वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ — पृष्ठ 531–540
वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 531–540
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अयोध्याकाण्डे पञ्चाधिकशततमः सर्गः ५१ ९
यथा काष्ठं च काष्ठं च समेयातां महार्णवे ।
समेत्य तु व्यपेयातां कालमासाद्य कंचन ॥ २६ ॥
एवं भार्याश्च पुत्राश्च ज्ञातयश्च वसूनि च ।
समेत्य व्यवधावन्ति ध्रुवो ह्येषां विनाभवः ॥ २७ ॥
' जैसे महासागरमें बहते हुए दो काठ कभी एक - दूसरेसे मिल जाते हैं और कुछ कालके बाद अलग भी हो जाते हैं, उसी प्रकार स्त्री, पुत्र, कुटुम्ब और धन भी मिलकर बिछुड़ जाते हैं; क्योंकि इनका वियोग अवश्यम्भावी है ॥ २६-२७ ॥
नात्र कश्चिद् यथाभावं प्राणी समतिवर्तते ।
तेन तस्मिन् न सामर्थ्यं प्रेतस्यास्त्यनुशोचतः ॥ २८ ॥
' इस संसारमें कोई भी प्राणी यथासमय प्राप्त होनेवाले जन्म - मरणका उल्लङ्घन नहीं कर सकता । इसलिये जो किसी मरे हुए व्यक्तिके लिये बारंबार शोक करता है, उसमें भी यह सामर्थ्य नहीं है कि वह अपनी ही मृत्युको टाल सके ॥ २८ ॥
यथा हि सार्थं गच्छन्तं ब्रूयात् कश्चित् पथि स्थितः ।
अहमप्यागमिष्यामि पृष्ठ भवतामिति ॥ २ ९ ॥ ।
एवं पूर्वैर्गतो मार्गः पितृपैतामहैर्भुवः ।
तमापन्नः कथं शोचेद् यस्य नास्ति व्यतिक्रमः ॥ ३० ॥
' जैसे आगे जाते हुए यात्रियों अथवा व्यापारियोंके समुदायसे रास्तेमें खड़ा हुआ पथिक यों कहे कि मैं भी आप लोगोंके पीछे - पीछे आऊँगा और तदनुसार वह उनके पीछे - पीछे जाय, उसी प्रकार हमारे पूर्वज पिता -पितामह आदि जिस मार्गसे गये हैं, जिसपर जाना अनिवार्य है तथा जिससे बचनेका कोई उपाय नहीं है, उसी मार्गपर स्थित हुआ मनुष्य किसी औरके लिये
शोक कैसे करे? ॥। २ ९ -३० ॥
वयसः पतमानस्य स्त्रोतसो वानिवर्तिनः ।
आत्मा सुखे नियोक्तव्यः सुखभाजः प्रजाः स्मृताः ॥ ३१ ॥
‘ जैसे नदियोंका प्रवाह पीछे नहीं लौटता, उसी प्रकार दिन - दिन ढलती हुई अवस्था फिर नहीं लौटती है । उसका क्रमशः नाश हो रहा है, यह सोचकर आत्माको कल्याणके साधनभूत धर्ममें लगावे; क्योंकि सभी लोग अपना कल्याण चाहते हैं ॥ ३१ ॥
धर्मात्मा सुशुभैः कृत्स्नैः क्रतुभिश्चाप्तदक्षिणैः ।
धूतपापो गतः स्वर्गं पिता नः पृथिवीपतिः ॥ ३२ ॥
' तात! हमारे पिता धर्मात्मा थे । उन्होंने पर्याप्त दक्षिणाएँ देकर प्रायः सभी परम शुभकारक यज्ञका अनुष्ठान किया था । उनके सारे पाप धुल गये थे । अतः वे महाराज स्वर्गलोकमें गये हैं ॥ ३२ ॥
भृत्यानां भरणात् सम्यक् प्रजानां परिपालनात् ।
अर्थादानाच्च धर्मेण पिता नस्त्रिदिवं गतः ॥ ३३ ॥
' वे भरण - पोषणके योग्य परिजनोंका भरण करते थे । प्रजाजनोंका भलीभाँति पालन करते थे और प्रजाजनोंसे धर्मके अनुसार कर आदिके रूपमें धन लेते थे - इन सब कारणोंसे हमारे पिता उत्तम स्वर्गलोकमें पधारे हैं ॥ ३३ ॥
कर्मभिस्तु शुभैरिटैः क्रतुभिश्चाप्तदक्षिणैः ।
स्वर्गं दशरथः प्राप्तः पिता नः पृथिवीपतिः ॥ ३४ ॥
' सर्वप्रिय शुभ कर्मों तथा प्रचुर दक्षिणवाले यज्ञोंके अनुष्ठानोंसे हमारे पिता पृथ्वीपति महाराज दशरथ स्वर्गलोकमें गये हैं ॥ ३४ ॥
इष्ट्वा बहुविधैर्यज्ञैर्भोगांश्चावाप्य पुष्कलान् ।
उत्तमं चायुरासाद्य स्वर्गतः पृथिवीपतिः ॥ ३५ ॥
' उन्होंने नाना प्रकारके यज्ञोंद्वारा यज्ञपुरुषकी आराधना की, प्रचुर भोग प्राप्त किये और उत्तम आयु पायी थी, इसके बाद वे महाराज यहाँसे स्वर्गलोकको पधारे हैं ॥
आयुरुत्तममासाद्य भोगानपि च राघवः ।
न स शोच्यः पिता तात स्वर्गतः सत्कृतः सताम् ॥ ३६ ॥
' तात! अन्य राजाओंकी अपेक्षा उत्तम आयु और श्रेष्ठ भोगोंको पाकर हमारे पिता सदा सत्पुरुषोंके द्वारा सम्मानित हुए हैं; अतः स्वर्गवासी हो जानेपर भी वे शोक करनेयोग्य नहीं हैं ॥ ३६ ॥
स जीर्णमानुषं देहं परित्यज्य पिता हि नः ।
दैवीमृद्धिमनुप्राप्तो ब्रह्मलोकविहारिणीम् ॥ ३७ ॥
' हमारे पिताने जराजीर्ण मानव शरीरका परित्याग करके दैवी सम्पत्ति प्राप्त की है, जो ब्रह्मलोकमें विहार करानेवाली है ॥ ३७ ॥
तं तु नैवंविधः कश्चित् प्राज्ञः शोचितुमर्हसि ।
त्वद्विधो मद्विधश्चापि श्रुतवान् बुद्धिमत्तरः ॥ ३८ ॥
' कोई भी ऐसा विद्वान्, जो तुम्हारे और मेरे समान शास्त्र - ज्ञान - सम्पन्न एवं परम बुद्धिमान् है, पिताजीके लिये शोक नहीं कर सकता ॥३८ ॥
एते बहुविधाः शोका विलापरुदिते तदा ।
वर्जनीया हि धीरेण सर्वावस्थासु धीमता ॥ ३ ९ ॥
' धीर एवं प्रज्ञावान् पुरुषको सभी अवस्थाओंमें ये नाना प्रकारके शोक, विलाप तथा रोदन त्याग देने चाहिये ॥
स स्वस्थो भव मा शोको यात्वा चावस तां पुरीम् ।
। तथा पित्रा नियुक्तोऽसि वशिना वदतां वर ॥४० ॥
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५२० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे ' इसलिये तुम स्वस्थ हो जाओ, तुम्हारे मनमें । शोक नहीं होना चाहिये । वक्ताओंमे श्रेष्ठ भरत! तुम यहाँसे जाकर अयोध्यापुरीमें निवास करो; क्योंकि मनको वशमें रखनेवाले पूज्य पिताजीने तुम्हारे लिये यही आदेश दिया है ॥ ४० ॥
यत्राहमपि तेनैव नियुक्तः पुण्यकर्मणा ।
तत्रैवाहं करिष्यामि पितुरार्यस्य शासनम् ॥ ४१ ॥
' उन पुण्यकर्मा महाराजने मुझे भी जहाँ रहनेकी आज्ञा दी है, वहीं रहकर मैं उन पूज्य पिताके आदेशका पालन करूँगा ॥ ४१ ॥
न मया शासनं तस्य त्यक्तुं न्याय्यमरिंदम ।
स त्वयापि सदा मान्यः स वै बन्धुः स नः पिता ॥ ४२ ॥
' शत्रुदमन भरत! पिताकी आज्ञाकी अवहेलना करना मेरे लिये कदापि उचित नहीं है । वे तुम्हारे लिये भी सर्वदा सम्मानके योग्य हैं; क्योंकि वे ही हमलोगोंके हितैषी बन्धु और जन्मदाता थे ॥४२ ॥
तद् वचः पितुरेवाहं सम्मतं धर्मचारिणाम् ।
कर्मणा पालयिष्यामि वनवासेन राघव ॥ ४३ ॥
' रघुनन्दन! मैं इस वनवासरूपी कर्मके द्वारा पिताजीके ही वचनका जो धर्मात्माओंको भी मान्य है, पालन करूँगा ॥ ४३ ॥
धार्मिकेणानृशंसेन नरेण गुरुवर्तिना ।
भवितव्यं नरव्याघ्र परलोकं जिगीषता ॥ ४४ ॥
' नरश्रेष्ठ! परलोकपर विजय पानेकी इच्छा रखनेवाले मनुष्यको धार्मिक, क्रूरतासे रहित और गुरुजनोंका आज्ञापालक होना चाहिये ॥ ४४ ॥
आत्मानमनुतिष्ठ त्वं स्वभावेन नरर्षभ ।
निशाम्य तु शुभं वृत्तं पितुर्दशरथस्य नः ॥ ४५ ॥
' मनुष्योंमें श्रेष्ठ भरत! हमारे पूज्य पिता दशरथके शुभ आचरणोंपर दृष्टिपात करके तुम अपने धार्मिक स्वभावके द्वारा आत्माकी उन्नतिके लिये प्रयत्न करो ' ॥ इत्येवमुक्त्वा वचनं महात्मा पितुर्निदेशप्रतिपालनार्थम् यवीयसं भ्रातरमर्थवच्च प्रभुर्मुहूर्ताद् विरराम रामः ॥ ४६ ॥
सर्वशक्तिमान् महात्मा श्रीराम एक मुहूर्ततक अपने छोटे भाई भरतसे पिताकी आज्ञाका पालन करानेके उद्देश्यसे ये अर्थयुक्त वचन कहकर चुप हो गये ॥ ४६ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे पञ्चाधिकशततमः सर्गः ॥ १०५ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ पाँचवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १०५ ॥
षडधिकशततमः सर्गः भरतकी पुनः श्रीरामसे अयोध्या लौटने और राज्य ग्रहण करनेकी प्रार्थना
एवमुक्त्वा तु विरते रामे वचनमर्थवत् ।
ततो मन्दाकिनीतीरे रामं प्रकृतिवत्सलम् ॥ १ ॥
उवाच भरतश्चित्रं धार्मिको धार्मिकं वचः ।
को हि स्यादीदृशो लोके यादृशस्त्वमरिंदम ॥ २ ॥
ऐसा अर्थयुक्त वचन कहकर जब श्रीराम चुप हो गये, तब धर्मात्मा भरतने मन्दाकिनीके तटपर प्रजावत्सल धर्मात्मा श्रीरामसे यह विचित्र बात कही-' शत्रुदमन रघुवीर! इस जगत् में जैसे आप हैं, वैसा दूसरा कौन हो सकता है? ॥ १-२ ॥
न त्वां प्रव्यथयेद् दुःखं प्रीतिर्वा न प्रहर्षयेत् ।
सम्मतश्चापि वृद्धानां तांश्च पृच्छसि संशयान् ॥ ३ ॥
‘ कोई भी दुःख आपको व्यथित नहीं कर सकता । कितनी ही प्रिय बात क्यों न हो, वह आपको हर्षोत्फुल्ल नहीं कर सकती । वृद्ध पुरुषोंके सम्माननीय होकर भी आप उनसे संदेहकी बातें पूछते हैं ॥ ३ ॥
यथा मृतस्तथा जीवन् यथासति तथा सति ।
यस्यैष बुद्धिलाभः स्यात् परितप्येत केन सः ॥ ४ ॥
' जैसे मरे हुए जीवका अपने शरीर आदिसे कोई सम्बन्ध नहीं रहता, उसी प्रकार जीते - जी भी वह उनके सम्बन्धसे रहित है । जैसे वस्तुके अभावमें उसके प्रति राग - द्वेष नहीं होता, वैसे ही उसके रहनेपर भी मनुष्यको राग - द्वेषसे शून्य होना चाहिये । जिसे ऐसी विवेकयुक्त बुद्धि प्राप्त हो गयी है, उसको संताप क्यों होगा? ॥४ ॥
परावरज्ञो यश्च स्याद् यथा त्वं मनुजाधिप ।
स एव व्यसनं प्राप्य न विषीदितुमर्हति ॥ ५ ॥
' नरेश्वर! जिसे आपके समान आत्मा और अनात्माका ज्ञान है, वही संकटमें पड़नेपर भी विषाद नहीं कर सकता ॥ ५ ॥
अमरोपमसत्त्वस्त्वं महात्मा सत्यसंगरः ।
सर्वज्ञः सर्वदर्शी च बुद्धिमांश्चासि राघव ॥ ६ ॥
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अयोध्याकाण्डे षडधिकशततमः सर्गः ५२१ ‘ रघुनन्दन! आप देवताओंकी भाँति सत्त्वगुणसे । सम्पन्न, महात्मा, सत्यप्रतिज्ञ, सर्वज्ञ, सबके साक्षी और बुद्धिमान् हैं ॥६ ॥
न त्वामेवंगुणैर्युक्तं प्रभवाभवकोविदम् ।
अविषह्यतमं दुःखमासादयितुमर्हति ॥ ७ ॥
' ऐसे उत्तम गुणोंसे युक्त और जन्म - मरणके रहस्यको जाननेवाले आपके पास असह्य दुःख नहीं आ सकता ॥ ७ ॥
प्रोषिते मयि यत् पापं मात्रा मत्कारणात् कृतम् ।
क्षुद्रया तदनिष्टं मे प्रसीदतु भवान् मम ॥ ८ ॥
' जब मैं परदेशमें था, उस समय नीच विचार रखनेवाली मेरी माताने मेरे लिये जो पाप कर डाला, वह मुझे अभीष्ट नहीं है; अतः आप उसे क्षमा करके मुझपर प्रसन्न हों ॥ ८ ॥
धर्मबन्धेन बद्धोऽस्मि तेनेमां नेह मातरम् ।
हन्मि तीव्रेण दण्डेन दण्डार्हां पापकारिणीम् ॥ ९ ॥
' मैं धर्मके बन्धनमें बँधा हूँ, इसलिये इस पाप करनेवाली एवं दण्डनीय माताको मैं कठोर दण्ड देकर मार नहीं डालता ॥ ९ ॥
कथं दशरथाज्जातः शुभाभिजनकर्मणः ।
जानन् धर्ममधर्मं च कुर्यां कर्म जुगुप्सितम् ॥ १० ॥
' जिनके कुल और कर्म दोनों ही शुभ थे, उन महाराज दशरथसे उत्पन्न होकर धर्म और अधर्मको जानता हुआ भी मैं मातृवधरूपी लोकनिन्दित कर्म कैसे करूँ? ॥१० ॥
गुरुः क्रियावान् वृद्धश्च राजा प्रेतः पितेति च ।
तातं न परिगर्हेऽहं दैवतं चेति संसदि ॥ ११ ॥
' महाराज मेरे गुरु, श्रेष्ठ यज्ञकर्म करनेवाले, बड़े - बूढ़े, राजा, पिता और देवता रहे हैं और इस समय परलोकवासी हो चुके हैं, इसीलिये इस भरी सभामें मैं उनकी निन्दा नहीं करता हूँ ॥ ११ ॥
को हि धर्मार्थयोर्हीनमीदृशं कर्म किल्बिषम् ।
स्त्रियः प्रियचिकीर्षुः सन् कुर्याद् धर्मज्ञ धर्मवित् ॥ १२ ॥
' धर्मज्ञ रघुनन्दन! कौन ऐसा मनुष्य है, जो धर्मको जानते हुए भी स्त्रीका प्रिय करनेकी इच्छासे ऐसा धर्म और अर्थसे हीन कुत्सित कर्म कर सकता है? ॥ १२ ॥
अन्तकाले हि भूतानि मुह्यन्तीति पुरा श्रुतिः ।
राज्ञैवं कुर्वता लोके प्रत्यक्षा सा श्रुतिः कृता ॥ १३ ॥
' लोकमें एक प्राचीन किंवदन्ती है कि अन्तकालमें सब प्राणी मोहित हो जाते हैं - उनकी बुद्धि नष्ट हो जाती है । राजा दशरथने ऐसा कठोर कर्म करके उस किंवदन्तीकी सत्यताको प्रत्यक्ष कर दिखाया ॥ १३ ॥
साध्वर्थमभिसंधाय क्रोधान्मोहाच्च साहसात् ।
तातस्य यदतिक्रान्तं प्रत्याहरतु तद् भवान् ॥ १४ ॥
' पिताजीने क्रोध, मोह और साहसके कारण ठीक समझ कर जो धर्मका उल्लङ्घन किया है, उसे आप पलट दें - उसका संशोधन कर दें ॥ १४ ॥
पितुर्हि समतिक्रान्तं पुत्रो यः साधु मन्यते ।
तदपत्यं मतं लोके विपरीतमतोऽन्यथा ॥ १५ ॥
' जो पुत्र पिताकी की हुई भूलको ठीक कर देता है, वही लोकमें उत्तम संतान माना गया है । जो इसके विपरीत बर्ताव करता है, वह पिताकी श्रेष्ठ संतति नहीं है ॥ १५ ॥
तदपत्यं भवानस्तु मा भवान् दुष्कृतं पितुः ।
अति यत् तत् कृतं कर्म लोके धीरविगर्हितम् ॥ १६ ॥
' अतः आप पिताकी योग्य संतान ही बने रहें । उनके अनुचित कर्मका समर्थन न करें । उन्होंने इस
समय जो कुछ किया है, वह धर्मकी सीमासे बाहर है ।
संसारमें धीर पुरुष उसकी निन्दा करते हैं ॥ १६ ॥
कैकेयीं मां च तातं च सुहृदो बान्धवांश्च नः ।
पौरजानपदान् सर्वांस्त्रातुं सर्वमिदं भवान् ॥ १७ ॥
' कैकेयी, मैं, पिताजी, सुहृद्गण, बन्धु - बान्धव, पुरवासी तथा राष्ट्रकी प्रजा - इन सबकी रक्षाके लिये आप मेरी प्रार्थना स्वीकार करें ॥ १७ ॥
क्व चारण्यं क्व च क्षात्रं क्व जटाः क्व च पालनम् ।
ईदृशं व्याहतं कर्म न भवान् कर्तुमर्हति ॥ १८ ॥
' कहाँ वनवास और कहाँ क्षात्रधर्म? कहाँ जटा-धारण और कहाँ प्रजाका पालन? ऐसे परस्परविरोधी कर्म आपको नहीं करने चाहिये ॥ १८ ॥
एष हि प्रथमो धर्मः क्षत्रियस्याभिषेचनम् ।
येन शक्यं महाप्राज्ञ प्रजानां परिपालनम् ॥ १ ९ ॥
' महाप्राज्ञ! क्षत्रियके लिये पहला धर्म यही है कि उसका राज्यपर अभिषेक हो, जिससे वह प्रजाका भलीभाँति पालन कर सके ॥१ ९ ॥
कश्च प्रत्यक्षमुत्सृज्य संशयस्थमलक्षणम् ।
आयतिस्थं चरेद् धर्मं क्षत्रबन्धुरनिश्चितम् ॥ २० ॥
' भला कौन ऐसा क्षत्रिय होगा, जो प्रत्यक्ष सुख साधनभूत प्रजापालनरूप धर्मका परित्याग करके संशयमें स्थित, सुखके लक्षणसे रहित, भविष्यमें फल देनेवाले । अनिश्चित धर्मका आचरण करेगा? ॥ २० ॥
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५२२ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे
अथ क्लेशजमेव त्वं धर्मं चरितुमिच्छसि ।
धर्मेण चतुरो वर्णान् पालयन् क्लेशमाजुहि ॥ २१ ॥
' यदि आप क्लेशसाध्य धर्मका ही आचरण करना चाहते हैं तो धर्मानुसार चारों वर्णोंका पालन करते हुए ही कष्ट उठाइये ॥ २१ ॥
चतुर्णामाश्रमाणां हि गार्हस्थ्यं श्रेष्ठमुत्तमम् ।
आहुर्धर्मज्ञ धर्मज्ञास्तं कथं त्यक्तुमिच्छसि ॥ २२ ॥
' धर्मज्ञ रघुनन्दन! धर्मके ज्ञाता पुरुष चारों आश्रमोंमें गार्हस्थ्यको ही श्रेष्ठ बतलाते हैं, फिर आप उसका परित्याग क्यों करना चाहते हैं? ॥ २२ ॥
श्रुतेन बालः स्थानेन जन्मना भवतो ह्यहम् ।
स कथं पालयिष्यामि भूमिं भवति तिष्ठति ॥ २३ ॥
' मैं शास्त्रज्ञान और जन्मजात अवस्था दोनों ही दृष्टियोंसे आपकी अपेक्षा बालक हूँ, फिर आपके रहते हुए मैं वसुधाका पालन कैसे करूँगा? ॥ २३ ॥
हीनबुद्धिगुणो बालो हीनस्थानेन चाप्यहम् ।
भवता च विनाभूतो न वर्तयितुमुत्सहे ॥ २४ ॥
' मैं बुद्धि और गुण दोनोंसे हीन हूँ, बालक हूँ तथा मेरा स्थान आपसे बहुत छोटा है; अतः मैं आपके बिना जीवन - धारण भी नहीं कर सकता, राज्यका पालन तो दूरकी बात है ॥ २४ ॥
इदं निखिलमप्यग्र्यं राज्यं पित्र्यमकण्टकम् ।
अनुशाधि स्वधर्मेण धर्मज्ञ सह बान्धवैः ॥ २५ ॥
' धर्मज्ञ रघुनन्दन! पिताका यह सारा राज्य श्रेष्ठ और निष्कण्टक है, अतः आप बन्धु - बान्धवोंके साथ स्वधर्मानुसार इसका पालन कीजिये ॥ २५ ॥
इहैव त्वाभिषिञ्चन्तु सर्वाः प्रकृतयः सह ।
ऋत्विजः सवसिष्ठाश्च मन्त्रविन्मन्त्रकोविदाः ॥ २६ ॥
' मन्त्रज्ञ रघुवीर! मन्त्रोंके ज्ञाता महर्षि वसिष्ठ आदि सभी ऋत्विज् तथा मन्त्री, सेनापति और प्रजा आदि सारी प्रकृतियाँ यहाँ उपस्थित हैं । ये सब लोग यहीं आपका राज्याभिषेक करें ॥ २६ ॥
अभिषिक्तस्त्वमस्माभिरयोध्यां पालने व्रज ।
विजित्य तरसा लोकान् मरुद्भिरिव वासवः ॥ २७ ॥
‘ हमलोगोंके द्वारा अभिषिक्त होकर आप मरुद्गणोंसे अभिषिक्त हुए इन्द्रकी भाँति वेगपूर्वक सब लोकोंको जीतकर प्रजाका पालन करनेके लिये अयोध्याको चलें ॥
ऋणानि त्रीण्यपाकुर्वन् दुर्हृदः साधु निर्दहन् ।
सुहृदस्तर्पयन् कामैस्त्वमेवात्रानुशाधि माम् ॥ २८ ॥
' वहाँ देवता, ऋषि और पितरोंका ऋण चुकायें, दुष्ट शत्रुओंका भलीभाँति दमन करें तथा मित्रोंको उनके इच्छानुसार वस्तुओंद्वारा तृप्त करते हुए आप ही अयोध्या में मुझे धर्मकी शिक्षा देते रहें ॥ २८ ॥
अद्यार्य मुदिताः सन्तु सुहृदस्तेऽभिषेचने ।
अद्य भीताः पलायन्तु दुष्प्रदास्ते दिशो दश ॥ २ ९ ॥
‘ आर्य! आपका अभिषेक सम्पन्न होनेपर सुहृद्गण प्रसन्न हों और दुःख देनेवाले आपके शत्रु भयभीत होकर दसों दिशाओंमें भाग जायँ ॥ २ ९ ॥
आक्रोशं मम मातुश्च प्रमृज्य पुरुषर्षभ ।
अद्य तत्रभवन्तं च पितरं रक्ष किल्बिषात् ॥ ३० ॥
' पुरुषप्रवर! आज आप मेरी माताके कलङ्कको धो - पोंछकर पूज्य पिताजीको भी निन्दासे बचाइये ॥ ३० ॥
शिरसा त्वाभियाचेऽहं कुरुष्व करुणां मयि ।
बान्धवेषु च सर्वेषु भूतेष्विव महेश्वरः ॥ ३१ ॥
' मैं आपके चरणोंमें माथा टेककर याचना करता हूँ । आप मुझपर दया कीजिये । जैसे महादेवजी सब प्राणियोंपर अनुग्रह करते हैं, उसी प्रकार आप भी अपने बन्धु - बान्धवोंपर कृपा कीजिये ॥ ३१ ॥
अथवा पृष्ठतः कृत्वा वनमेव भवानितः ।
गमिष्यति गमिष्यामि भवता सार्धमप्यहम् ॥ ३२ ॥
' अथवा यदि आप मेरी प्रार्थनाको ठुकराकर यहाँसे वनको ही जायँगे तो मैं भी आपके साथ जाऊँगा ' ॥ ३२ ॥
तथाभिरामो भरतेन ताम्यता प्रसाद्यमानः शिरसा महीपतिः । न चैव चक्रे गमनाय सत्त्ववान् मतिं पितुस्तद् वचने प्रतिष्ठितः ॥ ३३ ॥
ग्लानिमें पड़े हुए भरतने मनोभिराम राजा श्रीरामको उनके चरणोंमें माथा टेककर प्रसन्न करनेकी चेष्टा की तथापि उन सत्त्वगुणसम्पन्न रघुनाथजीने पिताकी आज्ञा में ही दृढ़तापूर्वक स्थित रहकर अयोध्या जानेका विचार नहीं किया ॥ ३३ ॥
तदद्भुतं स्थैर्यमवेक्ष्य राघवे समं जनो हर्षमवाप दुःखितः । न यात्ययोध्यामिति दुःखितोऽभवत् स्थिरप्रतिज्ञत्वमवेक्ष्य हर्षितः ॥ ३४ ॥
श्रीरामचन्द्रजीकी वह अद्भुत दृढ़ता देखकर सब लोग एक ही साथ दुःखी भी हुए और हर्षको भी प्राप्त हुए । ये अयोध्या नहीं जा रहे हैं- यह सोचकर वे दुःखी हुए और प्रतिज्ञा - पालनमें उनकी दृढ़ता देखकर उन्हें हर्ष हुआ ।
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अयोध्याकाण्डे सप्ताधिकशततमः सर्गः ५२३ मृत्विजो नैगमयूथवल्लभा- नेता और माताएँ अचेत - सी होकर आँसू बहाती हुई स्तथा विसंज्ञाश्रुकलाश्च मातरः । पूर्वोक्त बातें कहनेवाली भरतकी भूरि - भूरि प्रशंसा करने तथा ब्रुवाणं भरतं प्रतुष्टुवुः | लगीं और सबने उनके साथ ही योग्यतानुसार श्रीरामजीके प्रणम्य रामं च ययाचिरे सह ॥ ३५ ॥ सामने विनीत होकर उनसे अयोध्या लौट चलनेकी
उस समय ऋत्विज् पुरवासी, भिन्न - भिन्न समुदायके । याचना की ॥ ३५ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे षडधिकशततमः सर्गः ॥ १०६ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ छ्वाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १०६ ॥
सप्ताधिकशततमः सर्गः श्रीरामका भरतको समझाकर उन्हें अयोध्या जानेका आदेश देना
पुनरेवं ब्रुवाणं तं भरतं लक्ष्मणाग्रजः ।
प्रत्युवाच ततः श्रीमान् ज्ञातिमध्ये सुसत्कृतः ॥ १ ॥
जब भरत पुनः इस प्रकार प्रार्थना करने लगे, तब कुटुम्बीजनोंके बीचमें सत्कारपूर्वक बैठे हुए लक्ष्मणके बड़े भाई श्रीमान् रामचन्द्रजीने उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया- ॥१ ॥
उपपन्नमिदं वाक्यं जातः पुत्रो दशरथात् ' भाई! तुम नृपश्रेष्ठ राजकन्या माता कैकेयीके जो ऐसे उत्तम वचन कहे पुरा भ्रातः पिता नः मातामहे समाश्रौषीद्
यस्त्वमेवमभाषथाः ।
कैकेय्यां राजसत्तमात् ॥ २ ॥
महाराज दशरथके द्वारा केकय-गर्भसे उत्पन्न हुए हो; अत: तुमने हैं, वे सर्वथा तुम्हारे योग्य हैं ।
स मातरं ते समुद्वहन् ।
राज्यशुल्कमनुत्तमम् ॥ ३ ॥
' भैया! आजसे बहुत पहलेकी बात है - पिताजीका जब तुम्हारी माताजीके साथ विवाह हुआ था, तभी उन्होंने तुम्हारे नानासे कैकेयीके पुत्रको राज्य देनेकी उत्तम शर्त कर ली थी ॥ ३ ॥
देवासुरे च संग्रामे जनन्यै तव पार्थिवः ।
सम्प्रहृष्टो ददौ राजा वरमाराधितः प्रभुः ॥ ४ ॥
' इसके बाद देवासुर संग्राममें तुम्हारी माताने प्रभावशाली महाराजकी बड़ी सेवा की; इससे संतुष्ट होकर राजाने उन्हें वरदान दिया ॥४ ॥
ततः सा सम्प्रतिश्राव्य तव माता यशस्विनी ।
अयाचत नरश्रेष्ठं द्वौ वरौ वरवर्णिनी ॥ ५ ॥
' उसीकी पूर्तिके लिये प्रतिज्ञा कराकर तुम्हारी श्रेष्ठ वर्णवाली यशस्विनी माताने उन नरश्रेष्ठ पिताजीसे दो वर माँगे ॥५ ॥
तव राज्यं नरव्याघ्र मम प्रव्राजनं तथा ।
तच्च राजा तथा तस्यै नियुक्तः प्रददौ वरम् ॥ ६ ॥
' पुरुषसिंह! एक वरके द्वारा इन्होंने तुम्हारे लिये राज्य माँगा और दूसरेके द्वारा मेरा वनवास । इनसे इस प्रकार प्रेरित होकर राजाने वे दोनों वर इन्हें दे दिये ॥
तेन पित्राहमप्यत्र नियुक्तः पुरुषर्षभ ।
चतुर्दश वने वासं वर्षाणि वरदानिकम् ॥ ७ ॥
' पुरुषप्रवर! इस प्रकार उन पिताजीने वरदानके रूपमें मुझे चौदह वर्षोंतक वनवासकी आज्ञा दी है ।
सोऽयं वनमिदं प्राप्तो निर्जनं लक्ष्मणान्वितः ।
सीतया चाप्रतिद्वन्द्वः सत्यवादे स्थितः पितुः ॥ ८ ॥
' यही कारण है कि मैं सीता और लक्ष्मणके साथ इस निर्जन वनमें चला आया हूँ । यहाँ मेरा कोई प्रतिद्वन्द्वी नहीं है । मैं यहाँ पिताजीके सत्यकी रक्षामें स्थित रहूँगा ॥
भवानपि तथेत्येव पितरं सत्यवादिनम् ।
कर्तुमर्हसि राजेन्द्र क्षिप्रमेवाभिषिञ्चनात् ॥ ९ ॥
' राजेन्द्र! तुम भी उनकी आज्ञा मानकर शीघ्र ही राज्यपदपर अपना अभिषेक करा लो और पिताको सत्यवादी बनाओ - यही तुम्हारे लिये उचित है ॥ ९ ॥
ऋणान्मोचय राजानं मत्कृते भरत प्रभुम् ।
पितरं त्राहि धर्मज्ञ मातरं चाभिनन्दय ॥ १० ॥
' धर्मज्ञ भरत! तुम मेरे लिये पूज्य पिता राजा दशरथको कैकेयीके ऋणसे मुक्त करो, उन्हें नरकमें गिरनेसे बचाओ और माताका भी आनन्द बढ़ाओ ॥ १० ॥
श्रूयते धीमता तात श्रुतिर्गीता यशस्विना ।
गयेन यजमानेन गयेष्वेव पितॄन् प्रति ॥ ११ ॥
' तात! सुना जाता है कि बुद्धिमान्, यशस्वी राजा गयने गय- देशमें ही यज्ञ करते हुए पितरोंके प्रति एक कहावत कही थी ॥ ११ ॥
पुन्नाम्नो नरकाद् यस्मात् पितरं त्रायते सुतः ।
। तस्मात् पुत्र इति प्रोक्तः पितॄन् यः पाति सर्वतः ॥ १२ ॥
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५२४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे ' ( वह इस प्रकार है— ) बेटा पुत् नामक नरकसे ।
पिताका उद्धार करता है, इसलिये वह पुत्र कहा गया है ।
वही पुत्र है, जो पितरोंकी सब ओरसे रक्षा करता है ॥
एष्टव्या बहवः पुत्रा गुणवन्तो बहुश्रुताः ।
तेषां वै समवेतानामपि कश्चिद् गयां व्रजेत् ॥ १३ ॥
' बहुत - से गुणवान् और बहुश्रुत पुत्रोंकी इच्छा करनी चाहिये । सम्भव है कि प्राप्त हुए उन पुत्रोंमेंसे कोई एक भी गयाकी यात्रा करे? ॥ १३ ॥
एवं राजर्षयः सर्वे प्रतीता रघुनन्दन ।
तस्मात् त्राहि नरश्रेष्ठ पितरं नरकात् प्रभो ॥ १४ ॥
' रघुनन्दन! नरश्रेष्ठ भरत! इस प्रकार सभी राजर्षियोंने पितरोंके उद्धारका निश्चय किया है, अतः प्रभो! तुम भी अपने पिताका नरकसे उद्धार करो ॥ १४ ॥
अयोध्यां गच्छ भरत प्रकृतीरुपरञ्जय ।
शत्रुघ्नसहितो वीर सह सर्वैर्द्विजातिभिः ॥ १५ ॥
' वीर भरत! तुम शत्रुघ्न तथा समस्त ब्राह्मणोंको साथ लेकर अयोध्याको लौट जाओ और प्रजाको सुख दो ॥
प्रवेक्ष्ये दण्डकारण्यमहमप्यविलम्बयन् ।
आभ्यां तु सहितो वीर वैदेह्या लक्ष्मणेन च ॥ १६ ॥
' वीर! अब मैं भी लक्ष्मण और सीताके साथ शीघ्र ही दण्डकारण्यमें प्रवेश करूँगा ॥ १६ ॥
त्वं राजा भरत भव स्वयं नराणां वन्यानामहमपि राजराण्मृगाणाम् । गच्छ त्वं पुरवरमद्य सम्प्रहृष्टः संहृष्टस्त्वहमपि दण्डकान् प्रवेक्ष्ये ॥ १७ ॥
' भरत! तुम स्वयं मनुष्योंके राजा बनो और मैं जंगली पशुओंका सम्राट् बनूँगा । अब तुम अत्यन्त हर्षपूर्वक श्रेष्ठ नगर अयोध्याको जाओ और मैं भी प्रसन्नतापूर्वक दण्डक - वनमें प्रवेश करूँगा ॥ १७ ॥
छायां ते दिनकरभाः प्रबाधमानं वर्षत्रं भरत करोतु मूर्ध्नि शीताम् । एतेषामहमपि काननद्रुमाणां छायां तामतिशयिनीं शनैः श्रयिष्ये ॥ १८ ॥
' भरत! सूर्यकी प्रभाको तिरोहित कर देनेवाला छत्र तुम्हारे मस्तकपर शीतल छाया करे । अब मैं भी धीरे - धीरे इन जंगली वृक्षोंकी घनी छायाका आश्रय लूँगा ॥ १८ ॥
शत्रुघ्नस्त्वल सहायः सौमित्रिर्मम विदितः प्रधानमित्रम् । चत्वारस्तनयवरा वयं नरेन्द्र सत्यस्थं भरत चराम मा विषीद ॥ १ ९ ॥ ' भरत! अतुलित बुद्धिवाले शत्रुघ्न तुम्हारी सहायतामें रहें और सुविख्यात सुमित्राकुमार लक्ष्मण मेरे प्रधान मित्र ( सहायक ) हैं; हम चारों पुत्र अपने पिता राजा दशरथके सत्यकी रक्षा करें । तुम विषाद मत करो ' ॥ १ ९ ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे सप्ताधिकशततमः सर्गः ॥ १०७ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ सातवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १०७ ॥
अष्टाधिकशततमः सर्गः जाबालिका नास्तिकोंके मतका अवलम्बन करके श्रीरामको समझाना
आश्वासयन्तं भरतं जाबालिर्ब्राह्मणोत्तमः ।
उवाच रामं धर्मज्ञं धर्मापेतमिदं वचः ॥ १ ॥
जब धर्मज्ञ श्रीरामचन्द्रजी भरतको इस प्रकार समझा - बुझा रहे थे, उसी समय ब्राह्मणशिरोमणि जाबालिने उनसे यह धर्मविरुद्ध वचन कहा- ॥ १ ॥
साधु राघव मा भूत् ते बुद्धिरेवं निरर्थिका ।
प्राकृतस्य नरस्येव ह्यार्यबुद्धेस्तपस्विनः ॥ २ ॥
' रघुनन्दन! आपने ठीक कहा, परंतु आप श्रेष्ठ बुद्धिवाले और तपस्वी हैं; अतः आपको गँवार मनुष्यकी तरह ऐसा निरर्थक विचार मनमें नहीं लाना चाहिये ॥ २ ॥
कः कस्य पुरुषो बन्धुः किमाप्यं कस्य केनचित् ।
एको हि जायते जन्तुरेक एव विनश्यति ॥ ३ ॥
' संसारमें कौन पुरुष किसका बन्धु है और किससे किसको क्या पाना है? जीव अकेला ही जन्म लेता और अकेला ही नष्ट हो जाता है ॥ ३ ॥
तस्मान्माता पिता चेति राम सज्जेत यो नरः ।
उन्मत्त इव स ज्ञेयो नास्ति कश्चिद्धि कस्यचित् ॥ ४ ॥
' अतः श्रीराम! जो मनुष्य माता या पिता समझकर किसीके प्रति आसक्त होता है, उसे पागलके समान समझना चाहिये; क्योंकि यहाँ कोई किसीका कुछ भी नहीं है ॥ ४ ॥
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अयोध्याकाण्डे अष्टाधिकशततमः सर्गः ५२५
यथा ग्रामान्तरं गच्छन् नरः कश्चिद् बहिर्वसेत् ।
उत्सृज्य च तमावासं प्रतिष्ठेतापरेऽहनि ॥ ५ ॥
एवमेव मनुष्याणां पिता माता गृहं वसु ।
आवासमात्रं काकुत्स्थ सज्जन्ते नात्र सज्जनाः ॥ ६ ॥
' जैसे कोई मनुष्य दूसरे गाँवको जाते समय बाहर किसी धर्मशालामें एक रातके लिये ठहर जाता है और दूसरे दिन उस स्थानको छोड़कर आगेके लिये प्रस्थित हो जाता है, इसी प्रकार पिता, माता, घर और धन-ये मनुष्योंके आवासमात्र हैं । ककुत्स्थकुलभूषण! इनमें सज्जन पुरुष आसक्त नहीं होते हैं ॥ ६ ॥
पित्र्यं राज्यं समुत्सृज्य स नार्हसि नरोत्तम ।
आस्थातुं कापथं दुःखं विषमं बहुकण्टकम् ॥ ७ ॥
' अतः नरश्रेष्ठ! आपको पिताका राज्य छोड़कर इस दुःखमय, नीचे - ऊँचे तथा बहुकण्टकाकीर्ण वनके कुत्सित मार्गपर नहीं चलना चाहिये ॥७ ॥
समृद्धायामयोध्यायामात्मानमभिषेचय एकवेणीधरा हि त्वा नगरी सम्प्रतीक्षते ॥ ८ ॥
' आप समृद्धिशालिनी अयोध्यामें राजाके पदपर अपना अभिषेक कराइये । वह नगरी प्रोषितभर्तृका नारीकी भाँति एक वेणी धारण करके आपकी प्रतीक्षा करती है ॥८ ॥
राजभोगाननुभवन् महार्हान् पार्थिवात्मज ।
विहर त्वमयोध्यायां यथा शक्रस्त्रिविष्टपे ॥ ९ ॥
' राजकुमार! जैसे देवराज इन्द्र स्वर्गमें विहार करते हैं, उसी प्रकार आप बहुमूल्य राजभोगोंका उपभोग करते हुए अयोध्यामें विहार कीजिये ॥ ९ ॥
न ते कश्चिद् दशरथस्त्वं च तस्य च कश्चन ।
अन्यो राजा त्वमन्यस्तु तस्मात् कुरु यदुच्यते ॥ १० ॥
' राजा दशरथ आपके कोई नहीं थे और आप भी उनके कोई नहीं हैं । राजा दूसरे थे और आप भी दूसरे हैं; इसलिये मैं जो कहता हूँ, वही कीजिये ॥ १० ॥
बीजमात्रं पिता जन्तोः शुक्रं शोणितमेव च ।
संयुक्तमृतुमन्मात्रा पुरुषस्येह जन्म तत् ॥ ११ ॥
‘ पिता जीवके जन्ममें निमित्तकारणमात्र होता है । वास्तवमें ऋतुमती माताके द्वारा गर्भमें धारण किये हुए वीर्य और रजका परस्पर संयोग होनेपर ही पुरुषका यहाँ जन्म होता है ॥ ११ ॥
गतः स नृपतिस्तत्र गन्तव्यं यत्र तेन वै ।
प्रवृत्तिरेषा भूतानां त्वं तु मिथ्या विहन्यसे ॥ १२ ॥
' राजाको जहाँ जाना था, वहाँ चले गये । यह प्राणियोंके लिये स्वाभाविक स्थिति है । आप तो व्यर्थ ही मारे जाते ( कष्ट उठाते हैं ॥ १२ ॥
अर्थधर्मपरा ये ये तांस्तान् शोचामि नेतरान् ।
ते हि दुःखमिह प्राप्य विनाशं प्रेत्य लेभिरे ॥१३ ॥
' जो - जो मनुष्य प्राप्त हुए अर्थका परित्याग करके धर्मपरायण हुए हैं, उन्हीं - उन्हींके लिये मैं शोक करता हूँ, दूसरोंके लिये नहीं । वे इस जगत् में धर्मके नामपर केवल दुःख भोगकर मृत्युके पश्चात् नष्ट हो गये हैं ॥ अष्टकापितृदेवत्यमित्ययं अन्नस्योपद्रवं पश्य मृतो ' अष्टका आदि जितने हैं— श्राद्धका दान पितरोंको लोग श्राद्धमें प्रवृत्त होते हैं; तो इसमें अन्नका नाश ही मनुष्य क्या खायेगा ॥ १४ ॥
प्रस्तो जनः ।
हि किमशिष्यति ॥ १४ ॥
श्राद्ध हैं, उनके देवता पितर मिलता है । यही सोचकर किन्तु विचार करके देखिये होता है । भला, मरा हुआ
यदि भुक्तमिहान्येन देहमन्यस्य गच्छति ।
दद्यात् प्रवसतां श्राद्धं न तत् पथ्यशनं भवेत् ॥ १५ ॥
' यदि यहाँ दूसरेका खाया हुआ अन्न दूसरेके शरीरमें चला जाता हो तो परदेशमें जानेवालोंके लिये श्राद्ध ही कर देना चाहिये; उनको रास्तेके लिये भोजन देना उचित नहीं है ॥ १५ ॥
दानसंवनना ह्येते ग्रन्था मेधाविभिः कृताः ।
यजस्व देहि दीक्षस्व तपस्तप्यस्व संत्यज ॥ १६ ॥
' देवताओंके लिये यज्ञ और पूजन करो, दान दो, यज्ञकी दीक्षा ग्रहण करो, तपस्या करो और घर- द्वार छोड़कर संन्यासी बन जाओ इत्यादि बातें बतानेवाले ग्रन्थ बुद्धिमान् मनुष्योंने दानकी ओर लोगोंकी प्रवृत्ति करानेके लिये ही बनाये हैं ॥ १६ ॥
स नास्ति परमित्येतत् कुरु बुद्धिं महामते ।
प्रत्यक्षं यत् तदातिष्ठ परोक्षं पृष्ठतः कुरु ॥ १७ ॥
4 ' अतः महामते! आप अपने मनमें यह निश्चय कीजिये कि इस लोकके सिवा कोई दूसरा लोक नहीं है ( अतः वहाँ फल भोगनेके लिये धर्म आदि पालनकी आवश्यकता नहीं है ) । जो प्रत्यक्ष राज्यलाभ है, उसका आश्रय लीजिये, परोक्ष ( पारलौकिक लाभ ) को पीछे ढकेल दीजिये ॥ १७ ॥
सतां बुद्धिं पुरस्कृत्य सर्वलोकनिदर्शिनीम् ।
। राज्यं स त्वं निगृह्णीष्व भरतेन प्रसादितः ॥ १८ ॥
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५२६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे ' सत्पुरुषोंकी बुद्धि, जो सब लोगोंके लिये | करके भरतके अनुरोधसे आप अयोध्याका राज्य
राह दिखानेवाली होनेके कारण प्रमाणभूत है, आगे । ग्रहण कीजिये ' ॥ १८ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डेऽष्टाधिकशततमः सर्गः ॥ १०८ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ आठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १०८ ॥
नवाधिकशततमः सर्गः श्रीरामके द्वारा जाबालिके नास्तिक मतका
जाबालेस्तु वचः श्रुत्वा रामः सत्यपराक्रमः ।
उवाच परया सूक्त्या बुद्ध्याविप्रतिपन्नया ॥ १ ॥
जाबालिका यह वचन सुनकर सत्यपराक्रमी श्रीरामचन्द्रजीने अपनी संशयरहित बुद्धिके द्वारा श्रुतिसम्मत सदुक्तिका आश्रय लेकर कहा- ॥ १ ॥
भवान् मे प्रियकामार्थं वचनं यदिहोक्तवान् ।
अकार्य कार्यसंकाशमपथ्यं पथ्य संनिभम् ॥ २ ॥
' विप्रवर! आपने मेरा प्रिय करनेकी इच्छासे यहाँ जो बात कही है, वह कर्तव्य - सी दिखायी देती है; किंतु वास्तवमें करनेयोग्य नहीं है । वह पथ्य -सी दीखनेपर भी वास्तवमें अपथ्य है ॥ २ ॥
निर्मर्यादस्तु पुरुषः पापाचारसमन्वितः ।
मानं न लभते सत्सु भिन्नचारित्रदर्शनः ॥ ३ ॥ ।
' जो पुरुष धर्म अथवा वेदकी मर्यादाको त्याग देता है, वह पापकर्ममें प्रवृत्त हो जाता है । उसके आचार और विचार दोनों भ्रष्ट हो जाते हैं; इसलिये वह सत्पुरुषोंमें कभी सम्मान नहीं पाता है ॥ ३ ॥
कुलीनमकुलीनं वा वीरं पुरुषमानिनम् ।
चारित्रमेव व्याख्याति शुचिं वा यदि वाशुचिम् ॥ ४ ॥
' आचार ही यह बताता है कि कौन पुरुष उत्तम कुलमें उत्पन्न हुआ है और कौन अधम कुलमें, कौन वीर है और कौन व्यर्थ ही अपनेको पुरुष मानता है तथा कौन पवित्र है और कौन अपवित्र? ॥ ४ ॥
अनार्यस्त्वार्य संस्थानः शौचाद्धीनस्तथा शुचिः ।
लक्षण्यवदलक्षण्यो दुःशीलः शीलवानिव ॥ ५ ॥
' आपने जो आचार बताया है, उसे अपनानेवाला पुरुष श्रेष्ठ - सा दिखायी देनेपर भी वास्तवमें अनार्य होगा । बाहरसे पवित्र दीखनेपर भी भीतरसे अपवित्र होगा । उत्तम लक्षणोंसे युक्त - सा प्रतीत होनेपर भी वास्तवमें उसके विपरीत होगा तथा शीलवान् - सा दीखनेपर भी वस्तुतः वह दुःशील ही होगा ॥ ५ ॥
खण्डन करके आस्तिक मतका स्थापन
अधर्म धर्मवेषेण यद्यहं लोकसंकरम् ।
अभिपत्स्ये शुभं हित्वा क्रियां विधिविवर्जिताम् ॥ ६ ॥
कश्चेतयानः पुरुषः कार्याकार्यविचक्षणः ।
बहु मन्येत मां लोके दुर्वृत्तं लोकदूषणम् ॥ ७ ॥
' आपका उपदेश चोला तो धर्मका पहने हुए है, किंतु वास्तवमें अधर्म है । इससे संसारमें वर्ण-संकरताका प्रचार होगा । यदि मैं इसे स्वीकार करके वेदोक्त शुभकर्मोंका अनुष्ठान छोड़ दूँ और विधिहीन कर्मोंमें लग जाऊँ तो कर्तव्य - अकर्तव्यका ज्ञान रखनेवाला कौन समझदार मनुष्य मुझे श्रेष्ठ समझकर आदर देगा? उस दशामें तो मैं इस जगत्में दुराचारी तथा लोकको कलङ्कित करनेवाला समझा जाऊँगा ॥ ६-७ ॥
कस्य यास्याम्यहं वृत्तं केन वा स्वर्गमाप्नुयाम् ।
अनया वर्तमानोऽहं वृत्त्या हीनप्रतिज्ञया ॥ ८ ॥
' जहाँ अपनी की हुई प्रतिज्ञा तोड़ दी जाती है, उस वृत्तिके अनुसार बर्ताव करनेपर मैं किस साधनसे स्वर्गलोक प्राप्त करूँगा तथा आपने जिस आचारका उपदेश दिया है, वह किसका है, जिसका मुझे अनुसरण करना होगा; क्योंकि आपके कथनानुसार मैं पिता आदिमेंसे किसीका कुछ भी नहीं हूँ ॥ ८ ॥
कामवृत्तोऽन्वयं लोकः कृत्स्त्रः समुपवर्तते ।
यद्वृत्ताः सन्ति राजानस्तद्वृत्ताः सन्ति हि प्रजाः ॥ ९ ॥
‘ आपके बताये हुए मार्गसे चलनेपर पहले तो मैं स्वेच्छाचारी हूँगा । फिर यह सारा लोक स्वेच्छाचारी हो जायगा; क्योंकि राजाओंके जैसे आचरण होते हैं, प्रजा भी वैसा ही आचरण करने लगती है ॥ ९ ॥
सत्यमेवानृशंसं च राजवृत्तं सनातनम् ।
तस्मात् सत्यात्मकं राज्यं सत्ये लोकः प्रतिष्ठितः ॥ १० ॥
' सत्यका पालन ही राजाओंका दयाप्रधान धर्म
है— सनातन आचार है, अतः राज्य सत्यस्वरूप है ।
सत्यमें ही सम्पूर्ण लोक प्रतिष्ठित है ॥१० ॥
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अयोध्याकाण्डे नवाधिकशततमः सर्गः ५२७
ऋषयश्चैव देवाश्च सत्यमेव हि मेनिरे ।
सत्यवादी हि लोकेऽस्मिन् परं गच्छति चाक्षयम् ॥ ११ ॥
' ऋषियों और देवताओंने सदा सत्यका ही आदर किया है । इस लोकमें सत्यवादी मनुष्य अक्षय परम धाममें जाता है ॥ ११ ॥
उद्विजन्ते यथा सर्पान्नरादनृतवादिनः ।
धर्मः सत्यपरो लोके मूलं सर्वस्य चोच्यते ॥ १२ ॥
' झूठ बोलनेवाले मनुष्यसे सब लोग उसी तरह डरते हैं, जैसे साँपसे । संसारमें सत्य ही धर्मकी पराकाष्ठा है और वही सबका मूल कहा जाता है ॥ १२ ॥
सत्यमेवेश्वरो लोके सत्ये धर्मः सदाश्रितः ।
सत्यमूलानि सर्वाणि सत्यान्नास्ति परं पदम् ॥ १३ ॥
' जगत्में सत्य ही ईश्वर है । सदा सत्यके ही आधारपर धर्मकी स्थिति रहती है । सत्य ही सबकी जड़ है । सत्यसे बढ़कर दूसरा कोई परम पद नहीं है ॥ १३ ॥
दत्तमिष्टं हुतं चैव तप्तानि च तपांसि च ।
वेदाः सत्यप्रतिष्ठानास्तस्मात् सत्यपरो भवेत् ॥ १४ ॥
' दान, यज्ञ, होम, तपस्या और वेद - इन सबका आधार सत्य ही है; इसलिये सबको सत्यपरायण होना चाहिये ॥ १४ ॥
एकः पालयते लोकमेकः पालयते कुलम् ।
मज्जत्येको हि निरय एकः स्वर्गे महीयते ॥ १५ ॥
' एक मनुष्य सम्पूर्ण जगत्का पालन करता है, एक समूचे कुलका पालन करता है, एक नरकमें डूबता है और एक स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥ १५ ॥
सोऽहं पितुर्निदेशं तु किमर्थं नानुपालये ।
सत्यप्रतिश्रवः सत्यं सत्येन समयीकृतम् ॥ १६ ॥
‘ मैं सत्यप्रतिज्ञ हूँ और सत्यकी शपथ खाकर पिताके सत्यका पालन स्वीकार कर चुका हूँ, ऐसी दशामें मैं पिताके आदेशका किसलिये पालन नहीं करूँ? ॥ १६ ॥
नैव लोभान्न मोहाद् वा न चाज्ञानात् तमोऽन्वितः ।
सेतुं सत्यस्य भेत्स्यामि गुरोः सत्यप्रतिश्रवः ॥ १७ ॥
' पहले सत्यपालनकी प्रतिज्ञा करके अब लोभ, मोह अथवा अज्ञानसे विवेकशून्य होकर मैं पिताके सत्यकी मर्यादा भङ्ग नहीं करूँगा ॥ १७ ॥
असत्यसंधस्य सतश्चलस्यास्थिरचेतसः ।
नैव देवा न पितरः प्रतीच्छन्तीति नः श्रुतम् ॥ १८ ॥
' हमने सुना है कि जो अपनी प्रतिज्ञा झूठी करनेके कारण धर्मसे भ्रष्ट हो जाता है, उस चञ्चल चित्तवाले पुरुषके दिये हुए हव्य - कव्यको देवता और पितर नहीं स्वीकार करते हैं ॥ १८ ॥
प्रत्यगात्ममिमं धर्मं सत्यं पश्याम्यहं ध्रुवम् ।
भारः सत्पुरुषैश्चीर्णस्तदर्थमभिनन्द्यते ॥ १ ९ ॥
' मैं इस सत्यरूपी धर्मको समस्त प्राणियोंके लिये हितकर और सब धर्मोंमें श्रेष्ठ समझता हूँ । सत्पुरुषोंने जटा - वल्कल आदिके धारणरूप तापस धर्मका पालन किया है, इसलिये मैं भी उसका अभिनन्दन करता हूँ ॥
क्षात्रं धर्ममहं त्यक्ष्ये ह्यधर्मं धर्मसंहितम् ।
क्षुद्रैर्नृशंसैर्लुब्धैश्च सेवितं पापकर्मभिः ॥ २० ॥
' जो धर्मयुक्त प्रतीत हो रहा है, किंतु वास्तवमें अधर्मरूप है, जिसका नीच, क्रूर, लोभी और पापाचारी पुरुषोंने सेवन किया है, ऐसे क्षात्रधर्मका ( पिताकी आज्ञा भङ्ग करके राज्य ग्रहण करनेका ) मैं अवश्य त्याग करूँगा ( क्योंकि वह न्याययुक्त नहीं है ) ॥ २० ॥
कायेन कुरुते पापं मनसा सम्प्रधार्य तत् ।
अनृतं जिह्वया चाह त्रिविधं कर्म पातकम् ॥ २१ ॥
' मनुष्य अपने शरीरसे जो पाप करता है, उसे पहले मनके द्वारा कर्तव्यरूपसे निश्चित करता है । फिर जिह्वाकी सहायतासे उस अनृत कर्म ( पाप ) को वाणीद्वारा दूसरोंसे कहता है, तत्पश्चात् औरोंके सहयोगसे उसे शरीरद्वारा सम्पन्न करता है । इस तरह एक ही पातक कायिक, वाचिक और मानसिक भेदसे तीन प्रकारका होता है ॥ २१ ॥
भूमिः कीर्तिर्यशो लक्ष्मीः पुरुषं प्रार्थयन्ति हि ।
सत्यं समनुवर्तन्ते सत्यमेव भजेत् ततः ॥ २२ ॥
' पृथ्वी, कीर्ति, यश और लक्ष्मी – ये सब -की-सब सत्यवादी पुरुषको पानेकी इच्छा रखती हैं और शिष्ट पुरुष सत्यका ही अनुसरण करते हैं, अतः मनुष्यको सदा सत्यका ही सेवन करना चाहिये ॥२२ ॥
श्रेष्ठं ह्यनार्यमेव स्याद् यद् भवानवधार्य माम् ।
आह युक्तिकरैर्वाक्यैरिदं भद्रं कुरुष्व ह ॥ २३ ॥
' आपने उचित सिद्ध करके तर्कपूर्ण वचनोंके द्वारा मुझसे जो यह कहा है कि राज्य ग्रहण करनेमें ही कल्याण है; अतः इसे अवश्य स्वीकार करो । आपका यह आदेश श्रेष्ठ - सा प्रतीत होनेपर भी सज्जन पुरुषोंद्वारा आचरणमें लानेयोग्य नहीं है ( क्योंकि इसे स्वीकार करनेसे सत्य और न्यायका उल्लङ्घन होता है ) ॥ २३ ॥
कथं ह्यहं प्रतिज्ञाय वनवासमिमं गुरोः ।
भरतस्य करिष्यामि वचो हित्वा गुरोर्वचः ॥२४ ॥
| ' मैं पिताजीके सामने इस तरह वनमें रहनेकी
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५२८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे
प्रतिज्ञा कर चुका हूँ । अब उनकी आज्ञाका उल्लङ्घन ।
करके मैं भरतकी बात कैसे मान लूँगा ॥२४ ॥
स्थिरा मया प्रतिज्ञाता प्रतिज्ञा गुरुसंनिधौ ।
प्रहृष्टमानसा देवी कैकेयी चाभवत् तदा ॥ २५ ॥
' गुरुके समीप की हुई मेरी वह प्रतिज्ञा अटल है— किसी तरह तोड़ी नहीं जा सकती । उस समय जब कि मैंने प्रतिज्ञा की थी, देवी कैकेयीका हृदय हर्षसे खिल उठा था ॥ २५ ॥
वनवासं वसन्नेव शुचिर्नियतभोजनः ।
मूलपुष्पफलैः पुण्यैः पितॄन् देवांश्च तर्पयन् ॥ २६ ॥
' मैं वनमें ही रहकर बाहर - भीतरसे पवित्र हो नियमित भोजन करूँगा और पवित्र फल, मूल एवं पुष्पोंद्वारा देवताओं और पितरोंको तृप्त करता हुआ प्रतिज्ञाका पालन करूँगा ॥ २६ ॥
संतुष्टपञ्चवर्गोऽहं लोकयात्रां प्रवाहये ।
अकुहः श्रद्दधानः सन् कार्याकार्यविचक्षणः ॥ २७ ॥
' क्या करना चाहिये और क्या नहीं, इसका निश्चय मैं कर चुका हूँ । अतः फल- मूल आदिसे पाँचों इन्द्रियोंको संतुष्ट करके निश्छल, श्रद्धापूर्वक लोकयात्रा ( पिताकी आज्ञाके पालनरूप व्यवहार ) का निर्वाह करूँगा ॥ २७ ॥
कर्मभूमिमिमां प्राप्य कर्तव्यं कर्म यच्छुभम् ।
अग्निर्वायुश्च सोमश्च कर्मणां फलभागिनः ॥ २८ ॥
' इस कर्मभूमिको पाकर जो शुभ कर्म हो, उसका अनुष्ठान करना चाहिये; क्योंकि अग्नि, वायु तथा सोम भी कर्मोंके ही फलसे उन - उन पदोंके भागी हुए हैं ॥
शतं क्रतूनामाहृत्य देवराट् त्रिदिवं गतः ।
तपांस्युग्राणि चास्थाय दिवं प्राप्ता महर्षयः ॥ २ ९ ॥
' देवराज इन्द्र सौ यज्ञोंका अनुष्ठान करके स्वर्गलोकको प्राप्त हुए हैं । महर्षियोंने भी उग्र तपस्या करके दिव्य लोकोंमें स्थान प्राप्त किया है ' ॥ २ ९ ॥ अमृष्यमाणः पुनरुग्रतेजा निशम्य तन्नास्तिकवाक्यहेतुम् । अथाब्रवीत् तं नृपतेस्तनजो विगर्हमाणो वचनानि तस्य ॥ ३० ॥
उग्र तेजस्वी राजकुमार श्रीराम परलोककी सत्ताका खण्डन करनेवाले जाबालिके पूर्वोक्त वचनोंको सुनकर उन्हें सहन न कर सकनेके कारण उन वचनोंकी निन्दा करते हुए पुनः उनसे बोले – ॥ ३० ॥
सत्यं च धर्मं च पराक्रमं च भूतानुकम्पां प्रियवादितां च । द्विजातिदेवातिथिपूजनं च पन्थानमाहुस्त्रिदिवस्य सन्तः ॥ ३१ ॥
' सत्य, धर्म, पराक्रम, समस्त प्राणियोंपर दया, सबसे प्रिय वचन बोलना तथा देवताओं, अतिथियों और ब्राह्मणोंकी पूजा करना – इन सबको साधु पुरुषोंने स्वर्गलोकका मार्ग बताया है ॥ ३१ ॥
तेनैवमाज्ञाय यथावदर्थ-मेकोदयं सम्प्रतिपद्य विप्राः । धर्मं चरन्तः सकलं यथावत् कांक्षन्ति लोकागममप्रमत्ताः ॥ ३२ ॥
' सत्पुरुषोंके इस वचनके अनुसार धर्मका स्वरूप जानकर तथा अनुकूल तर्कसे उसका यथार्थ निर्णय करके एक निश्चयपर पहुँचे हुए सावधान ब्राह्मण भलीभाँति धर्माचरण करते हुए उन - उन उत्तम लोकोंको प्राप्त करना चाहते हैं ॥ ३२ ॥
निन्दाम्यहं कर्म कृतं पितुस्तद् यस्त्वामगृह्णाद् विषमस्थबुद्धिम् । बुद्ध्यानयैवंविधया चरन्तं सुनास्तिकं धर्मपथादपेतम् ॥ ३३ ॥
' आपकी बुद्धि विषम - मार्गमें स्थित है- आपने वेद - विरुद्ध मार्गका आश्रय ले रखा है । आप घोर नास्तिक और धर्मके रास्तेसे कोसों दूर हैं । ऐसी पाखण्डमयी बुद्धिके द्वारा अनुचित विचारका प्रचार करनेवाले आपको मेरे पिताजीने जो अपना याजक बना लिया, उनके इस कार्यकी मैं निन्दा करता हूँ ॥ ३३ ॥
यथा हि चोरः स तथा हि बुद्ध-स्तथागतं नास्तिकमत्र विद्धि । तस्माद्धि यः शक्यतमः प्रजानां स नास्तिके नाभिमुखो बुधः स्यात् ॥ ३४ ॥
' जैसे चोर दण्डनीय होता है, उसी प्रकार ( वेदविरोधी ) बुद्ध ( बौद्धमतावलम्बी ) भी दण्डनीय है । तथागत ( नास्तिकविशेष ) और नास्तिक ( चार्वाक् ) को भी यहाँ इसी कोटिमें समझना चाहिये । इसलिये प्रजापर अनुग्रह करनेके लिये राजाद्वारा जिस नास्तिकको दण्ड दिलाया जा सके, उसे तो चोरके समान दण्ड दिलाया ही जाय; परंतु जो वशके बाहर हो, उस नास्तिकके प्रति विद्वान् ब्राह्मण कभी उन्मुख न हो — उससे वार्तालापतक न करे ॥ ३४ ॥
त्वत्तो जनाः पूर्वतरे द्विजाश्च शुभानि कर्माणि बहूनि चक्रुः ।