वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ — पृष्ठ 631–640
वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 631–640
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अरण्यकाण्डे अष्टाविंशः सर्गः ६१ ९ महर्षि अगस्त्यने जो महान् और उत्तम वैष्णव । धनुष प्रदान किया था, उसीको लेकर उन्होंने खरपर धावा किया ॥ २१ ॥
ततः कनकपुङ्खैस्तु शरैः संनतपर्वभिः ।
चिच्छेद रामः संक्रुद्धः खरस्य समरे ध्वजम् ॥ २२ ॥
उस समय अत्यन्त क्रोधमें भरकर श्रीरामने सोनेकी पाँख और झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा समराङ्गणमें खरकी ध्वजा काट डाली ॥ २२ ॥
स दर्शनीयो बहुधा विच्छिन्नः काञ्चनो ध्वजः ।
जगाम धरणीं सूर्यो देवतानामिवाज्ञया ॥ २३ ॥
वह दर्शनीय सुवर्णमय ध्वज अनेक टुकड़ोंमें कटकर धरतीपर गिर पड़ा, मानो देवताओंकी आज्ञासे सूर्यदेव भूमिपर उतर आये हों ॥ २३ ॥
तं चतुर्भिः खरः क्रुद्धो रामं गात्रेषु मार्गणैः ।
विव्याध हृदि मर्मज्ञो मातङ्गमिव तोमरैः ॥ २४ ॥
क्रोधमें भरे हुए खरको मर्मस्थानोंका ज्ञान था । उसने श्रीरामके अङ्गोंमें, विशेषतः उनकी छातीमें चार बाण मारे, मानो किसी महावतने गजराजपर तोमरोंसे प्रहार किया हो ॥ २४ ॥
स रामो बहुभिर्बाणैः खरकार्मुकनिःसृतैः ।
विद्धो रुधिरसिक्ताङ्गो बभूव रुषितो भृशम् ॥ २५ ॥
खरके धनुषसे छूटे हुए बहुसंख्यक बाणोंसे घायल होकर श्रीरामका सारा शरीर लहूलुहान हो गया । इससे उनको बड़ा रोष हुआ ॥ २५ ॥
स धनुर्धन्विनां श्रेष्ठः संगृह्य परमाहवे ।
मुमोच परमेष्वासः षट् शरानभिलक्षितान् ॥ २६ ॥
धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ महाधनुर्धर श्रीरामने युद्धस्थलमें पूर्वोक्त श्रेष्ठ धनुषको हाथमें लेकर लक्ष्य निश्चित करके खरको छः बाण मारे ॥ २६ ॥
शिरस्येकेन बाणेन द्वाभ्यां बाह्वोरथार्पयत् ।
त्रिभिश्चन्द्रार्धवक्त्रैश्च वक्षस्यभिजघान ह ॥ २७ ॥
उन्होंने एक बाण उसके मस्तकमें, दोसे उसकी भुजाओंमें और तीन अर्धचन्द्राकार बाणोंसे उसकी छातीमें गहरी चोट पहुँचायी ॥ २७ ॥
ततः पश्चान्महातेजा नाराचान् भास्करोपमान् ।
जघान राक्षसं क्रुद्धस्त्रयोदश शिलाशितान् ॥ २८ ॥
तत्पश्चात् महातेजस्वी श्रीरामचन्द्रजीने कुपित होकर उस राक्षसको शानपर तेज किये हुए और सूर्यके समान चमकनेवाले तेरह बाण मारे ॥ २८ ॥
रथस्य युगमेकेन चतुर्भिः शबलान् हयान् ।
षष्ठेन च शिरः संख्ये चिच्छेद खरसारथेः ॥ २ ९ ॥
एक बाणसे तो उसके रथका जूआ काट दिया, चार बाणोंसे चारों चितकबरे घोड़े मार डाले और छठे बाणसे युद्धस्थलमें खरके सारथिका मस्तक काट गिराया ॥ २ ९ ॥
त्रिभिस्त्रिवेणून् बलवान् द्वाभ्यामक्षं महाबलः ।
द्वादशेन तु बाणेन खरस्य सशरं धनुः ॥ ३० ॥
छित्त्वा वज्रनिकाशेन राघवः प्रहसन्निव ।
त्रयोदशेनेन्द्रसमो बिभेद समरे खरम् ॥ ३१ ॥
तत्पश्चात् तीन बाणोंसे त्रिवेणु ( जूएके आधारदण्ड ) और दोसे रथके धुरेको खण्डित करके महान् शक्तिशाली और बलवान् श्रीरामने बारहवें बाणसे खरके बाणसहित धनुषके दो टुकड़े कर दिये । इसके बाद इन्द्रके समान तेजस्वी श्रीराघवेन्द्रने हँसते - हँसते वज्रतुल्य तेरहवें बाणके द्वारा समराङ्गणमें खरको घायल कर दिया ॥ ३०-३१ ॥
प्रभग्नधन्वा विरथो हताश्वो हतसारथिः ।
गदापाणिरवप्लुत्य तस्थौ भूमौ खरस्तदा ॥ ३२ ॥
धनुषके खण्डित होने, रथके टूटने, घोड़ोंके मारे जाने और सारथिके भी नष्ट हो जानेपर खर उस समय हाथमें गदा ले रथसे कूदकर धरतीपर खड़ा हो | गया ॥ ३२ ॥
तत् कर्म रामस्य महारथस्य
समेत्य देवाश्च महर्षयश्च ।
अपूजयन् प्राञ्जलयः प्रहृष्टा-स्तदा विमानाग्रगताः समेताः ॥ ३३ ॥
उस अवसरपर विमानपर बैठे हुए देवता और महर्षि हर्षसे उत्फुल्ल हो परस्पर मिलकर हाथ जोड़ महारथी श्रीरामके उस कर्मकी भूरि - भूरि प्रशंसा करने लगे ॥ ३३ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डेऽष्टाविंशः सर्गः ॥२८ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें अट्ठाईसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ २८ ॥
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६२० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे एकोनत्रिंशः सर्गः श्रीरामका खरको फटकारना तथा खरका भी उन्हें कठोर उत्तर देकर उनके ऊपर गदाका प्रहार करना और
खरं तु विरथं रामो गदापाणिमवस्थितम् ।
मृदुपूर्वं महातेजाः परुषं वाक्यमब्रवीत् ॥ १ ॥
खरको रथहीन होकर गदा हाथमें लिये सामने उपस्थित देख महातेजस्वी भगवान् श्रीराम पहले कोमल और फिर कठोर वाणीमें बोले - ॥१ ॥
गजाश्वरथसम्बाधे बले महति तिष्ठता ।
कृतं ते दारुणं कर्म सर्वलोकजुगुप्सितम् ॥ २ ॥
उद्वेजनीयो भूतानां नृशंसः पापकर्मकृत् ।
त्रयाणामपि लोकानामीश्वरोऽपि न तिष्ठति ॥ ३ ॥
कर्म लोकविरुद्धं तु कुर्वाणं क्षणदाचर ।
तीक्ष्णं सर्वजनो हन्ति सर्पं दुष्टमिवागतम् ॥ ४ ॥
' निशाचर! हाथी, घोड़े और रथोंसे भरी हुई विशाल सेनाके बीचमें खड़े रहकर ( असंख्य राक्षसोंके स्वामित्वका अभिमान लेकर ) तूने सदा जो क्रूरतापूर्ण कर्म किया है, उसकी समस्त लोकोंद्वारा निन्दा हुई है । जो समस्त प्राणियोंको उद्वेगमें डालनेवाला, क्रूर और पापाचारी है, वह तीनों लोकोंका ईश्वर हो तो भी अधिक कालतक टिक नहीं सकता । जो लोकविरोधी कठोर कर्म करनेवाला है, उसे सब लोग सामने आये हुए दुष्ट सर्पकी भाँति मारते हैं॥२–४ ॥
लोभात् पापानि कुर्वाणः कामाद् वा यो न बुध्यते ।
हृष्टः पश्यति तस्यान्तं ब्राह्मणी करकादिव ॥ ५ ॥
' जो वस्तु प्राप्त नहीं हुई है, उसकी इच्छाको ' काम ' कहते हैं और प्राप्त हुई वस्तुको अधिक - से-अधिक संख्यामें पानेकी इच्छाका नाम ' लोभ ' है । जो काम अथवा लोभसे प्रेरित हो पाप करता है और उसके ( विनाशकारी ) परिणामको नहीं समझता है, उलटे उस पापमें हर्षका अनुभव करता है, वह उसी प्रकार अपना विनाशरूप परिणाम देखता है जैसे वर्षाके साथ गिरे हुए ओलेको खाकर ब्राह्मणी ( रक्तपुच्छिका ) नामवाली कीड़ी अपना विनाश देखती है * ॥ ५ ॥
वसतो दण्डकारण्ये तापसान् धर्मचारिणः ।
किं नु हत्वा महाभागान् फलं प्राप्स्यसि राक्षस ॥ ६ ॥
* लाल पूँछवाली एक कीड़ी होती है, जो ओला करता है — यह बात लोकमें प्रसिद्ध है । श्रीरामद्वारा उस गदाका खण्डन ‘ राक्षस! दण्डकारण्यमें निवास करनेवाले तपस्यामें संलग्न धर्मपरायण महाभाग मुनियोंकी हत्या करके न जाने तू कौन - सा फल पायेगा? ॥ ६ ॥
न चिरं पापकर्माणः क्रूरा लोकजुगुप्सिताः ।
ऐश्वर्यं प्राप्य तिष्ठन्ति शीर्णमूला इव द्रुमाः ॥ ७ ॥
' जिनकी जड़ खोखली हो गयी हो, वे वृक्ष जैसे अधिक कालतक नहीं खड़े रह सकते, उ प्रकार पापकर्म करनेवाले लोकनिन्दित क्रूर पुरुष ( किसी पूर्वपुण्यके प्रभावसे ) ऐश्वर्यको पाकर भी चिरकालतक उसमें प्रतिष्ठित नहीं रह पाते ( उससे भ्रष्ट हो ही जाते हैं ) ॥७ ॥
अवश्यं लभते कर्ता फलं पापस्य कर्मणः ।
घोरं पर्यागते काले द्रुमः पुष्पमिवार्तवम् ॥ ८ ॥
' जैसे समय आनेपर वृक्षमें ऋतुके अनुसार फूल लगते ही हैं, उसी प्रकार पापकर्म करनेवाले पुरुषको समयानुसार अपने उस पापकर्मका भयंकर फल अवश्य ही प्राप्त होता है ॥ ८ ॥
नचिरात् प्राप्यते लोके पापानां कर्मणां फलम् ।
सविषाणामिवान्नानां भुक्तानां क्षणदाचर ॥ ९ ॥
' निशाचर! जैसे खाये हुए विषमिश्रित अन्नका परिणाम तुरंत ही भोगना पड़ता है, उसी प्रकार लोकमें किये गये पापकर्मोंका फल शीघ्र ही प्राप्त होता है॥९॥
पापमाचरतां घोरं लोकस्याप्रियमिच्छताम् ।
अहमासादितो राज्ञा प्राणान् हन्तुं निशाचर ॥ १० ॥
' राक्षस! जो संसारका बुरा चाहते हुए घोर पापकर्ममें लगे हुए हैं, उन्हें प्राणदण्ड देनेके लिये मेरे पिता महाराज दशरथने मुझे यहाँ वनमें भेजा है ॥ १० ॥
अद्य भित्त्वा मया मुक्ताः शराः काञ्चनभूषणाः ।
विदार्यातिपतिष्यन्ति वल्मीकमिव पन्नगाः ॥ ११ ॥
' आज मेरे छोड़े हुए सुवर्णभूषित बाण जैसे सर्प बाँबीको छेदकर निकलते हैं, उसी प्रकार तेरे शरीरको फाड़कर पृथ्वीको भी विदीर्ण करके पातालमें । जाकर गिरेंगे ॥ ११ ॥
खा लेनेपर मर जाती है । वह उसके लिये विषका काम
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अरण्यकाण्डे एकोनत्रिंशः सर्गः ६२१
ये त्वया दण्डकारण्ये भक्षिता धर्मचारिणः ।
तानद्य निहतः संख्ये ससैन्योऽनुगमिष्यसि ॥ १२ ॥
' तूने दण्डकारण्यमें जिन धर्मपरायण ऋषियोंका भक्षण किया है, आज युद्धमें मारा जाकर सेनासहित तू भी उन्हींका अनुसरण करेगा ॥ १२ ॥
अद्य त्वां निहतं बाणैः पश्यन्तु परमर्षयः ।
निरयस्थं विमानस्था ये त्वया निहताः पुरा ॥ १३ ॥
' पहले तूने जिनका वध किया है, वे महर्षि विमानपर बैठकर आज तुझे मेरे बाणोंसे मारा गया और नरकतुल्य कष्ट भोगता हुआ देखें ॥१३ ॥
प्रहरस्व यथाकामं कुरु यत्नं कुलाधम ।
अद्य ते पातयिष्यामि शिरस्तालफलं यथा ॥ १४ ॥
' कुलाधम! तेरी जितनी इच्छा हो, प्रहार कर । जितना सम्भव हो, मुझे परास्त करनेका प्रयत्न कर, किंतु आज मैं तेरे मस्तकको ताड़के फलकी भाँति अवश्य काट गिराऊँगा ' ॥ १४ ॥
एवमुक्तस्तु रामेण क्रुद्धः संरक्तलोचनः ।
प्रत्युवाच ततो रामं प्रहसन् क्रोधमूर्च्छितः ॥ १५ ॥
श्रीरामके ऐसा कहनेपर खर कुपित हो उठा । उसकी आँखें लाल हो गयीं । वह क्रोधसे अचेत - सा होकर हँसता हुआ श्रीरामको इस प्रकार उत्तर देने लगा— ॥ १५ ॥
प्राकृतान् राक्षसान् हत्वा युद्धे दशरथात्मज ।
आत्मना कथमात्मानमप्रशस्यं प्रशंससि ॥ १६ ॥
' दशरथकुमार! तुम साधारण राक्षसोंको युद्धमें मारकर स्वयं ही अपनी इतनी प्रशंसा कैसे कर रहे हो? तुम प्रशंसाके योग्य कदापि नहीं हो ॥ १६ ॥
विक्रान्ता बलवन्तो वा ये भवन्ति नरर्षभाः ।
कथयन्ति न ते किंचित् तेजसा चातिगर्विताः ॥ १७ ॥
' जो श्रेष्ठ पुरुष पराक्रमी अथवा बलवान् होते हैं, वे अपने प्रतापके कारण अधिक घमंडमें भरकर कोई बात नहीं कहते हैं ( अपने विषयमें मौन ही रहते हैं ) ॥ १७ ॥
प्राकृतास्त्वकृतात्मानो लोके क्षत्रियपांसनाः ।
निरर्थकं विकत्थन्ते यथा राम विकत्थसे ॥ १८ ॥
' राम! जो क्षुद्र, अजितात्मा और क्षत्रियकुलकलंक होते हैं, वे ही संसारमें अपनी बड़ाईके लिये व्यर्थ डींग हाँका करते हैं; जैसे इस समय तुम ( अपने विषयमें ) बढ़ - बढ़कर बातें बना रहे हो ॥ १८ ॥
कुलं व्यपदिशन् वीरः समरे कोऽभिधास्यति ।
मृत्युकाले तु सम्प्राप्ते स्वयमप्रस्तवे स्तवम् ॥ १ ९ ॥
' जब कि मृत्युके समान युद्धका अवसर उपस्थित है, ऐसे समयमें बिना किसी प्रस्तावके ही समराङ्गणमें कौन वीर अपनी कुलीनता प्रकट करता हुआ आप ही अपनी स्तुति करेगा? ॥ १ ९ ॥
सर्वथा तु लघुत्वं ते कत्थनेन विदर्शितम् ।
। सुवर्णप्रतिरूपेण नेव कुशाग्निना ॥ २० ॥
' जैसे पीतल सुवर्णशोधक आगमें तपाये जानेपर अपनी लघुता ( कालेपन ) को ही व्यक्त करता है, उसी प्रकार अपनी झूठी प्रशंसाके द्वारा तुमने सर्वथा अपने ओछेपनका ही परिचय दिया है ॥ २० ॥
न तु मामिह तिष्ठन्तं पश्यसि त्वं गदाधरम् ।
धराधरमिवाकम्प्यं पर्वतं धातुभिश्चितम् ॥ २१ ॥
' क्या तुम नहीं देखते कि मैं नाना प्रकार धातुओंकी खानोंसे युक्त तथा पृथ्वीको धारण करनेवाले अविचल कुलपर्वतके समान यहाँ स्थिरभावसे तुम्हारे सामने गदा लेकर खड़ा हूँ ॥ २१ ॥
पर्याप्तोऽहं गदापाणिर्हन्तुं प्राणान् रणे तव ।
त्रयाणामपि लोकानां पाशहस्त इवान्तकः ॥ २२ ॥
' मैं अकेला ही पाशधारी यमराजकी भाँति गदा हाथमें लेकर रणभूमिमें तुम्हारे और तीनों लोकोंके भी प्राण लेनेकी शक्ति रखता हूँ ॥ २२ ॥
कामं बह्वपि वक्तव्यं त्वयि वक्ष्यामि न त्वहम् ।
अस्तं प्राप्नोति सविता युद्धविघ्नस्ततो भवेत् ॥ २३ ॥
' यद्यपि तुम्हारे विषयमें मैं इच्छानुसार बहुत कुछ कह सकता हूँ तथापि इस समय कुछ नहीं कहूँगा; क्योंकि सूर्यदेव अस्ताचलको जा रहे हैं, अतः युद्धमें विघ्न पड़ जायगा ॥ २३ ॥
चतुर्दश सहस्राणि राक्षसानां हतानि ते ।
त्वद्विनाशात् करोम्यद्य तेषामश्रुप्रमार्जनम् ॥ २४ ॥
' तुमने चौदह हजार राक्षसोंका संहार किया है, अतः आज तुम्हारा भी विनाश करके मैं उन सबके आँसू पोछूंगा — उनकी मौतका बदला चुकाऊँगा ' ॥ २४ ॥
इत्युक्त्वा परमक्रुद्धः स गदां परमाङ्गदाम् ।
खरश्चिक्षेप रामाय प्रदीप्तामशनिं यथा ॥ २५ ॥
ऐसा कहकर अत्यन्त क्रोधसे भरे हुए खरने उत्तम वलय ( कड़े ) से विभूषित तथा प्रज्वलित वज्रके समान भयंकर गदाको श्रीरामचन्द्रजीके ऊपर चलाया ॥ २५ ॥
खरबाहुप्रमुक्ता सा प्रदीप्ता महती गदा ।
भस्म वृक्षांश्च गुल्मांश्च कृत्वागात् तत्समीपतः ॥ २६ ॥
खरके हाथोंसे छूटी हुई वह दीप्तिमान् विशाल
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६२२ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे गदा वृक्षों और लताओंको भस्म करके उनके समीप | आकाशमें ही उसके टुकड़े - टुकड़े कर डाले ॥ २७ ॥
जा पहुँची ॥२६ ॥ सा विशीर्णा शरैर्भिन्ना पपात धरणीतले ।
तामापतन्तीं महतीं मृत्युपाशोपमां गदाम् । गदा मन्त्रौषधिबलैर्व्यालीव विनिपातिता ॥ २८ ॥
अन्तरिक्षगतां रामश्चिच्छेद बहुधा शरैः ॥ २७ ॥ बाणोंसे विदीर्ण एवं चूर - चूर होकर वह गदा
मृत्युके पाशकी भाँति उस विशाल गदाको अपने पृथ्वीपर गिर पड़ी, मानो कोई सर्पिणी मन्त्र और ऊपर आती देख श्रीरामचन्द्रजीने अनेक बाण मारकर | ओषधियोंके बलसे गिरायी गयी हो ॥ २८ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे एकोनत्रिंशः सर्गः ॥ २ ९ ॥ इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें उनतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ २ ९ ॥ त्रिंशः सर्गः श्रीराम व्यङ्ग करनेपर खरका उन्हें फटकारकर उनके ऊपर सालवृक्षका प्रहार करना, श्रीरामका उस वृक्षको काटकर एक तेजस्वी बाणसे खरको मार गिराना तथा देवताओं और
भित्त्वा तु तां गदां बाणै राघवो धर्मवत्सलः ।
स्मयमान इदं वाक्यं संरब्धमिदमब्रवीत् ॥ १ ॥
धर्मप्रेमी भगवान् श्रीरामने अपने बाणोंद्वारा खरकी उस गदाको विदीर्ण करके मुसकराते हुए यह रोषसूचक बात कही -॥१ ॥
एतत् ते बलसर्वस्वं दर्शितं राक्षसाधम ।
शक्तिहीनतरो मत्तो वृथा त्वमुपगर्जसि ॥ २ ॥
' राक्षसाधम! यही तेरा सारा बल है, जिसे तूने इस गदाके साथ दिखाया है । अब सिद्ध हो गया कि तू मुझसे अत्यन्त शक्तिहीन है, व्यर्थ ही अपने बलकी डींग हाँक रहा था ॥ २ ॥
एषा बाणविनिर्भिन्ना गदा भूमितलं गता ।
अभिधानप्रगल्भस्य तव प्रत्ययघातिनी ॥ ३ ॥
' मेरे बाणोंसे छिन्न - भिन्न होकर तेरी यह गदा पृथ्वीपर पड़ी हुई है । तेरे मनमें जो यह विश्वास था कि मैं इस गदासे शत्रुका वध कर डालूँगा, इसका खण्डन तेरी इस गदाने ही कर दिया । अब यह स्पष्ट हो गया कि तू केवल बातें बनानेमें ढीठ है ( तुझसे कोई पराक्रम नहीं हो सकता ) ॥ ३ ॥
यत् त्वयोक्तं विनष्टानामिदमश्रुप्रमार्जनम् ।
राक्षसानां करोमीति मिथ्या तदपि ते वचः ॥ ४ ॥
' तूने जो यह कहा था कि मैं तुम्हारा वध करके तुम्हारे हाथसे मारे गये राक्षसोंका अभी आँसू पोछूंगा, तेरी वह बात भी झूठी हो गयी ॥ ४ ॥
नीचस्य क्षुद्रशीलस्य मिथ्यावृत्तस्य रक्षसः ।
प्राणानपहरिष्यामि गरुत्मानमृतं यथा ॥ ५ ॥
महर्षियोंद्वारा श्रीरामकी प्रशंसा ' तू नीच, क्षुद्रस्वभावसे युक्त और मिथ्याचारी राक्षस है । मैं तेरे प्राणोंको उसी प्रकार हर लूँगा, जैसे गरुड़ने देवताओंके यहाँसे अमृतका अपहरण किया था ॥ ५ ॥
अद्य ते भिन्नकण्ठस्य फेनबुद्बुदभूषितम् ।
विदारितस्य मद्बाणैर्मही पास्यति शोणितम् ॥ ६ ॥
' अब मैं अपने बाणोंसे तेरे शरीरको विदीर्ण करके तेरा गला भी काट डालूँगा । फिर यह पृथ्वी फेन और बुदबुदोंसे युक्त तेरे गरम - गरम रक्तका पान करेगी ॥ ६ ॥
पांसुरूषितसर्वाङ्गः स्त्रस्तन्यस्तभुजद्वयः ।
स्वप्स्यसे गां समाश्लिष्य दुर्लभां प्रमदामिव ॥ ७ ॥
' तेरे सारे अङ्ग धूलसे धूसर हो जायँगे, तेरी दोनों भुजाएँ शरीरसे अलग होकर पृथ्वीपर गिर जायँगी और उस दशामें तू दुर्लभ युवतीके समान इस पृथ्वीका आलिङ्गन करके सदाके लिये सो जायगा ॥ ७ ॥
। प्रवृद्धनिद्रे शयिते त्वयि राक्षसपांसने ।
भविष्यन्ति शरण्यानां शरण्या दण्डका इमे ॥ ८ ॥
' तेरे - जैसे राक्षसकुलकलङ्कके सदाके लिये महानिद्रामें सो जानेपर ये दण्डकवनके प्रदेश शरणार्थियोंको शरण देनेवाले हो जायँगे ॥ ८ ॥
जनस्थाने हतस्थाने तव राक्षस मच्छौः ।
निर्भया विचरिष्यन्ति सर्वतो मुनयो वने ॥ ९ ॥
' राक्षस! मेरे बाणोंसे जनस्थानमें बने हुए तेरे निवासस्थानके नष्ट हो जानेपर मुनिगण इस वनमें सब ओर निर्भय विचर सकेंगे ॥ ९ ॥
अद्य विप्रसरिष्यन्ति राक्षस्यो हतबान्धवाः ।
बाष्पार्द्रवदना दीना भयादन्यभयावहाः ॥ १० ॥
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अरण्यकाण्डे त्रिंशः सर्गः ६२३ ' जो अबतक दूसरोंको भय देती थीं, वे राक्षसियाँ । आज अपने बान्धवजनोंके मारे जानेसे दीन हो आँसुओंसे भींगे मुँह लिये जनस्थानसे स्वयं ही भयके कारण भाग जायँगी ॥ १० ॥
अद्य शोकरसज्ञास्ता भविष्यन्ति निरर्थिकाः ।
अनुरूपकुलाः पत्न्यो यासां त्वं पतिरीदृशः ॥ ११ ॥
' जिनका तुझ - जैसा दुराचारी पति है, वे तदनुरूप कुलवाली तेरी पत्नियाँ आज तेरे मारे जानेपर काम आदि पुरुषार्थोंसे वञ्चित हो शोकरूपी स्थायी भाववाले करुणरसका अनुभव करनेवाली होंगी ॥ ११ ॥
नृशंसशील क्षुद्रात्मन् नित्यं ब्राह्मणकण्टक ।
त्वत्कृते शङ्कितैरग्नौ मुनिभिः पात्यते हविः ॥ १२ ॥
' क्रूरस्वभाववाले निशाचर! तेरा हृदय सदा ही क्षुद्र विचारोंसे भरा रहता है । तू ब्राह्मणोंके लिये कण्टकरूप है । तेरे ही कारण मुनिलोग शङ्कित रहकर ही अग्निमें हविष्यकी आहुतियाँ डालते हैं'॥१२ ॥
तमेवमभिसंरब्धं ब्रुवाणं राघवं वने ।
खरो निर्भर्त्सयामास रोषात् खरतरस्वरः ॥ १३ ॥
वनमें श्रीरामचन्द्रजी जब इस प्रकार रोषपूर्ण बातें कह रहे थे, उस समय क्रोधके कारण खरका भी स्वर अत्यन्त कठोर हो गया और उसने उन्हें फटकारते हुए कहा— ॥ १३ ॥
दृढं खल्ववलिप्तोऽसि भयेष्वपि च निर्भयः ।
वाच्यावाच्यं ततो हि त्वं मृत्योर्वश्यो न बुध्यसे ॥ १४ ॥
' अहो! निश्चय ही तुम बड़े घमंडी हो, " भयके अवसरोंपर भी निर्भय बने हुए हो । जान पड़ता है कि तुम मृत्युके अधीन हो गये हो, इस कारणसे ही तुम्हें यह भी पता नहीं है कि कब क्या कहना चाहिये और क्या नहीं कहना चाहिये? ॥ १४ ॥
कालपाशपरिक्षिप्ता भवन्ति पुरुषा हि ये ।
कार्याकार्यं न जानन्ति ते निरस्तषडिन्द्रियाः ॥ १५ ॥
' जो पुरुष कालके फन्देमें फँस जाते हैं, उनकी छहों इन्द्रियाँ बेकाम हो जाती हैं; इसीलिये उन्हें कर्तव्य और अकर्तव्यका ज्ञान नहीं रह जाता है ' ॥ १५ ॥
एवमुक्त्वा ततो रामं संरुध्य भृकुटिं ततः ।
स ददर्श महासालमविदूरे निशाचरः ॥ १६ ॥
रणे प्रहरणस्यार्थे सर्वतो ह्यवलोकयन् ।
स तमुत्पाटयामास संदष्टदशनच्छ्दम् ॥ १७ ॥
ऐसा कहकर उस निशाचरने एक बार श्रीरामकी ओर भौंहें टेंढ़ी करके देखा और रणभूमिमें उनपर प्रहार करनेके लिये वह चारों ओर दृष्टिपात करने लगा । इतनेमें ही उसे एक विशाल साखूका वृक्ष दिखायी दिया, जो निकट ही था । खरने अपने होठोंको दाँतोंसे दबाकर उस वृक्षको उखाड़ लिया ॥१६-१७ ॥
तं समुत्क्षिप्य बाहुभ्यां विनर्दित्वा महाबलः ।
राममुद्दिश्य चिक्षेप हतस्त्वमिति चाब्रवीत् ॥ १८ ॥
फिर उस महाबली निशाचरने विकट गर्जना करके दोनों हाथोंसे उस वृक्षको उठा लिया और श्रीरामपर दे मारा । साथ ही यह भी कहा — ' लो, अब तुम मारे गये ' ॥ १८ ॥।
तमापतन्तं बाणौघैश्छित्त्वा रामः प्रतापवान् ।
रोषमाहारयत् तीव्रं निहन्तुं समरे खरम् ॥ १ ९ ॥
परमप्रतापी भगवान् श्रीरामने अपने ऊपर आते हुए उस वृक्षको बाण - समूहोंसे काट गिराया और उस समरभूमिमें खरको मार डालनेके लिये अत्यन्त क्रोध प्रकट किया ॥ १ ९ ॥।
जातस्वेदस्ततो रामो रोषरक्तान्तलोचनः ।
निर्बिभेद सहस्रेण बाणानां समरे खरम् ॥ २० ॥
उस समय श्रीरामके शरीरमें पसीना आ गया । उनके नेत्रप्रान्त रोषसे रक्तवर्णके हो गये । उन्होंने सहस्रों बाणोंका प्रहार करके समराङ्गणमें खरको क्षत - विक्षत कर दिया ॥ २० ॥
तस्य बाणान्तराद् रक्तं बहु सुस्राव फेनिलम् ।
गिरेः प्रस्रवणस्येव धाराणां च परिस्रवः ॥ २१ ॥
उनके बाणोंके आघातसे उस निशाचरके शरीरमें जो घाव हुए थे, उनसे अधिक मात्रामें फेनयुक्त रक्त प्रवाहित होने लगा, मानो पर्वतके झरनेसे जलकी धाराएँ गिर रही हों ॥ २१ ॥
विकलः स कृतो बाणैः खरो रामेण संयुगे ।
मत्तो रुधिरगन्धेन तमेवाभ्यद्रवद् द्रुतम् ॥ २२ ॥
श्रीरामने युद्धस्थलमें अपने बाणोंकी मारसे खरको व्याकुल कर दिया; तो भी ( उसका साहस कम नहीं हुआ । ) वह खूनकी गन्धसे उन्मत्त होकर बड़े वेगसे श्रीरामकी ओर ही दौड़ा ॥ २२ ॥
तमापतन्तं संक्रुद्धं कृतास्त्रो रुधिराप्लुतम् ।
अपासर्पद् द्वित्रिपदं किंचित्त्वरितविक्रमः ॥ २३ ॥
अस्त्र - विद्याके ज्ञाता भगवान् श्रीरामने देखा कि यह राक्षस खूनसे लथपथ होनेपर भी अत्यन्त क्रोधपूर्वक मेरी ही ओर बढ़ा आ रहा है तो वे तुरंत | चरणोंका संचालन करके दो - तीन पग पीछे हट गये
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६२४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे ( क्योंकि बहुत निकट होनेपर बाण चलाना सम्भव नहीं हो सकता था ) ॥ २३ ॥
ततः पावकसंकाशं वधाय समरे शरम् ।
खरस्य रामो जग्राह ब्रह्मदण्डमिवापरम् ॥ २४ ॥
तदनन्तर श्रीरामने समराङ्गणमें खरका वध करनेके लिये एक अग्निके समान तेजस्वी बाण हाथमें लिया, जो दूसरे ब्रह्मदण्डके समान भयंकर था ॥ २४ ॥
स तद् दत्तं मघवता सुरराजेन धीमता ।
संदधे च स धर्मात्मा मुमोच च खरं प्रति ॥ २५ ॥
वह बाण बुद्धिमान् देवराज इन्द्रका दिया हुआ था । धर्मात्मा श्रीरामने उसे धनुषपर रखा और खरको लक्ष्य करके छोड़ दिया ॥ २५ ॥
स विमुक्तो महाबाणो निर्घातसमनिःस्वनः ।
रामेण धनुरायम्य खरस्योरसि चापतत् ॥ २६ ॥
उस महाबाणके छूटते ही वज्रपातके समान भयानक शब्द हुआ । श्रीरामने अपने धनुषको कानतक खींचकर उसे छोड़ा था । वह खरकी छातीमें जा लगा ॥ २६ ॥
स पपात खरो भूमौ दह्यमानः शराग्निना ।
रुद्रेणेव विनिर्दग्धः श्वेतारण्ये यथान्धकः ॥ २७ ॥
जैसे श्वेतवनमें भगवान् रुद्रने अन्धकासुरको जलाकर भस्म किया था, उसी प्रकार दण्डकवनमें श्रीरामके उस बाणकी आगमें जलता हुआ निशाचर खर पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ २७ ॥
स वृत्र इव वज्रेण फेनेन नमुचिर्यथा ।
बलो वेन्द्राशनिहतो निपपात हतः खरः ॥ २८ ॥
जैसे वज्रसे वृत्रासुर, फेनसे नमुचि और इन्द्रकी अशनिसे बलासुर मारा गया था, उसी प्रकार श्रीरामके उस बाणसे आहत होकर खर धराशायी हो गया ॥ २८ ॥
एतस्मिन्नन्तरे देवाश्चारणैः सह संगताः ।
दुन्दुभींश्चाभिनिघ्नन्तः पुष्पवर्षं समन्ततः ॥ २ ९ ॥
रामस्योपरि संहृष्टा ववर्षुर्विस्मितास्तदा ।
अर्धाधिकमुहूर्तेन रामेण निशितैः शरैः ॥ ३० ॥
चतुर्दश सहस्त्राणि रक्षसां कामरूपिणाम् ।
खरदूषणमुख्यानां निहतानि महामृधे ॥ ३१ ॥
इसी समय देवता चारणोंके साथ मिलकर आये और हर्षमें भरकर दुन्दुभि बजाते हुए वहाँ श्रीरामके ऊपर चारों ओरसे फूलोंकी वर्षा करने लगे । उस समय उन्हें यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ था कि श्रीरामने अपने पैने बाणोंसे डेढ़ मुहूर्तमें ही इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले खर - दूषण आदि चौदह हजार राक्षसोंका इस । महासमरमें संहार कर डाला ॥ २ ९ –३१ ॥
अहो बत महत्कर्म रामस्य विदितात्मनः ।
अहो वीर्यमहो दार्द्धं विष्णोरिव हि दृश्यते ॥ ३२ ॥
वे बोले –'अहो! अपने स्वरूपको जाननेवाले भगवान् श्रीरामका यह कर्म महान् और अद्भुत है, इनका बल - पराक्रम भी अद्भुत है और इनमें भगवान् विष्णुकी भाँति आश्चर्यजनक दृढ़ता दिखायी देती है'॥३२ ॥
इत्येवमुक्त्वा ते सर्वे ययुर्देवा यथागतम् ।
ततो राजर्षयः सर्वे संगताः परमर्षयः ॥ ३३ ॥
सभाज्य मुदिता रामं सागस्त्या इदमब्रुवन् । ऐसा कहकर वे सब देवता जैसे आये थे, वैसे ही चले गये । तदनन्तर बहुत - से राजर्षि और अगस्त्य आदि महर्षि मिलकर वहाँ आये तथा प्रसन्नतापूर्वक श्रीरामका सत्कार करके उनसे इस प्रकार बोले - ॥ ३३३ ॥
एतदर्थं महातेजा महेन्द्रः पाकशासनः ॥ ३४ ॥
शरभङ्गाश्रमं पुण्यमाजगाम पुरंदरः ।
आनीतस्त्वमिमं देशमुपायेन महर्षिभिः ॥ ३५ ॥
' रघुनन्दन! इसीलिये महातेजस्वी पाकशासन पुरंदर इन्द्र शरभङ्ग मुनिके पवित्र आश्रमपर आये थे और इसी कार्यकी सिद्धिके लिये महर्षियोंने विशेष उपाय करके आपको पञ्चवटीके इस प्रदेशमें पहुँचाया था ॥ ३४-३५ ॥
एषां वधार्थं शत्रूणां रक्षसां पापकर्मणाम् ।
तदिदं नः कृतं कार्यं त्वया दशरथात्मज ॥ ३६ ॥
स्वधर्मं प्रचरिष्यन्ति दण्डकेषु महर्षयः । ' मुनियोंके शत्रुरूप इन पापाचारी राक्षसोंके वधके लिये ही आपका यहाँ शुभागमन आवश्यक समझा गया था । दशरथनन्दन! आपने हमलोगोंका यह बहुत बड़ा कार्य सिद्ध कर दिया । अब बड़े - बड़े ऋषि - मुनि दण्डकारण्यके विभिन्न प्रदेशोंमें निर्भय होकर अपने धर्मका अनुष्ठान करेंगे ' ॥ ३६३ ॥
एतस्मिन्नन्तरे वीरो लक्ष्मणः सह सीतया ।
। गिरिदुर्गाद् विनिष्क्रम्य संविवेशाश्रमे सुखी ॥ ३७ ॥
। इसी बीचमें वीर लक्ष्मण भी सीताके साथ पर्वतकी कन्दरासे निकलकर प्रसन्नतापूर्वक आश्रममें आ गये ॥ ततो रामस्तु विजयी पूज्यमानो महर्षिभिः ॥ ३८ ॥
प्रविवेशाश्रमं वीरो लक्ष्मणेनाभिपूजितः । तत्पश्चात् महर्षियोंसे प्रशंसित और लक्ष्मणसे पूजित विजयी वीर श्रीरामने आश्रममें प्रवेश किया ॥ ३८३ ॥
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अरण्यकाण्डे तं दृष्ट्वा शत्रुहन्तारं महर्षीणां सुखावहम् ॥ ३ ९ ॥ बभूव हृष्टा वैदेही भर्तारं परिषस्वजे ।
मुदा परमया युक्ता दृष्ट्वा रक्षोगणान् हतान् ।
रामं चैवाव्ययं दृष्ट्वा तुतोष जनकात्मजा ॥ ४० ॥
महर्षियोंको सुख देनेवाले अपने शत्रुहन्ता पतिका दर्शन करके विदेहराजनन्दिनी सीताको बड़ा हर्ष हुआ । उन्होंने परमानन्दमें निमग्न होकर अपने स्वामीका आलिङ्गन किया । राक्षस - समूह मारे गये और श्रीरामको कोई क्षति नहीं पहुँची – यह देख और जानकर जानकीजीको बहुत संतोष हुआ ॥ ३ ९ -४० ॥ एकत्रिंशः सर्गः ६२५ | ततस्तु तं राक्षससङ्घमर्दनं सम्पूज्यमानं मुदितैर्महात्मभिः । पुनः परिष्वज्य मुदान्वितानना बभूव हृष्टा जनकात्मजा तदा ॥ ४१ ॥
प्रसन्नतासे भरे हुए महात्मा मुनि जिनकी भूरि - भूरि प्रशंसा कर रहे थे तथा जिन्होंने राक्षसोंके समुदायको कुचल डाला था, उन प्राणवल्लभ, श्रीरामका बारम्बार आलिङ्गन करके उस समय जनकनन्दिनी सीताको बड़ा हर्ष हुआ । उनका मुख प्रसन्नतासे खिल ` उठा ॥ ४१ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे त्रिंशः सर्गः ॥ ३० ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३० ॥
एकत्रिंशः सर्गः रावणका अकम्पनकी सलाहसे सीताका अपहरण करनेके लिये जाना और मारीचके कहनेसे लङ्काको लौट आना
त्वरमाणस्ततो गत्वा जनस्थानादकम्पनः ।
प्रविश्य लङ्कां वेगेन रावणं वाक्यमब्रवीत् ॥ १ ॥
तदनन्तर जनस्थानसे अकम्पन नामक राक्षस बड़ी उतावलीके साथ लङ्काकी ओर गया और शीघ्र ही उस पुरीमें प्रवेश करके रावणसे इस प्रकार बोला – ॥ १ ॥
जनस्थानस्थिता राजन् राक्षसा बहवो हताः ।
खरश्च निहतः संख्ये कथंचिदहमागतः ॥ २ ॥
' राजन्! जनस्थानमें जो बहुत - से राक्षस रहते थे, वे मार डाले गये । खर युद्धमें मारा गया । मैं किसी तरह जान बचाकर यहाँ आया हूँ ' ॥ २ ॥
एवमुक्तो दशग्रीवः क्रुद्धः संरक्तलोचनः ।
अकम्पनमुवाचेदं निर्दहन्निव तेजसा ॥ ३ ॥
अकम्पनके ऐसा कहते ही दशमुख रावण क्रोधसे जल उठा और लाल आँखें करके उससे इस तरह बोला, मानो उसे अपने तेजसे जलाकर भस्म कर डालेगा ॥ ३ ॥
केन भीमं जनस्थानं हृतं मम परासुना ।
को हि सर्वेषु लोकेषु गतिं नाधिगमिष्यति ॥ ४ ॥
वह बोला - ' कौन मौतके मुखमें जाना चाहता है, जिसने मेरे भयंकर जनस्थानका विनाश किया है? कौन वह दुःसाहसी है, जिसे समस्त लोकोंमें कहीं भी ठौर - ठिकाना नहीं मिलनेवाला है? ॥४ ॥
न हि मे विप्रियं कृत्वा शक्यं मघवता सुखम् ।
प्राप्तुं वैश्रवणेनापि न यमेन च विष्णुना ॥ ५॥
' मेरा अपराध करके इन्द्र, यम, कुबेर और विष्णु भी चैनसे नहीं रह सकेंगे ॥ ५ ॥
कालस्य चाप्यहं कालो दहेयमपि पावकम् ।
मृत्युं मरणधर्मेण संयोजयितुमुत्सहे ॥ ६ ॥
' मैं कालका भी काल हूँ, आगको भी जला सकता हूँ तथा मौतको भी मृत्युके मुखमें डाल सकता हूँ ॥ ६ ॥
वातस्य तरसा वेगं निहन्तुमपि चोत्सहे ।
दहेयमपि संक्रुद्धस्तेजसाऽऽदित्यपावकौ ॥ ७ ॥
' यदि मैं क्रोधमें भर जाऊँ तो अपने वेगसे वायुकी गतिको भी रोक सकता हूँ तथा अपने तेजसे सूर्य और अग्निको भी जलाकर भस्म कर सकता हूँ " ॥ ७ ॥
तथा कुद्धं दशग्रीवं कृताञ्जलिरकम्पनः ।
भयात् संदिग्धया वाचा रावणं याचतेऽभयम् ॥ ८ ॥
रावणको इस प्रकार क्रोधसे भरा देख भयके मारे । अकम्पनकी बोलती बंद हो गयी । उसने हाथ जोड़कर संशययुक्त वाणीमें रावणसे अभयकी याचना की ॥८ ॥
दशग्रीवोऽभयं तस्मै प्रददौ रक्षसां वरः ।
स विस्रब्धोऽब्रवीद् वाक्यमसंदिग्धमकम्पनः ॥ ९ ॥
तब राक्षसोंमें श्रेष्ठ दशग्रीवने उसे अभयदान दिया । इससे अकम्पनको अपने प्राण बचनेका विश्वास हुआ और वह संशयरहित होकर बोला - ॥९ ॥
पुत्रो दशरथस्यास्ते सिंहसंहननो युवा ।
। रामो नाम महास्कन्धो वृत्तायतमहाभुजः ॥ १० ॥
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६२६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे
श्यामः पृथुयशाः श्रीमानतुल्यबलविक्रमः ।
हतस्तेन जनस्थाने खरश्च सहदूषणः ॥ ११ ॥
' राक्षसराज! राजा दशरथके नवयुवक पुत्र श्रीराम पञ्चवटीमें रहते हैं । उनके शरीरकी गठन सिंहके समान है, कंधे मोटे और भुजाएँ गोल तथा लम्बी हैं, शरीरका रंग साँवला है । वे बड़े यशस्वी और तेजस्वी दिखायी देते हैं । उनके बल और पराक्रमकी कहीं तुलना नहीं है । उन्होंने जनस्थानमें रहनेवाले खर और दूषण आदिका वध किया है ' ॥ १०-११ ॥
अकम्पनवचः श्रुत्वा रावणो राक्षसाधिपः ।
नागेन्द्र इव निःश्वस्य इदं वचनमब्रवीत् ॥ १२ ॥
अकम्पनकी यह बात सुनकर राक्षसराज रावणने नागराज ( महान् सर्प ) की भाँति लम्बी साँस खींचकर इस प्रकार कहा- ॥ १२ ॥
स सुरेन्द्रेण संयुक्तो रामः सर्वामरैः सह ।
उपयातो जनस्थानं ब्रूहि कच्चिदकम्पन ॥ १३ ॥
अकम्पन! बताओ तो सही क्या राम सम्पूर्ण देवताओं तथा देवराज इन्द्रके साथ जनस्थानमें आये हैं? ' ॥ १३ ॥
रावणस्य पुनर्वाक्यं निशम्य तदकम्पनः ।
आचचक्षे बलं तस्य विक्रमं च महात्मनः ॥ १४ ॥
रावणका यह प्रश्न सुनकर अकम्पनने महात्मा श्रीरामके बल और पराक्रमका पुनः इस प्रकार वर्णन किया—
रामो नाम महातेजाः श्रेष्ठः सर्वधनुष्मताम् ।
दिव्यास्त्रगुणसम्पन्नः परं धर्मं गतो युधि ॥ १५ ॥
' लङ्केश्वर! जिनका नाम राम है, वे संसारके समस्त धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ और अत्यन्त तेजस्वी हैं । दिव्यास्त्रोंके प्रयोगका जो गुण है, उससे भी वे पूर्णतः सम्पन्न हैं । युद्धकी कलामें तो वे पराकाष्ठाको पहुँचे हुए हैं ॥ १५ ॥
तस्यानुरूपो बलवान् रक्ताक्षो दुन्दुभिस्वनः ।
कनीयाँल्लक्ष्मणो भ्राता राकाशशिनिभाननः ॥ १६ ॥
' श्रीरामके साथ उनके छोटे भाई लक्ष्मण भी हैं, जो उन्हींके समान बलवान् हैं । उनका मुख पूर्णिमाके चन्द्रमाकी भाँति मनोहर है । उनकी आँखें कुछ - कुछ लाल हैं और स्वर दुन्दुभिके समान गम्भीर है ॥ १६ ॥
स तेन सह संयुक्तः पावकेनानिलो यथा ।
श्रीमान् राजवरस्तेन जनस्थानं निपातितम् ॥१७ ॥
' जैसे अग्निके साथ वायु हों, उसी प्रकार अपने भाईके साथ संयुक्त हुए राजाधिराज श्रीमान् राम बड़े प्रबल हैं । उन्होंने ही जनस्थानको उजाड़ डाला है ॥ १७ ॥
नैव देवा महात्मानो नात्र कार्या विचारणा ।
शरा रामेण तूत्सृष्टा रुक्मपुङ्खाः पतत्त्रिणः ॥१८ ॥
सर्पाः पञ्चानना भूत्वा भक्षयन्ति स्म राक्षसान् । ' उनके साथ न कोई देवता हैं, न महात्मा मुनि । इस विषयमें आप कोई विचार न करें । श्रीरामके छोड़े हुए सोनेकी पाँखवाले बाण पाँच मुखवाले सर्प बनकर राक्षसोंको खा जाते थे ॥१८३ ॥
येन येन च गच्छन्ति राक्षसा भयकर्षिताः ॥ १ ९ ॥
तेन तेन स्म पश्यन्ति राममेवाग्रतः स्थितम् ।
इत्थं विनाशितं तेन जनस्थानं तवानघ ॥ २० ॥
' भयसे कातर हुए राक्षस जिस - जिस मार्गसे भागते थे, वहाँ - वहाँ वे श्रीरामको ही अपने सामने खड़ा देखते थे । अनघ! इस प्रकार अकेले श्रीरामने ही आपके जनस्थानका विनाश किया है ' ॥ १ ९ -२० ॥
अकम्पनवचः श्रुत्वा रावणो वाक्यमब्रवीत् ।
गमिष्यामि जनस्थानं रामं हन्तुं सलक्ष्मणम् ॥ २१ ॥
अकम्पनकी यह बात सुनकर रावणने कहा-' मैं अभी लक्ष्मणसहित रामका वध करनेके लिये जनस्थानको जाऊँगा ' ॥ २१ ॥
अथैवमुक्ते वचने प्रोवाचेदमकम्पनः ।
शृणु राजन् यथावृत्तं रामस्य बलपौरुषम् ॥ २२ ॥
उसके ऐसा कहनेपर अकम्पन बोला- ' राजन्! श्रीरामका बल और पुरुषार्थ जैसा है, उसका यथावत् वर्णन मुझसे सुनिये ॥ २२ ॥
असाध्यः कुपितो रामो विक्रमेण महायशाः ।
आपगायास्तु पूर्णाया वेगं परिहरेच्छरैः ॥ २३ ॥
सताराग्रहनक्षत्रं नभश्चाप्यवसादयेत् । ' महायशस्वी श्रीराम यदि कुपित हो जायँ तो उन्हें अपने पराक्रमके द्वारा कोई भी काबूमें नहीं कर सकता । वे अपने बाणोंसे भरी हुई नदीके वेगको भी पलट सकते हैं तथा तारा, ग्रह और नक्षत्रोंसहित सम्पूर्ण आकाशमण्डलको पीड़ा दे सकते हैं ॥ २३३ ॥
असौ रामस्तु सीदन्तीं श्रीमानभ्युद्धरेन्महीम् ॥ २४ ॥
भित्त्वा वेलां समुद्रस्य लोकानाप्लावयेद् विभुः ।
वेगं वापि समुद्रस्य वायुं वा विधमेच्छौः ॥ २५ ॥
' वे श्रीमान् भगवान् राम समुद्रमें डूबती हुई पृथ्वीको ऊपर उठा सकते हैं, महासागरकी मर्यादाका भेदन करके समस्त लोकोंको उसके जलसे आप्लावित कर सकते हैं तथा अपने बाणोंसे समुद्रके वेग अथवा वायुको भी नष्ट कर सकते हैं ॥ २४-२५ ॥
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अरण्यकाण्डे एकत्रिंशः सर्गः ६२७
संहृत्य वा पुनर्लोकान् विक्रमेण महायशाः ।
शक्तः श्रेष्ठः स पुरुषः स्रष्टुं पुनरपि प्रजाः ॥ २६ ॥
' वे महायशस्वी पुरुषोत्तम अपने पराक्रमसे सम्पूर्ण लोकोंका संहार करके पुनः नये सिरेसे प्रजाकी सृष्टि करनेमें समर्थ हैं ॥ २६ ॥
नहि रामो दशग्रीव शक्यो जेतुं रणे त्वया ।
रक्षसां वापि लोकेन स्वर्गः पापजनैरिव ॥ २७ ॥
' दशग्रीव! जैसे पापी पुरुष स्वर्गपर अधिकार नहीं प्राप्त कर सकते, उसी प्रकार आप अथवा समस्त राक्षस - जगत् भी युद्धमें श्रीरामको नहीं जीत सकते ॥ २७ ॥
न तं वध्यमहं मन्ये सर्वैर्देवासुरैरपि ।
अयं तस्य वधोपायस्तन्ममैकमनाः शृणु ॥ २८ ॥
' मेरी समझमें सम्पूर्ण देवता और असुर मिलकर भी उनका वध नहीं कर सकते । उनके वधका यह एक उपाय मुझे सूझा है, उसे आप मेरे मुखसे एकचित्त होकर सुनिये ॥ २८ ॥
भार्या तस्योत्तमा लोके सीता नाम सुमध्यमा ।
श्यामा समविभक्ताङ्गी स्त्रीरलं रत्नभूषिता ॥ २ ९ ॥
' श्रीरामकी पत्नी सीता संसारकी सर्वोत्तम सुन्दरी है । उसने यौवनके मध्यमें पदार्पण किया है । उसके अङ्ग - प्रत्यङ्ग सुन्दर और सुडौल हैं । वह रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित रहती है । सीता सम्पूर्ण स्त्रियोंमें एक रत्न है ॥ २ ९ ॥
नैव देवी न गन्धर्वी नाप्सरा न च पन्नगी ।
तुल्या सीमन्तिनी तस्या मानुषी तु कुतो भवेत् ॥ ३० ॥
' देवकन्या, गन्धर्वकन्या, अप्सरा अथवा नागकन्या कोई भी रूपमें उसकी समानता नहीं कर सकती, फिर मनुष्य- जातिकी दूसरी कोई नारी उसके समान कैसे हो सकती है ॥३० ॥
तस्यापहर भार्यां त्वं तं प्रमथ्य महावने ।
सीतया रहितो रामो न चैव हि भविष्यति ॥ ३१ ॥
' उस विशाल वनमें जिस किसी भी उपायसे श्रीरामको धोखेमें डालकर आप उनकी पत्नीका अपहरण कर लें । सीतासे बिछुड़ जानेपर श्रीराम कदापि जीवित नहीं रहेंगे ' ॥ ३१ ॥
अरोचयत तद्वाक्यं रावणो राक्षसाधिपः ।
चिन्तयित्वा महाबाहुरकम्पनमुवाच ह ॥ ३२ ॥
राक्षसराज रावणको अकम्पनकी वह बात पसंद आ गयी । उस महाबाहु दशग्रीवने कुछ सोचकर अकम्पनसे कहा— ॥ ३२ ॥
बाढं कल्यं गमिष्यामि ह्येकः सारथिना सह ।
आनेष्यामि च वैदेहीमिमां हृष्टो महापुरीम् ॥ ३३ ॥
' ठीक है, कल प्रातः काल सारथिके साथ मैं अकेला ही जाऊँगा और विदेहकुमारी सीताको प्रसन्नतापूर्वक इस महापुरीमें ले आऊँगा ' ॥ ३३ ॥
तदेवमुक्त्वा प्रययौ खरयुक्तेन रावणः ।
रथेनादित्यवर्णेन दिशः सर्वाः प्रकाशयन् ॥ ३४ ॥
ऐसा कहकर रावण गधोंसे जुते हुए सूर्यतुल्य तेजस्वी रथपर आरूढ़ हो सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित करता हुआ वहाँसे चला ॥३४ ॥
स रथो राक्षसेन्द्रस्य नक्षत्रपथगो महान् ।
चञ्चूर्यमाणः शुशुभे जलदे चन्द्रमा इव ॥ ३५ ॥
नक्षत्रोंके मार्गपर विचरता हुआ राक्षसराजका वह विशाल रथ बादलोंकी आड़में प्रकाशित होनेवाले चन्द्रमाके समान शोभा पा रहा था ॥ ३५ ॥
स दूरे चाश्रमं गत्वा ताटकेयमुपागमत् ।
मारीचेनार्चितो राजा भक्ष्यभोज्यैरमानुषैः ॥ ३६ ॥
कुछ दूरपर स्थित एक आश्रममें जाकर वह ताटकापुत्र मारीचसे मिला । मारीचने अलौकिक भक्ष्य - भोज्य अर्पित करके राजा रावणका स्वागत - सत्कार किया ॥ ३६ ॥
तं स्वयं पूजयित्वा तु आसनेनोदकेन च ।
अर्थोपहितया वाचा मारीचो वाक्यमब्रवीत् ॥ ३७ ॥
आसन और जल आदिके द्वारा स्वयं ही उसका पूजन करके मारीचने अर्थयुक्त वाणीमें पूछा- ॥ ३७ ॥
कच्चित् सकुशलं राजँल्लोकानां राक्षसाधिप ।
आशङ्के नाधिजाने त्वं यतस्तूर्णमुपागतः ॥ ३८ ॥
' राक्षसराज! तुम्हारे राज्यमें लोगोंकी कुशल तो है न? तुम बड़ी उतावलीके साथ आ रहे हो, इसलिये मेरे मनमें कुछ खटका हुआ है । मैं समझता हूँ, तुम्हारे यहाँका अच्छा हाल नहीं है ' ॥ ३८ ॥
एवमुक्तो महातेजा मारीचेन स रावणः ।
ततः पश्चादिदं वाक्यमब्रवीद् वाक्यकोविदः ॥ ३ ९ ॥
मारीचके इस प्रकार पूछनेपर बातचीत की कलाको जाननेवाले महातेजस्वी रावणने इस प्रकार कहा- ॥ ३ ९ ॥
आरक्षो मे हतस्तात रामेणाक्लिष्टकारिणा ।
। जनस्थानमवध्यं तत् सर्वं युधि निपातितम् ॥ ४० ॥
' तात! अनायास ही महान् पराक्रम दिखानेवाले श्रीरामने मेरे राज्यकी सीमाके रक्षक खर - दूषण आदिको मार डाला है तथा जो जनस्थान अवध्य
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६२८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे
समझा जाता था, वहाँके सारे राक्षसोंको उन्होंने युद्धमें ।
मार गिराया है ॥ ४० ॥
तस्य मे कुरु साचिव्यं तस्य भार्यापहारणे ।
राक्षसेन्द्रवचः श्रुत्वा मारीचो वाक्यमब्रवीत् ॥ ४१ ॥
' अतः इसका बदला लेनेके लिये मैं उनकी स्त्रीका अपहरण करना चाहता हूँ । इस कार्यमें तुम मेरी सहायता करो । ' राक्षसराज रावणका यह वचन सुनकर मारीच बोला- ॥ ४१ ॥
आख्याता केन वा सीता मित्ररूपेण शत्रुणा ।
त्वया राक्षसशार्दूल को न नन्दति नन्दितः ॥ ४२ ॥
‘ निशाचरशिरोमणे! मित्रके रूपमें तुम्हारा वह कौन - सा ऐसा शत्रु है, जिसने तुम्हें सीताको हर लेनेकी सलाह दी है? कौन ऐसा पुरुष है, जो तुमसे सुख और आदर पाकर भी प्रसन्न नहीं है, अतः तुम्हारी बुराई करना चाहता है? ॥ ४२ ॥
सीतामिहानयस्वेति को ब्रवीति ब्रवीहि मे ।
रक्षोलोकस्य सर्वस्य कः शृङ्गं छेत्तुमिच्छति ॥। ४३ ॥
' कौन कहता है कि तुम सीताको यहाँ हर ले आओ? मुझे उसका नाम बताओ । वह कौन है, जो समस्त राक्षस - जगत्का सींग काट लेना चाहता है?॥
प्रोत्साहयति यश्च त्वां स च शत्रुरसंशयम् ।
आशीविषमुखाद् दंष्ट्रामुद्धर्तुं चेच्छति त्वया ॥ ४४ ॥
' जो इस कार्यमें तुम्हें प्रोत्साहन दे रहा है, वह तुम्हारा शत्रु है, इसमें संशय नहीं है । वह तुम्हारे हाथों विषधर सर्पके मुखसे उसके दाँत उखड़वाना चाहता है ॥४४ ॥
कर्मणानेन केनासि कापथं प्रतिपादितः ।
सुखसुप्तस्य ते राजन् प्रहृतं केन मूर्धनि ॥ ४५ ॥
' राजन्! किसने तुम्हें ऐसी खोटी सलाह देकर कुमार्गपर पहुँचाया है? किसने सुखपूर्वक सोते समय तुम्हारे मस्तकपर लात मारी है ॥ ४५ ॥
विशुद्धवंशाभिजनाग्रहस्त-तेजोमदः संस्थितदोर्विषाणः । उदीक्षितुं रावण युक्तः स संयुगे राघवगन्धहस्ती ॥ ४६ ॥
' रावण! राघवेन्द्र श्रीराम वह गन्धयुक्त गजराज हैं, जिसकी गन्ध सुँघकर ही गजरूपी योद्धा दूर भाग जाते हैं । विशुद्ध कुलमें जन्म ग्रहण करना ही उस राघवरूपी गजराजका शुण्डदण्ड है, प्रताप ही मद है और सुडौल बाँहें ही दोनों दाँत हैं । युद्धस्थलमें उनकी ओर देखना भी तुम्हारे लिये उचित नहीं है; फिर जूझनेकी तो बात ही क्या है ॥ ४६ ॥
असौ रणान्तःस्थितिसंधिवालो विदग्धरक्षोमृगहा नृसिंहः । सुप्तस्त्वया बोधयितुं न शक्यः शराङ्गपूर्णो निशितासिदंष्ट्रः ॥ ४७ ॥
' वे श्रीराम मनुष्यके रूपमें एक सिंह हैं । रणभूमिके भीतर स्थित होना ही उनके अङ्गोंकी संधियाँ तथा बाल हैं । वह सिंह चतुर राक्षसरूपी मृगोंका वध करनेवाला है, बाणरूपी अङ्गोंसे परिपूर्ण है तथा तलवारें ही उसकी तीखी दाढ़ें हैं । उस सोते हुए सिंहको तुम नहीं जगा सकते ॥ ४७ ॥
चापापहारे भुजवेगपङ्के शरोर्मिमाले महाहवौघे । न रामपातालमुखेऽतिघोरे प्रस्कन्दितुं राक्षसराज युक्तम् ॥ ४८ ॥
' राक्षसराज! श्रीराम एक पातालतलव्यापी महासागर हैं, धनुष ही उस समुद्रके भीतर रहनेवाला ग्राह है, भुजाओंका वेग ही कीचड़ है, बाण ही तरंगमालाएँ हैं और महान् युद्ध ही उसकी अगाध जलराशि है । उसके अत्यन्त भयंकर मुख अर्थात् बड़वानलमें कूद पड़ना तुम्हारे लिये कदापि उचित नहीं है ॥ ४८ ॥
प्रसीद लङ्केश्वर राक्षसेन्द्र लङ्कां प्रसन्नो भव साधु गच्छ । त्वं स्वेषु दारेषु रमस्व नित्यं रामः सभार्यो रमतां वनेषु ॥ ४ ९ ॥ ' लंकेश्वर! प्रसन्न होओ । राक्षसराज! सानन्द रहो और सकुशल लंकाको लौट जाओ । तुम सदा पुरीमें अपनी स्त्रियोंके साथ रमण करो और राम अपनी पत्नीके साथ वनमें विहार करें ' ॥ ४ ९ ॥
एवमुक्तो दशग्रीवो मारीचेन स रावणः ।
न्यवर्तत पुरीं लङ्कां विवेश च गृहोत्तमम् ॥ ५० ॥
मारीचके ऐसा कहनेपर दशमुख रावण लंकाको । लौटा और अपने सुन्दर महलमें चला गया ॥ ५० ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे एकत्रिंशः सर्गः ॥ ३१ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें इकतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३१ ॥