वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ — पृष्ठ 641–650
वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 641–650
पृष्ठ 641
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अरण्यकाण्डे द्वात्रिंशः सर्गः ६२ ९ द्वात्रिंशः शूर्पणखाका लंकामें
ततः शूर्पणखा दृष्ट्वा सहस्त्राणि चतुर्दश ।
हतान्येकेन रामेण रक्षसां भीमकर्मणाम् ॥ १ ॥
दूषणं च खरं चैव हतं त्रिशिरसं रणे ।
दृष्ट्वा पुनर्महानादान् ननाद जलदोपमा ॥ २ ॥
उधर शूर्पणखाने जब देखा कि श्रीरामने भयंकर कर्म करनेवाले चौदह हजार राक्षसोंको अकेले ही मार गिराया तथा युद्धके मैदानमें दूषण, खर और त्रिशिराको भी मौतके घाट उतार दिया, तब वह शोकके कारण मेघ - गर्जनाके समान पुनः बड़े जोर - जोरसे घोर चीत्कार करने लगी ॥ १-२ ॥
सा दृष्ट्वा कर्म रामस्य कृतमन्यैः सुदुष्करम् ।
जगाम परमोद्विग्ना लङ्कां रावणपालिताम् ॥ ३ ॥
श्रीरामने वह कर्म कर दिखाया, जो दूसरोंके लिये अत्यन्त दुष्कर है; यह अपनी आँखों देखकर वह अत्यन्त उद्विग्न हो उठी और रावणद्वारा सुरक्षित लंकापुरीको गयी ॥ ३ ॥
सा ददर्श विमानाग्रे रावणं दीप्ततेजसम् ।
उपोपविष्टं सचिवैर्मरुद्भिरिव वासवम् ॥ ४ ॥
वहाँ पहुँचकर उसने देखा, रावण पुष्पक विमान ( या सतमहले मकान ) के ऊपरी भागमें बैठा हुआ है । उसका राजोचित तेज उद्दीप्त हो रहा है तथा मरुद्गणोंसे घिरे हुए इन्द्रकी भाँति वह आस - पास बैठे हुए मन्त्रियोंसे घिरा है ॥४ ॥
आसीनं सूर्यसंकाशे काञ्चने परमासने ।
रुक्मवेदिगतं प्राज्यं ज्वलन्तमिव पावकम् ॥ ५ ॥
रावण जिस उत्तम सुवर्णमय सिंहासनपर विराजमान था, वह सूर्यके समान जगमगा रहा था । जैसे सोनेकी ईंटोंसे बनी हुई वेदीपर स्थापित अग्निदेव घीकी अधिक आहुति पाकर प्रज्वलित हो उठे हों, उसी प्रकार उस स्वर्णसिंहासनपर रावण शोभा पा रहा था ॥ ५ ॥
देवगन्धर्वभूतानामृषीणां च महात्मनाम् ।
अजेयं समरे घोरं व्यात्ताननमिवान्तकम् ॥ ६ ॥
देवासुरविमर्देषु वज्राशनिकृतव्रणम् ।
ऐरावतविषाणाग्रैरुत्कृष्टकिणवक्षसम् ॥ ७ ॥
देवता, गन्धर्व, भूत और महात्मा ऋषि भी उसे जीतनेमें असमर्थ थे । समरभूमिमें वह मुँह फैलाकर खड़े हुए यमराजकी भाँति भयानक जान पड़ता था । देवताओं । सर्गः रावणके पास जाना और असुरोंके संग्रामके अवसरोंपर उसके शरीरमें वज्र और अशनिके जो घाव हुए थे, उनके चिह्न अबतक विद्यमान थे । उसकी छातीमें ऐरावत हाथीने जो अपने दाँत गड़ाये थे, उसके निशान अब भी दिखायी देते थे ॥
विंशद्भुजं दशग्रीवं दर्शनीयपरिच्छदम् ।
विशालवक्षसं वीरं राजलक्षणलक्षितम् ॥ ८ ॥
नद्धवैदूर्यसंकाशं तप्तकाञ्चनभूषणम् ।
सुभुजं शुक्लदशनं महास्यं पर्वतोपमम् ॥ ९ ॥
उसके बीस भुजाएँ और दस मस्तक थे । उसके छत्र, चँवर और आभूषण आदि उपकरण देखने ही योग्य थे । वक्षःस्थल विशाल था । वह वीर राजोचित लक्षणोंसे सम्पन्न दिखायी देता था । वह अपने शरीरमें जो वैदूर्यमणि ( नीलम ) का आभूषण पहने हुए था, उसके समान ही उसके शरीरकी कान्ति भी थी । उसने तपाये हुए सोनेके आभूषण भी पहन रखे थे । उसकी भुजाएँ सुन्दर, दाँत सफेद, मुँह बहुत बड़ा और शरीर पर्वतके समान विशाल था ॥ ८ - ९ ॥
विष्णुचक्रनिपातैश्च शतशो देवसंयुगे ।
अन्यैः शस्त्रैः प्रहारैश्च महायुद्धेषु ताडितम् ॥ १० ॥
देवताओंके साथ युद्ध करते समय उसके अङ्गोंपर सैकड़ों बार भगवान् विष्णुके चक्रका प्रहार हुआ था । बड़े - बड़े युद्धोंमें अन्यान्य अस्त्र - शस्त्रोंकी भी उसपर मार पड़ी थी ( उन सबके चिह्न दृष्टिगोचर होते थे ) ॥
अहताङ्गैः समस्तैस्तं देवप्रहरणैस्तदा ।
अक्षोभ्याणां समुद्राणां क्षोभणं क्षिप्रकारिणम् ॥ ११ ॥
देवताओंके समस्त आयुधोंके प्रहारोंसे भी जो खण्डित न हो सके थे, उन्हीं अङ्गोंसे वह अक्षोभ्य समुद्रोंमें भी क्षोभ ( हलचल ) पैदा कर देता था । वह सभी कार्य बड़ी शीघ्रतासे करता था ॥ ११ ॥
क्षेप्तारं पर्वताग्राणां सुराणां च प्रमर्दनम् ।
उच्छेत्तारं च धर्माणां परदाराभिमर्शनम् ॥ १२ ॥
पर्वतशिखरोंको भी तोड़कर फेंक देता था, देवताओंको भी रौंद डालता था । धर्मकी तो वह जड़ ही काट देता था और परायी स्त्रियोंके सतीत्वका नाश करनेवाला था ॥
सर्वदिव्यास्त्रयोक्तारं यज्ञविघ्नकरं सदा ।
पुरीं भोगवतीं गत्वा पराजित्य च वासुकिम् ॥ १३ ॥
तक्षकस्य प्रियां भार्यां पराजित्य जहार यः ।
पृष्ठ 642
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
६३० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे वह सब प्रकारके दिव्यास्त्रोंका प्रयोग करनेवाला । और सदा यज्ञोंमें विघ्न डालनेवाला था । एक समय पातालकी भोगवती पुरीमें जाकर नागराज वासुकिको परास्त करके तक्षकको भी हराकर उसकी प्यारी पत्नीको वह हर ले आया था ॥ १३३ ॥
कैलासं पर्वतं गत्वा विजित्य नरवाहनम् ॥ १४ ॥
विमानं पुष्पकं तस्य कामगं वै जहार यः । इसी तरह कैलास पर्वतपर जाकर कुबेरको युद्धमें पराजित करके उसने उनके इच्छानुसार चलनेवाले पुष्पकविमानको अपने अधिकारमें कर लिया ॥ १४३ ॥
वनं चैत्ररथं दिव्यं नलिनीं नन्दनं वनम् ॥ १५ ॥
विनाशयति यः क्रोधाद् देवोद्यानानि वीर्यवान् । वह पराक्रमी निशाचर क्रोधपूर्वक कुबेरके दिव्य चैत्ररथ वनको, सौगन्धिक कमलोंसे युक्त नलिनी नामवाली पुष्करिणीको, इन्द्रके नन्दनवनको तथा देवताओंके दूसरे -दूसरे उद्यानोंको नष्ट करता रहता था ॥ १५३ ॥
चन्द्रसूर्यौ महाभागावुत्तिष्ठन्तौ परंतपौ ॥ १६ ॥
निवारयति बाहुभ्यां यः शैलशिखरोपमः । वह पर्वत - शिखरके समान आकार धारण करके शत्रुओंको संताप देनेवाले महाभाग चन्द्रमा और सूर्यको उनके उदयकालमें अपने हाथोंसे रोक देता था ॥ १६३ ॥
दशवर्षसहस्त्राणि तपस्तप्त्वा महावने ॥ १७ ॥
पुरा स्वयंभुवे धीरः शिरांस्युपजहार यः । उस धीर स्वभाववाले रावणने पूर्वकालमें एक विशाल वनके भीतर दस हजार वर्षोंतक घोर तपस्या करके ब्रह्माजीको अपने मस्तकोंकी बलि दे दी थी ॥ १७३ ॥
देवदानवगन्धर्वपिशाचपतगोरगैः ॥ १८ ॥
अभयं यस्य संग्रामे मृत्युतो मानुषादृते । उसके प्रभावसे उसे देवता, दानव, गन्धर्व, पिशाच, पक्षी और सर्पोंसे भी संग्राममें अभय प्राप्त हो गया था । मनुष्यके सिवा और किसीके हाथसे उसे मृत्युका भय नहीं था ॥ १८३ ॥
मन्त्रैरभिष्टुतं पुण्यमध्वरेषु द्विजातिभिः ॥ १ ९ ॥ हविर्धानेषु यः सोममुपहन्ति महाबलः । वह महाबली राक्षस सोमसवनकर्मविशिष्ट यज्ञोंमें द्विजातियोंद्वारा वेदमन्त्रोंके उच्चारणपूर्वक निकाले गये तथा वैदिक मन्त्रोंसे ही सुसंस्कृत एवं स्तुत हुए पवित्र सोमरसको वहाँ पहुँचकर नष्ट कर देता था ॥ १ ९ ३ ॥ प्राप्तयज्ञहरं दुष्टं ब्रह्मघ्नं क्रूरकारिणम् ॥ २० ॥
कर्कशं निरनुक्रोशं प्रजानामहिते रतम् । समाप्तिके निकट पहुँचे हुए यज्ञोंका विध्वंस करनेवाला वह दुष्ट निशाचर ब्राह्मणोंकी हत्या तथा दूसरे दूसरे क्रूर कर्म करता था । वह बड़े ही रूखे स्वभावका और निर्दय था । सदा प्रजाजनोंके अहितमें ही लगा रहता था ॥ २०३ ॥
रावणं सर्वभूतानां सर्वलोकभयावहम् ॥ २१ ॥
राक्षसी भ्रातरं क्रूरं सा ददर्श महाबलम् । समस्त लोकोंको भय देनेवाले और सम्पूर्ण प्राणियोंको रुलानेवाले अपने इस महाबली क्रूर भाईको राक्षसी शूर्पणखाने उस समय देखा ॥ २१३ ॥
तं दिव्यवस्त्राभरणं दिव्यमाल्योपशोभितम् ॥ २२ ॥
आसने सूपविष्टं तं काले कालमिवोद्यतम् ।
राक्षसेन्द्रं महाभागं पौलस्त्यकुलनन्दनम् ॥ २३ ॥
वह दिव्य वस्त्रों और आभूषणोंसे विभूषित था । दिव्य पुष्पोंकी मालाएँ उसकी शोभा बढ़ा रही थीं । सिंहासनपर बैठा हुआ राक्षसराज पुलस्त्यकुलनन्दन महाभाग दशग्रीव प्रलयकालमें संहारके लिये उद्यत हुए महाकालके समान जान पड़ता था ॥ २२-२३ ॥
उपगम्याब्रवीद् वाक्यं राक्षसी भयविह्वला ।
रावणं शत्रुहन्तारं मन्त्रिभिः परिवारितम् ॥ २४ ॥
मन्त्रियोंसे घिरे हुए शत्रुहन्ता भाई रावणके पास जाकर भयसे विह्वल हुई वह राक्षसी कुछ कहनेको उद्यत हुई ॥ २४ ॥
तमब्रवीद् दीप्तविशाललोचनं प्रदर्शयित्वा भयलोभमोहिता । | सुदारुणं वाक्यमभीतचारिणी महात्मना शूर्पणखा विरूपिता ॥ २५ ॥
महात्मा लक्ष्मणने नाक - कान काटकर जिसे कुरूप कर दिया था तथा जो निर्भय विचरनेवाली थी, वह भय और लोभसे मोहित हुई शूर्पणखा बड़े - बड़े चमकीले नेत्रोंवाले अत्यन्त क्रूर रावणको अपनी दुर्दशा दिखाकर | उससे बोली ॥ २५ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे द्वात्रिंशः सर्गः ॥ ३२ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें बत्तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३२ ॥
पृष्ठ 643
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अरण्यकाण्डे त्रयस्त्रिंशः सर्गः ६३१ त्रयस्त्रिंशः सर्गः शूर्पणखाका रावणको फटकारना
ततः शूर्पणखा दीना रावणं लोकरावणम् ।
अमात्यमध्ये संक्रुद्धा परुषं वाक्यमब्रवीत् ॥ १ ॥
उस समय शूर्पणखा श्रीरामसे तिरस्कृत होनेके कारण बहुत दुःखी थी । उसने मन्त्रियोंके बीचमें बैठे हुए समस्त लोकोंको रुलानेवाले रावणसे अत्यन्त कुपित होकर कठोर वाणीमें कहा— ॥१ ॥
प्रमत्तः कामभोगेषु स्वैरवृत्तो निरङ्कुशः ।
समुत्पन्नं भयं घोरं बोद्धव्यं नावबुध्यसे ॥ २ ॥
' राक्षसराज! तुम स्वेच्छाचारी और निरङ्कुश होकर विषय - भोगोंमें मतवाले हो रहे हो । तुम्हारे लिये घोर भय उत्पन्न हो गया है । तुम्हें इसकी जानकारी होनी चाहिये थी, किंतु तुम इसके विषयमें कुछ नहीं जानते हो ॥ २ ॥
सक्तं ग्राम्येषु भोगेषु कामवृत्तं महीपतिम् ।
लुब्धं न बहु मन्यन्ते श्मशानाग्निमिव प्रजाः ॥ ३ ॥
' जो राजा निम्न श्रेणीके भोगोंमें आसक्त हो स्वेच्छाचारी और लोभी हो जाता है, उसे मरघटकी आगके समान हेय मानकर प्रजा उसका अधिक आदर नहीं करती है ॥ ३ ॥
स्वयं कार्याणि यः काले नानुतिष्ठति पार्थिवः ।
स तु वै सह राज्येन तैश्च कार्यैर्विनश्यति ॥ ४ ॥
' जो राजा ठीक समयपर स्वयं ही अपने कार्योंका सम्पादन नहीं करता है, वह राज्य और उन कार्योंके साथ ही नष्ट हो जाता है ॥ ४ ॥
अयुक्तचारं दुर्दर्शमस्वाधीनं नराधिपम् ।
वर्जयन्ति नरा दूरान्नदीपङ्कमिव द्विपाः ॥ ५ ॥
' जो राज्यकी देखभालके लिये गुप्तचरोंको नियुक्त नहीं करता है, प्रजाजनोंको जिसका दर्शन दुर्लभ हो जाता है और कामिनी आदि भोगोंमें आसक्त होनेके कारण अपनी स्वाधीनता खो बैठता है, ऐसे राजाको प्रजा दूरसे ही त्याग देती है । ठीक उसी तरह, जैसे हाथी नदीकी कीचड़से दूर ही रहते हैं ॥ ५ ॥
ये न रक्षन्ति विषयमस्वाधीनं नराधिपाः ।
ते न वृद्ध्या प्रकाशन्ते गिरयः सागरे यथा ॥ ६ ॥
जो नरेश अपने राज्यके उस प्रान्तकी, जो अपनी ही असावधानीके कारण दूसरेके अधिकारमें चला गया हो, रक्षा नहीं करते — उसे पुनः अपने अधिकारमें नहीं लाते, वे समुद्रमें डूबे हुए पर्वतोंकी भाँति अपने अभ्युदयसे प्रकाशित नहीं होते हैं ॥६ ॥
आत्मवद्भिर्विगृह्य त्वं देवगन्धर्वदानवैः ।
अयुक्तचारश्चपलः कथं राजा भविष्यसि ॥ ७ ॥
' जो अपने मनको काबू में रखनेवाले एवं प्रयत्नशील हैं, उन देवताओं, गन्धर्वों तथा दानवोंके साथ विरोध करके तुमने अपने राज्यकी देखभालके लिये गुप्तचर नहीं नियुक्त किये हैं, ऐसी दशामें तुम जैसा विषयलोलुप चपल पुरुष कैसे राजा बना रह सकेगा? ॥ ७ ॥
त्वं तु बालस्वभावश्च बुद्धिहीनश्च राक्षस ।
ज्ञातव्यं तन्न जानीषे कथं राजा भविष्यसि ॥ ८ ॥
' राक्षस! तुम्हारा स्वभाव बालकों- जैसा है । तुम निरे
बुद्धिहीन हो । तुम्हें जाननेयोग्य बातोंका भी ज्ञान नहीं है ।
ऐसी दशामें तुम किस तरह राजा बने रह सकोगे? ॥ ८ ॥
येषां चाराश्च कोशश्च नयश्च जयतां वर ।
अस्वाधीना नरेन्द्राणां प्राकृतैस्ते जनैः समाः॥९॥
' विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ निशाचरपते! जिन नरेशोंके गुप्तचर, कोष और नीति – ये सब अपने अधीन नहीं हैं, वे साधारण लोगोंके ही समान हैं ॥ ९ ॥
यस्मात् पश्यन्ति दूरस्थान् सर्वानर्थान् नराधिपाः ।
चारेण तस्मादुच्यन्ते राजानो दीर्घचक्षुषः ॥ १० ॥
' गुप्तचरोंकी सहायतासे राजालोग दूर - दूरके सारे कार्योंकी देखभाल करते रहते हैं, इसीलिये वे दीर्घदर्शी या दूरदर्शी कहलाते हैं ॥ १० ॥
अयुक्तचारं मन्ये त्वां प्राकृतैः सचिवैर्युतः ।
स्वजनं च जनस्थानं निहतं नावबुध्यसे ॥११ ॥
' मैं समझती हूँ, तुम गवाँर मन्त्रियोंसे घिरे हुए हो, तभी तो तुमने अपने राज्यके भीतर गुप्तचर नहीं तैनात किये हैं । तुम्हारे स्वजन मारे गये और जनस्थान उजाड़ हो गया, फिर भी तुम्हें इसका पता नहीं लगा है ॥ ११ ॥
चतुर्दश सहस्राणि रक्षसां भीमकर्मणाम् ।
हतान्येकेन रामेण खरश्च सहदूषणः ॥ १२ ॥
ऋषीणामभयं दत्तं कृतक्षेमाश्च दण्डकाः ।
धर्षितं च जनस्थानं रामेणाक्लिष्टकारिणा ॥१३ ॥
' अकेले रामने, जो अनायास ही महान् कर्म करनेवाले हैं, भीमकर्मा राक्षसोंकी चौदह हजार सेनाको यमलोक पहुँचा दिया, खर और दूषणके भी प्राण ले लिये, ऋषियोंको भी अभयदान कर दिया तथा दण्डकारण्यमें राक्षसोंकी ओरसे जो विघ्न - बाधाएँ थीं,
पृष्ठ 644
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
६३२ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे
उन सबको दूर करके वहाँ शान्ति स्थापित कर दी । ।
जनस्थानको तो उन्होंने चौपट ही कर डाला ॥ १२-१३ ॥
त्वं तु लुब्धः प्रमत्तश्च पराधीनश्च राक्षस ।
विषये स्वे समुत्पन्नं यद् भयं नावबुध्यसे ॥ १४॥
' राक्षस! तुम तो लोभ और प्रमादमें फँसकर पराधीन हो रहे हो, अतः अपने ही राज्यमें उत्पन्न हुए भयका तुम्हें कुछ पता ही नहीं है ॥१४ ॥
तीक्ष्णमल्पप्रदातारं प्रमत्तं गर्वितं शठम् ।
व्यसने सर्वभूतानि नाभिधावन्ति पार्थिवम् ॥ १५ ॥
' जो राजा कठोरतापूर्ण बर्ताव करता अथवा तीखे । स्वभावका परिचय देता है, सेवकोंको बहुत कम वेतन देता है, प्रमादमें पड़ा और गर्वमें भरा रहता है तथा स्वभावसे ही शठ होता है, उसके संकटमें पड़नेपर सभी प्राणी उसका साथ छोड़ देते हैं — उसकी सहायताके लिये आगे नहीं बढ़ते हैं ।
अतिमानिनमग्राह्यमात्मसम्भावितं नरम् ।
क्रोधनं व्यसने हन्ति स्वजनोऽपि नराधिपम् ॥ १६ ॥
' जो अत्यन्त अभिमानी, अपनानेके अयोग्य, आप ही अपनेको बहुत बड़ा माननेवाला और क्रोधी होता है, ऐसे नर अथवा नरेशको संकटकालमें आत्मीय जन भी मार डालते हैं ॥ १६ ॥
नानुतिष्ठति कार्याणि भयेषु न बिभेति च ।
क्षिप्रं राज्याच्च्युतो दीनस्तृणैस्तुल्यो भवेदिह ॥ १७ ॥
‘ जो राजा अपने कर्तव्यका पालन अथवा करनेयोग्य कार्योंका सम्पादन नहीं करता तथा भयके अवसरोंपर भयभीत ( एवं अपनी रक्षाके लिये सावधान ) नहीं होता, वह शीघ्र ही राज्यसे भ्रष्ट एवं दीन होकर इस भूतलपर तिनकोंके समान उपेक्षणीय हो जाता है ॥ १७ ॥
शुष्ककाष्ठैर्भवेत् कार्यं लोष्ठैरपि च पांसुभिः ।
न तु स्थानात् परिभ्रष्टैः कार्यं स्याद् वसुधाधिपैः ॥ १८ ॥
' लोगोंको सूखे काठोंसे, मिट्टीके ढेलों तथा धूलसे भी कुछ प्रयोजन होता है, किंतु स्थानभ्रष्ट राजाओंसे उन्हें कोई प्रयोजन नहीं रहता ॥ १८ ॥
उपभुक्तं यथा वासः स्त्रजो वा मृदिता यथा ।
एवं राज्यात् परिभ्रष्टः समर्थोऽपि निरर्थकः ॥ १ ९ ॥
' जैसे पहना हुआ वस्त्र और मसल डाली गयी फूलोंकी माला दूसरोंके उपयोगमें आनेयोग्य नहीं होती, इसी प्रकार राज्यसे भ्रष्ट हुआ राजा समर्थ होनेपर भी दूसरोंके लिये निरर्थक है ॥१ ९ ॥
अप्रमत्तश्च यो राजा सर्वज्ञो विजितेन्द्रियः ।
कृतज्ञो धर्मशीलश्च स राजा तिष्ठते चिरम् ॥ २० ॥
' परंतु जो राजा सदा सावधान रहता, राज्यके समस्त कार्योंकी जानकारी रखता, इन्द्रियोंको वशमें किये रहता, कृतज्ञ ( दूसरोंके उपकारको माननेवाला ) तथा स्वभावसे ही धर्मपरायण होता है, वह राजा बहुत दिनोंतक राज्य करता है ॥ २० ॥
नयनाभ्यां प्रसुप्तो वा जागर्ति नयचक्षुषा ।
व्यक्तक्रोधप्रसादश्च स राजा पूज्यते जनैः ॥ २१ ॥
' जो स्थूल आँखोंसे तो सोता है, परंतु नीतिकी आँखोंसे सदा जागता रहता है तथा जिसके क्रोध और अनुग्रहका फल प्रत्यक्ष प्रकट होता है, उसी राजाकी लोग पूजा करते हैं ॥ २१ ॥
त्वं तु रावण दुर्बुद्धिर्गुणैरेतैर्विवर्जितः ।
यस्य तेऽविदितश्चारै रक्षसां सुमहान् वधः ॥२२ ॥
' रावण! तुम्हारी बुद्धि दूषित है और तुम इन सभी राजोचित गुणोंसे वञ्चित हो; क्योंकि तुम्हें अबतक गुप्तचरोंकी सहायतासे राक्षसोंके इस महान् संहारका समाचार ज्ञात नहीं हो सका था ॥ २२ ॥
परावमन्ता विषयेषु सङ्गवान् न देशकालप्रविभागतत्त्ववित् । अयुक्तबुद्धिर्गुणदोषनिश्चये विपन्नराज्यो न चिराद् विपत्स्यसे ॥ २३ ॥
' तुम दूसरोंका अनादर करनेवाले, विषयासक्त और देश - कालके विभागको यथार्थरूपसे न जाननेवाले हो, तुमने गुण और दोषके विचार एवं निश्चयमें कभी अपनी बुद्धिको नहीं लगाया है, अतः तुम्हारा राज्य शीघ्र ही नष्ट हो जायगा और तुम स्वयं भी भारी विपत्तिमें पड़ जाओगे ' ॥ इति स्वदोषान् परिकीर्तितांस्तथा समीक्ष्य बुद्ध्या क्षणदाचरेश्वरः । धनेन दर्पेण बलेन चान्वितो विचिन्तयामास चिरं स रावणः ॥ २४ ॥
शूर्पणखाके द्वारा कहे गये अपने दोषोंपर बुद्धिपूर्वक विचार करके धन, अभिमान और बलसे सम्पन्न वह निशाचर रावण बहुत देरतक सोच - विचार । एवं चिन्तामें पड़ा रहा ॥२४ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे त्रयस्त्रिंशः सर्गः ॥ ३३ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें तैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३३ ॥
पृष्ठ 645
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अरण्यकाण्डे चतुस्त्रिंशः सर्गः ६३३ चतुस्त्रिंशः सर्गः रावणके पूछनेपर शूर्पणखाका उससे राम, लक्ष्मण और सीताका परिचय दे हुए सीताको भार्या बनानेके लिये उसे प्रेरित करना
ततः शूर्पणखां दृष्ट्वा ब्रुवन्तीं परुषं वचः ।
अमात्यमध्ये संक्रुद्धः परिपप्रच्छ रावणः ॥ १ ॥
शूर्पणखाको इस प्रकार कठोर बातें कहती देख मन्त्रियोंके बीचमें बैठे हुए रावणने अत्यन्त कुपित होकर पूछा- ॥ १ ॥
कश्च रामः कथंवीर्यः किंरूपः किंपराक्रमः ।
किमर्थं दण्डकारण्यं प्रविष्टश्च सुदुस्तरम् ॥ २ ॥
' राम कौन है? उसका बल कैसा है? रूप और पराक्रम कैसे हैं? अत्यन्त दुस्तर दण्डकारण्यमें उसने किस लिये प्रवेश किया है? ॥ २ ॥
आयुधं किं च रामस्य येन ते राक्षसा हताः ।
खरश्च निहतः संख्ये दूषणस्त्रिशिरास्तथा ॥ ३ ॥
' रामके पास कौन - सा ऐसा अस्त्र है, जिससे वे सब राक्षस मारे गये तथा युद्धमें खर दूषण और त्रिशिराका भी संहार हो गया ॥ ३ ॥
तत्त्वं ब्रूहि मनोज्ञाङ्गि केन त्वं च विरूपिता ।
इत्युक्ता राक्षसेन्द्रेण राक्षसी क्रोधमूर्च्छिता ॥४ ॥
' मनोहर अङ्गोंवाली शूर्पणखे! ठीक - ठीक बताओ, किसने तुम्हें कुरूप बनाया है- किसने तुम्हारी नाक और कान काट डाले हैं? ' राक्षसराज रावणके इस प्रकार पूछनेपर वह राक्षसी क्रोधसे अचेत -सी हो उठी ॥ ४ ॥
ततो रामं यथान्यायमाख्यातुमुपचक्रमे ।
दीर्घबाहुर्विशालाक्षश्चीरकृष्णाजिनाम्बरः ॥ ५ ॥
कन्दर्पसमरूपश्च रामो दशरथात्मजः । तदनन्तर उसने श्रीरामका यथावत् परिचय देना आरम्भ किया— ' भैया! श्रीरामचन्द्र राजा दशरथके पुत्र हैं, उनकी भुजाएँ लंबी, आँखें बड़ी - बड़ी और रूप कामदेवके समान है । वे चीर और काला मृगचर्म धारण करते हैं ॥५३ ॥
शक्रचापनिभं चापं विकृष्य कनकाङ्गदम् ॥ ६ ॥
दीप्तान् क्षिपति नाराचान् सर्पानिव महाविषान् । ' श्रीराम इन्द्रधनुषके समान अपने विशाल धनुषको, जिसमें सोनेके छल्ले शोभा दे रहे हैं, खींचकर उसके द्वारा महाविषैले सर्पोंके समान तेजस्वी नाराचोंकी वर्षा करते हैं ॥६३ ॥
नाददानं शरान् घोरान् विमुञ्चन्तं महाबलम् ॥७ ॥
न कार्मुकं विकर्षन्तं रामं पश्यामि संयुगे । ' वे महाबली राम युद्धस्थलमें कब धनुष खींचते, कब भयंकर बाण हाथमें लेते और कब उन्हें छोड़ते हैं - यह मैं नहीं देख पाती थी ॥ ७३ ॥
हन्यमानं तु तत्सैन्यं पश्यामि शरवृष्टिभिः ॥ ८ ॥
इन्द्रेणेवोत्तमं सस्यमाहतं त्वश्मवृष्टिभिः । ' उनके बाणोंकी वर्षासे राक्षसोंकी सेना मर रही है— इतना ही मुझे दिखायी देता था । जैसे इन्द्र ( मेघ ) द्वारा बरसाये गये ओलोंकी वृष्टिसे अच्छी खेती चौपट हो जाती है, उसी प्रकार रामके विनाश हो गया ॥ ८३ ॥
रक्षसां भीमवीर्याणां सहस्राणि निहतानि शरैस्तीक्ष्णैस्तेनैकेन अर्धाधिकमुहूर्तेन खरश्च ऋषीणामभयं दत्तं कृतक्षेमाश्च ' श्रीराम अकेले और पैदल बाणोंसे राक्षसोंका चतुर्दश ॥ ९ ॥
पदातिना ।
सहदूषणः ॥ १० ॥
दण्डकाः ॥ ११ ॥
थे, तो भी उन्होंने डेढ़ मुहूर्त ( तीन घड़ी ) के भीतर ही खर और दूषणसहित चौदह हजार भयंकर बलशाली राक्षसोंका तीखे बाणोंसे संहार कर डाला, ऋषियोंको अभय दे दिया और समस्त दण्डकवनको राक्षसोंकी विघ्न-बाधासे रहित कर दिया ॥ ९ -११ ॥
एका कथंचिन्मुक्ताहं परिभूय महात्मना ।
स्त्रीवधं शङ्कमानेन रामेण विदितात्मना ॥ १२ ॥
' आत्मज्ञानी महात्मा श्रीरामने स्त्रीका वध हो जानेके भयसे एकमात्र मुझे किसी तरह केवल अपमानित करके ही छोड़ दिया ॥ १२ ॥
भ्राता चास्य महातेजा गुणतस्तुल्यविक्रमः ।
अनुरक्तश्च भक्तश्च लक्ष्मणो नाम वीर्यवान् ॥ १३ ॥
अमर्षी दुर्जयो जेता विक्रान्तो बुद्धिमान् बली ।
रामस्य दक्षिणो बाहुर्नित्यं प्राणो बहिश्चरः ॥ १४ ॥
' उनका एक बड़ा ही तेजस्वी भाई है, जो गुण और पराक्रममें उन्हींके समान है । उसका नाम है लक्ष्मण । वह पराक्रमी वीर अपने बड़े भाईका प्रेमी और भक्त है, उसकी बुद्धि बड़ी तीक्ष्ण है, वह अमर्षशील, दुर्जय, विजयी तथा बल - विक्रमसे सम्पन्न है । श्रीरामका
पृष्ठ 646
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
६३४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे
वह मानो दाहिना हाथ और सदा बाहर विचरनेवाला प्राण ।
है ॥ १३-१४ ॥
रामस्य तु विशालाक्षी पूर्णेन्दुसदृशानना ।
धर्मपत्नी प्रिया नित्यं भर्तुः प्रियहिते रता ॥ १५ ॥
' श्रीरामकी धर्मपत्नी भी उनके साथ है । वह पतिको बहुत प्यारी है और सदा अपने स्वामीका प्रिय तथा हित करनेमें ही लगी रहती है । उसकी आँखें विशाल और मुख पूर्ण चन्द्रके समान मनोरम है ॥ १५ ॥
सा सुकेशी सुनासोरूः सुरूपा च यशस्विनी ।
देवतेव वनस्यास्य राजते श्रीरिवापरा ॥ १६ ॥
' उसके केश, नासिका, ऊरु तथा रूप बड़े ही सुन्दर तथा मनोहर हैं । वह यशस्विनी राजकुमारी इस दण्डकवनकी देवी - सी जान पड़ती है और दूसरी लक्ष्मीके समान शोभा पाती है ॥१६ ॥
तप्तकाञ्चनवर्णाभा रक्ततुङ्गनखी शुभा ।
सीता नाम वरारोहा वैदेही तनुमध्यमा ॥ १७ ॥
' उसका सुन्दर शरीर तपाये हुए सुवर्णकी कान्ति धारण करता है, नख ऊँचे तथा लाल हैं । वह शुभलक्षणोंसे सम्पन्न है । उसके सभी अङ्ग सुडौल हैं और कटिभाग सुन्दर तथा पतला है । वह विदेहराज जनककी कन्या है और सीता उसका नाम है ॥ १७ ॥
नैव देवी न गन्धर्वी न यक्षी न च किंनरी ।
तथारूपा मया नारी दृष्टपूर्वा महीतले ॥ १८ ॥
‘ देवताओं, गन्धर्वों, यक्षों और किन्नरोंकी स्त्रियोंमें भी कोई उसके समान सुन्दरी नहीं है । इस भूतलपर वैसी रूपवती नारी मैंने पहले कभी नहीं देखी थी ॥ १८ ॥
यस्य सीता भवेद् भार्या यं च हृष्टा परिष्वजेत् ।
अभिजीवेत् स सर्वेषु लोकेष्वपि पुरंदरात् ॥ १ ९ ॥
' सीता जिसकी भार्या हो और वह हर्षमें भरकर जिसका आलिङ्गन करे, समस्त लोकोंमें उसीका जीवन इन्द्रसे भी अधिक भाग्यशाली है ॥ १ ९ ॥
सा सुशीला वपुःश्लाघ्या रूपेणाप्रतिमा भुवि ।
तवानुरूपा भार्या सा त्वं च तस्याः पतिर्वरः ॥ २० ॥
' उसका शील - स्वभाव बड़ा ही उत्तम है । उसका एक - एक अङ्ग स्तुत्य एवं स्पृहणीय है । उसके रूपकी समानता करनेवाली भूमण्डलमें दूसरी कोई स्त्री नहीं है । वह तुम्हारे योग्य भार्या होगी और तुम भी उसके योग्य श्रेष्ठ पति होओगे ॥ २० ॥
तां तु विस्तीर्णजघनां पीनोत्तुङ्गपयोधराम् ।
भार्यार्थे तु तवानेतुमुद्यताहं वराननाम् ॥ २१ ॥
विरूपितास्मि क्रूरेण लक्ष्मणेन महाभुज । ' महाबाहो! विस्तृत जघन और उठे हुए पुष्ट कुचोंवाली उस सुमुखी स्त्रीको जब मैं तुम्हारी भार्या बनानेके लिये ले आनेको उद्यत हुई, तब क्रूर लक्ष्मणने मुझे इस तरह कुरूप कर दिया ॥ २१३ ॥
तां तु दृष्ट्वाद्य वैदेहीं पूर्णचन्द्रनिभाननाम् ॥ २२ ॥
मन्मथस्य शराणां च त्वं विधेयो भविष्यसि । ' पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर मुखवाली विदेहराजकुमारी सीताको देखते ही तुम कामदेवके बाणोंके लक्ष्य बन जाओगे ॥ २२३ ॥
यदि तस्यामभिप्रायो भार्यात्वे तव जायते ।
शीघ्रमुद्भियतां पादो जयार्थमिह दक्षिणः ॥ २३ ॥
' यदि तुम्हें सीताको अपनी भार्या बनानेकी इच्छा हो तो शीघ्र ही श्रीरामको जीतनेके लिये यहाँ अपना दाहिना पैर आगे बढ़ाओ ॥ २३ ॥
रोचते यदि ते वाक्यं ममैतद् राक्षसेश्वर ।
क्रियतां निर्विशङ्केन वचनं मम रावण ॥२४ ॥
' राक्षसराज रावण! यदि तुम्हें मेरी यह बात पसंद हो तो निःशङ्क होकर मेरे कथनानुसार कार्य करो ॥ २४ ॥
विज्ञायैषामशक्तिं च क्रियतां च महाबल ।
सीता तवानवद्याङ्गी भार्यात्वे राक्षसेश्वर ॥ २५ ॥
' महाबली राक्षसेश्वर! इन राम आदिकी असमर्थता और अपनी शक्तिका विचार करके सर्वाङ्गसुन्दरी सीताको अपनी भार्या बनानेका प्रयत्न करो ( उसे हर लाओ ) ॥ २५ ॥
निशम्य रामेण शरैरजिह्मगै-र्हताञ्जनस्थानगतान् निशाचरान् । खरं च दृष्ट्वा निहतं च दूषणं त्वमद्य कृत्यं प्रतिपत्तुमर्हसि ॥ २६ ॥
' श्रीरामने अपने सीधे जानेवाले बाणोंद्वारा जनस्थाननिवासी निशाचरोंको मार डाला और खर तथा दूषणको भी मौतके घाट उतार दिया, यह सब सुनकर और देखकर अब तुम्हारा क्या कर्तव्य है, इसका निश्चय तुम्हें कर लेना चाहिये ' ॥ २६ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे चतुस्त्रिंशः सर्गः ॥ ३४ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें चौंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३४ ॥
पृष्ठ 647
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अरण्यकाण्डे पञ्चत्रिंशः सर्गः ६३५ पञ्चत्रिंशः सर्गः रावणका समुद्रतटवर्ती प्रान्तकी शोभा
ततः शूर्पणखावाक्यं तच्छ्रुत्वा रोमहर्षणम् ।
सचिवानभ्यनुज्ञाय कार्यं बुद्ध्वा जगाम ह ॥ १ ॥
शूर्पणखाकी ये रोंगटें खड़ी कर देनेवाली बातें सुनकर रावण मन्त्रियोंसे सलाह ले अपने कर्तव्यका निश्चय करके वहाँसे चल दिया ॥१ ॥
तत् कार्यमनुगम्यान्तर्यथावदुपलभ्य च ।
दोषाणां च गुणानां च सम्प्रधार्य बलाबलम् ॥ २ ॥
इति कर्तव्यमित्येव कृत्वा निश्चयमात्मनः ।
स्थिरबुद्धिस्ततो रम्यां यानशालां जगाम ह ॥ ३ ॥
उसने पहले सीताहरणरूपी कार्यपर मन - ही - मन विचार किया । फिर उसके दोषों और गुणोंका यथावत् ज्ञान प्राप्त करके बलाबलका निश्चय किया । अन्तमें यह स्थिर किया कि इस कामको करना ही चाहिये । जब इस बातपर उसकी बुद्धि जम गयी, तब वह रमणीय रथशालामें गया ॥ २-३ ॥
यानशालां ततो गत्वा प्रच्छन्नं राक्षसाधिपः ।
सूतं संचोदयामास रथः संयुज्यतामिति ॥४ ॥
गुप्तरूपसे रथशालामें जाकर राक्षसराज रावणने अपने सारथिको यह आज्ञा दी कि ' मेरा रथ जोतकर तैयार करो ' ॥४ ॥
एवमुक्तः क्षणेनैव सारथिर्लघुविक्रमः ।
रथं संयोजयामास तस्याभिमतमुत्तमम् ॥ ५ ॥
सारथि शीघ्रतापूर्वक कार्य करनेमें कुशल था । रावणकी उपर्युक्त आज्ञा पाकर उसने एक ही क्षणमें उसके मनके अनुकूल उत्तम रथ जोतकर तैयार कर दिया ॥ ५ ॥
कामगं रथमास्थाय काञ्चनं रत्नभूषितम् ।
पिशाचवदनैर्युक्तं खरैः कनकभूषणैः ॥ ६ ॥
वह रथ इच्छानुसार चलनेवाला तथा सुवर्णमय था । उसे रत्नोंसे विभूषित किया गया था । उसमें सोनेके साज - बाजोंसे सजे हुए गधे जुते थे, जिनका मुख पिशाचोंके समान था । रावण उसपर आरूढ़ होकर चला ॥ ६ ॥
मेघप्रतिमनादेन स तेन धनदानुजः ।
राक्षसाधिपतिः श्रीमान् ययौ नदनदीपतिम् ॥ ७ ॥
वह रथ मेघ गर्जनाके समान गम्भीर घर - घर ध्वनि फैलाता हुआ चलता था । उसके द्वारा वह देखते हुए पुनः मारीचके पास जाना कुबेरका छोटा भाई श्रीमान् राक्षसराज रावण समुद्रके तटपर गया ॥७ ॥
स श्वेतवालव्यजनः श्वेतच्छत्रो दशाननः ।
स्निग्धवैदूर्यसंकाशस्तप्तकाञ्चनभूषणः ॥८ ॥
दशग्रीवो विंशतिभुजो दर्शनीयपरिच्छदः ।
त्रिदशारिर्मुनीन्द्र दशशीर्ष इवाद्रिराट् ॥ ९ ॥
उस समय उसके लिये सफेद चँवरसे हवा की जा रही थी । सिरके ऊपर श्वेत छत्र तना हुआ था । उसकी अङ्गकान्ति स्निग्ध वैदूर्यमणिके समान नीली या काली थी । वह पक्के सोनेके आभूषणोंसे विभूषित था । उसके दस मुख, दस कण्ठ और बीस भुजाएँ थीं । उसके वस्त्राभूषण आदि अन्य उपकरण भी देखने ही योग्य थे । देवताओंका शत्रु और मुनीश्वरोंका हत्यारा वह निशाचर दस शिखरोंवाले पर्वतराजके समान प्रतीत होता था ॥ ८ - ९ ॥
कामगं रथमास्थाय शुशुभे राक्षसाधिपः ।
विद्युन्मण्डलवान् मेघः सबलाक इवाम्बरे ॥ १० ॥
इच्छानुसार चलनेवाले उस रथपर आरूढ़ हो राक्षसराज रावण आकाशमें विद्युन्मण्डलसे घिरे हुए तथा वकपंक्तियोंसे सुशोभित मेघके समान शोभा पा रहा था ॥ १० ॥
सशैलसागरानूपं वीर्यवानवलोकयन् ।
नानापुष्पफलैर्वृक्षैरनुकीर्णं सहस्रशः ॥ ११ ॥
शीतमङ्गलतोयाभिः पद्मिनीभिः समन्ततः ।
विशालैराश्रमपदैर्वेदिमद्भिरलंकृतम् ॥ १२ ॥
पराक्रमी रावण पर्वतयुक्त समुद्रके तटपर पहुँचकर उसकी शोभा देखने लगा । सागरका वह किनारा नाना प्रकारके फल - फूलवाले सहस्रों वृक्षोंसे व्याप्त था । चारों ओर मङ्गलकारी शीतल जलसे भरी हुई पुष्करिणियाँ और वेदिकाओंसे मण्डित विशाल आश्रम उस सिन्धुतटकी शोभा बढ़ा रहे थे ॥ ११-१२ ॥
कदल्यटविसंशोभं नारिकेलोपशोभितम् ।
सालैस्तालैस्तमालैश्च तरुभिश्च सुपुष्पितैः ॥ १३ ॥
कहीं कदलीवन और कहीं नारियलके कुञ्ज शोभा दे रहे थे । साल, ताल, तमाल तथा सुन्दर फूलोंसे भरे हुए दूसरे - दूसरे वृक्ष उस तटप्रान्तको अलंकृत कर रहे थे ॥
अत्यन्तनियताहारैः शोभितं परमर्षिभिः ।
। नागैः सुपणैर्गन्धर्वैः किंनरैश्च सहस्रशः ॥ १४ ॥
पृष्ठ 648
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
६३६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे अत्यन्त नियमित आहार करनेवाले बड़े - बड़े महर्षियों, नाग, सुपर्णों ( गरुड़ों ), गन्धर्वों तथा सहस्रों किन्नरोंसे भी उस स्थानकी बड़ी शोभा हो रही थी ॥ १४ ॥
जितकामैश्च सिद्धैश्च चारणैश्चोपशोभितम् ।
आजैर्वैखानसैर्माषैर्वालखिल्यैर्मरीचिपैः ॥ १५ ॥
कामविजयी सिद्धों, चारणों, ब्रह्माजीके पुत्रों, वानप्रस्थों, माष गोत्रमें उत्पन्न मुनियों, बालखिल्य महात्माओं तथा केवल सूर्य - किरणोंका पान करनेवाले तपस्वीजनोंसे भी वह सागरका तटप्रान्त सुशोभित हो रहा था ॥ १५ ॥
दिव्याभरणमाल्याभिर्दिव्यरूपाभिरावृतम् क्रीडारतविधिज्ञाभिरप्सरोभिः सहस्त्रशः ॥ १६ ॥
सेवितं देवपत्नीभिः श्रीमतीभिरुपासितम् ।
देवदानवसङ्घैश्च चरितं त्वमृताशिभिः ॥ १७ ॥
दिव्य आभूषणों और पुष्पमालाओंको धारण करनेवाली तथा क्रीड़ा - विहारकी विधिको जाननेवाली सहस्रों दिव्यरूपिणी अप्सराएँ वहाँ सब ओर विचर रही थीं । कितनी ही शोभाशालिनी देवाङ्गनाएँ उस सिन्धुतटका सेवन करती हुई आस - पास बैठी थीं । देवताओं और दानवोंके समूह तथा अमृतभोजी देवगण वहाँ विचर रहे थे ॥ १६-१७ ॥
हंसक्रौञ्चप्लवाकीर्णं सारसैः सम्प्रसादितम् ।
वैदूर्यप्रस्तरं स्निग्धं सान्द्रं सागरतेजसा ॥ १८ ॥
सिन्धुका वह तट समुद्रके तेजसे उसकी तरङ्गमालाओंके स्पर्शसे स्निग्ध एवं शीतल था । वहाँ हंस, क्रौञ्च तथा मेढक सब ओर फैले हुए थे और सारस उसकी शोभा बढ़ा रहे थे । उस तटपर वैदूर्यमणिके सदृश श्याम रंगके प्रस्तर दिखायी देते थे ॥ १८ ॥
पाण्डुराणि विशालानि दिव्यमाल्ययुतानि च ।
तूर्यगीताभिजुष्टानि विमानानि समन्ततः ॥ १ ९ ॥
तपसा जितलोकानां कामगान्यभिसम्पतन् ।
गन्धर्वाप्सरसचैव ददर्श धनदानुजः ॥ २० ॥
आकाशमार्गसे यात्रा करते हुए कुबेरके छोटे भाई रावणने रास्तेमें सब ओर बहुत - से श्वेत वर्णके विमानों, गन्धर्वों तथा अप्सराओंको भी देखा । वे इच्छानुसार चलनेवाले विशाल विमान उन पुण्यात्मा पुरुषोंके थे, जिन्होंने तपस्यासे पुण्यलोकोंपर विजय पायी थी । उन विमानोंको दिव्य पुष्पोंसे सजाया गया था और उनके भीतरसे गीत - वाद्यकी ध्वनि प्रकट हो रही थी ॥ १ ९ -२० ॥
निर्यासरसमूलानां चन्दनानां सहस्रशः ।
वनानि पश्यन् सौम्यानि घ्राणतृप्तिकराणि च ॥ २१ ॥
आगे बढ़नेपर उसने, जिनकी जड़ोंसे गोंद निकले हुए थे, ऐसे चन्दनोंके सहस्रों वन देखे, जो बड़े ही सुहावने और अपनी सुगन्धसे नासिकाको तृप्त करनेवाले थे ॥ २१ ॥
अगुरूणां च मुख्यानां वनान्युपवनानि च ।
तक्कोलानां च जात्यानां फलिनां च सुगन्धिनाम् ॥ २२ ॥
पुष्पाणि च तमालस्य गुल्मानि मरिचस्य च ।
मुक्तानां च समूहानि शुष्यमाणानि तीरतः ॥ २३ ॥
शैलानि प्रवरांश्चैव प्रवालनिचयांस्तथा ।
काञ्चनानि च शृङ्गाणि राजतानि तथैव च ॥ २४ ॥
प्रस्त्रवाणि मनोज्ञानि प्रसन्नान्यद्भुतानि च ।
धनधान्योपपन्नानि स्त्रीरत्नैरावृतानि च ॥ २५ ॥
हस्त्यश्वरथगाढानि नगराणि विलोकयन् । कहीं श्रेष्ठ अगुरुके वन थे, कहीं उत्तम जातिके सुगन्धित फलवाले तक्कोलों ( वृक्षविशेषों ) के उपवन थे । कहीं तमालके फूल खिले हुए थे । कहीं गोल मिर्चकी झाड़ियाँ शोभा पाती थीं और कहीं समुद्रके तटपर ढेर - के - ढेर मोती सूख रहे थे । कहीं श्रेष्ठ पर्वतमालाएँ, कहीं मूगोंकी राशियाँ, कहीं सोने - चाँदीके शिखर तथा कहीं सुन्दर, अद्भुत और स्वच्छ पानीके झरने दिखायी देते थे । कहीं धन - धान्यसे सम्पन्न, स्त्री-रत्नोंसे भरे हुए तथा हाथी, घोड़े और रथोंसे व्यास नगर दृष्टिगोचर होते थे । इन सबको देखता हुआ रावण आगे बढ़ा ॥ २२ - २५३ ॥ तं समं सर्वतः स्निग्धं मृदुसंस्पर्शमारुतम् ॥ २६ ॥
अनूपे सिन्धुराजस्य ददर्श त्रिदिवोपमम् । फिर उसने सिंधुराजके तटपर एक ऐसा स्थान देखा, जो स्वर्गके समान मनोहर, सब ओरसे समतल और स्निग्ध था । वहाँ मन्द मन्द वायु चलती थी, जिसका स्पर्श बड़ा कोमल जान पड़ता था ॥ २६३ ॥
तत्रापश्यत् स मेघाभं न्यग्रोधं मुनिभिर्वृतम् ॥ २७ ॥
समन्ताद् यस्य ताः शाखाः शतयोजनमायताः । वहाँ सागरतटपर एक बरगदका वृक्ष दिखायी दिया, जो अपनी घनी छायाके कारण मेघोंकी घटाके समान प्रतीत होता था । उसके नीचे चारों ओर मुनि निवास करते थे । उस वृक्षकी सुप्रसिद्ध शाखाएँ चारों ओर सौ योजनतक फैली हुई थीं ॥ २७३ ॥
यस्य हस्तिनमादाय महाकायं च कच्छपम् ॥ २८ ॥
भक्षार्थं गरुडः शाखामाजगाम महाबलः । यह वही वृक्ष था, जिसकी शाखापर किसी समय महाबली गरुड़ एक विशालकाय हाथी और कछुएको
पृष्ठ 649
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अरण्यकाण्डे लेकर उन्हें खानेके लिये आ बैठे थे ॥ २८३ ॥
तस्य तां सहसा शाखां भारेण पतगोत्तमः ॥ २ ९ ॥ सुपर्णः पर्णबहुलां बभञ्जाथ महाबलः । पक्षियोंमें श्रेष्ठ महाबली गरुड़ने बहुसंख्यक पत्तोंसे भरी हुई उस शाखाको सहसा अपने भारसे तोड़ डाला था ॥ २ ९ ३ ॥ तत्र वैखानसा माषा वालखिल्या मरीचिपाः ॥ ३० ॥
आजा बभूवुर्धूम्राश्च संगताः परमर्षयः । उस शाखाके नीचे बहुत - से वैखानस, माष, बालखिल्य, मरीचिप ( सूर्य - किरणोंका पान करनेवाले ), ब्रह्मपुत्र और धूम्रप संज्ञावाले महर्षि एक साथ रहते थे ॥ ३०३ ॥
तेषां दयार्थं गरुडस्तां शाखां शतयोजनाम् ॥ ३१ ॥
भग्नामादाय वेगेन तौ चोभौ गजकच्छपौ ।
एकपादेन धर्मात्मा भक्षयित्वा तदामिषम् ॥ ३२ ॥
निषादविषयं हत्वा शाखया पतगोत्तमः ।
प्रहर्षमतुलं लेभे मोक्षयित्वा महामुनीन् ॥ ३३ ॥
उनपर दया करके उनके जीवनकी रक्षा करनेके लिये पक्षियोंमें श्रेष्ठ धर्मात्मा गरुड़ने उस टूटी हुई सौ योजन लंबी शाखाको और उन दोनों हाथी तथा कछुएको भी वेगपूर्वक एक ही पंजेसे पकड़ लिया तथा आकाशमें ही उन दोनों जंतुओंके मांस खाकर फेंकी हुई उस डालीके द्वारा निषाद देशका संहार कर डाला । उस समय पूर्वोक्त महामुनियोंको मृत्युके संकटसे बचा लेनेसे गरुड़को अनुपम हर्ष प्राप्त हुआ ॥ ३१-३३ ॥
स तु तेन प्रहर्षेण द्विगुणीकृतविक्रमः ।
अमृतानयनार्थं वै चकार मतिमान् मतिम् ॥ ३४ ॥
उस महान् हर्षसे बुद्धिमान् गरुड़का पराक्रम दूना हो गया और उन्होंने अमृत ले आनेके लिये पक्का निश्चय कर लिया ॥३४ ॥
अयोजालानि निर्मथ्य भित्त्वा रत्नगृहं वरम् ।
महेन्द्रभवनाद् गुप्तमाजहारामृतं ततः ॥ ३५ ॥
तत्पश्चात् इन्द्रलोकमें जाकर उन्होंने इन्द्रभवनकी उन जालियोंको तोड़ डाला, जो लोहेकी सींकचोंसे पञ्चत्रिंशः सर्गः ६३७ महेन्द्रभवनसे हर लाये ॥ ३५ ॥
तं महर्षिगणैर्जुष्टं सुपर्णकृतलक्षणम् ।
नाम्ना सुभद्रं न्यग्रोधं ददर्श धनदानुजः ॥ ३६ ॥
गरुड़के द्वारा तोड़ी हुई डालीका वह चिह्न उस बरगदमें उस समय भी मौजूद था । उस वृक्षका नाम था सुभद्रवट । बहुत - से महर्षि उस वृक्षकी छायामें निवास करते थे । कुबेरके छोटे भाई रावणने उस वटवृक्षको देखा ॥ ३६ ॥
तं तु गत्वा परं पारं समुद्रस्य नदीपतेः ।
ददर्शाश्रममेकान्ते पुण्ये रम्ये वनान्तरे ॥ ३७ ॥
नदियोंके स्वामी समुद्रके दूसरे तटपर जाकर उसने एक रमणीय वनके भीतर पवित्र एवं एकान्तस्थानमें एक आश्रमका दर्शन किया ॥ ३७ ॥
तत्र कृष्णाजिनधरं जटामण्डलधारिणम् ।
ददर्श नियताहारं मारीचं नाम राक्षसम् ॥ ३८ ॥
वहाँ शरीरमें काला मृगचर्म और सिरपर जटाओंका समूह धारण किये नियमित आहार करते हुए मारीच नामक राक्षस निवास करता था । रावण वहाँ जाकर उससे मिला ॥ ३८ ॥
स रावणः समागम्य विधिवत् तेन रक्षसा ।
मारीचेनार्चितो राजा सर्वकामैरमानुषैः ॥ ३ ९ ॥
मिलनेपर उस राक्षस मारीचने सब प्रकारके अलौकिक कमनीय पदार्थ अर्पित करके राजा रावणका विधिपूर्वक आतिथ्य -सत्कार किया ॥ ३ ९ ॥
तं स्वयं पूजयित्वा च भोजनेनोदकेन च ।
अर्थोपहितया वाचा मारीचो वाक्यमब्रवीत् ॥ ४० ॥
अन्न और जलसे स्वयं उसका पूर्ण सत्कार करके मारीचने प्रयोजनकी बातें पूछते हुए उससे इस प्रकार कहा – ॥ ४० ॥
कच्चित्ते कुशलं राजन् लङ्कायां राक्षसेश्वर ।
केनार्थेन पुनस्त्वं वै तूर्णमेव इहागतः ॥ ४१ ॥
' राजन्! तुम्हारी लङ्कामें कुशल तो है? राक्षसराज! तुम किस कामके लिये पुन: इतनी जल्दी यहाँ आये हो? ॥
एवमुक्तो महातेजा मारीचेन स रावणः ।
ततः पश्चादिदं वाक्यमब्रवीद् वाक्यकोविदः ॥ ४२ ॥
बनी हुई थीं । फिर रत्ननिर्मित श्रेष्ठ भवनको नष्ट- मारीचके इस प्रकार पूछनेपर बातचीत करनेमें भ्रष्ट करके वहाँ छिपाकर रखे हुए अमृतको वे कुशल महातेजस्वी रावणने उससे इस प्रकार कहा- ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे पञ्चत्रिंशः सर्गः ॥ ३५ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें पैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३५ ॥
पृष्ठ 650
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
६३८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे षट्त्रिंशः सर्गः रावणका मारीचसे श्रीरामके अपराध बताकर उनकी पत्नी सीताके अपहरणमें सहायताके लिये कहना
मारीच श्रूयतां तात वचनं मम भाषतः ।
आर्तोऽस्मि मम चार्तस्य भवान् हि परमा गतिः ॥ १ ॥
' तात मारीच! मैं सब बता रहा हूँ । मेरी बात सुनो । इस समय मैं बहुत दुःखी हूँ और इस दुःखकी अवस्थामें तुम्हीं मुझे सबसे बढ़कर सहारा देनेवाले हो ॥ १ ॥
जानीषे त्वं जनस्थानं भ्राता यत्र खरो मम ।
दूषणश्च महाबाहुः स्वसा शूर्पणखा च मे ॥ २ ॥
त्रिशिराश्च महाबाहू राक्षसः पिशिताशनः ।
अन्ये च बहवः शूरा लब्धलक्षा निशाचराः ॥ ३ ॥
' तुम जनस्थानको जानते हो, जहाँ मेरा भाई खर, महाबाहु दूषण, मेरी बहिन शूर्पणखा, मांसभोजी राक्षस महाबाहु त्रिशिरा तथा और भी बहुत - से लक्ष्यवेधमें कुशल शूरवीर निशाचर रहा करते थे॥२-३ ॥
वसन्ति मन्नियोगेन अधिवासं च राक्षसाः ।
बाधमाना महारण्ये मुनीन् ये धर्मचारिणः ॥ ४ ॥
' वे सभी राक्षस मेरी आज्ञासे वहाँ घर बनाकर रहते थे और उस विशाल वनमें जो धर्माचरण करनेवाले मुनि थे, उन्हें सताया करते थे ॥४ ॥
चतुर्दश सहस्त्राणि रक्षसां भीमकर्मणाम् ।
शूराणां लब्धलक्षाणां खरचित्तानुवर्तिनाम् ॥ ५ ॥
' वहाँ खरके मनका अनुसरण करनेवाले तथा युद्धविषयक उत्साहसे सम्पन्न चौदह हजार शूरवीर राक्षस रहते थे, जो भयंकर कर्म करनेवाले थे ॥ ५ ॥
ते त्विदानीं जनस्थाने वसमाना महाबलाः ।
सङ्गताः परमायत्ता रामेण सह संयुगे ॥ ६ ॥
‘ जनस्थानमें निवास करनेवाले जितने महाबली राक्षस थे, वे सब - के - सब उस समय अच्छी तरह सन्नद्ध होकर युद्धक्षेत्रमें रामके साथ जा भिड़े थे ॥ ६ ॥
नानाशस्त्रप्रहरणाः खरप्रमुखराक्षसाः ।
तेन संजातरोषेण रामेण रणमूर्धनि ॥ ७ ॥
अनुक्त्वा परुषं किंचिच्छरैर्व्यापारितं धनुः । ' वे खर आदि राक्षस नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंका प्रहार करनेमें कुशल थे, परंतु युद्धके मुहानेपर रोषमें भरे हुए श्रीरामने अपने मुँहसे कोई कड़वी बात न कहकर बाणोंके साथ धनुषका ही व्यापार आरम्भ किया ॥ ७३ ॥
चतुर्दश सहस्राणि रक्षसामुग्रतेजसाम् ॥ ८ ॥
निहतानि शरैर्दीतैर्मानुषेण पदातिना ।
खरश्च निहतः संख्ये दूषणश्च निपातितः ॥ ९ ॥
हत्वा त्रिशिरसं चापि निर्भया दण्डकाः कृताः । ' पैदल और मनुष्य होकर भी रामने अपने दमकते हुए बाणोंसे भयंकर तेजवाले चौदह हजार राक्षसोंका विनाश कर डाला और उसी युद्धमें खरको भी मौतके घाट उतारकर दूषणको भी मार गिराया । साथ ही त्रिशिराका वध करके उसने दण्डकारण्यको दूसरोंके लिये निर्भय बना दिया ॥ ८- ९ ३ ॥ पित्रा निरस्तः क्रुद्धेन सभार्यः क्षीणजीवितः ॥ १० ॥
स हन्ता तस्य सैन्यस्य रामः क्षत्रियपांसनः । ' उसके पिताने कुपित होकर उसे पत्नीसहित घरसे निकाल दिया है । उसका जीवन क्षीण हो चला है । यह क्षत्रियकुल- कलङ्क राम ही उस राक्षस - सेनाका घातक है ॥ १०३ ॥
अशीलः कर्कशस्तीक्ष्णो मूर्खो लुब्धोऽजितेन्द्रियः ॥ ११ ॥
त्यक्तधर्मा त्वधर्मात्मा भूतानामहिते रतः ।
येन वैरं विनारण्ये सत्त्वमास्थाय केवलम् ॥ १२ ॥
कर्णनासापहारेण भगिनी मे विरूपिता ।
अस्य भार्यां जनस्थानात् सीतां सुरसुतोपमाम् ॥ १३ ॥
आनयिष्यामि विक्रम्य सहायस्तत्र मे भव । ' वह शीलरहित, क्रूर, तीखे स्वभाववाला, मूर्ख, लोभी, अजितेन्द्रिय, धर्मत्यागी, अधर्मात्मा और समस्त प्राणियोंके अहितमें तत्पर रहनेवाला है । जिसने बिना किसी वैर - विरोधके केवल बलका आश्रय ले मेरी बहिन नाक - कान काटकर उसका रूप बिगाड़ दिया, उससे बदला लेनेके लिये मैं भी उसकी देवकन्याके समान सुन्दरी पत्नी सीताको जनस्थानसे बलपूर्वक हर लाऊँगा । तुम उस कार्यमें मेरी सहायता करो ॥ ११ - १३३ ॥ त्वया ह्यहं सहायेन पार्श्वस्थेन महाबल ॥ १४ ॥
भ्रातृभिश्च सुरान् सर्वान् नाहमत्राभिचिन्तये ॥ तत्सहायो भव त्वं मे समर्थो ह्यसि राक्षस ॥ १५ ॥