वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ — पृष्ठ 791–800

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 791–800

पृष्ठ 791

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किष्किन्धाकाण्डे लिये धनुष हाथमें लिया ॥ १ ॥

स गृहीत्वा धनुर्घोरं शरमेकं च मानदः ।

सालमुद्दिश्य चिक्षेप पूरयन् स रवैर्दिशः ॥ २ ॥

दूसरोंको मान देनेवाले श्रीरघुनाथजीने वह भयंकर धनुष और एक बाण लेकर धनुषकी टंकारसे सम्पूर्ण दिशाओंको गुँजाते हुए उस बाणको सालवृक्षकी ओर छोड़ दिया ॥ २ ॥

स विसृष्टो बलवता बाणः स्वर्णपरिष्कृतः ।

भित्त्वा सालान् गिरिप्रस्थं सप्तं भूमिं विवेश ह ॥ ३ ॥

उन बलवान् वीरशिरोमणिके द्वारा छोड़ा गया वह सुवर्णभूषित बाण उन सातों सालवृक्षोंको एक ही साथ बींधकर पर्वत तथा पृथ्वीके सातों तलोंको छेदता हुआ पातालमें चला गया ॥ ३ ॥

सायकस्तु मुहूर्तेन सालान् भित्त्वा महाजवः ।

निष्पत्य च पुनस्तूणं तमेव प्रविवेश ह ॥ ४ ॥

इस प्रकार एक ही मुहूर्तमें उन सबका भेदन करके वह महान् वेगशाली बाण पुनः वहाँसे निकलकर उनके तरकसमें ही प्रविष्ट हो गया ॥ ४ ॥

तान् दृष्ट्वा सप्त निर्भिन्नान् सालान् वानरपुङ्गवः ।

रामस्य शरवेगेन विस्मयं परमं गतः ॥ ५ ॥

श्रीरामके बाणके वेगसे उन सातों सालवृक्षोंको विदीर्ण हुआ देख वानरशिरोमणि सुग्रीवको बड़ा विस्मय हुआ ॥ ५ ॥

स मूर्ध्ना न्यपतद् भूमौ प्रलम्बीकृतभूषणः ।

सुग्रीवः परमप्रीतो राघवाय कृताञ्जलिः ॥ ६ ॥

साथ ही उन्हें मन - ही - मन बड़ी प्रसन्नता हुई । सुग्रीवने हाथ जोड़कर धरतीपर माथा टेक दिया और श्रीरघुनाथजीको साष्टाङ्ग प्रणाम किया । प्रणामके लिये झुकते समय उनके कण्ठहारादि भूषण लटकते हुए दिखायी देते थे ॥ ६ ॥

इदं चोवाच धर्मज्ञं कर्मणा तेन हर्षितः ।

रामं सर्वास्त्रविदुषां श्रेष्ठं शूरमवस्थितम् ॥ ७ ॥

श्रीरामके उस महान् कर्मसे अत्यन्त प्रसन्न हो उन्होंने सामने खड़े हुए सम्पूर्ण अस्त्र - वेत्ताओंमें श्रेष्ठ धर्मज्ञ, शूरवीर श्रीरामचन्द्रजीसे इस प्रकार कहा- ॥७ ॥

सेन्द्रानपि सुरान् सर्वांस्त्वं बाणैः पुरुषर्षभ ।

समर्थः समरे हन्तुं किं पुनर्वालिनं प्रभो ॥ ८ ॥

' पुरुषप्रवर! भगवन्! आप तो अपने बाणोंसे समराङ्गणमें इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओंका वध भी करनेमें समर्थ हैं । फिर वालीको मारना आपके लिये कौन बड़ी बात है? ॥ ८ ॥

येन सप्त महासाला गिरिभूमिश्च दारिताः ।

बाणेनैकेन काकुत्स्थ स्थाता ते को रणाग्रतः ॥ ९ ॥

द्वादशः सर्गः ७७ ९ ' काकुत्स्थ! जिन्होंने सात बड़े - बड़े सालवृक्ष, पर्वत और पृथ्वीको भी एक ही बाणसे विदीर्ण कर डाला, उन्हीं आपके समक्ष युद्धके मुहानेपर कौन ठहर सकता है ॥ ९ ॥

अद्य मे विगतः शोकः प्रीतिरद्य परा मम ।

सुहृदं त्वां समासाद्य महेन्द्रवरुणोपमम् ॥१० ॥

' महेन्द्र और वरुणके समान पराक्रमी आपको

सुहृद्के रूपमें पाकर आज मेरा सारा शोक दूर हो गया ।

आज मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है ॥१० ॥

तमद्यैव प्रियार्थं मे वैरिणं भ्रातृरूपिणम् ।

वालिनं जहि काकुत्स्थ मया बद्धोऽयमञ्जलिः ॥ ११ ॥

' ककुत्स्थकुलभूषण! मैं हाथ जोड़ता हूँ । आप आज ही मेरा प्रिय करनेके लिये उस वालीका, जो भाईके रूपमें मेरा शत्रु है, वध कर डालिये ' ॥ ११ ॥

ततो रामः परिष्वज्य सुग्रीवं प्रियदर्शनम् ।

प्रत्युवाच महाप्राज्ञो लक्ष्मणानुगतं वचः ॥ १२ ॥

सुग्रीव श्रीरामचन्द्रजीको लक्ष्मणके समान प्रिय हो गये थे । उनकी बात सुनकर महाप्राज्ञ श्रीरामने अपने उस प्रिय सुहृद्को हृदयसे लगा लिया और इस प्रकार उत्तर दिया- ॥ १२ ॥

अस्माद्गच्छाम किष्किन्धां क्षिप्रं गच्छ त्वमग्रतः ।

गत्वा चाह्वय सुग्रीव वालिनं भ्रातृगन्धिनम् ॥ १३ ॥

' सुग्रीव! हमलोग शीघ्र ही इस स्थानसे किष्किन्धाको चलते हैं । तुम आगे जाओ और जाकर व्यर्थ ही भाई कहलानेवाले वालीको युद्धके लिये ललकारो ' ॥ १३ ॥

सर्वे ते त्वरितं गत्वा किष्किन्धां वालिनः पुरीम् ।

वृक्षैरात्मानमावृत्य ह्यतिष्ठन् गहने वने ॥१४ ॥

तदनन्तर वे सब लोग वालीकी राजधानी किष्किन्धापुरीमें गये और वहाँ गहन वनके भीतर वृक्षोंकी आड़में अपनेको छिपकर खड़े हो गये ॥ १४ ॥

सुग्रीवोऽप्यनदद् घोरं वालिनो ह्वानकारणात् ।

गाढं परिहितो वेगान्नादैर्भिन्दन्निवाम्बरम् ॥ १५ ॥

सुग्रीवने लँगोटसे अपनी कमर खूब कस ली और वालीको बुलानेके लिये भयंकर गर्जना की । वेगपूर्वक किये हुए उस सिंहनादसे मानो वे आकाशको फाड़े डालते थे ॥१५ ॥

तं श्रुत्वा निनदं भ्रातुः क्रुद्धो वाली महाबलः ।

निष्पपात सुसंरब्धो भास्करोऽस्ततटादिव ॥ १६ ॥

भाईका सिंहनाद सुनकर महाबली वालीको बड़ा क्रोध हुआ । वह अमर्षमें भरकर अस्ताचलसे नीचे । जानेवाले सूर्यके समान बड़े वेगसे घरसे निकला ॥ १६ ॥

पृष्ठ 792

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७८० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे

ततः सुतुमुलं युद्धं वालिसुग्रीवयोरभूत् ।

गगने ग्रहयोर्घोरं बुधाङ्गारकयोरिव ॥ १७ ॥

फिर तो वाली और सुग्रीवमें बड़ा भयंकर युद्ध छिड़ गया, मानो आकाशमें बुध और मंगल इन दोनों ग्रहोंमें घोर संग्राम हो रहा हो ॥ १७ ॥

तलैरशनिकल्पैश्च वज्रकल्पैश्च मुष्टिभिः ।

जघ्नतुः समरेऽन्योन्यं भ्रातरौ क्रोधमूर्च्छितौ ॥ १८ ॥

वे दोनों भाई क्रोधसे मूच्छित हो एक - दूसरेपर वज्र और अशनिके समान तमाचों और घूँसोंका प्रहार करने लगे ॥

ततो रामो धनुष्पाणिस्तावुभौ समुदैक्षत ।

अन्योन्यसदृशौ वीरावुभौ देवाविवाश्विनौ ॥ १ ९ ॥

उसी समय श्रीरामचन्द्रजीने धनुष हाथमें लिया और उन दोनोंकी ओर देखा । वे दोनों वीर अश्विनीकुमारोंकी भाँति परस्पर मिलते - जुलते दिखायी दिये ॥ १ ९ ॥

यन्नावगच्छत् सुग्रीवं वालिनं वापि राघवः ।

ततो न कृतवान् बुद्धिं मोक्तुमन्तकरं शरम् ॥ २० ॥

श्रीरामचन्द्रजीको यह पता न चला कि इनमें कौन सुग्रीव है और कौन वाली; इसलिये उन्होंने अपना वह प्राणान्तकारी बाण छोड़नेका विचार स्थगित कर दिया ॥

एतस्मिन्नन्तरे भग्नः सुग्रीवस्तेन वालिना ।

अपश्यन् राघवं नाथमृष्यमूकं प्रदुद्रुवे ॥ २१ ॥

इसी बीचमें वालीने सुग्रीवके पाँव उखाड़ दिये । वे अपने रक्षक श्रीरघुनाथजीको न देखकर ऋष्यमूक पर्वतकी ओर भागे ॥ २१ ॥

क्लान्तो रुधिरसिक्ताङ्गः प्रहारैर्जर्जरीकृतः ।

वालिनाभिद्रुतः क्रोधात् प्रविवेश महावनम् ॥ २२ ॥

वे बहुत थक गये थे । उनका सारा शरीर लहूलुहान और प्रहारोंसे जर्जर हो रहा था । इतनेपर भी वालीने क्रोधपूर्वक उनका पीछा किया । किंतु वे मतंगमुनिके महान् वनमें घुस गये ॥ २२ ॥

तं प्रविष्टं वनं दृष्ट्वा वाली शापभयात् ततः ।

मुक्तो ह्यसि त्वमित्युक्त्वा स निवृत्तो महाबलः ॥ २३ ॥

सुग्रीवको उस वनमें प्रविष्ट हुआ देख महाबली वाली शापके भयसे वहाँ नहीं गया और ' जाओ तुम बच गये ' ऐसा कहकर वहाँसे लौट आया ॥ २३ ॥

राघवोऽपि सह भ्रात्रा सह चैव हनूमता ।

तदेव वनमागच्छत् सुग्रीवो यत्र वानरः ॥ २४ ॥

इधर श्रीरघुनाथजी भी अपने भाई लक्ष्मण तथा श्रीहनुमान्जीके साथ उसी समय वनमें आ गये, जहाँ वानर सुग्रीव विद्यमान थे ॥ २४ ॥

तं समीक्ष्यागतं रामं सुग्रीवः सहलक्ष्मणम् ।

ह्रीमान् दीनमुवाचेदं वसुधामवलोकयन् ॥ २५ ॥

लक्ष्मणसहित श्रीरामको आया देख सुग्रीवको बड़ी लज्जा हुई और वे पृथ्वीकी ओर देखते हुए वाणीमें उनसे बोले— ॥ २५ ॥

आह्वयस्वेति मामुक्त्वा दर्शयित्वा च विक्रमम् ।

वैरिणा घातयित्वा च किमिदानीं त्वया कृतम् ॥ २६ ॥

तामेव वेलां वक्तव्यं त्वया राघव तत्त्वतः ।

वालिनं न निहन्मीति ततो नाहमितो व्रजे ॥ २७ ॥

' रघुनन्दन! आपने अपना पराक्रम दिखाया और मुझे यह कहकर भेज दिया कि जाओ, वालीको युद्धके लिये ललकारो, यह सब हो जानेपर आपने शत्रुसे पिटवाया और स्वयं छिप गये । बताइये, इस समय आपने ऐसा क्यों किया? आपको उसी समय सच - सच बता देना चाहिये था कि मैं वालीको नहीं मारूँगा । ऐसी दशामें मैं यहाँसे उसके पास जाता ही नहीं ' ॥ २६-२७ ॥

तस्य चैवं ब्रुवाणस्य सुग्रीवस्य महात्मनः ।

करुणं दीनया वाचा राघवः पुनरब्रवीत् ॥ २८ ॥

महामना सुग्रीव जब दीन वाणीद्वारा इस प्रकार करुणा जनक बात कहने लगे, तब श्रीराम फिर उनसे | बोले— ॥ २८ ॥

सुग्रीव श्रूयतां तात क्रोधश्च व्यपनीयताम् ।

कारणं येन बाणोऽयं स मया न विसर्जितः ॥ २ ९ ॥

' तात सुग्रीव! मेरी बात सुनो, क्रोधको अपने मनसे निकाल दो । मैंने क्यों नहीं बाण चलाया, इसका कारण बतलाता हूँ ॥ २ ९ ॥

अलंकारेण वेषेण प्रमाणेन गतेन च ।

त्वं च सुग्रीव वाली च सदृशौ स्थः परस्परम् ॥ ३० ॥

सुग्रीव! वेशभूषा, कद और चाल - ढालमें तुम और वाली दोनों एक - दूसरे से मिलते - जुलते हो ॥ ३० ॥

स्वरेण वर्चसा चैव प्रेक्षितेन च वानर ।

विक्रमेण च वाक्यैश्च व्यक्तिं वां नोपलक्षये ॥ ३१ ॥

' स्वर, कान्ति, दृष्टि, पराक्रम और बोलचालके द्वारा भी मुझे तुम दोनोंमें कोई अन्तर नहीं दिखायी देता ॥ ३१ ॥ '

ततोऽहं रूपसादृश्यान्मोहितो वानरोत्तम ।

नोत्सृजामि महावेगं शरं शत्रुनिबर्हणम् ॥ ३२ ॥

' वानरश्रेष्ठ! तुम दोनोंके रूपकी इतनी समानता देखकर मैं मोहमें पड़ गया- तुम्हें पहचान न सका; इसलिये मैंने अपना महान् वेगशाली शत्रुसंहारक बाण नहीं छोड़ा ॥ ३२ ॥ '

पृष्ठ 793

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किष्किन्धाकाण्डे

जीवितान्तकरं घोरं सादृश्यात् तु विशङ्कितः ।

मूलघातो न नौ स्याद्धि द्वयोरिति कृतो मया ॥ ३३ ॥

' मेरा वह भयंकर बाण शत्रुके प्राण लेनेवाला था, इसलिये तुम दोनोंकी समानतासे संदेहमें पड़कर मैंने उस बाणको नहीं छोड़ा । सोचा, कहीं ऐसा न हो कि हम दोनोंके मूल उद्देश्यका ही विनाश हो जाय ॥ ३३ ॥ '

afe वीर विपन्ने हि अज्ञानाल्लाघवान्मया ।

मौढ्यं च मम बाल्यं च ख्यापितं स्यात् कपीश्वर ॥ ३४ ॥

' वीर! वानरराज! यदि अनजानमें या जल्दबाजीके कारण मेरे बाणसे तुम्हीं मारे जाते तो मेरी बालोचित चपलता और मूढ़ता ही सिद्ध होती ॥ ३४ ॥ '

दत्ताभयवधो नाम पातकं महदद्भुतम् ।

अहं च लक्ष्मणश्चैव सीता च वरवर्णिनी ॥ ३५ ॥

त्वदधीना वयं सर्वे वनेऽस्मिन् शरणं भवान् ।

तस्माद् युध्यस्व भूयस्त्वं मा माशङ्कीश्च वानर ॥ ३६ ॥

' जिसको अभय वध करनेसे बड़ा भारी पातक है । इस समय मैं तुम्हारे अधीन हैं । इस हो; इसलिये वानरराज! प्रारम्भ करो ॥ ३५-३६ एतन्मुहूर्ते तु मया निरस्तमिषुणैकेन दान दे दिया गया हो, उसका पाप होता है; यह एक अद्भुत , लक्ष्मण और सुन्दरी सीता सब वनमें तुम्हीं हमलोगोंके आश्रय शङ्का न करो; पुनः चलकर युद्ध ॥

पश्य वालिनमाहवे ।

चेष्टमानं महीतले ॥ ३७ ॥

' तुम इसी मुहूर्तमें वालीको मेरे एक ही बाणका निशाना बनकर धरतीपर लोटता देखोगे ॥ ३७ ॥

त्रयोदशः सर्गः ७८१

अभिज्ञानं कुरुष्व त्वमात्मनो वानरेश्वर ।

येन त्वामभिजानीयां द्वन्द्वयुद्धमुपागतम् ॥ ३८ ॥

' वानरेश्वर! अपनी पहचानके लिये तुम कोई चिह्न धारण कर लो, जिससे द्वन्द्वयुद्धमें प्रवृत्त होनेपर मैं तुम्हें पहचान सकूँ ' ॥ ३८ ॥

गजपुष्पीमिमां फुल्लामुत्पाट्य शुभलक्षणाम् ।

कुरु लक्ष्मण कण्ठेऽस्य सुग्रीवस्य महात्मनः ॥ ३ ९ ॥

( सुग्रीवसे ऐसा कहकर श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मणसे बोले – ) ' लक्ष्मण! यह उत्तम लक्षणोंसे युक्त गजपुष्पी लता फूल रही है । इसे उखाड़कर तुम महामना सुग्रीवके गलेमें पहना दो ' ॥ ३ ९ ॥

ततो गिरितटे जातामुत्पाट्य कुसुमायुताम् ।

लक्ष्मणो गजपुष्पीं तां तस्य कण्ठे व्यसर्जयत् ॥ ४० ॥

यह आज्ञा पाकर लक्ष्मणने पर्वतके किनारे उत्पन्न हुई फूलोंसे भरी वह गजपुष्पी लता उखाड़कर सुग्रीवके गलेमें डाल दिया ॥ ४० ॥

स तया शुशुभे श्रीमाल्लतया कण्ठसक्तया ।

मालयेव बलाकानां ससंध्य इव तोयदः ॥ ४१ ॥

गलेमें पड़ी हुई उस लतासे श्रीमान् सुग्रीव वकपंक्तिसे अलंकृत संध्याकालके मेघकी भाँति शोभा पाने लगे ॥ ४१ ॥

विभ्राजमानो वपुषा रामवाक्यसमाहितः ।

जगाम सह रामेण किष्किन्धां पुनराप सः ॥ ४२ ॥

श्रीरामके वचनसे आश्वासन पाकर अपने सुन्दर शरीरसे शोभा पानेवाले सुग्रीव श्रीरघुनाथजीके साथ फिर किष्किन्धापुरीमें जा पहुँचे ॥ ४२ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे द्वादशः सर्गः ॥१२ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें बारहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १२ ॥

त्रयोदशः सर्गः श्रीराम आदिका मार्गमें वृक्षों, विविध जन्तुओं, जलाशयों तथा सप्तजन आश्रमका दूरसे दर्शन करते हुए

ऋष्यमूकात् स धर्मात्मा किष्किन्धां लक्ष्मणाग्रजः । ।

जगाम सह सुग्रीवो वालिविक्रमपालिताम् ॥ १ ॥

लक्ष्मणके बड़े भाई धर्मात्मा श्रीराम सुग्रीवको साथ लेकर पुनः ऋष्यमूकसे उस किष्किन्धापुरीकी ओर चले, जो वालीके पराक्रमसे सुरक्षित थी ॥ १ ॥

समुद्यम्य महच्चापं रामः काञ्चनभूषितम् ।

शरांश्चादित्यसंकाशान् गृहीत्वा रणसाधकान् ॥ २ ॥

अपने सुवर्णभूषित विशाल धनुषको उठाकर और । पुनः किष्किन्धापुरीमें पहुँचना युद्धमें सफलता दिखानेवाले सूर्यतुल्य तेजस्वी बाणोंको लेकर श्रीराम वहाँसे प्रस्थित हुए ॥२ ॥

अग्रतस्तु ययौ तस्य राघवस्य महात्मनः ।

सुग्रीवः संहतग्रीवो लक्ष्मणश्च महाबलः ॥३ ॥

महात्मा रघुनाथजीके आगे - आगे सुगठित ग्रीवावाले सुग्रीव और महाबली लक्ष्मण चल रहे थे ॥ ३ ॥

पृष्ठतो हनुमान् वीरो नलो नीलश्च वीर्यवान् ।

तारश्चैव महातेजा हरियूथपयूथपः ॥४ ॥

पृष्ठ 794

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७८२ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे

और उनके पीछे वीर हनुमान्, नल, पराक्रमी नील तथा ।

वानर- र - यूथपोंके भी यूथपति महातेजस्वी तार चल रहे थे ॥

ते वीक्षमाणा वृक्षांश्च पुष्पभारावलम्बिनः ।

प्रसन्नाम्बुवहाश्चैव सरितः सागरंगमाः ॥ ५ ॥

कन्दराणि च शैलांश्च निर्दराणि गुहास्तथा ।

शिखराणि च मुख्यानि दरीश्च प्रियदर्शनाः ॥ ६ ॥

वे सब लोग फूलोंके भारसे झुके हुए वृक्षों, स्वच्छ जलवाली समुद्रगामिनी नदियों, कन्दराओं, पर्वतों, शिला-विवरों, गुफाओं, मुख्य - मुख्य शिखरों और सुन्दर दिखायी देनेवाली गहन गुफाओंको देखते हुए आगे बढ़ने लगे ॥

वैदूर्यविमलैस्तोयैः पद्यैश्चाकोशकुड्मलैः ।

शोभितान् सजलान् मार्गे तटाकांश्चावलोकयन् ॥ ७ ॥

उन्होंने मार्गमें ऐसे सजल सरोवरोंको भी देखा, जो वैदूर्यमणिके समान रंगवाले, निर्मल जल तथा कम खिले हुए मुकुलयुक्त कमलोंसे सुशोभित थे ॥७ ॥

कारण्डैः सारसैर्हसैर्वञ्जुलैर्जलकुक्कुटैः ।

चक्रवाकैस्तथा चान्यैः शकुनैः प्रतिनादितान् ॥ ८ ॥

कारण्डव, सारस, हंस, वञ्जुल, जलमुर्ग, चक्रवाक तथा अन्य पक्षी उन सरोवरोंमें चहचहा रहे थे । उन सबकी प्रतिध्वनि वहाँ गूँज रही थी ॥ ८ ॥

मृदुशष्पाङ्कुराहारान्निर्भयान् वनगोचरान् ।

चरतः सर्वतः पश्यन् स्थलीषु हरिणान् स्थितान् ॥ ९ ॥

स्थलोंमें सब ओर हरी - हरी कोमल घासके अङ्कुरोंका आहार करनेवाले वनचारी हरिण कहीं निर्भय होकर चरते थे और कहीं खड़े दिखायी देते थे ( इन सबको देखते हुए श्रीराम आदि किष्किन्धाकी ओर जा रहे थे ) ॥ ९ ॥

तटाकवैरिणश्चापि शुक्लदन्तविभूषितान् ।

घोरानेकचरान् वन्यान् द्विरदान् कूलघातिनः ॥ १० ॥

मत्तान् गिरितटोत्कृष्टान् पर्वतानिव जङ्गमान् ।

वानरान् द्विरदप्रख्यान् महीरेणुसमुक्षितान् ॥ ११ ॥

वने वनचरांश्चान्यान् खेचरांश्च विहंगमान् ।

पश्यन्तस्त्वरिता जग्मुः सुग्रीववशवर्तिनः ॥ १२ ॥

जो सफेद दाँतोंसे सुशोभित थे, देखनेमें भयंकर थे, अकेले विचरते थे और किनारोंको खोदकर नष्ट कर देनेके कारण सरोवरोंके शत्रु समझे जाते थे, ऐसे दो दाँतोंवाले मदमत्त जङ्गली हाथी चलते - फिरते पर्वतोंके समान जाते दिखायी देते थे । उन्होंने अपने दाँतोंसे पर्वतके तटप्रान्तको विदीर्ण कर दिया था । कहीं हाथी जैसे विशालकाय वानर दृष्टिगोचर होते थे, जो धरतीकी धूलसे नहा उठे थे । इनके सिवा उस वनमें और भी बहुत - से जंगली जीव- । जन्तु तथा आकाशचारी पक्षी विचरते देखे जाते थे । इन सबको देखते हुए श्रीराम आदि सब लोग सुग्रीवके वशवर्ती हो तीव्र गतिसे आगे बढ़ने लगे ॥ १०-१२ ॥

तेषां तु गच्छतां तत्र त्वरितं रघुनन्दनः ।

द्रुमषण्डवनं दृष्ट्वा रामः सुग्रीवमब्रवीत् ॥ १३ ॥

उन यात्रा करनेवाले लोगोंमें वहाँ रघुकुलनन्दन श्रीरामने वृक्षसमूहोंसे सघन वनको देखकर सुग्रीवसे पूछा— ॥ १३ ॥

एष मेघ इवाकाशे वृक्षषण्डः प्रकाशते ।

मेघसंघातविपुलः पर्यन्तकदलीवृतः ॥ १४ ॥

' वानरराज! आकाशमें मेघकी भाँति जो यह वृक्षका समूह प्रकाशित हो रहा है, क्या है? यह इतना विस्तृत है कि मेघोंकी घटाके समान छा रहा है । इसके किनारे - किनारे केलेके वृक्ष लगे हुए हैं, जिनसे वह सारा वृक्षसमूह घिर गया है ॥१४ ॥

किमेतज्ज्ञातुमिच्छामि सखे कौतूहलं मम ।

कौतूहलापनयनं कर्तुमिच्छाम्यहं त्वया ॥ १५ ॥

' सखे! यह कौन - सा वन है, यह मैं जानना चाहता हूँ । इसके लिये मेरे मनमें बड़ा कौतूहल है । मैं चाहता हूँ कि तुम्हारे द्वारा मेरे इस कौतूहलका निवारण हो ' ॥ १५ ॥

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा राघवस्य महात्मनः ।

गच्छन्नेवाचचक्षेऽथ सुग्रीवस्तन्महद् वनम् ॥१६ ॥

महात्मा रघुनाथजीकी यह बात सुनकर सुग्रीवने चलते-चलते ही उस विशाल वनके विषयमें बताना आरम्भ किया ।

एतद् राघव विस्तीर्णमाश्रमं श्रमनाशनम् ।

उद्यानवनसम्पन्नं स्वादुमूलफलोदकम् ॥ १७ ॥

' रघुनन्दन! यह एक विस्तृत आश्रम है, जो सबके श्रमका निवारण करनेवाला है । यह उद्यानों और उपवनोंसे युक्त है । यहाँ स्वादिष्ट फल - मूल और जल सुलभ होते हैं ।

अत्र सप्तजना नाम मुनयः संशितव्रताः ।

सप्तैवासन्नधः शीर्षा नियतं जलशायिनः ॥ १८ ॥

‘ इस आश्रममें सप्तजन नामसे प्रसिद्ध सात ही मुनि रहते थे, जो कठोर व्रतके पालनमें तत्पर थे । वे नीचे सिर करके तपस्या करते थे । नियमपूर्वक रहकर जलमें शयन करनेवाले थे ॥ १८ ॥

सप्तरात्रे कृताहारा वायुनाचलवासिनः ।

दिवं वर्षशतैर्याताः सप्तभिः सकलेवराः ॥ १ ९ ॥

' सात दिन और सात रात व्यतीत करके वे केवल वायुका आहार करते थे तथा एक स्थानपर निश्चल भावसे रहते थे । इस प्रकार सात सौ वर्षोंतक तपस्या करके वे सशरीर स्वर्गलोकको चले गये ॥ १ ९ ॥

पृष्ठ 795

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किष्किन्धाकाण्डे चतुर्दशः सर्गः ७८३

तेषामेतत्प्रभावेण द्रुमप्राकारसंवृतम् ।

आश्रमं सुदुराधर्षमपि सेन्द्रैः सुरासुरैः ॥ २० ॥

' उन्हींके प्रभावसे सघन वृक्षोंकी चहारदीवारीसे घिरा हुआ यह आश्रम इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओं और असुरोंके लिये भी अत्यन्त दुर्धर्ष बना हुआ है ॥ २० ॥

पक्षिणो वर्जयन्त्येतत् तथान्ये वनचारिणः ।

विशन्ति मोहाद् येऽप्यत्र न निवर्तन्ति ते पुनः ॥ २१ ॥

' पक्षी तथा दूसरे वनचर जीव इसे दूरसे ही त्याग देते हैं । जो मोहवश इसके भीतर प्रवेश करते हैं, वे फिर कभी नहीं लौटते हैं ॥ २१ ॥

विभूषणरवाश्चात्र श्रूयन्ते सकलाक्षराः ।

तूर्यगीतस्वनश्चापि गन्धो दिव्यश्च राघव ॥ २२ ॥

‘ रघुनन्दन! यहाँ मधुर अक्षरवाली वाणीके साथ -साथ आभूषणोंकी झनकारें भी सुनी जाती हैं । वाद्य और गीतकी मधुर ध्वनि भी कानोंमें पड़ती है और दिव्य सुगन्धका भी अनुभव होता है ॥ २२ ॥

त्रेताग्नयोऽपि दीप्यन्ते धूमो ह्येष प्रदृश्यते ।

वेष्टयन्निव वृक्षाग्रान् कपोताङ्गारुणो घनः ॥ २३ ॥

' यहाँ आहवनीय आदि त्रिविध अग्नियाँ भी प्रज्वलित होती हैं । यह कबूतरके अंगोंकी भाँति धूसर रंगवाला घना धूम उठता दिखायी देता है, जो वृक्षोंकी शिखाओंको आवेष्टित - सा कर रहा है ॥ २३ ॥

एते वृक्षाः प्रकाशन्ते धूमसंसक्तमस्तकाः ।

मेघजालप्रतिच्छन्ना वैडूर्यगिरयो यथा ॥ २४ ॥

' जिनके शिखाओंपर होम - धूम छा रहे हैं, वे ये वृक्ष मेघसमूहोंसे आच्छादित हुए नीलमके पर्वतोंकी भाँति प्रकाशित हो रहे हैं ॥ २४ ॥

कुरु प्रणामं धर्मात्मंस्तेषामुद्दिश्य राघव ।

लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा प्रयतः संहताञ्जलिः ॥ २५ ॥

' धर्मात्मा रघुनन्दन! आप मनको एकाग्र करके दोनों हाथ जोड़कर भाई लक्ष्मणके साथ उन मुनियोंके उद्देश्यसे प्रणाम कीजिये ॥ २५ ॥

प्रणमन्ति हि ये तेषामृषीणां भावितात्मनाम् ।

न तेषामशुभं किंचिच्छरीरे राम विद्यते ॥ २६ ॥

' श्रीराम! जो उन पवित्र अन्तःकरणवाले ऋषियोंको प्रणाम करते हैं, उनके शरीरमें किंचिन्मात्र भी अशुभ नहीं रह जाता है ' ॥ २६ ॥

ततो रामः सह भ्रात्रा लक्ष्मणेन कृताञ्जलिः ।

मुद्द महात्मानस्तानृषीनभ्यवादयत् ॥ २७ ॥

तब भाई लक्ष्मणसहित श्रीरामने हाथ जोड़कर उन महात्मा ऋषियोंके उद्देश्यसे प्रणाम किया ॥२७ ॥

अभिवाद्य च धर्मात्मा रामो भ्राता च लक्ष्मणः ।

सुग्रीवो वानराश्चैव जम्मुः संहृष्टमानसाः ॥ २८ ॥

धर्मात्मा श्रीराम, उनके छोटे भाई लक्ष्मण, सुग्रीव तथा अन्य सभी वानर उन ऋषियोंको प्रणाम करके प्रसन्नचित्त हो आगे बढ़े ॥ २८ ॥

ते गत्वा दूरमध्वानं तस्मात् सप्तजनाश्रमात् ।

ददृशुस्तां दुराधर्षां किष्किन्धां वालिपालिताम् ॥ २ ९ ॥

उस सप्तजनाश्रमसे दूरतकका मार्ग तय कर लेनेके पश्चात् उन सबने ततस्तु पुरीं तदनन्तर वानर, जिनका शस्त्र लेकर वालीद्वारा सुरक्षित किष्किन्धापुरीको देखा ॥ रामानुजरामवानराः प्रगृह्य शस्त्राण्युदितोग्रतेजसः । सुरेशात्मजवीर्यपालितां वधाय शत्रोः पुनरागतास्त्विह ॥ ३० ॥

श्रीरामके छोटे भाई लक्ष्मण, श्रीराम तथा उग्रतेज उदित हुआ था, हाथोंमें अस्त्र-इन्द्रकुमार वालीके पराक्रमसे पालित किष्किन्धापुरीमें शत्रुवधके निमित्त पुनः आ पहुँचे ॥ ३० ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे त्रयोदशः सर्गः ॥१३ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामयाण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें तेरहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १३ ॥

चतुर्दशः सर्गः वाली - वधके लिये श्रीरामका आश्वासन पाकर सुग्रीवकी विकट गर्जना सर्वे ते त्वरितं गत्वा किष्किन्धां वालिनः पुरीम् । विसार्य सर्वतो दृष्टिं कानने काननप्रियः । वृक्षैरात्मानमावृत्य व्यतिष्ठन् गहने वने ॥ १ ॥ सुग्रीवो विपुलग्रीवः क्रोधमाहारयद् भृशम् ॥२ ॥

वे सब लोग शीघ्रतापूर्वक वालीकी किष्किन्धापुरीमें वनके प्रेमी विशाल ग्रीवावाले सुग्रीवने उस वनमें पहुँचकर एक गहन वनमें वृक्षोंकी ओटमें अपने चारों ओर दृष्टि दौड़ायी और अपने मनमें अत्यन्त आपको छिपाकर खड़े हो गये ॥ १ ॥ क्रोधका संचय किया ॥ २ ॥

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७८४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे

ततस्तु निनदं घोरं कृत्वा युद्धाय चाह्वयत् ।

परिवारैः परिवृतो नादैर्भिन्दन्निवाम्बरम् ॥ ३ ॥

तदनन्तर अपने सहायकोंसे घिरे हुए उन्होंने अपने सिंहनादसे आकाशको फाड़ते हुए - से घोर गर्जना की और वालीको युद्धके लिये ललकारा ॥ ३ ॥

गर्जन्निव महामेघो वायुवेगपुरःसरः ।

अथ बालार्कसदृशो दृप्तसिंहगतिस्ततः ॥ ४ ॥

उस समय सुग्रीव वायुके वेगके साथ गर्जते हुए महामेघके समान जान पड़ते थे । अपनी अङ्गकान्ति और प्रतापके द्वारा प्रातःकालके सूर्यकी भाँति प्रकाशित होते थे । उनकी चाल दर्पभरे सिंहके समान प्रतीत होती थी ॥ ४ ॥

दृष्ट्वा रामं क्रियादक्षं सुग्रीवो वाक्यमब्रवीत् ।

हरिवागुरया व्याप्तां तप्तकाञ्चनतोरणाम् ॥ ५ ॥

प्राप्ताः स्म ध्वजयन्त्राढ्यां किष्किन्धां वालिनः पुरीम् ।

प्रतिज्ञा या कृता वीर त्वया वालिवधे पुरा ॥ ६ ॥

सफलां कुरु तां क्षिप्रं लतां काल इवागतः । कार्यकुशल श्रीरामचन्द्रजीकी ओर देखकर सुग्रीवने कहा — ' भगवन्! वालीकी यह किष्किन्धापुरी तपाये हुए सुवर्णके द्वारा निर्मित नगरद्वारसे सुशोभित है । इसमें सब ओर वानरोंका जाल - सा बिछा हुआ है तथा यह ध्वजों और यन्त्रोंसे सम्पन्न है । हम सब लोग इस पुरीमें आ पहुँचे हैं । वीर! आपने पहले वाली वधके लिये जो प्रतिज्ञा की थी, उसे अब शीघ्र सफल कीजिये । ठीक उसी तरह जैसे आया हुआ अनुकूल समय लताको फल - फूलसे सम्पन्न कर देता है ' ॥ ५-६३ ॥ एवमुक्तस्तु धर्मात्मा सुग्रीवेण स राघवः ॥ ७ ॥

तमेवोवाच वचनं सुग्रीवं शत्रुसूदनः । सुग्रीवके ऐसा कहनेपर शत्रुसूदन धर्मात्मा श्रीरघुनाथजीने फिर अपनी पूर्वोक्त बातको दुहराते हुए ही सुग्रीवसे कहा - ॥७३ ॥

कृताभिज्ञानचिह्नस्त्वमनया गजसाह्वया ॥ ८ ॥ ।

लक्ष्मणेन समुत्पाट्य एषा कण्ठे कृता तव ।

शोभसेऽप्यधिकं वीर लतया कण्ठसक्तया ॥ ९ ॥

विपरीत इवाकाशे सूर्यो नक्षत्रमालया । ' वीर! अब तो इस गजपुष्पी लताके द्वारा तुमने अपनी पहचानके लिये चिह्न धारण कर ही लिया है । लक्ष्मणने इसे उखाड़कर तुम्हारे कण्ठमें पहना ही दिया है । तुम कण्ठमें धारण की हुई इस लताके द्वारा बड़ी शोभा पा रहे हो । जिस प्रकार सूर्यमंडल आकाशमें नक्षत्रमालासे घिरकर सुशोभित होता है उसी प्रकार इस कण्ठ - लम्बिनी लतासे सुशोभित होनेवाले तुम्हारी उस सूर्यसे तुलना हो सकती है ॥ ८ - ९ ३ ॥ अद्य वालिसमुत्थं ते भयं वैरं च वानर ॥ १० ॥

एकेनाहं प्रमोक्ष्यामि बाणमोक्षेण संयुगे । ' वानरराज! आज मैं वालीसे उत्पन्न हुए तुम्हारे भय और वैर दोनोंको युद्धस्थलमें एक ही बार बाण छोड़कर मिटा दूँगा ॥ १०३ ॥

मम दर्शय सुग्रीव वैरिणं भ्रातृरूपिणम् ॥११ ॥

वाली विनिहतो यावद्वने पांसुषु चेष्टते । ' सुग्रीव! तुम मुझे अपने उस भ्रातारूपी शत्रुको दिखा तो दो । फिर वाली मारा जाकर वनके भीतर धूलमें लोटता दिखायी देगा ॥११ ॥

यदि दृष्टिपथं प्राप्तो जीवन् स विनिवर्तते ॥ १२ ॥

ततो दोषेण मागच्छेत् सद्यो गर्हेच्च मां भवान् । ' यदि मेरी दृष्टिमें पड़ जानेपर भी वह जीवित लौट जाय तो तुम मुझे दोषी समझना और तत्काल जी भरकर मेरी निन्दा करना ॥ १२३ ॥

प्रत्यक्षं सप्त ते साला मया बाणेन दारिताः ॥ १३ ॥

तेनावेहि बलेनाद्य वालिनं निहतं रणे । ' तुम्हारी आँखोंके सामने मैंने अपने एक ही बाणसे सात सालके वृक्ष विदीर्ण किये थे, मेरे उसी बलसे आज समराङ्गणमें ( एक बाणसे ही ) तुम वालीको मारा गया समझो ॥ १३३ ॥

अनृतं नोक्तपूर्वं मे चिरं कृच्छ्रेऽपि तिष्ठता ॥ १४ ॥

धर्मलोभपरीतेन न च वक्ष्ये कथंचन ।

सफलां च करिष्यामि प्रतिज्ञां जहि संभ्रमम् ॥ १५ ॥

' बहुत समयसे संकट झेलते रहनेपर भी मैं कभी झूठ नहीं बोला हूँ । मेरे किसी तरह मैं झूठ तो प्रतिज्ञाको भी अवश्य और घबराहटको अपने प्रसूतं कलमक्षेत्रं तदाह्वाननिमित्तं च सुग्रीव कुरु तं शब्दं ' जैसे इन्द्र वर्षा फलसे सम्पन्न करते हैं, मनमें धर्मका लोभ है । इसलिये बोलूँगा ही नहीं । साथ ही अपनी सफल करूँगा । अतः तुम भय हृदयसे निकाल दो ॥ १४-१५ ॥

वर्षेणेव शतक्रतुः ।

वालिनो हेममालिनः ॥ १६ ॥

निष्पतेद् येन वानरः । करके उगे हुए धानके खेतको उसी तरह मैं भी बाणका प्रयोग करके वालीके वधद्वारा तुम्हारा मनोरथ पूर्ण करूँगा । इसलिये सुग्रीव! तुम सुवर्णमालाधारी वालीको बुलानेके लिये इस समय ऐसी गर्जना करो, जिससे तुम्हारा सामना करनेके लिये वह वानर नगरसे बाहर निकल आये ॥ १६३ ॥

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किष्किन्धाकाण्डे जितकाशी जयश्लाघी त्वया चाधर्षितः पुरात् ॥ १७ ॥ ।

निष्पतिष्यत्यसङ्गेन वाली स प्रियसंयुगः । ' वह अनेक युद्धोंमें विजय पाकर विजयश्रीसे सुशोभित हुआ है । सबपर विजय पानेकी इच्छा रखता है और उसने कभी तुमसे हार नहीं खायी है । इसके अलावे युद्धसे उसका बड़ा प्रेम है, अतः वाली कहीं भी आसक्त न होकर नगरके बाहर अवश्य निकलेगा ॥ रिपूणां धर्षितं श्रुत्वा मर्षयन्ति न संयुगे ॥ १८ ॥

जानन्तस्तु स्वकं वीर्यं स्त्रीसमक्षं विशेषतः । ' क्योंकि अपने पराक्रमको जाननेवाले वीर पुरुष, विशेषतः स्त्रियोंके सामने, युद्धके लिये शत्रुओंके तिरस्कारपूर्ण शब्द सुनकर कदापि सहन नहीं करते हैं ' ॥ स तु रामवचः श्रुत्वा सुग्रीवो हेमपिङ्गलः ॥ १ ९ ॥ ननर्द क्रूरनादेन विनिर्भिन्दन्निवाम्बरम् । श्रीरामचन्द्रजीकी यह बात सुनकर सुवर्णके समान पिङ्गलवर्णवाले सुग्रीवने आकाशको विदीर्ण - सा करते हुए कठोर स्वरमें बड़ी भयंकर गर्जना की ॥ १ ९ ३ ॥ तत्र शब्देन वित्रस्ता गावो यान्ति हतप्रभाः ॥ २० ॥

राजदोषपरामृष्टाः कुलस्त्रिय इवाकुलाः । पञ्चदशः सर्गः ७८५ उस सिंहनादसे भयभीत हो बड़े - बड़े बैल शक्तिहीन हो राजाके दोषसे परपुरुषोंद्वारा पकड़ी जानेवाली कुलाङ्गनाओंके समान व्याकुलचित्त हो सब ओर भाग चले ॥

द्रवन्ति च मृगाः शीघ्रं भग्ना इव रणे हयाः ।

पतन्ति च खगा भूमौ क्षीणपुण्या इव ग्रहाः ॥ २१ ॥

मृग युद्धस्थलमें अस्त्र - शस्त्रोंकी चोट खाकर भागे हुए घोड़ोंके समान तीव्र गतिसे भागने लगे और पक्षी जिनके पुण्य नष्ट हो गये हैं, ऐसे ग्रहोंके समान आकाशसे पृथ्वीपर गिरने लगे ॥२१ ॥

ततः जीमूतकृतप्रणादो नादं ह्यमुञ्चत् त्वरया प्रतीतः । सूर्यात्मजः शौर्यविवृद्धतेजाः सरित्पतिर्वाऽनिलचञ्चलोर्मिः ॥ २२ ॥

तदनन्तर जिनका सिंहनाद मेघकी गर्जनाके समान गम्भीर था और शौर्यके द्वारा जिनका तेज बढ़ा हुआ था, वे सुविख्यात सूर्यकुमार सुग्रीव बड़ी उतावलीके साथ बारंबार गर्जना करने लगे, मानो वायुके वेगसे चञ्चल हुई उत्ताल तरङ्ग - मालाओंसे सुशोभित सरिताओंका स्वामी समुद्र कोलाहल कर रहा हो ॥ २२ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे चतुर्दशः सर्गः ॥ १४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें चौदहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १४ ॥

पञ्चदशः सर्गः सुग्रीवकी गर्जना सुनकर वालीका युद्धके लिये निकलना और ताराका उसे रोककर सुग्रीव और श्रीरामके साथ मैत्री कर लेनेके लिये समझाना

अथ तस्य निनादं तं सुग्रीवस्य महात्मनः ।

शुश्रावान्तःपुरगतो वाली भ्रातुरमर्षणः ॥ १ ॥ ।

उस समय अमर्षशील वाली अपने अन्तःपुरमें था । उसने अपने भाई महामना सुग्रीवका वह सिंहनाद वहींसे सुना ॥१ ॥

श्रुत्वा तु तस्य निनदं सर्वभूतप्रकम्पनम् ।

मदश्चैकपदे नष्टः क्रोधश्चापादितो महान् ॥ २ ॥

समस्त प्राणियोंको कम्पित कर देनेवाली उनकी वह गर्जना सुनकर उसका सारा मद सहसा उतर गया और उसे महान् क्रोध उत्पन्न हुआ ॥२ ॥

ततो रोषपरीताङ्गो वाली स कनकप्रभः ।

उपरक्त इवादित्यः सद्यो निष्प्रभतां गतः ॥ ३ ॥

फिर तो सुवर्णके समान पीले रंगवाले वालीका

सारा शरीर क्रोधसे तमतमा उठा । वह राहुग्रस्त सूर्यके ।

समान तत्काल श्रीहीन दिखायी देने लगा ॥ ३ ॥

वाली दंष्ट्राकरालस्तु क्रोधाद् दीप्ताग्निलोचनः ।

भात्युत्पतितपद्माभः समृणाल इव हृदः ॥४ ॥

वालीकी दाढ़ें विकराल थीं, नेत्र क्रोधके कारण प्रज्वलित अग्रिके समान उद्दीप्त हो रहे थे । वह उस तालाब समान श्रीहीन दिखायी देता था, जिसमें कमलपुष्पोंकी शोभा तो नष्ट हो गयी हो और केवल मृणाल रह गये हों ॥

शब्दं दुर्मर्षणं श्रुत्वा निष्पपात ततो हरिः ।

वेगेन च पदन्यासैर्दारयन्निव मेदिनीम् ॥५ ॥

वह दु: सह शब्द सुनकर वाली अपने पैरोंकी धमकसे पृथ्वीको विदीर्ण - सी करता हुआ बड़े वेगसे निकला ॥ ५ ॥

तं तु तारा परिष्वज्य स्नेहाद् दर्शितसौहृदा ।

उवाच त्रस्तसम्भ्रान्ता हितोदर्कमिदं वचः ॥६ ॥

उस समय वालीकी पत्नी तारा भयभीत हो घबरा

पृष्ठ 798

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७८६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे उठी । उसने वालीको अपनी दोनों भुजाओंमें भर लिया । और स्नेहसे सौहार्दका परिचय देते हुए परिणाममें हित करनेवाली यह बात कही - ॥ ६ ॥

साधु क्रोधमिमं वीर नदीवेगमिवागतम् ।

शयनादुत्थितः काल्यं त्यज भुक्तामिव स्रजम् ॥ ७ ॥

' वीर! मेरी अच्छी बात सुनिये और सहसा आये हुए नदीके वेगकी भाँति इस बढ़े हुए क्रोधको त्याग दीजिये । जैसे प्रात: काल शय्यासे उठा हुआ पुरुष रातको उपभोगमें लायी गयी पुष्पमालाका त्याग कर देता है; उसी प्रकार इस क्रोधका परित्याग कीजिये ॥ ७ ॥

काल्यमेतेन संग्रामं करिष्यसि च वानर ।

वीर ते शत्रुबाहुल्यं फल्गुता वा न विद्यते ॥ ८ ॥

सहसा तव निष्क्रामो मम तावन्न रोचते ।

श्रूयतामभिधास्यामि यन्निमित्तं निवार्यते ॥ ९ ॥

' वानरवीर! कल प्रात: काल सुग्रीवके साथ युद्ध कीजियेगा ( इस समय रुक जाइये ) यद्यपि युद्धमें कोई शत्रु आपसे बढ़कर नहीं है और आप किसीसे छोटे नहीं हैं । तथापि इस समय सहसा आपका घरसे बाहर निकलना मुझे अच्छा नहीं लगता है, आपको रोकनेका एक विशेष कारण भी है । उसे बताती हूँ, सुनिये ॥ ८ - ९ ॥

पूर्वमापतितः क्रोधात् स त्वामाह्वयते युधि ।

निष्पत्य च निरस्तस्ते हन्यमानो दिशो गतः ॥ १० ॥

' सुग्रीव पहले भी यहाँ आये थे और क्रोधपूर्वक उन्होंने आपको युद्धके लिये ललकारा था । उस समय आपने नगरसे निकलकर उन्हें परास्त किया और वे आपकी मार खाकर सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर भागते हुए मतङ्ग वनमें चले गये थे ॥१० ॥

त्वया तस्य निरस्तस्य पीडितस्य विशेषतः ।

इहैत्य पुनराह्वानं शङ्कां जनयतीव मे ॥ ११ ॥

' इस प्रकार आपके द्वारा पराजित और विशेष पीड़ित होनेपर भी वे पुनः यहाँ आकर आपको युद्धके लिये ललकार रहे हैं । उनका यह पुनरागमन मेरे मनमें शङ्का - सी उत्पन्न कर रहा है ॥ ११ ॥

दर्पश्च व्यवसायश्च यादृशस्तस्य नर्दतः ।

निनादस्य च संरम्भो नैतदल्पं हि कारणम् ॥ १२ ॥

' इस समय गर्जते हुए सुग्रीवका दर्प और उद्योग जैसा दिखायी देता है तथा उनकी गर्जनामें जो उत्तेजना जान पड़ती है, इसका कोई छोटा - मोटा कारण नहीं होना चाहिये ॥ १२ ॥

नासहायमहं मन्ये सुग्रीवं तमिहागतम् ।

अवष्टब्धसहायश्च यमाश्रित्यैष गर्जति ॥ १३ ॥

' मैं समझती हूँ सुग्रीव किसी प्रबल सहायकके बिना अबकी बार यहाँ नहीं आये हैं । किसी सबल सहायकको साथ लेकर ही आये हैं, जिसके बलपर ये इस तरह गरज रहे हैं ॥ १३ ॥

प्रकृत्या निपुणश्चैव बुद्धिमांश्चैव वानरः ।

नापरीक्षितवीर्येण सुग्रीवः सख्यमेष्यति ॥ १४ ॥

' वानर सुग्रीव स्वभावसे ही कार्यकुशल और बुद्धिमान् हैं । वे किसी ऐसे पुरुषके साथ मैत्री नहीं करेंगे, जिसके बल और पराक्रमको अच्छी तरह परख न लिया हो ॥ १४ ॥

पूर्वमेव मया वीर श्रुतं कथयतो वचः ।

अङ्गदस्य कुमारस्य वक्ष्याम्यद्य हितं वचः ॥ १५ ॥

' वीर! मैंने पहले ही कुमार अङ्गदके मुँहसे यह बात सुन ली है । इसलिये आज मैं आपके हितकी बात बताती हूँ ॥

अङ्गदस्तु कुमारोऽयं वनान्तमुपनिर्गतः ।

प्रवृत्तिस्तेन कथिता चारैरासीन्निवेदिता ॥ १६ ॥

' एक दिन कुमार अङ्गद वनमें गये थे । वहाँ गुप्तचरोंने उन्हें एक समाचार बताया, जो उन्होंने यहाँ आकर मुझसे भी कहा था ॥ १६ ॥

अयोध्याधिपतेः पुत्रौ शूरौ समरदुर्जयौ ।

इक्ष्वाकूणां कुले जातौ प्रथितौ रामलक्ष्मणौ ॥ १७ ॥

' वह समाचार इस प्रकार है - अयोध्यानरेशके दो शूर - वीर पुत्र, जिन्हें युद्धमें जीतना अत्यन्त कठिन है, जिनका जन्म इक्ष्वाकुकुलमें हुआ है तथा जो श्रीराम और लक्ष्मणके नामसे प्रसिद्ध हैं, यहाँ वनमें आये हुए हैं ॥ १७ ॥

सुग्रीवप्रियकामार्थं प्राप्तौ तत्र दुरासदौ ।

स ते भ्रातुर्हि विख्यातः सहायो रणकर्मणि ॥ १८ ॥

रामः परबलामर्दी युगान्ताग्निरिवोत्थितः ।

निवासवृक्षः साधूनामापन्नानां परा गतिः ॥ १ ९ ॥

' वे दोनों दुर्जय वीर सुग्रीवका प्रिय करनेके लिये उनके पास पहुँच गये हैं । उन दोनोंमेंसे जो आपके भाईके युद्ध - कर्ममें सहायक बताये गये हैं, वे श्रीराम शत्रुसेनाका संहार करनेवाले तथा प्रलयकालमें प्रज्वलित हुई अग्निके समान तेजस्वी हैं । वे साधु पुरुषोंके आश्रयदाता कल्पवृक्ष हैं और संकटमें पड़े हुए प्राणियोंके लिये सबसे बड़ा सहारा हैं ॥ १८-१९ ॥

आर्तानां संश्रयश्चैव यशसश्चैकभाजनम् ।

ज्ञानविज्ञानसम्पन्नो निदेशे निरतः पितुः ॥ २० ॥

' आर्त पुरुषोंके आश्रय, यशके एकमात्र भाजन,

पृष्ठ 799

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किष्किन्धाकाण्डे षोडशः सर्गः ७८७

ज्ञान - विज्ञानसे सम्पन्न तथा पिताकी आज्ञामें स्थित ।

रहनेवाले हैं ॥२० ॥

धातूनामिव शैलेन्द्रो गुणानामाकरो महान् ।

तत् क्षमो न विरोधस्ते सह तेन महात्मना ॥ २१ ॥

दुर्जयेनाप्रमेयेण रामेण रणकर्मसु । ‘ जैसे गिरिराज हिमालय नाना धातुओंकी खान है, उसी प्रकार श्रीराम उत्तम गुणोंके बहुत बड़े भंडार हैं । अतः उन महात्मा रामके साथ आपका विरोध करना कदापि उचित नहीं है । क्योंकि वे युद्धकी कलामें अपना सानी नहीं रखते हैं । उनपर विजय पाना अत्यन्त कठिन है ॥ २१३ ॥

शूर वक्ष्यामि ते किंचिन्न चेच्छाम्यभ्यसूयितुम् ॥ २२ ॥

श्रूयतां क्रियतां चैव तव वक्ष्यामि यद्धितम् । ' शूरवीर! मैं आपके गुणोंमें दोष देखना नहीं चाहती । अतः आपसे कुछ कहती हूँ । आपके लिये जो हितकर है,

वही बता रही हूँ । आप उसे सुनिये और वैसा ही कीजिये ॥

यौवराज्येन सुग्रीवं तूर्णं साध्वभिषेचय ॥ २३ ॥

विग्रहं मा कृथा वीर भ्रात्रा राजन् यवीयसा । ' अच्छा यही होगा कि आप सुग्रीवका शीघ्र ही युवराजके पदपर अभिषेक कर दीजिये । वीर वानरराज! सुग्रीव आपके छोटे भाई हैं, उनके साथ युद्ध न कीजिये ॥ अहं हि ते क्षमं मन्ये तेन रामेण सौहृदम् ॥ २४ ॥

सुग्रीवेण च सम्प्रीतिं वैरमुत्सृज्य दूरतः । ' मैं आपके लिये यही उचित समझती हूँ कि आप वैरभावको दूर हटाकर श्रीरामके साथ सौहार्द और सुग्रीवके साथ प्रेमका सम्बन्ध स्थापित कीजिये ॥ २४३ ॥

लालनीयो हि ते भ्राता यवीयानेष वानरः ॥ २५ ॥

तत्र वा सन्निहस्थो वा सर्वथा बन्धुरेव ते ।

नहि तेन समं बन्धुं भुवि पश्यामि कंचन ॥२६ ॥

' वानर सुग्रीव आपके छोटे भाई हैं । अतः आपका लाड़ - प्यार पानेके योग्य हैं । वे ऋष्यमूकपर रहें या किष्किन्धामें — सर्वथा आपके बन्धु ही हैं । मैं इस भूतलपर उनके समान बन्धु और किसीको नहीं देखती हूँ ॥

दानमानादिसत्कारैः कुरुष्व प्रत्यनन्तरम् ।

वैरमेतत् समुत्सृज्य तव पार्श्वे स तिष्ठतु ॥ २७ ॥

' आप दान -मान आदि सत्कारोंके द्वारा उन्हें अपना अत्यन्त अन्तरङ्ग बना लीजिये, जिससे वे इस वैरभावको छोड़कर आपके पास रह सकें ॥ २७ ॥

सुग्रीवो विपुलग्रीवो महाबन्धुर्मतस्तव ।

भ्रातृसौहृदमालम्ब्य नान्या गतिरिहास्ति ते ॥ २८ ॥

' पुष्ट ग्रीवावाले सुग्रीव आपके अत्यन्त प्रेमी बन्धु हैं, ऐसा मेरा मत है । इस समय भ्रातृप्रेमका सहारा लेनेके सिवा आपके लिये यहाँ दूसरी कोई गति नहीं है ॥ २८ ॥

यदि ते मत्प्रियं कार्यं यदि चावैषि मां हिताम् ।

याच्यमानः प्रियत्वेन साधु वाक्यं कुरुष्व मे ॥ २ ९ ॥

' यदि आपको मेरा प्रिय करना हो तथा आप मुझे अपनी हितकारिणी समझते हों तो मैं प्रेमपूर्वक याचना करती हूँ, आप मेरी यह नेक सलाह मान लीजिये ॥ २ ९ ॥ प्रसीद पथ्यं शृणु जल्पितं हि मे न रोषमेवानुविधातुमर्हसि । क्षमो हि ते कोशलराजा न विग्रहः शक्रसमानतेजसा ॥ ३० ॥

' स्वामिन्! आप प्रसन्न होइये । मैं आपके हितकी बात कहती हूँ । आप इसे ध्यान देकर सुनिये । केवल रोषका ही अनुसरण न कीजिये । कोसलराजकुमार श्रीराम इन्द्रके समान तेजस्वी हैं । उनके साथ वैर बाँधना या युद्ध छेड़ना आपके लिये कदापि उचित नहीं है ' ॥ तदा हि तारा हितमेव वाक्यं तं वालिनं पथ्यमिदं बभाषे । न रोचते तद् वचनं हि तस्य कालाभिपन्नस्य विनाशकाले ॥ ३१ ॥

उस समय ताराने वालीसे उसके हितकी ही बात कही थी और यह लाभदायक भी थी । किंतु उसकी बात उसे नहीं रुची । क्योंकि उसके विनाशका समय । निकट था और वह कालके पाशमें बँध चुका था ॥ ३१ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे पञ्चदशः सर्गः ॥ १५ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें पंद्रहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १५ ॥

षोडशः सर्गः वालीका ताराको डाँटकर लौटाना और सुग्रीवसे जूझना तथा श्रीरामके बाणसे घायल होकर पृथ्वीपर गिरना तामेवं ब्रुवतीं तारां ताराधिपनिभाननाम् । तारापति चन्द्रमाके समान मुखवाली ताराको ऐसी बातें वाली निर्भर्त्सयामास वचनं चेदमब्रवीत् ॥ १॥ | करती देख वालीने उसे फटकारा और इस प्रकार कहा—

पृष्ठ 800

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १, पृष्ठ 800 का मूल पृष्ठ
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७८८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे

गर्जतोऽस्य सुसंरब्धं भ्रातुः शत्रोर्विशेषतः ।

मर्षयिष्यामि केनापि कारणेन वरानने ॥ २ ॥

‘ वरानने! इस गर्जते हुए भाईकी, जो विशेषतः मेरा शत्रु है, यह उत्तेजनापूर्ण चेष्टा मैं किस कारणसे सहन करूँगा ॥२ ॥

अधर्षितानां शूराणां समरेष्वनिवर्तिनाम् ।

धर्षणामर्षणं भीरु मरणादतिरिच्यते ॥ ३ ॥

' भीरु! जो कभी परास्त नहीं हुए और जिन्होंने युद्धके अवसरोंपर कभी पीठ नहीं दिखायी, उन शूरवीरोंके लिये शत्रुकी ललकार सह लेना मृत्युसे भी बढ़कर दुःखदायी होता है ॥ ३ ॥

सोढुं न च समर्थोऽहं युद्धकामस्य संयुगे ।

सुग्रीवस्य च संरम्भं हीनग्रीवस्य गर्जितम् ॥ ४ ॥

‘ यह हीन ग्रीवावाला सुग्रीव संग्रामभूमिमें मेरे साथ युद्धकी इच्छा रखता है । मैं इसके रोषावेश और गर्जन-तर्जनको सहन करनेमें असमर्थ हूँ ॥ ४ ॥

न च कार्यो विषादस्ते राघवं प्रति मत्कृते ।

धर्मज्ञश्च कृतज्ञश्च कथं पापं करिष्यति ॥ ५ ॥

‘ श्रीरामचन्द्रजीकी बात सोचकर भी तुम्हें मेरे लिये विषाद नहीं करना चाहिये । क्योंकि वे धर्मके ज्ञाता तथा

कर्तव्याकर्तव्यको समझनेवाले हैं । अतः पाप कैसे करेंगे ॥

निवर्तस्व सह स्त्रीभिः कथं भूयोऽनुगच्छसि ।

सौहृदं दर्शितं तावन्मयि भक्तिस्त्वया कृता ॥ ६ ॥

प्रतियोत्स्याम्यहं गत्वा सुग्रीवं जहि सम्भ्रमम् ।

दर्पं चास्य विनेष्यामि न च प्राणैर्वियोक्ष्यते ॥ ७ ॥

' तुम इन स्त्रियोंके साथ लौट जाओ । क्यों मेरे पीछे बार - बार आ रही हो । तुमने मेरे प्रति अपना स्नेह दिखाया । भक्तिका भी परिचय दे दिया । अब जाओ, घबराहट छोड़ो । मैं आगे बढ़कर सुग्रीवका सामना करूँगा । उसके घमण्डको

चूर - चूर कर डालूँगा । किंतु प्राण नहीं लूंगा ॥ ६-७ ॥

अहं ह्याजिस्थितस्यास्य करिष्यामि यदीप्सितम् ।

वृक्षैर्मुष्टिप्रहारैश्च पीडितः प्रतियास्यति ॥ ८ ॥

' युद्धके मैदानमें खड़े हुए सुग्रीवकी जो - जो इच्छा है, उसे मैं पूर्ण करूँगा । वृक्षों और मुक्कोंकी मारसे पीड़ित होकर वह स्वयं ही भाग जायगा ॥ ८ ॥

न मे गर्वितमायस्तं सहिष्यति दुरात्मवान् ।

कृतं तारे सहायत्वं दर्शितं सौहृदं मयि ॥ ९ ॥

' तारे! दुरात्मा सुग्रीव मेरे युद्धविषयक दर्प और आयास ( उद्योग ) को नहीं सह सकेगा । तुमने मेरी बौद्धिक सहायता अच्छी तरह कर दी और मेरे प्रति अपना सौहार्द भी दिखा दिया ॥ ९ ॥

शापितासि मम प्राणैर्निवर्तस्व जनेन च ।

अलं जित्वा निवर्तिष्ये तमहं भ्रातरं रणे ॥ १० ॥

' अब मैं प्राणोंकी सौगन्ध दिलाकर कहता हूँ कि अब तुम इन स्त्रियोंके साथ लौट जाओ । अब अधिक कहनेकी आवश्यकता नहीं है, मैं युद्धमें अपने उस भाईको जीतकर लौट आऊँगा ' ॥१० ॥

तं तु तारा परिष्वज्य वालिनं प्रियवादिनी ।

चकार रुदती मन्दं दक्षिणा सा प्रदक्षिणम् ॥ ११ ॥

यह सुनकर अत्यन्त उदार स्वभाववाली तारा वालीका आलिङ्गन करके मन्द स्वरमें रोते - रोते उसकी परिक्रमा की ॥ ११ ॥

ततः स्वस्त्ययनं कृत्वा मन्त्रविद् विजयैषिणी ।

अन्तःपुरं सह स्त्रीभिः प्रविष्टा शोकमोहिता ॥ १२ ॥

वह पतिकी विजय चाहती थी और उसे मन्त्रका भी ज्ञान था । इसलिये उसने वालीकी मङ्गल - कामनासे स्वस्तिवाचन किया और शोकसे मोहित हो वह अन्य स्त्रियोंके साथ अन्तःपुरको चली गयी ॥ १२ ॥

प्रविष्टायां तु तारायां सह स्त्रीभिः स्वमालयम् ।

नगर्या निर्ययौ क्रुद्धो महासर्प इव श्वसन् ॥ १३ ॥

स्त्रियोंसहित ताराके अपने महलमें चले जानेपर वाली क्रोधसे भरे हुए महान् सर्पकी भाँति लम्बी साँस खींचता हुआ नगरसे बाहर निकला ॥ १३ ॥

स निःश्वस्य महारोषो वाली परमवेगवान् ।

सर्वतश्चारयन् दृष्टिं शत्रुदर्शनकांक्षया ॥ १४ ॥

महान् रोषसे युक्त और अत्यन्त वेगशाली वाली लम्बी साँस छोड़कर शत्रुको देखनेकी इच्छासे चारों ओर अपनी दृष्टि दौड़ाने लगा ॥ १४ ॥

स ददर्श ततः श्रीमान् सुग्रीवं हेमपिङ्गलम् ।

सुसंवीतमवष्टब्धं दीप्यमानमिवानलम् ॥ १५ ॥

इतनेहीमें श्रीमान् वालीने सुवर्णके समान पिङ्गल वर्णवाले सुग्रीवको देखा, जो लँगोट बाँधकर युद्धके लिये डटकर खड़े थे और प्रज्वलित अग्निके समान प्रकाशित हो रहे थे ॥१५ ॥

तं स दृष्ट्वा महाबाहुः सुग्रीवं पर्यवस्थितम् ।

गाढं परिदधे वासो वाली परमकोपनः ॥ १६ ॥

सुग्रीवको खड़ा देख महाबाहु वाली अत्यन्त कुपित हो उठा । उसने अपना लँगोट भी दृढ़ताके साथ बाँध लिया ॥

स वाली गाढसंवीतो मुष्टिमुद्यम्य वीर्यवान् ।

सुग्रीवमेवाभिमुखो ययाँ योदधुं कृतक्षणः ॥ १७ ॥