वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ — पृष्ठ 571–580

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 571–580

पृष्ठ 571

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अरण्यकाण्डे चतुर्थः सर्गः ५५ ९ चतुर्थः श्रीराम और लक्ष्मणके

ह्रियमाणौ तु काकुत्स्थौ दृष्ट्वा सीता रघूत्तमौ ।

उच्चैः स्वरेण चुक्रोश प्रगृह्य सुमहाभुजौ ॥ १ ॥

रघुकुलके श्रेष्ठ वीर ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम और लक्ष्मणको राक्षस लिये जा रहा है — यह देखकर सीता अपनी दोनों बाहें ऊपर उठाकर जोर - जोरसे रोने-चिल्लाने लगीं - ॥ १ ॥

एष दाशरथी रामः सत्यवाञ्छीलवान् शुचिः ।

रक्षसा रौद्ररूपेण ह्रियते सहलक्ष्मणः ॥ २ ॥

' हाय! इन सत्यवादी, शीलवान् और शुद्ध आचार-विचारवाले दशरथनन्दन श्रीराम और लक्ष्मणको यह रौद्ररूपधारी राक्षस लिये जा रहा है ॥ २ ॥

मामृक्षा भक्षयिष्यन्ति शार्दूलद्वीपिनस्तथा ।

मां हरोत्सृज काकुत्स्थौ नमस्ते राक्षसोत्तम ॥ ३ ॥

‘ राक्षसशिरोमणे! तुम्हें नमस्कार है । इस वनमें रीछ, व्याघ्र और चीते मुझे खा जायँगे, इसलिये तुम मुझे ही ले चलो, किंतु इन दोनों ककुत्स्थवंशी वीरोंको छोड़ दो'॥३ ॥

तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा वैदेह्या रामलक्ष्मणौ ।

वेगं प्रचक्रतुर्वीरौ वधे तस्य दुरात्मनः ॥ ४ ॥

विदेहनन्दिनी सीताकी यह बात सुनकर वे दोनों वीर श्रीराम और लक्ष्मण उस दुरात्मा राक्षसका वध करनेमें शीघ्रता करने लगे ॥४ ॥

तस्य रौद्रस्य सौमित्रिः सव्यं बाहुं बभञ्ज ह ।

रामस्तु दक्षिणं बाहुं तरसा तस्य रक्षसः ॥ ५ ॥

सुमित्राकुमार लक्ष्मणने उस राक्षसकी बायीं और श्रीरामने उसकी दाहिनी बाँह बड़े वेगसे तोड़ डाली ॥ ५ ॥

स भग्नबाहुः संविग्नः पपाताशु विमूर्च्छितः ।

धरण्यां मेघसंकाशो वज्रभिन्न इवाचलः ॥ ६ ॥

भुजाओंके टूट जानेपर वह मेघके समान काला राक्षस व्याकुल हो गया और शीघ्र ही मूच्छित होकर वज्रके द्वारा टूटे हुए पर्वतशिखरकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥६ ॥

मुष्टिभिर्बाहुभिः पद्भिः सूदयन्तौ तु राक्षसम् ।

उद्यम्योद्यम्य चाप्येनं स्थण्डिले निष्पिपेषतुः ॥ ७ ॥

तब श्रीराम और लक्ष्मण विराधको भुजाओं, मुक्कों और लातोंसे मारने लगे तथा उसे उठा - उठाकर पटकने और पृथ्वीपर रगड़ने लगे ॥७ ॥

सर्गः द्वारा विराधका वध

स विद्धौ बहुभिर्बाणैः खड्गाभ्यां च परिक्षतः ।

निष्पिष्टो बहुधा भूमौ न ममार स राक्षसः ॥ ८ ॥

बहुसंख्यक बाणोंसे घायल और तलवारोंसे क्षत-विक्षत होनेपर तथा पृथ्वीपर बार - बार रगड़ा जानेपर भी वह राक्षस मरा नहीं ॥ ८ ॥

तं प्रेक्ष्य रामः सुभृशमवध्यमचलोपमम् ।

भयेष्वभयदः श्रीमानिदं वचनमब्रवीत् ॥ ९ ॥

अवध्य तथा पर्वतके समान अचल विराधको बारंबार देखकर भयके अवसरोंपर अभय देनेवाले श्रीमान् रामने लक्ष्मणसे यह बात कही - ॥९ ॥

तपसा पुरुषव्याघ्र राक्षसोऽयं न शक्यते ।

शस्त्रेण युधि निर्जेतुं राक्षसं निखनावहे ॥ १० ॥

' पुरुषसिंह! यह राक्षस तपस्यासे ( वर पाकर ) अवध्य हो गया है । इसे शस्त्रके द्वारा युद्धमें नहीं जीता जा सकता । इसलिये हमलोग निशाचर विराधको पराजित करनेके लिये अब गड्ढा खोदकर गाड़ दें ॥ १० ॥

कुञ्जरस्येव रौद्रस्य राक्षसस्यास्य लक्ष्मण ।

वनेऽस्मिन् सुमहच्छ्वभ्रं खन्यतां रौद्रवर्चसः ॥ ११ ॥

' लक्ष्मण! हाथीके समान भयंकर तथा रौद्र तेजवाले इस राक्षसके लिये इस वनमें बहुत बड़ा गड्ढा खोदो ' ॥ ११ ॥

इत्युक्त्वा लक्ष्मणं रामः प्रदरः खन्यतामिति ।

तस्थौ विराधमाक्रम्य कण्ठे पादेन वीर्यवान् ॥ १२ ॥

इस प्रकार लक्ष्मणको गड्ढा खोदनेकी आज्ञा देकर पराक्रमी श्रीराम अपने एक पैरसे विराधका गला दबाकर खड़े हो गये ॥१२ ॥

तच्छ्रुत्वा राघवेणोक्तं राक्षसः प्रश्नितं वचः ।

इदं प्रोवाच काकुत्स्थं विराधः पुरुषर्षभम् ॥ १३ ॥

श्रीरामचन्द्रजीकी कही हुई यह बात सुनकर राक्षस विराधने पुरुषप्रवर श्रीरामसे यह विनययुक्त बात कही - ॥ १३ ॥

हतोऽहं पुरुषव्याघ्र शक्रतुल्यबलेन वै ।

मया तु पूर्वं त्वं मोहान्न ज्ञातः पुरुषर्षभ ॥ १४ ॥

' पुरुषसिंह! नरश्रेष्ठ! आपका बल देवराज इन्द्रके समान है । मैं आपके हाथसे मारा गया । मोहवश पहले मैं आपको पहचान न सका ॥१४ ॥

कौसल्या सुप्रजास्तात रामस्त्वं विदितो मया ।

वैदेही च महाभागा लक्ष्मणश्च महायशाः ॥ १५ ॥

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५६० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे ‘ तात! आपके द्वारा माता कौसल्या उत्तम संतानवाली । हुई हैं । मैं यह जान गया कि आप ही श्रीरामचन्द्रजी हैं । यह महाभागा विदेहनन्दिनी सीता हैं और ये आपके छोटे भाई महायशस्वी लक्ष्मण हैं ॥ १५ ॥

अभिशापादहं घोरां प्रविष्टो राक्षसीं तनुम् ।

तुम्बुरुर्नाम गन्धर्वः शप्तो वैश्रवणेन हि ॥ १६ ॥

' मुझे शापके कारण इस भयंकर राक्षसशरीरमें आना पड़ा था । मैं तुम्बुरु नामक गन्धर्व हूँ । कुबेरने मुझे राक्षस होनेका शाप दिया था ॥ १६ ॥

प्रसाद्यमानश्च मया सोऽब्रवीन्मां महायशाः ।

यदा दाशरथी रामस्त्वां वधिष्यति संयुगे ॥ १७ ॥

तदा प्रकृतिमापन्नो भवान् स्वर्गं गमिष्यति । ' जब मैंने उन्हें प्रसन्न करनेकी चेष्टा की, तब वे महायशस्वी कुबेर मुझसे इस प्रकार बोले- ' गन्धर्व! जब दशरथनन्दन श्रीराम युद्धमें तुम्हारा वध करेंगे, तब तुम अपने पहले स्वरूपको प्राप्त होकर स्वर्गलोकको जाओगे ॥ १७३ ॥

अनुपस्थीयमानो मां स क्रुद्धो व्याजहार ह ॥ १८ ॥

इति वैश्रवणो राजा रम्भासक्तमुवाच ह । ' मैं रम्भा नामक अप्सरामें आसक्त था, इसलिये एक दिन ठीक समयसे उनकी सेवामें उपस्थित न हो सका । इसीलिये कुपित हो राजा वैश्रवण ( कुबेर ) ने मुझे पूर्वोक्त शाप देकर उससे छूटनेकी अवधि बतायी थी ॥ १८३ ॥

तव प्रसादान्मुक्तोऽहमभिशापात् सुदारुणात् ॥ १ ९ ॥ भुवनं स्वं गमिष्यामि स्वस्ति वोऽस्तु परंतप । ‘ शत्रुओंको संताप देनेवाले रघुवीर! आज आपकी

कृपासे मुझे उस भयंकर शापसे छुटकारा मिल गया ।

आपका कल्याण हो, अब मैं अपने लोकको जाऊँगा ॥

इतो वसति धर्मात्मा शरभङ्गः प्रतापवान् ॥ २० ॥

अध्यर्धयोजने तात महर्षिः सूर्यसंनिभः ।

तं क्षिप्रमभिगच्छ त्वं स ते श्रेयोऽभिधास्यति ॥ २१ ॥

' तात! यहाँसे डेढ़ योजनकी दूरीपर सूर्यके समान तेजस्वी प्रतापी और धर्मात्मा महामुनि शरभङ्ग निवास करते हैं । उनके पास आप शीघ्र चले जाइये, वे आपके कल्याणकी बात बतायेंगे ॥ २०-२१ ॥

अवटे चापि मां राम निक्षिप्य कुशली व्रज ।

रक्षसां गतसत्त्वानामेष धर्मः सनातनः ॥ २२ ॥

' श्रीराम! आप मेरे शरीरको गड्डे में गाड़कर कुशलपूर्वक चले जाइये । मरे हुए राक्षसोंके शरीरको गड्ढेमें गाड़ना ( कब्र खोदकर उसमें दफना देना ) यह उनके लिये सनातन ( परम्पराप्राप्त ) धर्म है ॥ २२ ॥

अवटे ये निधीयन्ते तेषां लोकाः सनातनाः ।

एवमुक्त्वा तु काकुत्स्थं विराधः शरपीडितः ॥ २३ ॥

बभूव स्वर्गसम्प्राप्तो न्यस्तदेहो महाबलः । ' जो राक्षस गड्ढेमें गाड़ दिये जाते हैं, उन्हें सनातन लोकोंकी प्राप्ति होती है । ' श्रीरामसे ऐसा कहकर बाणोंसे पीड़ित हुआ महाबली विराध ( जब उसका शरीर गड्ढेमें डाला गया, तब ) उस शरीरको छोड़कर स्वर्गलोकको चला गया ॥ २३३ ॥

तच्छ्रुत्वा राघवो वाक्यं लक्ष्मणं व्यादिदेश ह ॥ २४ ॥

कुञ्जरस्येव रौद्रस्य राक्षसस्यास्य लक्ष्मण ।

वनेऽस्मिन्सुमहान् श्वभ्रः खन्यतां रौद्रकर्मणः ॥ २५ ॥

( वह किस तरह गड्ढेमें डाला गया? —यह बात अब बतायी जाती है ) उसकी बात सुनकर श्रीरघुनाथजीने लक्ष्मणको आज्ञा दी - ' लक्ष्मण! भयंकर कर्म करनेवाले तथा हाथीके समान भयानक इस राक्षसके लिये इस वनमें बहुत बड़ा गड्ढा खोदो ' ॥ २४-२५ ॥

इत्युक्त्वा लक्ष्मणं रामः प्रदरः खन्यतामिति ।

तस्थौ विराधमाक्रम्य कण्ठे पादेन वीर्यवान् ॥ २६ ॥

इस प्रकार लक्ष्मणको गड्ढा खोदनेका आदेश दे पराक्रमी श्रीराम एक पैरसे विराधका गला दबाकर खड़े हो गये ॥ २६ ॥

ततः खनित्रमादाय लक्ष्मणः श्वभ्रमुत्तमम् ।

अखनत् पार्श्वतस्तस्य विराधस्य महात्मनः ॥ २७ ॥

तब लक्ष्मणने फावड़ा लेकर उस विशालकाय विराधके पास ही एक बहुत बड़ा गड्ढा खोदकर तैयार किया ॥ २७ ॥

तं मुक्तकण्ठमुत्क्षिप्य शङ्कुकर्णं महास्वनम् ।

विराधं प्राक्षिपच्छ्वभ्रे नदन्तं भैरवस्वनम् ॥२८ ॥

तब श्रीरामने उसके गलेको छोड़ दिया और लक्ष्मणने खूंटे - जैसे कानवाले उस विराधको उठाकर उस गड्ढेमें डाल दिया, उस समय वह बड़ी भयानक आवाजमें जोर - जोरसे गर्जना कर रहा था ॥ २८ ॥

तमाहवे दारुणमाशुविक्रम स्थिरावुभौ संयति रामलक्ष्मणौ । मुदान्वितौ चिक्षिपतुर्भयावहं नदन्तमुत्क्षिप्य बलेन राक्षसम् ॥ २ ९ ॥ युद्धमें स्थिर रहकर शीघ्रतापूर्वक पराक्रम प्रकट करनेवाले उन दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मणने

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अरण्यकाण्डे रणभूमिमें क्रूरतापूर्ण कर्म करनेवाले उस भयंकर राक्षस । विराधको बलपूर्वक उठाकर गड्ढेमें फेंक दिया । उस समय वह जोर - जोरसे चिल्ला रहा था । उसे गड्ढेमें डालकर वे अवध्यतां समर्थ्य महान् नहीं है, यह श्रीराम और दोनों बन्धु बड़े प्रसन्न हुए ॥ २ ९ ॥। प्रेक्ष्य महासुरस्य तौ शितेन शस्त्रेण तदा नरर्षभौ । चात्यर्थविशारदावुभौ बिले विराधस्य वधं प्रचक्रतुः ॥ ३० ॥

असुर विराधका तीखे शस्त्रसे वध होनेवाला देखकर अत्यन्त कुशल दोनों भाई नरश्रेष्ठ लक्ष्मणने उस समय गड्ढा खोदकर उस गड्ढेमें उसे डाल दिया और उसे मिट्टीसे पाटकर उस राक्षसका वध कर डाला ॥ ३० ॥

स्वयं विराधेन हि मृत्युमात्मनः प्रसह्य रामेण यथार्थमीप्सितः । निवेदितः काननचारिणा स्वयं न मे वधः शस्त्रकृतो भवेदिति ॥ ३१ ॥

वास्तवमें श्रीरामके हाथसे ही हठपूर्वक मरना उसे अभीष्ट था । उस अपनी मनोवाञ्छित मृत्युकी प्रातिके उद्देश्यसे स्वयं वनचारी विराधने ही श्रीरामको यह बता दिया था कि शस्त्रद्वारा मेरा वध नहीं हो सकता ॥ ३१ ॥

तदेव रामेण निशम्य भाषितं कृता मतिस्तस्य बिलप्रवेशने । पञ्चमः सर्गः ५६१ बिलं च तेनातिबलेन रक्षसा प्रवेश्यमानेन वनं विनादितम् ॥ ३२ ॥

उसकी कही हुई उसी बातको सुनकर श्रीरामने उसे गड्ढेमें गाड़ देनेका विचार किया था । जब वह गड्ढे में डाला जाने लगा, उस समय उस अत्यन्त बलवान् राक्षसने अपनी चिल्लाहटसे सारे वनप्रान्तको गुँजा दिया । प्रहृष्टरूपाविव रामलक्ष्मणौ विराधमुर्व्या प्रदरे निपात्य तम् । ननन्दतुर्वीतभयौ महावने शिलाभिरन्तर्दधतुश्च राक्षसम् ॥ ३३ ॥

राक्षस विराधको पृथ्वीके अंदर गड्ढेमें गिराकर श्रीराम और लक्ष्मणने बड़ी प्रसन्नताके साथ उसे ऊपरसे बहुतेरे पत्थर डालकर पाट दिया । फिर वे निर्भय हो उस महान् वनमें सानन्द विचरने लगे ॥ ३३ ॥

ततस्तु तौ काञ्चनचित्रकार्मुक निहत्य रक्षः परिगृह्य मैथिलीम् । विजहतुस्तौ मुदि महावने दिवि स्थितौ चन्द्रदिवाकराविव ॥ ३४ ॥

इस प्रकार उस राक्षसका वध करके मिथिलेश-कुमारी सीताको साथ ले सोनेके विचित्र धनुषोंसे सुशोभित हो वे दोनों भाई आकाशमें स्थित हुए चन्द्रमा और सूर्यकी भाँति उस महान् वनमें आनन्दमग्न हो विचरण करने लगे ॥ ३४ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे चतुर्थः सर्गः ॥ ४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें चौथा सर्ग पूरा हुआ ॥ ४ ॥

पञ्चमः सर्गः श्रीराम, लक्ष्मण और सीताका शरभङ्ग मुनिके आश्रमपर जाना, देवताओंका दर्शन करना और मुनिसे सम्मानित होना तथा शरभङ्ग मुनिका ब्रह्मलोक - गमन

हत्वा तु तं भीमबलं विराधं राक्षसं वने ।

ततः सीतां परिष्वज्य समाश्वास्य च वीर्यवान् ॥ १ ॥

अब्रवीद् भ्रातरं रामो लक्ष्मणं दीप्ततेजसम् ।

कष्टं वनमिदं दुर्गं न च स्मो वनगोचराः ॥ २ ॥

अभिगच्छामहे शीघ्रं शरभङ्गं तपोधनम् ।

आश्रमं शरभङ्गस्य राघवोऽभिजगाम ह ॥ ३ ॥

वनमें उस भयंकर बलशाली राक्षस विराधका वध करके पराक्रमी श्रीरामने सीताको हृदयसे लगाकर सान्त्वना दी और उद्दीप्त तेजवाले भाई लक्ष्मणसे इस प्रकार कहा — ' सुमित्रानन्दन! यह दुर्गम वन बड़ा कष्टप्रद । है । हमलोग इसके पहले कभी ऐसे वनोंमें नहीं रहे हैं ( अतः यहाँके कष्टोंका न तो अनुभव है और न अभ्यास ही है ) । अच्छा! हमलोग अब शीघ्र ही तपोधन शरभङ्गजीके पास चलें ' – ऐसा कहकर श्रीरामचन्द्रजी शरभङ्ग मुनिके आश्रमपर गये ॥१-३ ॥

तस्य देवप्रभावस्य तपसा भावितात्मनः ।

समीपे शरभङ्गस्य ददर्श महदद्भुतम् ॥४ ॥

देवताओंके तुल्य प्रभावशाली तथा तपस्यासे शुद्ध अन्तःकरणवाले ( अथवा तपके द्वारा परब्रह्म परमात्माका साक्षात्कार करनेवाले ) शरभङ्ग मुनिके समीप जानेपर

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५६२ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे श्रीरामने एक बड़ा अद्भुत दृश्य देखा ॥ ४ ॥

विभ्राजमानं वपुषा सूर्यवैश्वानरप्रभम् ।

रथप्रवरमारूढमाकाशे विबुधानुगम् ॥ ५ ॥

असंस्पृशन्तं वसुधां ददर्श विबुधेश्वरम् ।

सम्प्रभाभरणं देवं विरजोऽम्बरधारिणम् ॥ ६ ॥

वहाँ उन्होंने आकाशमें एक श्रेष्ठ रथपर बैठे हुए देवताओंके स्वामी इन्द्रदेवका दर्शन किया, जो पृथ्वीका स्पर्श नहीं कर रहे थे । उनकी अङ्गकान्ति सूर्य और अग्निके समान प्रकाशित होती थी । वे अपने तेजस्वी शरीरसे देदीप्यमान हो रहे थे । उनके पीछे और भी बहुत - से देवता थे । उनके दीप्तिमान् आभूषण चमक रहे थे तथा उन्होंने निर्मल वस्त्र धारण कर रखा था ॥ ५-६ ॥

तद्विधैरेव बहुभिः पूज्यमानं महात्मभिः ।

हरितैर्वाजिभिर्युक्तमन्तरिक्षगतं रथम् ॥७ ॥

ददर्शादूरतस्तस्य तरुणादित्यसंनिभम् । उन्हींके समान वेशभूषावाले दूसरे बहुत - से महात्मा इन्द्रदेवकी पूजा ( स्तुति प्रशंसा ) कर रहे थे । उनका रथ आकाशमें खड़ा था और उसमें हरे रंगके घोड़े जुते हुए थे । श्रीरामने निकटसे उस रथको देखा । वह नवोदित सूर्यके समान प्रकाशित होता था ॥ ७३ ॥

पाण्डुराभ्रघनप्रख्यं चन्द्रमण्डलसंनिभम् ॥ ८ ॥

अपश्यद् विमलं छत्रं चित्रमाल्योपशोभितम् । उन्होंने यह भी देखा कि इन्द्रके मस्तकके ऊपर श्वेत बादलोंके समान उज्ज्वल तथा चन्द्रमण्डलके समान कान्तिमान् निर्मल छत्र तना हुआ है, जो विचित्र फूलोंकी मालाओंसे सुशोभित है ॥ ८३ ॥

चामरव्यजने चाग्र्ये रुक्मदण्डे महाधने ॥ ९ ॥

गृहीते वरनारीभ्यां धूयमाने च मूर्धनि । श्रीरामने सुवर्णमय डंडेवाले दो श्रेष्ठ एवं बहुमूल्य चँवर और व्यजन भी देखे, जिन्हें दो सुन्दरियाँ लेकर देवराजके मस्तकपर हवा कर रही थीं ॥ ९ ३ ॥ गन्धर्वामरसिद्धाश्च बहवः परमर्षयः ॥ १० ॥

अन्तरिक्षगतं देवं गीर्भिरग्र्याभिरैडयन् ।

सह सम्भाषमाणे तु शरभङ्गेन वासवे ॥ ११ ॥

दृष्ट्वा शतक्रतुं तत्र रामो लक्ष्मणमब्रवीत् ।

रामोऽथ रथमुद्दिश्य भ्रातुर्दर्शयताद्भुतम् ॥ १२ ॥

उस समय बहुत - से गन्धर्व, देवता, सिद्ध और महर्षिगण उत्तम वचनद्वारा अन्तरिक्षमें विराजमान देवेन्द्रकी स्तुति करते थे और देवराज इन्द्र शरभङ्ग मुनिके साथ वार्तालाप कर रहे थे । वहाँ इस प्रकार शतक्रतु इन्द्रका दर्शन करके श्रीरामने उनके अद्भुत रथकी ओर अँगुलीसे संकेत करते हुए उसे भाईको दिखाया और लक्ष्मणसे इस प्रकार कहा - ॥१०–१२ ॥

अर्चिष्मन्तं श्रिया जुष्टमद्भुतं पश्य लक्ष्मण ।

प्रतपन्तमिवादित्यमन्तरिक्षगतं रथम् ॥ १३ ॥

' लक्ष्मण! आकाशमें वह अद्भुत रथ तो देखो, उससे तेजकी लपटें निकल रही हैं । वह सूर्यके समान तप रहा है । शोभा मानो मूर्तिमती होकर उसकी सेवा करती है ॥१३ ॥

ये हयाः पुरुहूतस्य पुरा शक्रस्य नः श्रुताः ।

अन्तरिक्षगता दिव्यास्त इमे हरयो ध्रुवम् ॥ १४ ॥

' हमलोगोंने पहले देवराज इन्द्रके जिन दिव्य घोडोंके विषयमें जैसा सुन रखा है, निश्चय ही आकाशमें ये वैसे ही दिव्य अश्व विराजमान हैं ॥१४ ॥

इमे च पुरुषव्याघ्र ये तिष्ठन्त्यभितो दिशम् ।

शतं शतं कुण्डलिनो युवानः खड्गपाणयः ॥ १५ ॥

विस्तीर्णविपुलोरस्काः परिघायतबाहवः ।

शोणांशुवसनाः सर्वे व्याघ्रा इव दुरासदाः ॥ १६ ॥

' पुरुषसिंह! इस रथके दोनों ओर जो ये हाथोंमें खड्ग लिये कुण्डलधारी सौ - सौ युवक खड़े हैं, इनके वक्षःस्थल विशाल एवं विस्तृत हैं, भुजाएँ परिघोंके समान सुदृढ़ एवं बड़ी - बड़ी हैं । ये सब - के - सब लाल वस्त्र धारण किये हुए हैं और व्याघ्रोंके समान दुर्जय प्रतीत होते हैं ॥ १५-१६ ॥

उरोदेशेषु सर्वेषां हारा ज्वलनसंनिभाः ।

रूपं बिभ्रति सौमित्रे पञ्चविंशतिवार्षिकम् ॥ १७ ॥

' सुमित्रानन्दन! इन सबके हृदयदेशोंमें अग्रिके समान तेजसे जगमगाते हुए हार शोभा पाते हैं । ये नवयुवक पच्चीस वर्षोंकी अवस्थाका रूप धारण करते हैं ॥ १७ ॥

एतद्धि किल देवानां वयो भवति नित्यदा ।

यथेमे पुरुषव्याघ्रा दृश्यन्ते प्रियदर्शनाः ॥ १८ ॥

' कहते हैं, देवताओंकी सदा ऐसी ही अवस्था रहती है, जैसे ये पुरुषप्रवर दिखायी देते हैं । इनका दर्शन कितना प्यारा लगता है ॥ १८ ॥

इहैव सह वैदेह्या मुहूर्तं तिष्ठ लक्ष्मण ।

यावज्जानाम्यहं व्यक्तं क एष द्युतिमान् रथे ॥ १ ९ ॥

' लक्ष्मण! जबतक कि मैं स्पष्ट रूपसे यह पता न लगा लूँ कि रथपर बैठे हुए ये तेजस्वी पुरुष कौन हैं? तबतक तुम विदेहनन्दिनी सीताके साथ एक । मुहूर्ततक यहीं ठहरो ' ॥ १ ९ ॥

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अरण्यकाण्डे

तमेवमुक्त्वा सौमित्रिमिहैव स्थीयतामिति ।

अभिचक्राम काकुत्स्थः शरभङ्गाश्रमं प्रति ॥ २० ॥

इस प्रकार सुमित्राकुमारको वहीं ठहरनेका आदेश देकर श्रीरामचन्द्रजी टहलते हुए शरभङ्ग मुनिके आश्रमपर गये ॥ २० ॥

ततः समभिगच्छन्तं प्रेक्ष्य रामं शचीपतिः ।

शरभङ्गमनुज्ञाप्य विबुधानिदमब्रवीत् ॥ २१ ॥

श्रीरामको आते देख शचीपति इन्द्रने शरभङ्ग मुनिसे विदा ले देवताओंसे इस प्रकार कहा- ॥ २१ ॥

इहोपयात्यसौ रामो यावन्मां नाभिभाषते ।

निष्ठां नयत तावत् तु ततो माद्रष्टुमर्हति ॥ २२ ॥

' श्रीरामचन्द्रजी यहाँ आ रहे हैं । वे जबतक मुझसे कोई बात न करें, उसके पहले ही तुमलोग मुझे यहाँसे दूसरे स्थानमें ले चलो । इस समय श्रीरामसे मेरी मुलाकात नहीं होनी चाहिये ॥ २२ ॥

जितवन्तं कृतार्थं हि तदाहमचिरादिमम् ।

कर्म ह्यनेन कर्तव्यं महदन्यैः सुदुष्करम् ॥ २३ ॥

' इन्हें वह महान् कर्म करना है, जिसका सम्पादन करना दूसरोंके लिये बहुत कठिन है । जब ये रावणपर विजय पाकर अपना कर्तव्य पूर्ण करके कृतार्थ हो जायँगे, तब मैं शीघ्र ही आकर इनका दर्शन करूँगा ' ॥ २३ ॥

अथ वज्री तमामन्त्र्य मानयित्वा च तापसम् ।

रथेन हययुक्तेन ययौ दिवमरिंदमः ॥ २४ ॥

यह कहकर वज्रधारी शत्रुदमन इन्द्रने तपस्वी शरभङ्गका सत्कार किया और उनसे पूछकर अनुमति ले वे घोड़े जुते हुए रथके द्वारा स्वर्गलोकको चल दिये ॥

प्रयाते तु सहस्राक्षे राघवः सपरिच्छदः ।

अग्निहोत्रमुपासीनं शरभङ्गमुपागमत् ॥ २५ ॥

सहस्र नेत्रधारी इन्द्रके चले जानेपर श्रीरामचन्द्रजी अपनी पत्नी और भाईके साथ शरभङ्ग मुनिके पास गये । उस समय वे अग्निके समीप बैठकर अग्निहोत्र कर रहे थे ॥ २५ ॥

तस्य पादौ च संगृह्य रामः सीता च लक्ष्मणः ।

निषेदुस्तदनुज्ञाता लब्धवासा निमन्त्रिताः ॥ २६ ॥

श्रीराम, सीता और लक्ष्मणने मुनिके चरणोंमें प्रणाम किया और उनकी आज्ञासे वहाँ बैठ गये । शरभङ्गजीने उन्हें आतिथ्यके लिये निमन्त्रण दे ठहरनेके लिये स्थान दिया ॥ २६ ॥

ततः शक्रोपयानं तु पर्यपृच्छत राघवः ।

शरभङ्गश्च तत् सर्वं राघवाय न्यवेदयत् ॥ २७॥

पञ्चमः सर्गः ५६३ तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजीने उनसे इन्द्रके आनेका कारण पूछा । तब शरभङ्ग मुनिने श्रीरघुनाथजीसे सब बातें निवेदन करते हुए कहा- ॥ २७ ॥

मामेष वरदो राम ब्रह्मलोकं निनीषति ।

जितमुग्रेण तपसा दुष्प्रापमकृतात्मभिः ॥ २८ ॥

' श्रीराम! ये वर देनेवाले इन्द्र मुझे ब्रह्मलोकमें ले जाना चाहते हैं । मैंने अपनी उग्र तपस्यासे उस लोकपर विजय पायी है । जिनकी इन्द्रियाँ वशमें नहीं हैं, उन पुरुषोंके लिये वह अत्यन्त दुर्लभ है ॥ २८ ॥

अहं ज्ञात्वा नरव्याघ्र वर्तमानमदूरतः ।

ब्रह्मलोकं न गच्छामि त्वामदृष्ट्वा प्रियातिथिम् ॥ २ ९ ॥

' पुरुषसिंह! परंतु जब मुझे मालूम हो गया कि आप इस आश्रमके निकट आ गये हैं, तब मैंने निश्चय किया कि आप जैसे प्रिय अतिथिका दर्शन किये बिना मैं ब्रह्मलोकको नहीं जाऊँगा ॥ २ ९ ॥

त्वयाहं पुरुषव्याघ्र धार्मिकेण महात्मना ।

समागम्य गमिष्यामि त्रिदिवं चावरं परम् ॥३० ॥

' नरश्रेष्ठ! आप धर्मपरायण महात्मा पुरुषसे मिलकर ही मैं स्वर्गलोक तथा उससे ऊपरके ब्रह्मलोकको जाऊँगा ॥ ३० ॥

अक्षया नरशार्दूल जिता लोका मया शुभाः ।

ब्राह्मयाश्च नाकपृष्ठ्याश्च प्रतिगृह्णीष्व मामकान् ॥ ३१ ॥

' पुरुषशिरोमणे! मैंने ब्रह्मलोक और स्वर्गलोक आदि जिन अक्षय शुभ लोकोंपर विजय पायी है, मेरे उन सभी लोकोंको आप ग्रहण करें ' ॥३१ ॥

एवमुक्तो नरव्याघ्रः सर्वशास्त्रविशारदः ।

ऋषिणा शरभङ्गेन राघवो वाक्यमब्रवीत् ॥ ३२ ॥

शरभङ्ग मुनिके ऐसा कहनेपर सम्पूर्ण शास्त्रोंके ज्ञाता नरश्रेष्ठ श्रीरघुनाथजीने यह बात कही — ॥ ३२ ॥

अहमेवाहरिष्यामि सर्वांल्लोकान् महामुने ।

आवासं त्वहमिच्छामि प्रदिष्टमिह कानने ॥ ३३ ॥

' महामुने! मैं ही आपको उन सब लोकोंकी प्राप्ति कराऊँगा । इस समय तो मैं इस वनमें आपके बताये हुए स्थानपर निवासमात्र करना चाहता हूँ ' ॥ ३३ ॥

राघवेणैवमुक्तस्तु शक्रतुल्यबलेन वै ।

शरभङ्गो महाप्राज्ञः पुनरेवाब्रवीद् वचः ॥ ३४ ॥

इन्द्रके समान बलशाली श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर महाज्ञानी शरभङ्ग मुनि फिर बोले— ॥ ३४ ॥

इह राम महातेजाः सुतीक्ष्णो नाम धार्मिकः ।

। वसत्यरण्ये नियतः स ते श्रेयो विधास्यति ॥ ३५ ॥

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५६४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे ' श्रीराम! इस वनमें थोड़ी ही दूरपर महातेजस्वी । धर्मात्मा सुतीक्ष्ण मुनि नियमपूर्वक निवास करते हैं । वे ही आपका कल्याण ( आपके लिये स्थान आदिका प्रबन्ध ) करेंगे ॥ ३५ ॥

सुतीक्ष्णमभिगच्छ त्वं शुचौ देशे तपस्विनम् ।

रमणीये वनोद्देशे स ते वासं विधास्यति ॥ ३६ ॥

' आप इस रमणीय वनप्रान्तके उस पवित्र स्थानमें तपस्वी सुतीक्ष्ण मुनिके पास चले जाइये । वे आपके निवासस्थानकी व्यवस्था करेंगे ॥ ३६ ॥

इमां मन्दाकिनीं राम प्रतिस्त्रोतामनुव्रज ।

नदीं पुष्पोडुपवहां ततस्तत्र गमिष्यसि ॥ ३७ ॥

' श्रीराम! आप फूलके समान छोटी - छोटी डोंगियोंसे पार होने योग्य अथवा पुष्पमयी नौकाको बहानेवाली इस मन्दाकिनी नदीके स्रोतके विपरीत दिशामें इसीके किनारे - किनारे चले जाइये । इससे वहाँ पहुँच जाइयेगा ॥३७ ॥

एष पन्था नरव्याघ्र मुहूर्तं पश्य तात माम् ।

यावज्जहामि गात्राणि जीर्णां त्वचमिवोरगः ॥ ३८ ॥

' नरश्रेष्ठ! यही वह मार्ग है, परंतु तात! दो घड़ी यहीँ ठहरिये और जबतक पुरानी केंचुलका त्याग करनेवाले सर्पकी भाँति मैं अपने इन जराजीर्ण अङ्गोंका त्याग न कर दूँ, तबतक मेरी ही ओर देखिये ' ॥ ३८ ॥

ततोऽग्निं स समाधाय हुत्वा चाज्येन मन्त्रवत् ।

शरभङ्गो महातेजाः प्रविवेश हुताशनम् ॥ ३ ९ ॥

यों कहकर महातेजस्वी शरभङ्ग मुनिने विधिवत् अग्निकी स्थापना करके उसे प्रज्वलित किया और मन्त्रोच्चारणपूर्वक घीकी आहुति देकर वे स्वयं भी उस अग्निमें प्रविष्ट हो गये ॥ ३ ९ ॥

तस्य रोमाणि केशांश्च तदा वह्निर्महात्मनः ।

जीर्णां त्वचं तदस्थीनि यच्च मांसं च शोणितम् ॥ ४० ॥

उस समय अग्निने उन महात्माके रोम, केश, जीर्ण त्वचा, हड्डी, मांस और रक्त सबको जलाकर भस्म कर दिया ॥ ४० ॥

स च पावकसंकाशः कुमारः समपद्यत ।

उत्थायाग्निचयात् तस्माच्छरभङ्गो व्यरोचत ॥ ४१ ॥

वे शरभङ्ग मुनि अग्नितुल्य तेजस्वी कुमारके रूपमें प्रकट हो गये और उस अग्निराशिसे ऊपर उठकर बड़ी शोभा पाने लगे ॥ ४१ ॥

स लोकानाहिताग्नीनामृषीणां च महात्मनाम् ।

देवानां च व्यतिक्रम्य ब्रह्मलोकं व्यरोहत ॥ ४२ ॥

वे अग्निहोत्री पुरुषों, महात्मा मुनियों और देवताओंके भी लोकोंको लाँघकर ब्रह्मलोकमें जा पहुँचे ॥ ४२ ॥

स पुण्यकर्मा भुवने द्विजर्षभः पितामहं सानुचरं ददर्श ह । पितामहश्चापि समीक्ष्य तं द्विजं ननन्द सुस्वागतमित्युवाच ह ॥ ४३ ॥

पुण्यकर्म करनेवाले द्विजश्रेष्ठ शरभङ्गने ब्रह्मलोक में पार्षदोंसहित पितामह ब्रह्माजीका दर्शन किया । ब्रह्माजी भी उन ब्रह्मर्षिको देखकर बड़े प्रसन्न हुए और बोले-| ' महामुने! तुम्हारा शुभ स्वागत है ' ॥४३ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे पञ्चमः सर्गः ॥ ५ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें पाँचवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५ ॥

षष्ठः सर्गः वानप्रस्थ मुनियोंका राक्षसोंके अत्याचारसे अपनी रक्षाके लिये श्रीरामचन्द्रजीसे प्रार्थना करना और श्रीरामका उन्हें आश्वासन देना

शरभङ्गे दिवं प्राप्ते मुनिसङ्घाः समागताः ।

अभ्यगच्छन्त काकुत्स्थं रामं ज्वलिततेजसम् ॥ १ ॥

शरभङ्ग मुनिके ब्रह्मलोक चले जानेपर प्रज्वलित तेजवाले ककुत्स्थवंशी श्रीरामचन्द्रजीके पास बहुत - से मुनियोंके समुदाय पधारे ॥ १ ॥

वैखानसा वालखिल्याः सम्प्रक्षाला मरीचिपाः ।

अश्मकुट्टाश्च बहवः पत्राहाराश्च तापसाः ॥ २ ॥ ।

दन्तोलूखलिनश्चैव तथैवोन्मज्जकाः परे ।

गात्रशय्या अशय्याश्च तथैवानवकाशिकाः ॥ ३ ॥

मुनयः सलिलाहारा वायुभक्षास्तथापरे ।

आकाशनिलयाश्चैव तथा स्थण्डिलशायिनः ॥ ४ ॥

तथोर्ध्ववासिनो दान्तास्तथाऽऽर्द्रपटवाससः ।

सजपाश्च तपोनिष्ठास्तथा पञ्चतपोऽन्विताः ॥ ५ ॥

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अरण्यकाण्डे उनमें वैखानस ', वालखिल्य, सम्प्रक्षाल । मरीचिप े, बहुसंख्यक अश्मकुट्ट ', पत्राहार, दन्तोलूखली, उन्मज्जकर, गात्रशय्य, अशय्य १०, अनवकाशिक ११, सलिलाहार १२, वायुभक्ष १३, आकाशनिलय १४, स्थण्डिलशायी १५, ऊर्ध्ववासी १६, दान्त १७, आर्द्रपटवासा १८, सजप १ ९, तपोनिष्ठ २० और पञ्चाग्निसेवी २१ – इन सभी श्रेणियोंके तपस्वी मुनि थे॥२-५ ॥

सर्वे ब्राह्मया श्रिया युक्ता दृढयोगसमाहिताः ।

शरभङ्गाश्रमे राममभिजग्मुश्च तापसाः ॥ ६ ॥

वे सभी तपस्वी ब्रह्मतेजसे सम्पन्न थे और सुदृढ़ योगके अभ्याससे उन सबका चित्त एकाग्र हो गया था । वे सब - के - सब शरभङ्ग मुनिके आश्रमपर श्रीरामचन्द्रजीके समीप आये ॥ ६ ॥

अभिगम्य च धर्मज्ञा रामं धर्मभृतां वरम् ।

ऊचुः परमधर्मज्ञमृषिसङ्घाः समागताः ॥ ७ ॥

धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ परम धर्मज्ञ श्रीरामचन्द्रजीके पास आकर वे धर्मके ज्ञाता समागत ऋषिसमुदाय उनसे बोले -॥७ ॥

त्वमिक्ष्वाकुकुलस्यास्य पृथिव्याश्च महारथः ।

प्रधानश्चापि नाथश्च देवानां मघवानिव ॥ ८ ॥

' रघुनन्दन! आप इस इक्ष्वाकुवंशके साथ ही समस्त भूमण्डलके भी स्वामी, संरक्षक एवं प्रधान महारथी वीर हैं । जैसे इन्द्र देवताओंके रक्षक हैं, उसी प्रकार आप मनुष्यलोककी रक्षा करनेवाले हैं ॥८ ॥

विश्रुतस्त्रिषु लोकेषु यशसा विक्रमेण च ।

पितृव्रतत्वं सत्यं च त्वयि धर्मश्च पुष्कलः ॥ ९ ॥

' आप अपने यश और पराक्रमसे तीनों लोकोंमें विख्यात हैं । आपमें पिताकी आज्ञाके पालनका व्रत, सत्य भाषण तथा सम्पूर्ण धर्म विद्यमान हैं ॥ ९ ॥

षष्ठः सर्गः ५६५

त्वामासाद्य महात्मानं धर्मज्ञं धर्मवत्सलम् ।

अर्थित्वान्नाथ वक्ष्यामस्तच्च नः क्षन्तुमर्हसि ॥१० ॥

' नाथ! आप महात्मा, धर्मज्ञ और धर्मवत्सल हैं । हम आपके पास प्रार्थी होकर आये हैं; इसीलिये ये स्वार्थकी बात निवेदन करना चाहते हैं । आपको इसके लिये हमें क्षमा करना चाहिये ॥ १० ॥

अधर्मः सुमहान् नाथ भवेत् तस्य तु भूपतेः ।

यो हरेद् बलिषड्भागं न च रक्षति पुत्रवत् ॥ ११ ॥

' स्वामिन्! जो राजा प्रजासे उसकी आयका छठा भाग करके रूपमें ले ले और पुत्रकी भाँति प्रजाकी रक्षा न करे, उसे महान् अधर्मका भागी होना पड़ता है ॥ ११ ॥

युञ्जानः स्वानिव प्राणान् प्राणैरिष्टान् सुतानिव ।

नित्ययुक्तः सदा रक्षन् सर्वान् विषयवासिनः ॥ १२ ॥

प्राजोति शाश्वतीं राम कीर्तिं स बहुवार्षिकीम् ।

ब्रह्मणः स्थानमासाद्य तत्र चापि महीयते ॥ १३ ॥

' श्रीराम! जो भूपाल प्रजाकी रक्षाके कार्यमें संलग्न हो अपने राज्यमें निवास करनेवाले सब लोगोंको प्राणोंके समान अथवा प्राणोंसे भी अधिक प्रिय पुत्रोंके समान समझकर सदा सावधानीके. साथ उनकी रक्षा करता है, वह बहुत वर्षोंतक स्थिर रहनेवाली अक्षय कीर्ति पाता है और अन्तमें ब्रह्मलोकमें जाकर वहाँ भी विशेष सम्मानका भागी होता है ॥ १२-१३ ॥

यत् करोति परं धर्मं मुनिर्मूलफलाशनः ।

तत्र राज्ञश्चतुर्भागः प्रजा धर्मेण रक्षतः ॥ १४ ॥

' राजाके राज्यमें मुनि फल- मूलका आहार करके जिस उत्तम धर्मका अनुष्ठान करता है, उसका चौथा भाग धर्मके अनुसार प्रजाकी रक्षा करनेवाले उस १. ऋषियोंका एक समुदाय जो ब्रह्माजीके नखसे उत्पन्न हुआ है । २. ब्रह्माजीके बाल ( रोम ) से प्रकट हुए महर्षियोंका समूह । ३. जो भोजनके बाद अपने बर्तन धो - पोंछकर रख देते हैं, दूसरे समयके लिये कुछ नहीं बचाते । ४. सूर्य अथवा चन्द्रमाकी किरणोंका पान करके रहनेवाले । ५. कच्चे अन्नको पत्थरसे कूटकर खानेवाले । ६. पत्तोंका आहार करनेवाले । ७. दाँतोंसे ही ऊखलका काम लेनेवाले । ८. कण्ठतक पानीमें डूबकर तपस्या करनेवाले । ९. शरीरसे ही शय्याका काम लेनेवाले अर्थात् बिना बिछौनेके ही भुजापर सिर रखकर सोनेवाले । १०. शय्याके साधनोंसे रहित । ११. निरन्तर सत्कर्ममें लगे रहनेके कारण कभी अवकाश न पानेवाले । १२. जल पीकर रहनेवाले । १३. हवा पीकर जीवननिर्वाह करनेवाले । १४. खुले मैदानमें रहनेवाले । १५. वेदीपर सोनेवाले । १६. पर्वतशिखर आदि ऊँचे स्थानोंमें निवास करनेवाले । १७. मन और इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले । १८. सदा भीगे कपड़े पहननेवाले । १ ९. निरन्तर जप करनेवाले । २०. तपस्या अथवा परमात्मतत्त्वके विचारमें स्थित रहनेवाले । २१. गर्मी मौसममें ऊपरसे सूर्यका और चारों ओरसे अग्निका ताप सहन करनेवाले ।

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५६६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे राजाको प्राप्त हो जाता है ॥ १४ ॥

सोऽयं ब्राह्मणभूयिष्ठो वानप्रस्थगणो महान् ।

त्वन्नाथोऽनाथवद् राम राक्षसैर्हन्यते भृशम् ॥ १५ ॥

' श्रीराम! इस वनमें रहनेवाला वानप्रस्थ महात्माओंका यह महान् समुदाय, जिसमें ब्राह्मणोंकी ही संख्या अधिक है तथा जिसके रक्षक आप ही हैं, राक्षसोंके द्वारा अनाथकी तरह मारा जा रहा है - इस मुनि - समुदायका बहुत अधिक मात्रामें संहार हो रहा है ॥ १५ ॥

एहि पश्य शरीराणि मुनीनां भावितात्मनाम् ।

हतानां राक्षसैर्घोरैर्बहूनां बहुधा वने ॥ १६ ॥

' आइये, देखिये, ये भयंकर राक्षसोंद्वारा बारम्बार अनेक प्रकारसे मारे गये बहुसंख्यक पवित्रात्मा मुनियोंके शरीर ( शव या कंकाल ) दिखायी देते हैं ॥ १६ ॥

पम्पानदीनिवासानामनुमन्दाकिनीमपि चित्रकूटालयानां च क्रियते कदनं महत् ॥ १७ ॥

' पम्पा सरोवर और उसके निकट बहनेवाली तुङ्गभद्रा नदीके तटपर जिनका निवास है, जो मन्दाकिनीके किनारे रहते हैं तथा जिन्होंने चित्रकूटपर्वतके किनारे अपना निवासस्थान बना लिया है, उन सभी ऋषि-महर्षियोंका राक्षसोंद्वारा महान् संहार किया जा रहा है ॥ १७ ॥

एवं वयं न मृष्यामो विप्रकारं तपस्विनाम् ।

क्रियमाणं वने घोरं रक्षोभिर्भीमकर्मभिः ॥ १८ ॥

' इन भयानक कर्म करनेवाले राक्षसोंने इस वनमें तपस्वी मुनियोंका जो ऐसा भयंकर विनाशकाण्ड मचा रखा है, वह हमलोगोंसे सहा नहीं जाता है ॥ १८ ॥

ततस्त्वां शरणार्थं च शरण्यं समुपस्थिताः ।

परिपालय नो राम वध्यमानान् निशाचरैः ॥ १ ९ ॥

' अतः इन राक्षसोंसे बचनेके लिये शरण लेनेके उद्देश्यसे हम आपके पास आये हैं । श्रीराम! आप शरणागतवत्सल हैं, अतः इन निशाचरोंसे मारे जाते हुए हम मुनियोंकी रक्षा कीजिये ॥ १ ९ ॥

परा त्वत्तो गतिर्वीर पृथिव्यां नोपपद्यते ।

परिपालय नः सर्वान् राक्षसेभ्यो नृपात्मज ॥ २० ॥

‘ वीर राजकुमार! इस भूमण्डलमें हमें आपसे

बढ़कर दूसरा कोई सहारा नहीं दिखायी देता । आप इन ।

राक्षसोंसे हम सबको बचाइये ' ॥ २० ॥

एतच्छ्रुत्वा तु काकुत्स्थस्तापसानां तपस्विनाम् ।

इदं प्रोवाच धर्मात्मा सर्वानेव तपस्विनः ॥२१ ॥

तपस्यामें लगे रहनेवाले उन तपस्वी मुनियोंकी ये बातें सुनकर ककुत्स्थकुलभूषण धर्मात्मा श्रीरामने उन सबसे कहा —॥२१ ॥

नैवमर्हथ मां वक्तुमाज्ञाप्योऽहं तपस्विनाम् ।

केवलेन स्वकार्येण प्रवेष्टव्यं वनं मया ॥ २२ ॥

' मुनिवरो! आपलोग मुझसे इस प्रकार प्रार्थना न करें । मैं तो तपस्वी महात्माओंका आज्ञापालक हूँ । मुझे केवल अपने ही कार्यसे वनमें तो प्रवेश करना ही है ( इसके साथ ही आपलोगोंकी सेवाका सौभाग्य भी मुझे प्राप्त हो जायगा ) ॥ २२ ॥

विप्रकारमपाक्रष्टुं राक्षसैर्भवतामिमम् ।

पितुस्तु निर्देशकरः प्रविष्टोऽहमिदं वनम् ॥ २३ ॥

' राक्षसोंके द्वारा जो आपको यह कष्ट पहुँच रहा है, इसे दूर करनेके लिये ही मैं पिताके आदेशका पालन करता हुआ इस वनमें आया हूँ ॥ २३ ॥

भवतामर्थसिद्ध्यर्थमागतोऽहं यदृच्छया ।

तस्य मेऽयं वने वासो भविष्यति महाफलः ॥ २४ ॥

‘ आपलोगोंके प्रयोजनकी सिद्धिके लिये मैं दैवात् यहाँ आ पहुँचा हूँ । आपकी सेवाका अवसर मिलने से मेरे लिये यह वनवास महान् फलदायक होगा ॥ २४ ॥

तपस्विनां रणे शत्रून् हन्तुमिच्छामि राक्षसान् ।

पश्यन्तु वीर्यमृषयः सभ्रातुर्मे तपोधनाः ॥ २५ ॥

‘ तपोधनो! मैं तपस्वी मुनियोंसे शत्रुता रखनेवाले उन राक्षसोंका युद्धमें संहार करना चाहता हूँ । आप सब महर्षि भाईसहित मेरा पराक्रम देखें ' ॥ २५ ॥

दत्त्वा वरं चापि तपोधनानां धर्मे धृतात्मा सह लक्ष्मणेन । तपोधनैश्चापि सहार्यदत्तः सुतीक्ष्णमेवाभिजगाम वीरः ॥ २६ ॥

इस प्रकार उन तपोधनोंको वर देकर धर्ममें मन लगानेवाले तथा श्रेष्ठ दान देनेवाले वीर श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मण तथा तपस्वी महात्माओंके साथ सुतीक्ष्ण मुनिके पास गये ॥ २६ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे षष्ठः सर्गः ॥ ६ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें छठा सर्ग पूरा हुआ ॥ ६ ॥

पृष्ठ 579

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अरण्यकाण्डे सप्तमः सर्गः ५६७ सप्तमः सीता और भ्रातासहित श्रीरामका बातचीत करना तथा उनसे

रामस्तु सहितो भ्रात्रा सीतया च परंतपः ।

सुतीक्ष्णस्याश्रमपदं जगाम सह तैर्द्विजैः ॥ १ ॥

शत्रुओंको संताप देनेवाले श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मण, सीता तथा उन ब्राह्मणोंके साथ सुतीक्ष्ण मुनिके आश्रमकी ओर चले ॥१ ॥

स गत्वा दूरमध्वानं नदीस्तीर्त्वा बहूदकाः ।

ददर्श विमलं शैलं महामेरुमिवोन्नतम् ॥ २ ॥

वे दूरतकका मार्ग तै करके अगाध जलसे भरी हुई बहुत - सी नदियोंको पार करते हुए जब आगे गये, तब उन्हें महान् मेरुगिरिके समान एक अत्यन्त ऊँचा पर्वत दिखायी दिया, जो बड़ा ही निर्मल था ॥ २ ॥

ततस्तदिक्ष्वाकुवरौ सततं विविधैर्दुमैः ।

काननं तौ विविशतुः सीतया सह राघवौ ॥ ३ ॥

वहाँसे आगे बढ़कर वे दोनों इक्ष्वाकुकुलके श्रेष्ठ वीर रघुवंशी बन्धु सीताके साथ नाना प्रकारके वृक्षोंसे भरे हुए एक वनमें पहुँचे ॥ ३ ॥

प्रविष्टस्तु वनं घोरं बहुपुष्पफलद्रुमम् ।

ददर्शाश्रममेकान्ते चीरमालापरिष्कृतम् ॥४ ॥

उस घोर वनमें प्रविष्ट हो श्रीरघुनाथजीने एकान्त स्थानमें एक आश्रम देखा, जहाँके वृक्ष प्रचुर फल-फूलोंसे लदे हुए थे । इधर - उधर टँगे हुए चीर वस्त्रोंके समुदाय उस आश्रमकी शोभा बढ़ाते थे ॥ ४ ॥

तत्र तापसमासीनं मलपङ्कजधारिणम् ।

रामः सुतीक्ष्णं विधिवत् तपोधनमभाषत ॥ ५ ॥

वहाँ आन्तरिक मलकी शुद्धिके लिये पद्मासन धारण किये सुतीक्ष्ण मुनि ध्यानमग्न होकर बैठे थे । श्रीरामने उन तपोधन मुनिके पास विधिवत् जाकर उनसे इस प्रकार कहा— ॥५ ॥

रामोऽहमस्मि भगवन् भवन्तं द्रष्टुमागतः ।

तन्माभिवद धर्मज्ञ महर्षे सत्यविक्रम ॥ ६ ॥

सर्गः सुतीक्ष्णके आश्रमपर जाकर उनसे सत्कृत हो रातमें वहीं ठहरना धीर महर्षि सुतीक्ष्णने अपनी दोनों भुजाओंसे उनका आलिङ्गन किया और इस प्रकार कहा- ॥ ७ ॥

स्वागतं ते रघुश्रेष्ठ राम सत्यभृतां वर ।

आश्रमोऽयं त्वयाऽऽक्रान्तः सनाथ इव साम्प्रतम् ॥ ८ ॥

‘ सत्यवादियोंमें श्रेष्ठ रघुकुलभूषण श्रीराम! आपका स्वागत है । इस समय आपके पदार्पण करनेसे यह आश्रम सनाथ हो गया ॥८ ॥

प्रतीक्षमाणस्त्वामेव नारोहेऽहं महायशः ।

देवलोकमितो वीर देहं त्यक्त्वा महीतले ॥ ९ ॥

' महायशस्वी वीर! मैं आपकी ही प्रतीक्षामें था, इसीलिये अबतक इस पृथ्वीपर अपने शरीरको त्यागकर मैं यहाँसे देवलोक ( ब्रह्मधाम ) में नहीं गया ॥ ९ ॥

चित्रकूटमुपादाय राज्यभ्रष्टोऽसि मे श्रुतः ।

इहोपयातः काकुत्स्थ देवराजः शतक्रतुः ॥ १० ॥

' मैंने सुना था कि आप राज्यसे भ्रष्ट हो चित्रकूट पर्वतपर आकर रहते हैं । काकुत्स्थ! यहाँ सौ यज्ञोंका अनुष्ठान करनेवाले देवराज इन्द्र आये थे ॥ १० ॥

उपागम्य च मे देवो महादेवः सुरेश्वरः ।

सर्वांल्लोकाञ्जितानाह मम पुण्येन कर्मणा ॥ ११ ॥

' वे महान् देवता देवेश्वर इन्द्रदेव मेरे पास आकर कह रहे थे कि ' तुमने अपने पुण्यकर्मके द्वारा समस्त शुभ लोकोंपर विजय पायी है'॥११ ॥

तेषु देवर्षिजुष्टेषु जितेषु तपसा मया ।

मत्प्रसादात् सभार्यस्त्वं विहरस्व सलक्ष्मणः ॥१२ ॥

' उनके कथनानुसार मैंने तपस्यासे जिन देवर्षिसेवित लोकोंपर अधिकार प्राप्त किया है, उन लोकोंमें आप सीता और लक्ष्मणके साथ विहार करें । मैं बड़ी प्रसन्नताके साथ वे सारे लोक आपकी सेवामें समर्पित करता हूँ ' ॥

तमुग्रतपसं दीप्तं महर्षि सत्यवादिनम् ।

प्रत्युवाचात्मवान् रामो ब्रह्माणमिव वासवः ॥ १३ ॥

‘ सत्यपराक्रमी धर्मज्ञ महर्षे! भगवन्! मैं राम हूँ जैसे इन्द्र ब्रह्माजीसे बात करते हैं, उसी प्रकार और यहाँ आपका दर्शन करनेके लिये आया हूँ, अतः मनस्वी श्रीरामने उन उग्र तपस्यावाले तेजस्वी एवं आप मुझसे बात कीजिये ' ॥ ६ ॥ सत्यवादी महर्षिको इस प्रकार उत्तर दिया – ॥ १३ ॥

स निरीक्ष्य ततो धीरो रामं धर्मभृतां वरम् । अहमेवाहरिष्यामि स्वयं लोकान् महामुने । समाश्लिष्य च बाहुभ्यामिदं वचनमब्रवीत् ॥ ७ ॥ आवासं त्वहमिच्छामि प्रदिष्टमिह कानने ॥ १४ ॥

धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ भगवान् श्रीरामका दर्शन करके ' महामुने! वे लोक तो मैं स्वयं ही आपको प्राप्त

पृष्ठ 580

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १, पृष्ठ 580 का मूल पृष्ठ
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५६८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे कराऊँगा, इस समय तो मेरी यह इच्छा है कि आप । बतावें कि मैं इस वनमें अपने ठहरनेके लिये कहाँ कुटिया बनाऊँ? ॥ १४ ॥

भवान् सर्वत्र कुशलः सर्वभूतहिते रतः ।

आख्यातं शरभङ्गेन गौतमेन महात्मना ॥ १५ ॥

' आप समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर तथा इहलोक और परलोककी सभी बातोंके ज्ञानमें निपुण हैं, यह बात मुझसे गौतमगोत्रीय महात्मा शरभङ्गने कही थी ' ॥ १५ ॥

एवमुक्तस्तु रामेण महर्षिर्लोकविश्रुतः ।

अब्रवीन्मधुरं वाक्यं हर्षेण महता युतः ॥ १६ ॥

श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर उन लोकविख्यात महर्षिने बड़े हर्षके साथ मधुर वाणीमें कहा- ॥ १६ ॥

अयमेवाश्रमो राम गुणवान् रम्यतामिति ।

ऋषिसंघानुचरितः सदा मूलफलैर्युतः ॥ १७ ॥

' श्रीराम! यही आश्रम सब प्रकारसे गुणवान् ( सुविधाजनक ) है, अतः आप यहीं सुखपूर्वक निवास कीजिये । यहाँ ऋषियोंका समुदाय सदा आता - जाता रहता है और फल -मूल भी सर्वदा सुलभ होते हैं ॥ १७ ॥

इममाश्रममागम्य मृगसंघा महीयसः ।

अहत्वा प्रतिगच्छन्ति लोभयित्वाकुतोभयाः ॥ १८ ॥

' इस आश्रमपर बड़े - बड़े मृगोंके झुंड आते और अपने रूप, कान्ति एवं गतिसे मनको लुभाकर किसीको कष्ट दिये बिना ही यहाँसे लौट जाते हैं । उन्हें यहाँ किसीसे कोई भय नहीं प्राप्त होता है ॥ १८ ॥

नान्यो दोषो भवेदत्र मृगेभ्योऽन्यत्र विद्धि वै ।

तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य महर्षेर्लक्ष्मणाग्रजः ॥ १ ९ ॥

उवाच वचनं धीरो विगृह्य सशरं धनुः । ‘ इस आश्रममें मृगोंके उपद्रवके सिवा और कोई दोष नहीं है, यह आप निश्चितरूपसे जान लें । ' महर्षिका यह वचन सुनकर लक्ष्मणके बड़े भाई धीर - वीर भगवान् श्रीरामने हाथमें धनुष - बाण लेकर कहा— ॥ १ ९ ३ ॥ तानहं सुमहाभाग मृगसंघान् समागतान् ॥२० ॥

हयां निशितधारेण शरेणानतपर्वणा ।

भवांस्तत्राभिषज्येत किं स्यात् कृच्छ्रतरं ततः ॥ २१ ॥

' महाभाग! यहाँ आये हुए उन उपद्रवकारी मृगसमूहोंको यदि मैं झुकी हुई गाँठ और तीखी धारवाले बाणसे मार डालूँ तो इसमें आपका अपमान होगा । यदि ऐसा हुआ तो इससे बढ़कर कष्टकी बात मेरे लिये और क्या हो सकती है? ॥ २०-२१ ॥

एतस्मिन्नाश्रमे वासं चिरं तु न समर्थये ।

तमेवमुक्त्वोपरमं रामः संध्यामुपागमत् ॥ २२ ॥

' इसलिये मैं इस आश्रममें अधिक समय नहीं निवास करना चाहता । ' मुनिसे ऐसा कहकर मौन हो श्रीरामचन्द्रजी संध्योपासना करने चले गये ॥ २२ ॥

अन्वास्य पश्चिमां संध्यां तत्र वासमकल्पयत् ।

सुतीक्ष्णस्याश्रमे रम्ये सीतया लक्ष्मणेन च ॥ २३ ॥

सायंकालकी संध्योपासना करके श्रीरामने सीता और लक्ष्मणके साथ सुतीक्ष्ण मुनिके उस रमणीय आश्रममें निवास किया ॥ २३ ॥

ततः शुभं तापसयोग्यमन्नं स्वयं सुतीक्ष्णः पुरुषर्षभाभ्याम् । ताभ्यां सुसत्कृत्य ददौ महात्मा संध्यानिवृत्तौ रजनीं समीक्ष्य ॥ २४ ॥

संध्याका समय बीतनेपर रात हुई देख महात्मा सुतीक्ष्णने स्वयं ही तपस्वी - जनोंके सेवन करने योग्य शुभ अन्न ले आकर उन दोनों पुरुषशिरोमणि बन्धुओंको । बड़े सत्कारके साथ अर्पित किया ॥ २४ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे सप्तमः सर्गः ॥ ७ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें सातवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ७ ॥

अष्टमः सर्गः प्रातःकाल सुतीक्ष्णसे विदा ले श्रीराम, लक्ष्मण, सीताका वहाँसे प्रस्थान रामस्तु सहसौमित्रिः सुतीक्ष्णेनाभिपूजितः । उत्थाय च यथाकालं राघवः सह सीतया । परिणाम्य निशां तत्र प्रभाते प्रत्यबुध्यत ॥ १ ॥ उपस्पृश्य सुशीतेन तोयेनोत्पलगन्धिना ॥ २ ॥

सुतीक्ष्णके द्वारा भलीभाँति पूजित हो लक्ष्मणसहित अथ तेऽग्निं सुरांश्चैव वैदेही रामलक्ष्मणौ । श्रीराम उनके आश्रममें ही रात बिताकर प्रातः काल जाग उठे ॥ | काल्यं विधिवदभ्यर्च्य तपस्विशरणे वने ॥ ३ ॥