वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ — पृष्ठ 731–740

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 731–740

पृष्ठ 731

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अरण्यकाण्डे अष्टषष्टितमः सर्गः ७१ ९ ' तात! जब मैं उससे लड़ता - लड़ता थक गया, । उस अवस्थामें मेरे दोनों पंख काटकर वह निशाचर विदेहनन्दिनी सीताको साथ लिये यहाँसे दक्षिण दिशाकी ओर गया था ॥ १० ॥

उपरुध्यन्ति मे प्राणा दृष्टिर्भ्रमति राघव ।

पश्यामि वृक्षान् सौवर्णानुशीरकृतमूर्धजान् ॥ ११ ॥

' रघुनन्दन! अब मेरे प्राणोंकी गति बंद हो रही है, दृष्टि घूम रही है और समस्त वृक्ष मुझे सुनहरे रंगके दिखायी देते हैं । ऐसा जान पड़ता है कि उन वृक्षोंपर खशके केश जमे हुए हैं ॥ ११ ॥

येन याति मुहूर्तेन सीतामादाय रावणः ।

विप्रणष्टं धनं क्षिप्रं तत्स्वामी प्रतिपद्यते ॥ १२ ॥

विन्दो नाम मुहूर्तोऽसौ न च काकुत्स्थ सोऽबुधत् ।

त्वत्प्रियां जानकीं हृत्वा रावणो राक्षसेश्वरः ।

झषवद् बडिशं गृह्य क्षिप्रमेव विनश्यति ॥ १३ ॥

' रावण सीताको जिस मुहूर्तमें ले गया है, उसमें खोया हुआ धन शीघ्र ही उसके स्वामीको मिल जाता है । काकुत्स्थ! वह ' विन्द ' नामक मुहूर्त था, किंतु उस राक्षसको इसका पता नहीं था । जैसे मछली मौतके लिये ही बंसी पकड़ लेती है, उसी प्रकार वह भी सीताको ले जाकर शीघ्र ही नष्ट हो जायगा ॥ १२-१३ ॥

न च त्वया व्यथा कार्या जनकस्य सुतां प्रति ।

वैदेह्या रंस्यसे क्षिप्रं हत्वा तं रणमूर्धनि ॥ १४ ॥

' अतः अब तुम जनकनन्दिनीके लिये अपने मनमें खेद न करो । संग्रामके मुहानेपर उस निशाचरका वध करके तुम शीघ्र ही पुनः विदेहराजकुमारीके साथ विहार करोगे ' ॥ १४ ॥

असम्मूढस्य गृध्रस्य रामं प्रत्यनुभाषतः ।

आस्यात् सुस्राव रुधिरं म्रियमाणस्य सामिषम् ॥ १५ ॥

गृध्रराज जटायु यद्यपि मर रहे थे तो भी उनके मनपर मोह या भ्रम नहीं छाया था ( उनके होश - हवास ठीक थे ) । वे श्रीरामचन्द्रजीको उनकी बातका उत्तर दे ही रहे थे कि उनके मुखसे मांसयुक्त रुधिर निकलने लगा ॥ १५ ॥

पुत्रो विश्श्रवसः साक्षाद् भ्राता वैश्रवणस्य च ।

इत्युक्त्वा दुर्लभान् प्राणान् मुमोच पतगेश्वरः ॥ १६ ॥

वे बोले –'रावण विश्रवाका पुत्र और कुबेरका सगा भाई है ' इतना कहकर उन पक्षिराजने दुर्लभ प्राणोंका परित्याग कर दिया ॥ १६ ॥

ब्रूहि ब्रूहीति रामस्य ब्रुवाणस्य कृताञ्जलेः ।

त्यक्त्वा शरीरं गृधस्य प्राणा जग्मुर्विहायसम् ॥ १७ ॥

श्रीरामचन्द्रजी हाथ जोड़े कह रहे थे, ' कहिये, कहिये, कुछ और कहिये! ' किंतु उस समय गृध्रराजके प्राण उनका शरीर छोड़कर आकाशमें चले गये ॥१७ ॥

स निक्षिप्य शिरौ भूमौ प्रसार्य चरणौ तथा ।

विक्षिप्य च शरीरं स्वं पपात धरणीतले ॥ १८ ॥

उन्होंने अपना मस्तक भूमिपर डाल दिया, दोनों पैर फैला दिये और अपने शरीरको भी पृथ्वीपर ही डालते हुए वे धराशायी हो गये ॥ १८ ॥

तं गृध्रं प्रेक्ष्य ताम्राक्षं गतासुमचलोपमम् ।

रामः सुबहुभिर्दुःखैर्दीनः सौमित्रिमब्रवीत् ॥ १ ९ ॥

गृध्रराज जटायुकी आँखें लाल दिखायी देती थीं । प्राण निकल जानेसे वे पर्वतके समान अविचल हो गये । उन्हें इस अवस्थामें देखकर बहुत - से दुःखोंसे दुःखी हुए श्रीरामचन्द्रजीने सुमित्राकुमारसे कहा— ॥ १ ९ ॥

बहूनि रक्षसां वासे वर्षाणि वसता सुखम् ।

अनेन दण्डकारण्ये विशीर्णमिह पक्षिणा ॥ २० ॥

' लक्ष्मण! राक्षसोंके निवासस्थान इस दण्डकारण्यमें बहुत वर्षोंतक सुखपूर्वक रहकर इन पक्षिराजने यहीं अपने शरीरका त्याग किया है ॥ २० ॥

अनेकवार्षिको यस्तु चिरकालसमुत्थितः ।

सोऽयमद्य हतः शेते कालो हि दुरतिक्रमः ॥ २१ ॥

' इनकी अवस्था बहुत वर्षोंकी थी । इन्होंने सुदीर्घ कालतक अपना अभ्युदय देखा है; किंतु आज इस वृद्धावस्थामें उस राक्षसके द्वारा मारे जाकर ये पृथ्वीपर सो रहे हैं; क्योंकि कालका उल्लङ्घन करना सबके ही लिये कठिन है ॥ २१ ॥

पश्य लक्ष्मण गृधोऽयमुपकारी हतश्च मे ।

सीतामभ्यवपन्नो हि रावणेन वलीयसा ॥ २२ ॥

' लक्ष्मण! देखो, ये जटायु मेरे बड़े उपकारी थे, किंतु आज मारे गये । सीताकी रक्षाके लिये युद्धमें प्रवृत्त होनेपर अत्यन्त बलवान् रावणके हाथसे इनका वध | हुआ है ॥ २२ ॥

गृध्रराज्यं परित्यज्य पितृपैतामहं महत् ।

मम हेतोरयं प्राणान् मुमोच पतगेश्वरः ॥२३ ॥

' बाप - दादोंके द्वारा प्राप्त हुए गीधोंके विशाल राज्यका त्याग करके इन पक्षिराजने मेरे ही लिये अपने प्राणोंकी आहुति दी है ॥ २३ ॥

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७२० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे

सर्वत्र खलु दृश्यन्ते साधवो धर्मचारिणः ।

शूराः शरण्याः सौमित्रे तिर्यग्योनिगतेष्वपि ॥ २४ ॥

' शूर, शरणागतरक्षक, धर्मपरायण श्रेष्ठ पुरुष सभी जगह देखे जाते हैं । पशु - पक्षीकी योनियोंमें भी उनका अभाव नहीं है ॥ २४ ॥

सीताहरणजं दुःखं न मे सौम्य तथागतम् ।

यथा विनाशो गृध्रस्य मत्कृते च परंतप ॥ २५ ॥

' सौम्य! शत्रुओंको संताप देनेवाले लक्ष्मण! इस समय मुझे सीताके हरणका उतना दुःख नहीं है, जितना कि मेरे लिये प्राणत्याग करनेवाले जटायुकी मृत्युसे हो रहा है ॥ २५ ॥

राजा दशरथः श्रीमान् यथा मम महायशाः ।

पूजनीयश्च मान्यश्च तथायं पतगेश्वरः ॥ २६ ॥

' महायशस्वी श्रीमान् राजा दशरथ जैसे मेरे माननीय और पूज्य थे, वैसे ही ये पक्षिराज जटायु भी हैं ॥ २६ ॥

सौमित्रे हर काष्ठानि निर्मथिष्यामि पावकम् ।

गृध्रराजं दिधक्ष्यामि मत्कृते निधनं गतम् ॥ २७ ॥

' सुमित्रानन्दन! तुम सूखे काष्ठ ले आओ, मैं मथकर आग निकालूँगा और मेरे लिये मृत्युको प्राप्त हुए इन गृध्रराजका दाह - संस्कार करूँगा ॥ २७ ॥

नाथं पतगलोकस्य चितिमारोपयाम्यहम् ।

इमं धक्ष्यामि सौमित्रे हतं रौद्रेण रक्षसा ॥ २८ ॥

' सुमित्राकुमार! उस भयंकर राक्षसके द्वारा मारे गये इन पक्षिराजको मैं चितापर चढ़ाऊँगा और इनका दाह - संस्कार करूँगा ' ॥ २८ ॥

या गतिर्यज्ञशीलानामाहिताग्नेश्च या गतिः ।

अपरावर्तिनां या च या च भूमिप्रदायिनाम् ॥ २ ९ ॥

मया त्वं समनुज्ञातो गच्छ लोकाननुत्तमान् ।

गृधराज महासत्त्व संस्कृतश्च मया व्रज ॥ ३० ॥

( फिर वे जटायुको सम्बोधित करके बोले - ) ' महान् बलशाली गृध्रराज! यज्ञ करनेवाले, अग्रिहोत्री, युद्धमें पीठ न दिखानेवाले और भूमिदान करनेवाले पुरुषोंको जिस गतिकी - जिन उत्तम लोकोंकी प्राप्ति होती है, मेरी आज्ञासे उन्हीं सर्वोत्तम लोकोंमें तुम भी जाओ । मेरे द्वारा दाह - संस्कार किये जानेपर तुम्हारी सद्गति हो ' ॥

एवमुक्त्वा चितां दीप्तामारोप्य पतगेश्वरम् ।

ददाह रामो धर्मात्मा स्वबन्धुमिव दुःखितः ॥ ३१ ॥

ऐसा कहकर धर्मात्मा श्रीरामचन्द्रजीने दुःखित हो पक्षिराजके शरीरको चितापर रखा और उसमें आग लगाकर अपने बन्धुकी भाँति उनका दाह - संस्कार किया ॥

रामोऽथ सहसौमित्रिर्वनं गत्वा स वीर्यवान् ।

स्थूलान् हत्वा महारोहीननुतस्तार तं द्विजम् ॥ ३२ ॥

रोहिमांसानि चोद्धृत्य पेशीकृत्वा महायशाः ।

शकुनाय ददौ रामो रम्ये हरितशाद्वले ॥ ३३ ॥

तदनन्तर लक्ष्मणसहित पराक्रमी श्रीराम वनमें जा मोटे - मोटे महारोही ( कन्दमूल विशेष ) काट लाये और उन्हें जटायुके लिये अर्पित करनेके उद्देश्यसे उन्होंने पृथ्वीपर कुश बिछाये । महायशस्वी श्रीरामने रोहीके गूदे निकालकर उनका पिण्ड बनाया और उन सुन्दर हरित कुशाओंपर जटायुको पिण्डदान किया ॥ ३२-३३ ॥

यत् तत् प्रेतस्य मर्त्यस्य कथयन्ति द्विजातयः ।

तत् स्वर्गगमनं पित्र्यं तस्य रामो जजाप ह ॥ ३४ ॥

ब्राह्मणलोग परलोकवासी मनुष्यको स्वर्गकी प्राप्ति करानेके उद्देश्यसे जिन पितृसम्बन्धी मन्त्रोंका जप आवश्यक बतलाते हैं, उन सबका भगवान् श्रीरामने जप किया ॥ ३४ ॥

ततो गोदावरीं गत्वा नदीं नरवरात्मजौ ।

उदकं चक्रतुस्तस्मै गृधराजाय तावुभौ ॥ ३५ ॥

तदनन्तर उन दोनों राजकुमारोंने गोदावरी नदी तटपर जाकर उन गृध्रराजके लिये जलाञ्जलि दी ॥ ३५ ॥

शास्त्रदृष्टेन विधिना जलं गृध्राय राघवौ ।

स्नात्वा तौ गृधराजाय उदकं चक्रतुस्तदा ॥ ३६ ॥

रघुकुलके उन दोनों महापुरुषोंने गोदावरीमें नहाकर शास्त्रीय विधिसे उन गृध्रराजके लिये उस समय जलाञ्जलिका दान किया ॥ ३६ ॥

स गृध्रराजः कृतवान् यशस्करं सुदुष्करं कर्म रणे निपातितः । महर्षिकल्पेन च संस्कृतस्तदा जगाम पुण्यां गतिमात्मनः शुभाम् ॥ ३७ ॥

महर्षितुल्य श्रीरामके द्वारा दाहसंस्कार होने के कारण गृध्रराज जटायुको आत्माका कल्याण करनेवाली परम पवित्र गति प्राप्त हुई । उन्होंने रणभूमिमें अत्यन्त दुष्कर और यशोवर्धक पराक्रम प्रकट किया था । परंतु अन्तमें रावणने उन्हें मार गिराया ॥ ३७ ॥

कृतोदक तावपि पक्षिसत्तमे स्थिरां च बुद्धिं प्रणिधाय जग्मतुः । प्रवेश्य सीताधिगमे ततो मनो वनं सुरेन्द्राविव विष्णुवासवौ ॥ ३८ ॥

पृष्ठ 733

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अरण्यकाण्डे एकोनसप्ततितमः सर्गः ७२१ तर्पण करनेके पश्चात् वे दोनों भाई पक्षिराज | कार्यमें मन लगा देवेश्वर विष्णु और इन्द्रकी भाँति

जटायुमें पितृतुल्य सुस्थिरभाव रखकर सीताकी खोजके । वनमें आगे बढ़े ॥३८ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डेऽष्टषष्टितमः सर्गः ॥ ६८ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें अड़सठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६८ ॥

एकोनसप्ततितमः सर्गः लक्ष्मणका अयोमुखीको दण्ड देना तथा श्रीराम और लक्ष्मणका कबन्धके बाहुबन्धमें

कृत्वैवमुदकं तस्मै प्रस्थितौ राघवौ तदा ।

अवेक्षन्तौ वने सीतां जग्मतुः पश्चिमां दिशम् ॥ १ ॥

इस प्रकार जटायुके लिये जलाञ्जलि दान करके वे दोनों रघुवंशी बन्धु उस समय वहाँसे प्रस्थित हुए और वनमें सीताकी खोज करते हुए पश्चिम दिशा ( नैर्ऋत्य कोण ) की ओर गये ॥ १ ॥

तां दिशं दक्षिणां गत्वा शरचापासिधारिणौ ।

अविप्रहतमैक्ष्वाक पन्थानं प्रतिपेदतुः ॥ २ ॥

धनुष, बाण और खड्ग धारण किये वे दोनों इक्ष्वाकुवंशी वीर उस दक्षिण - पश्चिम दिशाकी ओर आगे बढ़ते हुए एक ऐसे मार्गपर जा पहुँचे, जिसपर लोगोंका आना - जाना नहीं होता था ॥ २ ॥

गुल्मैर्वृक्षैश्च बहुभिर्लताभिश्च प्रवेष्टितम् ।

आवृतं सर्वतो दुर्गं गहनं घोरदर्शनम् ॥ ३ ॥

वह मार्ग बहुत - से वृक्षों, झाड़ियों और लता-बेलोंद्वारा सब ओरसे घिरा हुआ था । वह बहुत ही दुर्गम, गहन और देखनेमें भयंकर था ॥३ ॥

व्यतिक्रम्य तु वेगेन गृहीत्वा दक्षिणां दिशम् ।

सुभीमं तन्महारण्यं व्यतियातौ महाबलौ ॥ ४ ॥

उसे वेगपूर्वक लाँघकर वे दोनों महाबली राजकुमार दक्षिण दिशाका आश्रय ले उस अत्यन्त भयानक और विशाल वनसे आगे निकल गये ॥४ ॥

ततः परं जनस्थानात् त्रिकोशं गम्य राघवौ ।

क्रौञ्चारण्यं विविशतुर्गहनं तौ महौजसौ ॥ ५ ॥

तदनन्तर जनस्थानसे तीन कोस दूर जाकर वे महाबली श्रीराम और लक्ष्मण क्रौञ्चारण्य नामसे प्रसिद्ध गहन वनके भीतर गये ॥५ ॥

नानामेघघनप्रख्यं प्रहृष्टमिव सर्वतः ।

नानावर्णैः शुभैः पुष्पैर्मृगपक्षिगणैर्युतम् ॥ ६ ॥

वह वन अनेक मेघोंके समूहकी भाँति श्याम प्रतीत होता था । विविध रंगके सुन्दर फूलोंसे सुशोभित पड़कर चिन्तित होना | होनेके कारण वह सब ओरसे हर्षोत्फुल्ल - सा जान पड़ता था । उसके भीतर बहुत - से पशु - पक्षी निवास करते थे ॥६ ॥

दिदृक्षमाणौ वैदेहीं तद् वनं तौ विचिक्यतुः ।

तत्र तत्रावतिष्ठन्तौ सीताहरणदुःखितौ ॥ ७ ॥

सीताका पता लगानेकी इच्छासे वे दोनों उस वनमें उनकी खोज करने लगे । जहाँ - तहाँ थक जानेपर वे विश्रामके लिये ठहर जाते उन्हें बड़ा दुःख हो रहा ततः पूर्वेण तौ गत्वा क्रौञ्चारण्यमतिक्रम्य तत्पश्चात् वे दोनों क्रौञ्चारण्यको पार करके | गये ॥ ८ ॥

थे । विदेहनन्दिनीके अपहरणसे था ॥ ७ ॥

त्रिक्रोशं भ्रातरौ तदा ।

मतङ्गाश्रममन्तरे ॥ ८ ॥

भाई तीन कोस पूर्व जाकर मतङ्ग मुनिके आश्रमके पास

दृष्ट्वा तु तद् वनं घोरं बहुभीममृगद्विजम् ।

नानावृक्षसमाकीर्णं सर्वं गहनपादपम् ॥ ९ ॥

वह वन बड़ा भयंकर था । उसमें बहुत - से भयानक पशु और पक्षी निवास करते थे । अनेक प्रकारके वृक्षोंसे व्याप्त वह सारा वन गहन वृक्षावलियोंसे भरा था ॥ ९ ॥

ददृशाते गिरौ तत्र दरीं दशरथात्मजौ ।

पातालसमगम्भीरां तमसा नित्यसंवृताम् ॥१० ॥

वहाँ पहुँचकर उन दशरथराजकुमारोंने वहाँके

पर्वतपर एक गुफा देखी, जो पातालके समान गहरी थी ।

वह सदा अन्धकारसे आवृत रहती थी ॥१० ॥

आसाद्य च नरव्याघ्रौ दर्यास्तस्याविदूरतः ।

ददर्शतुर्महारूपां राक्षसीं विकृताननाम् ॥११ ॥

उसके समीप जाकर उन दोनों नरश्रेष्ठ वीरोंने एक विशालकाय राक्षसी देखी, जिसका मुख बड़ा विकराल था ॥

भयदामल्यसत्त्वानां बीभत्सां रौद्रदर्शनाम् ।

लम्बोदरीं तीक्ष्णदंष्ट्रां करालीं परुषत्वचम् ॥१२ ॥

| वह छोटे - छोटे जन्तुओंको भय देनेवाली तथा

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७२२ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे देखनेमें बड़ी भयंकर थी । उसकी सूरत देखकर घृणा । होती थी । उसके लंबे पेट, तीखी दाढें और कठोर त्वचा थी । वह बड़ी विकराल दिखायी देती थी ॥ १२ ॥

भक्षयन्तीं मृगान् भीमान् विकटां मुक्तमूर्धजाम् ।

अवैक्षतां तु तौ तत्र भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥ १३ ॥

भयानक पशुओंको भी पकड़कर खा जाती थी । उसका आकार विकट था और बाल खुले हुए थे । उस कन्दराके समीप दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मणने उसे देखा ॥ १३ ॥

सा समासाद्य तौ वीरौ व्रजन्तं भ्रातुरग्रतः ।

एहि रंस्यावहेत्युक्त्वा समालम्भत लक्ष्मणम् ॥ १४ ॥

वह राक्षसी उन दोनों वीरोंके पास आयी और अपने भाईके आगे - आगे चलते हुए लक्ष्मणकी ओर देखकर बोली- ' आओ हम दोनों रमण करें । ' ऐसा कहकर उसने लक्ष्मणका हाथ पकड़ लिया ॥ १४ ॥

उवाच चैनं वचनं अहं त्वयोमुखी नाम इतना ही नहीं, भुजाओंमें कस लिया नाम अयोमुखी है । मैं समझ लो, बहुत बड़ा पति हो ' ॥ १५ ॥

सौमित्रिमुपगुह्य च ।

लाभस्ते त्वमसि प्रियः ॥ १५ ॥

उसने सुमित्राकुमारको अपनी और इस प्रकार कहा - ' मेरा तुम्हें भार्यारूपसे मिल गयी तो लाभ हुआ और तुम मेरे प्यारे ।

नाथ पर्वतदुर्गेषु नदीनां पुलिनेषु च ।

आयुश्चिरमिदं वीर त्वं मया सह रंस्यसे ॥ १६ ॥

‘ प्राणनाथ! वीर! यह दीर्घकालतक स्थिर रहनेवाली आयु पाकर तुम पर्वतकी दुर्गम कन्दराओंमें तथा नदियोंके तटोंपर मेरे साथ सदा रमण करोगे ' ॥ १६ ॥

एवमुक्तस्तु कुपितः खड्गमुद्धृत्य लक्ष्मणः ।

कर्णनासस्तनं तस्या निचकर्तारिसूदनः ॥ १७ ॥

राक्षसीके ऐसा कहनेपर शत्रुसूदन लक्ष्मण क्रोधसे जल उठे । उन्होंने तलवार निकालकर उसके कान, नाक और स्तन काट डाले ॥ १७ ॥

कर्णनासे निकृत्ते तु विस्वरं विननाद सा ।

यथागतं प्रदुद्राव राक्षसी घोरदर्शना ॥ १८ ॥

नाक और कानके कट जानेपर वह भयंकर राक्षसी जोर - जोरसे चिल्लाने लगी और जहाँसे आयी थी, उधर ही भाग गयी ॥ १८ ॥

तस्यां गतायां गहनं व्रजन्तौ वनमोजसा ।

आसेदतुरमित्रघ्नौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥ १ ९ ॥

उसके चले जानेपर वे दोनों भाई शक्तिशाली श्रीराम और लक्ष्मण बड़े वेगसे चलकर एक गहन वनमें जा पहुँचे ॥ १ ९ ॥

लक्ष्मणस्तु महातेजाः सत्त्ववाञ्छीलवाञ्छुचिः ।

अब्रवीत् प्राञ्जलिर्वाक्यं भ्रातरं दीप्ततेजसम् ॥ २० ॥

उस समय महातेजस्वी, धैर्यवान्, सुशील एवं पवित्र आचार - विचारवाले लक्ष्मणने हाथ जोड़कर अपने तेजस्वी भ्राता श्रीरामचन्द्रजीसे कहा - ॥२० ॥

स्पन्दते मे दृढं बाहुरुद्विग्नमिव मे मनः ।

प्रायशश्चाप्यनिष्टानि निमित्तान्युपलक्षये ॥ २१ ॥

तस्मात् सज्जीभवार्य त्वं कुरुष्व वचनं मम ।

ममैव हि निमित्तानि सद्यः शंसन्ति सम्भ्रमम् ॥ २२ ॥

' आर्य! मेरी बायीं बाँह जोर - जोरसे फड़क रही है और मन उद्विग्न - सा हो रहा है । मुझे बार - बार बुरे शकुन दिखायी देते हैं, इसलिये आप भयका सामना करनेके लिये तैयार हो जाइये । मेरी बात मानिये । ये जो बुरे शकुन हैं, वे केवल मुझे ही तत्काल प्राप्त होनेवाले भयकी सूचना देते हैं ॥ २१-२२ ॥

एष वञ्जुलको नाम पक्षी परमदारुणः ।

आवयोर्विजयं युद्धे शंसन्निव विनर्दति ॥ २३ ॥

' ( इसके साथ एक शुभ शकुन भी हो रहा है ) यह जो वञ्जुल नामक अत्यन्त दारुण पक्षी है, यह युद्धमें हम दोनोंकी विजय सूचित करता हुआ - सा जोर - जोरसे बोल रहा है ' ॥२३ ॥

तयोरन्वेषतोरेवं सर्वं तद् वनमोजसा ।

संजज्ञे विपुलः शब्दः प्रभञ्जन्निव तद् वनम् ॥ २४ ॥

इस प्रकार बलपूर्वक उस सारे वनमें वे दोनों भाई जब सीताकी खोज कर रहे थे, उसी समय वहाँ बड़े जोरका शब्द हुआ, जो उस वनका विध्वंस करता हुआ - सा प्रतीत होता था ॥ २४ ॥

संवेष्टितमिवात्यर्थं गहनं मातरिश्वना ।

वनस्य तस्य शब्दोऽभूद् वनमापूरयन्निव ॥ २५ ॥

उस वनमें जोर - जोरसे आँधी चलने लगी । वह सारा वन उसकी लपेटमें आ गया । वनमें उस शब्दकी जो प्रतिध्वनि उठी, उससे वह सारा वनप्रान्त गूँज उठा ॥ २५ ॥

तं शब्दं कांक्षमाणस्तु रामः खड्गी सहानुजः ।

ददर्श सुमहाकायं राक्षसं विपुलोरसम् ॥ २६ ॥

भाईके साथ तलवार हाथमें लिये भगवान् श्रीराम उस शब्दका पता लगाना ही चाहते थे कि एक चौड़ी छातीवाले विशालकाय राक्षसपर उनकी दृष्टि पड़ी ॥ २६ ॥

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अरण्यकाण्डे एकोनसप्ततितमः सर्गः ७२३

आसेदतुश्च तद्रक्षस्तावुभौ प्रमुखे स्थितम् ।

विवृद्धमशिरोग्रीवं कबन्धमुदरेमुखम् ॥ २७ ॥

उन दोनों भाइयोंने उस राक्षसको अपने सामने खड़ा पाया । वह देखनेमें बहुत बड़ा था; किंतु उसके न मस्तक था न गला । कबन्ध ( धड़मात्र ) ही उसका स्वरूप था और उसके पेटमें ही मुँह बना हुआ था ॥

रोमभिर्निशितैस्तीक्ष्णैर्महागिरिमिवोच्छ्रितम् ।

नीलमेघनिभं रौद्रं मेघस्तनितनिःस्वनम् ॥ २८ ॥

उसके सारे शरीरमें पैने और तीखे रोयें थे । वह महान् पर्वतके समान ऊँचा था । उसकी आकृति बड़ी भयंकर थी । वह नील मेघके समान काला था और मेघके समान ही गम्भीर स्वरमें गर्जना करता था ॥ २८ ॥

अग्निज्वालानिकाशेन ललाटस्थेन दीप्यता ।

महापक्षेण पिङ्गेन विपुलेनायतेन च ॥ २ ९ ॥

एकेनोरसि घोरेण नयनेन सुदर्शिना ।

महादंष्ट्रोपपन्नं तं लेलिहानं महामुखम् ॥ ३० ॥

उसकी छातीमें ही ललाट था और ललाटमें एक ही लंबी - चौड़ी तथा आगकी ज्वालाके समान दहकती हुई भयंकर आँख थी, जो अच्छी तरह देख सकती थी । उसकी पलक बहुत बड़ी थी और वह आँख भूरे रंगकी थी । उस राक्षसकी दाढ़ें बहुत बड़ी थीं तथा वह अपनी लपलपाती हुई जीभसे अपने विशाल मुखको बारंबार चाट रहा था ॥ २ ९ -३० ॥

भक्षयन्तं महाघोरानृक्षसिंहमृगद्विजान् ।

घोरौ भुजौ विकुर्वाणमुभौ योजनमायतौ ॥३१ ॥

कराभ्यां विविधान् गृह्य ऋक्षान् पक्षिगणान् मृगान् ।

आकर्षन्तं विकर्षन्तमनेकान् मृगयूथपान् ॥ ३२ ॥

अत्यन्त भयंकर रीछ, सिंह, हिंसक पशु और पक्षी — ये ही उसके भोजन थे । वह अपनी एक - एक योजन लंबी दोनों भयानक भुजाओंको दूरतक फैला देता और उन दोनों हाथोंसे नाना प्रकारके अनेकों भालू, पक्षी, पशु तथा मृगके यूथपतियोंको पकड़कर खींच लेता था । उनमेंसे जो उसे भोजनके लिये अभीष्ट नहीं होते, उन जन्तुओंको वह उन्हीं हाथोंसे पीछे ढकेल देता था ॥ ३१-३२ ॥

स्थितमावृत्य पन्थानं तयोश्रीत्रोः प्रपन्नयोः ।

अथ तं समतिक्रम्य क्रोशमात्रं ददर्शतुः ॥ ३३ ॥

महान्तं दारुणं भीमं कबन्धं भुजसंवृतम् ।

कबन्धमिव संस्थानादतिघोरप्रदर्शनम् ॥ ३४ ॥ ।

दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण जब उसके निकट पहुँचे, तब वह उनका रास्ता रोककर खड़ा हो गया । तब वे दोनों भाई उससे दूर हट गये और बड़े गौरसे उसे देखने लगे । उस समय वह एक कोस लंबा जान पड़ा । उस राक्षसकी आकृति केवल कबन्ध ( धड़ ) के ही रूपमें थी, इसलिये वह कबन्ध कहलाता था । वह विशाल, हिंसापरायण, भयंकर तथा दो बड़ी - बड़ी भुजाओंसे युक्त था और देखनेमें अत्यन्त घोर प्रतीत होता था ॥ ३३ - ३४ ॥

स महाबाहुरत्यर्थं प्रसार्य विपुलौ भुजौ ।

जग्राह सहितावेव राघवौ पीडयन् बलात् ॥ ३५ ॥

उस महाबाहु राक्षसने अपनी दोनों विशाल भुजाओंको फैलाकर उन दोनों रघुवंशी राजकुमारोंको बलपूर्वक पीड़ा देते हुए एक साथ ही पकड़ लिया ॥ ३५ ॥

खड्गिनौ दृढधन्वानौ तिग्मतेजौ महाभुजौ ।

भ्रातरौ विवशं प्राप्तौ कृष्यमाणौ महाबलौ ॥ ३६ ॥

दोनोंके हाथोंमें तलवारें थीं, दोनोंके पास मजबूत धनुष थे और वे दोनों भाई प्रचण्ड तेजस्वी, विशाल भुजाओंसे युक्त तथा महान् बलवान् थे तो भी उस राक्षसके द्वारा खींचे जानेपर विवशताका अनुभव करने लगे ॥ ३६ ॥

तत्र धैर्याच्च शूरस्तु राघवौ नैव विव्यथे ।

बाल्यादनाश्रयाच्चैव लक्ष्मणस्त्वभिविव्यथे ॥ ३७ ॥

उस समय वहाँ शूरवीर रघुनन्दन श्रीराम तो धैर्यके कारण व्यथित नहीं हुए, परंतु बालबुद्धि होने तथा धैर्यका आश्रय न लेनेके कारण लक्ष्मणके मनमें बड़ी व्यथा हुई ॥ ३७ ॥

उवाच च विषण्णः सन् राघवं राघवानुजः ।

पश्य मां विवशं वीर राक्षसस्य वशंगतम् ॥३८ ॥

तब श्रीरामके छोटे भाई लक्ष्मण विषादग्रस्त हो श्रीरघुनाथजीसे बोले – ' वीरवर! देखिये, मैं राक्षसके वशमें पड़कर विवश हो गया हूँ ॥ ३८ ॥

मयैकेन तु निर्युक्तः परिमुच्यस्व राघव ।

मां हि भूतबलिं दत्त्वा पलायस्व यथासुखम् ॥ ३ ९ ॥

' रघुनन्दन! एकमात्र मुझे ही इस राक्षसको भेंट देकर आप स्वयं इसके बाहुबन्धनसे मुक्त हो जाइये । इस भूतको मेरी ही बलि देकर आप सुखपूर्वक यहाँसे निकल भागिये ॥ ३ ९ ॥

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७२४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे

अधिगन्तासि वैदेहीमचिरेणेति मे मतिः ।

प्रतिलभ्य च काकुत्स्थ पितृपैतामहीं महीम् ॥ ४० ॥

तत्र मां राम राज्यस्थः स्मर्तुमर्हसि सर्वदा । ' मेरा विश्वास है कि आप शीघ्र ही विदेह-राजकुमारीको प्राप्त कर लेंगे । ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम! वनवाससे लौटनेपर पिता- पितामहोंकी भूमिको अपने अधिकारमें लेकर जब आप राज - सिंहासनपर विराजमान होइयेगा, तब वहाँ सदा मेरा भी स्मरण करते रहियेगा ' ॥ ४०३ ॥

लक्ष्मणेनैवमुक्तस्तु रामः सौमित्रिमब्रवीत् ॥ ४१ ॥

मा स्म त्रासं वृथा वीर नहि त्वादृग् विषीदति । लक्ष्मणके ऐसा कहनेपर श्रीरामने उन सुमित्रा -कुमारसे कहा- ' वीर! तुम भयभीत न होओ । तुम्हारे -जैसे शूरवीर इस तरह विषाद नहीं करते हैं ' ॥ ४१३ ॥

एतस्मिन्नन्तरे क्रूरो भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥ ४२ ॥

तावुवाच महाबाहुः कबन्धो दानवोत्तमः । इसी बीचमें क्रूर हृदयवाले दानवशिरोमणि महाबाहु कबन्धने उन दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मणसे कहा- ॥ ॥ ४२३ ॥

कौ युवां वृषभस्कन्धौ महाखड्गधनुर्धरौ ॥ ४३ ॥

घोरं देशमिमं प्राप्तौ दैवेन मम चाक्षुषौ ।

वदतं कार्यमिह वां किमर्थं चागतौ युवाम् ॥ ४४ ॥

' तुम दोनों कौन हो? तुम्हारे कंधे बैल समान ऊँचे हैं । तुमने बड़ी - बड़ी तलवारें और धनुष धारण कर रखे हैं । इस भयंकर देशमें तुम दोनों किसलिये आये हो? यहाँ तुम्हारा क्या कार्य है? बताओ । भाग्यसे ही तुम दोनों मेरी आँखोंके सामने पड़ गये ॥ ४३-४४ ॥

इमं देशमनुप्राप्तौ क्षुधार्तस्येह तिष्ठतः ।

सबाणचापखड्गौ च तीक्ष्णशृङ्गाविवर्षभौ ॥ ४५ ॥

मां तूर्णमनुसम्प्राप्तौ दुर्लभं जीवितं हि वाम् । ' मैं यहाँ भूखसे पीड़ित होकर खड़ा था और तुम स्वयं धनुष - बाण और खड्ग लिये तीखे सींगवाले दो बैलोंके समान तुरंत ही इस स्थानपर मेरे निकट आ पहुँचे । अतः अब तुम दोनोंका जीवित रहना कठिन है ' ॥ ४५३ ॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा कबन्धस्य दुरात्मनः ॥४६ ॥

उवाच लक्ष्मणं रामो मुखेन परिशुष्यता ।

कृच्छ्रात् कृच्छ्रतरं प्राप्य दारुणं सत्यविक्रम ॥ ४७ ॥

व्यसनं जीवितान्ताय प्राप्तमप्राप्य तां प्रियाम् । दुरात्मा कबन्धकी ये बातें सुनकर श्रीरामने सूखे मुखवाले लक्ष्मणसे कहा - ' सत्यपराक्रमी वीर! कठिन-से कठिन असह्य दुःखको पाकर हम दुःखी थे ही, तबतक पुनः प्रियतमा सीताके प्राप्त होनेसे पहले ही हम दोनोंपर यह महान् संकट आ गया, जो जीवनका अन्त कर देनेवाला है॥४६-४७३ ॥ कालस्य सुमहद् वीर्यं सर्वभूतेषु लक्ष्मण ॥ ४८ ॥

त्वां च मां च नरव्याघ्र व्यसनैः पश्य मोहितौ ।

नहि भारोऽस्ति दैवस्य सर्वभूतेषु लक्ष्मण ॥ ४ ९ ॥

' नरश्रेष्ठ लक्ष्मण! कालका महान् बल सभी प्राणियोंपर अपना प्रभाव डालता है । देखो न, तुम और मैं दोनों ही कालके दिये हुए अनेकानेक संकटोंसे मोहित हो रहे हैं । सुमित्रानन्दन! दैव अथवा कालके लिये सम्पूर्ण प्राणियोंपर शासन करना भाररूप ( कठिन ) नहीं है ॥ ४८-४९ ॥

शूराश्च बलवन्तश्च कृतास्त्राश्च रणाजिरे ।

कालाभिपन्नाः सीदन्ति यथा वालुकसेतवः ॥ ५० ॥

' जैसे बालूके बने हुए पुल पानीके आघातसे ढह जाते हैं, उसी प्रकार बड़े - बड़े शूरवीर, बलवान् और अस्त्रवेत्ता पुरुष भी समराङ्गणमें कालके वशीभूत हो कष्टमें पड़ जाते हैं'॥५० ॥

इति ब्रुवाणो दृढसत्यविक्रमो महायशा दाशरथिः प्रतापवान् । सौमित्रिमुदग्रविक्रमः स्थिरां तदा स्वां मतिमात्मनाकरोत् ॥ ५१ ॥

ऐसा कहकर सुदृढ़ एवं सत्यपराक्रमवाले महान् बल - विक्रमसे सम्पन्न महायशस्वी प्रतापशाली दशरथनन्दन श्रीरामने सुमित्राकुमारकी ओर देखकर उस समय स्वयं ही अपनी बुद्धिको सुस्थिर कर | लिया ॥ ५१ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे एकोनसप्ततितमः सर्गः ॥ ६ ९ ॥ इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें उनहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६ ९ ॥

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अरण्यकाण्डे सप्ततितमः सर्गः ७२५ सप्ततितमः सर्गः श्रीराम और लक्ष्मणका परस्पर विचार करके कबन्धकी दोनों भुजाओंको काट डालना तथा कबन्धके द्वारा उनका स्वागत

तौ तु तत्र स्थितौ दृष्ट्वा भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ।

बाहुपाशपरिक्षितौ कबन्धो वाक्यमब्रवीत् ॥ १ ॥

अपने बाहुपाशसे घिरकर वहाँ खड़े हुए उन दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मणकी ओर देखकर कबन्धने कहा - ॥१ ॥

तिष्ठतः किं नु मां दृष्ट्वा क्षुधार्तं क्षत्रियर्षभौ ।

आहारार्थं तु संदिष्टौ दैवेन हतचेतनौ ॥ २ ॥

' क्षत्रियशिरोमणि राजकुमारो! मुझे भूखसे पीड़ित देखकर भी खड़े क्यों हो? ( मेरे मुँहमें चले आओ )

क्योंकि दैवने मेरे भोजनके लिये ही तुम्हें यहाँ भेजा है ।

इसीलिये तुम दोनोंकी बुद्धि मारी गयी है ' ॥ २ ॥

तच्छ्रुत्वा लक्ष्मणो वाक्यं प्राप्तकालं हितं तदा ।

उवाचार्तिसमापन्नो विक्रमे कृतनिश्चयः ॥ ३ ॥

यह सुनकर पीड़ित हुए लक्ष्मणने उस समय पराक्रमका ही निश्चय करके यह समयोचित एवं हितकर बात कही - ॥ ३ ॥

त्वां च मां च पुरा तूर्णमादत्ते राक्षसाधमः ।

तस्मादसिभ्यामस्याशु बाहू छिन्दावहे गुरू ॥ ४ ॥

' भैया! यह नीच राक्षस मुझको और आपको तुरंत मुँहमें ले ले, इसके पहले ही हमलोग अपनी तलवारोंसे इसकी बड़ी - बड़ी बाँहें शीघ्र ही काट डालें ॥ ४ ॥

भीषणोऽयं महाकायो राक्षसा भुजविक्रमः ।

लोकं ह्यतिजितं कृत्वा ह्यावां हन्तुमिहेच्छति ॥ ५ ॥

' यह महाकाय राक्षस बड़ा भीषण है । इसकी भुजाओंमें ही इसका सारा बल और पराक्रम निहित है । यह समस्त संसारको सर्वथा पराजित - सा करके अब हमलोगोंको भी यहाँ मार डालना चाहता है ॥५ ॥

निश्चेष्टानां वधो राजन् कुत्सितो जगतीपतेः ।

क्रतुमध्योपनीतानां पशूनामिव राघव ॥ ६ ॥

' राजन्! रघुनन्दन! यज्ञमें लाये गये पशुओंके समान निश्चेष्ट प्राणियोंका वध राजाके लिये निन्दित बताया गया है ( इसलिये हमें इसके प्राण नहीं लेने । चाहिये, केवल भुजाओंका ही उच्छेद कर देना चाहिये ) ' ॥ ६ ॥

एतत् संजल्पितं श्रुत्वा तयोः क्रुद्धस्तु राक्षसः ।

विदार्यास्यं ततो रौद्रं तो भक्षयितुमारभत् ॥ ७ ॥

उन दोनोंकी यह बातचीत सुनकर उस राक्षसको बड़ा क्रोध हुआ और वह अपना भयंकर मुख फैलाकर उन्हें खा जानेको उद्यत हो गया ॥७ ॥

ततस्तौ देशकालज्ञौ खड्गाभ्यामेव राघवौ ।

अच्छिन्दन्तां सुसंहृष्टौ बाहू तस्यांसदेशतः ॥ ८ ॥

इतनेमें ही देश - काल ( अवसर ) का ज्ञान रखनेवाले उन दोनों रघुवंशी राजकुमारोंने अत्यन्त हर्षमें भरकर तलवारोंसे ही उसकी दोनों भुजाएँ कंधोंसे काट गिरायीं ॥ ८ ॥

दक्षिणो दक्षिणं बाहुमसक्तमसिना ततः ।

चिच्छेद रामो वेगेन सव्यं वीरस्तु लक्ष्मणः ॥ ९ ॥

भगवान् श्रीराम उसके दाहिने भागमें खड़े थे । उन्होंने अपनी तलवारसे उसकी दाहिनी बाँह बिना किसी रुकावटके वेगपूर्वक काट डाली तथा वाम भागमें खड़े वीर लक्ष्मणने उसकी बायीं भुजाको तलवारसे उड़ा दिया ॥९ ॥

स पपात महाबाहुश्छिन्नबाहुर्महास्वनः ।

खं च गां च दिशश्चैव नादयञ्जलदो यथा ॥ १० ॥

भुजाएँ कट जानेपर वह महाबाहु राक्षस मेघके समान गम्भीर गर्जना करके पृथ्वी, आकाश तथा दिशाओंको गुँजाता हुआ धरतीपर गिर पड़ा ॥ १० ॥

स निकृत्तौ भुजौ दृष्ट्वा शोणितौघपरिप्लुतः ।

दीनः पप्रच्छ तौ वीरौ कौ युवामिति दानवः ॥ ११ ॥

अपनी भुजाओंको कटी हुई देख खूनसे लथपथ हुए उस दानवने दीन वाणीमें पूछा - ' वीरो! तुम दोनों कौन हो? ' ॥ ११ ॥

इति तस्य ब्रुवाणस्य लक्ष्मणः शुभलक्षणः ।

शशंस तस्य काकुस्त्थं कबन्धस्य महाबलः ॥ १२ ॥

कबन्धके इस प्रकार पूछनेपर शुभ लक्षणोंवाले महाबली लक्ष्मणने उसे श्रीरामचन्द्रजीका परिचय देना आरम्भ किया— ॥१२ ॥

अयमिक्ष्वाकुदायादो रामो नाम जनैः श्रुतः ।

तस्यैवावरजं विद्धि भ्रातरं मां च लक्ष्मणम् ॥१३ ॥

' ये इक्ष्वाकुवंशी महाराज दशरथके पुत्र हैं और लोगोंमें श्रीराम नामसे विख्यात हैं । मुझे इन्हींका छोटा भाई समझो । मेरा नाम लक्ष्मण है ॥१३ ॥

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७२६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे

मात्रा प्रतिहते राज्ये रामः प्रव्राजितो वनम् ।

मया सह चरत्येष भार्यया च महद् वनम् ॥ १४ ॥

अस्य देवप्रभावस्य वसतो विजने वने ।

रक्षसापहृता भार्या यामिच्छन्ताविहागतौ ॥ १५ ॥

' माता कैकेयीके द्वारा जब इनका राज्याभिषेक रोक दिया गया, तब ये पिताकी आज्ञासे वनमें चले आये और मेरे तथा अपनी पत्नीके साथ इस विशाल वनमें विचरण करने लगे । इस निर्जन वनमें रहते हुए इन देवतुल्य प्रभावशाली श्रीरघुनाथजीकी पत्नीको किसी राक्षसने हर लिया है । उन्हींका पता लगानेकी इच्छासे हमलोग यहाँ आये हैं ॥ १४-१५ ॥

त्वं तु को वा किमर्थं वा कबन्धसदृशो वने ।

आस्येनोरसि दीप्तेन भग्नजो विचेष्टसे ॥ १६ ॥

' तुम कौन हो? और कबन्धके समान रूप धारण करके क्यों इस वनमें पड़े हो? छातीके नीचे चमकता हुआ मुँह और टूटी हुई जंघा ( पिण्डली ) लिये तुम किस कारण इधर - उधर लुढ़कते फिरते हो? ' ॥ १६ ॥

एवमुक्तः कबन्धस्तु लक्ष्मणेनोत्तरं वचः ।

उवाच वचनं प्रीतस्तदिन्द्रवचनं स्मरन् ॥ १७ ॥

लक्ष्मणके ऐसा कहनेपर कबन्धको इन्द्रकी कही हुई बातका स्मरण हो आया । अतः उसने बड़ी प्रसन्नताके साथ लक्ष्मणको उनकी बातका उत्तर दिया- ॥ १७ ॥

स्वागतं वां नरव्याघ्रौ दिष्ट्या पश्यामि वामहम् ।

दिष्ट्या चेमौ निकृत्तौ मे युवाभ्यां बाहुबन्धनौ ॥ १८ ॥

' पुरुषसिंह वीरो! आप दोनोंका स्वागत है । बड़े भाग्यसे मुझे आपलोगोंका दर्शन मिला है । ये मेरी दोनों भुजाएँ मेरे लिये भारी बन्धन थीं । सौभाग्यकी बात है कि आपलोगोंने इन्हें काट डाला ॥ १८ ॥

विरूपं यच्च मे रूपं प्राप्तं ह्यविनयाद् यथा ।

तन्मे शृणु नरव्याघ्र तत्त्वतः शंसतस्तव ॥ १ ९ ॥

' नरश्रेष्ठ श्रीराम! मुझे जो ऐसा कुरूप रूप प्राप्त हुआ है, यह मेरी ही उद्दण्डताका फल है । यह सब कैसे

हुआ, वह प्रसङ्ग आपको मैं ठीक - ठीक बता रहा हूँ ।

आप मुझसे सुनें ' ॥ १ ९ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे सप्ततितमः सर्गः ॥ ७० ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें सत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ७० ॥

एकसप्ततितमः सर्गः कबन्धकी आत्मकथा, अपने शरीरका दाह हो जानेपर उसका श्रीरामको सीताके अन्वेषणमें सहायता देनेका आश्वासन

पुरा राम महाबाहो महाबलपराक्रमम् ।

रूपमासीन्ममाचिन्त्यं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ॥ १ ॥

' महाबाहु श्रीराम! पूर्वकालमें मेरा रूप महान् बलपराक्रमसे सम्पन्न, अचिन्त्य तथा तीनों लोकोंमें विख्यात था ॥ १ ॥

यथा सूर्यस्य सोमस्य शक्रस्य च यथा वपुः ।

सोऽहं रूपमिदं कृत्वा लोकवित्रासनं महत् ॥ २ ॥

ऋषीन् वनगतान् राम त्रासयामि ततस्ततः । ' सूर्य, चन्द्रमा और इन्द्रका शरीर जैसा तेजस्वी है, वैसा ही मेरा भी था । ऐसा होनेपर भी मैं लोगोंको भयभीत करनेवाले इस अत्यन्त भयंकर राक्षसरूपको धारण करके इधर - उधर घूमता और वनमें रहनेवाले ऋषियोंको डराया करता था ॥ २३ ॥

ततः स्थूलशिरा नाम महर्षिः कोपितो मया ॥ ३ ॥

स चिन्वन् विविधं वन्यं रूपेणानेन धर्षितः ।

तेनाहमुक्तः प्रेक्ष्यैवं घोरशापाभिधायिना ॥ ४ ॥

अपने इस बर्तावसे एक दिन मैंने स्थूलशिरा नामक महर्षिको कुपित कर दिया । वे नाना प्रकारके जंगली फल - मूल आदिका संचय कर रहे थे, उसी समय मैंने उन्हें इस राक्षसरूपसे डरा दिया । मुझे ऐसे विकट रूपमें देखकर उन्होंने उ घोर शाप देते हुए कहा — ॥ ३-४ ॥

एतदेवं नृशंसं ते रूपमस्तु विगर्हितम् ।

स मया याचितः क्रुद्धः शापस्यान्तो भवेदिति ॥ ५ ॥

अभिशापकृतस्येति तेनेदं भाषितं वचः । ' दुरात्मन्! आजसे सदाके लिये तुम्हारा यही क्रूर

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अरण्यकाण्डे एकसप्ततितमः सर्गः ७२७ और निन्दित रूप रह जाय । ' यह सुनकर मैंने उन कुपित महर्षिसे प्रार्थना की — ' भगवन्! इस अभिशाप ( तिरस्कार ) जनित शापका अन्त होना चाहिये । ' तब उन्होंने इस प्रकार कहा— ॥ ५३ ॥

यदा छित्त्वा भुजौ रामस्त्वां दहेद् विजने वने ॥ ६ ॥

तदा त्वं प्राप्स्यसे रूपं स्वमेव विपुलं शुभम् ।

श्रिया विराजितं पुत्रं दनोस्त्वं विद्धि लक्ष्मण ॥ ७ ॥

' जब श्रीराम ( और लक्ष्मण ) तुम्हारी दोनों भुजाएँ काटकर तुम्हें निर्जन वनमें जलायेंगे, तब तुम पुनः अपने उसी परम उत्तम, सुन्दर और शोभासम्पन्न रूपको प्राप्त कर लोगे । ' लक्ष्मण! इस प्रकार तुम मुझे एक दुराचारी दानव समझो॥६-७ ॥

इन्द्रकोपादिदं रूपं प्राप्तमेवं रणाजिरे ।

अहं हि तपसोग्रेण पितामहमतोषयम् ॥ ८ ॥

दीर्घमायुः स मे प्रादात् ततो मां विभ्रमोऽस्पृशत् ।

दीर्घमायुर्मया प्राप्तं किं मां शक्रः करिष्यति ॥ ९ ॥

' मेरा जो यह ऐसा रूप है, यह समराङ्गणमें इन्द्र क्रोधसे प्राप्त हुआ है । मैंने पूर्वकालमें राक्षस होनेके पश्चात् घोर तपस्या करके पितामह ब्रह्माजीको संतुष्ट किया और उन्होंने मुझे दीर्घजीवी होनेका वर दिया । इससे मेरी बुद्धिमें यह भ्रम या अहंकार उत्पन्न हो गया कि मुझे तो दीर्घकालतक बनी रहनेवाली आयु प्राप्त हुई है; फिर इन्द्र मेरा क्या कर लेंगे? ॥ ८ - ९ ॥

इत्येवं बुद्धिमास्थाय रणे शक्रमधर्षयम् ।

तस्य बाहुप्रमुक्तेन वज्रेण शतपर्वणा ॥ १० ॥

सक्थिनी च शिरश्चैव शरीरे सम्प्रवेशितम् । ' ऐसे विचारका आश्रय लेकर एक दिन मैंने युद्धमें देवराजपर आक्रमण किया । उस समय इन्द्रने मुझपर सौ धारोंवाले वज्रका प्रहार किया । उनके छोड़े हुए उस वज्रसे मेरी जाँघें और मस्तक मेरे ही शरीरमें घुस गये ॥१०३ ॥

स मया याच्यमानः सन् नानयद् यमसादनम् ॥ ११ ॥

पितामहवचः सत्यं तदस्त्विति ममाब्रवीत् । ' मैंने बहुत प्रार्थना की, इसलिये उन्होंने मुझे यमलोक नहीं पठाया और कहा- ' पितामह ब्रह्माजीने जो तुम्हें दीर्घजीवी होनेके लिये वरदान दिया है, वह सत्य हो'॥११३ ॥

अनाहारः कथं शक्तो भग्नसक्थिशिरोमुखः ॥ १२ ॥

वज्रेणाभिहतः कालं सुदीर्घमपि जीवितुम् । ' तब मैंने कहा- देवराज! आपने अपने वज्रकी मारसे मेरी जाँघें, मस्तक और मुँह सभी तोड़ डाले । अब मैं कैसे आहार ग्रहण करूँगा और निराहार रहकर किस प्रकार सुदीर्घकालतक जीवित रह सकूँगा? ॥ स एवमुक्तः शक्रो मे बाहू योजनमायतौ ॥ १३ ॥

तदा चास्यं च मे कुक्षौ तीक्ष्णदंष्ट्रमकल्पयत् । ‘ मेरे ऐसा कहनेपर इन्द्रने मेरी भुजाएँ एक - एक योजन लंबी कर दीं एवं तत्काल ही मेरे पेटमें तीखे दाढ़वाला एक मुख बना दिया ॥ १३३ ॥

सोऽहं भुजाभ्यां दीर्घाभ्यां संक्षिप्यास्मिन् वनेचरान् ॥ १४ ॥

सिंहद्वीपिमृगव्याघ्रान् भक्षयामि समन्ततः । ' इस प्रकार मैं विशाल भुजाओंद्वारा वनमें रहनेवाले सिंह, चीते, हरिन और बाघ आदि जन्तुओंको सब ओरसे समेटकर खाया करता था ॥ १४३ ॥

स तु मामब्रवीदिन्द्रो यदा रामः सलक्ष्मणः ॥ १५ ॥

छेत्स्यते समरे बाहू तदा स्वर्गं गमिष्यसि । ' इन्द्रने मुझे यह भी बतला दिया था कि जब लक्ष्मणसहित श्रीराम तुम्हारी भुजाएँ काट देंगे, उस समय तुम स्वर्गमें जाओगे ॥ १५३ ॥

अनेन वपुषा तात वनेऽस्मिन् राजसत्तम ॥ १६ ॥

यद् यत् पश्यामि सर्वस्य ग्रहणं साधु रोचये । ' तात! राजशिरोमणे! इस शरीरसे इस वनके भीतर मैं जो - जो वस्तु देखता हूँ, वह सब ग्रहण कर लेना मुझे ठीक लगता है ॥ १६३ ॥

अवश्यं ग्रहणं रामो मन्येऽहं समुपैष्यति ॥ १७ ॥

इमां बुद्धिं पुरस्कृत्य देहन्यासकृतश्रमः । ' इन्द्र तथा मुनिके कथनानुसार मुझे यह विश्वास था कि एक दिन श्रीराम अवश्य मेरी पकड़में आ जायँगे । इसी विचारको सामने रखकर मैं इस शरीरको त्याग देनेके लिये प्रयत्नशील था ॥ १७३ ॥

स त्वं रामोऽसि भद्रं ते नाहमन्येन राघव ॥१८ ॥

शक्यो हन्तुं यथा तत्त्वमेवमुक्तं महर्षिणा । ' रघुनन्दन! अवश्य ही आप श्रीराम हैं । आपका कल्याण हो । मैं आपके सिवा दूसरे किसीसे नहीं मारा जा सकता था । यह बात महर्षिने ठीक ही कही थी ॥१८ ॥

अहं हि मतिसाचिव्यं करिष्यामि नरर्षभ ॥ १ ९ ॥ मित्रं चैवोपदेक्ष्यामि युवाभ्यां संस्कृतोऽग्निना । ' नरश्रेष्ठ! आप दोनों जब अग्निके द्वारा मेरा

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७२८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे दाह - संस्कार कर देंगे, उस समय मैं आपकी बौद्धिक । सहायता करूँगा । आप दोनोंके लिये एक अच्छे मित्रका पता बताऊँगा ' ॥ १ ९ ३ ॥ एवमुक्तस्तु धर्मात्मा दनुना तेन राघवः ॥ २० ॥

इदं जगाद वचनं लक्ष्मणस्य च पश्यतः । उस दानवके ऐसा कहनेपर धर्मात्मा श्रीरामचन्द्रजीने लक्ष्मणके सामने उससे यह बात कही- ॥ २०३ ॥

रावणेन हृता भार्या सीता मम यशस्विनी ॥ २१ ॥

निष्क्रान्तस्य जनस्थानात् सह भ्रात्रा यथासुखम् ।

नाममात्रं तु जानामि न रूपं तस्य रक्षसः ॥ २२ ॥

' कबन्ध! मेरी यशस्विनी भार्या सीताको रावण हर ले गया है । उस समय मैं अपने भाई लक्ष्मणके साथ सुखपूर्वक जनस्थानके बाहर चला गया था । मैं

उस राक्षसका नाममात्र जानता हूँ । उसकी शकल -सूरतसे परिचित नहीं हूँ ॥ २१-२२ ॥

निवासं वा प्रभावं वा वयं तस्य न विद्महे ।

शोकार्तानामनाथानामेवं विपरिधावताम् ॥ २३ ॥

कारुण्यं सदृशं कर्तुमुपकारेण वर्तताम् । ' वह कहाँ रहता है और कैसा उसका प्रभाव है, इस बातसे हमलोग सर्वथा अनभिज्ञ हैं । इस समय सीताका शोक हमें बड़ी पीड़ा दे रहा है । हम असहाय होकर इसी तरह सब ओर दौड़ रहे हैं । तुम हमारे ऊपर समुचित करुणा करनेके लिये इस विषयमें हमारा कुछ उपकार करो ॥२३३ ॥

काष्ठान्यानीय भग्नानि काले शुष्काणि कुञ्जरैः ॥ २४ ॥

धक्ष्यामस्त्वां वयं वीर श्वभ्रे महति कल्पिते । ' वीर! फिर हमलोग हाथियोंद्वारा तोड़े गये सूखे काठ लाकर स्वयं खोदे हुए एक बहुत बड़े गड्ढेमें तुम्हारे शरीरको रखकर जला देंगे ॥ २४३ ॥

स त्वं सीतां समाचक्ष्व येन वा यत्र वा हृता ॥ २५ ॥

कुरु कल्याणमत्यर्थं यदि जानासि तत्त्वतः । ' अतः अब तुम हमें सीताका पता बताओ । इस समय वह कहाँ है? तथा उसे कौन कहाँ ले गया है? यदि ठीक - ठीक जानते हो तो सीताका समाचार बताकर हमारा अत्यन्त कल्याण करो ' ॥ २५३ ॥

एवमुक्तस्तु रामेण वाक्यं दनुरनुत्तमम् ॥ २६ ॥

प्रोवाच कुशलो वक्ता वक्तारमपि राघवम् । श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर बातचीतमें कुशल उस दानवने उन प्रवचनपटु रघुनाथजी से यह परम उत्तम बात कही - ॥ २६३ ॥

दिव्यमस्ति न मे ज्ञानं नाभिजानामि मैथिलीम् ॥ २७ ॥

यस्तां वक्ष्यति तं वक्ष्ये दग्धः स्वं रूपमास्थितः ।

। योऽभिजानाति तद्रक्षस्तद् वक्ष्ये राम तत्परम् ॥२८ ॥

' श्रीराम! इस समय मुझे दिव्य ज्ञान नहीं है, इसलिये मैं मिथिलेशकुमारीके विषयमें कुछ भी नहीं जानता । जब मेरे इस शरीरका दाह हो जायगा, तब मैं अपने पूर्व स्वरूपको प्राप्त होकर किसी ऐसे व्यक्तिका पता बता सकूँगा, जो सीताके विषयमें आपको कुछ बतायेगा तथा जो उस उत्कृष्ट राक्षसको भी जानता होगा, ऐसे पुरुषका आपको परिचय दूँगा ॥ २७-२८ ॥

अदग्धस्य हि विज्ञातुं शक्तिरस्ति न मे प्रभो ।

राक्षसं तु महावीर्यं सीता येन हृता तव ॥ २ ९ ॥

' प्रभो! जबतक मेरे इस शरीरका दाह नहीं होगा तबतक मुझमें यह जाननेकी शक्ति नहीं आ सकती कि वह महापराक्रमी राक्षस कौन है, जिसने आपकी सीताका अपहरण किया है ॥ २ ९ ॥

विज्ञानं हि महद् भ्रष्टं शापदोषेण राघव ।

स्वकृतेन मया प्राप्तं रूपं लोकविगर्हितम् ॥ ३० ॥

' रघुनन्दन! शाप - दोषके कारण मेरा महान् विज्ञान नष्ट हो गया है । अपनी ही करतूतसे मुझे यह लोकनिन्दित रूप प्राप्त हुआ है ॥ ३० ॥

किं तु यावन्न यात्यस्तं सविता श्रान्तवाहनः ।

तावन्मामवटे क्षिप्त्वा दह राम यथाविधि ॥ ३१ ॥

' किंतु श्रीराम! जबतक सूर्यदेव अपने वाहनोंके थक जानेपर अस्त नहीं हो जाते, तभीतक मुझे गड्ढे में डालकर शास्त्रीय विधिके अनुसार मेरा दाह - संस्कार कर दीजिये ॥ ३१ ॥

दग्धस्त्वयाहमव न्यायेन रघुनन्दन ।

वक्ष्यामि तं महावीर यस्तं वेत्स्यति राक्षसम् ॥ ३२ ॥

' महावीर रघुनन्दन! आपके द्वारा विधिपूर्वक गड्ढेमें मेरे शरीरका दाह हो जानेपर मैं ऐसे महापुरुषका परिचय दूँगा, जो उस राक्षसको जानते होंगे ॥ ३२ ॥

तेन सख्यं च कर्तव्यं न्याय्यवृत्तेन राघव ।

कल्पयिष्यति ते वीर साहाय्यं लघुविक्रम ॥ ३३ ॥

' शीघ्र पराक्रम प्रकट करनेवाले वीर रघुनाथजी! न्यायोचित आचारवाले उन महापुरुषके साथ आपको