वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ — पृष्ठ 581–590

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 581–590

पृष्ठ 581

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अरण्यकाण्डे उदयन्तं दिनकरं दृष्ट्वा विगतकल्मषाः ॥ सुतीक्ष्णमभिगम्येदं श्लक्ष्णं वचनमब्रुवन् ॥ ४ ॥

सीतासहित श्रीराम और लक्ष्मणने ठीक समयसे उठकर कमलकी सुगन्धसे सुवासित परम शीतल जलके द्वारा स्नान किया । तदनन्तर उन तीनोंने ही मिलकर विधिपूर्वक अग्नि और देवताओंकी प्रातः कालिक पूजा की । इसके बाद तपस्वीजनोंके आश्रयभूत वनमें उदित हुए सूर्यदेवका दर्शन करके वे तीनों निष्पाप पथिक सुतीक्ष्ण मुनिके पास गये और यह मधुर वचन बोले- ॥ २–४ ॥

सुखोषिताः स्म भगवंस्त्वया पूज्येन पूजिताः ।

आपृच्छामः प्रयास्यामो मुनयस्त्वरयन्ति नः ॥ ५ ॥

' भगवन्! आपने पूजनीय होकर भी हमलोगोंकी पूजा की है । हम आपके आश्रममें बड़े सुखसे रहे हैं । अब

हम यहाँसे जायँगे, इसके लिये आपकी आज्ञा चाहते हैं ।

ये मुनि हमें चलनेके लिये जल्दी मचा रहे हैं ॥ ५ ॥

त्वरामहे वयं द्रष्टुं कृत्स्नमाश्रममण्डलम् ।

ऋषीणां पुण्यशीलानां दण्डकारण्यवासिनाम् ॥ ६ ॥

' हमलोग दण्डकारण्यमें निवास करनेवाले पुण्यात्मा ऋषियोंके सम्पूर्ण आश्रममण्डलका दर्शन करनेके लिये उतावले हो रहे हैं ॥ ६ ॥

अभ्यनुज्ञातुमिच्छामः सहैभिर्मुनिपुंगवैः ।

धर्मनित्यैस्तपोदान्तैर्विशिखैरिव पावकैः ॥ ७ ॥

' अतः हमारी इच्छा है कि आप धूमरहित अग्निके समान तेजस्वी, तपस्याद्वारा इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले तथा नित्य - धर्मपरायण इन श्रेष्ठ महर्षियोंके साथ यहाँसे जानेके लिये हमें आज्ञा दें ॥ ७ ॥

अविषह्यातपो यावत् सूर्यो नातिविराजते ।

अमार्गेणागतां लक्ष्मीं प्राप्येवान्वयवर्जितः ॥ ८ ॥

तावदिच्छामहे गन्तुमित्युक्त्वा चरणौ मुनेः ।

ववन्दे सहसौमित्रिः सीतया सह राघवः ॥ ९ ॥

' जैसे अन्यायसे आयी हुई सम्पत्तिको पाकर किसी नीच कुलके मनुष्यमें असह्य उग्रता आ जाती है, उसी प्रकार यह सूर्यदेव जबतक असह्य ताप देनेवाले होकर प्रचण्ड तेजसे प्रकाशित न होने लगें, उसके पहले ही हम यहाँसे चल देना चाहते हैं । ' ऐसा कहकर लक्ष्मण और सीतासहित श्रीरामने मुनिके चरणोंकी वन्दना की ॥

तौ संस्पृशन्तौ चरणावुत्थाप्य मुनिपुंगवः ।

गाढमाश्लिष्य सस्नेहमिदं वचनमब्रवीत् ॥ १० ॥

अपने चरणोंका स्पर्श करते हुए श्रीराम और लक्ष्मणको उठाकर मुनिवर सुतीक्ष्णने कसकर हृदयसे अष्टमः सर्गः ५६ ९ लगा लिया और बड़े स्नेहसे इस प्रकार कहा - ॥१० ॥

अरिष्टं गच्छ पन्थानं राम सौमित्रिणा सह ।

सीतया चानया सार्धं छाययेवानुवृत्तया ॥ ११ ॥

' श्रीराम! आप छायाकी भाँति अनुसरण करनेवाली इस धर्मपत्नी सीता तथा सुमित्राकुमार लक्ष्मणके साथ यात्रा कीजिये । आपका मार्ग विघ्न - बाधाओंसे रहित परम मङ्गलमय हो ॥ ११ ॥

पश्याश्रमपदं रम्यं दण्डकारण्यवासिनाम् ।

एषां तपस्विनां वीर तपसा भावितात्मनाम् ॥ १२ ॥

' वीर! तपस्यासे शुद्ध अन्तःकरणवाले दण्डकारण्य-वासी इन तपस्वी मुनियोंके रमणीय आश्रमोंका दर्शन कीजिये ॥

सुप्राज्यफलमूलानि पुष्पितानि वनानि च ।

प्रशस्तमृगयूथानि शान्तपक्षिगणानि च ॥ १३ ॥

‘ इस यात्रामें आप प्रचुर फल - मूलोंसे युक्त तथा फूलोंसे सुशोभित अनेक वन देखेंगे; वहाँ उत्तम मृगोंके झुंड विचरते होंगे और पक्षी शान्तभावसे रहते होंगे ॥ १३ ॥

फुल्लपङ्कजखण्डानि प्रसन्नसलिलानि च ।

कारण्डवविकीर्णानि तटाकानि सरांसि च ॥ १४ ॥

' आपको बहुत - से ऐसे तालाब और सरोवर दिखायी देंगे, जिनमें प्रफुल्ल कमलोंके समूह शोभा दे रहे होंगे । उनमें स्वच्छ जल भरे होंगे तथा कारण्डव आदि जलपक्षी सब ओर फैल रहे होंगे ॥ १४ ॥

द्रक्ष्यसे दृष्टिरम्याणि गिरिप्रस्स्रवणानि च ।

रमणीयान्यरण्यानि मयूराभिरुतानि च ॥ १५ ॥

' नेत्रोंको रमणीय प्रतीत होनेवाले पहाड़ी झरनों और मोरोंकी मीठी बोलीसे गूँजती हुई सुरम्य वनस्थलियोंको भी आप देखेंगे ॥ १५ ॥

गम्यतां वत्स सौमित्रे भवानपि च गच्छतु ।

आगन्तव्यं च ते दृष्ट्वा पुनरेवाश्रमं प्रति ॥ १६ ॥

‘ श्रीराम! जाइये, वत्स सुमित्राकुमार! तुम भी जाओ । दण्डकारण्यके आश्रमोंका दर्शन करके आपलोगोंको फिर इसी आश्रममें आ जाना चाहिये ' ॥ १६ ॥

एवमुक्तस्तथेत्युक्त्वा काकुत्स्थः सहलक्ष्मणः । प्रदक्षिणं मुनिं कृत्वा प्रस्थातुमुपचक्रमे ॥ १७ ॥.

उनके ऐसा कहनेपर लक्ष्मणसहित श्रीरामने ' बहुत अच्छा ' कहकर मुनिकी परिक्रमा की और वहाँसे प्रस्थान करनेकी तैयारी की ॥ १७ ॥

ततः शुभतरे तूणी धनुषी चायतेक्षणा ।

ददौ सीता तयोर्भ्रात्रोः खड्गौ च विमलौ ततः ॥ १८ ॥

| तदनन्तर विशाल नेत्रोंवाली सीताने उन दोनों

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५७० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे

भाइयोंके हाथमें दो परम सुन्दर तूणीर, धनुष और । आश्रमसे बाहर निकले ॥१ ९ ॥

चमचमाते हुए खड्ग प्रदान किये ॥१८ ॥ शीघ्रं तौ रूपसम्पन्नावनुज्ञातौ महर्षिणा ।

आबध्य च शुभे तूणी चापे चादाय सस्वने । प्रस्थितौ धृतचापासी सीतया सह राघवौ ॥ २० ॥

निष्क्रान्तावाश्रमाद् गन्तुमुभौ तौ रामलक्ष्मणौ ॥ १ ९ ॥ वे दोनों रघुवंशी वीर बड़े ही रूपवान् थे, उन्होंने उन सुन्दर तूणीरोंको पीठपर बाँधकर टंकारते हुए खड्ग और धनुष धारण करके महर्षिकी आज्ञा धनुषको हाथमें ले वे दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण | सीताके साथ शीघ्र ही वहाँसे प्रस्थान किया ॥ २० ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डेऽष्टमः सर्गः ॥ ८ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें आठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ८ ॥

नवमः सीताका श्रीरामसे निरपराध अहिंसा - धर्मका पालन

सुतीक्ष्णेनाभ्यनुज्ञातं प्रस्थितं रघुनन्दनम् ।

हृद्यया स्निग्धया वाचा भर्तारमिदमब्रवीत् ॥ १ ॥

सुतीक्ष्णकी आज्ञा लेकर वनकी ओर प्रस्थित हुए अपने स्वामी रघुकुलनन्दन श्रीरामसे सीताने स्नेहभरी मनोहर वाणीमें इस प्रकार कहा- ॥ १ ॥

अधर्मं तु सुसूक्ष्मेण विधिना प्राप्यते महान् ।

निवृत्तेन च शक्योऽयं व्यसनात् कामजादिह ॥ २ ॥

' आर्यपुत्र! यद्यपि आप महान् पुरुष हैं तथापि अत्यन्त सूक्ष्म विधिसे विचार करनेपर आप अधर्मको प्राप्त हो रहे हैं । जब कामजनित व्यसनसे आप सर्वथा निवृत्त हैं, तब यहाँ इस अधर्मसे भी बच सकते हैं ॥ २ ॥

त्रीण्येव व्यसनान्यत्र कामजानि भवन्त्युत ।

मिथ्यावाक्यं तु परमं तस्माद् गुरुतरावुभौ ॥ ३ ॥

परदाराभिगमनं विना वैरं च रौद्रता ।

मिथ्यावाक्यं न ते भूतं न भविष्यति राघव ॥ ४ ॥

' इस जगत्में कामसे उत्पन्न होनेवाले तीन ही व्यसन होते हैं । मिथ्याभाषण बहुत बड़ा व्यसन है, किंतु उससे भी भारी दो व्यसन और हैं- परस्त्रीगमन और बिना वैरके ही दूसरोंके प्रति क्रूरतापूर्ण बर्ताव । रघुनन्दन! इनमेंसे मिथ्याभाषणरूप व्यसन तो न आपमें कभी हुआ है और न आगे होगा ही ॥ ३-४ ॥

कुतोऽभिलषणं स्त्रीणां परेषां धर्मनाशनम् ।

तव नास्ति मनुष्येन्द्र न चाभूत् ते कदाचन ॥ ५ ॥

मनस्यपि तथा राम न चैतद् विद्यते क्वचित् ।

स्वदारनिरतश्चैव नित्यमेव नृपात्मज ॥ ६ ॥

धर्मिष्ठः सत्यसंधश्च पितुर्निर्देशकारकः ।

त्वयि धर्मश्च सत्यं च त्वयि सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥७ ॥

सर्गः प्राणियोंको न मारने और करनेके लिये अनुरोध ' परस्त्रीविषयक अभिलाषा तो आपको हो ही कैसे सकती है? नरेन्द्र! धर्मका नाश करनेवाली यह कुत्सित इच्छा न आपके मनमें कभी हुई थी, न है और न भविष्यमें कभी होनेकी सम्भावना ही है । राजकुमार श्रीराम! यह दोष तो आपके मनमें भी कभी उदित नहीं हुआ है । ( फिर वाणी और क्रियामें कैसे आ सकता है? ) आप सदा ही अपनी धर्मपत्नीमें अनुरक्त रहनेवाले, धर्मनिष्ठ, सत्यप्रतिज्ञ तथा पिताकी आज्ञाका पालन करनेवाले हैं । आपमें धर्म और सत्य दोनोंकी स्थिति है । आपमें ही सब कुछ प्रतिष्ठित है ॥ ५–७ ॥

तच्च सर्वं महाबाहो शक्यं वोढुं जितेन्द्रियैः ।

तव वश्येन्द्रियत्वं च जानामि शुभदर्शन ॥ ८ ॥

' महाबाहो! जो लोग जितेन्द्रिय हैं, वे सदा सत्य और धर्मको पूर्णरूपसे धारण कर सकते हैं । शुभदर्शी महापुरुष! आपकी जितेन्द्रियताको मैं अच्छी तरह जानती हूँ ( इसीलिये मुझे विश्वास है कि आपमें पूर्वोक्त दोनों दोष कदापि नहीं रह सकते ) ॥ ८ ॥

तृतीयं यदिदं रौद्रं परप्राणाभिहिंसनम् ।

निर्वैरं क्रियते मोहात् तच्च ते समुपस्थितम् ॥ ९ ॥

' परंतु दूसरोंके प्राणोंकी हिंसारूप जो यह तीसरा भयंकर दोष है, उसे लोग मोहवश बिना वैर-विरोधके भी किया करते हैं । वही दोष आपके सामने भी उपस्थित है ॥ ९ ॥

प्रतिज्ञातस्त्वया वीर दण्डकारण्यवासिनाम् ।

ऋषीणां रक्षणार्थाय वधः संयति रक्षसाम् ॥ १० ॥

‘ वीर! आपने दण्डकारण्यनिवासी ऋषियोंकी रक्षाके लिये युद्धमें राक्षसोंका वध करनेकी प्रतिज्ञा की है ॥

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अरण्यकाण्डे

एतन्निमित्तं च वनं दण्डका इति विश्रुतम् ।

प्रस्थितस्त्वं सह भ्रात्रा धृतबाणशरासनः ॥ ११ ॥

' इसीके लिये आप भाईके साथ धनुष - बाण लेकर दण्डकारण्यके नामसे विख्यात वनकी ओर प्रस्थित हुए हैं ॥ ११ ॥

ततस्त्वां प्रस्थितं दृष्ट्वा मम चिन्ताकुलं मनः ।

त्वद्वृत्तं चिन्तयन्त्या वै भवेन्निःश्रेयसं हितम् ॥ १२ ॥

' अतः आपको इस घोर कर्मके लिये प्रस्थित हुआ देख मेरा चित्त चिन्तासे व्याकुल हो उठा है । आपके प्रतिज्ञा - पालनरूप व्रतका विचार करके मैं सदा यही सोचती रहती हूँ कि कैसे आपका कल्याण हो? ॥ १२ ॥

नहि मे रोचते वीर गमनं दण्डकान् प्रति ।

कारणं तत्र वक्ष्यामि वदन्त्याः श्रूयतां मम ॥ १३ ॥

' वीर! मुझे इस समय आपका दण्डकारण्यमें जाना अच्छा नहीं लगता है । इसका क्या कारण है- यह बता रही हूँ; आप मेरे मुँहसे सुनिये ॥ १३ ॥

त्वं हि बाणधनुष्पाणिभ्रात्रा सह वनं गतः ।

दृष्ट्वा वनचरान् सर्वान् कच्चित् कुर्याः शरव्ययम् ॥ १४ ॥

4 ' आप हाथमें धनुष - बाण लेकर अपने भाईके साथ वनमें आये हैं । सम्भव है, समस्त वनचारी राक्षसोंको देखकर कदाचित् आप उनके प्रति अपने बाणोंका प्रयोग कर बैठें ॥ १४ ॥

क्षत्रियाणामिह धनुर्हुताशस्येन्धनानि च ।

समीपतः स्थितं तेजोबलमुच्छ्रयते भृशम् ॥ १५ ॥

' जैसे आगके समीप रखे हुए ईंधन उसके तेजरूप बलको अत्यन्त उद्दीत कर देते हैं, उसी प्रकार जहाँ क्षत्रियोंके पास धनुष हो तो वह उनके बल और प्रतापको उद्बोधित कर देता है ॥ १५ ॥

पुरा किल महाबाहो तपस्वी सत्यवान् शुचिः ।

कस्मिंश्चिदभवत् पुण्ये वने रतमृगद्विजे ॥ १६ ॥

' महाबाहो! पूर्वकालकी बात है, किसी पवित्र वनमें, जहाँ मृग और पक्षी बड़े आनन्दसे रहते थे, एक सत्यवादी एवं पवित्र तपस्वी निवास करते थे ॥ १६ ॥

तस्यैव तपसो विघ्नं कर्तुमिन्द्रः शचीपतिः ।

खड्गपाणिरथागच्छदाश्रमं भटरूपधृक् ॥ १७ ॥

' उन्हींकी तपस्यामें विघ्न डालनेके लिये शचीपति इन्द्र किसी योद्धाका रूप धारण करके हाथमें तलवार लिये एक दिन उनके आश्रमपर आये ॥ १७ ॥

तस्मिंस्तदाश्रमपदे निहितः खड्ग उत्तमः ।

स न्यासविधिना दत्तः पुण्ये तपसि तिष्ठतः ॥ १८ ॥

नवमः सर्गः ५७१ ' उन्होंने मुनिके आश्रममें अपना उत्तम खड्ग रख दिया । पवित्र तपस्यामें लगे हुए मुनिको धरोहरके रूपमें वह खड्ग दे दिया ॥ १८ ॥

स तच्छस्त्रमनुप्राप्य न्यासरक्षणतत्परः ।

वने तु विचरत्येव रक्षन् प्रत्ययमात्मनः ॥ १ ९ ॥

' उस शस्त्रको पाकर मुनि उस धरोहरकी रक्षामें लग गये । वे अपने विश्वासकी रक्षाके लिये वनमें विचरते समय भी उसे साथ रखते थे ॥१ ९ ॥

यत्र गच्छत्युपादातुं मूलानि च फलानि च ।

न विना याति तं खड्गं न्यासरक्षणतत्परः ॥ २० ॥

' धरोहरकी रक्षामें तत्पर रहनेवाले वे मुनि फल-मूल लानेके लिये जहाँ - कहीं भी जाते, उस खड्गको साथ लिये बिना नहीं जाते थे ॥२० ॥

नित्यं शस्त्रं परिवहन् क्रमेण स तपोधनः ।

चकार रौद्रीं स्वां बुद्धिं त्यक्त्वा तपसि निश्चयम् ॥ २१ ॥

' तप ही जिनका धन था, उन मुनिने प्रतिदिन शस्त्र ढोते रहनेके कारण क्रमशः तपस्याका निश्चय छोड़कर अपनी बुद्धिको क्रूरतापूर्ण बना लिया ॥ २१ ॥

ततः स रौद्राभिरतः प्रमत्तोऽधर्मकर्षितः ।

तस्य शस्त्रस्य संवासाज्जगाम नरकं मुनिः ॥ २२ ॥

' फिर तो अधर्मने उन्हें आकृष्ट कर लिया । वे मुनि प्रमादवश रौद्र - कर्ममें तत्पर हो गये और उस शस्त्रके सहवाससे उन्हें नरकमें जाना पड़ा ॥ २२ ॥

एवमेतत् पुरावृत्तं शस्त्रसंयोगकारणम् ।

अग्निसंयोगवद्धेतुः शस्त्रसंयोग उच्यते ॥ २३ ॥

‘ इस प्रकार शस्त्रका संयोग होनेके कारण पूर्वकालमें उन तपस्वी मुनिको ऐसी दुर्दशा भोगनी पड़ी । जैसे आगका संयोग ईंधनोंको जलानेका कारण होता है, उसी प्रकार शस्त्रोंका संयोग शस्त्रधारीके हृदयमें विकारका उत्पादक कहा गया है ॥२३ ॥

स्नेहाच्च बहुमानाच्च स्मारये त्वां तु शिक्षये ।

न कथंचन सा कार्या गृहीतधनुषा त्वया ॥ २४ ॥

बुद्धिर्वैरं विना हन्तुं राक्षसान् दण्डकाश्रितान् ।

अपराधं विना हन्तुं लोको वीर न मंस्यते ॥ २५ ॥

' मेरे मनमें आपके प्रति जो स्नेह और विशेष आदर है, उसके कारण मैं आपको उस प्राचीन घटनाकी याद दिलाती हूँ तथा यह शिक्षा भी देती हूँ कि आपको धनुष लेकर किसी तरह बिना वैरके ही दण्डकारण्यवासी राक्षसों के वधका विचार नहीं करना चाहिये । वीरवर! बिना अपराधके । ही किसीको मारना संसारके लोग अच्छा नहीं समझेंगे ॥

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५७२ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे

क्षत्रियाणां तु वीराणां वनेषु नियतात्मनाम् ।

धनुषा कार्यमेतावदार्तानामभिरक्षणम् ॥ २६ ॥

' अपने मन और इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले क्षत्रिय वीरोंके लिये वनमें धनुष धारण करनेका इतना ही प्रयोजन है कि वे संकटमें पड़े हुए प्राणियोंकी रक्षा करें ॥ २६ ॥

क्व च शस्त्रं क्व च वनं क्व च क्षात्रं तपः क्व च ।

व्याविद्धमिदमस्माभिर्देशधर्मस्तु पूज्यताम् ॥ २७ ॥

“ कहाँ शस्त्र धारण और कहाँ वनवास! कहाँ क्षत्रियका हिंसामय कठोर कर्म और कहाँ सब प्राणियोंपर दया करनारूप तप — ये परस्पर विरुद्ध जान पड़ते हैं । अतः हमलोगोंको देशधर्मका ही आदर करना चाहिये ( इस समय हम तपोवनरूप देशमें निवास करते हैं, अतः यहाँके अहिंसामय धर्मका पालन करना ही हमारा कर्तव्य है ) ॥ २७ ॥

कदर्यकलुषा बुद्धिर्जायते शस्त्रसेवनात् ।

पुनर्गत्वा त्वयोध्यायां क्षत्रधर्मं चरिष्यसि ॥ २८ ॥

' केवल शस्त्रका सेवन करनेसे मनुष्यकी बुद्धि कृपण पुरुषोंके समान कलुषित हो जाती है; अतः आप अयोध्यामें चलनेपर ही पुनः क्षात्रधर्मका अनुष्ठान कीजियेगा ॥ २८ ॥

अक्षया तु भवेत् प्रीतिः श्वश्रूश्वशुरयोर्मम ।

यदि राज्यं हि संन्यस्य भवेस्त्वं निरतो मुनिः ॥ २ ९ ॥ ।

' राज्य त्यागकर वनमें आ जानेपर यदि आप मुनिवृत्तिसे ही रहें तो इससे मेरी सास और श्वशुरको अक्षय प्रसन्नता होगी ॥ २ ९ ॥

धर्मादर्थः प्रभवति धर्मात् प्रभवते सुखम् ।

धर्मेण लभते सर्वं धर्मसारमिदं जगत् ॥ ३० ॥

' धर्मसे अर्थ प्राप्त होता है, धर्मसे सुखका उदय

होता है और धर्मसे ही मनुष्य सब कुछ पा लेता है ।

इस संसारमें धर्म ही सार है ॥ ३० ॥

आत्मानं नियमैस्तैस्तैः कर्षयित्वा प्रयत्नतः ।

प्राप्तये निपुणैर्धर्मो न सुखाल्लभते सुखम् ॥३१ ॥

' चतुर मनुष्य भिन्न - भिन्न वानप्रस्थोचित नियमोंके द्वारा अपने शरीरको क्षीण करके यत्नपूर्वक धर्मका सम्पादन करते हैं; क्योंकि सुखदायक साधनसे सुखके हेतुभूत धर्मकी प्राप्ति नहीं होती है ॥ ३१ ॥

नित्यं शुचिमतिः सौम्य चर धर्मं तपोवने ।

सर्वं तु विदितं तुभ्यं त्रैलोक्यामपि तत्त्वतः ॥ ३२ ॥

' सौम्य! प्रतिदिन शुद्धचित्त होकर तपोवनमें धर्मका अनुष्ठान कीजिये । त्रिलोकीमें जो कुछ भी है, आपको तो वह सब कुछ यथार्थरूपसे विदित ही है ॥ ३२ ॥

स्त्रीचापलादेतदुपाहृतं मे धर्मं च वक्तुं तव कः समर्थः । विचार्य बुद्धया तु सहानुजेन यद् रोचते तत् कुरु माचिरेण ॥ ३३ ॥

' मैंने नारीजातिकी स्वाभाविक चपलताके कारण ही आपकी सेवामें ये बातें निवेदन कर दी हैं । वास्तवमें आपको धर्मका उपदेश करनेमें कौन समर्थ है? आप इस विषयमें अपने छोटे भाईके साथ बुद्धिपूर्वक विचार कर लें । फिर आपको जो ठीक जँचे, उसे ही शीघ्रतापूर्वक करें ' ॥ ३३ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे नवमः सर्गः ॥ ९ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें नवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ९ ॥

दशमः सर्गः श्रीरामका ऋषियोंकी रक्षाके लिये राक्षसोंके वधके निमित्त की हुई प्रतिज्ञाके पालनपर दृढ़ रहनेका

वाक्यमेतत् तु वैदेह्या व्याहृतं भर्तृभक्तया ।

श्रुत्वा धर्मे स्थितो रामः प्रत्युवाचाथ जानकीम् ॥ १ ॥

अपने स्वामीके प्रति भक्ति रखनेवाली विदेहकुमारी ' सीताकी कही हुई यह बात सुनकर सदा धर्ममें स्थित रहनेवाले श्रीरामचन्द्रजीने जानकीको इस प्रकार उत्तर दिया-हितमुक्तं त्वया देवि स्निग्धया सदृशं वचः । कुलं व्यपदिशन्त्या च धर्मज्ञे जनकात्मजे ॥ २ ॥

विचार प्रकट करना ' देवि! धर्मको जाननेवाली जनककिशोरी! तुम्हारा मेरे ऊपर स्नेह है, इसलिये तुमने मेरे हितकी बात कही है । क्षत्रियोंके कुलधर्मका उपदेश करती हुई तुमने जो कुछ कहा है, वह तुम्हारे ही योग्य है ॥ २ ॥

किं नु वक्ष्याम्यहं देवि त्वयैवोक्तमिदं वचः ।

क्षत्रियैर्धार्यते चापो नार्तशब्दो भवेदिति ॥ ३ ॥

' देवि! मैं तुम्हें क्या उत्तर दूँ, तुमने ही पहले यह

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अरण्यकाण्डे बात कही है कि क्षत्रियलोग इसलिये धनुष धारण करते । हैं कि किसीको दुःखी होकर हाहाकार न करना पड़े ( यदि कोई दुःख या संकटमें पड़ा हो तो उसकी रक्षा की जाय ) ॥ ३ ॥

ते चार्ता दण्डकारण्ये मुनयः संशितव्रताः ।

मां सीते स्वयमागम्य शरण्यं शरणं गताः ॥ ४ ॥

' सीते! दण्डकारण्यमें रहकर कठोर व्रतका पालन करनेवाले वे मुनि बहुत दुःखी हैं, इसीलिये मुझे शरणागतवत्सल जानकर वे स्वयं मेरे पास आये और शरणागत हुए ॥ ४ ॥

वसन्तः कालकालेषु वने मूलफलाशनाः ।

न लभन्ते सुखं भीरु राक्षसैः क्रूरकर्मभिः ॥ ५ ॥

भक्ष्यन्ते राक्षसैर्भीमैर्नरमांसोपजीविभिः । ' भीरु! सदा ही वनमें रहकर फल- मूलका आहार करनेवाले वे मुनि इन क्रूरकर्मा राक्षसोंके कारण कभी सुख नहीं पाते हैं । मनुष्योंके मांससे जीवननिर्वाह करनेवाले ये भयानक राक्षस उन्हें मारकर खा जाते हैं ।॥ ते भक्ष्यमाणा मुनयो दण्डकारण्यवासिनः ॥ ६ ॥

अस्मानभ्यवपद्येति मामूचुर्द्विजसत्तमाः । ' उन राक्षसोंके ग्रास बने हुए वे दण्डकारण्यवासी द्विजश्रेष्ठ मुनि हमलोगोंके पास आकर मुझसे बोले-' प्रभो! हमपर अनुग्रह कीजिये ' ॥ ६३ ॥

मया तु वचनं श्रुत्वा तेषामेवं मुखाच्च्युतम् ॥ ७ ॥

वचनशुश्रूषां वाक्यमेतदुदाहृतम् । ' उनके मुखसे निकली हुई इस प्रकार रक्षाकी पुकार सुनकर और उनकी आज्ञा - पालनरूपी सेवाका विचार मनमें लेकर मैंने उनसे यह बात कही ॥ ७३ ॥

प्रसीदन्तु भवन्तो मे ह्रीरेषा तु ममातुला ॥ ८ ॥

यदीदृशैरहं विप्रैरुपस्थेयैरुपस्थितः ।

किं करोमीति च मया व्याहृतं द्विजसंनिधौ ॥ ९ ॥

' महर्षियो! आप - जैसे ब्राह्मणोंकी सेवामें मुझे स्वयं ही उपस्थित होना चाहिये था, परंतु आप स्वयं ही अपनी रक्षाके लिये मेरे पास आये, यह मेरे लिये अनुपम लज्जाकी बात है; अतः आप प्रसन्न हों । बताइये, मैं आपलोगोंकी क्या सेवा करूँ? ' यह बात मैंने उन ब्राह्मणोंके सामने कही ॥ ८ - ९ ॥

सर्वैरेव समागम्य वागियं समुदाहृता ।

राक्षसैर्दण्डकारण्ये बहुभिः कामरूपिभिः ॥१० ॥

अर्दिताः स्म भृशं राम भवान् नस्तत्र रक्षतु । ‘ तब उन सभीने मिलकर अपना मनोभाव इन दशमः सर्गः ५७३ वचनोंमें प्रकट किया— ' श्रीराम! दण्डकारण्यमें इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले बहुत - से राक्षस रहते हैं । उनसे हमें बड़ा कष्ट पहुँच रहा है, अतः वहाँ उनके भयसे आप हमारी रक्षा करें ॥ १०३ ॥

होमकाले तु सम्प्राप्ते पर्वकालेषु चानघ ॥ ११ ॥

धर्षयन्ति सुदुर्धर्षा राक्षसाः पिशिताशनाः । ' निष्पाप रघुनन्दन! अग्निहोत्रका समय आनेपर तथा पर्वके अवसरोंपर ये अत्यन्त दुर्धर्ष मांसभोजी राक्षस हमें धर दबाते हैं ॥ ११३ ॥

राक्षसैर्धर्षितानां च तापसानां तपस्विनाम् ॥ १२ ॥

गतिं मृगयमाणानां भवान् नः परमा गतिः । ' राक्षसोंद्वारा आक्रान्त होनेवाले हम तपस्वी तापस सदा अपने लिये कोई आश्रय ढूँढ़ते रहते हैं, अतः आप ही हमारे परम आश्रय हों ॥ १२३ ॥

कामं तपः प्रभावेण शक्ता हन्तुं निशाचरान् ॥ १३ ॥

चिरार्जितं न चेच्छामस्तपः खण्डयितुं वयम् ।

बहुविघ्नं तपो नित्यं दुश्चरं चैव राघव ॥ १४ ॥

' रघुनन्दन! यद्यपि हम तपस्याके प्रभावसे इच्छानुसार इन राक्षसोंका वध करनेमें समर्थ हैं तथापि चिरकालसे उपार्जित किये हुए तपको खण्डित करना नहीं चाहते हैं; क्योंकि तपमें सदा ही बहुत - से विघ्न आते रहते हैं तथा इसका सम्पादन बहुत ही कठिन होता है ॥ १३-१४ ॥

तेन शापं न मुञ्चामो भक्ष्यमाणाश्च राक्षसैः ।

तदर्द्यमानान् रक्षोभिर्दण्डकारण्यवासिभिः ॥ १५ ॥

रक्ष नस्त्वं सह भ्रात्रा त्वन्नाथा हि वयं वने । ' यही कारण है कि राक्षसोंके ग्रास बन जानेपर भी हम उन्हें शाप नहीं देते हैं, इसलिये दण्डकारण्यवासी निशाचरोंसे पीड़ित हुए हम तापसोंकी भाईसहित आप रक्षा करें; क्योंकि इस वनमें अब आप ही हमारे रक्षक | हैं ' ॥ १५३ ॥

मया चैतद्वचः श्रुत्वा कात्र्त्स्न्येन परिपालनम् ॥ १६ ॥

ऋषीणां दण्डकारण्ये संश्रुतं जनकात्मजे । ' जनकनन्दिनि! दण्डकारण्यमें ऋषियोंकी यह बात सुनकर मैंने पूर्णरूपसे उनकी रक्षा करनेकी प्रतिज्ञा की है ॥ १६३ ॥

संश्रुत्य च न शक्ष्यामि जीवमानः प्रतिश्रवम् ॥ १७ ॥

मुनीनामन्यथा कर्तुं सत्यमिष्टं हि मे सदा । ' मुनियोंके सामने यह प्रतिज्ञा करके अब मैं जीते-जी इस प्रतिज्ञाको मिथ्या नहीं कर सकूँगा; क्योंकि । सत्यका पालन मुझे सदा ही प्रिय है ॥ १७३ ॥

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५७४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे अप्यहं जीवितं जह्यां त्वां वा सीते सलक्ष्मणाम् ॥ १८ ॥

न तु प्रतिज्ञा संश्रुत्य ब्राह्मणेभ्यो विशेषतः । ‘ सीते! मैं अपने प्राण छोड़ सकता हूँ, तुम्हारा और लक्ष्मणका भी परित्याग कर सकता हूँ, किंतु अपनी प्रतिज्ञाको, विशेषतः ब्राह्मणोंके लिये की गयी प्रतिज्ञाको मैं कदापि नहीं तोड़ सकता ॥१८३ ॥

तदवश्यं मया कार्यमृषीणां परिपालनम् ॥ १ ९ ॥ अनुक्तेनापि वैदेहि प्रतिज्ञाय कथं पुनः । ‘ इसलिये ऋषियोंकी रक्षा करना मेरे लिये आवश्यक कर्तव्य है । विदेहनन्दिनि! ऋषियोंके बिना कहे ही उनकी मुझे रक्षा करनी चाहिये थी; फिर जब उन्होंने स्वयं कहा और मैंने प्रतिज्ञा भी कर ली, तब अब उनकी रक्षासे कैसे मुँह मोड़ सकता हूँ ॥ १ ९ ३ ॥ मम स्नेहाच्च सौहार्दादिदमुक्तं त्वया वचः ॥ २० ॥

परितुष्टोऽस्म्यहं सीते न ह्यनिष्टोऽनुशास्यते । ' सीते! तुमने स्नेह और सौहार्दवश जो मुझसे ये बातें कही हैं, इससे मैं बहुत संतुष्ट हूँ; क्योंकि जो अपना प्रिय न हो, उसे कोई हितकर उपदेश नहीं देता ॥ २०३ ॥

सदृशं चानुरूपं च कुलस्य तव शोभने ।

सधर्मचारिणी मे त्वं प्राणेभ्योऽपि गरीयसी ॥ २१ ॥

' शोभने! तुम्हारा यह कथन तुम्हारे योग्य तो है ही, तुम्हारे कुलके भी सर्वथा अनुरूप है । तुम मेरी सहधर्मिणी हो और मुझे प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय हो ' ॥ इत्येवमुक्त्वा वचनं महात्मा सीतां प्रियां मैथिलराजपुत्रीम् । रामो धनुष्मान् सह लक्ष्मणेन जगाम रम्याणि तपोवनानि ॥ २२ ॥

महात्मा श्रीरामचन्द्रजी अपनी प्रिया मिथिलेशकुमारी सीतासे ऐसा वचन कहकर हाथमें धनुष ले लक्ष्मणके साथ रमणीय तपोवनोंमें विचरण करने लगे ॥ २२ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे दशमः सर्गः ॥ १० ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें दसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १० ॥

एकादशः सर्गः पञ्चाप्सर तीर्थ एवं माण्डकर्णि मुनिकी कथा, विभिन्न आश्रमोंमें घूमकर श्रीराम आदिका सुतीक्ष्णके आश्रममें आना, वहाँ कुछ कालतक रहकर उनकी आज्ञासे अगस्त्यके भाई तथा अगस्त्यके आश्रमपर जाना तथा अगस्त्यके

अग्रतः प्रययौ रामः सीता मध्ये सुशोभना ।

पृष्ठतस्तु धनुष्पाणिर्लक्ष्मणोऽनुजगाम ह ॥ १ ॥

तदनन्तर आगे - आगे श्रीराम चले बीचमें परम सुन्दरी सीता चल रही थीं और उनके पीछे हाथमें धनुष लिये लक्ष्मण चलने लगे ॥ १ ॥

तौ पश्यमानौ विविधान् शैलप्रस्थान् वनानि च ।

नदीश्च विविधा रम्या जग्मतुः सह सीतया ॥ २ ॥

सीताके साथ वे दोनों भाई भाँति - भाँतिके पर्वतीय शिखरों, वनों तथा नाना प्रकारकी रमणीय नदियोंको देखते हुए अग्रसर होने लगे ॥२ ॥

सारसांश्चक्रवाकांश्च नदीपुलिनचारिणः ।

सरांसि च सपद्मानि युतानि जलजैः खगैः ॥ ३ ॥

उन्होंने देखा, कहीं नदियोंके तटोंपर सारस और चक्रवाक विचर रहे हैं और कहीं खिले हुए कमलों और जलचर पक्षियोंसे युक्त सरोवर शोभा पाते हैं ॥ ३ ॥

प्रभावका वर्णन

यूथबद्धांश्च पृषतान् मदोन्मत्तान् विषाणिनः ।

महिषांश्च वराहांश्च गजांश्च द्रुमवैरिणः ॥४ ॥

कहीं चितकबरे मृग यूथ बाँधे चले जा रहे थे, कहीं बड़े - बड़े सींगवाले मदमत्त भैंसे तथा बढ़े हुए दाँतवाले जंगली सूअर और वृक्षोंके वैरी दन्तार हाथी दिखायी देते थे ॥ ४ ॥

ते गत्वा दूरमध्वानं लम्बमाने दिवाकरे ।

ददृशुः सहिता रम्यं तटाकं योजनायुतम् ॥ ५ ॥

। दूरतक यात्रा तै करनेके बाद जब सूर्य अस्ताचलको जाने लगे, तब उन तीनोंने एक साथ देखा - सामने एक बड़ा ही सुन्दर तालाब है, जिसकी लम्बाई - चौड़ाई एक-एक योजनकी जान पड़ती है ॥५ ॥

पद्मपुष्करसम्बाधं गजयूथैरलंकृतम् ।

सारसैर्हसकादम्बैः संकुलं जलजातिभिः ॥ ६ ॥

वह सरोवर लाल और श्वेत कमलोंसे भरा हुआ

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अरण्यकाण्डे एकादशः सर्गः ५७५ था । उसमें क्रीड़ा करते हुए झुंड - के - झुंड हाथी उसकी । शोभा बढ़ाते थे । तथा सारस, राजहंस और कलहंस आदि पक्षियों एवं जलमें उत्पन्न होनेवाले मत्स्य आदि जन्तुओंसे वह व्याप्त दिखायी देता था ॥ ६ ॥

प्रसन्नसलिले रम्ये तस्मिन् सरसि शुश्रुवे ।

गीतवादित्रनिर्घोषो न तु कश्चन दृश्यते ॥ ७ ॥

स्वच्छ जलसे भरे हुए उस रमणीय सरोवरमें गाने - बजानेका शब्द सुनायी देता था, किंतु कोई दिखायी नहीं दे रहा था ॥ ७ ॥

ततः कौतूहलाद् रामो लक्ष्मणश्च महारथः ।

मुनिं धर्मभृतं नाम प्रष्टुं समुपचक्रमे ॥ ८ ॥

तब श्रीराम और महारथी लक्ष्मणने कौतूहलवश अपने साथ आये हुए धर्मभृत् नामक मुनिसे पूछना आरम्भ किया- ॥ ८ ॥

इदमत्यद्भुतं श्रुत्वा सर्वेषां नो महामुने ।

कौतूहलं महज्जातं किमिदं साधु कथ्यताम् ॥ ९ ॥

' महामुने! यह अत्यन्त अद्भुत संगीतकी ध्वनि सुनकर हम सब लोगोंको बड़ा कौतूहल हो रहा है । यह क्या है, इसे अच्छी तरह बताइये'॥९ ॥

तेनैवमुक्तो धर्मात्मा राघवेण मुनिस्तदा ।

प्रभावं सरसः क्षिप्रमाख्यातुमुपचक्रमे ॥ १० ॥

श्रीरामचन्द्रजीके इस प्रकार पूछनेपर धर्मात्मा धर्मभृत् नामक मुनिने तुरंत ही उस सरोवरके प्रभावका वर्णन आरम्भ किया- ॥ १० ॥

इदं पञ्चाप्सरो नाम तटाकं सार्वकालिकम् ।

निर्मितं तपसा राम मुनिना माण्डकर्णिना ॥ ११ ॥

' श्रीराम! यह पञ्चाप्सर नामक सरोवर है, जो सर्वदा अगाध जलसे भरा रहता है । माण्डकर्णि नामक मुनिने अपने तपके द्वारा इसका निर्माण किया था ॥ ११ ॥

स हि तेपे तपस्तीव्रं माण्डकर्णिर्महामुनिः ।

दशवर्षसहस्राणि वायुभक्षो जलाशये ॥ १२ ॥

' महामुनि माण्डकर्णिने एक जलाशयमें रहकर केवल वायुका आहार करते हुए दस सहस्र वर्षोंतक तीव्र तपस्या की थी ॥ १२ ॥

ततः प्रव्यथिताः सर्वे देवाः साग्निपुरोगमाः ।

अब्रुवन् वचनं सर्वे परस्परसमागताः ॥ १३ ॥

' उस समय अग्नि आदि सब देवता उनके तपसे अत्यन्त व्यथित हो उठे और आपसमें मिलकर वे सब -के - सब इस प्रकार कहने लगे ॥१३ ॥

अस्माकं कस्यचित् स्थानमेष प्रार्थयते मुनिः ।

इति संविग्नमनसः सर्वे तत्र दिवौकसः ॥ १४ ॥

' जान पड़ता है, ये मुनि हमलोगोंमेंसे किसीके स्थानको लेना चाहते हैं, ऐसा सोचकर वे सब देवता वहाँ मन - ही - मन उद्विग्न हो उठे ॥ १४ ॥

ततः कर्तुं तपोविघ्नं सर्वदेवैर्नियोजिताः ।

प्रधानाप्सरसः पञ्च विद्युच्चलितवर्चसः ॥ १५ ॥

' तब उनकी तपस्यामें विघ्न डालनेके लिये सम्पूर्ण देवताओंने पाँच प्रधान अप्सराओंको नियुक्त किया, जिनकी अङ्गकान्ति विद्युत् के समान चञ्चल थी ॥ १५ ॥

अप्सरोभिस्ततस्ताभिर्मुनिर्दृष्टपरावरः नीतो मदनवश्यत्वं देवानां कार्यसिद्धये ॥१६ ॥

' तदनन्तर जिन्होंने लौकिक एवं पारलौकिक धर्माधर्मका ज्ञान प्राप्त कर लिया था, उन मुनिको उन पाँच अप्सराओंने देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये कामके अधीन कर दिया ॥ १६ ॥

ताश्चैवाप्सरसः पञ्च मुनेः पत्नीत्वमागताः ।

तटाके निर्मितं तासां तस्मिन्नन्तर्हितं गृहम् ॥ १७ ॥

' मुनिकी पत्नी बनी हुई वे ही पाँच अप्सराएँ यहाँ रहती हैं । उनके रहनेके लिये इस तालाबके भीतर घर बना हुआ है, जो जलके अंदर छिपा हुआ है ॥ १७ ॥

तत्रैवाप्सरसः पञ्च निवसन्त्यो यथासुखम् ।

रमयन्ति तपोयोगान्मुनिं यौवनमास्थितम् ॥ १८ ॥

' उसी घरमें सुखपूर्वक रहती हुई पाँचों अप्सराएँ तपस्याके प्रभावसे युवावस्थाको प्राप्त हुए मुनिको अपनी सेवाओंसे संतुष्ट करती हैं ॥ १८ ॥

तासां संक्रीडमानानामेष वादित्रनिःस्वनः ।

श्रूयते भूषणोन्मिश्रो गीतशब्दो मनोहरः ॥ १ ९ ॥

' क्रीड़ा - विहारमें लगी हुई उन अप्सराओंके ही वाद्योंकी यह ध्वनि सुनायी देती है, जो भूषणोंकी झनकारके साथ मिली हुई है । साथ ही उनके गीतका भी मनोहर शब्द सुन पड़ता है'॥१९ ॥

आश्चर्यमिति तस्यैतद् वचनं भावितात्मनः ।

राघवः प्रतिजग्राह सह भ्रात्रा महायशाः ॥ २० ॥

अपने भाईके साथ महायशस्वी श्रीरघुनाथजीने उन भावितात्मा महर्षिके इस कथनको ' यह तो बड़े आश्चर्यकी बात है ' यों कहकर स्वीकार किया ॥ २० ॥

एवं कथयमानः स ददर्शाश्रममण्डलम् ।

कुशचीरपरिक्षिप्तं ब्राह्मया लक्ष्म्या समावृतम् ॥ २१ ॥

पृष्ठ 588

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५७६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे इस प्रकार कहते हुए श्रीरामचन्द्रजीको एक आश्रममण्डल दिखायी दिया, जहाँ सब ओर कुश और वल्कल वस्त्र फैले हुए थे । वह आश्रम ब्राह्मी लक्ष्मी ( ब्रह्मतेज ) से प्रकाशित होता था ॥ २१ ॥

प्रविश्य सह वैदेह्या लक्ष्मणेन च राघवः ।

तदा तस्मिन् स काकुत्स्थः श्रीमत्याश्रममण्डले ॥ २२ ॥

उषित्वा स सुखं तत्र पूज्यमानो महर्षिभिः । विदेहनन्दिनी सीता तथा लक्ष्मणके साथ उस तेजस्वी आश्रममण्डलमें प्रवेश करके ककुत्स्थकुलभूषण श्रीरामने उस समय सुखपूर्वक निवास किया । वहाँके महर्षियोंने उनका बड़ा आदर - सत्कार किया ॥ २२३ ॥

जगाम चाश्रमांस्तेषां पर्यायेण तपस्विनाम् ॥ २३ ॥

येषामुषितवान् पूर्वं सकाशे स महास्त्रवित् । तदनन्तर महान् अस्त्रोंके ज्ञाता श्रीरामचन्द्रजी बारी-बारीसे उन सभी तपस्वी मुनियोंके आश्रमोंपर गये, जिनके यहाँ वे पहले रह चुके थे । उनके पास भी ( उनकी भक्ति देख ) दुबारा जाकर रहे ॥ २३३ ॥

क्वचित् परिदशान् मासानेकसंवत्सरं क्वचित् ॥ २४ ॥

क्वचिच्च चतुरो मासान् पञ्च षट् च परान् क्वचित् ।

अपरत्राधिकान् मासानध्यर्धमधिकं क्वचित् ॥ २५ ॥

त्रीन् मासानष्टमासांश्च राघवो न्यवसत् सुखम् । कहीं दस महीने, कहीं साल भर कहीं चार महीने, कहीं पाँच या छः महीने, कहीं इससे भी अधिक समय ( अर्थात् सात महीने ), कहीं उससे भी अधिक ( आठ महीने ), कहीं आधे मास अधिक अर्थात् साढ़े आठ महीने, कहीं तीन महीने और कहीं आठ और तीन अर्थात् ग्यारह महीनेतक श्रीरामचन्द्रजीने सुखपूर्वक निवास किया॥२४-२५३ ॥ तत्र संवसतस्तस्य मुनीनामाश्रमेषु वै ॥२६ ॥

रमतश्चानुकूल्येन ययुः संवत्सरा दश । इस प्रकार मुनियोंके आश्रमोंपर रहते और अनुकूलता पाकर आनन्दका अनुभव करते हुए उनके दस वर्ष बीत गये ॥ २६३ ॥

परिसृत्य च धर्मज्ञो सुतीक्ष्णस्याश्रमपदं इस प्रकार सब भगवान् श्रीराम सीताके ही लौट आये ॥ २७३ स तमाश्रममागम्य तत्रापि न्यवसद् रामः राघवः सह सीतया ॥ २७ ॥

पुनरेवाजगाम ओर घूम - फिरकर धर्मके ह । ज्ञाता साथ फिर सुतीक्ष्णके आश्रमपर ॥ मुनिभिः परिपूजितः ॥ २८ ॥

किंचित् कालमरिंदमः । शत्रुओंका दमन करनेवाले श्रीराम उस आश्रम में आकर वहाँ रहनेवाले मुनियोंद्वारा भलीभाँति सम्मानित हो वहाँ भी कुछ कालतक रहे ॥ २८३ ॥

अथाश्रमस्थो विनयात् कदाचित् तं महामुनिम् ॥ २ ९ ॥ उपासीनः स काकुत्स्थः सुतीक्ष्णमिदमब्रवीत् । उस आश्रममें रहते हुए श्रीरामने एक दिन महामुनि सुतीक्ष्णके पास बैठकर विनीतभावसे कहा – ॥ २ ९ ३ ॥ अस्मिन्नरण्ये भगवन्नगस्त्यो मुनिसत्तमः ॥३० ॥

वसतीति मया नित्यं कथाः कथयतां श्रुतम् ।

न तु जानामि तं देशं वनस्यास्य महत्तया ॥३१ ॥

' भगवन्! मैंने प्रतिदिन बातचीत करनेवाले लोगोंके मुँहसे सुना है कि इस वनमें कहीं मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यजी निवास करते हैं; किंतु इस वनकी विशालताके कारण मैं उस स्थानको नहीं जानता हूँ ॥ ३०-३१ ॥

कुत्राश्रमपदं रम्यं महर्षेस्तस्य धीमतः ।

प्रसादार्थं भगवतः सानुजः सह सीतया ॥ ३२ ॥

अगस्त्यमधिगच्छेयमभिवादयितुं मुनिम् ।

मनोरथो महानेष हृदि सम्परिवर्तते ॥ ३३ ॥

' उन बुद्धिमान् महर्षिका सुन्दर आश्रम कहाँ है? मैं लक्ष्मण और सीताके साथ भगवान् अगस्त्यको प्रसन्न करनेके लिये उन मुनीश्वरको प्रणाम करनेके उद्देश्यसे उनके आश्रमपर जाऊँ — यह महान् मनोरथ मेरे हृदयमें चक्कर लगा रहा है ॥ ३२-३३ ॥

यदहं तं मुनिवरं शुश्रूषेयमपि स्वयम् ।

इति रामस्य स मुनिः श्रुत्वा धर्मात्मनो वचः ॥ ३४ ॥

सुतीक्ष्णः प्रत्युवाचेदं प्रीतो दशरथात्मजम् । ' मैं चाहता हूँ कि स्वयं भी मुनिवर अगस्त्यकी सेवा करूँ । ' धर्मात्मा श्रीरामका यह वचन सुनकर सुतीक्ष्ण मुनि बड़े प्रसन्न हुए और उन दशरथनन्दनसे इस प्रकार बोले - ॥ ३४३ ॥

अहमप्येतदेव त्वां वक्तुकामः सलक्ष्मणम् ॥ ३५ ॥

अगस्त्यमभिगच्छेति सीतया सह राघव ।

दिष्ट्या त्विदानीमर्थेऽस्मिन् स्वयमेव ब्रवीषि माम् ॥ ३६ ॥

' रघुनन्दन! मैं भी लक्ष्मणसहित आपसे यही कहना चाहता था कि आप सीताके साथ महर्षि अगस्त्यके पास जायँ । सौभाग्यकी बात है कि इस समय आप स्वयं ही मुझसे वहाँ जानेके विषयमें पूछ रहे हैं ॥ ३५-३६ ॥ अयमाख्यामि ते राम यत्रागस्त्यो महामुनिः ।

योजनान्याश्रमात् तात याहि चत्वारि वै ततः ।

दक्षिणेन महान् श्रीमानगस्त्यभ्रातुराश्रमः ॥ ३७ ॥

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अरण्यकाण्डे एकादशः सर्गः ५७७ ' श्रीराम! महामुनि अगस्त्य जहाँ रहते हैं, उस । आश्रमका पता मैं अभी आपको बताये देता हूँ । तात! इस आश्रमसे चार योजन दक्षिण चले जाइये । वहाँ आपको अगस्त्यके भाईका बहुत बड़ा एवं सुन्दर आश्रम मिलेगा ॥ ३७ ॥

स्थलीप्रायवनोद्देशे पिप्पलीवनशोभिते ।

रम्ये नानाविहगनादिते ॥ ३८ ॥

पद्मिन्यो विविधास्तत्र प्रसन्नसलिलाशयाः ।

हंसकारण्डवाकीर्णाश्चक्रवाकोपशोभिताः ॥ ३ ९ ॥ ।

' वहाँके वनकी भूमि प्राय: समतल है तथा पिप्पलीका वन उस आश्रमकी शोभा बढ़ाता है । वहाँ फूलों और फलोंकी बहुतायत है । नाना प्रकारके पक्षियोंके कलरवोंसे गूँजते हुए उस रमणीय आश्रमके पास भाँति - भाँतिके कमलमण्डित सरोवर हैं, जो स्वच्छ जलसे भरे हुए हैं । हंस और कारण्डव आदि पक्षी उनमें सब ओर फैले हुए हैं तथा चक्रवाक उनकी शोभा बढ़ाते हैं ॥ ३८-३९ ॥

तत्रैकां रजनीं व्युष्य प्रभाते राम गम्यताम् ।

दक्षिणां दिशमास्थाय वनखण्डस्य पार्श्वतः ॥ ४० ॥

तत्रागस्त्याश्रमपदं गत्वा योजनमन्तरम् ।

रमणीये वनोद्देशे बहुपादपशोभिते ॥ ४१ ॥

' श्रीराम! आप एक रात उस आश्रममें ठहरकर प्रात: काल उस वनखण्डके किनारे दक्षिण दिशाकी ओर जायँ । इस प्रकार एक योजन आगे जानेपर अनेकानेक वृक्षोंसे सुशोभित वनके रमणीय भागमें अगस्त्य मुनिका आश्रम मिलेगा ॥ ४०-४१ ॥

रंस्यते तत्र वैदेही लक्ष्मणश्च त्वया सह ।

स हि रम्यो वनोद्देशो बहुपादपसंयुतः ॥ ४२ ॥

' वहाँ विदेहनन्दिनी सीता और लक्ष्मण आपके साथ सानन्द विचरण करेंगे: क्योंकि बहुसंख्यक वृक्षोंसे सुशोभित वह वनप्रान्त बड़ा ही रमणीय है ॥ ४२ ॥

यदि बुद्धिः कृता द्रष्टुमगस्त्यं तं महामुनिम् ।

अद्यैव गमने बुद्धिं रोचयस्व महामते ॥ ४३ ॥

' महामते! यदि आपने महामुनि अगस्त्यके दर्शनका निश्चित विचार कर लिया है तो आज ही वहाँकी यात्रा करनेका भी निश्चय करें ' ॥ ४३ ॥

इति रामो मुनेः श्रुत्वा सह भ्रात्राभिवाद्य च ।

प्रतस्थेऽगस्त्यमुद्दिश्य सानुगः सह सीतया ॥ ४४ ॥

मुनिका यह वचन सुनकर भाईसहित श्रीरामचन्द्रजीने उन्हें प्रणाम किया और सीता तथा लक्ष्मणके साथ अगस्त्यजीके आश्रमकी ओर चल दिये ॥ ४४ ॥

पश्यन् वनानि चित्राणि पर्वतांश्चाभ्रसंनिभान् ।

सरांसि सरितश्चैव पथि मार्गवशानुगान् ॥ ४५ ॥

मार्ग में मिले हुए विचित्र - विचित्र वनों, मेघमालाके समान पर्वतमालाओं, सरोवरों और सरिताओंको देखते हुए वे आगे बढ़ते गये ॥ ४५ ॥

सुतीक्ष्णेनोपदिष्टेन गत्वा तेन पथा सुखम् ।

इदं परमसंहृष्टो वाक्यं लक्ष्मणमब्रवीत् ॥ ४६ ॥

इस प्रकार सुतीक्ष्णके बताये हुए मार्गसे सुखपूर्वक चलते - चलते श्रीरामचन्द्रजीने अत्यन्त हर्षमें भरकर लक्ष्मणसे यह बात कही - ॥ ४६ ॥

एतदेवाश्रमपदं नूनं तस्य महात्मनः ।

अगस्त्यस्य मुनेर्भ्रातुर्दृश्यते पुण्यकर्मणः ॥ ४७ ॥

' सुमित्रानन्दन! निश्चय ही यह पुण्यकर्मोंका अनुष्ठान करनेवाले महात्मा अगस्त्यमुनिके भाईका आश्रम दिखायी दे रहा है ॥ ४७ ॥

यथा हीमे वनस्यास्य ज्ञाताः पथि सहस्रशः ।

संनताः फलभारेण पुष्पभारेण च द्रुमाः ॥ ४८ ॥

' क्योंकि सुतीक्ष्णजीने जैसा बतलाया था, उसके अनुसार इस वनके मार्गमें फूलों और फलोंके भारसे झुके हुए सहस्रों परिचित वृक्ष शोभा पा रहे हैं ॥ ४८ ॥

पिप्पलीनां च पक्वानां वनादस्मादुपागतः ।

गन्धोऽयं पवनोत्क्षिप्तः सहसा कटुकोदयः ॥ ४ ९ ॥

' इस वनमें पकी हुई पीपलियोंकी यह गन्ध वायुसे प्रेरित होकर सहसा इधर आयी है, जिससे कटु रसका उदय हो रहा है ॥ ४ ९ ॥

तत्र तत्र च दृश्यन्ते संक्षिप्ताः काष्ठसंचयाः ।

लूनाश्च परिदृश्यन्ते दर्भा वैदूर्यवर्चसः ॥ ५० ॥

' जहाँ - तहाँ लकड़ियोंके ढेर लगे दिखायी देते हैं और वैदूर्यमणिके समान रंगवाले कुश कटे हुए दृष्टिगोचर होते हैं ॥ ५० ॥

एतच्च वनमध्यस्थं कृष्णाभ्रशिखरोपमम् ।

पावकस्याश्रमस्थस्य धूमाग्रं सम्प्रदृश्यते ॥ ५१ ॥

' यह देखो, जंगलके बीचमें आश्रमकी अग्रिका धुआँ उठता दिखायी दे रहा है, जिसका अग्रभाग काले मेघोंके ऊपरी भाग - सा प्रतीत होता है ॥ ५१ ॥

विविक्तेषु च तीर्थेषु कृतस्नाना द्विजातयः ।

पुष्पोपहारं कुर्वन्ति कुसुमैः स्वयमर्जितैः ॥ ५२ ॥

' यहाँके एकान्त एवं पवित्र तीर्थोंमें स्नान करके आये हुए ब्राह्मण स्वयं चुनकर लाये हुए फूलोंसे देवताओंके लिये पुष्पोपहार अर्पित करते हैं ॥ ५२ ॥

75 Srimad Valmiki Ramayan ( 1 ) Section_20_1_Front

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५७८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे

ततः सुतीक्ष्णवचनं यथा सौम्य मया श्रुतम् ।

अगस्त्यस्याश्रमो भ्रातुर्नूनमेष भविष्यति ॥ ५३ ॥

' सौम्य! मैंने सुतीक्ष्णजीका कथन जैसा सुना था, उसके अनुसार यह निश्चय ही अगस्त्यजीके भाईका आश्रम होगा ॥ ५३ ॥

निगृह्य तरसा मृत्युं लोकानां हितकाम्यया ।

यस्य भ्रात्रा कृतेयं दिक्शरण्या पुण्यकर्मणा ॥ ५४ ॥

' इन्हींके भाई पुण्यकर्मा अगस्त्यजीने समस्त लोकोंके हितकी कामनासे मृत्युस्वरूप वातापि और इल्वलका वेगपूर्वक दमन करके इस दक्षिण दिशाको शरण लेनेके योग्य बना दिया ॥ ५४ ॥

इहैकदा किल क्रूरो वातापिरपि चेल्वलः ।

भ्रातरौ सहितावास्तां ब्राह्मणघ्नौ महासुरौ ॥ ५५ ॥

' एक समयकी बात है, यहाँ क्रूर स्वभाववाला

वातापि और इल्वल — ये दोनों भाई एक साथ रहते थे ।

ये दोनों महान् असुर ब्राह्मणोंकी हत्या करनेवाले थे ॥

धारयन् ब्राह्मणं रूपमिल्वलः संस्कृतं वदन् ।

आमन्त्रयति विप्रान् स श्राद्धमुद्दिश्य निर्घृणः ॥ ५६ ॥

भ्रातरं संस्कृतं कृत्वा ततस्तं मेषरूपिणम् ।

तान् द्विजान् भोजयामास श्राद्धदृष्टेन कर्मणा ॥ ५७ ॥

' निर्दयी इल्वल ब्राह्मणका रूप धारण करके संस्कृत बोलता हुआ जाता और श्राद्धके लिये ब्राह्मणोंको निमन्त्रण दे आता था । फिर मेष ( जीवशाक ) का रूप धारण करनेवाले अपने भाई वातापिका संस्कार करके श्राद्धकल्पोक्त विधिसे ब्राह्मणोंको खिला देता था ॥ ५६-५७ ॥

ततो भुक्तवतां तेषां विप्राणामिल्वलोऽब्रवीत् ।

वातापे निष्क्रमस्वेति स्वरेण महता वदन् ॥ ५८ ॥

' वे ब्राह्मण जब भोजन कर लेते, तब इल्वल उच्च स्वरसे बोलता- ' वातापे! निकलो ' ॥ ५८ ॥

ततो भ्रातुर्वचः श्रुत्वा वातापिर्मेषवन्नदन् ।

भित्त्वा भित्त्वा शरीराणि ब्राह्मणानां विनिष्पतत् ॥ ५ ९ ॥

' भाईकी बात सुनकर वातापि भेड़ेके समान ' में - में ' करता हुआ उन ब्राह्मणोंके पेट फाड़ - फाड़कर निकल आता था ॥ ५ ९ ॥

ब्राह्मणानां सहस्त्राणि तैरेवं कामरूपिभिः ।

विनाशितानि संहत्य नित्यशः पिशिताशनैः ॥ ६० ॥

' इस प्रकार इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले उन मांसभक्षी असुरोंने प्रतिदिन मिलकर सहस्रों ब्राह्मणोंका विनाश कर डाला ॥ ६० ॥

अगस्त्येन तदा देवैः प्रार्थितेन महर्षिणा ।

अनुभूय किल श्राद्धे भक्षितः स महासुरः ॥ ६१ ॥

' उस समय देवताओंकी प्रार्थनासे महर्षि अगस्त्यने श्राद्धमें शाकरूपधारी उस महान् असुरको जान - बूझकर भक्षण किया ॥ ६१ ॥

ततः सम्पन्नमित्युक्त्वा दत्त्वा हस्तेऽवनेजनम् ।

भ्रातरं निष्क्रमस्वेति चेल्वलः समभाषत ॥ ६२ ॥

' तदनन्तर श्राद्धकर्म सम्पन्न हो गया । ऐसा कहकर ब्राह्मणोंके हाथमें अवनेजनका जल दे इल्वलने भाईको सम्बोधित करके कहा, ' निकलो ' ॥ ६२ ॥

स तदा भाषमाणं तु भ्रातरं विप्रघातिनम् ।

अब्रवीत् प्रहसन् धीमानगस्त्यो मुनिसत्तमः ॥ ६३ ॥

‘ इस प्रकार भाईको पुकारते हुए उस ब्राह्मणघाती असुरसे बुद्धिमान् मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यने हँसकर कहा—

कुतो निष्क्रमितुं शक्तिर्मया जीर्णस्य रक्षसः ।

भ्रातुस्तु मेषरूपस्य गतस्य यमसादनम् ॥ ६४ ॥

' जिस जीवशाकरूपधारी तेरे भाई राक्षसको मैंने

खाकर पचा लिया, वह तो यमलोकमें जा पहुँचा है ।

अब उसमें निकलनेकी शक्ति कहाँ है ' ॥ ६४ ॥

अथ तस्य वचः श्रुत्वा भ्रातुर्निधनसंश्रितम् ।

प्रधर्षयितुमारेभे मुनिं क्रोधान्निशाचरः ॥ ६५ ॥

' भाईकी मृत्युको सूचित करनेवाले मुनिके इस वचनको सुनकर उस निशाचरने क्रोधपूर्वक उन्हें मार डालनेका उद्योग आरम्भ किया ॥ ६५ ॥

सोऽभ्यद्रवद् द्विजेन्द्रं तं मुनिना दीप्ततेजसा ।

चक्षुषानलकल्पेन निर्दग्धो निधनं गतः ॥ ६६ ॥

' उसने ज्यों ही द्विजराज अगस्त्यपर धावा किया, त्यों ही उद्दीप्त तेजवाले उन मुनिने अपनी अग्नितुल्य दृष्टिसे उस राक्षसको दग्ध कर डाला । इस प्रकार उसकी मृत्यु हो गयी ॥ ६६ ॥

तस्यायमाश्रमो भ्रातुस्तटाकवनशोभितः ।

विप्रानुकम्पया येन कर्मेदं दुष्करं कृतम् ॥ ६७ ॥

‘ ब्राह्मणोंपर कृपा करके जिन्होंने यह दुष्कर कर्म किया था, उन्हीं महर्षि अगस्त्यके भाईका यह आश्रम है, जो सरोवर और वनसे सुशोभित हो रहा है ' ॥ ६७ ॥

एवं कथयमानस्य तस्य सौमित्रिणा सह ।

रामस्यास्तं गतः सूर्यः संध्याकालोऽभ्यवर्तत ॥ ६८ ॥

श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मणके साथ इस प्रकार बातचीत कर रहे थे । इतनेमें ही सूर्यदेव अस्त हो गये और संध्याका समय हो गया ॥६८ ॥

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