वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ — पृष्ठ 661–670

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 661–670

पृष्ठ 661

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अरण्यकाण्डे एकचत्वारिंशः सर्गः ६४ ९ ' अच्छे मन्त्रियोंको चाहिये कि जो राजा स्वेच्छाचारी । होकर कुमार्गपर चलने लगे, उसे सब प्रकारसे वे रोकें । तुम भी रोकनेके ही योग्य हो; फिर भी वे मन्त्री तुम्हें रोक नहीं रहे हैं ॥ ७ ॥

धर्ममर्थं च कामं च यशश्च जयतां वर ।

स्वामिप्रसादात् सचिवाः प्राप्नुवन्ति निशाचर ॥ ८ ॥

' विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ निशाचर! मन्त्री अपने स्वामी राजाकी कृपासे ही धर्म, अर्थ, काम और यश पाते हैं ॥ ८ ॥

विपर्यये तु तत्सर्वं व्यर्थं भवति रावण ।

व्यसनं स्वामिवैगुण्यात् प्राप्नुवन्तीतरे जनाः ॥ ९ ॥

‘ रावण! यदि स्वामीकी कृपा न हो तो सब व्यर्थ हो जाता है । राजाके दोषसे दूसरे लोगोंको भी कष्ट भोगना पड़ता है ॥ ९ ॥

राजमूलो हि धर्मश्च यशश्च जयतां वर ।

तस्मात् सर्वास्ववस्थासु रक्षितव्या नराधिपाः ॥ १० ॥

' विजयशीलोंमें श्रेष्ठ राक्षसराज! धर्म और यशकी प्राप्तिका मूल कारण राजा ही है; अतः सभी अवस्थाओंमें राजाकी रक्षा करनी चाहिये ॥ १० ॥

राज्यं पालयितुं शक्यं न तीक्ष्णेन निशाचर ।

न चातिप्रतिकूलेन नाविनीतेन राक्षस ॥ ११ ॥

‘ रात्रिमें विचरनेवाले राक्षस! जिसका स्वभाव अत्यन्त तीखा हो, जो जनताके अत्यन्त प्रतिकूल चलनेवाला और उद्दण्ड हो, ऐसे राजासे राज्यकी रक्षा नहीं हो सकती ॥ ११ ॥

ये तीक्ष्णमन्त्राः सचिवा भुज्यन्ते सह तेन वै ।

विषमेषु रथाः शीघ्रं मन्दसारथयो यथा ॥ १२ ॥

' जो मन्त्री तीखे उपायका उपदेश करते हैं, वे अपनी सलाह माननेवाले उस राजाके साथ ही दुःख भोगते हैं, जैसे जिनके सारथि मूर्ख हों, ऐसे रथ नीची - ऊँची भूमिमें जानेपर सारथियोंके साथ ही संकटमें पड़ जाते हैं ॥ १२ ॥

बहवः साधवो लोके युक्तधर्ममनुष्ठिताः ।

परेषामपराधेन विनष्टाः सपरिच्छदाः ॥ १३॥

' उपयुक्त धर्मका अनुष्ठान करनेवाले बहुत - से साधु - पुरुष इस जगत्में दूसरोंके अपराधसे परिवारसहित नष्ट हो गये हैं ॥ १३ ॥

स्वामिना प्रतिकूलेन प्रजास्तीक्ष्णेन रावण ।

रक्ष्यमाणा न वर्धन्ते मेषा गोमायुना यथा ॥ १४ ॥

' रावण! प्रतिकूल बर्ताव और तीखे स्वभाववाले राजासे रक्षित होनेवाली प्रजा उसी तरह वृद्धिको नहीं प्राप्त होती है, जैसे गीदड़ या भेड़ियेसे पालित होनेवाली भेड़ें ॥ १४ ॥

अवश्यं विनशिष्यन्ति सर्वे रावण राक्षसाः ।

येषां त्वं कर्कशो राजा दुर्बुद्धिरजितेन्द्रियः ॥ १५ ॥

' रावण! जिनके तुम क्रूर, दुर्बुद्धि और अजितेन्द्रिय राजा हो, वे सब राक्षस अवश्य ही नष्ट हो जायँगे ॥ १५ ॥

तदिदं काकतालीयं घोरमासादितं मया ।

अत्र त्वं शोचनीयोऽसि ससैन्यो विनशिष्यसि ॥ १६ ॥

' काकतालीय न्यायके अनुसार मुझे तुमसे अकस्मात् ही यह घोर दुःख प्राप्त हो गया । इस विषयमें मुझे तुम ही शोकके योग्य जान पड़ते हो; क्योंकि सेनासहित तुम्हारा नाश हो जायगा ॥ १६ ॥

मां निहत्य तु रामोऽसावचिरात् त्वां वधिष्यति ।

अनेन कृतकृत्योऽस्मि म्रिये चाप्यरिणा हतः ॥ १७ ॥

' श्रीरामचन्द्रजी मुझे मारकर तुम्हारा भी शीघ्र ही वध कर डालेंगे । जब दोनों ही तरहसे मेरी मृत्यु निश्चित है, तब श्रीरामके हाथसे होनेवाली जो यह मृत्यु है, इसे पाकर मैं कृतकृत्य हो जाऊँगा; क्योंकि शत्रुके द्वारा युद्धमें मारा जाकर प्राणत्याग करूँगा ( तुम - जैसे राजाके हाथसे बलपूर्वक प्राणदण्ड पानेका कष्ट नहीं भोगूँगा ) ॥ १७ ॥

दर्शनादेव रामस्य मामवधारय ।

आत्मानं च हतं विद्धि हृत्वा सीतां सबान्धवम् ॥ १८ ॥

' राजन्! यह निश्चित समझो कि श्रीरामके सामने जाकर उनकी दृष्टि पड़ते ही मैं मारा जाऊँगा और यदि तुमने सीताका हरण किया तो तुम अपनेको भी बन्धु-बान्धवोंसहित मरा हुआ ही मानो ॥ १८ ॥

आनयिष्यसि चेत् सीतामाश्रमात् सहितो मया ।

नैव त्वमपि नाहं वै नैव लङ्का न राक्षसाः ॥ १ ९ ॥

' यदि तुम मेरे साथ जाकर श्रीरामके आश्रमसे सीताका अपहरण करोगे, तब न तो तुम जीवित बचोगे । और न मैं ही । न लंकापुरी रहने पायेगी और न वहाँके निवासी राक्षस ही ॥ १ ९ ॥ निवार्यमाणस्तु मया हितैषिणा न मृष्यसे वाक्यमिदं निशाचर । परेतकल्पा हि गतायुषो नरा हितं न गृह्णन्ति सुहृद्धिरीरितम् ॥ २० ॥

' निशाचर! मैं तुम्हारा हितैषी हूँ, इसीलिये तुम्हें

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६५० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे पापकर्मसे रोक रहा हूँ; किंतु तुम्हें मेरी बात सहन नहीं | मरणासन्न पुरुष अपने सुहृदोंकी कही हुई हितकर बातें

होती है । सच है जिनकी आयु समाप्त हो जाती है, वे । नहीं स्वीकार करते हैं'॥२० ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे एकचत्वारिंशः सर्गः ॥ ४१ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें इकतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ४१ ॥

द्विचत्वारिंशः सर्गः मारीचका सुवर्णमय मृगरूप धारण करके श्रीरामके आश्रमपर जाना और

एवमुक्त्वा तु परुषं मारीचो रावणं ततः ।

गच्छावेत्यब्रवीद् दीनो भयाद् रात्रिंचरप्रभोः ॥ १ ॥

रावणसे इस प्रकार कठोर बातें कहकर उस निशाचर-राजके भयसे दुःखी हुए मारीचने कहा – ' चलो चलें ॥ १ ॥

दृष्टश्चाहं पुनस्तेन शरचापासिधारिणा ।

मद्वधोद्यतशस्त्रेण निहतं जीवितं च मे ॥ २ ॥

' मेरे वधके लिये जिनका हथियार सदा उठा ही रहता है, उन धनुष - बाण और तलवार धारण करनेवाले श्रीरामचन्द्रजीने यदि फिर मुझे देख लिया तो मेरे जीवनका अन्त निश्चित है ॥ २ ॥

नहि रामं पराक्रम्य जीवन् प्रतिनिवर्तते ।

वर्तते प्रतिरूपोऽसौ यमदण्डहतस्य ते ॥ ३ ॥

' श्रीरामचन्द्रजीके साथ पराक्रम दिखाकर कोई जीवित नहीं लौटता है । तुम यमदण्डसे मारे गये हो ( इसीलिये उनसे भिड़नेकी बात सोचते हो ) । वे श्रीरामचन्द्रजी तुम्हारे लिये यमदण्डके ही समान हैं ॥ ३ ॥

किं नु कर्तुं मया शक्यमेवं त्वयि दुरात्मनि ।

एष गच्छाम्यहं तात स्वस्ति तेऽस्तु निशाचर ॥४ ॥

' परंतु जब तुम इस प्रकार दुष्टतापर उतारू हो गये, तब मैं क्या कर सकता हूँ । लो, यह मैं चलता हूँ । तात निशाचर! तुम्हारा कल्याण हो ' ॥ ४ ॥

प्रहृष्टस्त्वभवत् तेन वचनेन स राक्षसः ।

परिष्वज्य सुसंश्लिष्टमिदं वचनमब्रवीत् ॥ ५ ॥

मारीचके उस वचनसे राक्षस रावणको बड़ी प्रसन्नता हुई । उसने उसे कसकर हृदयसे लगा लिया और इस प्रकार कहा- ॥ ५ ॥

एतच्छौटीर्ययुक्तं मच्छन्दवशवर्तिनः ।

इदानीमसि मारीचः पूर्वमन्यो हि राक्षसः ॥ ६ ॥

' यह तुमने वीरताकी बात कही है; क्योंकि अब तुम मेरी इच्छाके वशवर्ती हो गये हो । इस समय तुम । सीताका उसे देखना वास्तवमें मारीच हो । पहले तुममें किसी दूसरे राक्षसका आवेश हो गया था ॥६ ॥

आरुह्यतामयं शीघ्रं खगो रत्नविभूषितः ।

मया सह रथो युक्तः पिशाचवदनैः खरैः ॥ ७ ॥

' यह रत्नोंसे विभूषित मेरा आकाशगामी रथ तैयार है, इसमें पिशाचोंके से मुखवाले गधे जुते हुए हैं, इसपर मेरे साथ जल्दीसे बैठ जाओ ॥ ७ ॥

प्रलोभयित्वा वैदेहीं यथेष्टं गन्तुमर्हसि ।

तां शून्ये प्रसभं सीतामानयिष्यामि मैथिलीम् ॥ ८ ॥

' ( तुम्हारे जिम्मे एक ही काम है ) विदेहकुमारी सीताके मनमें अपने लिये लोभ उत्पन्न कर दो । उसे लुभाकर तुम जहाँ चाहो जा सकते हो । आश्रम सूना हो जानेपर मैं मिथिलेशकुमारी सीताको जबरदस्ती उठा लाऊँगा ' ॥ ८ ॥

ततस्तथेत्युवाचैनं रावणं ताटकासुतः ।

ततो रावणमारीचौ विमानमिव तं रथम्॥९॥

आरुह्याययतुः शीघ्रं तस्मादाश्रममण्डलात् । तब ताटकाकुमार मारीचने रावणसे कहा- ' तथास्तु ' ऐसा ही हो । तदनन्तर रावण और मारीच दोनों उस विमानाकार रथपर बैठकर शीघ्र ही उस आश्रममण्डलसे चल दिये ॥ ९ ३ ॥ तथैव तत्र पश्यन्तौ पत्तनानि वनानि च ॥१० ॥

गिरींश्च सरितः सर्वा राष्ट्राणि नगराणि च ।

समेत्य दण्डकारण्यं राघवस्याश्रमं ततः ॥ ११ ॥

ददर्श सहमारीचो रावणो राक्षसाधिपः । मार्गमें पहलेकी ही भाँति अनेकानेक पत्तनों, वनों, पर्वतों, समस्त नदियों, राष्ट्रों तथा नगरोंको देखते हुए दोनोंने दण्डकारण्यमें प्रवेश किया और वहाँ मारीचसहित राक्षसराज रावणने श्रीरामचन्द्रजीका आश्रम देखा ॥ १०-११३ ॥

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अरण्यकाण्डे द्विचत्वारिंशः सर्गः ६५१ अवतीर्य रथात् तस्मात् ततः काञ्चनभूषणात् ॥ १२ ॥ ।

हस्ते गृहीत्वा मारीचं रावणो वाक्यमब्रवीत् । तब उस सुवर्णभूषित रथसे उतरकर रावणने मारीचका हाथ अपने हाथमें ले उससे कहा- ॥ १२३ ॥

एतद् रामाश्रमपदं दृश्यते कदलीवृतम् ॥ १३ ॥

क्रियतां तत् सखे शीघ्रं यदर्थं वयमागताः । ' सखे! यह केलोंसे घिरा हुआ रामका आश्रम दिखायी दे रहा है । अब शीघ्र ही वह कार्य करो, जिसके लिये हमलोग यहाँ आये हैं ' ॥ १३३ ॥

स रावणवचः श्रुत्वा मारीचो राक्षसस्तदा ॥ १४ ॥

मृगो भूत्वाऽऽश्रमद्वारि रामस्य विचचार ह । रावणकी बात सुनकर राक्षस मारीच उस समय मृगका रूप धारण करके श्रीरामके आश्रमके द्वारपर विचरने लगा ॥ स तु रूपं समास्थाय महदद्भुतदर्शनम् ॥ १५ ॥

मणिप्रवरशृङ्गाग्रः सितासितमुखाकृतिः ।

रक्तपद्मोत्पलमुख इन्द्रनीलोत्पलश्रवाः ॥ १६ ॥

किंचिदभ्युन्नतग्रीव इन्द्रनीलनिभोदरः ।

मधूकनिभपार्श्वश्च कञ्जकिञ्जल्कसंनिभः ॥ १७ ॥

उस समय उसने देखनेमें बड़ा ही अद्भुत रूप धारण कर रखा था । उसके सींगोंके ऊपरी भाग इन्द्रनील नामक श्रेष्ठ मणिके बने हुए जान पड़ते थे, मुखमण्डलपर सफेद और काले रंगकी बूँदें थीं, मुखका रंग लाल कमलके समान था । उसके कान नीलकमलके तुल्य थे और गरदन कुछ ऊँची थी, उदरका भाग इन्द्रनीलमणिकी कान्ति धारण कर रहा था । पार्श्वभाग महुएके फूलके समान श्वेतवर्णके थे, शरीरका सुनहरा रंग कमलके केसरकी भाँति सुशोभित होता था ॥ १५ – १७ ॥

वैदूर्यसंकाशखुरस्तनुजङ्घः सुसंहतः ।

इन्द्रायुधसवर्णेन पुच्छेनोर्ध्वं विराजितः ॥ १८ ॥

उसके खुर वैदूर्यमणिके समान, पिंडलियाँ पतली और पूँछ ऊपरसे इन्द्रधनुषके रंगकी थी, जिससे उसका संगठित शरीर विशेष शोभा पा रहा था ॥ १८ ॥

मनोहरस्निग्धवर्णो रत्नैर्नानाविधैर्वृतः ।

क्षणेन राक्षसो जातो मृगः परमशोभनः ॥ १ ९ ॥

उसकी देहकी कान्ति बड़ी ही मनोहर और चिकनी थी । वह नाना प्रकारकी रत्नमयी बुँदकियोंसे विभूषित दिखायी देता था । राक्षस मारीच क्षणभरमें ही परम शोभाशाली मृग बन गया ॥१ ९ ॥

वनं प्रज्वलयन् रम्यं रामाश्रमपदं च तत् ।

मनोहरं दर्शनीयं रूपं कृत्वा स राक्षसः ॥ २० ॥

प्रलोभनार्थं वैदेह्या नानाधातुविचित्रितम् ।

विचरन् गच्छते सम्यक् शाद्वलानि समन्ततः ॥ २१ ॥

सीताको लुभानेके लिये विविध धातुओंसे चित्रित मनोहर एवं दर्शनीय रूप बनाकर वह निशाचर उस रमणीय वन तथा श्रीरामके उस आश्रमको प्रकाशित करता हुआ सब ओर उत्तम घासको चरने और विचरने लगा ॥ २०-२१ ॥

रौप्यैर्बिन्दुशतैश्चित्रं भूत्वा च प्रियदर्शनः ।

विटपीनां किसलयान् भक्षयन् विचचार ह ॥ २२ ॥

सैकड़ों रजतमय विन्दुओंसे युक्त विचित्र रूप धारण करके वह मृग बड़ा प्यारा दिखायी देता था । वह वृक्षोंके कोमल पल्लवोंको खाता हुआ इधर - उधर विचरने लगा ॥ २२ ॥

कदलीगृहकं गत्वा कर्णिकारानितस्ततः ।

समाश्रयन् मन्दगतिं सीतासंदर्शनं ततः ॥ २३ ॥

केलेके बगीचेमें जाकर वह कनेरोंके कुञ्जमें जा पहुँचा । फिर जहाँ सीताकी दृष्टि पड़ सके, ऐसे स्थानमें जाकर मन्दगतिका आश्रय ले इधर - उधर घूमने लगा ॥ २३ ॥

राजीवचित्रपृष्ठः स विरराज महामृग: ।

रामाश्रमपदाभ्याशे विचचार यथासुखम् ॥ २४ ॥

उसका पृष्ठभाग कमलके केसरकी भाँति सुनहरे रंगका होनेके कारण विचित्र दिखायी देता था, इससे उस महान् मृगकी बड़ी शोभा हो रही थी । श्रीरामचन्द्रजीके आश्रमके निकट ही वह अपनी मौजसे घूम रहा | था ॥ २४ ॥

पुनर्गत्वा निवृत्तश्च विचचार मृगोत्तमः ।

गत्वा मुहूर्तं त्वरया पुनः प्रतिनिवर्तते ॥ २५ ॥

वह श्रेष्ठ मृग कुछ दूर जाकर फिर लौट आता था और वहीं घूमने लगता था । दो घड़ीके लिये कहीं चला जाता और फिर बड़ी उतावलीके साथ लौट आता | था ॥ २५ ॥

विक्रीडंश्च क्वचिद् भूमौ पुनरेव निषीदति ।

आश्रमद्वारमागम्य मृगयूथानि गच्छति ॥ २६ ॥

वह कहीं खेलता, कूदता और पुनः भूमिपर ही बैठ जाता था, फिर आश्रमके द्वारपर आकर मृगोंके झुंडके पीछे - पीछे चल देता ॥ २६ ॥

मृगयूथैरनुगतः पुनरेव निवर्तते ।

सीतादर्शनमाकांक्षन् राक्षसो मृगतां गतः ॥ २७ ॥

तत्पश्चात् झुंड - के - झुंड मृगोंको साथ लिये फिर । लौट आता था । उस मृगरूपधारी राक्षसके मनमें केवल

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६५२ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे यह अभिलाषा थी कि किसी तरह सीताकी दृष्टि मुझपर ` पड़ जाय ॥ २७ ॥

परिभ्रमति चित्राणि मण्डलानि विनिष्पतन् ।

समुद्वीक्ष्य च सर्वे तं मृगा येऽन्ये वनेचराः ॥ २८ ॥

उपगम्य समाघ्राय विद्रवन्ति दिशो दश । सीताके समीप आते समय वह विचित्र मण्डल ( पैंतरे ) दिखाता हुआ चारों ओर चक्कर लगाता था । उस वनमें विचरनेवाले जो दूसरे मृग थे, वे सब उसे देखकर पास आते और उसे सूँघकर दसों दिशाओंमें भाग जाते थे ॥ राक्षसः सोऽपि तान् वन्यान् मृगान् मृगवधे रतः ॥ २ ९ ॥ प्रच्छादनार्थं भावस्य न भक्षयति संस्पृशन् । राक्षस मारीच यद्यपि मृगोंके वधमें ही तत्पर रहता था तथापि उस समय अपने भावको छिपानेके लिये उन वन्य मृगोंका स्पर्श करके भी उन्हें खाता नहीं था ॥ २ ९ ३ ॥ तस्मिन्नेव ततः काले वैदेही शुभलोचना ॥ ३० ॥

कुसुमापचये व्यग्ग्रा पादपानत्यवर्तत ।

कर्णिकारानशोकांश्च चूतांश्च मदिरेक्षणा ॥ ३१ ॥

उसी समय मदभरे सुन्दर नेत्रोंवाली विदेहनन्दिनी सीता, जो फूल चुननेमें लगी हुई थीं, कनेर, अशोक और आमके वृक्षोंको लाँघती हुई उधर आ निकलीं ॥

कुसुमान्यपचिन्वन्ती चचार रुचिरानना ।

अनर्हा वनवासस्य सा तं रत्नमयं मृगम् ॥ ३२ ॥

मुक्तामणिविचित्राङ्गं ददर्श परमाङ्गना । फूलोंको चुनती हुई वे वहीं विचरने लगीं । उनका मुख बड़ा ही सुन्दर था 1 । वे वनवासका कष्ट भोगनेके योग्य नहीं थीं । परम सुन्दरी सीताने उस रत्नमय मृगको देखा, जिसका अङ्ग - प्रत्यङ्ग मुक्तामणियोंसे चित्रित - सा जान पड़ता था ॥३२३ ॥

तं वै रुचिरदन्तोष्ठं रूप्यधातुतनूरुहम् ॥ ३३ ॥

विस्मयोत्फुल्लनयना सस्नेहं समुदैक्षत । उसके दाँत और ओठ बड़े सुन्दर थे तथा शरीरके रोएँ चाँदी एवं ताँबे आदि धातुओंके बने हुए जान पड़ते थे । उसके ऊपर दृष्टि पड़ते ही सीताजीकी आँखें आश्चर्यसे खिल उठीं और वे बड़े स्नेहसे उसकी ओर निहारने लगीं ॥ ३३३ ॥

स च तां रामदयितां पश्यन् मायामयो मृगः ॥ ३४ ॥

विचचार ततस्तत्र दीपयन्निव तद् वनम् । वह मायामय मृग भी श्रीरामकी प्राणवल्लभा सीताको देखता और उस वनको प्रकाशित - सा करता हुआ वहीं विचरने लगा ॥ ३४३ ॥

अदृष्टपूर्वं दृष्ट्वा तं नानारत्नमयं मृगम् ।

विस्मयं परमं सीता जगाम जनकात्मजा ॥ ३५ ॥

सीताने वैसा मृग पहले कभी नहीं देखा था । वह नाना प्रकारके रत्नोंका ही बना जान पड़ता था । उसे देखकर जनककिशोरी सीताको बड़ा विस्मय हुआ ॥ ३५ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे द्विचत्वारिंशः सर्गः ॥ ४२ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें बयालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ४२ ॥

त्रिचत्वारिंशः सर्गः कपटमृगको देखकर लक्ष्मणका संदेह, सीताका उस मृगको जीवित या मृत अवस्थामें भी ले आनेके लिये श्रीरामको प्रेरित करना तथा श्रीरामका लक्ष्मणको समझा - बुझाकर सीताकी रक्षाका भार सौंपकर

सा तं सम्प्रेक्ष्य सुश्रोणी कुसुमानि विचिन्वती ।

हेमराजतवर्णाभ्यां पाश्र्वाभ्यामुपशोभितम् ॥ १ ॥

प्रहृष्टा चानवद्याङ्गी मृष्टहाटकवर्णिनी ।

भर्तारमपि चक्रन्द लक्ष्मणं चैव सायुधम् ॥ २ ॥

वह मृग सोने और चाँदीके समान कान्तिवाले पार्श्व - भागोंसे सुशोभित था । शुद्ध सुवर्णके समान कान्ति तथा निर्दोष अङ्गवाली सुन्दरी सीता फूल चुनते - चुनते ही उस मृगको देखकर मन - ही - मन बहुत प्रसन्न हुईं और अपने पति श्रीराम तथा देवर लक्ष्मणको उस मृगको मारनेके लिये जाना । हथियार लेकर आनेके लिये पुकारने लगीं ॥ १-२ ॥

आहूयाहूय च पुनस्तं मृगं साधु वीक्षते ।

आगच्छागच्छ शीघ्रं वै आर्यपुत्र सहानुज ॥ ३ ॥

वे बार - बार उन्हें पुकारतीं और फिर उस मृगको अच्छी तरह देखने लगती थीं । वे बोलीं, ' आर्यपुत्र! अपने भाईके साथ आइये, शीघ्र आइये ' ॥ ३ ॥

तावाहूतौ नरव्याघ्रौ वैदेह्या रामलक्ष्मणौ ।

वीक्षमाणौ तु तं देशं तदा ददृशतुर्मृगम् ॥४ ॥

विदेहकुमारी सीताके द्वारा पुकारे जानेपर नरश्रेष्ठ

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अरण्यकाण्डे त्रिचत्वारिंशः सर्गः ६५३ श्रीराम और लक्ष्मण वहाँ आये और उस स्थानपर सब ओर दृष्टि डालते हुए उन्होंने उस समय उस मृगको देखा ॥ ४ ॥

शङ्कमानस्तु तं दृष्ट्वा लक्ष्मणो वाक्यमब्रवीत् ।

तमेवैनमहं मन्ये मारीचं राक्षसं मृगम् ॥ ५ ॥

उसे देखकर लक्ष्मणके मनमें संदेह हुआ और वे बोले- ' भैया! मैं तो समझता हूँ कि इस मृगके रूपमें वह मारीच नामका राक्षस ही आया है ॥ ५ ॥

चरन्तो मृगयां हृष्टाः पापेनोपाधिना वने ।

अनेन निहता राम राजानः कामरूपिणा ॥ ६ ॥

' श्रीराम! स्वेच्छानुसार रूप धारण करनेवाले इस पापीने कपट - वेष बनाकर वनमें शिकार खेलनेके लिये आये हुए कितने ही हर्षोत्फुल्ल नरेशोंका वध किया है ॥

अस्य मायाविदो माया मृगरूपमिदं कृतम् ।

भानुमत् पुरुषव्याघ्र गन्धर्वपुरसंनिभम् ॥ ७ ॥

' पुरुषसिंह! यह अनेक प्रकारकी मायाएँ जानता है । इसकी जो माया सुनी गयी है, वही इस प्रकाशमान मृगरूपमें परिणत हो गयी है । यह गन्धर्व - नगरके समान देखनेभरके लिये ही है ( इसमें वास्तविकता नहीं है ) ।

मृगो ह्येवंविधो रत्नविचित्रो नास्ति राघव ।

जगत्यां जगतीनाथ मायैषा हि न संशयः ॥ ८ ॥

' रघुनन्दन! पृथ्वीनाथ! इस भूतलपर कहीं भी ऐसा विचित्र रत्नमय मृग नहीं है; अतः निःसंदेह यह माया ही है ' ॥ ८ ॥

एवं ब्रुवाणं काकुत्स्थं प्रतिवार्य शुचिस्मिता ।

उवाच सीता संहृष्टा छद्मना हृतचेतना ॥ ९ ॥

मारीचके छलसे जिनकी विचारशक्ति हर ली गयी थी, उन पवित्र मुसकानवाली सीताने उपर्युक्त बातें कहते हुए लक्ष्मणको रोककर स्वयं ही बड़े हर्षके साथ कहा-आर्यपुत्राभिरामोऽसौ मृगो हरति मे मनः । आनयैनं महाबाहो क्रीडार्थं नो भविष्यति ॥ १० ॥

' आर्यपुत्र! यह मृग बड़ा ही सुन्दर है । इसने मेरे मनको हर लिया है । महाबाहो! इसे ले आइये । यह हमलोगोंके मन- बहलावके लिये रहेगा ॥ १० ॥

इहाश्रमपदेऽस्माकं बहवः पुण्यदर्शनाः ।

मृगाश्चरन्ति सहिताश्चमराः सृमरास्तथा ॥ ११ ॥

ऋक्षाः पृषतसङ्घाश्च वानराः किन्नरास्तथा ।

विहरन्ति महाबाहो रूपश्रेष्ठा महाबलाः ॥ १२ ॥

न चान्यः सदृशो राजन् दृष्टः पूर्वं मृगो मया ।

तेजसा क्षमया दीप्त्या यथायं मृगसत्तमः ॥ १३ ॥

' राजन्! महाबाहो! यद्यपि हमारे इस आश्रमपर बहुत - से पवित्र एवं दर्शनीय मृग एक साथ आकर चरते हैं तथा सृमर ( काली पूँछवाली चवँरी गाय ), चमर ( सफेद पूँछवाली चवँरी गाय ), रीछ, चितकबरे मृगोंके झुंड, वानर तथा सुन्दर रूपवाले महाबली किन्नर भी विचरण करते हैं, तथापि आजके पहले मैंने दूसरा कोई ऐसा तेजस्वी, सौम्य और दीतिमान् मृग नहीं देखा था, जैसा कि यह श्रेष्ठ मृग दिखायी दे रहा है ॥ ११-१३ ॥

नानावर्णविचित्राङ्गो रत्नभूतो ममाग्रतः ।

द्योतयन् वनमव्यग्रं शोभते शशिसंनिभः ॥ १४ ॥

' नाना प्रकारके रंगोंसे युक्त होनेके कारण इसके अङ्ग विचित्र जान पड़ते हैं । ऐसा प्रतीत होता है मानो यह अङ्गोंका ही बना हुआ हो । मेरे आगे निर्भय एवं शान्तभावसे स्थित होकर इस वनको प्रकाशित करता हुआ यह चन्द्रमाके समान शोभा पा रहा है ॥ १४ ॥

अहो रूपमहो लक्ष्मीः स्वरसम्पच्च शोभना ।

मृगोऽद्भुतो विचित्राङ्गो हृदयं हरतीव मे ॥ १५ ॥

' इसका रूप अद्भुत है । इसकी शोभा अवर्णनीय है । इसकी स्वरसम्पत्ति ( बोली ) बड़ी सुन्दर है । विचित्र अङ्गोंसे सुशोभित यह अद्भुत मृग मेरे मनको मोहे लेता है ॥ १५ ॥

यदि ग्रहणमभ्येति जीवन्नेव मृगस्तव ।

आश्चर्यभूतं भवति विस्मयं जनयिष्यति ॥ १६ ॥

' यदि यह मृग जीते - जी ही आपकी पकड़में आ जाय तो एक आश्चर्यकी वस्तु होगा और सबके हृदयमें विस्मय उत्पन्न कर देगा ॥ १६ ॥

समाप्तवनवासानां राज्यस्थानां च नः पुनः ।

अन्तःपुरे विभूषार्थो मृग एष भविष्यति ॥ १७ ॥

' जब हमारे वनवासकी अवधि पूरी हो जायगी और हम पुनः अपना राज्य पा लेंगे, उस समय यह मृग हमारे अन्तःपुरकी शोभा बढ़ायेगा ॥ १७ ॥

भरतस्यार्यपुत्रस्य श्वश्रूणां मम च प्रभो ।

मृगरूपमिदं दिव्यं विस्मयं जनयिष्यति ॥ १८ ॥

' प्रभो! इस मृगका यह दिव्य रूप भरतके, आपके, मेरी सासुओंके और मेरे लिये भी विस्मयजनक होगा ।

जीवन्न यदि तेऽभ्येति ग्रहणं मृगसत्तमः ।

अजिनं नरशार्दूल रुचिरं तु भविष्यति ॥ १ ९ ॥

' पुरुषसिंह! यदि कदाचित् यह श्रेष्ठ मृग जीते - जी पकड़ा न जा सके तो इसका चमड़ा ही बहुत | सुन्दर होगा ॥ १ ९ ॥

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६५४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे

निहतस्यास्य सत्त्वस्य जाम्बूनदमयत्वचि ।

शष्पबृस्यां विनीतायामिच्छाम्यहमुपासितुम् ॥ २० ॥

' घास - फूसकी बनी हुई चटाईपर इस मरे हुए मृगका सुवर्णमय चमड़ा बिछाकर मैं इसपर आपके साथ बैठना चाहती हूँ ॥ २० ॥

कामवृत्तमिदं रौद्रं स्त्रीणामसदृशं मतम् ।

वपुषा त्वस्य सत्त्वस्य विस्मयो जनितो मम ॥ २१ ॥

' यद्यपि स्वेच्छासे प्रेरित होकर अपने पतिको ऐसे काममें लगाना यह भयंकर स्वेच्छाचार है और साध्वी स्त्रियोंके लिये उचित नहीं माना गया है तथापि इस जन्तुके शरीरने मेरे हृदयमें विस्मय उत्पन्न कर दिया है ( इसीलिये मेँ इसको पकड़ लानेके लिये अनुरोध करती हूँ ) ' ॥ २१ ॥

तेन काञ्चनरोम्णा तु मणिप्रवरशृङ्गिणा ।

तरुणादित्यवर्णेन नक्षत्रपथवर्चसा ॥२२ ॥

बभूव राघवस्यापि मनो विस्मयमागतम् ।

इति सीतावचः श्रुत्वा दृष्ट्वा च मृगमद्भुतम् ॥ २३ ॥

लोभितस्तेन रूपेण सीतया च प्रचोदितः ।

उवाच राघवो हृष्टो भ्रातरं लक्ष्मणं वचः ॥ २४ ॥

सुनहरी रोमावली, इन्द्रनील मणिके समान सींग, उदयकालके सूर्यकी - सी कान्ति तथा नक्षत्रलोककी भाँति विन्दुयुक्त तेजसे सुशोभित उस मृगको देखकर श्रीरामचन्द्रजीका मन भी विस्मित हो उठा । सीताकी पूर्वोक्त बातको सुनकर, उस मृगके अद्भुत रूपको देखकर, उसके उस रूपपर लुभाकर और सीतासे प्रेरित होकर हर्षसे भरे हुए श्रीरामने अपने भाई लक्ष्मणसे कहा— ॥ २२–२४ ॥

पश्य लक्ष्मण वैदेह्याः स्पृहामुल्लसितामिमाम् ।

रूपश्रेष्ठतया ह्येष मृगोऽद्य न भविष्यति ॥ २५ ॥

' लक्ष्मण! देखो तो सही, विदेहनन्दिनी सीताके मनमें इस मृगको पानेके लिये कितनी प्रबल इच्छा जाग उठी है? वास्तवमें इसका रूप है भी बहुत ही सुन्दर । अपने रूपकी इस श्रेष्ठताके कारण ही यह मृग आज जीवित नहीं रह सकेगा ॥ २५ ॥

न वने नन्दनोद्देशे न चैत्ररथसंश्रये ।

कुतः पृथिव्यां सौमित्रेयोऽस्य कश्चित् समो मृगः ॥ २६ ॥

‘ सुमित्रानन्दन! देवराज इन्द्रके नन्दनवनमें और कुबेरके चैत्ररथवनमें भी कोई ऐसा मृग नहीं होगा, जो इसकी समानता कर सके । फिर पृथ्वीपर तो हो ही कहाँसे सकता है ॥ २६ ॥

प्रतिलोमानुलोमाश्च रुचिरा रोमराजयः ।

शोभन्ते मृगमाश्रित्य चित्राः कनकबिन्दुभिः ॥ २७ ॥

‘ टेढ़ी और सीधी रुचिर रोमावलियाँ इस मृगके शरीरका आश्रय ले सुनहरे विन्दुओंसे चित्रित हो बड़ी शोभा पा रही हैं ॥ २७ ॥

पश्यास्य जृम्भमाणस्य दीप्तामग्निशिखोपमाम् ।

जिह्वां मुखान्निः सरन्तीं मेघादिव शतह्रदाम् ॥ २८ ॥

' देखो न, जब यह जँभाई लेता है, तब इसके मुखसे प्रज्वलित अग्निशिखाके समान दमकती हुई जा बाहर निकल आती है और मेघसे प्रकट हुई बिजली के समान चमकने लगती है ॥ २८ ॥

मसारगल्वर्कमुखः शङ्खमुक्तानिभोदरः ।

कस्य नामानिरूप्योऽसौ न मनो लोभयेन्मृगः ॥ २ ९ ॥

' इसका मुख- सम्पुट इन्द्रनीलमणिके बने हुए चषक ( पानपात्र ) के समान जान पड़ता है, उदर शङ्ख और मोतीके समान सफेद है । यह अवर्णनीय मृग किसके मनको नहीं लुभा लेगा ॥ २ ९ ॥

कस्य रूपमिदं दृष्ट्वा जाम्बूनदमयप्रभम् ।

नानारत्नमयं दिव्यं न मनो विस्मयं व्रजेत् ॥ ३० ॥

' नाना प्रकारके रत्नोंसे विभूषित इसके सुनहरी प्रभावाले दिव्य रूपको देखकर किसके मनमें विस्मय नहीं होगा ॥

मांसहेतोरपि मृगान् विहारार्थं च धन्विनः ।

घ्नन्ति लक्ष्मण राजानो मृगयायां महावने ॥ ३१ ॥

' लक्ष्मण! राजालोग बड़े - बड़े वनोंमें मृगया खेलते समय मांस ( मृगचर्म ) के लिये और शिकार खेलनेका शौक पूरा करनेके लिये भी धनुष हाथमें लेकर मृगोंको मारते हैं ॥३१ ॥

धनानि व्यवसायेन विचीयन्ते महावने ।

धातवो विविधाश्चापि मणिरत्नसुवर्णिनः ॥ ३२ ॥

' मृगयाके उद्योगसे ही राजालोग विशाल वनमें धनका भी संग्रह करते हैं; क्योंकि वहाँ मणि, रत्न और सुवर्ण आदिसे युक्त नाना प्रकारकी धातुएँ उपलब्ध होती हैं ॥ ३२ ॥

तत् सारमखिलं नृणां धनं निचयवर्धनम् ।

मनसा चिन्तितं सर्वं यथा शुक्रस्य लक्ष्मण ॥ ३३ ॥

' लक्ष्मण! कोशकी वृद्धि करनेवाला वह वन्य धन मनुष्योंके लिये अत्यन्त उत्कृष्ट होता है । ठीक उसी तरह, जैसे ब्रह्मभावको प्राप्त हुए पुरुषके लिये मनके चिन्तनमात्रसे प्राप्त हुई सारी वस्तुएँ अत्यन्त उत्तम बतायी गयी हैं ॥ ३३ ॥

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अरण्यकाण्डे त्रिचत्वारिंशः सर्गः ६५५

अर्थी येनार्थकृत्येन संव्रजत्यविचारयन् ।

तमर्थमर्थशास्त्रज्ञाः प्राहुरर्थ्याः सुलक्ष्मण ॥ ३४ ॥

' लक्ष्मण! अर्थी मनुष्य जिस अर्थ ( प्रयोजन ) का सम्पादन करनेके लिये उसके प्रति आकृष्ट हो बिना विचारे ही चल देता है, उस अत्यन्त आवश्यक प्रयोजनको ही अर्थसाधनमें चतुर एवं अर्थशास्त्रके ज्ञाता विद्वान् ' अर्थ ' कहते हैं ॥ ३४ ॥

एतस्य मृगरत्नस्य परायें काञ्चनत्वचि ।

उपवेक्ष्यति वैदेही मया सह सुमध्यमा ॥ ३५ ॥

' इस रत्नस्वरूप श्रेष्ठ मृगके बहुमूल्य सुनहरे चमड़ेपर सुन्दरी विदेहराजनन्दिनी सीता मेरे साथ बैठेगी ॥ ३५ ॥

न कादली न प्रियकी न प्रवेणी न चाविकी ।

भवेदेतस्य सदृशी स्पर्शेऽनेनेति मे मतिः ॥ ३६ ॥

' कदली ( कोमल ऊँचे चितकबरे और नीलाग्ररोमवाले मृगविशेष ), प्रियक ( कोमल ऊँचे चिकने और घने रोमवाले मृगविशेष ), प्रवेण ( विशेष प्रकारके बकरे ) और अवि ( भेड़ ) की त्वचा भी स्पर्श करनेमें इस काञ्चन मृगके छालेके समान कोमल एवं सुखद नहीं हो सकती, ऐसा मेरा विश्वास है ॥ ३६ ॥

एष चैव मृगः श्रीमान् यश्च दिव्यो नभश्चरः ।

उभावेतौ मृगौ दिव्यौ तारामृगमहीमृगौ ॥ ३७ ॥

' यह सुन्दर मृग और वह जो दिव्य आकाशचारी

मृग ( मृगशिरा नक्षत्र ) है, ये दोनों ही दिव्य मृग हैं ।

इनमेंसे एक तारामृग ' और दूसरा महीमृग ' है ॥ ३७ ॥

यदि वायं तथा यन्मां भवेद् वदसि लक्ष्मण ।

मायैषा राक्षसस्येति कर्तव्योऽस्य वधो मया ॥ ३८ ॥

' लक्ष्मण! तुम मुझसे जैसा कह रहे हो यदि वैसा ही यह मृग हो, यदि यह राक्षसकी माया ही हो तो भी मुझे उसका वध करना ही चाहिये ॥ ३८ ॥

एतेन हि नृशंसेन मारीचेनाकृतात्मना ।

वने विचरता पूर्वं हिंसिता मुनिपुंगवाः ॥ ३ ९ ॥

' क्योंकि अपवित्र ( दुष्ट ) चित्तवाले इस क्रूरकर्मा मारीचने वनमें विचरते समय पहले अनेकानेक श्रेष्ठ मुनियोंकी हत्या की है ॥ ३ ९ ॥

उत्थाय बहवोऽनेन मृगयायां जनाधिपाः ।

निहताः परमेष्वासास्तस्माद् वध्यस्त्वयं मृगः ॥ ४० ॥

' इसने मृगयाके समय प्रकट होकर बहुत - से १. नक्षत्रलोकमें विचरनेवाला मृग ( मृगशिरा नक्षत्र ) महाधनुर्धर नरेशोंका वध किया है, अतः इस मृगके रूपमें इसका भी वध अवश्य करनेयोग्य है ॥४० ॥

पुरस्तादिह वातापिः परिभूय तपस्विनः ।

उदरस्थो द्विजान् हन्ति स्वगर्भोऽश्वतरीमिव ॥ ४१ ॥

' इसी वनमें पहले वातापि नामक राक्षस रहता था, जो तपस्वी महात्माओंका तिरस्कार करके कपटपूर्ण उपायसे उनके पेटमें पहुँच जाता और जैसे खच्चरीको अपने ही गर्भका बच्चा नष्ट कर देता है, उसी प्रकार उन ब्रह्मर्षियोंको नष्ट कर देता था ॥ ४१ ॥

स कदाचिच्चिराल्लोभादाससाद महामुनिम् ।

अगस्त्यं तेजसा युक्तं भक्ष्यस्तस्य बभूव ह ॥ ४२ ॥

' वह वातापि एक दिन दीर्घकालके पश्चात् लोभवश तेजस्वी महामुनि अगस्त्यजीके पास जा पहुँचा और ( श्राद्धकालमें ) उनका आहार बन गया । उनके पेटमें पहुँच गया ॥ ४२ ॥

समुत्थाने च तद्रूपं कर्तुकामं समीक्ष्य तम् ।

उत्स्मयित्वा तु भगवान् वातापिमिदमब्रवीत् ॥ ४३ ॥

' श्राद्धके अन्तमें जब वह अपना राक्षसरूप प्रकट करनेकी इच्छा करने लगा -उनका पेट फाड़कर निकल आनेको उद्यत हुआ, तब उस वातापिको लक्ष्य करके भगवान् अगस्त्य मुसकराये और उससे इस प्रकार बोले - ॥ ४३ ॥

त्वयाविगण्य वातापे परिभूताश्च तेजसा ।

जीवलोके द्विजश्रेष्ठास्तस्मादसि जरां गतः ॥४४ ॥

' वातापे! तुमने बिना सोचे - विचारे इस जीव-जगत् में बहुत - से श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको अपने तेजसे तिरस्कृत किया है, उसी पापसे अब तुम पच गये ' ॥ ४४ ॥

तद् रक्षो न भवेदेव वातापिरिव लक्ष्मण ।

मद्विधं योऽतिमन्येत धर्मनित्यं जितेन्द्रियम् ॥ ४५ ॥

' लक्ष्मण! जो सदा धर्ममें तत्पर रहनेवाले मुझ जैसे जितेन्द्रिय पुरुषका भी अतिक्रमण करे, उस मारीच नामक राक्षसको भी वातापिके समान ही नष्ट हो जाना चाहिये ॥ ४५ ॥

भवेद्धतोऽयं वातापिरगस्त्येनेव मा गतः ।

इह त्वं भव संनद्धो यन्त्रितो रक्ष मैथिलीम् ॥ ४६ ॥

' जैसे वातापि अगस्त्यके द्वारा नष्ट हुआ, उसी प्रकार यह मारीच अब मेरे सामने आकर अवश्य ही । मारा जायगा । तुम अस्त्र और कवच आदिसे सुसज्जित । २. दूसरा पृथ्वीपर विचरनेवाला काञ्चन मृग ।

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६५६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे हो जाओ और यहाँ सावधानीके साथ मिथिलेशकुमारीक रक्षा करो ॥ ४६ ॥

अस्यामायत्तमस्माकं यत् कृत्यं रघुनन्दन ।

अहमेनं वधिष्यामि ग्रहीष्याम्यथवा मृगम् ॥४७ ॥

‘ रघुनन्दन! हमलोगोंका जो आवश्यक कर्तव्य है, वह सीताकी रक्षाके ही अधीन है । मैं इस मृगको मार डालूँगा अथवा इसे जीता ही पकड़ लाऊँगा ॥ ४७ ॥

यावद् गच्छामि सौमित्रे मृगमानयितुं द्रुतम् ।

पश्य लक्ष्मण वैदेह्या मृगत्वचि गतां स्पृहाम् ॥ ४८ ॥

' सुमित्राकुमार लक्ष्मण! देखो, इस मृगका चर्म हस्तगत करनेके लिये विदेहनन्दिनीको कितनी उत्कण्ठा हो रही है, इसलिये इस मृगको ले आनेके लिये मैं तुरंत ही जा रहा हूँ ॥ ४८ ॥

त्वचा प्रधानया ह्येष मृगोऽद्य न भविष्यति ।

अप्रमत्तेन ते भाव्यमाश्रमस्थेन सीतया ॥ ४ ९ ॥

यावत् पृषतमेकेन सायकेन निहन्म्यहम् ।

हत्वैतच्चर्म चादाय शीघ्रमेष्यामि लक्ष्मण ॥ ५० ॥

' इस मृगको मारनेका प्रधान हेतु है, इसके चमड़ेको प्राप्त करना । आज इसीके कारण यह मृग जीवित नहीं रह सकेगा । लक्ष्मण! तुम आश्रमपर रहकर सीताके साथ सावधान रहना - सावधानी साथ तबतक इसकी रक्षा करना, जबतक कि मैं एक ही बाणसे इस चितकबरे मृगको मार नहीं डालता हूँ । मारनेके पश्चात् इसका चमड़ा लेकर मैं शीघ्र लौट आऊँगा ॥ ४ ९ -५० ॥ प्रदक्षिणेनातिबलेन पक्षिण जटायुषा बुद्धिमता च लक्ष्मण । भवाप्रमत्तः प्रतिगृह्य मैथिल प्रतिक्षणं सर्वत एव शङ्कितः ॥ ५१ ॥

' लक्ष्मण! बुद्धिमान् पक्षी गृध्रराज जटायु बड़े ही बलवान् और सामर्थ्यशाली हैं । उनके साथ ही यहाँ सदा सावधान रहना । मिथिलेशकुमारी सीताको अपने संरक्षणमें लेकर प्रतिक्षण सब दिशाओंमें रहनेवाले राक्षसोंकी । ओरसे चौकन्ने रहना ' ॥५१ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे त्रिचत्वारिंशः सर्गः ॥ ४३ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें तैंतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ४३ ॥

चतुश्चत्वारिंशः सर्गः श्रीरामके द्वारा मारीचका वध लक्ष्मणके पुकारनेका शब्द

तथा तु तं समादिश्य भ्रातरं रघुनन्दनः ।

बबन्धासिं महा जाम्बूनदमयत्सरुम् ॥ १ ॥

लक्ष्मणको इस प्रकार आदेश देकर रघुकुलका आनन्द बढ़ानेवाले महातेजस्वी श्रीरामचन्द्रजीने सोनेकी मूँठवाली तलवार कमरमें बाँध ली ॥१ ॥

ततस्त्रिविनतं चापमादायात्मविभूषणम् ।

आबध्य च कपालौ द्वौ जगामोदग्रविक्रमः ॥ २ ॥

तत्पश्चात् महापराक्रमी रघुनाथजी तीन स्थानोंमें झुके हुए अपने आभूषणरूप धनुषको हाथमें ले पीठपर दो तरकस बाँधकर वहाँसे चल दिये ॥ २ ॥

तं वन्यराजो राजेन्द्रमापतन्तं निरीक्ष्य वै ।

बभूवान्तर्हितस्त्रासात् पुनः संदर्शनेऽभवत् ॥ ३ ॥

राजाधिराज श्रीरामको आते देख वह वन्य मृगोंका राजा काञ्चनमृग भयके मारे छिप गया, किंतु फिर तुरंत ही उनके दृष्टिपथमें आ गया ॥ ३ ॥

और उसके द्वारा सीता और सुनकर श्रीरामकी चिन्ता बद्धासिर्धनुरादाय प्रदुद्राव यतो मृगः ।तं स्म पश्यति रूपेण द्योतयन्तमिवाग्रतः ॥ ४ ॥

अवेक्ष्यावेक्ष्य धावन्तं धनुष्पाणिर्महावने ।

अतिवृत्तमिवोत्पाताल्लोभयानं कदाचन ॥ ५ ॥

शङ्कितं तु समुद्भ्रान्तमुत्पतन्तमिवाम्बरम् ।

दृश्यमानमदृश्यं च वनोद्देशेषु केषुचित् ॥ ६ ॥

छिन्नाभैरिव संवीतं शारदं चन्द्रमण्डलम् ।

मुहूर्तादेव ददृशे मुहुर्दूरात् प्रकाशते ॥ ७ ॥

तब तलवार बाँधे और धनुष लिये श्रीराम जिस ओर वह मृग था, उसी ओर दौड़े । धनुर्धर श्रीरामने देखा, वह अपने रूपसे सामनेकी दिशाको प्रकाशित-सी कर रहा था । उस महान् वनमें वह पीछेकी ओर देख - देखकर आगेकी ओर भाग रहा था । कभी छलाँगें मारकर बहुत दूर निकल जाता और कभी इतना निकट दिखायी देता कि हाथसे पकड़ लेनेका लोभ पैदा कर

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अरण्यकाण्डे चतुश्चत्वारिंशः सर्गः ६५७ देता था । कभी डरा हुआ, कभी घबराया हुआ और । कभी आकाशमें उछलता हुआ दीख पड़ता था । कभी वनके किन्हीं स्थानोंमें छिपकर अदृश्य हो जाता था, मानो शरद् - ऋतुका चन्द्रमण्डल मेघखण्डोंसे आवृत हो गया हो । एक ही मुहूर्तमें वह निकट दिखायी देता और पुनः बहुत दूरके स्थानमें चमक उठता था ॥ ४-७ ॥

दर्शनादर्शनेनैव सोऽपकर्षत राघवम् ।

स दूरमाश्रमस्यास्य मारीचो मृगतां गतः ॥ ८ ॥

इस तरह प्रकट होता और छिपता हुआ वह मृगरूपधारी मारीच श्रीरघुनाथजीको उनके आश्रमसे बहुत दूर खींच ले गया ॥ ८ ॥

आसीत् क्रुद्धस्तु काकुत्स्थो विवशस्तेन मोहितः ।

अथावतस्थे सुश्रान्तश्छायामाश्रित्य शाद्वले ॥ ९ ॥

उस समय उससे मोहित और विवश होकर श्रीराम कुछ कुपित हो उठे और थककर एक जगह छायाका आश्रय ले हरी - हरी घासवाली भूमिपर खड़े हो गये॥९॥

स तमुन्मादयामास मृगरूपो निशाचरः ।

मृगैः परिवृतोऽथान्यैरदूरात् प्रत्यदृश्यत ॥ १० ॥

इस मृगरूपधारी निशाचरने उन्हें उन्मत्त - सा कर दिया था । थोड़ी ही देरमें वह दूसरे मृगोंसे घिरा हुआ पास ही दिखायी दिया ॥ १० ॥

ग्रहीतुकामं दृष्ट्वा तं पुनरेवाभ्यधावत ।

तत्क्षणादेव संत्रासात् पुनरन्तर्हितोऽभवत् ॥ ११ ॥

श्रीराम मुझे पकड़ना चाहते हैं, यह देखकर वह फिर भागा और भयके मारे पुनः तत्काल ही अदृश्य हो गया ॥ ११ ॥

पुनरेव ततो दूराद् वृक्षखण्डाद् विनिःसृतः ।

दृष्ट्वा रामो महातेजास्तं हन्तुं कृतनिश्चयः ॥ १२ ॥

तदनन्तर वह पुनः दूरवर्ती वृक्ष - समूहसे होकर निकला । उसे देखकर महातेजस्वी श्रीरामने मार डालनेका निश्चय किया ॥ १२ ॥

भूयस्तु शरमुद्धृत्य कुपितस्तत्र राघवः ।

सूर्यरश्मिप्रतीकाशं ज्वलन्तमरिमर्दनम् ॥ १३ ॥

संधाय सुदृढे चापे विकृष्य बलवद्बली ।

तमेव मृगमुद्दिश्य श्वसन्तमिव पन्नगम् ॥ १४ ॥

मुमोच ज्वलितं दीप्तमस्त्रं ब्रह्मविनिर्मितम् । तब वहाँ क्रोधमें भरे हुए बलवान् राघवेन्द्र श्रीरामने तरकससे सूर्यकी किरणोंके समान तेजस्वी एक प्रज्वलित एवं शत्रु - संहारक बाण निकालकर उसे अपने सुदृढ धनुषपर रखा और उस धनुषको जोरसे खींचकर उस मृगको ही लक्ष्य करके फुफकारते सर्पके समान सनसनाता हुआ वह प्रज्वलित एवं तेजस्वी बाण, जिसे ब्रह्माजीने बनाया था, छोड़ दिया ॥ १३-१४३ ॥ शरीरं मृगरूपस्य विनिर्भिद्य शरोत्तमः ॥ १५ ॥

मारीचस्यैव हृदयं बिभेदाशनिसंनिभः । वज्रके समान तेजस्वी उस उत्तम बाणने मृगरूपधारी मारीचके शरीरको चीरकर उसके हृदयको भी विदीर्ण कर दिया ॥ १५३ ॥

तालमात्रमथोत्प्लुत्य न्यपतत् स भृशातुरः ॥ १६ ॥

व्यनदद् भैरवं नादं धरण्यामल्पजीवितः । ' उसकी चोटसे अत्यन्त आतुर हो वह राक्षस ताड़के बराबर उछलकर पृथ्वीपर गिर पड़ा । उसका जीवन समाप्त हो चला । वह पृथ्वीपर पड़ा - पड़ा भयंकर गर्जना करने लगा ॥ १६३ ॥

म्रियमाणस्तु मारीचो जहौ तां कृत्रिमां तनुम् ॥ १७ ॥

स्मृत्वा तद्वचनं रक्षो दध्यौ केन तु लक्ष्मणम् ।

इह प्रस्थापयेत् सीता तां शून्ये रावणो हरेत् ॥ १८ ॥

मरते समय मारीचने अपने उस कृत्रिम शरीरको त्याग दिया । फिर रावणके वचनका स्मरण करके उस राक्षसने सोचा, किस उपायसे सीता लक्ष्मणको यहाँ भेज दे और सूने आश्रमसे रावण उसे हर ले जाय ॥

स प्राप्तकालमाज्ञाय चकार च ततः स्वनम् ।

सदृशं राघवस्येव हा सीते लक्ष्मणेति च ॥१ ९ ॥

रावणके बताये हुए उपायको काममें लानेका अवसर आ गया है— यह समझकर उसने श्रीरामचन्द्रजीके ही समान स्वरमें ' हा सीते! हा लक्ष्मण! ' कहकर पुकारा ॥

तेन मर्मणि निर्विद्धं शरेणानुपमेन हि ।

मृगरूपं तु तत् त्यक्त्वा राक्षसं रूपमास्थितः ॥ २० ॥

श्रीरामके अनुपम बाणसे उसका मर्म विदीर्ण हो गया था, अतः उस मृगरूपको त्यागकर उसने राक्षसरूप धारण कर लिया ॥ २० ॥

चक्रे स सुमहाकायं मारीचो जीवितं त्यजन् ।

तं दृष्ट्वा पतितं भूमौ राक्षसं भीमदर्शनम् ॥ २१ ॥

रामो रुधिरसिक्ताङ्गं चेष्टमानं महीतले ।

जगाम मनसा सीतां लक्ष्मणस्य वचः स्मरन् ॥२२ ॥

प्राणत्याग करते समय मारीचने अपने शरीरको बहुत बड़ा बना लिया था । भयंकर दिखायी देनेवाले उस राक्षसको भूमिपर पड़कर खूनसे लथपथ हो | धरतीपर लोटते और छटपटाते देख श्रीरामको लक्ष्मणकी

पृष्ठ 670

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६५८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे

कही हुई बात याद आ गयी और वे मन - ही - मन ।

सीताकी चिन्ता करने लगे ॥ २१-२२ ॥

मारीचस्य तु मायैषा पूर्वोक्तं लक्ष्मणेन तु ।

तत् तथा ह्यभवच्चाद्य मारीचोऽयं मया हतः ॥ २३ ॥

वे सोचने लगे, ' अहो! जैसा लक्ष्मणने पहले कहा था, उसके अनुसार यह वास्तवमें मारीचकी माया ही थी । लक्ष्मणकी बात ठीक निकली । आज मेरे द्वारा यह मारीच ही मारा गया ॥ २३ ॥

हा सीते लक्ष्मणेत्येवमाक्रुश्य तु महास्वनम् ।

ममार राक्षसः सोऽयं श्रुत्वा सीता कथं भवेत् ॥ २४ ॥

लक्ष्मणश्च महाबाहुः कामवस्थां गमिष्यति । ' परंतु यह राक्षस उच्च स्वरसे ' हा सीते! हा लक्ष्मण! ' की पुकार करके मरा है । उसके उस शब्दको

सुनकर सीताकी कैसी अवस्था हो जायगी और महाबाहु ।

लक्ष्मणकी भी क्या दशा होगी? ' ॥ २४३ ॥

इति संचिन्त्य धर्मात्मा राम्रो हृष्टतनूरुहः ॥ २५ ॥

तत्र रामं भयं तीव्रमाविवेश विषादजम् ।

राक्षसं मृगरूपं तं हत्वा श्रुत्वा च तत्स्वनम् ॥ २६ ॥

ऐसा सोचकर धर्मात्मा श्रीरामके रोंगटे खड़े हो गये । उस समय वहाँ मृगरूपधारी उस राक्षसको मारकर और उसके उस शब्दको सुनकर श्रीरामके मन में विषादजनित तीव्र भय समा गया ॥ २५-२६ ॥

निहत्य पृषतं चान्यं मांसमादाय राघवः ।

त्वरमाणो जनस्थानं ससाराभिमुखं तदा ॥ २७ ॥

उस लोकविलक्षण मृगका वध करके तपस्वीके उपभोगमें आनेयोग्य फल- मूल आदि लेकर श्रीराम तत्काल ही जनस्थानके निकटवर्ती पञ्चवटीमें स्थित अपने आश्रमकी ओर बड़ी उतावलीके साथ चले ॥ २७ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे चतुश्चत्वारिंशः सर्गः ॥ ४४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें चौवालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ४४ ॥

पञ्चचत्वारिंशः सर्गः सीताके मार्मिक वचनोंसे प्रेरित होकर लक्ष्मणका श्रीरामके पास जाना

आर्तस्वरं तु तं भर्तुर्विज्ञाय सदृशं वने ।

उवाच लक्ष्मणं सीता गच्छ जानीहि राघवम् ॥ १ ॥

उस समय वनमें जो आर्तनाद हुआ, उसे अपने पतिके स्वरसे मिलता - जुलता जान श्रीसीताजी लक्ष्मणसे बोलीं – ' भैया! जाओ, श्रीरघुनाथजीकी सुधि लो-उनका समाचार जानो ॥ १ ॥

नहि मे जीवितं स्थाने हृदयं वावतिष्ठते ।

क्रोशतः परमार्तस्य श्रुतः शब्दो मया भृशम् ॥ २ ॥

‘ उन्होंने बड़े आर्तस्वरसे हमलोगोंको पुकारा है । मैंने उनका वह शब्द सुना है । वह बहुत उच्च स्वरसे बोला गया था । उसे सुनकर मेरे प्राण और मन अपने स्थानपर नहीं रह गये हैं- मैं घबरा उठी हूँ ॥ २ ॥

आक्रन्दमानं तु वने भ्रातरं त्रातुमर्हसि ।

तं क्षिप्रमभिधाव त्वं भ्रातरं शरणैषिणम् ॥ ३ ॥

रक्षसां वशमापन्नं सिंहानामिव गोवृषम् ।

न जगाम तथोक्तस्तु भ्रातुराज्ञाय शासनम् ॥ ४ ॥

' तुम्हारे भाई वनमें आर्तनाद कर रहे हैं । वे कोई शरण – रक्षाका सहारा चाहते हैं । तुम उन्हें बचाओ । जल्दी ही अपने भाईके पास दौड़े हुए जाओ । जैसे कोई साँड़ सिंहोंके पंजेमें फँस गया हो, उसी प्रकार वे राक्षसोंके वशमें पड़ गये हैं, अतः जाओ । ' सीताके ऐसा कहनेपर भी भाईके आदेशका विचार करके लक्ष्मण नहीं गये ॥ ३-४ ॥

तमुवाच ततस्तत्र क्षुभिता जनकात्मजा ।

सौमित्रे मित्ररूपेण भ्रातुस्त्वमसि शत्रुवत् ॥५ ॥

यस्त्वमस्यामवस्थायां भ्रातरं नाभिपद्यसे ।

इच्छसि त्वं विनश्यन्तं रामं लक्ष्मण मत्कृते ॥ ६ ॥

उनके इस व्यवहारसे वहाँ जनककिशोरी सीता क्षुब्ध हो उठीं और उनसे इस प्रकार बोलीं-' सुमित्राकुमार! तुम मित्ररूपमें अपने भाईके शत्रु ही जान पड़ते हो, इसीलिये तुम इस संकटकी अवस्थामें भी भाईके पास नहीं पहुँच रहे हो । लक्ष्मण! मैं जानती हूँ, तुम मुझपर अधिकार करनेके लिये इस समय श्रीरामका विनाश ही चाहते हो ॥ ५-६ ॥

लोभात्तु मत्कृते नूनं नानुगच्छसि राघवम् ।

व्यसनं ते प्रियं मन्ये स्नेहो भ्रातरि नास्ति ते ॥ ७ ॥

' मेरे लिये तुम्हारे मनमें लोभ हो गया है, निश्चय ही इसीलिये तुम श्रीरघुनाथजीके पीछे नहीं जा रहे हो । मैं समझती हूँ, श्रीरामका संकटमें पड़ना ही तुम्हें प्रिय है । तुम्हारे मनमें अपने भाईके प्रति स्नेह नहीं है ॥ ७ ॥