वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ — पृष्ठ 611–620
वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 611–620
पृष्ठ 611
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अरण्यकाण्डे एकोनविंशः सर्गः ५ ९९
बताओ, जिस उद्दण्डने वनमें तुमपर बलपूर्वक आक्रमण ।
करके तुम्हें परास्त किया है ' ॥१२ ॥
इति भ्रातुर्वचः श्रुत्वा क्रुद्धस्य च विशेषतः ।
ततः शूर्पणखा वाक्यं सबाष्पमिदमब्रवीत् ॥ १३ ॥
भाईका विशेषतः क्रोधमें भरे हुए भाई खरका यह वचन सुनकर शूर्पणखा नेत्रोंसे आँसू बहाती हुई इस प्रकार बोली- ॥ १३ ॥
तरुणौ रूपसम्पन्नौ सुकुमारौ महाबलौ ।
पुण्डरीकविशालाक्षौ चीरकृष्णाजिनाम्बरौ ॥ १४ ॥
' भैया! वनमें दो तरुण पुरुष आये हैं, जो देखने में बड़े ही सुकुमार, रूपवान् और महान् बलवान् हैं । उन दोनोंके बड़े - बड़े नेत्र ऐसे जान पड़ते हैं मानो खिले हुए कमल हों । वे दोनों ही वल्कल - वस्त्र और मृगचर्म पहने हुए हैं ॥ १४ ॥
फलमूलाशनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ ।
पुत्रौ दशरथस्यास्तां भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥ १५ ॥
' फल और मूल ही उनका भोजन है । वे जितेन्द्रिय, तपस्वी और ब्रह्मचारी हैं । दोनों ही राजा दशरथके पुत्र और आपसमें भाई - भाई हैं । उनके नाम राम और लक्ष्मण हैं ॥ १५ ॥
गन्धर्वराजप्रतिमौ पार्थिवव्यञ्जनान्वितौ ।
देवौ वा दानवावेतौ न तर्कयितुमुत्सहे ॥ १६ ॥
' वे दो गन्धर्वराजोंके समान जान पड़ते हैं और राजोचित लक्षणोंसे सम्पन्न हैं । ये दोनों भाई देवता अथवा दानव हैं, यह मैं अनुमानसे भी नहीं जान सकती ॥ १६ ॥
तरुणी रूपसम्पन्ना सर्वाभरणभूषिता ।
दृष्टा तत्र मया नारी तयोर्मध्ये सुमध्यमा ॥ १७ ॥
' उन दोनोंके बीच एक तरुण अवस्थावाली रूपवती स्त्री भी वहाँ देखी है, जिसके शरीरका मध्यभाग बड़ा ही सुन्दर है । वह सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित है ॥
ताभ्यामुभाभ्यां सम्भूय प्रमदामधिकृत्य ताम् ।
इमामवस्थां नीताहं यथानाथासती तथा ॥ १८ ॥
' उस स्त्रीके ही कारण उन दोनोंने मिलकर मेरी एक अनाथ और कुलटा स्त्रीकी भाँति ऐसी दुर्गति की है ॥
तस्याश्चानृजुवृत्तायास्तयोश्च हतयोरहम् ।
सफेनं पातुमिच्छामि रुधिरं रणमूर्धनि ॥ १ ९ ॥
' मैं युद्धमें उस कुटिल आचारवाली स्त्रीके और उन दोनों राजकुमारोंके भी मारे जानेपर उनका फेनसहित रक्त पीना चाहती हूँ ॥ १ ९ ॥
एष मे प्रथमः कामः कृतस्तत्र त्वया भवेत् ।
तस्यास्तयोश्च रुधिरं पिबेयमहमाहवे ॥ २० ॥
' रणभूमिमें उस स्त्रीका और उन पुरुषोंका भी रक्त मैं पी सकूँ - यह मेरी पहली और प्रमुख इच्छा है, जो तुम्हारे द्वारा पूर्ण की जानी चाहिये ॥ २० ॥
इति तस्यां ब्रुवाणायां चतुर्दश महाबलान् ।
व्यादिदेश खरः क्रुद्धो राक्षसानन्तकोपमान् ॥ २१ ॥
शूर्पणखाके ऐसा कहनेपर खरने कुपित होकर अत्यन्त बलवान् चौदह राक्षसोंको, जो यमराजके समान भयंकर थे, यह आदेश दिया- ॥ २१ ॥
मानुषौ शस्त्रसम्पन्नौ चीरकृष्णाजिनाम्बरौ ।
प्रविष्टौ दण्डकारण्यं घोरं प्रमदया सह ॥ २२ ॥
' वीरो! इस भयंकर दण्डकारण्यके भीतर चीर और काला मृगचर्म धारण किये दो शस्त्रधारी मनुष्य एक युवती स्त्रीके साथ घुस आये हैं ॥ २२ ॥
तौ हत्वा तां च दुर्वृत्तामुपावर्तितुमर्हथ ।
इयं च भगिनी तेषां रुधिरं मम पास्यति ॥ २३ ॥
' तुमलोग वहाँ जाकर पहले उन दोनों पुरुषोंको मार डालो; फिर उस दुराचारिणी स्त्रीके भी प्राण ले लो । मेरी यह बहिन उन तीनोंका रक्त पीयेगी ॥ २३ ॥
मनोरथोऽयमिष्टोऽस्या भगिन्या मम राक्षसाः ।
शीघ्रं सम्पाद्यतां गत्वा तौ प्रमथ्य स्वतेजसा ॥ २४ ॥
' राक्षसो! मेरी इस बहिनका यह प्रिय मनोरथ है । तुम वहाँ जाकर अपने प्रभावसे उन दोनों मनुष्योंको मार गिराओ और बहिनके इस मनोरथको शीघ्र पूरा करो ॥
युष्माभिर्निहतौ दृष्ट्वा तावुभौ भ्रातरौ रणे ।
इयं प्रहृष्टा मुदिता रुधिरं युधि पास्यति ॥ २५ ॥
' रणभूमिमें उन दोनों भाइयोंको तुम्हारे द्वारा मारा गया देख यह हर्षसे खिल उठेगी और आनन्दमग्न होकर युद्धस्थलमें उनका रक्त पान करेगी ' ॥ २५ ॥
इति प्रतिसमादिष्टा राक्षसास्ते चतुर्दश ।
तत्र जग्मुस्तया सार्धं घना वातेरिता इव ॥ २६ ॥
खरकी ऐसी आज्ञा पाकर वे चौदहों राक्षस हवाके उड़ाये हुए बादलोंके समान विवश हो शूर्पणखाके साथ । पञ्चवटीको गये ॥ २६ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे एकोनविंशः सर्गः ॥ १ ९ ॥ इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें उन्नीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १ ९ ॥
पृष्ठ 612
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
६०० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे विंशः सर्गः श्रीरामद्वारा खरके भेजे हुए चौदह राक्षसोंका वध
ततः शूर्पणखा घोरा राघवाश्रममागता ।
राक्षसानाचचक्षे तौ भ्रातरौ सह सीतया ॥ १ ॥
तदनन्तर भयानक राक्षसी शूर्पणखा श्रीरामचन्द्रजीके आश्रमपर आयी । उसने सीतासहित उन दोनों भाइयोंका उन राक्षसोंको परिचय दिया ॥ १ ॥
ते रामं पर्णशालायामुपविष्टं महाबलम् ।
ददृशुः सीतया सार्धं लक्ष्मणेनापि सेवितम् ॥ २ ॥
राक्षसोंने देखा — महाबली श्रीराम सीताके साथ पर्णशालामें बैठे हैं और लक्ष्मण भी उनकी सेवामें उपस्थित हैं ॥२ ॥
तां दृष्ट्वा राघवः श्रीमानागतांस्तांश्च राक्षसान् ।
अब्रवीद् भ्रातरं रामो लक्ष्मणं दीप्ततेजसम् ॥ ३ ॥
इधर श्रीमान् रघुनाथजीने भी शूर्पणखा तथा उसके साथ आये हुए उन राक्षसोंको भी देखा । देखकर वे उद्दीत तेजवाले अपने भाई लक्ष्मणसे इस प्रकार बोले - ॥ ३ ॥
मुहूर्तं भव सौमित्रे सीतायाः प्रत्यनन्तरः ।
इमानस्या af धष्यामि पदवीमागतानिह ॥४ ॥
' सुमित्राकुमार! तुम थोड़ी देरतक सीताके पास खड़े हो जाओ । मैं इस राक्षसीके सहायक बनकर पीछे - पीछे आये हुए इन निशाचरोंका यहाँ अभी वध कर डालूँगा ' ॥ ४ ॥
वाक्यमेतत् ततः श्रुत्वा रामस्य विदितात्मनः ।
तथेति लक्ष्मणो वाक्यं राघवस्य प्रपूजयन् ॥ ५ ॥
अपने स्वरूपको समझनेवाले श्रीरामचन्द्रजीकी यह बात सुनकर लक्ष्मणने इसकी भूरि - भूरि सराहना करते हुए ' तथास्तु ' कहकर उनकी आज्ञा शिरोधार्य की ॥ ५ ॥
राघवोऽपि महच्चापं चामीकरविभूषितम् ।
चकार सज्यं धर्मात्मा तानि रक्षांसि चाब्रवीत् ॥ ६ ॥
तब धर्मात्मा रघुनाथजीने अपने सुवर्णमण्डित विशाल धनुषपर प्रत्यञ्चा चढ़ायी और उन राक्षसोंसे कहा- ॥
पुत्रौ दशरथस्यावां भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ।
प्रविष्टौ सीतया सार्धं दुश्चरं दण्डकावनम् ॥ ७ ॥
फलमूलाशनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ ।
वसन्तौ दण्डकारण्ये किमर्थमुपहिंसथ ॥ ८ ॥
' हम दोनों भाई राजा दशरथके पुत्र राम और लक्ष्मण हैं तथा सीताके साथ इस दुर्गम दण्डकारण्यमें । आकर फल - मूलका आहार करते हुए इन्द्रियसंयमपूर्वक तपस्यामें संलग्न हैं और ब्रह्मचर्यका पालन करते हैं । इस प्रकार दण्डकवनमें निवास करनेवाले हम दोनों भाइयोंकी तुम किसलिये हिंसा करना चाहते हो? ॥ ७-८ ॥
युष्मान् पापात्मकान् हन्तुं विप्रकारान् महाहवे ।
ऋषीणां तु नियोगेन सम्प्राप्तः सशरासनः॥९ ॥
' देखो, तुम सब - के - सब पापात्मा तथा ऋषियों का अपराध करनेवाले हो । उन ऋषि - मुनियोंकी आज्ञासे ही मैं धनुष - बाण लेकर महासमरमें तुम्हारा वध करनेके लिये यहाँ आया हूँ॥९॥
तिष्ठतैवात्र संतुष्टा नोपवर्तितुमर्हथ ।
यदि प्राणैरिहार्थो वो निवर्तध्वं निशाचराः ॥१० ॥
' निशाचरो! यदि तुम्हें युद्धसे संतोष प्राप्त होता हो तो यहाँ खड़े ही रहो, भाग मत जाना और यदि तुम्हें प्राणोंका लोभ हो तो लौट जाओ ( एक क्षणके लिये भी यहाँ न रुको ) ' ॥ १० ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा राक्षसास्ते चतुर्दश ।
ऊचुर्वांचं सुसंक्रुद्धा ब्रह्मघ्नाः शूलपाणयः ॥११ ॥
संरक्तनयना घोरा रामं संरक्तलोचनम् ।
परुषा मधुराभाषं हृष्टा दृष्टपराक्रमम् ॥ १२ ॥
श्रीरामकी यह बात सुनकर वे चौदहों राक्षस अत्यन्त कुपित हो उठे । ब्राह्मणोंकी हत्या करनेवाले वे घोर निशाचर हाथोंमें शूल लिये क्रोधसे लाल आँखें करके कठोर वाणीमें हर्ष और उत्साहके साथ स्वभावतः लाल नेत्रोंवाले मधुरभाषी श्रीरामसे, जिनका पराक्रम वे देख चुके थे, यों बोले - ॥ ११-१२ ॥
क्रोधमुत्पाद्य नो भर्तुः खरस्य सुमहात्मनः ।
त्वमेव हास्यसे प्राणान् सद्योऽस्माभिर्हतो युधि ॥ १३ ॥
' अरे! तूने हमारे स्वामी महाकाय खरको क्रोध दिलाया है; अतः हमलोगोंके हाथसे युद्धमें मारा जाकर तू स्वयं ही तत्काल अपने प्राणोंसे हाथ धो बैठेगा ॥ १३ ॥
का हि ते शक्तिरेकस्य बहूनां रणमूर्धनि ।
अस्माकमग्रतः स्थातुं किं पुनर्योद्धुमाहवे ॥ १४ ॥
' हम बहुत - से हैं और तू अकेला, तेरी क्या शक्ति है कि तू हमारे सामने रणभूमिमें खड़ा भी रह सके, फिर युद्ध करना तो दूरकी बात है ॥ १४ ॥
पृष्ठ 613
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अरण्यकाण्डे एकविंशः सर्गः ६०१
एभिर्बाहुप्रयुक्तैश्च परिघैः शूलपट्टिशैः ।
प्राणांस्त्यक्ष्यसि वीर्यं च धनुश्च करपीडितम् ॥ १५ ॥
' हमारी भुजाओंद्वारा छोड़े गये इन परिघों, शूलों और पट्टिशोंकी मार खाकर तू अपने हाथमें दबाये हुए इस धनुषको, बल - पराक्रमके अभिमानको तथा अपने प्राणोंको भी एक साथ ही त्याग देगा ' ॥ १५ ॥
इत्येवमुक्त्वा संरब्धा राक्षसास्ते चतुर्दश ।
उद्यतायुधनिस्त्रिशा राममेवाभिदुद्रुवुः ॥ १६ ॥
ऐसा कहकर क्रोधमें भरे हुए वे चौदहों राक्षस । तरह - तरहके आयुध और तलवारें लिये श्रीरामपर ही टूट पड़े ॥१६ ॥
चिक्षिपुस्तानि शूलानि राघवं प्रति दुर्जयम् ।
तानि शूलानि काकुत्स्थः समस्तानि चतुर्दश ॥ १७ ॥
तावद्भिरेव चिच्छेद शरैः काञ्चनभूषितैः । उन राक्षसोंने दुर्जय वीर श्रीराघवेन्द्रपर वे शूल चलाये, परंतु ककुत्स्थकुलभूषण श्रीरामचन्द्रजीने उन समस्त चौदहों शूलोंको उतने ही सुवर्णभूषित बाणोंद्वारा काट डाला ॥ १७३ ॥
ततः पश्चान्महातेजा नाराचान् सूर्यसंनिभान् ॥ १८ ॥
जग्राह परमक्रुद्धश्चतुर्दश शिलाशितान् ।
गृहीत्वा धनुरायम्य लक्ष्यानुद्दिश्य राक्षसान् ॥ १ ९ ॥
मुमोच राघवो बाणान् वज्रानिव शतक्रतुः । तत्पश्चात् महातेजस्वी रघुनाथजीने अत्यन्त कुपित हो शानपर चढ़ाकर तेज किये गये सूर्यतुल्य तेजस्वी चौदह नाराच हाथमें लिये । फिर धनुष लेकर उसपर उन बाणोंको रखा और कानतक खींचकर राक्षसोंको लक्ष्य करके छोड़ दिया । मानो इन्द्रने वज्रोंका प्रहार किया हो ॥ १८-१९ ३ ॥ ते भित्त्वा रक्षसां वेगाद् वक्षांसि रुधिरप्लुताः ॥ २० ॥
विनिष्पेतुस्तदा भूमौ वल्मीकादिव पन्नगाः । वे बाण बड़े वेगसे उन राक्षसोंकी छाती छेदकर रुधिरमें डूबे हुए निकले और बाँबीसे बाहर आये हुए सर्पोंकी भाँति तत्काल पृथ्वीपर गिर पड़े ॥२०३ ॥
तैर्भग्नहृदया भूमौ छिन्नमूला इव द्रुमाः ॥ २१ ॥
निपेतुः शोणितस्नाता विकृता विगतासवः । उन नाराचोंसे हृदय विदीर्ण हो जानेके कारण वे राक्षस जड़से कटे हुए वृक्षोंकी भाँति धराशायी हो गये । वे सब - के - सब खूनसे नहा गये थे । उनके शरीर विकृत हो गये थे । उस अवस्थामें उनके प्राणपखेरू उड़ गये ॥ २१३ ॥
तान् भूमौ पतितान् दृष्ट्वा राक्षसी क्रोधमूर्च्छिता ॥ २२ ॥
उपगम्य खरं सा तु किंचित्संशुष्कशोणिता ।
पपात पुनरेवार्ता सनिर्यासेव वल्लरी ॥ २३ ॥
उन सबको पृथ्वीपर पड़ा देख वह राक्षसी क्रोधसे मूच्छित हो गयी और खरके पास जाकर पुनः आर्तभावसे गिर पड़ी । उसके कटे हुए कानों और नाकका खून सूख गया था, इसलिये गोंदयुक्त लताके समान प्रतीत होती थी ॥ २२-२३ ॥
भ्रातुः समीपे शोकार्ता ससर्ज निनदं महत् ।
सस्वरं मुमुचे बाष्पं विवर्णवदना तदा ॥२४ ॥
भाईके निकट शोकसे पीड़ित हुई शूर्पणखा बड़े जोरसे आर्तनाद करने और फूट - फूटकर रोने तथा आँसू बहाने लगी । उस समय उसके मुखकी कान्ति फीकी पड़ गयी थी ॥ २४ ॥
निपातितान् प्रेक्ष्य रणे तु राक्षसान् प्रधाविता शूर्पणखा पुनस्ततः । वधं च तेषां निखिलेन रक्षसां शशंस सर्वं भगिनी खरस्य सा ॥ २५ ॥
रणभूमिमें उन राक्षसोंको मारा गया देख खरकी बहिन शूर्पणखा पुनः वहाँसे भागी हुई आयी । उसने उन समस्त राक्षसोंके वधका सारा समाचार भाईसे कह | सुनाया ॥ २५ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे विंशः सर्गः ॥२० ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें बीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ २० ॥
एकविंशः सर्गः शूर्पणखाका खरके पास आकर उन राक्षसोंके वधका समाचार बताना और रामका भय दिखाकर उसे युद्धके लिये उत्तेजित करना स पुनः पतितां दृष्ट्वा क्रोधाच्छूर्पणखां पुनः । शूर्पणखाको पुनः पृथ्वीपर पड़ी हुई देख उवाच व्यक्तया वाचा तामनर्थार्थमागताम् ॥ १ ॥ अनर्थके लिये आयी हुई उस बहिनसे खरने क्रोधपूर्वक
पृष्ठ 614
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
६०२ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे स्पष्ट वाणीमें फिर कहा- ॥ १ ॥ ।
मया त्विदानीं शूरास्ते राक्षसाः पिशिताशनाः ।
त्वत्प्रियार्थं विनिर्दिष्टाः किमर्थं रुद्यते पुनः ॥ २ ॥
' बहिन! मैंने तुम्हारा प्रिय करनेके लिये उस समय बहुत - से शूरवीर एवं मांसाहारी राक्षसोंको जानेकी आज्ञा दे दी थी, अब फिर तुम किसलिये रो रही हो? ॥ २ ॥
भक्ताश्चैवानुरक्ताश्च हिताश्च मम नित्यशः ।
हन्यमाना न हन्यन्ते न न कुर्युर्वचो मम ॥ ३ ॥
' मैंने जिन राक्षसोंको भेजा था, वे मेरे भक्त, मुझमें अनुराग रखनेवाले और सदा मेरा हित चाहनेवाले हैं । वे किसीके मारनेपर भी मर नहीं सकते । उनके द्वारा मेरी आज्ञाका पालन न हो, यह भी सम्भव नहीं है ॥ ३ ॥
किमेतच्छ्रोतुमिच्छामि कारणं यत्कृते पुनः ।
हा नाथेति विनर्दन्ती सर्पवच्चेष्टसे क्षितौ ॥ ४ ॥
' फिर ऐसा कौन - सा कारण उपस्थित हो गया, जिसके लिये तुम ' हा नाथ ' की पुकार मचाती हुई साँपकी तरह धरतीपर लोट रही हो । मैं उसे सुनना चाहता हूँ ॥४ ॥
अनाथवद् विलपसि किं नु नाथे मयि स्थिते ।
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ मा मैवं वैक्लव्यं त्यज्यतामिति ॥ ५ ॥
' मेरे - जैसे संरक्षकके रहते हुए तुम अनाथकी तरह विलाप क्यों करती हो? उठो! उठो!! इस तरह लोटो मत । घबराहट छोड़ दो ' ॥५ ॥
इत्येवमुक्ता दुर्धर्षा खरेण परिसान्त्विता ।
विमृज्य नयने सास्त्रे खरं भ्रातरमब्रवीत् ॥ ६ ॥
खरके इस प्रकार सान्त्वना देनेपर वह दुर्धर्ष राक्षसी अपने आँसूभरे नेत्रोंको पोंछकर भाई खरसे बोली- ॥
अस्मीदानीमहं प्राप्ता हतश्रवणनासिका ।
शोणितौघपरिक्लिन्ना त्वया च परिसान्त्विता ॥ ७ ॥
' भैया मैं इस समय फिर तुम्हारे पास क्यों आयी हूँ — यह बताती हूँ, सुनो - मेरे नाक - कान कट गये और मैं खूनकी धारासे नहा उठी, उस अवस्थामें जब पहली बार मैं आयी थी, तब तुमने मुझे बड़ी सान्त्वना दी थी ॥ ७ ॥
प्रेषिताश्च त्वया शूरा राक्षसास्ते चतुर्दश ।
निहन्तुं राघवं घोरं मत्प्रियार्थं सलक्ष्मणम् ॥ ८ ॥
ते तु रामेण सामर्षाः शूलपट्टिशपाणयः ।
समरे निहताः सर्वे सायकैर्मर्मभेदिभिः ॥ ९ ॥
' तत्पश्चात् मेरा प्रिय करनेके लिये लक्ष्मणसहित । रामका वध करनेके उद्देश्यसे तुमने जो वे चौदह शूरवीर राक्षस भेजे थे, वे सब - के - सब अमर्ष भरकर हाथोंमें शूल और पट्टिश लिये वहाँ जा पहुँचे, परंतु रामने अपने मर्मभेदी बाणोंद्वारा उन सबको समराङ्गणमें मार गिराया ॥ ८ - ९ ॥
तान् भूमौ पतितान् दृष्ट्वा क्षणेनैव महाजवान् ।
रामस्य च महत्कर्म महांस्त्रासोऽभवन्मम ॥ १० ॥
' उन महान् वेगशाली निशाचरोंको क्षणभरमें ही धराशायी हुआ देख रामके उस महान् पराक्रमपर दृष्टिपात करके मेरे मनमें बड़ा भय उत्पन्न हो गया ॥
सास्मि भीता समुद्विग्ना विषण्णा च निशाचर ।
शरणं त्वां पुनः प्राप्ता सर्वतो भयदर्शिनी ॥ ११ ॥
' निशाचरराज! मैं भयभीत, उद्विग्न और विषादग्रस्त हो गयी हूँ । मुझे सब ओर भय - ही- भय दिखायी देता है, इसीलिये फिर तुम्हारी शरणमें आयी हूँ ॥ ११ ॥
विषादनक्राध्युषिते परित्रासोर्मिमालिनि ।
किं मां न त्रायसे मग्नां विपुले शोकसागरे ॥ १२ ॥
' मैं शोकके उस विशाल समुद्रमें डूब गयी हूँ, जहाँ विषादरूपी मगर निवास करते हैं और त्रासकी तरङ्गमालाएँ उठती रहती हैं । तुम उस शोकसागरसे मेरा उद्धार क्यों नहीं करते हो? ॥ १२ ॥
एते च निहता भूमौ रामेण निशितैः शरैः ।
ये च मे पदवीं प्राप्ता राक्षसाः पिशिताशनाः ॥ १३ ॥
' जो मांसभक्षी राक्षस मेरे साथ गये थे, वे सब-के - सब रामके पैने बाणोंसे मारे जाकर पृथ्वीपर पड़े हैं ॥
मयि ते यद्यनुक्रोशो यदि रक्षःसु तेषु च ।
रामेण यदि शक्तिस्ते तेजो वास्ति निशाचर ॥ १४ ॥
दण्डकारण्यनिलयं जहि राक्षसकण्टकम् । ' राक्षसराज! यदि मुझपर और उन मरे हुए राक्षसोंपर तुम्हें दया आती हो तथा यदि रामके साथ लोहा लेनेके लिये तुममें शक्ति और तेज हो तो उन्हें मार डालो; क्योंकि दण्डकारण्यमें घर बनाकर रहनेवाले राम राक्षसोंके लिये कण्टक हैं ॥ १४३ ॥
यदि रामममित्रघ्नं न त्वमद्य वधिष्यसि ॥ १५ ॥
तव चैवाग्रतः प्राणांस्त्यक्ष्यामि निरपत्रपा । ' यदि तुम आज ही शत्रुघाती रामका वध नहीं कर डालोगे तो मैं तुम्हारे सामने ही अपने प्राण त्याग दूँगी; क्योंकि मेरी लाज लुट चुकी है ॥ १५३ ॥
बुद्धयाहमनुपश्यामि न त्वं रामस्य संयुगे ॥ १६ ॥
स्थातुं प्रतिमुखे शक्तः सबलोऽपि महारणे ।
पृष्ठ 615
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अरण्यकाण्डे ' मैं बुद्धिसे बारंबार सोचकर देखती हूँ कि तुम महासमरमें सबल होकर भी रामके सामने युद्धमें नहीं ठहर सकोगे ॥ १६३ ॥
शूरमानी न शूरस्त्वं मिथ्यारोपितविक्रमः ॥ १७ ॥
अपयाहि जनस्थानात् त्वरितः सहबान्धवः ।
जहि त्वं समरे मूढान्यथा तु कुलपांसन ॥ १८ ॥
' तुम अपनेको शूरवीर मानते हो, किंतु तुममें शौर्य है ही नहीं । तुमने झूठे ही अपने - आपमें पराक्रमका आरोप कर लिया है । मूढ़! तुम समराङ्गणमें उन दोनोंको मार डालो अन्यथा अपने कुलमें कलङ्क लगाकर भाई - बन्धुओंके साथ तुरंत ही इस जनस्थानसे भाग जाओ ॥ १७-१८ ॥
मानुषौ तौ न शक्नोषि हन्तुं वै रामलक्ष्मणौ ।
निःसत्त्वस्याल्पवीर्यस्य वासस्ते कीदृशस्त्विह ॥ १ ९ ॥
' राम और लक्ष्मण मनुष्य हैं, यदि उन्हें भी मारनेकी तुममें शक्ति नहीं है तो तुम्हारे जैसे निर्बल द्वाविंशः सर्गः ६०३ | और पराक्रमशून्य राक्षसका यहाँ रहना कैसे सम्भव हो सकता है? ॥ १ ९ ॥
रामतेजोऽभिभूतो हि त्वं क्षिप्रं विनशिष्यसि ।
स हि तेजः समायुक्तो रामो दशरथात्मजः ॥ २० ॥
भ्राता चास्य महावीर्यो येन चास्मि विरूपिता । ' तुम रामके तेजसे पराजित होकर शीघ्र ही नष्ट हो जाओगे; क्योंकि दशरथकुमार राम बड़े तेजस्वी हैं । उनका भाई भी महान् पराक्रमी है, जिसने मुझे नाक-कानसे हीन करके अत्यन्त कुरूप बना दिया ' ॥ २०३ ॥
एवं विलप्य बहुशो राक्षसी प्रदरोदरी ॥ २१ ॥
भ्रातुः समीपे शोकार्ता नष्टसंज्ञा बभूव ह ।
कराभ्यामुदरं हत्वा रुरोद भृशदुःखिता ॥ २२ ॥
इस प्रकार बहुत विलाप करके गुफाके समान गहरे | पेटवाली वह राक्षसी शोकसे आतुर हो अपने भाईके पास मूर्च्छित - सी हो गयी और अत्यन्त दुःखी हो दोनों हाथोंसे । पेट पीटती हुई फूट - फूटकर रोने लगी ॥ २१-२२ ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे एकविंशः सर्गः ॥ २१ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें इक्कीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ २१ ॥
द्वाविंशः सर्गः चौदह हजार राक्षसोंकी सेनाके साथ खर - दूषणका जनस्थानसे पञ्चवटीकी ओर प्रस्थान
एवमाधर्षितः शूरः शूर्पणख्या खरस्ततः ।
उवाच रक्षसां मध्ये खरः खरतरं वचः ॥ १ ॥
शूर्पणखाद्वारा इस प्रकार तिरस्कृत होकर शूरवीर खरने राक्षसोंके बीच अत्यन्त कठोर वाणीमें कहा- ॥ १ ॥
` तवापमानप्रभवः क्रोधोऽयमतुलो मम ।
न शक्यते धारयितुं लवणाम्भ इवोल्बणम् ॥ २ ॥
' बहिन! तुम्हारे अपमानके कारण मुझे बेतरह । क्रोध चढ़ आया है । इसे धारण करना या दबा देना उसी प्रकार असम्भव है, जैसे पूर्णिमाको प्रचण्ड वेगसे बढ़े हुए खारे पानीके समुद्रके जलको ( अथवा यह उसी प्रकार असह्य है, जैसे घावपर नमकीन पानीका छिड़कना ) ॥ २ ॥
न रामं गणये वीर्यान्मानुषं क्षीणजीवितम् ।
आत्मदुश्चरितैः प्राणान् हतो योऽद्य विमोक्ष्यते ॥ ३ ॥
' मैं पराक्रमकी दृष्टिसे रामको कुछ भी नहीं गिनता हूँ; क्योंकि उस मनुष्यका जीवन अब क्षीण हो । चला है । वह अपने दुष्कर्मोंसे ही मारा जाकर आज प्राणोंसे हाथ धो बैठेगा ॥ ३ ॥
बाष्पः संधार्यतामेष सम्भ्रमश्च विमुच्यताम् ।
अहं रामं सह भ्रात्रा नयामि यमसादनम् ॥ ४ ॥
' तुम अपने. आँसुओंको रोको और यह घबराहट छोड़ो । मैं भाईसहित रामको अभी यमलोक पहुँचा देता हूँ ॥ ४ ॥
परश्वधहतस्याद्य मन्दप्राणस्य भूतले ।
रामस्य रुधिरं रक्तमुष्णं पास्यसि राक्षसि ॥५ ॥
' राक्षसी! आज मेरे फरसेकी मारसे निष्प्राण होकर धरतीपर पड़े हुए रामका गरम - गरम रक्त तुम्हें पीनेको मिलेगा ' ॥ ५ ॥
सम्प्रहृष्टा वचः श्रुत्वा खरस्य वदनाच्च्युतम् ।
प्रशशंस पुनर्मौर्व्याद् भ्रातरं रक्षसां वरम् ॥ ६ ॥
खरके मुखसे निकली हुई इस बातको सुनकर शूर्पणखाको पड़ी प्रसन्नता हुई । उसने मूर्खतावश राक्षसोंमें श्रेष्ठ भाई खरकी पुनः भूरि - भूरि प्रशंसा की ॥ ६ ॥
पृष्ठ 616
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
६०४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे
तया परुषितः पूर्वं पुनरेव प्रशंसितः ।
अब्रवीद् दूषणं नाम खरः सेनापतिं तदा ॥७ ॥
उसने पहले जिसका कठोर वाणीद्वारा तिरस्कार किया और पुनः जिसकी अत्यन्त सराहना की, उस खरने उस समय अपने सेनापति दूषणसे कहा- ॥ ७ ॥
चतुर्दश सहस्त्राणि मम चित्तानुवर्तिनाम् ।
रक्षसां भीमवेगानां समरेष्वनिवर्तिनाम् ॥ ८॥ ।
नीलजीमूतवर्णानां लोकहिंसाविहारिणाम् ।
सर्वोद्योगमुदीर्णानां रक्षसां सौम्य कारय ॥ ९ ॥ ।
' सौम्य! मेरे मनके अनुकूल चलनेवाले, युद्धके मैदानसे पीछे न हटनेवाले, भयंकर वेगशाली, मेघोंकी काली घटाके समान काले रंगवाले, लोगोंकी हिंसासे ही क्रीड़ा - विहार करनेवाले तथा युद्धमें उत्साहपूर्वक आगे बढ़नेवाले चौदह सहस्र राक्षसोंको युद्धके लिये भेजनेकी पूरी तैयारी कराओ ॥ ८ - ९ ॥
उपस्थापय मे क्षिप्रं रथं सौम्य धनूंषि च ।
शरांश्च चित्रान् खड्गांश्च शक्तीश्च विविधाः शिताः ॥ १० ॥
सौम्य सेनापते! तुम शीघ्र ही मेरा रथ भी यहाँ मँगवा लो । उसपर बहुत - से धनुष, बाण, विचित्र - विचित्र खड्ग और नाना प्रकारकी तीखी शक्तियोंको भी रख दो ॥ १० ॥
अग्रे निर्यातुमिच्छामि पौलस्त्यानां महात्मनाम् ।
वधार्थं दुर्विनीतस्य रामस्य रणकोविद ॥ ११ ॥
' रणकुशल वीर! मैं इस उद्दण्ड रामका वध ।
करनेके लिये महामनस्वी पुलस्त्यवंशी राक्षसोंके आगे-आगे जाना चाहता हूँ ' ॥११ ॥
इति तस्य ब्रुवाणस्य सूर्यवर्णं महारथम् ।
सदश्वैः शबलैर्युक्तमाचचक्षेऽथ दूषणः ॥ १२ ॥
उसके इस प्रकार आज्ञा देते ही एक सूर्यके समान प्रकाशमान और चितकबरे रंगके अच्छे घोड़ोंसे जुता हुआ विशाल रथ वहाँ आ गया । दूषणने खरको इसकी सूचना दी ॥ १२ ॥
तं मेरुशिखराकारं तप्तकाञ्चनभूषणम् ।
हेमचक्रमसम्बाधं वैदूर्यमयकूबरम् ॥ १३ ॥
मत्स्यैः पुष्यैर्दुमैः शैलैश्चन्द्रसूर्यैश्च काञ्चनैः ।
माङ्गल्यैः पक्षिसङ्घैश्च ताराभिश्च समावृतम् ॥ १४ ॥
ध्वजनिस्त्रिशसम्पन्नं किंकिणीवरभूषितम् ।
सदश्वयुक्तं सोऽमर्षादारुरोह खरस्तदा ॥ १५ ॥
वह रथ मेरुपर्वतके शिखरकी भाँति ऊँचा था, उसे तपाये हुए सोनेके बने हुए साज - बाजसे सजाया गया था, उसके पहियोंमें सोना जड़ा हुआ था, उसका विस्तार । बहुत बड़ा था, उस रथके कूबर वैदूर्यमणिसे जड़े गये थे, उसकी सजावटके लिये सोनेके बने हुए मत्स्य फूल, वृक्ष, पर्वत, चन्द्रमा, सूर्य, माङ्गलिक पक्षियोंके समुदाय तथा तारिकाओंसे वह रथ सुशोभित हो रहा था, उसपर ध्वजा फहरा रही थी तथा रथके भीतर खड्ग आदि अस्त्र - शस्त्र रखे हुए थे, छोटी - छोटी घण्टियों अथवा सुन्दर घुँघुरुओंसे सजे और उत्तम घोड़ोंसे जुते हुए उस रथपर राक्षसराज खर उस समय आरूढ़ हुआ । अपनी बहिनके अपमानका स्मरण करके उसके मनमें बड़ा अमर्ष हो रहा था ॥ १३–१५ ॥ खरस्तु तन्महत्सैन्यं रथचर्मायुधध्वजम् । नार निर्यातेत्यब्रवीत् प्रेक्ष्य दूषणः सर्वराक्षसान् ॥ १६ ॥
रथ, ढाल, अस्त्र - शस्त्र तथा ध्वजसे सम्पन्न उस विशाल सेनाकी ओर देखकर खर और दूषणने समस्त राक्षसोंसे कहा — ' निकलो, आगे बढ़ो ' ॥ १६ ॥
ततस्तद् राक्षसं सैन्यं घोरचर्मायुधध्वजम् ।
निर्जगाम जनस्थानान्महानादं महाजवम् ॥१७ ॥
कूच करनेकी आज्ञा प्राप्त होते ही भयंकर ढाल, अस्त्र - शस्त्र तथा ध्वजासे युक्त वह विशाल राक्षस - सेना जोर - जोरसे गर्जना करती हुई जनस्थानसे बड़े वेगके साथ निकली ॥ १७ ॥
मुद्गरैः पट्टिशैः शूलैः सुतीक्ष्णैश्च परश्वधैः ।
खड्गैश्चक्रैश्च हस्तस्थैर्भ्राजमानैः सतोमरैः ॥ १८ ॥
शक्तिभिः परिघैर्घोरैरतिमात्रैश्च कार्मुकैः ।
गदासिमुसलैर्वजैर्गृहीतैर्भीमदर्शनैः ॥१ ९ ॥
राक्षसानां सुघोराणां सहस्त्राणि चतुर्दश ।
निर्यातानि जनस्थानात् खरचित्तानुवर्तिनाम् ॥ २० ॥
सैनिकोंके हाथमें मुद्गर, पट्टिश, शूल, अत्यन्त तीखे फरसे, खड्ग, चक्र और तोमर चमक उठे । शक्ति, भयंकर परिघ, विशाल धनुष, गदा, तलवार, मुसल तथा वज्र ( आठ कोणवाले आयुधविशेष ) उन राक्षसोंके हाथोंमें आकर बड़े भयानक दिखायी दे रहे थे । इन अस्त्र - शस्त्रोंसे उपलक्षित और खरके मनकी इच्छाके अनुसार चलनेवाले अत्यन्त भयंकर चौदह हजार राक्षस जनस्थानसे युद्धके लिये चले ॥ १८-२० ॥
तांस्तु निर्धावतो दृष्ट्वा राक्षसान् भीमदर्शनान् ।
खरस्याथ रथः किंचिज्जगाम तदनन्तरम् ॥ २१ ॥
उन भयंकर दिखायी देनेवाले राक्षसोंको धावा करते देख खरका रथ भी कुछ देर सैनिकोंके निकलनेकी प्रतीक्षा करके उनके साथ ही आगे बढ़ा ॥ २१ ॥
पृष्ठ 617
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अरण्यकाण्डे ततस्ताञ्छबलानश्वांस्तप्तकाञ्चनभूषितान् खरस्य मतमाज्ञाय सारथिः पर्यचोदयत् ॥ २२ ॥
तदनन्तर खरका अभिप्राय जानकर उसके सारथिने तपाये हुए सोनेके आभूषणोंसे विभूषित उन चितकबरे घोड़ोंको हाँका ॥ २२ ॥
संचोदितो रथः शीघ्रं खरस्य रिपुघातिनः ।
शब्देनापूरयामास दिशः सप्रदिशस्तथा ॥ २३ ॥
उसके हाँकनेपर शत्रुघाती खरका रथ शीघ्र ही अपने घर - घर शब्दसे सम्पूर्ण दिशाओं तथा उपदिशाओंको प्रतिध्वनित करने लगा ॥ २३ ॥
त्रयोविंशः सर्गः ६०५ प्रवृद्धमन्युस्तु खरः खरस्वरो
रिपोर्वधार्थं त्वरितो यथान्तकः ।
अचूचुदत् सारथिमुन्नदन् पुन-र्महाबलो मेघ इवाश्मवर्षवान् ॥ २४ ॥
उस समय खरका क्रोध बढ़ा हुआ था । उसका स्वर भी कठोर हो गया था । वह शत्रुके वधके लिये उतावला होकर यमराजके समान भयानक जान पड़ता था । जैसे ओलोंकी वर्षा करनेवाला मेघ बड़े जोरसे गर्जना करता है, उसी प्रकार महाबली खरने उच्चस्वरसे सिंहनाद करके पुनः सारथिको रथ हाँकनेके लिये प्रेरित किया ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे द्वाविंशः सर्गः ॥ २२ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें बाईसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ २२ ॥
त्रयोविंशः सर्गः भयंकर उत्पातोंको देखकर भी खरका उनकी परवा नहीं करना तथा राक्षस - सेनाका श्रीरामके आश्रमके समीप पहुँचना
तत्प्रयातं बलं घोरमशिवं शोणितोदकम् ।
अभ्यवर्षन्महाघोरस्तुमुलो गर्दभारुणः ॥ १ ॥
उस सेनाके प्रस्थान करते समय आकाशमें गधे के समान धूसर रंगवाले बादलोंकी महाभयंकर घटा घिर आयी । उसकी तुमुल गर्जना होने लगी तथा सैनिकोंके ऊपर घोर अमङ्गलसूचक रक्तमय जलकी वर्षा आरम्भ हो गयी ॥ १ ॥
निपेतुस्तुरगास्तस्य रथयुक्ता महाजवाः ।
समे पुष्पचिते देशे राजमार्गे यदृच्छया ॥ २ ॥
खरके रथमें जुते हुए महान् वेगशाली घोड़े फूल बिछे हुए समतलस्थानमें सड़कपर चलते - चलते अकस्मात् गिर पड़े ॥ २ ॥
श्यामं रुधिरपर्यन्तं बभूव परिवेषणम् ।
अलातचक्रप्रतिमं प्रतिगृह्य दिवाकरम् ॥ ३ ॥
सूर्यमण्डलके चारों ओर अलातचक्रके समान गोलाकार घेरा दिखायी देने लगा, जिसका रंग काला और किनारेका रंग लाल था ॥३ ॥
ततो ध्वजमुपागम्य हेमदण्डं समुच्छ्रितम् ।
समाक्रम्य महाकायस्तस्थौ गृध्रः सुदारुणः ॥ ४ ॥
तदनन्तर खरके रथकी सुवर्णमय दण्डवाली ऊँची ध्वजापर एक विशालकाय गीध आकर बैठ गया, जो देखनेमें बड़ा ही भयंकर था ॥४ ॥
जनस्थानसमीपे च समाक्रम्य खरस्वनाः ।
विस्वरान् विविधान् नादान् मांसादा मृगपक्षिणः ॥ ५ ॥
व्याजहुरभिदीप्तायां दिशि वै भैरवस्वनम् ।
अशिवं यातुधानानां शिवा घोरा महास्वनाः ॥ ६ ॥
कठोर स्वरवाले मांसभक्षी पशु और पक्षी जनस्थानके पास आकर विकृत स्वरमें अनेक प्रकारके विकट शब्द बोलने लगे तथा सूर्यकी प्रभासे प्रकाशित हुई दिशाओंमें जोर - जोरसे चीत्कार करनेवाले और मुँहसे आग उगलनेवाले भयंकर गीदड़ राक्षसोंके लिये अमङ्गलजनक भैरवनाद करने लगे॥५-६ ॥ प्रभिन्नगजसंकाशास्तोयशोणितधारिणः आकाशं तदनाकाशं चक्रुर्भीमाम्बुवाहकाः ॥ ७ ॥
भयंकर मेघ, जो मदकी धारा बहानेवाले गजराजके समान दिखायी देते थे और जलकी जगह रक्त धारण किये हुए थे, तत्काल घिर आये । उन्होंने समूचे आकाशको ढक दिया । थोड़ा - सा भी अवकाश नहीं रहने दिया ॥ ७ ॥
बभूव तिमिरं घोरमुद्धतं रोमहर्षणम् ।
दिशो वा प्रदिशो वापि सुव्यक्तं न चकाशिरे ॥ ८ ॥
सब ओर अत्यन्त भयंकर तथा रोमाञ्चकारी घना अन्धकार छा गया । दिशाओं अथवा कोणका स्पष्टरूपसे भान नहीं हो पाता था ॥८ ॥
क्षतजार्द्रसवर्णाभा संध्या कालं विना बभौ ।
खरं चाभिमुखं नेदुस्तदा घोरा मृगाः खगाः ॥ ९ ॥
बिना समयके ही खूनसे भीगे हुए वस्त्रके समान
पृष्ठ 618
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
६०६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे रंगवाली संध्या प्रकट हो गयी । उस समय भयंकर पशु-पक्षी खरके सामने आकर गर्जना करने लगे ॥ ९ ॥
कङ्कगोमायुगृध्राश्च चुक्रुशुर्भयशंसिनः ।
नित्याशिवकरा युद्धे शिवा घोरनिदर्शनाः ॥ १० ॥
नेदुर्बलस्याभिमुखं ज्वालोद्गारिभिराननैः । भयकी सूचना देनेवाले कङ्क ( सफेद चील ), गीदड़ और गीध खरके सामने चीत्कार करने लगे । युद्धमें सदा अमङ्गल सूचित करनेवाली और भय दिखानेवाली गीदड़ियाँ खरकी सेनाके सामने आकर आग उगलनेवाले मुखोंसे घोर शब्द करने लगीं ॥ १०३ ॥
कबन्धः परिघाभासो दृश्यते भास्करान्तिके ॥ ११ ॥
जग्राह सूर्यं स्वर्भानुरपर्वणि महाग्रहः ।
प्रवाति मारुतः शीघ्रं निष्प्रभोऽभूद् दिवाकरः ॥ १२ ॥
सूर्यके निकट परिघके समान कबन्ध ( सिर कटा हुआ धड़ ) दिखायी देने लगा । महान् ग्रह राहु अमावास्याके बिना ही सूर्यको ग्रसने लगा । हवा तीव्र गतिसे चलने लगी एवं सूर्यदेवकी प्रभा फीकी पड़ गयी॥११-१२ ॥
उत्पेतुश्च विना रात्रिं ताराः खद्योतसप्रभाः ।
संलीनमीनविहगा नलिन्यः शुष्कपङ्कजाः ॥ १३ ॥
बिना रातके ही जुगनूके समान चमकनेवाले तारे आकाशमें उदित हो गये । सरोवरोंमें मछली और
जलपक्षी विलीन हो गये । उनके कमल सूख गये ॥ १३ ॥
तस्मिन् क्षणे बभूवुश्च विना पुष्पफलैर्द्रुमाः ।
उद्धूतश्च विना वातं रेणुर्जलधरारुणः ॥ १४ ॥
उस क्षणमें वृक्षोंके फूल और फल झड़ गये । बिना हवाके ही बादलोंके समान धूसर रंगकी धूल ऊपर उठकर आकाशमें छा गयी ॥ १४ ॥
चीचीकूचीति वाश्यन्त्यो बभूवुस्तत्र सारिकाः ।
उल्काश्चापि सनिर्घोषा निपेतुर्घोरदर्शनाः ॥ १५ ॥
वहाँ वनकी सारिकाएँ चें - चें करने लगीं । भारी आवाजके साथ भयानक उल्काएँ आकाशसे पृथ्वीपर गिरने लगीं ॥ १५ ॥
प्रचचाल मही चापि सशैलवनकानना ।
खरस्य च रथस्थस्य नर्दमानस्य धीमतः ॥ १६ ॥
प्राकम्पत भुजः सव्यः स्वरश्चास्यावसज्जत ।
सास्त्रा सम्पद्यते दृष्टिः पश्यमानस्य सर्वतः ॥ १७ ॥
पर्वत, वन और काननोंसहित धरती डोलने लगी । बुद्धिमान् खर रथपर बैठकर गर्जना कर रहा था । उस समय उसकी बायीं भुजा सहसा काँप उठी । स्वर अवरुद्ध हो गया और सब ओर देखते समय उसकी आँखोंमें आँसू आने लगे ॥ १६-१७ ॥
ललाटे च रुजो जाता न च मोहान्त्र्यवर्तत ।
तान् समीक्ष्य महोत्पातानुत्थितान् रोमहर्षणान् ॥ १८ ॥
अब्रवीद् राक्षसान् सर्वान् प्रहसन् स खरस्तदा । उसके सिरमें दर्द होने लगा, फिर भी मोहवश वह युद्धसे निवृत्त नहीं हुआ । उस समय प्रकट हुए उन बड़े-बड़े रोमाञ्चकारी उत्पातोंको देखकर खर जोर - जोर से हँसने लगा और समस्त राक्षसोंसे बोला – ॥ १८३ ॥
महोत्पातानिमान् सर्वानुत्थितान् घोरदर्शनान् ॥ १ ९ ॥
न चिन्तयाम्यहं वीर्याद् बलवान् दुर्बलानिव ।
तारा अपि शरैस्तीक्ष्णैः पातयेयं नभस्तलात् ॥ २० ॥
' ये जो भयानक दिखायी देनेवाले बड़े - बड़े उत्पात प्रकट हो रहे हैं, इन सबकी मैं अपने बल भरोसे कोई परवा नहीं करता; ठीक उसी तरह, जैसे बलवान् वीर दुर्बल शत्रुओंको कुछ नहीं समझता है । मैं अपने तीखे बाणोंद्वारा आकाशसे तारोंको भी गिरा सकता हूँ ॥१ ९ -२० ॥
मृत्युं मरणधर्मेण संक्रुद्धो योजयाम्यहम् ।
राघवं तं बलोत्सिक्तं भ्रातरं चापि लक्ष्मणम् ॥ २१ ॥
अव सायकैस्तीक्ष्णैनपावर्तितुमुत्सहे । ' यदि कुपित हो जाऊँ तो मृत्युको भी मौतके मुखमें डाल सकता हूँ । आज बलका घमंड रखनेवाले राम और उसके भाई लक्ष्मणको तीखे बाणोंसे मारे बिना मैं पीछे नहीं लौट सकता ॥ २१३ ॥
यन्निमित्तं तु रामस्य लक्ष्मणस्य विपर्ययः ॥ २२ ॥
सकामा भगिनीमेऽस्तु पीत्वा तु रुधिरं तयोः । ' जिसे दण्ड देनेके लिये राम और लक्ष्मणकी बुद्धिमें विपरीत विचार ( क्रूरतापूर्ण कर्म करनेके भाव ) का उदय हुआ है, वह मेरी बहिन शूर्पणखा उन दोनोंका खून पीकर सफलमनोरथ हो जाय ॥ २२३ ॥
न क्वचित् प्राप्तपूर्वो मे संयुगेषु पराजयः ॥ २३ ॥
युष्माकमेतत् प्रत्यक्षं नानृतं कथयाम्यहम् । ' आजतक जितने युद्ध हुए हैं, उनमेंसे किसीमें भी पहले मेरी कभी पराजय नहीं हुई है; यह तुमलोगोंने
प्रत्यक्ष देखा है । मैं झूठ नहीं कहता हूँ ॥ २३३ ॥
देवराजमपि कुद्धो मत्तैरावतगामिनम् ॥ २४ ॥
वज्रहस्तं रणे हन्यां किं पुनस्तौ च मानवौ । ' मैं मतवाले ऐरावतपर चलनेवाले वज्रधारी देवराज इन्द्रको भी रणभूमिमें कुपित होकर कालके
पृष्ठ 619
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अरण्यकाण्डे गालमें डाल सकता हूँ, फिर उन दो मनुष्योंकी तो बात ही क्या है? ' ॥ २४३ ॥
सा तस्य गर्जितं श्रुत्वा राक्षसानां महाचमूः ॥ २५ ॥
प्रहर्षमतुलं भे मृत्युपाशावपाशिता । खरकी यह गर्जना सुनकर राक्षसोंकी वह विशाल सेना, जो मौतके पाशसे बँधी हुई थी, अनुपम हर्षसे भर गयी ॥ २५३ ॥
समेयुश्च महात्मानो युद्धदर्शनकांक्षिणः ॥ २६ ॥
ऋषयो देवगन्धर्वाः सिद्धाश्च सह चारणैः ।
समेत्य चोचुः सहितास्तेऽन्योन्यं पुण्यकर्मणः ॥ २७ ॥
उस समय युद्ध देखनेकी इच्छावाले बहुत - से पुण्यकर्मा महात्मा, ऋषि, देवता, गन्धर्व, सिद्ध और चारण वहाँ एकत्र हो गये । एकत्र हो वे सभी मिलकर एक - दूसरेसे कहने लगे— ॥ २६-२७ ॥
स्वस्ति गोब्राह्मणेभ्यस्तु लोकानां ये च सम्मताः ।
जयतां राघवो युद्धे पौलस्त्यान् रजनीचरान् ॥ २८ ॥
चक्रहस्तो यथा विष्णुः सर्वानसुरसत्तमान् । ' गौओं और ब्राह्मणोंका कल्याण हो तथा जो अन्य लोकप्रिय महात्मा हैं, वे भी कल्याणके भागी हों । जैसे चक्रधारी भगवान् विष्णु समस्त असुरशिरोमणियोंको परास्त कर देते हैं, उसी प्रकार रघुकुलभूषण श्रीराम युद्धमें इन पुलस्त्यवंशी निशाचरोंको पराजित करें ' ॥ २८३ ॥
एतच्चान्यच्च बहुशो ब्रुवाणाः परमर्षयः ॥ २ ९ ॥
जातकौतूहलास्तत्र विमानस्थाश्च देवताः ।
ददृशुर्वाहिनीं तेषां राक्षसानां गतायुषाम् ॥ ३० ॥
ये तथा और भी बहुत - सी मङ्गलकामनासूचक बातें चतुर्विंशः सर्गः ६०७ | बैठकर जिनकी आयु समाप्त हो चली थी, उन राक्षसोंकी उस विशाल वाहिनीको देखने लगे ॥ २ ९ -३० ॥
रथेन तु खरो वेगात् सैन्यस्याग्राद् विनिःसृतः ।
श्येनगामी पृथुग्रीवो यज्ञशत्रुर्विहंगमः ॥ ३१ ॥
दुर्जयः करवीराक्षः परुषः कालकार्मुकः ।
हेममाली महामाली सर्पास्यो रुधिराशनः ॥ ३२ ॥
द्वादशैते महावीर्याः प्रतस्थुरभितः खरम् । खर रथके द्वारा बड़े वेगसे चलकर सारी सेनासे आगे निकल आया और श्येनगामी, पृथुग्रीव, यज्ञशत्रु, विहंगम, दुर्जय, करवीराक्ष, परुष, कालकार्मुक, हेममाली, महामाली, सर्पास्य तथा रुधिराशन — ये बारह महापराक्रमी राक्षस खरको दोनों ओरसे घेरकर उसके साथ - साथ चलने लगे ॥ ३१-३२३ ॥
महाकपालः स्थूलाक्षः प्रमाथस्त्रिशिरास्तथा ।
चत्वार एते सेनाग्रे दूषणं पृष्ठतोऽन्वयुः ॥ ३३ ॥
महाकपाल, स्थूलाक्ष, प्रमाथ और त्रिशिरा - ये चार राक्षस - वीर सेनाके आगे और सेनापति दूषणके पीछे - पीछे चल रहे थे ॥ ३३ ॥
सा भीमवेगा समराभिकांक्षिणी सुदारुणा राक्षसवीरसेना । राजपुत्र हा माला ग्रहाणामिव चन्द्रसूर्यौ ॥ ३४ ॥
राक्षस वीरोंकी वह भयंकर वेगवाली अत्यन्त दारुण सेना, जो युद्धकी अभिलाषासे आ रही थी, सहसा उन दोनों राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मणके पास जा पहुँची, मानो ग्रहोंकी पंक्ति चन्द्रमा और सूर्यके समीप
कहते हुए वे महर्षि और देवता कौतूहलवश विमानपर । प्रकाशित हो रही हो ॥३४ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे त्रयोविंशः सर्गः ॥ २३ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें तेईसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ २३ ॥
चतुर्विंशः सर्गः श्रीरामका तात्कालिक शकुनोंद्वारा राक्षसोंके विनाश और अपनी विजयकी सम्भावना करके सीतासहित भेजना और युद्धके
आश्रमं प्रतियाते तु खरे खरपराक्रमे ।
तानेवौत्पातिकान् रामः सह भ्रात्रा ददर्श ह ॥ १ ॥
प्रचण्ड पराक्रमी खर जब श्रीरामके आश्रमकी ओर चला, तब भाईसहित श्रीरामने भी उन्हीं उत्पात -सूचक लक्षणोंको देखा ॥ १ ॥
लक्ष्मणको पर्वतकी गुफामें लिये उद्यत होना
तानुत्पातान् महाघोरान् रामो दृष्ट्वात्यमर्षणः ।
प्रजानामहितान् दृष्ट्वा वाक्यं लक्ष्मणमब्रवीत् ॥ २ ॥
प्रजाके अहितकी सूचना देनेवाले उन महाभयंकर उत्पातोंको देखकर श्रीरामचन्द्रजी राक्षसोंके उपद्रवका विचार करके अत्यन्त अमर्षमें भर गये और लक्ष्मणसे
पृष्ठ 620
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
६०८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे इस प्रकार बोले- ॥ २ ॥
इमान् पश्य महाबाहो सर्वभूतापहारिणः ।
समुत्थितान् महोत्पातान् संहर्तुं सर्वराक्षसान् ॥ ३ ॥
' महाबाहो! ये जो बड़े - बड़े उत्पात प्रकट हो रहे हैं, इनकी ओर दृष्टिपात करो । समस्त भूतोंके संहारकी सूचना देनेवाले ये महान् उत्पात इस समय इन सारे राक्षसोंका संहार करनेके लिये उत्पन्न हुए हैं ॥ ३ ॥
अमी रुधिरधारास्तु विसृजन्ते खरस्वनाः ।
व्योम्नि मेघा निवर्तन्ते परुषा गर्दभारुणाः ॥ ४ ॥
' आकाशमें जो गधोंके समान धूसर वर्णवाले बादल इधर - उधर विचर रहे हैं, ये प्रचण्ड गर्जना करते हुए खूनकी धाराएँ बरसा रहे हैं ॥४ ॥
सधूमाश्च शराः सर्वे मम युद्धाभिनन्दिताः ।
रुक्मपृष्ठानि चापानि विचेष्टन्ते विचक्षण ॥ ५ ॥
' युद्धकुशल लक्ष्मण! मेरे सारे बाण उत्पातवश उठनेवाले धूमसे सम्बद्ध हो युद्धके लिये मानो आनन्दित हो रहे हैं तथा जिनके पृष्ठभागमें सुवर्ण मढ़ा हुआ है, वे मेरे धनुष भी प्रत्यञ्चासे जुड़ जानेके लिये स्वयं ही चेष्टाशील जान पड़ते हैं ॥ ५ ॥
यादृशा इह कूजन्ति पक्षिणो वनचारिणः ।
अग्रतो नोऽभयं प्राप्तं संशयो जीवितस्य च ॥ ६ ॥
' यहाँ जैसे - जैसे वनचारी पक्षी बोल रहे हैं, उनसे हमारे लिये भविष्यमें अभयकी और राक्षसोंके लिये प्राणसंकटकी प्राति सूचित हो रही है ॥६ ॥
सम्प्रहारस्तु सुमहान् भविष्यति न संशयः ।
अयमाख्याति मे बाहुः स्फुरमाणो मुहुर्मुहुः ॥ ७ ॥
' मेरी यह दाहिनी भुजा बारंबार फड़ककर इस बातकी सूचना देती है कि कुछ ही देरमें बहुत बड़ा युद्ध होगा, इसमें संशय नहीं है ॥ ७ ॥
संनिकर्षे तु नः शूर जयं शत्रोः पराजयम् ।
सुप्रभं च प्रसन्नं च तव वक्त्रं हि लक्ष्यते ॥ ८ ॥
' शूरवीर लक्ष्मण! परंतु निकट भविष्यमें ही हमारी विजय और शत्रुकी पराजय होगी; क्योंकि तुम्हारा मुख कान्तिमान् एवं प्रसन्न दिखायी दे रहा है ॥ ८ ॥
उद्यतानां हि युद्धार्थं येषां भवति लक्ष्मण ।
निष्प्रभं वदनं तेषां भवत्यायुः परिक्षयः ॥ ९ ॥
‘ लक्ष्मण! युद्धके लिये उद्यत होनेपर जिनका मुख प्रभाहीन ( उदास ) हो जाता है, उनकी आयु नष्ट हो जाती है ॥
रक्षसां नर्दतां घोरः श्रूयतेऽयं महाध्वनिः ।
आहतानां च भेरीणां राक्षसैः क्रूरकर्मभिः ॥ १० ॥ ।
‘ गरजते हुए राक्षसोंका यह घोर नाद सुनायी देता है, तथा क्रूरकर्मा राक्षसोंद्वारा बजायी गयी भेरियोंकी यह महाभयंकर ध्वनि कानोंमें पड़ रही है ॥ १० ॥
अनागतविधानं तु कर्तव्यं शुभमिच्छता ।
आपदं शङ्कमानेन पुरुषेण विपश्चिता ॥ ११ ॥
' अपना कल्याण चाहनेवाले विद्वान् पुरुषको उचित है कि आपत्तिकी आशङ्का होनेपर पहलेसे ही उससे बचनेका उपाय कर ले ॥ ११ ॥
तस्माद् गृहीत्वा वैदेहीं शरपाणिर्धनुर्धरः ।
गुहामाश्रय शैलस्य दुर्गां पादपसंकुलाम् ॥ १२ ॥
' इसलिये तुम धनुष - बाण धारण करके विदेहकुमारी सीताको साथ ले पर्वतकी उस गुफामें चले जाओ, जो वृक्षोंसे आच्छादित है ॥ १२ ॥
प्रतिकूलितुमिच्छामि न हि वाक्यमिदं त्वया ।
शापितो मम पादाभ्यां गम्यतां वत्स मा चिरम् ॥ १३ ॥
' वत्स! तुम मेरे इस वचनके प्रतिकूल कुछ कहो या करो, यह मैं नहीं चाहता । अपने चरणोंकी शपथ दिलाकर कहता हूँ, शीघ्र चले जाओ ॥ १३ ॥
त्वं हि शूरश्च बलवान् हन्या एतान् न संशयः ।
स्वयं निहन्तुमिच्छामि सर्वानेव निशाचरान् ॥ १४ ॥
' इसमें संदेह नहीं कि तुम बलवान् और शूरवीर हो तथा इन राक्षसोंका वध कर सकते हो; तथापि मैं स्वयं ही इन निशाचरोंका संहार करना चाहता हूँ ( इसलिये तुम मेरी बात मानकर सीताको सुरक्षित रखने के लिये इसे गुफामें ले जाओ ) ' ॥ १४ ॥
एवमुक्तस्तु रामेण लक्ष्मणः सह सीतया ।
शरानादाय चापं च गुहां दुर्गां समाश्रयत् ॥ १५ ॥
श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर लक्ष्मण धनुष-बाण ले सीताके साथ पर्वतकी दुर्गम गुफामें चले गये ॥
तस्मिन् प्रविष्टे तु गुहां लक्ष्मणे सह सीतया ।
हन्त निर्युक्तमित्युक्त्वा रामः कवचमाविशत् ॥ १६ ॥
सीतासहित लक्ष्मणके गुफाके भीतर चले जानेपर श्रीरामचन्द्रजीने ' हर्षकी बात है, लक्ष्मणने शीघ्र मेरी बात मान ली और सीताकी रक्षाका समुचित प्रबन्ध हो गया ' ऐसा कहकर कवच धारण किया ॥ १६ ॥
स तेनाग्निनिकाशेन कवचेन विभूषितः ।
बभूव रामस्तिमिरे महानग्निरिवोत्थितः ॥ १७ ॥
प्रज्वलित आगके समान प्रकाशित होनेवाले उस कवचसे विभूषित हो श्रीराम अन्धकारमें प्रकट हुए महान् अग्निदेवके समान शोभा पाने लगे ॥१७ ॥