाथोंसे सिर पीटने लगे और बारम्बार लम्बी साँस खींचकर हाथ - से - हाथ मलकर, दाँत कटकटाकर राजा दशरथके मनकी वास्तविक अवस्था देखते हुए अपने वचनरूपी तीखे बाणोंसे कैकेयीके हृदयको कम्पित - सा करने लगे ॥१-३ ॥
वाक्यवज्रैरनुपमैर्निर्भिन्दन्निव चाशुभैः ।
कैकेय्याः सर्वमर्माणि सुमन्त्रः प्रत्यभाषत ॥ ४ ॥
अपने अशुभ एवं अनुपम वचनरूपी वज्रसे कैकेयीके सारे मर्मस्थानोंको विदीर्ण - से करते हुए सुमन्त्रने उससे इस प्रकार कहना आरम्भ किया -॥४ ॥
यस्यास्तव पतिस्त्यक्तो राजा दशरथः स्वयम् ।
भर्ता सर्वस्य जगतः स्थावरस्य चरस्य च ॥५ ॥
नह्यकार्यतमं किंचित्तव देवीह विद्यते ।
पतिघ्नीं त्वामहं मन्ये कुलघ्नीमपि चान्ततः ॥ ६ ॥ ।
' देवि! जब तुमने सम्पूर्ण चराचर जगत्के स्वामी स्वयं अपने पति महाराज दशरथका ही त्याग कर दिया, तब इस जगत् में कोई ऐसा कुकर्म नहीं है, जिसे तुम न कर सको; मैं तो समझता हूँ कि तुम पतिकी हत्या करनेवाली तो हो ही; अन्ततः भी कैकेयीका टस - से - मस न होना कुलघातिनी भी हो ॥ ५-६ ॥
यन्महेन्द्रमिवाजय्यं दुष्प्रकम्प्यमिवाचलम् ।
महोदधिमिवाक्षोभ्यं संतापयसि कर्मभिः ॥७ ॥
' ओह! जो देवराज इन्द्रके समान अजेय, पर्वतके समान अकम्पनीय और महासागरके समान क्षोभरहित हैं, उन महाराज दशरथको भी तुम अपने कर्मोंसे संतप्त कर रही हो ॥ ७ ॥
मावमंस्था दशरथं भर्तारं वरदं पतिम् ।
भर्तुरिच्छा हि नारीणां पुत्रकोट्या विशिष्यते ॥ ८ ॥
राजा दशरथ तुम्हारे पति, पालक और वरदाता हैं । तुम इनका अपमान न करो । नारियोंके लिये पतिकी इच्छाका महत्त्व करोड़ों पुत्रोंसे भी अधिक है ॥८ ॥
यथावयो हि राज्यानि प्राप्नुवन्ति नृपक्षये ।
इक्ष्वाकुकुलनाथेऽस्मिंस्तं लोपयितुमिच्छसि ॥ ९ ॥
' इस कुलमें राजाका परलोकवास हो जानेपर उसके पुत्रोंकी अवस्थाका विचार करके जो ज्येष्ठ पुत्र होते हैं, वे ही राज्य पाते हैं । राजकुलके इस परम्परागत आचारको तुम इन इक्ष्वाकुवंशके स्वामी महाराज दशरथके जीते - जी ही मिटा देना चाहती हो ॥ ९ ॥
राजा भवतु ते पुत्रो भरतः शास्तु मेदिनीम् ।
वयं तत्र गमिष्यामो यत्र रामो गमिष्यति ॥ १० ॥
' तुम्हारे पुत्र भरत राजा हो जायँ और इस पृथ्वीका शासन करें; किंतु हमलोग तो वहीं चले जायँगे जहाँ श्रीराम जायँगे ॥ १० ॥
न च ते विषये कश्चिद् ब्राह्मणो वस्तुमर्हति ।
तादृशं त्वममर्यादमद्य कर्म करिष्यसि ॥ ११ ॥
नूनं सर्वे गमिष्यामो मार्गं रामनिषेवितम् । ' तुम्हारे राज्यमें कोई भी ब्राह्मण निवास नहीं | करेगा; यदि तुम आज वैसा मर्यादाहीन कर्म करोगी तो
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३३६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे निश्चय ही हम सब लोग उसी मार्गपर चले जायँगे, जिसका श्रीरामने सेवन किया है ॥ ११३ ॥
त्यक्ता या बान्धवैः सर्वैर्ब्राह्मणैः साधुभिः सदा ॥ १२ ॥
का प्रीती राज्यलाभेन तव देवि भविष्यति ।
तादृशं त्वममर्यादं कर्म कर्तुं चिकीर्षसि ॥ १३ ॥
' सम्पूर्ण बन्धु - बान्धव और सदाचारी ब्राह्मण भी तुम्हारा त्याग कर देंगे । देवि! फिर इस राज्यको पाकर
तुम्हें क्या आनन्द मिलेगा । ओह! तुम ऐसा मर्यादाहीन ।
कर्म करना चाहती हो ॥ १२-१३ ॥
आश्चर्यमिव पश्यामि यस्यास्ते वृत्तमीदृशम् ।
आचरन्त्या न विवृता सद्यो भवति मेदिनी ॥ १४ ॥
' मुझे तो यह देखकर आश्चर्य - सा हो रहा है कि तुम्हारे इतने बड़े अत्याचार करनेपर भी पृथ्वी तुरंत फट क्यों नहीं जाती? ॥ १४ ॥
महाब्रह्मर्षिसृष्टा वा ज्वलन्तो भीमदर्शनाः ।
धिग्वाग्दण्डा न हिंसन्ति रामप्रव्राजने स्थिताम् ॥ १५ ॥
' अथवा बड़े - बड़े ब्रह्मर्षियोंके धिक्कारपूर्ण वाग्दण्ड ( शाप ) जो देखनेमें भयंकर और जलाकर भस्म कर देनेवाले होते हैं, श्रीरामको घरसे निकालनेके लिये तैयार खड़ी हुई तुम - जैसी पाषाणहृदयाका सर्वनाश क्यों नहीं कर डालते हैं? ॥ १५ ॥
आनं छित्त्वा कुठारेण निम्बं परिचरेत् तु कः ।
यश्चैनं पयसा सिञ्चेन्नैवास्य मधुरो भवेत् ॥ १६ ॥
' भला आमको कुल्हाड़ीसे काटकर उसकी जगह नीमका सेवन कौन करेगा? जो आमकी जगह नीमको ही दूधसे सींचता है, उसके लिये भी यह नीम मीठा फल देनेवाला नहीं हो सकता ( अतः वरदानके बहाने श्रीरामको वनवास देकर कैकेयीके चित्तको संतुष्ट करना राजाके लिये कभी सुखद परिणामका जनक नहीं हो सकता ) ॥ १६ ॥
आभिजात्यं हि ते मन्ये यथा मातुस्तथैव च ।
न हि निम्बात् स्त्रवेत् क्षौद्रं लोके निगदितं वचः ॥ १७ ॥
' कैकेयि! मैं समझता हूँ कि तुम्हारी माताका अपने कुलके अनुरूप जैसा स्वभाव था, वैसा ही तुम्हारा भी है । लोकमें कही जानेवाली यह कहावत सत्य ही है कि नीमसे मधु नहीं टपकता ॥ १७ ॥
तव मातुरसद्ग्राहं विद्म पूर्वं यथा श्रुतम् ।
पितुस्ते वरदः कश्चिद् ददौ वरमनुत्तमम् ॥ १८ ॥
' तुम्हारी माताके दुराग्रहकी बात भी हम जानते हैं । इसके विषयमें पहले जैसा सुना गया है, वह बताया जाता है । एक समय किसी वर देनेवाले साधुने तुम्हारे पिताको अत्यन्त उत्तम वर दिया था ॥ १८ ॥
सर्वभूतरुतं तस्मात् संजज्ञे वसुधाधिपः ।
तेन तिर्यग्गतानां च भूतानां विदितं वचः ॥ १ ९ ॥
' उस वरके प्रभावसे केकयनरेश समस्त प्राणियोंकी बोली समझने लगे । तिर्यक् योनिमें पड़े हुए प्राणियोंकी बातें भी उनकी समझमें आ जाती थीं ॥ १ ९ ॥
ततो जृम्भस्य शयने विरुताद् भूरिवर्चसः ।
पितुस्ते विदितो भावः स तत्र बहुधाहसत् ॥२० ॥
' एक दिन तुम्हारे महातेजस्वी पिता शय्यापर लेटे हुए थे । उसी समय जृम्भ नामक पक्षीकी आवाज उनके कानोंमें पड़ी । उसकी बोलीका अभिप्राय उनकी समझमें आ गया । अतः वे वहाँ कई बार हँसे ॥ २० ॥
तत्र ते जननी क्रुद्धा मृत्युपाशमभीप्सती ।
हासं ते नृपते सौम्य जिज्ञासामीति चाब्रवीत् ॥ २१ ॥
' उसी शय्यापर तुम्हारी माँ भी सोयी थी । वह यह समझकर कि राजा मेरी ही हँसी उड़ा रहे हैं, कुपित हो उठी और गलेमें मौतकी फाँसी लगानेकी इच्छा रखती हुई बोली– ' सौम्य! नरेश्वर! तुम्हारे हँसनेका क्या कारण है, यह मैं जानना चाहती हूँ ' ॥ २१ ॥
नृपश्चोवाच तां देवीं हासं शंसामि ते यदि ।
ततो मे मरणं सद्यो भविष्यति न संशयः ॥ २२ ॥
' तब राजाने उस देवीसे कहा – ' रानी! यदि मैं अपने हँसनेका कारण बता दूँ तो उसी क्षण मेरी मृत्यु हो जायगी, इसमें संशय नहीं है ' ॥ २२ ॥
माता ते पितरं देवि पुनः केकयमब्रवीत् ।
शंस मे जीव वा मा वा न मां त्वं प्रहसिष्यसि ॥२३ ॥
' देवि! यह सुनकर तुम्हारी रानी माताने तुम्हारे पिता केकयराजसे फिर कहा- ' तुम जीओ या मरो, मुझे कारण बता दो । भविष्यमें तुम फिर मेरी हँसी नहीं उड़ा सकोगे ' ॥ २३ ॥
प्रियया च तथोक्तः स केकयः पृथिवीपतिः ।
तस्मै तं वरदायार्थं कथयामास तत्त्वतः ॥ २४ ॥
' अपनी प्यारी रानीके ऐसा कहनेपर केकयनरेशने उस वर देनेवाले साधुके पास जाकर सारा समाचार । ठीक - ठीक कह सुनाया ॥ २४ ॥
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अयोध्याकाण्डे
ततः स वरदः साधू राजानं प्रत्यभाषत ।
म्रियतां ध्वंसतां वेयं मा शंसीस्त्वं महीपते ॥ २५ ॥
' तब उस वर देनेवाले साधुने राजाको उत्तर दिया— ' महाराज! रानी मरे या घरसे निकल जाय; तुम कदापि यह बात उसे न बताना ' ॥ २५ ॥
स तच्छ्रुत्वा वचस्तस्य प्रसन्नमनसो नृपः ।
मातरं ते निरस्याशु विजहार कुबेरवत् ॥ २६ ॥
' प्रसन्न चित्तवाले उस साधुका यह वचन सुनकर केकयनरेशने तुम्हारी माताको तुरंत घरसे निकाल दिया और स्वयं कुबेरके समान विहार करने लगे ॥ २६ ॥
तथा त्वमपि राजानं दुर्जनाचरिते पथि ।
असद्ग्राहमिमं मोहात् कुरुषे पापदर्शिनी ॥ २७ ॥
' तुम भी इसी प्रकार दुर्जनोंके मार्गपर स्थित हो पापपर ही दृष्टि रखकर मोहवश राजासे यह अनुचित आग्रह कर रही हो ॥ २७ ॥
सत्यश्चात्र प्रवादोऽयं लौकिकः प्रतिभाति मा ।
पितॄन् समनुजायन्ते नरा मातरमङ्गनाः ॥ २८ ॥
' आज मुझे यह लोकोक्ति सोलह आने सच मालूम होती है कि पुत्र पिताके समान होते हैं और कन्याएँ माताके समान ॥ २८ ॥
नैवं भव गृहाणेदं यदाह वसुधाधिपः ।
भर्तुरिच्छामुपास्वेह जनस्यास्य गतिर्भव ॥ २ ९ ॥
' तुम ऐसी न बनो - इस लोकोक्तिको अपने जीवनमें चरितार्थ न करो । राजाने जो कुछ कहा है, उसे स्वीकार करो ( श्रीरामका राज्याभिषेक होने दो ) । अपने पतिकी इच्छाका अनुसरण करके इस जन - समुदायको यहाँ शरण देनेवाली बनो ॥ २ ९ ॥
मा त्वं प्रोत्साहिता पापैर्देवराजसमप्रभम् ।
भर्तारं लोकभर्तारमसद्धर्ममुपादध ॥ ३० ॥
' पापपूर्ण विचार रखनेवाले लोगोंके बहकावेमें आकर तुम देवराज इन्द्रके तुल्य तेजस्वी अपने लोक-प्रतिपालक स्वामीको अनुचित कर्ममें न लगाओ ॥ ३० ॥
नहि मिथ्या प्रतिज्ञातं करिष्यति तवानघः ।
श्रीमान् दशरथो राजा देवि राजीवलोचनः ॥ ३१ ॥
पञ्चत्रिंशः सर्गः ३३७ ' देवि! कमलनयन श्रीमान् राजा दशरथ पापसे दूर रहते हैं । वे अपनी प्रतिज्ञा झूठी नहीं करेंगे ॥ ३१ ॥
ज्येष्ठो वदान्यः कर्मण्यः स्वधर्मस्यापि रक्षिता ।
रक्षिता जीवलोकस्य बली रामोऽभिषिच्यताम् ॥ ३२ ॥
' श्रीरामचन्द्रजी अपने भाइयोंमें ज्येष्ठ, उदार, कर्मठ,
स्वधर्मके पालक, जीवजगत्के रक्षक और बलवान् हैं ।
इनका इस राज्यपर अभिषेक होने दो ॥३२ ॥
परिवादो हि ते देवि महाँल्लोके चरिष्यति ।
यदि रामो वनं याति विहाय पितरं नृपम् ॥ ३३ ॥
' देवि! यदि श्रीराम अपने पिता राजा दशरथको छोड़कर वनको चले जायँगे तो संसारमें तुम्हारी बड़ी निन्दा होगी ॥ ३३ ॥
स्वराज्यं राघवः पातु भव त्वं विगतज्वरा ।
नहि ते राघवादन्यः क्षमः पुरवरे वसन् ॥ ३४ ॥
' अतः श्रीरामचन्द्रजी ही अपने राज्यका पालन करें और तुम निश्चिन्त होकर बैठो । श्रीरामके सिवा दूसरा कोई राजा इस श्रेष्ठ नगरमें रहकर तुम्हारे अनुकूल आचरण नहीं कर सकता ॥३४ ॥
रामे हि यौवराज्यस्थे राजा दशरथो वनम् ।
प्रवेक्ष्यति महेष्वासः पूर्ववृत्तमनुस्मरन् ॥ ३५ ॥
‘ श्रीरामके युवराजपदपर प्रतिष्ठित हो जानेके बाद महाधनुर्धर राजा दशरथ पूर्वजोंके वृत्तान्तका स्मरण करके स्वयं वनमें प्रवेश करेंगे ' ॥ ३५ ॥
इति सान्त्वैश्च तीक्ष्णैश्च कैकेयीं राजसंसदि ।
भूयः संक्षोभयामास सुमन्त्रस्तु कृताञ्जलिः ॥ ३६ ॥
नैव सा क्षुभ्यते देवी न च स्म परिदूयते ।
न चास्या मुखवर्णस्य लक्ष्यते विक्रिया तदा ॥ ३७ ॥
इस प्रकार सुमन्त्रने हाथ जोड़कर कैकेयीको उस राजभवनमें सान्त्वनापूर्ण तथा तीखे वचनोंसे भी बारम्बार विचलित करनेकी चेष्टा की; किंतु वह टस से मस न हुई । देवी कैकेयीके मनमें न तो क्षोभ हुआ और न दुःख ही । उस समय उसके चेहरेके रंगमें भी कोई फर्क पड़ता नहीं दिखायी | दिया ॥ ३६-३७ ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे पञ्चत्रिंशः सर्गः ॥ ३५ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें पैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३५ ॥
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३३८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे षट्त्रिंशः सर्गः राजा दशरथका श्रीरामके साथ सेना और खजाना भेजनेका आदेश, कैकेयीद्वारा इसका विरोध, सिद्धार्थका कैकेयीको समझाना तथा राजाका श्रीरामके साथ जानेकी इच्छा प्रकट करना
ततः सुमन्त्रमैक्ष्वाकः पीडितोऽत्र प्रतिज्ञया ।
सबाष्पमतिनिःश्वस्य जगादेदं पुनर्वचः ॥१ ॥
तब इक्ष्वाकुकुलनन्दन राजा दशरथ वहाँ अपनी प्रतिज्ञासे पीड़ित हो आँसू बहाते हुए लम्बी साँस खींचकर सुमन्त्रसे फिर इस प्रकार बोले- ॥ १ ॥
सूत रत्नसुसम्पूर्णा चतुर्विधबला चमूः ।
राघवस्यानुयात्रार्थं क्षिप्रं प्रतिविधीयताम् ॥ २ ॥
' सूत! तुम शीघ्र ही रत्नोंसे भरी - पूरी चतुरङ्गिणी सेनाको श्रीरामके पीछे - पीछे जानेकी आज्ञा दो ॥ २ ॥
रूपाजीवाश्च वादिन्यो वणिजश्च महाधनाः ।
शोभयन्तु कुमारस्य वाहिनीः सुप्रसारिताः ॥ ३ ॥
' रूपसे आजीविका चलाने और सरस वचन बोलनेवाली स्त्रियाँ तथा महाधनी एवं विक्रययोग्य द्रव्योंका प्रसारण करनेमें कुशल वैश्य राजकुमार श्रीरामकी सेनाओंको सुशोभित करें ॥ ३ ॥
ये चैनमुपजीवन्ति रमते यैश्च वीर्यतः ।
तेषां बहुविधं दत्त्वा तानप्यत्र नियोजय ॥ ४ ॥
' जो श्रीरामके पास रहकर जीवन निर्वाह करते हैं तथा जिन मल्लोंसे ये उनका पराक्रम देखकर प्रसन्न रहते हैं, उन सबको अनेक प्रकारका धन देकर उन्हें भी इनके साथ जानेकी आज्ञा दे दो ॥ ४ ॥
आयुधानि च मुख्यानि नागराः शकटानि च ।
अनुगच्छन्तु काकुत्स्थं व्याधाश्चारण्यकोविदाः ॥ ५ ॥
' मुख्य - मुख्य आयुध, नगरके निवासी, छकड़े तथा वनके भीतरी रहस्यको जाननेवाले व्याध ककुत्स्थकुलभूषण श्रीरामके पीछे - पीछे जायँ ॥५ ॥
निघ्नन् मृगान् कुञ्जरांश्च पिबंश्चारण्यकं मधु ।
नदीश्च विविधाः पश्यन् न राज्यं संस्मरिष्यति ॥ ६ ॥
' वे रास्तेमें आये हुए मृगों एवं हाथियोंको पीछे लौटाते, जंगली मधुका पान करते और नाना प्रकारकी नदियोंको देखते हुए अपने राज्यका स्मरण नहीं करेंगे ॥
धान्यकोशश्च यः कश्चिद् धनकोशश्च मामकः ।
तौ राममनुगच्छेतां वसन्तं निर्जने वने ॥ ७ ॥
‘ श्रीराम निर्जन वनमें निवास करनेके लिये जा रहे हैं, अतः मेरा खजाना और अन्नभण्डार - ये दोनों वस्तुएँ इनके साथ जायँ ॥ ७ ॥
यजन् पुण्येषु देशेषु विसृजंश्चाप्तदक्षिणाः ।
ऋषिभिश्चापि संगम्य प्रवत्स्यति सुखं वने ॥ ८ ॥
' ये वनके पावन प्रदेशोंमें यज्ञ करेंगे, उनमें आचार्य आदिको पर्याप्त दक्षिणा देंगे तथा ऋषियोंसे मिलकर वनमें सुखपूर्वक रहेंगे ॥ ८ ॥
भरतश्च महाबाहुरयोध्यां पालयिष्यति ।
सर्वकामैः पुनः श्रीमान् रामः संसाध्यतामिति॥९ ॥
' महाबाहु भरत अयोध्याका पालन करेंगे । श्रीमान् रामको सम्पूर्ण मनोवाञ्छित भोगोंसे सम्पन्न करके यहाँसे भेजा जाय'॥९ ॥
एवं ब्रुवति काकुत्स्थे कैकेय्या भयमागतम् ।
मुखं चाप्यगमच्छोषं स्वरश्चापि व्यरुध्यत ॥१० ॥
जब महाराज दशरथ ऐसी बातें कहने लगे, तब कैकेयीको बड़ा भय हुआ । उसका मुँह सूख गया और उसका स्वर भी रुँध गया ॥१० ॥
सा विषण्णा च संत्रस्ता मुखेन परिशुष्यता ।
राजानमेवाभिमुखी कैकेयी वाक्यमब्रवीत् ॥ ११ ॥
वह केकयराजकुमारी विषादग्रस्त एवं त्रस्त होकर सूखे मुँहसे राजाकी ओर ही मुँह करके बोली- ॥ ११ ॥
राज्यं गतधनं साधो पीतमण्डां सुरामिव ।
निरास्वाद्यतमं शून्यं भरतो नाभिपत्स्यते ॥ १२ ॥
' श्रेष्ठ महाराज! जिसका सारभाग पहलेसे ही पी लिया गया हो, उस आस्वादरहित सुराको जैसे उसका सेवन करनेवाले लोग नहीं ग्रहण करते हैं, उसी प्रकार इस धनहीन और सूने राज्यको, जो कदापि सेवन करनेयोग्य नहीं रह जायगा, भरत कदापि नहीं ग्रहण करेंगे ' ॥ १२ ॥
कैकेय्यां मुक्तलज्जायां वदन्त्यामतिदारुणम् ।
राजा दशरथो वाक्यमुवाचायतलोचनाम् ॥ १३ ॥
कैकेयी लाज छोड़कर जब वह अत्यन्त दारुण वचन बोलने लगी, तब राजा दशरथने उस विशाललोचना कैकेयीसे इस प्रकार कहा— ॥ १३ ॥
वहन्तं किं तुदसि मां नियुज्य धुरि माहिते ।
अनायें कृत्यमारब्धं किं न पूर्वमुपारुधः ॥ १४ ॥