वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ — पृष्ठ 541–550

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 541–550

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अयोध्याकाण्डे दशाधिकशततमः सर्गः ५२ ९ छित्त्वा सदेमं च परं च लोकं तस्माद् द्विजाः स्वस्ति कृतं हुतं च ॥ ३५ ॥

' आपके सिवा पहलेके श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने इहलोक और परलोककी फल - कामनाका परित्याग करके वेदोक्त धर्म समझकर सदा ही बहुत - से शुभकर्मोंका अनुष्ठान किया है । अतः जो भी ब्राह्मण हैं, वे वेदोंको ही प्रमाण मानकर स्वस्ति ( अहिंसा और सत्य आदि ), कृत ( तप, दान और परोपकार आदि ) तथा हुत ( यज्ञ - याग आदि ) कर्मोंका सम्पादन करते हैं ॥ ३५ ॥

धर्मे रताः सत्पुरुषैः समेता-स्तेजस्विनो दानगुणप्रधानाः । अहिंसका वीतमलाश्च लोके भवन्ति पूज्या मुनयः प्रधानाः ॥ ३६ ॥

' जो धर्ममें तत्पर रहते हैं, सत्पुरुषोंका साथ करते हैं, तेजसे सम्पन्न हैं, जिनमें दानरूपी गुणकी प्रधानता है, जो कभी किसी प्राणीकी हिंसा नहीं करते तथा जो मलसंसर्गसे रहित हैं, ऐसे श्रेष्ठ मुनि ही संसारमें पूजनीय होते हैं ' ॥ ३६ ॥

इति ब्रुवन्तं वचनं सरोषं रामं महात्मानमदीनसत्त्वम् । उवाच पथ्यं पुनरास्तिकं च सत्यं वचः सानुनयं च विप्रः ॥ ३७ ॥

महात्मा श्रीराम स्वभावसे ही दैन्यभावसे रहित थे । उन्होंने जब रोषपूर्वक पूर्वोक्त बात कही, तब ब्राह्मण जाबालिने विनयपूर्वक यह आस्तिकतापूर्ण सत्य एवं हितकर वचन कहा— ॥ ३७ ॥

न नास्तिकानां वचनं ब्रवीम्यहं न नास्तिकोऽहं न च नास्ति किंचन । समीक्ष्य कालं पुनरास्तिकोऽभवं भवेय काले पुनरेव नास्तिकः ॥ ३८ ॥

' रघुनन्दन! न तो मैं नास्तिक हूँ और न नास्तिकोंकी बात ही करता हूँ । परलोक आदि कुछ भी नहीं है, ऐसा मेरा मत नहीं है । मैं अवसर देखकर फिर आस्तिक हो गया और लौकिक व्यवहारके समय आवश्यकता होनेपर पुनः नास्तिक हो सकता हूँ - नास्तिकोंकी - सी बातें कर सकता हूँ ॥३८ ॥

स चापि कालोऽयमुपागतः शनै-यथा मया नास्तिकवागुदीरिता । निवर्तनार्थं तव राम कारणात् प्रसादनार्थं च मयैतदीरितम् ॥ ३ ९ ॥ ' इस समय ऐसा अवसर आ गया था, जिससे मैंने धीरे - धीरे नास्तिकोंकी - सी बातें कह डालीं । श्रीराम! मैंने जो यह बात कही, इसमें मेरा उद्देश्य यही था कि किसी तरह आपको राजी करके अयोध्या लौटनेके । लिये तैयार कर लूँ ' ॥३ ९ ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे नवाधिकशततमः सर्गः ॥ १० ९ ॥ इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ नौवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १० ९ ॥ दशाधिकशततमः सर्गः वसिष्ठजीका सृष्टिपरम्पराके साथ इक्ष्वाकुकुलकी परम्परा बताकर ज्येष्ठके ही राज्याभिषेकका औचित्य सिद्ध करना और श्रीरामसे राज्य ग्रहण करनेके लिये कहना

क्रुद्धमाज्ञाय रामं तु वसिष्ठः प्रत्युवाच ह ।

जाबालिरपि जानीते लोकस्यास्य गतागतिम् ॥ १ ॥

श्रीरामचन्द्रजीको रुष्ट जानकर महर्षि वसिष्ठजीने उनसे कहा — ' रघुनन्दन! महर्षि जाबालि भी यह जानते हैं कि इस लोकके प्राणियोंका परलोकमें जाना और आना होता रहता है ( अतः ये नास्तिक नहीं हैं ) ॥ १ ॥

निवर्तयितुकामस्तु त्वामेतद् वाक्यमब्रवीत् ।

इमां लोकसमुत्पत्तिं लोकनाथ निबोध मे ॥ २ ॥

' जगदीश्वर! इस समय तुम्हें लौटानेकी इच्छासे ही इन्होंने यह नास्तिकतापूर्ण बात कही थी । तुम मुझसे इस लोककी उत्पत्तिका वृत्तान्त सुनो ॥२ ॥

सर्वं सलिलमेवासीत् पृथिवी तत्र निर्मिता ।

ततः समभवद् ब्रह्मा स्वयंभूर्दैवतैः सह ॥३ ॥

' सृष्टिके प्रारम्भकालमें सब कुछ जलमय ही था । उस जलके भीतर ही पृथ्वीका निर्माण हुआ । तदनन्तर देवताओंके साथ स्वयंभू ब्रह्मा प्रकट हुए ॥ ३ ॥

स वराहस्ततो भूत्वा प्रोज्जहार वसुंधराम् ।

असृजच्च जगत् सर्वं सह पुत्रैः कृतात्मभिः ॥४ ॥

‘ इसके बाद उन भगवान् विष्णुस्वरूप ब्रह्माने ही

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५३० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे वराहरूपसे प्रकट होकर जलके भीतरसे इस पृथ्वीको । निकाला और अपने कृतात्मा पुत्रोंके साथ इस सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि की ॥ ४ ॥

आकाशप्रभवो ब्रह्मा शाश्वतो नित्य अव्ययः ।

तस्मान्मरीचिः संजज्ञे मरीचेः कश्यपः सुतः ॥ ५ ॥

' आकाशस्वरूप परब्रह्म परमात्मासे ब्रह्माजीका

प्रादुर्भाव हुआ है, जो नित्य, सनातन एवं अविनाशी हैं ।

उनसे मरीचि उत्पन्न हुए और मरीचिके पुत्र कश्यप हुए ॥

विवस्वान् कश्यपाज्जज्ञे मनुर्वैवस्वतः स्वयम् ।

स तु प्रजापतिः पूर्वमिक्ष्वाकुस्तु मनोः सुतः ॥ ६ ॥

' कश्यपसे विवस्वान्‌का जन्म हुआ । विवस्वान्‌के

पुत्र साक्षात् वैवस्वत मनु हुए, जो पहले प्रजापति थे ।

मनुके पुत्र इक्ष्वाकु हुए ॥ ६ ॥

यस्येयं प्रथमं दत्ता समृद्धा मनुना मही ।

तमिक्ष्वाकुमयोध्यायां राजानं विद्धि पूर्वकम् ॥ ७ ॥

‘ जिन्हें मनुने सबसे पहले इस पृथ्वीका समृद्धिशाली राज्य सौंपा था, उन राजा इक्ष्वाकुको तुम अयोध्याका प्रथम राजा समझो ॥ ७ ॥

इक्ष्वाकोस्तु सुतः श्रीमान् कुक्षिरित्येव विश्रुतः ।

कुक्षेरथात्मजो वीरो विकुक्षिरुदपद्यत ॥ ८ ॥

' इक्ष्वाकुके पुत्र श्रीमान् कुक्षिके नामसे विख्यात हुए । कुक्षिके वीर पुत्र विकुक्षि हुए ॥ ८ ॥

विकुक्षेस्तु महातेजाः बाणः पुत्रः प्रतापवान् ।

बाणस्य च महाबाहुरनरण्यो महातपाः ॥ ९ ॥

' विकुक्षिके महातेजस्वी प्रतापी पुत्र बाण हुए । बाणके महाबाहु पुत्र अनरण्य हुए, जो बड़े भारी तपस्वी थे ॥

नानावृष्टिर्बभूवास्मिन् न दुर्भिक्षः सतां वरे ।

अनरण्ये महाराजे तस्करो वापि कश्चन ॥ १० ॥

' सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ महाराज अनरण्यके राज्यमें कभी अनावृष्टि नहीं हुई, अकाल नहीं पड़ा और कोई चोर भी नहीं उत्पन्न हुआ ॥ १० ॥

अनरण्यान्महाराज पृथू राजा बभूव ह ।

तस्मात् पृथोर्महातेजास्त्रिशङ्कुरुदपद्यत ॥ ११ ॥

' महाराज! अनरण्यसे राजा पृथु हुए । उन पृथुसे महातेजस्वी त्रिशंकुकी उत्पत्ति हुई ॥११ ॥

स सत्यवचनाद् वीरः सशरीरो दिवं गतः ।

त्रिशङ्कोरभवत् सूनुर्धुन्धुमारो महायशाः ॥ १२ ॥

' वे वीर त्रिशंकु विश्वामित्रके सत्य वचनके प्रभावसे सदेह स्वर्गलोकको चले गये थे । त्रिशंकुके महायशस्वी धुन्धुमार हुए ॥ १२ ॥

धुन्धुमारान्महातेजा युवनाश्वो व्यजायत ।

युवनाश्वसुतः श्रीमान् मान्धाता समपद्यत ॥ १३ ॥

' धुन्धुमारसे महातेजस्वी युवनाश्वका जन्म हुआ ।

युवनाश्वके पुत्र श्रीमान् मान्धाता हुए ॥१३ ॥

मान्धातुस्तु महातेजाः सुसंधिरुदपद्यत ।

सुसंधेरपि पुत्रौ द्वौ ध्रुवसंधिः प्रसेनजित् ॥ १४ ॥

‘ मान्धाताके महान् तेजस्वी पुत्र सुसंधि हुए ।

सुसंधिके दो पुत्र हुए- ध्रुवसंधि और प्रसेनजित् ॥ १४ ॥

यशस्वी ध्रुवसंधेस्तु भरतो रिपुसूदनः ।

भरतात् तु महाबाहोरसितो नाम जायत ॥ १५ ॥

' ध्रुवसंधिके यशस्वी पुत्र शत्रुसूदन भरत थे ।

महाबाहु भरतसे असित नामक पुत्र उत्पन्न हुआ ॥ १५ ॥

यस्यैते प्रतिराजान उदपद्यन्त शत्रवः ।

हैहयास्तालजङ्घाश्च शूराश्च शशबिन्दवः ॥ १६ ॥

' जिसके शत्रुभूत प्रतिपक्षी राजा ये हैहय, तालजंघ और शूर शशबिन्दु उत्पन्न हुए थे ॥१६ ॥

तांस्तु सर्वान् प्रतिव्यूह्य युद्धे राजा प्रवासितः ।

स च शैलवरे रम्ये बभूवाभिरतो मुनिः ॥ १७ ॥

' उन सबका सामना करनेके लिये सेनाका व्यूह बनाकर युद्धके लिये डटे रहनेपर भी शत्रुओंकी संख्या अधिक होनेके कारण राजा असितको हारकर परदेशकी शरण लेनी पड़ी । वे रमणीय शैल - शिखरपर प्रसन्नतापूर्वक रहकर मुनिभावसे परमात्माका मनन - चिन्तन करने लगे ॥

द्वे चास्य भार्ये गर्भिण्यौ बभूवतुरिति श्रुतिः ।

तत्र चैका महाभागा भार्गवं देववर्चसम् ॥ १८ ॥

ववन्दे पद्मपत्राक्षी कांक्षिणी पुत्रमुत्तमम् ।

एका गर्भविनाशाय सपल्यै गरलं ददौ ॥ १ ९ ॥

' सुना जाता है कि असितकी दो पत्नियाँ गर्भवती थीं । उनमेंसे एक महाभागा कमललोचना राजपत्नीने उत्तम पुत्र पानेकी अभिलाषा रखकर देवतुल्य तेजस्वी भृगुवंशी च्यवन मुनिके चरणोंमें वन्दना की और दूसरी रानीने अपनी सौतके गर्भका विनाश करनेके लिये उसे जहर दे दिया ।

भार्गवश्च्यवनो नाम हिमवन्तमुपाश्रितः ।

तमृषिं साभ्युपागम्य कालिन्दी त्वभ्यवादयत् ॥ २० ॥

' उन दिनों भृगुवंशी च्यवन मुनि हिमालयपर रहते थे । राजा असितकी कालिन्दी नामवाली पत्नीने ऋषिके चरणोंमें पहुँचकर उन्हें प्रणाम किया ॥२० ॥

स तामभ्यवदत् प्रीतो वरेप्सुं पुत्रजन्मनि ।

पुत्रस्ते भविता देवि महात्मा लोकविश्रुतः ॥ २१ ॥

धार्मिकश्च सुभीमश्च वंशकर्तारिसूदनः ।

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अयोध्याकाण्डे दशाधिकशततमः सर्गः ५३१ ' मुनिने प्रसन्न होकर पुत्रकी उत्पत्तिके लिये वरदान चाहनेवाली रानीसे इस प्रकार कहा - ' देवि! तुम्हें एक महामनस्वी लोकविख्यात पुत्र प्राप्त होगा, जो धर्मात्मा, शत्रुओंके लिये अत्यन्त भयंकर, अपने वंशको चलानेवाला और शत्रुओंका संहारक होगा ' ॥ २१३ ॥

श्रुत्वा प्रदक्षिणं कृत्वा मुनिं तमनुमान्य च ॥ २२ ॥

पद्मपत्रसमानाक्षं पद्मगर्भसमप्रभम् ।

ततः सा गृहमागम्य पत्नी पुत्रमजायत ॥ २३ ॥

' यह सुनकर रानीने मुनिकी परिक्रमा की और उनसे विदा लेकर वहाँसे अपने घर आनेपर उस रानीने एक पुत्रको जन्म दिया, जिसकी कान्ति कमलके भीतरी भागके समान सुन्दर थी और नेत्र कमलदलके समान मनोहर थे ॥२२-२३ ॥

सपल्या तु गरस्तस्यै दत्तो गर्भजिघांसया ।

गरेण सह तेनैव तस्मात् स सगरोऽभवत् ॥ २४ ॥

‘ सौतने उसके गर्भको नष्ट करनेके लिये जो गर ( विष ) दिया था, उस गरके साथ ही वह बालक प्रकट हुआ; इसलिये सगर नामसे प्रसिद्ध हुआ ॥ २४ ॥

स राजा सगरो नाम यः समुद्रमखानयत् ।

इष्ट्वा पर्वणि वेगेन त्रासयान इमाः प्रजाः ॥ २५ ॥

' राजा सगर वे ही हैं, जिन्होंने पर्वके दिन यज्ञकी दीक्षा ग्रहण करके खुदाईके वेगसे इन समस्त प्रजाओंको भयभीत करते हुए अपने पुत्रोंद्वारा समुद्रको खुदवाया था ॥ २५ ॥

असमञ्जस्तु पुत्रोऽभूत् सगरस्येति नः श्रुतम् ।

जीवन्नेव स पित्रा तु निरस्तः पापकर्मकृत् ॥ २६ ॥

' हमारे सुननेमें आया है कि सगरके पुत्र असमञ्ज हुए, जिन्हें पापकर्ममें प्रवृत्त होनेके कारण पिताने जीते-जी ही राज्यसे निकाल दिया था ॥ २६ ॥

अंशुमानपि पुत्रोऽभूदसमञ्जस्य वीर्यवान् ।

दिलीपोंऽशुमतः पुत्रो दिलीपस्य भगीरथः ॥ २७ ॥

' असमञ्जके पुत्र अंशुमान् हुए, जो बड़े पराक्रमी थे ।

अंशुमान्के दिलीप और दिलीपके पुत्र भगीरथ हुए ॥ २७ ॥

भगीरथात् ककुत्स्थश्च काकुत्स्था येन तु स्मृताः ।

ककुत्स्थस्य तु पुत्रोऽभूद् रघुर्येन तु राघवाः ॥ २८ ॥

' भगीरथसे ककुत्स्थका जन्म हुआ, जिनसे उनके वंशवाले ' काकुत्स्थ ' कहलाते हैं । ककुत्स्थके पुत्र रघु हुए, जिनसे उस वंशके लोग ' राघव ' कहलाये ॥ २८ ॥

रघोस्तु पुत्रस्तेजस्वी प्रवृद्धः पुरुषादकः ।

कल्माषपादः सौदास इत्येवं प्रथितो भुवि ॥ २ ९ ॥

' रघुके तेजस्वी पुत्र कल्माषपाद हुए, जो बड़े होनेपर शापवश कुछ वर्षोंके लिये नरभक्षी राक्षस हो गये थे । वे इस पृथ्वीपर सौदास नामसे विख्यात थे ॥

कल्माषपादपुत्रोऽभूच्छङ्खणस्त्विति नः श्रुतम् ।

यस्तु तद्वीर्यमासाद्य सहसैन्यो व्यनीनशत् ॥ ३० ॥

‘ कल्माषपादके पुत्र शङ्खण हुए, यह हमारे सुननेमें आया है, जो युद्धमें सुप्रसिद्ध पराक्रम प्राप्त करके भी सेनासहित नष्ट हो गये थे ॥ ३० ॥

शङ्खणस्य तु पुत्रोऽभूच्छूरः श्रीमान् सुदर्शनः ।

सुदर्शनस्याग्निवर्ण अग्निवर्णस्य शीघ्रगः ॥ ३१ ॥

' शङ्खणके शूरवीर पुत्र श्रीमान् सुदर्शन हुए ।

सुदर्शनके पुत्र अग्निवर्ण और अग्निवर्णके पुत्र शीघ्रग थे ॥

शीघ्रगस्य मरुः पुत्रो मरोः पुत्रः प्रशुश्रुवः ।

प्रशुश्रुवस्य पुत्रोऽभूदम्बरीषो महामतिः ॥ ३२ ॥

' शीघ्रगके पुत्र मरु, मरुके पुत्र प्रशुश्रुव तथा प्रशुश्रुवके महाबुद्धिमान् पुत्र अम्बरीष हुए ॥ ३२ ॥

अम्बरीषस्य पुत्रोऽभून्नहुषः सत्यविक्रमः ।

नहुषस्य च नाभागः पुत्रः परमधार्मिकः ॥ ३३ ॥

' अम्बरीषके पुत्र सत्यपराक्रमी नहुष थे । नहुषके पुत्र नाभाग हुए, जो बड़े धर्मात्मा थे ॥ ३३ ॥

अजश्च सुव्रतश्चैव नाभागस्य सुतावुभौ ।

अजस्य चैव धर्मात्मा राजा दशरथः सुतः ॥ ३४ ॥

' नाभागके दो पुत्र हुए- अज और सुव्रत । अज धर्मात्मा पुत्र राजा दशरथ थे ॥ ३४ ॥

। तस्य ज्येष्ठोऽसि दायादो राम इत्यभिविश्रुतः ।

तद् गृहाण स्वकं राज्यमवेक्षस्व जगन्नृप ॥ ३५ ॥

' दशरथके ज्येष्ठ पुत्र तुम हो, जिसकी ' श्रीराम ' के नामसे प्रसिद्धि है । नरेश्वर! यह अयोध्याका राज्य तुम्हारा है, इसे ग्रहण करो और इसकी देखभाल करते रहो ॥ ३५ ॥

इक्ष्वाकूणां हि सर्वेषां राजा भवति पूर्वजः ।

पूर्वजे नावरः पुत्रो ज्येष्ठो राजाभिषिच्यते ॥ ३६ ॥

' समस्त इक्ष्वाकुवंशियोंके यहाँ ज्येष्ठ पुत्र राजा होता आया है । ज्येष्ठके होते हुए छोटा पुत्र राजा नहीं होता है । ज्येष्ठ पुत्रका ही राजाके पदपर अभिषेक होता है ॥ ३६ ॥

स राघवाणां कुलधर्ममात्मनः सनातनं नाद्य विहन्तुमर्हसि । प्रभूतरत्नामनुशाधि मेदिनीं । प्रभूतराष्ट्रां पितृवन्महायशः ॥ ३७ ॥

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५३२ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे ' महायशस्वी श्रीराम! रघुवंशियोंका जो अपना | बहुत - से अवान्तर देशोंवाली तथा प्रचुर रत्नराशि सम्पन्न सनातन कुलधर्म है, उसको आज तुम नष्ट न करो । इस वसुधाका पिताकी भाँति पालन करो ' ॥ ३७ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे दशाधिकशततमः सर्गः ॥ ११० ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ दसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ११० ॥

एकादशाधिकशततमः सर्गः वसिष्ठजीके समझानेपर भी श्रीरामको पिताकी आज्ञाके पालनसे विरत होते न देख भरतका धरना देनेको समझाकर अयोध्या

वसिष्ठः स तदा राममुक्त्वा राजपुरोहितः ।

अब्रवीद् धर्मसंयुक्तं पुनरेवापरं वचः ॥ १ ॥

उस समय राजपुरोहित वसिष्ठने पूर्वोक्त बातें कहकर पुनः श्रीरामसे दूसरी धर्मयुक्त बातें कहीं - ॥ १ ॥

पुरुषस्येह जातस्य भवन्ति गुरवः सदा ।

आचार्यश्चैव काकुत्स्थ पिता माता च राघव ॥ २ ॥

" रघुनन्दन! ककुत्स्थकुलभूषण! इस संसारमें उत्पन्न हुए पुरुषके सदा तीन गुरु होते हैं- आचार्य, पिता और माता ॥ २ ॥

पिता ह्येनं जनयति पुरुषं पुरुषर्षभ ।

प्रज्ञां ददाति चाचार्यस्तस्मात् स गुरुरुच्यते ॥ ३ ॥

' पुरुषप्रवर! पिता पुरुषके शरीरको उत्पन्न करता है, इसलिये गुरु है और आचार्य उसे ज्ञान देता है, इसलिये गुरु कहलाता है ॥ ३ ॥

स तेऽहं पितुराचार्यस्तव चैव परंतप ।

मम त्वं वचनं कुर्वन् नातिवर्तेः सतां गतिम् ॥ ४ ॥

' शत्रुओंको संताप देनेवाले रघुवीर! मैं तुम्हारे पिताका और तुम्हारा भी आचार्य हूँ; अतः मेरी आज्ञाका पालन करनेसे तुम सत्पुरुषोंके पथका त्याग करनेवाले नहीं समझे जाओगे ॥ ४ ॥

इमा हि ते परिषदो ज्ञातयश्च नृपास्तथा ।

एषु तात चरन् धर्मं नातिवर्तेः सतां गतिम् ॥ ५ ॥

' तात! ये तुम्हारे सभासद्, बन्धु - बान्धव तथा सामन्त राजा पधारे हुए हैं, इनके प्रति धर्मानुकूल बर्ताव करनेसे भी तुम्हारे द्वारा सन्मार्गका उल्लङ्घन नहीं होगा ॥ ५ ॥

वृद्धाया धर्मशीलाया मातुर्नार्हस्यवर्तितुम् ।

अस्या हि वचनं कुर्वन् नातिवर्तेः सतां गतिम् ॥ ६ ॥

' अपनी धर्मपरायणा बूढ़ी माताकी बात तो तुम्हें कभी टालनी ही नहीं चाहिये । इनकी आज्ञाका पालन तैयार होना तथा श्रीरामका उन्हें लौटनेकी आज्ञा देना करके तुम श्रेष्ठ पुरुषोंके आश्रयभूत धर्मका उल्लङ्घन करनेवाले नहीं माने जाओगे ॥ ६ ॥

भरतस्य वचः कुर्वन् याचमानस्य राघव ।

आत्मानं नातिवर्तेस्त्वं सत्यधर्मपराक्रम ॥७ ॥

' सत्य, धर्म और पराक्रमसे सम्पन्न रघुनन्दन! भरत अपने आत्मस्वरूप तुमसे राज्य ग्रहण करने और अयोध्या लौटनेकी प्रार्थना कर रहे हैं, उनकी बात मान लेनेसे भी तुम धर्मका उल्लङ्घन करनेवाले नहीं कहलाओगे ' ॥ ७ ॥

एवं मधुरमुक्तः स गुरुणा राघवः स्वयम् ।

प्रत्युवाच समासीनं वसिष्ठं पुरुषर्षभः ॥ ८ ॥

गुरु वसिष्ठने सुमधुर वचनोंमें जब इस प्रकार कहा, तब साक्षात् पुरुषोत्तम श्रीराघवेन्द्रने वहाँ बैठे हुए वसिष्ठजीको यों उत्तर दिया ॥ ८ ॥

यन्मातापितरौ वृत्तं तनये कुरुतः सदा ।

न सुप्रतिकरं तत् तु मात्रा पित्रा च यत्कृतम् ॥ ९ ॥

यथाशक्तिप्रदानेन स्वापनोच्छादनेन च ।

नित्यं च प्रियवादेन तथा संवर्धनेन च ॥ १० ॥

' माता और पिता पुत्रके प्रति जो सर्वदा स्नेहपूर्ण बर्ताव करते हैं, अपनी शक्तिके अनुसार उत्तम खाद्य पदार्थ देने, अच्छे बिछौनेपर सुलाने, उबटन आदि लगाने, सदा मीठी बातें बोलने तथा पालन - पोषण करने आदिके द्वारा माता और पिताने जो उपकार किया है, उसका बदला सहज ही नहीं चुकाया जा सकता ॥

स हि राजा दशरथः पिता जनयिता मम ।

आज्ञापयन्मां यत् तस्य न तन्मिथ्या भविष्यति ॥ ११ ॥

4 ' अतः मेरे जन्मदाता पिता महाराज दशरथने मुझे जो आज्ञा दी है, वह मिथ्या नहीं होगी ' ॥ ११ ॥

एवमुक्तस्तु रामेण भरतः प्रत्यनन्तरम् ।

। उवाच विपुलोरस्कः सूतं परमदुर्मनाः ॥ १२ ॥

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अयोध्याकाण्डे एकादशाधिकशततमः सर्गः ५३३ श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर चौड़ी छातीवाले । भरतजीका मन बहुत उदास हो गया । वे पास ही बैठे हुए सूत सुमन्त्रसे बोले - ॥ १२ ॥

इह तु स्थण्डिले शीघ्रं कुशानास्तर सारथे ।

आर्यं प्रत्युपवेक्ष्यामि यावन्मे सम्प्रसीदति ॥ १३ ॥

निराहारो निरालोको धनहीनो यथा द्विजः ।

शये पुरस्ताच्छालायां यावन्मां प्रतियास्यति ॥ १४ ॥ ।

' सारथे! आप इस वेदीपर शीघ्र ही बहुत - से कुश बिछा दीजिये । जबतक आर्य मुझपर प्रसन्न नहीं होंगे, तबतक मैं यहीं इनके पास धरना दूँगा । जैसे साहूकार या महाजनके द्वारा निर्धन किया हुआ ब्राह्मण उसके घरके दरवाजेपर मुँह ढककर बिना खाये - पिये पड़ा रहता है, उसी प्रकार मैं भी उपवासपूर्वक मुखपर आवरण डालकर इस कुटियाके सामने लेट जाऊँगा । जबतक मेरी बात मानकर ये अयोध्याको नहीं लौटेंगे, तबतक मैं इसी तरह पड़ा रहूँगा ' ॥ १३-१४ ॥

स तु राममवेक्षन्तं सुमन्त्रं प्रेक्ष्य दुर्मनाः ।

कुशोत्तरमुपस्थाप्य भूमावेवास्थितः स्वयम् ॥ १५ ॥

यह सुनकर सुमन्त्र श्रीरामचन्द्रजीका मुँह ताकने लगे । उन्हें इस अवस्थामें देख भरतके मनमें बड़ा दुःख हुआ और वे स्वयं ही कुशकी चटाई बिछाकर जमीनपर बैठ गये ॥ १५ ॥

तमुवाच महातेजा रामो राजर्षिसत्तमः ।

किं मां भरत कुर्वाणं तात प्रत्युपवेक्ष्यसे ॥ १६ ॥

तब महातेजस्वी राजर्षिशिरोमणि श्रीरामने उनसे कहा— ' तात भरत! मैं तुम्हारी क्या बुराई करता हूँ, जो मेरे आगे धरना दोगे? ॥ १६ ॥

ब्राह्मणो ह्येकपार्श्वेन नरान् रोद्धुमिहार्हति ।

न तु मूर्धाभिषिक्तानां विधिः प्रत्युपवेशने ॥ १७ ॥

' ब्राह्मण एक करवटसे सोकर - धरना देकर मनुष्योंको अन्यायसे रोक सकता है, परंतु राजतिलक ग्रहण करनेवाले क्षत्रियोंके लिये इस प्रकार धरना देनेका विधान नहीं है ॥ १७ ॥

उत्तिष्ठ नरशार्दूल हित्वैतद् दारुणं व्रतम् ।

पुरवर्यांमितः क्षिप्रमयोध्यां याहि राघव ॥ १८ ॥

' अतः नरश्रेष्ठ रघुनन्दन! इस कठोर व्रतका परित्याग करके उठो और यहाँसे शीघ्र ही अयोध्यापुरीको जाओ ' ॥

आसीनस्त्वेव भरतः पौरजानपदं जनम् ।

उवाच सर्वतः प्रेक्ष्य किमार्यं नानुशासथ ॥ १ ९ ॥

यह सुनकर भरत वहाँ बैठे - बैठे ही सब ओर दृष्टि डालकर नगर और जनपदके लोगोंसे बोले — ' आपलोग भैयाको क्यों नहीं समझाते हैं? ' ॥ १ ९ ॥

ते तदोचुर्महात्मानं पौरजानपदा जनाः ।

काकुत्स्थमभिजानीमः सम्यग् वदति राघवः ॥ २० ॥

तब नगर और जनपदके लोग महात्मा भरतसे बोले - ' हम जानते हैं, काकुत्स्थ श्रीरामचन्द्रजीके प्रति आप रघुकुल- तिलक भरतजी ठीक ही कहते हैं ॥ २० ॥

एषोऽपि हि महाभागः पितुर्वचसि तिष्ठति ।

अत एव न शक्ताः स्मो व्यावर्तयितुमञ्जसा ॥ २१ ॥

' परंतु ये महाभाग श्रीरामचन्द्रजी भी पिताकी आज्ञाके पालनमें लगे हैं, इसलिये यह भी ठीक ही है । अतएव हम इन्हें सहसा उस ओरसे लौटानेमें असमर्थ हैं ' ॥ २१ ॥

तेषामाज्ञाय वचनं रामो वचनमब्रवीत् ।

एवं निबोध वचनं सुहृदां धर्मचक्षुषाम् ॥ २२ ॥

उन पुरवासियोंके वचनका तात्पर्य समझकर श्रीरामने भरतसे कहा- ' भरत! धर्मपर दृष्टि रखनेवाले सुहृदोंके इस कथनको सुनो और समझो ॥ २२ ॥

एतच्चैवोभयं श्रुत्वा सम्यक् सम्पश्य राघव ।

उत्तिष्ठ त्वं महाबाहो मां च स्पृश तथोदकम् ॥ २३ ॥

' रघुनन्दन! मेरी और इनकी दोनों बातोंको सुनकर उनपर सम्यक् रूपसे विचार करो । महाबाहो! अब शीघ्र उठो तथा मेरा और जलका स्पर्श करो ' ॥ २३ ॥

अथोत्थाय जलं स्पृष्ट्वा भरतो वाक्यमब्रवीत् ।

शृण्वन्तु मे परिषदो मन्त्रिणः शृणुयुस्तथा ॥ २४ ॥

न याचे पितरं राज्यं नानुशासामि मातरम् ।

एवं परमधर्मज्ञं नानुजानामि राघवम् ॥ २५ ॥

यह सुनकर भरत उठकर खड़े हो गये और श्रीराम एवं जलका स्पर्श करके बोले – ' मेरे सभासद् और मन्त्री सब लोग सुनें — न तो मैंने पिताजीसे राज्य माँगा था और न मातासे ही कभी इसके लिये कुछ कहा था । साथ ही, परम धर्मज्ञ श्रीरामचन्द्रजीके वनवासमें भी मेरी कोई सम्मति नहीं है ॥ २४-२५ ॥

यदि त्ववश्यं वस्तव्यं कर्तव्यं च पितुर्वचः ।

अहमेव निवत्स्यामि चतुर्दश वने समाः ॥ २६ ॥

' फिर भी यदि इनके लिये पिताजीकी आज्ञाका पालन करना और वनमें रहना अनिवार्य है तो इनके बदले मैं ही चौदह वर्षोंतक वनमें निवास करूँगा ' ॥ २६ ॥

धर्मात्मा तस्य सत्येन भ्रातुर्वाक्येन विस्मितः ।

उवाच रामः सम्प्रेक्ष्य पौरजानपदं जनम् ॥ २७ ॥

भाई भरतकी इस सत्य बातसे धर्मात्मा श्रीरामको

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५३४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे बड़ा विस्मय हुआ और उन्होंने पुरवासी तथा राज्यनिवासी लोगोंकी ओर देखकर कहा- ॥ २७ ॥

विक्रीतमाहितं क्रीतं यत् पित्रा जीवता मम ।

न तल्लोपयितुं शक्यं मया वा भरतेन वा ॥ २८ ॥

' पिताजीने अपने जीवनकालमें जो वस्तु बेंच दी है, या धरोहर रख दी है, अथवा खरीदी है, उसे मैं अथवा भरत कोई भी पलट नहीं सकता ॥ २८ ॥

उपाधिर्न मया कार्यों वनवासे जुगुप्सितः ।

युक्तमुक्तं च कैकेय्या पित्रा मे सुकृतं कृतम् ॥ २ ९ ॥

' मुझे वनवासके लिये किसीको प्रतिनिधि नहीं बनाना चाहिये; क्योंकि सामर्थ्य रहते हुए प्रतिनिधिसे काम लेना लोकमें निन्दित है । कैकेयीने उचित माँग ही प्रस्तुत की थी और मेरे पिताजीने उसे देकर पुण्य कर्म ही किया था ।

जानामि भरतं क्षान्तं गुरुसत्कारकारिणम् ।

सर्वमेवात्र कल्याणं सत्यसंधे महात्मनि ॥ ३० ॥

‘ मैं जानता हूँ, भरत बड़े क्षमाशील और गुरुजनोंका सत्कार करनेवाले हैं, इन सत्यप्रतिज्ञ महात्मामें सभी कल्याणकारी गुण मौजूद हैं ॥ ३० ॥

अनेन धर्मशीलेन वनात् प्रत्यागतः पुनः ।

भ्रात्रा सह भविष्यामि पृथिव्याः पतिरुत्तमः ॥ ३१ ॥

' चौदह वर्षोंकी अवधि पूरी करके जब मैं वनसे लौटूंगा, तब अपने इन धर्मशील भाईके साथ इस भूमण्डलका श्रेष्ठ राजा होऊँगा ॥ ३१ ॥

वृतो राजा हि कैकेय्या मया तद्वचनं कृतम् ।

अनृतान्मोचयानेन पितरं तं महीपतिम् ॥ ३२ ॥

' कैकेयीने राजासे वर माँगा और मैंने उसका पालन स्वीकार कर लिया, अतः भरत! अब तुम मेरा कहना मानकर उस वरके पालनद्वारा अपने पिता महाराज दशरथको असत्यके बन्धनसे मुक्त | करो ' ॥ ३२ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकादशाधिकशततमः सर्गः ॥ १११ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ ग्यारहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १११ ॥

द्वादशाधिकशततमः सर्गः ऋषियोंका भरतको श्रीरामकी आज्ञाके अनुसार लौट जानेकी सलाह देना, भरतका पुनः श्रीरामके चरणोंमें गिरकर चलनेकी प्रार्थना करना, श्रीरामका उन्हें समझाकर अपनी चरणपादुका

तमप्रतिमतेजोभ्यां भ्रातृभ्यां रोमहर्षणम् ।

विस्मिताः संगमं प्रेक्ष्य समुपेता महर्षयः ॥ १ ॥

उन अनुपम तेजस्वी भ्राताओं वह रोमाञ्चकारी समागम देख वहाँ आये हुए महर्षियोंको बड़ा विस्मय हुआ ॥ १ ॥

अन्तर्हिता मुनिगणाः स्थिताश्च परमर्षयः ।

तौ भ्रातरौ महाभागौ काकुत्स्थौ प्रशशंसिरे ॥ २ ॥

अन्तरिक्षमें अदृश्य भावसे खड़े हुए मुनि तथा वहाँ प्रत्यक्षरूपमें बैठे हुए महर्षि उन महान् भाग्यशाली ककुत्स्थवंशी बन्धुओंकी इस प्रकार प्रशंसा करने लगे- ॥२ ॥

सदाय राजपुत्रौ द्वौ धर्मज्ञौ धर्मविक्रमौ ।

श्रुत्वा वयं हि सम्भाषामुभयोः स्पृहयामहे ॥ ३ ॥

' ये दोनों राजकुमार सदा श्रेष्ठ, धर्मके ज्ञाता और धर्ममार्गपर ही चलनेवाले हैं । इन दोनोंकी बातचीत सुनकर हमें उसे बारंबार सुनते रहनेकी ही इच्छा होती है ' ॥ ३ ॥

देकर उन सबको विदा करना

ततस्त्वृषिगणाः क्षिप्रं दशग्रीववधैषिणः ।

भरतं राजशार्दूलमित्यूचुः संगता वचः ॥ ४ ॥

तदनन्तर दशग्रीव रावणके वधकी अभिलाषा रखनेवाले ऋषियोंने मिलकर राजसिंह भरतसे तुरंत ही यह बात कही - ॥४ ॥

कुले जात महाप्राज्ञ महावृत्त महायशः ।

ग्राह्यं रामस्य वाक्यं ते पितरं यद्यवेक्षसे ॥ ५ ॥

' महाप्राज्ञ! तुम उत्तम कुलमें उत्पन्न हुए हो । तुम्हारा आचरण बहुत उत्तम और यश महानु है । यदि तुम अपने पिताकी ओर देखो - उन्हें सुख पहुँचाना चाहो तो तुम्हें श्रीरामचन्द्रजीकी बात मान लेनी चाहिये ॥ ५ ॥

सदानृणमिमं रामं वयमिच्छामहे पितुः ।

अनृणत्वाच्च कैकेय्याः स्वर्गं दशरथो गतः ॥ ६ ॥

' हमलोग इन श्रीरामको पिताके ॠणसे सदा उऋण देखना चाहते हैं । कैकेयीका ऋण चुका देनेके कारण ही राजा दशरथ स्वर्गमें पहुँचे हैं ' ॥ ६ ॥

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अयोध्याकाण्डे द्वादशाधिकशततमः सर्गः ५३५

एतावदुक्त्वा वचनं गन्धर्वाः समहर्षयः ।

राजर्षयश्चैव तथा सर्वे स्वां स्वां गतिं गताः ॥ ७ ॥

इतना कहकर वहाँ आये हुए गन्धर्व, महर्षि और राजर्षि सब अपने - अपने स्थानको चले गये ॥ ७ ॥

ह्लादितस्तेन वाक्येन शुशुभे शुभदर्शनः ।

रामः संहृष्टवदनस्तानृषीनभ्यपूजयत् ॥ ८ ॥

जिनके दर्शनसे जगत्का कल्याण हो जाता है, वे भगवान् श्रीराम महर्षियोंके वचनसे बहुत प्रसन्न हुए । उनका मुख हर्षोल्लाससे खिल उठा, इससे उनकी बड़ी शोभा हुई और उन्होंने उन महर्षियोंकी सादर प्रशंसा की ॥ ८ ॥

त्रस्तगात्रस्तु भरतः स वाचा सज्जमानया ।

कृताञ्जलिरिदं वाक्यं राघवं पुनरब्रवीत् ॥ ९ ॥

परंतु भरतका सारा शरीर थर्रा उठा । वे लड़खड़ाती हुई जबानसे हाथ जोड़कर श्रीरामचन्द्रजीसे बोले - ॥ ९ ॥

राम धर्ममिमं प्रेक्ष्य कुलधर्मानुसंततम् ।

कर्तुमर्हसि काकुत्स्थ मम मातुश्च याचनाम् ॥ १० ॥

' ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम! हमारे कुलधर्मसे सम्बन्ध रखनेवाला जो ज्येष्ठ पुत्रका राज्यग्रहण और प्रजापालनरूप धर्म है, उसकी ओर दृष्टि डालकर आप मेरी तथा माताकी याचना सफल कीजिये ॥ १० ॥

रक्षितुं सुमहद् राज्यमहमेकस्तु नोत्सहे ।

पौरजानपदांश्चापि रक्तान् रञ्जयितुं तदा ॥ ११ ॥

' मैं अकेला ही इस विशाल राज्यकी रक्षा नहीं कर सकता तथा आपके चरणोंमें अनुराग रखनेवाले इन पुरवासी तथा जनपदवासी लोगोंको भी आपके बिना प्रसन्न नहीं रख सकता ॥ ११ ॥

ज्ञातयश्चापि योधाश्च मित्राणि सुहृदश्च नः ।

त्वामेव हि प्रतीक्षन्ते पर्जन्यमिव कर्षकाः ॥ १२ ॥

' जैसे किसान मेघकी प्रतीक्षा करते रहते हैं, उसी प्रकार हमारे बन्धु - बान्धव, योद्धा, मित्र और सुहृद् सब लोग आपकी ही बाट जोहते हैं ॥ १२ ॥

इदं राज्यं महाप्राज्ञ स्थापय प्रतिपद्य हि ।

शक्तिमान् स हि काकुत्स्थ लोकस्य परिपालने ॥ १३ ॥

‘ महाप्राज्ञ! आप इस राज्यको स्वीकार करके दूसरे किसीको इसके पालनका भार सौंप दीजिये । वही पुरुष आपके प्रजावर्ग अथवा लोकका पालन करनेमें समर्थ हो सकता है ' ॥ १३ ॥

एवमुक्त्वापतद् भ्रातुः पादयोर्भरतस्तदा ।

भृशं सम्प्रार्थयामास राघवेऽतिप्रियं वदन् ॥ १४ ॥

ऐसा कहकर भरत अपने भाईके चरणोंपर गिर पड़े । उस समय उन्होंने श्रीरघुनाथजीसे अत्यन्त प्रिय वचन बोलकर उनसे राज्यग्रहण करनेके लिये बड़ी प्रार्थना की ॥

तमङ्के भ्रातरं कृत्वा रामो वचनमब्रवीत् ।

श्यामं नलिनपत्राक्षं मत्तहंसस्वरः स्वयम् ॥ १५ ॥

तब श्रीरामचन्द्रजीने श्यामवर्ण कमलनयन भाई भरतको उठाकर गोदमें बिठा लिया और मदमत्त हंसके समान मधुर स्वरमें स्वयं यह बात कही - ॥ १५ ॥

आगता त्वामियं बुद्धिः स्वजा वैनयिकी च या ।

भृशमुत्सहसे तात रक्षितुं पृथिवीमपि ॥ १६ ॥

' तात! तुम्हें जो यह स्वाभाविक विनयशील बुद्धि प्राप्त हुई है इस बुद्धिके द्वारा तुम समस्त भूमण्डलकी रक्षा करनेमें भी पूर्णरूपसे समर्थ हो सकते हो ॥ १६ ॥

अमात्यैश्च सुहृद्भिश्च बुद्धिमद्धिश्च मन्त्रिभिः ।

सर्वकार्याणि सम्मन्त्र्य महान्त्यपि हि कारय ॥१७ ॥

' इसके सिवा अमात्यों, सुहृदों और बुद्धिमान् मन्त्रियोंसे सलाह लेकर उनके द्वारा सब कार्य, वे कितने ही बड़े क्यों न हों, करा लिया करो ॥ १७ ॥

लक्ष्मीश्चन्द्रादपेयाद् वा हिमवान् वा हिमं त्यजेत् ।

अतीयात् सागरो वेलां न प्रतिज्ञामहं पितुः ॥ १८ ॥

' चन्द्रमासे उसकी प्रभा अलग हो जाय, हिमालय हिमका परित्याग कर दे, अथवा समुद्र अपनी सीमाको लाँघकर आगे बढ़ जाय, किंतु मैं पिताकी प्रतिज्ञा नहीं तोड़ सकता ॥ १८ ॥

कामा वा तात लोभाद् वा मात्रा तुभ्यमिदं कृतम् ।

न तन्मनसि कर्तव्यं वर्तितव्यं च मातृवत् ॥ १ ९ ॥

' तात! माता कैकेयीने कामनासे अथवा लोभवश तुम्हारे लिये जो कुछ किया है, उसको मनमें न लाना और उसके प्रति सदा वैसा ही बर्ताव करना जैसा अपनी पूजनीया माताके प्रति करना उचित है ' ॥ १ ९ ॥

एवं ब्रुवाणं भरतः कौसल्यासुतमब्रवीत् ।

तेजसाऽऽदित्यसंकाशं प्रतिपच्चन्द्रदर्शनम् ॥ २० ॥

जो सूर्यके समान तेजस्वी हैं तथा जिनका दर्शन प्रतिपदा ( द्वितीया ) के चन्द्रमाकी भाँति आह्लादजनक है, उन कौसल्यानन्दन श्रीरामके इस प्रकार कहनेपर भरत उनसे यों बोले— ॥२० ॥

अधिरोहार्य पादाभ्यां पादुके हेमभूषिते ।

एते हि सर्वलोकस्य योगक्षेमं विधास्यतः ॥ २१ ॥

' आर्य! ये दो सुवर्णभूषित पादुकाएँ आपके । चरणोंमें अर्पित हैं, आप इनपर अपने चरण रखें । ये ही

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५३६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे सम्पूर्ण जगत्के योगक्षेमका निर्वाह करेंगी ' ॥ २१ ॥

सोऽधिरुह्य नरव्याघ्रः पादुके व्यवमुच्य च ।

प्रायच्छत् सुमहातेजा भरताय महात्मने ॥ २२ ॥

तब महातेजस्वी पुरुषसिंह श्रीरामने उन पादुकाओंपर चढ़कर उन्हें फिर अलग कर दिया और महात्मा भरतको सौंप दिया ॥ २२ ॥

स पादुके सम्प्रणम्य रामं वचनमब्रवीत् ।

चतुर्दश हि वर्षाणि जटाचीरधरो ह्यहम् ॥ २३ ॥

फलमूलाशनो वीर भवेयं रघुनन्दन ।

तवागमनमाकांक्षन् वसन् वै नगराद् बहिः ॥ २४ ॥

तव पादुकयोर्न्यस्य राज्यतन्त्रं परंतप । उन पादुकाओंको प्रणाम करके भरतने श्रीरामसे कहा- ' वीर रघुनन्दन! मैं भी चौदह वर्षोंतक जटा और चीर धारण करके फल - मूलका भोजन करता हुआ आपके आगमनकी प्रतीक्षामें नगरसे बाहर ही रहूँगा । परंतप! इतने दिनोंतक राज्यका सारा भार आपकी इन चरण-पादुकाओंपर ही रखकर मैं आपकी बाट जोहता रहूँगा || चतुर्दशे हि सम्पूर्णे वर्षेऽहनि रघूत्तम ॥ २५ ॥

न द्रक्ष्यामि यदि त्वां तु प्रवेक्ष्यामि हुताशनम् । ' रघुकुलशिरोमणे! यदि चौदहवाँ वर्ष पूर्ण होनेपर नूतन वर्षके प्रथम दिन ही मुझे आपका दर्शन नहीं मिलेगा तो मैं जलती हुई आगमें प्रवेश कर जाऊँगा ' ॥ तथेति च प्रतिज्ञाय तं परिष्वज्य सादरम् ॥ २६ ॥

शत्रुघ्नं च परिष्वज्य वचनं चेदमब्रवीत् । श्रीरामचन्द्रजीने ' बहुत अच्छा ' कहकर स्वीकृति दे दी और बड़े आदरके साथ भरतको हृदयसे लगाया । तत्पश्चात् शत्रुघ्नको भी छातीसे लगाकर यह बात कही-मातरं रक्ष कैकेयीं मा रोषं कुरु तां प्रति ॥ २७ ॥

मया च सीतया चैव शप्तोऽसि रघुनन्दन ।

इत्युक्त्वाश्रुपरीताक्षो भ्रातरं विससर्ज ह ॥ २८ ॥

' रघुनन्दन! मैं तुम्हें अपनी और सीताकी शपथ दिलाकर कहता हूँ कि तुम माता कैकेयीकी रक्षा करना, उनके प्रति कभी क्रोध न करना ' – इतना कहते - कहते उनकी आँखोंमें आँसू उमड़ आये । उन्होंने व्यथित हृदयसे भाई शत्रुघ्नको विदा किया ॥ २७-२८ ॥ स पादुके ते भरतः स्वलंकृते महोज्ज्वले सम्परिगृह्य धर्मवित् । प्रदक्षिणं चैव चकार राघवं चकार चैवोत्तमनागमूर्धनि ॥ २ ९ ॥ धर्मज्ञ भरतने भलीभाँति अलंकृत की हुई उन परम उज्ज्वल चरणपादुकाओंको लेकर श्रीरामचन्द्रजीकी परिक्रमा की तथा उन पादुकाओंको राजाकी सवारीमें आनेवाले सर्वश्रेष्ठ गजराजके मस्तकपर स्थापित किया ॥ अथानुपूर्व्या प्रतिपूज्य तं जनं गुरूंश्च मन्त्रीन् प्रकृतीस्तथानुजौ । व्यसर्जयद् राघववंशवर्धनः स्थितः स्वधर्मे हिमवानिवाचलः ॥ ३० ॥

तदनन्तर अपने धर्ममें हिमालयकी भाँति अविचल भावसे स्थित रहनेवाले रघुवंशवर्धन श्रीरामने क्रमशः वहाँ आये हुए जनसमुदाय, गुरु, मन्त्री, प्रजा तथा दोनों भाइयोंका यथायोग्य सत्कार करके उन्हें विदा किया ॥ तं मात बाष्पगृहीतकण्ठ्यो दुःखेन नामन्त्रयितुं हि शेकुः । स चैव मातृरभिवाद्य सर्वा रुदन् कुटीं स्वां प्रविवेश रामः ॥ ३१ ॥

उस समय कौसल्या आदि सभी माताओंका गला आँसुओंसे रुँध गया था । वे दुःखके कारण श्रीरामको सम्बोधित भी न कर सकीं । श्रीराम भी सब माताओंको प्रणाम करके रोते हुए अपनी कुटियामें | चले गये ॥३१ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे द्वादशाधिकशततमः सर्गः ॥ ११२ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ बारहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ११२ ॥

त्रयोदशाधिकशततमः सर्गः भरतका भरद्वाजसे मिलते हुए अयोध्याको लौट आना

ततः शिरसि कृत्वा तु पादुके भरतस्तदा । पूर्वक रथपर बैठे ॥ १ ॥

आरुरोह रथं हृष्टः शत्रुघ्नसहितस्तदा ॥ १ ॥ वसिष्ठो वामदेवश्च जाबा

तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजीकी दोनों चरणपादुकाओंको अग्रतः प्रययुः सर्वे मन्त्रिणो मन्त्रपूजिताः ॥ २ ॥

अपने मस्तकपर रखकर भरत शत्रुघ्रके साथ प्रसन्नता- वसिष्ठ, वामदेव तथा दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन

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अयोध्याकाण्डे त्रयोदशाधिकशततमः सर्गः ५३७

करनेवाले जाबालि आदि सब मन्त्री, जो उत्तम मन्त्रणा ।

देनेके कारण सम्मानित थे, आगे - आगे चले ॥ २ ॥

मन्दाकिनीं नदीं रम्यां प्राङ्मुखास्ते ययुस्तदा ।

प्रदक्षिणं च कुर्वाणाश्चित्रकूटं महागिरिम् ॥ ३ ॥

वे सब लोग चित्रकूट नामक महान् पर्वतकी परिक्रमा करते हुए परम रमणीय मन्दाकिनी नदीको पार करके पूर्वदिशाकी ओर प्रस्थित हुए ॥ ३ ॥

पश्यन् धातुसहस्त्राणि रम्याणि विविधानि च ।

प्रययौ तस्य पार्श्वेन ससैन्यो भरतस्तदा ॥ ४ ॥

उस समय भरत अपनी सेनाके साथ सहस्रों प्रकारके रमणीय धातुओंको देखते किनारेसे होकर निकले ॥ ४ ॥

अदूराच्चित्रकूटस्य ददर्श आश्रमं यत्र स मुनिर्भरद्वाजः चित्रकूटसे थोड़ी ही दूर जानेपर देखा, जहाँ मुनिवर भरद्वाजजी निवास स तमाश्रममागम्य भरद्वाजस्य हुए चित्रकूटके

भरतस्तदा ।

कृतालयः ॥ ५ ॥

भरतने वह आश्रम करते थे * ॥ ५ ॥

वीर्यवान् ।

अवतीर्य रथात् पादौ ववन्दे कुलनन्दनः ॥ ६ ॥

अपने कुलको आनन्दित करनेवाले पराक्रमी भरत महर्षि भरद्वाजके उस आश्रमपर पहुँचकर रथसे उतर पड़े और उन्होंने मुनिके चरणोंमें प्रणाम किया ॥ ६ ॥

ततो हृष्टो भरद्वाजो भरतं वाक्यमब्रवीत् ।

अपि कृत्यं कृतं तात रामेण च समागतम् ॥ ७ ॥

उनके आनेसे महर्षि भरद्वाजको बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने भरतसे पूछा - ' तात! क्या तुम्हारा कार्य सम्पन्न हुआ? क्या श्रीरामचन्द्रजीसे भेंट हुई? ' ॥ ७ ॥

एवमुक्तः स तु ततो भरद्वाजेन धीमता ।

प्रत्युवाच भरद्वाजं भरतो धर्मवत्सलः ॥ ८ ॥

बुद्धिमान् भरद्वाजजीके इस प्रकार पूछनेपर धर्मवत्सल भरतने उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया— ॥ ८ ॥

स याच्यमानो गुरुणा मया च दृढविक्रमः ।

राघवः परमप्रीतो वसिष्ठं वाक्यमब्रवीत् ॥ ९ ॥

' मुने! भगवान् श्रीराम अपने पराक्रमपर दृढ़ रहनेवाले हैं । मैंने उनसे बहुत प्रार्थना की । गुरुजीने भी अनुरोध किया । तब उन्होंने अत्यन्त प्रसन्न होकर गुरुदेव वसिष्ठजीसे इस प्रकार कहा- ॥ ९ ॥

पितुः प्रतिज्ञां तामेव पालयिष्यामि तत्त्वतः ।

चतुर्दश हि वर्षाणि या प्रतिज्ञा पितुर्मम ॥ १० ॥

' मैं चौदह वर्षोंतक वनमें रहूँ, इसके लिये मेरे पिताजीने जो प्रतिज्ञा कर ली थी, उनकी उस प्रतिज्ञाका ही मैं यथार्थरूपसे पालन करूँगा ' ॥ १० ॥

एवमुक्तो महाप्राज्ञो वसिष्ठः प्रत्युवाच ह ।

वाक्यज्ञो वाक्यकुशलं राघवं वचनं महत् ॥ ११ ॥

' उनके ऐसा कहनेपर बातके मर्मको समझनेवाले महाज्ञानी वसिष्ठजीने बातचीत करनेमें कुशल श्रीरघुनाथजीसे यह महत्त्वपूर्ण बात कही - ॥ ११ ॥

एते प्रयच्छ संहृष्टः पादुके हेमभूषिते ।

अयोध्यायां महाप्राज्ञ योगक्षेमकरो भव ॥ १२ ॥

' महाप्राज्ञ! तुम प्रसन्नतापूर्वक ये स्वर्णभूषित पादुकाएँ अपने प्रतिनिधिके रूपमें भरतको दे दो और इन्हींके द्वारा अयोध्याके योगक्षेमका निर्वाह करो ' ॥

एवमुक्तो वसिष्ठेन राघवः प्राङ्मुखः स्थितः ।

पादुके हेमविकृते मम राज्याय ते ददौ ॥ १३ ॥

' गुरु वसिष्ठजीके ऐसा कहनेपर पूर्वाभिमुख खड़े हुए श्रीरघुनाथजीने अयोध्याके राज्यका संचालन करनेके लिये ये दोनों स्वर्णभूषित पादुकाएँ मुझे दे दीं ॥ १३ ॥

निवृत्तोऽहमनुज्ञातो रामेण सुमहात्मना ।

। अयोध्यामेव गच्छामि गृहीत्वा पादुके शुभे ॥ १४ ॥

' तत्पश्चात् मैं महात्मा श्रीरामकी आज्ञा पाकर लौट आया हूँ और उनकी इन मङ्गलमयी चरणपादुकाओंको लेकर अयोध्याको ही जा रहा हूँ ' ॥ १४ ॥

एतच्छ्रुत्वा शुभं वाक्यं भरतस्य महात्मनः ।

भरद्वाजः शुभतरं मुनिर्वाक्यमुदाहरत् ॥ १५ ॥

महात्मा भरतका यह शुभ वचन सुनकर भरद्वाज मुनिने यह परम मङ्गलमय बात कही - ॥ १५ ॥

नैतच्चित्रं नरव्याघ्रे शीलवृत्तविदां वरे ।

यदार्यं त्वयि तिष्ठेत्तु निम्नोत्सृष्टमिवोदकम् ॥ १६ ॥

' भरत! तुम मनुष्योंमें सिंहके समान वीर तथा * यह आश्रम यमुनासे दक्षिण दिशामें चित्रकूटके कुछ निकट था । गङ्गा और यमुनाके बीच प्रयागवाला आश्रम, जहाँ वनमें जाते समय श्रीरामचन्द्रजी तथा भरत आदिने विश्राम किया था, इससे भिन्न जान पड़ता है । तभी इस आश्रमपर भरद्वाजसे मिलनेके बाद भरत आदिके यमुना पार करनेका उल्लेख मिलता है — ' ततस्ते यमुनां दिव्यां नदीं तीत्वोर्मिमालिनीम् । ' इस द्वितीय आश्रमसे श्रीराम और भरतके समागमका समाचार शीघ्र प्राप्त हो सकता था; इसीलिये भरद्वाजजी भरतके लौटनेके समय यहीं मौजूद थे ।

पृष्ठ 550

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५३८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे शील और सदाचारके ज्ञाताओंमें श्रेष्ठ हो । जैसे जल । नीची भूमिवाले जलाशयमें सब ओरसे बहकर चला आता है, उसी प्रकार तुममें सारे श्रेष्ठ गुण स्थित हों— यह कोई आश्चर्यकी बात नहीं है ॥ १६ ॥

अनृणः स महाबाहुः पिता दशरथस्तव ।

यस्य त्वमीदृशः पुत्रो धर्मात्मा धर्मवत्सलः ॥ १७ ॥

' तुम्हारे पिता महाबाहु राजा दशरथ सब प्रकारसे उऋण हो गये, जिनके तुम जैसा धर्मप्रेमी एवं धर्मात्मा पुत्र है ' ॥ १७ ॥

तमृषिं तु महाप्राज्ञमुक्तवाक्यं कृताञ्जलिः ।

आमन्त्रयितुमारेभे चरणावुपगृह्य च ॥ १८ ॥ ।

उन महाज्ञानी महर्षिके ऐसा कहनेपर भरतने हाथ जोड़कर उनके चरणोंका स्पर्श किया; फिर वे उनसे जानेकी आज्ञा लेनेको उद्यत हुए ॥ १८ ॥

ततः प्रदक्षिणं कृत्वा भरद्वाजं पुनः पुनः ।

भरतस्तु ययौ श्रीमानयोध्यां सह मन्त्रिभिः ॥ १ ९ ॥

तदनन्तर श्रीमान् भरत बारंबार भरद्वाज मुनिकी परिक्रमा करके मन्त्रियोंसहित अयोध्याकी ओर चल दिये ॥ १ ९ ॥

यानैश्च शकटैश्चैव हयैर्नागैश्च सा चमूः ।

पुनर्निवृत्ता विस्तीर्णा भरतस्यानुयायिनी ॥ २० ॥

फिर वह विस्तृत सेना रथों, छकड़ों, घोड़ों और हाथियोंके साथ भरतका अनुसरण करती हुई अयोध्याको लौटी ॥२० ॥

ततस्ते यमुनां दिव्यां नदीं तीर्वोर्मिमालिनीम् ।

ददृशुस्तां पुनः सर्वे गङ्गां शिवजलां नदीम् ॥ २१ ॥

तत्पश्चात् आगे जाकर उन सब लोगोंने तरंग-मालाओंसे सुशोभित दिव्य नदी यमुनाको पार करके पुनः शुभसलिला गङ्गाजीका दर्शन किया ॥ २१ ॥

तां रम्यजलसम्पूर्णां संतीर्य सहबान्धवः ।

शृङ्गवेरपुरं रम्यं प्रविवेश ससैनिकः ॥ २२ ॥

फिर बन्धु - बान्धवों और सैनिकोंके साथ मनोहर जलसे भरी हुई गङ्गाके भी पार होकर वे परम रमणीय शृङ्गवेरपुरमें जा पहुँचे ॥ २२ ॥

शृङ्गवेरपुराद् भूय अयोध्यां संददर्श ह ।

अयोध्यां तु तदा दृष्ट्वा पित्रा भ्रात्रा विवर्जिताम् ॥ २३ ॥

भरतो दुःखसंतप्तः सारथिं चेदमब्रवीत् । शृङ्गवेरपुरसे प्रस्थान करनेपर उन्हें पुनः अयोध्यापुरीका दर्शन हुआ, जो उस समय पिता और भाई दोनोंसे विहीन थी । उसे देखकर भरतने दुःखसे संतप्त हो सारथिसे इस प्रकार कहा— ॥ २३३ ॥

सारथे पश्य विध्वस्ता अयोध्या न प्रकाशते ॥ २४ ॥

निराकारा निरानन्दा दीना प्रतिहतस्वना ॥ २५ ॥

' सारथि सुमन्त्रजी! देखिये, अयोध्याकी सारी शोभा नष्ट हो गयी है; अतः यह पहलेकी भाँति प्रकाशित नहीं होती है । इसका वह सुन्दर रूप, वह आनन्द जाता रहा । इस समय यह अत्यन्त दीन और नीरव हो रही है ' ॥ २४-२५ ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे त्रयोदशाधिकशततमः सर्गः ॥ ११३ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ तेरहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ११३ ॥

चतुर्दशाधिकशततमः सर्गः भरतके द्वारा अयोध्याकी दुरवस्थाका दर्शन तथा अन्तःपुरमें प्रवेश करके भरतका दुःखी होना स्निग्धगम्भीरघोषेण स्यन्दनेनोपयान् प्रभुः । था । प्रकाश न होनेके कारण वह पुरी कृष्णपक्षकी अयोध्यां भरतः क्षिप्रं प्रविवेश महायशाः ॥ १ ॥ काली रातके समान जान पड़ती थी ॥२ ॥

इसके बाद प्रभावशाली महायशस्वी भरतने स्निग्ध, राहुशत्रोः प्रियां पत्नीं श्रिया प्रज्वलितप्रभाम् । गम्भीर घर्घर घोषसे युक्त रथके द्वारा यात्रा करके शीघ्र ग्रहेणाभ्युदितेनैकां रोहिणीमिव पीडिताम् ॥ ३ ॥

ही अयोध्यामें प्रवेश किया ॥ १ ॥ जैसे चन्द्रमाकी प्रिय पत्नी और अपनी शोभासे

बिडालोलूकचरितामालीननरवारणाम् प्रकाशित कान्तिवाली रोहिणी उदित हुए राहु नाम तिमिराभ्याहतां कालीमप्रकाशां निशामिव ॥ २ ॥ ग्रहके द्वारा अपने पतिके ग्रस लिये जानेपर अकेली-उस समय वहाँ बिलाव और उल्लू विचर रहे थे । असहाय हो जाती है, उसी प्रकार दिव्य ऐश्वर्यसे

घरोंके किवाड़ बंद थे । सारे नगरमें अन्धकार छा रहा प्रकाशित होनेवाली अयोध्या राजाके कालकवलित हो