वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ — पृष्ठ 801–810
वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 801–810
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किष्किन्धाकाण्डे षोडशः सर्गः ७८ ९ लँगोटको मजबूतीके साथ कसकर पराक्रमी । वाली प्रहारका अवसर देखता हुआ मुक्का तानकर सुग्रीवकी ओर चला ॥ १७ ॥
श्लिष्टं मुष्टिं समुद्यम्य संरब्धतरमागतः ।
सुग्रीवोऽपि समुद्दिश्य वालिनं हेममालिनम् ॥ १८ ॥
सुग्रीव भी सुवर्णमालाधारी वालीके उद्देश्यसे बँधा हुआ मुक्का ताने बड़े आवेशके साथ उसकी ओर बढ़े ॥
तँ वाली क्रोधताम्राक्षः सुग्रीवं रणकोविदम् ।
आपतन्तं महावेगमिदं वचनमब्रवीत् ॥ १ ९ ॥
युद्धकलाके पण्डित महावेगशाली सुग्रीवको अपनी ओर आते देख वालीकी आँखें क्रोधसे लाल हो गयीं और वह इस प्रकार बोला – ॥ १ ९ ॥
एष मुष्टिर्महान् बद्धो गाढः सुनियताङ्गुलिः ।
मया वेगविमुक्तस्ते प्राणानादाय यास्यति ॥ २० ॥
' सुग्रीव! देख ले । यह बड़ा भारी मुक्का खूब कसकर बँधा हुआ है । इसमें सारी अङ्गुलियाँ सुनियन्त्रितरूपसे परस्पर सटी हुई हैं । मेरे द्वारा वेगपूर्वक चलाया हुआ यह मुक्का तेरे प्राण लेकर ही जायगा ' ॥ २० ॥
एवमुक्तस्तु सुग्रीवः क्रुद्धो वालिनमब्रवीत् ।
तव चैष हरन् प्राणान् मुष्टिः पततु मूर्धनि ॥ २१ ॥ ।
वालीके ऐसा कहनेपर सुग्रीव क्रोधपूर्वक उससे बोले – ' मेरा यह मुक्का भी तेरे प्राण लेनेके लिये तेरे मस्तकपर गिरे ' ॥ २१ ॥
ताडितस्तेन तं क्रुद्धः समभिक्रम्य वेगतः ।
अभवच्छोणितोद्गारी सापीड इव पर्वतः ॥ २२ ॥
इतनेहीमें वालीने वेगपूर्वक आक्रमण करके सुग्रीवपर मुक्केका प्रहार किया । उस चोटसे घायल एवं कुपित हुए सुग्रीव झरनोंसे युक्त पर्वतकी भाँति मुँहसे रक्त वमन करने लगे ॥ २२ ॥
सुग्रीवेण तु निःशङ्कं सालमुत्पाट्य तेजसा ।
गात्रेष्वभिहतो वाली वज्रेणैव महागिरिः ॥ २३ ॥
तत्पश्चात् सुग्रीवने भी निःशङ्क होकर बलपूर्वक एक सालवृक्षको उखाड़ लिया और उसे वालीके शरीरपर दे मारा, मानो इन्द्रने किसी विशाल पर्वतपर वज्रका प्रहार किया हो ॥ २३ ॥
स तु वृक्षेण निर्भग्नः सालताडनविह्वलः ।
गुरुभारभराक्रान्ता नौः ससार्थेव सागरे ॥ २४ ॥
उस वृक्षकी चोटसे वालीके शरीरमें घाव हो गया । उस आघातसे विह्वल हुआ वाली व्यापारियोंके समूहके चढ़नेसे भारी भारकै द्वारा दबकर समुद्रमें डगमगाती हुई नौकाके समान काँपने लगा ॥ २४ ॥
तौ भीमबलविक्रान्तौ सुपर्णसमवेगितौ ।
प्रवृद्धौ घोरवपुषौ चन्द्रसूर्याविवाम्बरे ॥ २५ ॥
उन दोनों भाइयोंका बल और पराक्रम भयंकर था । दोनोंके ही वेग गरुड़के समान थे । वे दोनों भयंकर रूप धारण करके बड़े जोरसे जूझ रहे थे और पूर्णिमाके आकाशमें चन्द्रमा और सूर्यके समान दिखायी देते थे ॥
परस्परममित्रघ्नौ छिद्रान्वेषणतत्परौ ।
ततोऽवर्धत वाली तु बलवीर्यसमन्वितः ॥ २६ ॥
सूर्यपुत्रो महावीर्यः सुग्रीवः परिहीयत । वे शत्रुसूदन वीर अपने विपक्षीको मार डालनेकी इच्छासे एक - दूसरेकी दुर्बलता ढूँढ़ रहे थे; परंतु उस युद्धमें बल - विक्रमसम्पन्न वाली बढ़ने लगा और महापराक्रमी सूर्यपुत्र सुग्रीवकी शक्ति क्षीण होने लगी ॥ वालिना भग्नदर्पस्तु सुग्रीवो मन्दविक्रमः ॥ २७ ॥
वालिनं प्रति सामर्षो दर्शयामास राघवम् । वालीने सुग्रीवका घमण्ड चूर्ण कर दिया । उनका पराक्रम मन्द पड़ने लगा । तब वालीके प्रति अमर्षमें भरे हुए सुग्रीवने श्रीरामचन्द्रजीको अपनी अवस्थाका लक्ष्य कराया ॥ २७३ ॥
वृक्षैः सशाखैः शिखरैर्वज्रकोटिनिभैर्नखैः ॥ २८ ॥
मुष्टिभिर्जानुभिः पद्भिर्बाहुभिश्च पुनः पुनः ।
तयोर्युद्धमभूद्घोरं वृत्रवासवयोरिव ॥ २ ९ ॥
इसके बाद डालियोंसहित वृक्षों, पर्वतके शिखरों, वज्रके समान भयंकर नखों, मुक्कों, घुटनों, लातों और हाथोंकी मारसे उन दोनोंमें इन्द्र और वृत्रासुरकी भाँति भयंकर संग्राम होने लगा ॥ २ ९ ॥
तौ शोणिताक्तौ युध्येतां वानरौ वनचारिणौ ।
मेघाविव महाशब्दैस्तर्जमानौ परस्परम् ॥३० ॥
वे दोनों वनचारी वानर लहूलुहान होकर लड़ रहे थे और दो बादलोंकी तरह अत्यन्त भयंकर गर्जना करते हुए एक - दूसरेको डाँट रहे थे ॥३० ॥
हीयमानमथापश्यत् सुग्रीवं वानरेश्वरम् ।
प्रेक्षमाणं दिशश्चैव राघवः स मुहुर्मुहुः ॥ ३१ ॥
श्रीरघुनाथजीने देखा, वानरराज सुग्रीव कमजोर पड़ रहे हैं और बारंबार इधर - उधर दृष्टि दौड़ा रहे हैं ॥ ३१ ॥
ततो रामो महातेजा आर्तं दृष्ट्वा हरीश्वरम् ।
स शरं वीक्षते वीरो वालिनो वधकांक्षया ॥३२ ॥
| वानरराजको पीड़ित देख महातेजस्वी श्रीरामने । वालीके वधकी इच्छासे अपने बाणपर दृष्टिपात किया ॥
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७ ९ ० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे
ततो धनुषि संधाय शरमाशीविषोपमम् ।
पूरयामास तच्चापं कालचक्रमिवान्तकः ॥ ३३ ॥
उन्होंने अपने धनुषपर विषधर सर्पके समान भयंकर बाण रखा और उसे जोरसे खींचा, मानो यमराजने कालचक्र उठा लिया हो ॥ ३३ ॥
तस्य ज्यातलघोषेण त्रस्ताः पत्ररथेश्वराः ।
प्रदुद्रुवुर्मृगाश्चैव युगान्त इव मोहिताः ॥ ३४ ॥
उसकी प्रत्यञ्चाकी टङ्कारध्वनिसे भयभीत हो बड़े-बड़े पक्षी और मृग भाग खड़े हुए । वे प्रलयकालके समय मोहित हुए जीवोंके समान किंकर्तव्यविमूढ़ हो गये ॥ ३४ ॥
मुक्तस्तु वज्रनिर्घोषः प्रदीप्ताशनिसंनिभः ।
राघवेण महाबाणो वालिवक्षसि पातितः ॥ ३५ ॥
श्रीरघुनाथजीने वज्रकी भाँति गड़गड़ाहट और प्रज्वलित अशनिकी भाँति प्रकाश पैदा करनेवाला वह महान् बाण छोड़ दिया तथा उसके द्वारा वालीके वक्षःस्थलपर चोट पहुँचायी ॥ ३५ ॥
ततस्तेन महातेजा वीर्ययुक्तः कपीश्वरः ।
वेगेनाभिहतो वाली निपपात महीतले ॥ ३६ ॥
उस बाणसे वेगपूर्वक आहत हो महातेजस्वी पराक्रमी वानरराज वाली तत्काल पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ३६ ॥
इन्द्रध्वज इवोद्भूतः पौर्णमास्यां महीतले ।
आश्वयुक्समये मासि गतश्रीको विचेतनः ।
बाष्पसंरुद्धकण्ठस्तु वाली चार्तस्वरः शनैः ॥ ३७ ॥
आश्विनकी पूर्णिमाके दिन इन्द्रध्वजोत्सवके अन्तमें ऊपर फेंका गया इन्द्रध्वज जैसे पृथ्वीपर गिर पड़ता है, उसी प्रकार वाली ग्रीष्मऋतुके अन्तमें श्रीहीन, अचेत और आँसुओंसे गद्गदकण्ठ हो धराशायी हो गया और धीरे - धीरे आर्तनाद करने लगा ॥ ३७ ॥
नरोत्तमः कालयुगान्तकोपमं शरोत्तमं काञ्चनरूप्यभूषितम् । ससर्ज तममित्रमर्दनं सधूममग्निं मुखतो यथा हरः ॥ ३८ ॥
श्रीरामका वह उत्तम बाण युगान्तकालके समान भयंकर तथा सोने - चाँदीसे विभूषित था । पूर्वकालमें महादेवजीने जैसे अपने मुखसे ( मुख - मण्डलके अन्तर्गत ललाटवर्ती नेत्रसे ) शत्रुभूत कामदेवका नाश करनेके लिये धूमयुक्त अग्निकी सृष्टि की थी, उसी प्रकार पुरुषोत्तम श्रीरामने सुग्रीवशत्रु वालीका मर्दन करनेके लिये उस प्रज्वलित बाणको छोड़ा था ॥ ३८ ॥
अथोक्षितः शोणिततोयविस्रवैः सुपुष्पिताशोक इवानिलोद्धतः । विचेतनो वासवसूनुराहवे प्रभ्रंशितेन्द्रध्वजवत् क्षितिं गतः ॥ ३ ९ ॥ इन्द्रकुमार वालीके शरीरसे पानीके समान रक्तकी धारा बहने लगी । वह उससे नहा गया और अचेत हो वायुके उखाड़े हुए पुष्पित अशोकवृक्ष एवं आकाशसे नीचे गिरे हुए इन्द्रध्वजके समान समराङ्गणमें पृथ्वीपर | गिर पड़ा ॥ ३ ९ ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे षोडशः सर्गः ॥ १६ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें सोलहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १६ ॥
सप्तदशः सर्गः वालीका श्रीरामचन्द्रजीको फटकारना
ततः शरेणाभिहतो रामेण रणकर्कशः ।
पपात सहसा वाली निकृत्त इव पादपः ॥ १ ॥
युद्धमें कठोरता दिखानेवाला वाली श्रीरामके बाणसे घायल हो कटे वृक्षकी भाँति सहसा पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥
भूमौ न्यस्तसर्वाङ्गस्तप्तकाञ्चनभूषणः ।
स अपतद् देवराजस्य मुक्तरश्मिरिव ध्वजः ॥ २ ॥
उसका सारा शरीर पृथ्वीपर पड़ा हुआ था । तपाये हुए सुवर्णके आभूषण अब भी उसकी शोभा बढ़ा रहे थे । वह देवराज इन्द्रके बन्धनरहित ध्वजकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ा था ॥ २ ॥
अस्मिन् निपतिते भूमौ हर्वृक्षाणां गणेश्वरे ।
नष्टचन्द्रमिव व्योम न व्यराजत मेदिनी ॥ ३ ॥
वानरों और भालुओंके यूथपति वालीके धराशायी हो जानेपर यह पृथ्वी चन्द्ररहित आकाशकी भाँति शोभाहीन हो गयी ॥ ३ ॥
भूमौ निपतितस्यापि तस्य देहं महात्मनः ।
न श्रीर्जहाति न प्राणा न तेजो न पराक्रमः ॥ ४ ॥
पृथ्वीपर पड़े होनेपर भी महामना वा शरीरको शोभा, प्राण, तेज और पराक्रम नहीं छोड़ सके थे ॥४ ॥
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किष्किन्धाकाण्डे
शक्रदत्ता वरा माला काञ्चनी रत्नभूषिता ।
दधार हरिमुख्यस्य प्राणांस्तेजः श्रियं च सा ॥ ५ ॥
इन्द्रकी दी हुई रत्नजटित श्रेष्ठ सुवर्णमाला उस वानरराजके प्राण, तेज और शोभाको धारण किये हुए थी ॥
स तया मालया वीरो हैमया हरियूथपः ।
संध्यानुगतपर्यन्तः पयोधर इवाभवत् ॥ ६ ॥
उस सुवर्णमालासे विभूषित हुआ वानरयूथपति वीर वाली संध्याकी लालीसे रँगे हुए प्रान्त भागवाले मेघखण्डके समान शोभा पा रहा था ॥६ ॥
तस्य माला च देहश्च मर्मघाती च यः शरः ।
त्रिधेव रचिता लक्ष्मीः पतितस्यापि शोभते ॥ ७ ॥ ।
पृथ्वीपर गिरे होनेपर भी वालीकी वह सुवर्णमाला, उसका शरीर तथा मर्मस्थलको विदीर्ण करनेवाला वह बाण – ये तीनों पृथक् - पृथक् तीन भागों में विभक्त की हुई अङ्गलक्ष्मीके समान शोभा पा रहे थे ॥७ ॥
तदस्त्रं तस्य वीरस्य स्वर्गमार्गप्रभावनम् ।
रामबाणासनक्षिप्तमावहत् परमां गतिम् ॥ ८ ॥
वीरवर श्रीरामके धनुषसे चलाये गये उस अस्त्रने वालीके लिये स्वर्गका मार्ग प्रकाशित कर दिया और उसे परमपदको पहुँचा दिया ॥८ ॥
तं तथा पतितं संख्ये गतार्चिषमिवानलम् । ।
ययातिमिव पुण्यान्ते देवलोकादिह च्युतम् ॥ ९ ॥
आदित्यमिव कालेन युगान्ते भुवि पातितम् ।
महेन्द्रमिव दुर्धर्षमुपेन्द्रमिव दुःसहम् ॥ १० ॥
महेन्द्रपुत्रं पतितं वालिनं हेममालिनम् ।
व्यूढोरस्कं महाबाहुं दीप्तास्यं हरिलोचनम् ॥ ११ ॥
इस प्रकार युद्धस्थलमें गिरा हुआ इन्द्रपुत्र वाली ज्वालारहित अग्निके समान, पुण्योंका क्षय होनेपर पुण्यलोकसे इस पृथ्वीपर गिरे हुए राजा ययातिके समान तथा महाप्रलयके समय कालद्वारा पृथ्वीपर गिराये गये । सूर्यके समान जान पड़ता था । उसके गलेमें सोनेकी माला शोभा दे रही थी । वह महेन्द्रके समान दुर्जय और भगवान् विष्णुके समान दुस्सह था । उसकी छाती चौड़ी, भुजाएँ बड़ी - बड़ी, मुख दीप्तिमान् और नेत्र कपिलवर्णके थे ॥ ९ -११ ॥
लक्ष्मणानुचरो रामो ददर्शोपससर्प च ।
तं तथा पतितं वीरं गतार्चिषमिवानलम् ॥ १२ ॥
बहुमान्य च तं वीरं वीक्षमाणं शनैरिव ।
उपयातौ महावीर्यौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥ १३ ॥
सप्तदशः सर्गः ७ ९ १ लक्ष्मणको साथ लिये श्रीरामने वालीको इस अवस्थामें देखा और वे उसके समीप गये । इस प्रकार ज्वालारहित अग्निकी भाँति वहाँ गिरा हुआ वह वीर धीरे - धीरे देख रहा था । महापराक्रमी दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण उस वीरका विशेष सम्मान करते हुए उसके पास गये ॥ १२-१३ ॥
तं दृष्ट्वा राघवं वाली लक्ष्मणं च महाबलम् ।
अब्रवीत् परुषं वाक्यं प्रश्रितं धर्मसंहितम् ॥ १४ ॥
उन श्रीराम तथा महाबली लक्ष्मणको देखकर वाली धर्म और विनयसे युक्त कठोर वाणीमें बोला— ॥ १४ ॥
स भूमावल्पतेजोऽसुर्निहतो नष्टचेतनः ।
अर्थसंहितया वाचा गर्वितं रणगर्वितम् ॥ १५ ॥
अब उसमें तेज और प्राण स्वल्पमात्रामें ही रह गये थे । वह बाणसे घायल होकर पृथ्वीपर पड़ा था और उसकी चेष्टा धीरे - धीरे लुप्त होती जा रही थी । उसने युद्धमें गर्वयुक्त पराक्रम प्रकट करनेवाले गर्वीले श्रीरामसे कठोर वाणीमें इस प्रकार कहना आरम्भ किया- ॥ १५ ॥
त्वं नराधिपतेः पुत्रः प्रथितः प्रियदर्शनः ।
पराङ्मुखवधं कृत्वा कोऽत्र प्राप्तस्त्वया गुणः ।
यदहं युद्धसंरब्धस्त्वत्कृते निधनं गतः ॥ १६ ॥
रघुनन्दन! आप राजा दशरथके सुविख्यात पुत्र हैं । आपका दर्शन सबको प्रिय है । मैं आपसे युद्ध करने नहीं आया था । मैं तो दूसरेके साथ युद्धमें उलझा हुआ था । उस दशामें आपने मेरा वध करके यहाँ कौन-सा गुण प्राप्त किया है - किस महान् यशका उपार्जन किया है? क्योंकि मैं युद्धके लिये दूसरेपर रोष प्रकट कर रहा था, किंतु आपके कारण बीचमें ही मृत्युको प्राप्त हुआ ॥१६ ॥
कुलीनः सत्त्वसम्पन्नस्तेजस्वी चरितव्रतः ।
रामः करुणवेदी च प्रजानां च हिते रतः ॥ १७ ॥
सानुक्रोशो महोत्साहः समयज्ञो दृढव्रतः ।
इत्येतत् सर्वभूतानि कथयन्ति यशो भुवि ॥१८ ॥
इस भूतलपर सब प्राणी आपके यशका वर्णन करते हुए कहते हैं— श्रीरामचन्द्रजी कुलीन, सत्त्वगुणसम्पन्न, तेजस्वी, उत्तम व्रतका आचरण करनेवाले, करुणाका अनुभव करनेवाले, प्रजाके हितैषी, दयालु, महान् उत्साही, समयोचित कार्य एवं सदाचारके ज्ञाता और
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७ ९ २ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे दृढ़प्रतिज्ञ हैं ॥ १७-१८ ॥
दमः शमः क्षमा धर्मो धृतिः सत्यं पराक्रमः ।
पार्थिवानां गुणा राजन् दण्डश्चाप्यपकारिषु ॥ १ ९ ॥
' राजन्! इन्द्रियनिग्रह, मनका संयम, क्षमा, धर्म, धैर्य, सत्य, पराक्रम तथा अपराधियोंको दण्ड देना-ये राजाके गुण हैं ॥१ ९ ॥
तान् गुणान् सम्प्रधार्याहमग्र्यं चाभिजनं तव ।
तारया प्रतिषिद्धः सन् सुग्रीवेण समागतः ॥ २० ॥
' मैं आपमें इन सभी सद्गुणोंका विश्वास करके आपके उत्तम कुलको यादकर ताराके मना करनेपर भी सुग्रीवके साथ लड़ने आ गया ॥ २० ॥
न मामन्येन संरब्धं प्रमत्तं वेद्धुमर्हसि ।
इति मे बुद्धिरुत्पन्ना बभूवादर्शने तव ॥ २१ ॥
जबतक मैंने आपको नहीं देखा था, तबतक मेरे मनमें यही विचार उठता था कि दूसरेके साथ रोषपूर्वक जुझते हुए मुझको आप असावधान अवस्थामें अपने बाणसे बेधना उचित नहीं समझेंगे ॥ २१ ॥
स त्वां विनिहतात्मानं धर्मध्वजमधार्मिकम् ।
जाने पापसमाचारं तृणैः कूपमिवावृतम् ॥ २२ ॥
' परंतु आज मुझे मालूम हुआ कि आपकी बुद्धि मारी गयी है । आप धर्मध्वजी हैं । दिखावेके लिये धर्मका चोला पहने हुए हैं । वास्तवमें अधर्मी हैं । आपका आचार - व्यवहार पापपूर्ण है । आप घास - फूससे ढके हुए कूपके समान धोखा देनेवाले हैं ॥२२ ॥
सतां वेषधरं पापं प्रच्छन्नमिव पावकम् ।
नाहं त्वामभिजानामि धर्मच्छद्माभिसंवृतम् ॥ २३ ॥
' आपने साधु पुरुषोंका - सा वेश धारण कर रखा है; परंतु हैं पापी । राखसे ढकी हुई आगके समान आपका असली रूप साधु - वेषमें छिप गया है । मैं नहीं जानता था कि आपने लोगोंको छलनेके लिये ही धर्मकी आड़ ली है ॥ २३ ॥
विषये वा पुरे वा ते यदा पापं करोम्यहम् ।
न च त्वामवजानेऽहं कस्मात् तं हंस्यकिल्बिषम् ॥ २४ ॥
' जब मैं आपके राज्य या नगरमें कोई उपद्रव नहीं कर रहा था तथा आपका भी तिरस्कार नहीं करता था, तब आपने मुझ निरपराधको क्यों मारा? ॥ २४ ॥
फलमूलाशनं नित्यं वानरं वनगोचरम् ।
मामिहाप्रतियुध्यन्तमन्येन च समागतम् ॥ २५ ॥
' मैं सदा फल - मूलका भोजन करनेवाला और वनमें ही विचरनेवाला वानर हूँ । मैं यहाँ आपसे युद्ध नहीं करता था, दूसरेके साथ मेरी लड़ाई हो रही थी । फिर बिना अपराधके आपने मुझे क्यों मारा? ॥ २५ ॥
त्वं नराधिपतेः पुत्रः प्रतीतः प्रियदर्शनः ।
लिङ्गमप्यस्ति ते राजन् दृश्यते धर्मसंहितम् ॥२६ ॥
‘ राजन्! आप एक सम्माननीय नरेशके पुत्र हैं । विश्वासके योग्य हैं और देखनेमें भी प्रिय हैं । आपमें धर्मका साधनभूत चिह्न ( जटा ) वल्कल धारण आदि भी प्रत्यक्ष दिखायी देता है ॥ २६ ॥
कः क्षत्रियकुले जातः श्रुतवान् नष्टसंशयः ।
धर्मंलिङ्गप्रतिच्छन्नः क्रूरं कर्म समाचरेत् ॥ २७ ॥
' क्षत्रियकुलमें उत्पन्न शास्त्रका ज्ञाता, संशयरहित तथा धार्मिक वेश - भूषासे आच्छन्न होकर भी कौन मनुष्य ऐसा क्रूरतापूर्ण कर्म कर सकता है ॥२७ ॥
त्वं राघवकुले जातो धर्मवानिति विश्रुतः ।
अभव्यो भव्यरूपेण किमर्थं परिधावसे ॥ २८ ॥
' महाराज! रघुके कुलमें आपका प्रादुर्भाव हुआ है । आप धर्मात्माके रूपमें प्रसिद्ध हैं तो भी इतने अभव्य ( क्रूर ) निकले! यदि यही आपका असली रूप है तो फिर किसलिये ऊपरसे भव्य ( विनीत एवं दयालु ) साधु पुरुषका - सा रूप धारण करके चारों ओर दौड़ते - फिरते हैं? ॥ २८ ॥
साम दानं क्षमा धर्मः सत्यं धृतिपराक्रमौ ।
पार्थिवानां गुणा राजन् दण्डश्चाप्यपकारिषु ॥ २ ९ ॥
' राजन्! साम, दान, क्षमा, धर्म, सत्य, धृति, पराक्रम और अपराधियोंको देना — ये भूपालोंके | गुण हैं ॥ २ ९ ॥
वयं वनचरा राम मृगा मूलफलाशिनः ।
एषा प्रकृतिरस्माकं पुरुषस्त्वं नरेश्वर ॥ ३० ॥
‘ नरेश्वर राम! हम फल - मूल खानेवाले वनचारी मृग हैं । यही हमारी प्रकृति है; किंतु आप तो पुरुष ( मनुष्य ) हैं ( अतः हमारे और आपमें वैरका कोई कारण नहीं है ) ॥ ३० ॥
भूमिर्हिरण्यं रूपं च विग्रहे कारणानि च ।
तत्र कस्ते वने लोभो मदीयेषु फलेषु वा ॥ ३१ ॥
' पृथ्वी, सोना और चाँदी— इन्हीं वस्तुओंके लिये राजाओंमें परस्पर युद्ध होते हैं । ये ही तीन कलहके मूल कारण हैं । परंतु यहाँ वे भी नहीं हैं । इस दिशामें इस वनमें या हमारे फलोंमें आपका क्या
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किष्किन्धाकाण्डे लोभ हो सकता है ॥ ३१ ॥
नयश्च विनयश्चोभौ निग्रहानुग्रहावपि ।
राजवृत्तिरसंकीर्णा न नृपाः कामवृत्तयः ॥ ३२ ॥
' नीति और विनय, दण्ड और अनुग्रह- ये राजधर्म हैं, किंतु इनके उपयोगके भिन्न - भिन्न अवसर हैं ( इनका अविवेकपूर्वक उपयोग करना उचित नहीं हैं ) । राजाओंको स्वेच्छाचारी नहीं होना चाहिये ॥ ३२ ॥
त्वं तु कामप्रधानश्च कोपनश्चानवस्थितः ।
राजवृत्तेषु संकीर्णः शरासनपरायणः ॥ ३३ ॥
" परंतु आप तो कामके गुलाम, क्रोधी और मर्यादामें स्थित न रहनेवाले - चञ्चल हैं । नय - विनय आदि जो राजाओंके धर्म हैं, उनके अवसरका विचार
किये बिना ही किसीका कहीं भी प्रयोग कर देते हैं ।
जहाँ कहीं भी बाण चलाते - फिरते हैं ॥ ३३ ॥
न तेऽस्त्यपचितिर्धर्मे नार्थे बुद्धिरवस्थिता ।
इन्द्रियैः कामवृत्तः सन् कृष्यसे मनुजेश्वर ॥ ३४ ॥
' आपका धर्मके विषयमें आदर नहीं है और न अर्थसाधनमें ही आपकी बुद्धि स्थिर है । नरेश्वर! आप स्वेच्छाचारी हैं । इसलिये आपकी इन्द्रियाँ आपको कहीं भी खींच ले जाती हैं ॥ ३४ ॥
हत्वा बाणेन काकुत्स्थ मामिहानपराधिनम् ।
किं वक्ष्यसि सतां मध्ये कर्म कृत्वा जुगुप्सितम् ॥ ३५ ॥
' काकुत्स्थ! मैं सर्वथा निरपराध था तो भी यहाँ । मुझे बाणसे मारनेका घृणित कर्म करके सत्पुरुषोंके बीचमें आप क्या कहेंगे ॥ ३५ ॥
राजहा ब्रह्महा गोघ्नश्चोरः प्राणिवधे रतः ।
नास्तिकः परिवेत्ता च सर्वे निरयगामिनः ॥ ३६ ॥
' राजाका वध करनेवाला, ब्रह्म - हत्यारा, गोघाती, चोर, प्राणियोंकी हिंसामें तत्पर रहनेवाला, नास्तिक और परिवेत्ता ( बड़े भाईके अविवाहित रहते अपना विवाह करनेवाला छोटा भाई ) ये सब - के - सब नरकगामी होते हैं ॥ ३६ ॥
सूचकश्च कदर्यश्च मित्रघ्नो गुरुतल्पगः ।
लोकं पापात्मनामेते गच्छन्ते नात्र संशयः ॥ ३७ ॥
' चुगली खानेवाला, लोभी, मित्र - हत्यारा तथा गुरुपत्नीगामी — ये पापात्माओंके लोकमें जाते हैं-इसमें संशय नहीं है ॥ ३७ ॥
अधार्यं चर्म मे सद्धी रोमाण्यस्थि च वर्जितम् ।
अभक्ष्याणि च मांसानि त्वद्विधैर्धर्मचारिभिः ॥ ३८ ॥ ।
सप्तदशः सर्गः ७ ९ ३ ' हम वानरोंका चमड़ा भी तो सत्पुरुषोंके धारण करने योग्य नहीं होता । हमारे रोम और हड्डियाँ भी वर्जित हैं ( छूने - योग्य नहीं हैं । आप - जैसे धर्माचारी पुरुषोंके लिये मांस तो सदा ही अभक्ष्य है; फिर किस लोभसे आपने मुझ वानरको अपने बाणका शिकार बनाया है? ) ॥ ३८ ॥
पञ्च पञ्चनखा भक्ष्या ब्रह्मक्षत्रेण राघव ।
शल्यकः श्वाविधो गोधा शशः कूर्मश्च पञ्चमः ॥। ३ ९ ॥
' रघुनन्दन! त्रैवर्णिकोंमें जिनकी किसी कारणसे मांसाहार ( जैसे निन्दनीय कर्म ) में प्रवृत्ति हो गयी है, उनके लिये भी पाँच नखवाले जीवोंमेंसे पाँच ही भक्षणके योग्य बताये गये हैं । उनके नाम इस प्रकार हैं — गेंडा, साही, गोह, खरहा और पाँचवाँ कछुआ ॥ ३ ९ ॥
चर्म चास्थि च मे राम न स्पृशन्ति मनीषिणः ।
अभक्ष्याणि च मांसानि सोऽहं पञ्चनखो हतः ॥ ४० ॥
' श्रीराम! मनीषी पुरुष मेरे ( वानरके ) चमड़े और हड्डीका स्पर्श नहीं करते हैं । वानरके मांस भी सभीके लिये अभक्ष्य होते हैं । इस तरह जिसका सब कुछ निषिद्ध है, ऐसा पाँच नखवाला मैं आज आपके हाथसे मारा गया हूँ ॥४० ॥
तारया वाक्यमुक्तोऽहं सत्यं सर्वज्ञया हितम् ।
तदतिक्रम्य मोहेन कालस्य वशमागतः ॥ ४१ ॥
' मेरी स्त्री तारा सर्वज्ञ है । उसने मुझे सत्य और हितकी बात बतायी थी । किंतु मोहवश उसका उल्लङ्घन करके मैं कालके अधीन हो गया ॥ ४१ ॥
त्वया नाथेन काकुत्स्थ न सनाथा वसुंधरा ।
प्रमदा शीलसम्पूर्णा पत्येव च विधर्मणा ॥ ४२ ॥
' काकुत्स्थ! जैसे सुशीला युवती पापात्मा पतिसे सुरक्षित नहीं हो पाती, उसी प्रकार आप - जैसे स्वामीको पाकर यह वसुधा सनाथ नहीं हो सकती ॥४२ ॥
शठो नैकृतिकः क्षुद्रो मिथ्याप्रश्रितमानसः । कथं दशरथेन त्वं ' आप शठ ( करनेवाले ), अपकारी, रहनेवाले हैं । महात्मा कैसे उत्पन्न किया ॥ छिन्नचारित्र्यकक्ष्येण त्यक्तधर्माङ्कुशेनाहं ' हाय! जिसने जातः पापो महात्मना ॥ ४३ ॥
छिपे रहकर दूसरोंका अप्रिय क्षुद्र और झूठे ही शान्तचित्त बने राजा दशरथने आप - जैसे पापीको ४३ ॥
सतां धर्मातिवर्तिना ।
निहतो रामहस्तिना ॥ ४४ ॥
सदाचारका रस्सा तोड़ डाला है,
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७ ९ ४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे सत्पुरुषोंके धर्म एवं मर्यादाका उल्लङ्घन किया है तथा जिसने धर्मरूपी अङ्कुशकी भी अवहेलना कर दी है, उस रामरूपी हाथीके द्वारा आज मैं मारा गया ॥ ४४ ॥
अशुभं चाप्ययुक्तं च सतां चैव विगर्हितम् ।
वक्ष्यसे चेदृशं कृत्वा सद्भिः सह समागतः ॥ ४५ ॥
' ऐसा अशुभ, अनुचित और सत्पुरुषोंद्वारा निन्दित कर्म करके आप श्रेष्ठ पुरुषोंसे मिलनेपर उनके सामने क्या कहेंगे ॥ ४५ ॥
उदासीनेषु योऽस्मासु विक्रमोऽयं प्रकाशितः ।
अपकारिषु ते राम नैवं पश्यामि विक्रमम् ॥ ४६ ॥
' श्रीराम! हम उदासीन प्राणियोंपर आपने जो यह पराक्रम प्रकट किया है, ऐसा बल - पराक्रम आप अपना अपकार करनेवालोंपर प्रकट कर रहे हों, ऐसा मुझे नहीं दिखायी देता ॥ ४६ ॥
दृश्यमानस्तु युध्येथा मया युधि नृपात्मज ।
अद्य वैवस्वतं देवं पश्येस्त्वं निहतो मया ॥ ४७ ॥
' राजकुमार! यदि आप युद्धस्थलमें मेरी दृष्टिके
। राक्षसं च दुरात्मानं तव भार्यापहारिणम् ।
कण्ठे बद्ध्वा प्रदद्यां तेऽनिहतं रावणं रणे ॥ ५० ॥
‘ आपकी पत्नीका अपहरण करनेवाले दुरात्मा राक्षस रावणको मैं युद्धमें मारे बिना ही उसके गलेमें रस्सी बाँधकर पकड़ लाता और उसे आपके हवाले कर देता ॥
न्यस्तां सागरतोये वा पाताले वापि मैथिलीम् ।
आनयेयं तवादेशाच्छ्वेतामश्वतरीमिव ॥ ५१ ॥
' जैसे मधुकैटभद्वारा अपहृत हुई श्वेताश्वतरी श्रुतिका भगवान् हयग्रीवने उद्धार किया था, उसी प्रकार मैं आपके आदेशसे मिथिलेशकुमारी सीताको यदि वे समुद्रके जलमें या पातालमें रखी गयी होती तो भी वहाँसे ला देता ॥ ५१ ॥
युक्तं यत्प्राप्नुयाद् राज्यं सुग्रीवः स्वर्गते मयि ।
अयुक्तं यदधर्मेण त्वयाहं निहतो रणे ॥५२ ॥
' मेरे स्वर्गवासी हो जानेपर सुग्रीव जो यह राज्य प्राप्त करेंगे, वह तो उचित ही है । अनुचित इतना ही हुआ है कि आपने मुझे रणभूमिमें अधर्मपूर्वक मारा है ॥ ५२ ॥
सामने आकर मेरे साथ युद्ध करते तो आज मेरे द्वारा काममेवंविधो लोकः कालेन विनियुज्यते । मारे जाकर सूर्यपुत्र यम देवताका दर्शन करते होते ॥ ४७ ॥
त्वयादृश्येन तु रणे निहतोऽहं दुरासदः ।
प्रसुप्तः पन्नगेनैव नरः पापवशं गतः ॥ ४८ ॥
' जैसे किसी सोये हुए पुरुषको साँप आकर डँस ले और वह मर जाय उसी प्रकार रणभूमिमें मुझ दुर्जय वीरको आपने छिपे रहकर मारा है तथा ऐसा करके आप पापके भागी हुए हैं ॥ ४८ ॥
सुग्रीवप्रियकामेन यदहं निहतस्त्वया ।
मामेव यदि पूर्वं त्वमेतदर्थमचोदयः ।
मैथिलीमहमेकाला तव चानीतवान् भवेः ॥ ४ ९ ॥
' जिस उद्देश्यको लेकर सुग्रीवका प्रिय करनेकी कामनासे - आपने मेरा वध किया है, उसी उद्देश्यकी सिद्धिके लिये यदि आपने पहले मुझसे ही कहा होता तो मैं मिथिलेशकुमारी जानकीको एक ही दिनमें ढूँढ़कर आपके पास ला देता ॥ ४ ९ ॥ क्षमं चेद्भवता प्राप्तमुत्तरं साधु चिन्त्यताम् ॥ ५३ ॥
' यह जगत् कभी - न - कभी कालके अधीन होता ही है । इसका ऐसा स्वभाव ही है । अतः भले ही मेरी मृत्यु हो जाय, इसके लिये मुझे खेद नहीं है । परंतु मेरे इस तरह मारे जानेका यदि आपने उचित उत्तर ढूँढ़ निकाला हो तो उसे अच्छी तरह सोच - विचारकर कहिये ' ॥ ५३ ॥
इत्येवमुक्त्वा परिशुष्कवक्त्रः शराभिघाताद् व्यथितो महात्मा । समीक्ष्य रामं रविसंनिकाशं तूष्णीं बभौ वानरराजसूनुः ॥ ५४ ॥
ऐसा कहकर महामनस्वी वानरराजकुमार वाली सूर्यके समान तेजस्वी श्रीरामचन्द्रजीकी ओर देखकर चुप हो गया । उसका मुँह सूख गया था और बाणके आघातसे उसको बड़ी पीड़ा हो रही थी ॥ ५४ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे सप्तदशः सर्गः ॥ १७ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें सत्रहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १७ ॥
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किष्किन्धाकाण्डे अष्टादशः सर्गः ७ ९ ५ अष्टादशः सर्गः श्रीरामका वालीकी बातका उत्तर देते हुए उसे दिये गये दण्डका औचित्य बताना, वालीका निरुत्तर होकर भगवान्से अपने अपराधके लिये क्षमा माँगते हुए अङ्गदकी रक्षाके लिये प्रार्थना करना और श्रीरामका उसे आश्वासन
इत्युक्तः प्रश्रितं वाक्यं धर्मार्थसहितं हितम् ।
परुषं वालिना रामो निहतेन विचेतसा ॥ १ ॥
तं निष्प्रभमिवादित्यं मुक्ततोयमिवाम्बुदम् ।
उक्तवाक्यं हरिश्रेष्ठमुपशान्तमिवानलम् ॥ २ ॥
धर्मार्थगुणसम्पन्नं हरीश्वरमनुत्तमम् ।
अधिक्षिप्तस्तदा रामः पश्चाद् वालिनमब्रवीत् ॥ ३ ॥
वहाँ मारे जाकर अचेत हुए वालीने जब इस प्रकार विनयाभास, धर्माभास, अर्थाभास और हिताभाससे युक्त कठोर बातें कहीं, आक्षेप किया, तब उन बातोंको कहकर मौन हुए वानरश्रेष्ठ वालीसे श्रीरामचन्द्रजीने धर्म, अर्थ और श्रेष्ठ गुणोंसे युक्त परम उत्तम बात कही । उस समय वाली प्रभाहीन सूर्य, जलहीन बादल और बुझी हुई आगके समान श्रीहीन प्रतीत होता था ॥ १-३ ॥
धर्ममर्थं च कामं च समयं चापि लौकिकम् ।
अविज्ञाय कथं बाल्यान्मामिहाद्य विगर्हसे ॥ ४ ॥
( श्रीराम बोले - ) ' वानर! धर्म, अर्थ, काम और लौकिक सदाचारको तो तुम स्वयं ही नहीं जानते हो । फिर बालोचित अविवेकके कारण आज यहाँ मेरी निन्दा क्यों करते हो? ॥४ ॥
अपृष्ट्वा बुद्धिसम्पन्नान् वृद्धानाचार्यसम्मतान् ।
सौम्य वानरचापल्यात् त्वं मां वक्तुमिहेच्छसि ॥ ५ ॥
' सौम्य! तुम आचार्योंद्वारा सम्मानित बुद्धिमान् वृद्ध पुरुषोंसे पूछे बिना ही उनसे धर्मके स्वरूपको ठीक - ठीक समझे बिना ही वानरोचित चपलतावश मुझे यहाँ उपदेश देना चाहते हो? अथवा मुझपर आक्षेप करनेकी इच्छा रखते हो ॥५ ॥
इक्ष्वाकूणामियं भूमिः सशैलवनकानना ।
मृगपक्षिमनुष्याणां निग्रहानुग्रहेष्वपि ॥ ६ ॥
' पर्वत, वन और काननोंसे युक्त यह सारी पृथ्वी । इक्ष्वाकुवंशी राजाओंकी है; अतः वे यहाँके पशु - पक्षी और मनुष्योंपर दया करने और उन्हें दण्ड देनेके भी अधिकारी हैं ॥ ६ ॥
तां पालयति धर्मात्मा भरतः सत्यवानृजुः ।
धर्मकामार्थतत्त्वज्ञो निग्रहानुग्रहे रतः ॥ ७ ॥
' धर्मात्मा राजा भरत इस पृथ्वीका पालन करते हैं । देना वे सत्यवादी, सरल तथा धर्म, अर्थ और कामके तत्त्वको जाननेवाले हैं; अतः दुष्टोंके निग्रह तथा साधु पुरुषोंके प्रति अनुग्रह करनेमें तत्पर रहते हैं ॥ ७ ॥
नयश्च विनयश्चोभौ यस्मिन् सत्यं च सुस्थितम् ।
विक्रमश्च यथा दृष्टः स राजा देशकालवित् ॥ ८ ॥
' जिसमें नीति, विनय, सत्य और पराक्रम आदि सभी राजोचित गुण यथावत् रूपसे स्थित देखे जायँ, वही देश - काल - तत्त्वको जाननेवाला राजा होता है ( भरतमें ये सभी गुण विद्यमान हैं ) ॥ ८ ॥
तस्य धर्मकृतादेशा वयमन्ये च पार्थिवाः ।
चरामो वसुधां कृत्स्नां धर्मसंतानमिच्छ्वः ॥ ९ ॥
' भरतकी ओरसे हमें तथा दूसरे राजाओंको यह आदेश प्राप्त है कि जगत्में धर्मके पालन और प्रसारके लिये यत्न किया जाय । इसलिये हमलोग धर्मका प्रचार करनेकी इच्छासे सारी पृथ्वीपर विचरते रहते हैं॥९॥
तस्मिन् नृपतिशार्दूले भरते धर्मवत्सले ।
पालयत्यखिलां पृथ्वीं कश्चरेद् धर्मविप्रियम् ॥ १० ॥
' राजाओंमें श्रेष्ठ भरत धर्मपर अनुराग रखनेवाले हैं । वे समूची पृथ्वीका पालन कर रहे हैं । उनके रहते हुए इस पृथ्वीपर कौन प्राणी धर्मके विरुद्ध आचरण कर सकता है? ॥१० ॥
ते वयं मार्गविभ्रष्टं स्वधर्मे परमे स्थिताः ।
भरताज्ञां पुरस्कृत्य निगृह्णीमो यथाविधि ॥ ११ ॥
' हम सब लोग अपने श्रेष्ठ धर्ममें दृढ़तापूर्वक स्थित रहकर भरतकी आज्ञाको सामने रखते हुए धर्ममार्गसे भ्रष्ट पुरुषको विधिपूर्वक दण्ड देते हैं ॥ ११ ॥
त्वं तु संक्लिष्टधर्मश्च कर्मणा च विगर्हितः ।
कामतन्त्रप्रधानश्च न स्थितो राजवर्त्मनि ॥१२ ॥
' तुमने अपने जीवनमें कामको ही प्रधानता दे रखी थी । राजोचित मार्गपर तुम कभी स्थिर नहीं रहे । तुमने सदा ही धर्मको बाधा पहुँचायी और बुरे कर्मों कारण सत्पुरुषोंद्वारा सदा तुम्हारी निन्दा की गयी ॥१२ ॥
ज्येष्ठो भ्राता पिता वापि यश्च विद्यां प्रयच्छति ।
त्रयस्ते पितरो ज्ञेया धर्मे च पथि वर्तिनः ॥ १३ ॥
' बड़ा भाई, पिता तथा जो विद्या देता है, वह
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७ ९ ६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे
गुरु — ये तीनों धर्ममार्गपर स्थित रहनेवाले पुरुषोंके लिये ।
पिताके तुल्य माननीय हैं, ऐसा समझना चाहिये ॥ १३ ॥
यवीयानात्मनः पुत्रः शिष्यश्चापि गुणोदितः ।
पुत्रवत्ते त्रयश्चिन्त्या धर्मश्चैवात्र कारणम् ॥१४ ॥
' इसी प्रकार छोटा भाई, पुत्र और गुणवान् शिष्य — ये तीन पुत्रके तुल्य समझे जाने योग्य हैं । उनके प्रति ऐसा भाव रखनेमें धर्म ही कारण है ॥ १४ ॥
सूक्ष्मः परमदुर्ज्ञेयः सतां धर्मः प्लवङ्गम ।
हृदिस्थः सर्वभूतानामात्मा वेद शुभाशुभम् ॥ १५ ॥
' वानर! सज्जनोंका धर्म सूक्ष्म होता है, वह परम दुर्ज्ञेय है— उसे समझना अत्यन्त कठिन है । समस्त प्राणियोंके अन्तःकरणमें विराजमान जो परमात्मा हैं, वे ही सबके शुभ और अशुभको जानते हैं ॥ १५ ॥
चपलश्चपलैः सार्धं वानरैरकृतात्मभिः ।
जात्यन्ध इव जात्यन्धैर्मन्त्रयन् प्रेक्षसे नु किम् ॥ १६ ॥
' तुम स्वयं भी चपल हो और चञ्चल चित्तवाले अजितात्मा वानरोंके साथ रहते हो; अतः जैसे कोई जन्मान्ध पुरुष जन्मान्धोंसे ही रास्ता पूछे, उसी प्रकार तुम उन चपल वानरोंके साथ परामर्श करते हो, फिर तुम धर्मका विचार क्या कर सकते हो? – उसके स्वरूपको कैसे समझ सकते हो? ॥ १६ ॥
अहं तु व्यक्ततामस्य वचनस्य ब्रवीमि ते ।
नहि मां केवलं रोषात् त्वं विगर्हितुमर्हसि ॥ १७ ॥
' मैंने यहाँ जो कुछ कहा है, उसका अभिप्राय तुम्हें स्पष्ट करके बताता हूँ । तुम्हें केवल रोषवश मेरी निन्दा नहीं करनी चाहिये ॥ १७ ॥
तदेतत् कारणं पश्य यदर्थं त्वं मया हतः ।
भ्रातुर्वर्तसि भार्यायां त्यक्त्वा धर्मं सनातनम् ॥ १८ ॥
' मैंने तुम्हें क्यों मारा है? उसका कारण सुनो और समझो । तुम सनातन धर्मका त्याग करके अपने छोटे भाईकी स्त्रीसे सहवास करते हो ॥ १८ ॥
अस्य त्वं धरमाणस्य सुग्रीवस्य महात्मनः ।
रुमायां वर्तसे कामात् स्नुषायां पापकर्मकृत् ॥ १ ९ ॥
' इस महामना सुग्रीवके जीते - जी इसकी पत्नी रुमाका, जो तुम्हारी पुत्रवधूके समान है, कामवश
उपभोग करते हो । अतः पापाचारी हो ॥ १ ९ ॥
तद् व्यतीतस्य ते धर्मात् कामवृत्तस्य वानर ।
भ्रातृभार्याभिमर्शेऽस्मिन् दण्डोऽयं प्रतिपादितः ॥ २० ॥
' वानर! इस तरह तुम धर्मसे भ्रष्ट हो स्वेच्छाचारी
हो गये हो और अपने भाईकी स्त्रीको गले लगाते हो ।
तुम्हारे इसी अपराधके कारण तुम्हें यह दण्ड दिया गया है ॥
नहि लोकविरुद्धस्य लोकवृत्तादपेयुषः ।
दण्डादन्यत्र पश्यामि निग्रहं हरियूथप ॥ २१ ॥
' वानरराज! जो लोकाचारसे भ्रष्ट होकर लोकविरुद्ध आचरण करता है, उसे रोकने या राहपर लानेके लिये मैं दण्डके सिवा और कोई उपाय नहीं देखता ॥ २१ ॥
न च ते मर्षये पापं क्षत्रियोऽहं कुलोद्गतः ।
औरसीं भगिनीं वापि भार्यां वाप्यनुजस्य यः ॥२२ ॥
प्रचरेत नरः कामात् तस्य दण्डो वधः स्मृतः । ' मैं उत्तम कुलमें उत्पन्न क्षत्रिय हूँ; अतः मैं तुम्हारे पापको क्षमा नहीं कर सकता । जो पुरुष अपनी कन्या, बहिन अथवा छोटे भाईकी स्त्रीके पास काम - बुद्धिसे जाता है, उसका वध करना ही उसके लिये उपयुक्त दण्ड माना गया है ॥२२३ ॥
भरतस्तु महीपालो वयं त्वादेशवर्तिनः ॥ २३ ॥
त्वं च धर्मादतिक्रान्तः कथं शक्यमुपेक्षितुम् । ' हमारे राजा भरत हैं । हमलोग तो केवल उनके आदेशका पालन करनेवाले हैं । तुम धर्मसे गिर गये हो; अतः तुम्हारी उपेक्षा कैसे की जा सकती थी ॥ २३३ ॥
गुरुधर्मव्यतिक्रान्तं प्राज्ञो धर्मेण पालयन् ॥ २४ ॥
भरतः कामयुक्तानां निग्रहे पर्यवस्थितः । ' विद्वान् राजा भरत महान् धर्मसे भ्रष्ट हुए पुरुषको दण्ड देते और धर्मात्मा पुरुषका धर्मपूर्वक पालन करते हुए कामासक्त स्वेच्छाचारी पुरुषोंके निग्रहमें तत्पर रहते हैं ॥
वयं तु भरतादेशावधिं कृत्वा हरीश्वर ।
त्वद्विधान् भिन्नमर्यादान् निग्रहीतुं व्यवस्थिताः ॥ २५ ॥
' हरीश्वर! हमलोग तो भरतकी आज्ञाको ही प्रमाण मानकर धर्ममर्यादाका उल्लङ्घन करनेवाले तुम्हारे - जैसे लोगोंको दण्ड देनेके लिये सदा उद्यत रहते हैं ॥ २५ ॥
सुग्रीवेण च मे सख्यं लक्ष्मणेन यथा तथा ।
दारराज्यनिमित्तं च निःश्रेयस्करः स मे ॥ २६ ॥
प्रतिज्ञा च मया दत्ता तदा वानरसंनिधौ ।
प्रतिज्ञा च कथं शक्या मद्विधेनानवेक्षितुम् ॥ २७ ॥
सुग्रीवके साथ मेरी मित्रता हो चुकी है । उनके प्रति मेरा वही भाव है, जो लक्ष्मणके प्रति है । वे अपनी स्त्री और राज्यकी प्राप्तिके लिये मेरी भलाई करने के लिये भी कटिबद्ध हैं । मैंने वानरोंके समीप इन्हें स्त्री और राज्य दिलानेके लिये प्रतिज्ञा भी कर ली है । ऐसी दशामें मेरे - जैसा मनुष्य अपनी प्रतिज्ञाकी ओरसे कैसे । दृष्टि हटा सकता है ॥ २६-२७ ॥
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किष्किन्धाकाण्डे अष्टादशः सर्गः ७ ९ ७
तदेभिः कारणैः सर्वैर्महद्भिर्धर्मसंश्रितैः । अभीष्ट था ॥ ३३ ॥
शासनं तव यद् युक्तं तद् भवाननुमन्यताम् ॥ २८ ॥ अन्यैरपि कृतं पापं प्रमत्तैर्वसुधाधिपैः ।
ये सभी धर्मानुकूल महान् कारण एक साथ प्रायश्चित्तं च कुर्वन्ति तेन तच्छाम्यते रजः ॥ ३४ ॥
उपस्थित हो गये, जिनसे विवश होकर तुम्हें उचित दण्ड देना पड़ा है । तुम भी इसका अनुमोदन करो ॥ २८ ॥
सर्वथा धर्म इत्येव द्रष्टव्यस्तव निग्रहः ।
वयस्यस्योपकर्तव्यं धर्ममेवानुपश्यता ॥ २ ९ ॥
' धर्मपर दृष्टि रखनेवाले मनुष्यके लिये मित्रका उपकार करना धर्म ही माना गया है; अतः तुम्हें जो यह दण्ड दिया गया है, वह धर्मके अनुकूल है । ऐसा ही तुम्हें समझना चाहिये ॥ २ ९ ॥ शक्यं त्वयापि तत्कार्यं धर्ममेवानुवर्तता ।
श्रूयते मनुना गीतौ श्लोकौ चारित्रवत्सलौ ।
गृहीतौ धर्मकुशलैस्तथा तच्चरितं मया ॥ ३० ॥
' यदि राजा होकर तुम धर्मका अनुसरण करते तो तुम्हें भी वही काम करना पड़ता, जो मैंने किया है । मनुने राजोचित सदाचारका प्रतिपादन करनेवाले दो श्लोक कहे हैं, जो स्मृतियोंमें सुने जाते हैं और जिन्हें धर्मपालनमें कुशल पुरुषोंने सादर स्वीकार किया । उन्हींके अनुसार इस समय यह मेरा बर्ताव हुआ है ( वे श्लोक इस प्रकार हैं - ) ॥ ३० ॥
राजभिर्धृतदण्डाश्च कृत्वा पापानि मानवाः ।
निर्मलाः स्वर्गमायान्ति सन्तः सुकृतिनो यथा ॥ ३१ ॥
शासनाद् वापि मोक्षाद् वा स्तेनः पापात् प्रमुच्यते ।
राजा त्वशासन् पापस्य तदवाजोति किल्बिषम् ॥ ३२ ॥
' मनुष्य पाप करके यदि राजाके दिये हुए दण्डको भोग लेते हैं तो वे शुद्ध होकर पुण्यात्मा साधु पुरुषोंकी भाँति स्वर्गलोकमें जाते हैं । ( चोर आदि पापी जब राजाके सामने उपस्थित हों उस समय उन्हें ) राजा दण्ड दे अथवा दया करके छोड़ दे । चोर आदि पापी पुरुष अपने पापसे मुक्त हो जाता है; किंतु यदि राजा पापीको उचित दण्ड नहीं देता तो उसे स्वयं उसके पापका फल भोगना पड़ता है * ॥
आर्येण मम मान्धात्रा व्यसनं घोरमीप्सितम् ।
श्रमणेन कृते पापे यथा पापं कृतं त्वया ॥ ३३ ॥
' तुमने जैसा पाप किया है, वैसा ही पाप प्राचीन कालमें एक श्रमणने किया था । उसे मेरे पूर्वज महाराज मान्धाताने बड़ा कठोर दण्ड दिया था, जो शास्त्रके अनुसार * * मनुस्मृतिमें ये दोनों श्लोक किंचित् पाठान्तरके साथ राजभिः कृतदण्डास्तु कृत्वा पापानि मानवाः शासनाद् वा विमोक्षाद् वा स्तेनः स्तेयाद् विमुच्यते ' यदि राजा दण्ड देने में प्रमाद कर जायँ तो उन्हें दूसरोंके किये हुए पाप भी भोगने पड़ते हैं तथा उसके लिये जब वे प्रायश्चित्त करते हैं तभी उनका दोष शान्त होता है ॥ ३४ ॥
तदलं परितापेन धर्मतः परिकल्पितः ।
वधो वानरशार्दूल न वयं स्ववशे स्थिताः ॥ ३५ ॥
‘ अतः वानरश्रेष्ठ! पश्चात्ताप करनेसे कोई लाभ नहीं है । सर्वथा धर्मके अनुसार ही तुम्हारा वध किया गया है; क्योंकि हमलोग अपने वशमें नहीं हैं ( शास्त्रके ही अधीन हैं ) ॥ ३५ ॥
शृणु चाप्यपरं भूयः कारणं हरिपुंगव ।
तच्छ्रुत्वा हि महद् वीर न मन्युं कर्तुमर्हसि ॥ ३६ ॥
' वानरशिरोमणे! तुम्हारे वधका जो दूसरा कारण है, उसे भी सुन लो । वीर! उस महान् कारणको सुनकर तुम्हें मेरे प्रति क्रोध नहीं करना चाहिये ॥ ३६ ॥
न मे तत्र मनस्तापो न मन्युर्हरिपुंगव ।
वागुराभिश्च पाशैश्च कूटैश्च विविधैर्नराः ॥ ३७ ॥
प्रतिच्छन्नाश्च दृश्याश्च गृह्णन्ति सुबहून् मृगान् ।
प्रधावितान् वा वित्रस्तान् विस्त्रब्धानतिविष्ठितान् ॥ ३८ ॥
' वानरश्रेष्ठ! इस कार्यके लिये मेरे मनमें न तो संताप होता है और न खेद ही । मनुष्य ( राजा आदि ) बड़े - बड़े जाल बिछाकर फंदे फैलाकर और नाना प्रकारके कूट उपाय ( गुप्त गड्ढोंके निर्माण आदि ) करके छिपे रहकर सामने आकर बहुत - से मृगोंको पकड़ लेते हैं; भले ही वे भयभीत होकर भागते हों या विश्वस्त होकर अत्यन्त निकट बैठे हों ॥ ३८ ॥
प्रमत्तानप्रमत्तान् वा नरा मांसाशिनो भृशम् ।
विध्यन्ति विमुखांश्चापि न च दोषोऽत्र विद्यते ॥ ३ ९ ॥
' मांसाहारी मनुष्य ( क्षत्रिय ) सावधान, असावधान अथवा विमुख होकर भागनेवाले पशुओंको भी अत्यन्त घायल कर देते हैं; किंतु उनके लिये इस मृगयामें दोष नहीं होता ॥ ३ ९ ॥ यान्ति राजर्षयश्चात्र मृगयां धर्मकोविदाः ।
तस्मात् त्वं निहतो युद्धे मया बाणेन वानर ।
। अयुध्यन् प्रतियुध्यन् वा यस्माच्छाखामृगो ह्यसि ॥ ४० ॥
इस प्रकार मिलते हैं— । निर्मलाः स्वर्गमायान्ति सन्तः सुकृतिनो यथा ॥ । अशासित्वा तु तं राजा स्तेनस्याप्नोति किल्बिषम् ॥ ( ८ । ३१८,३१६ )
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७ ९ ८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे ' वानर! धर्मज्ञ राजर्षि भी इस जगत्में मृगयाके । लिये जाते हैं और विविध जन्तुओंका वध करते हैं । इसलिये मैंने तुम्हें युद्धमें अपने बाणका निशाना बनाया है । तुम मुझसे युद्ध करते थे या नहीं करते थे, तुम्हारी वध्यतामें कोई अन्तर नहीं आता; क्योंकि तुम शाखामृग हो ( और मृगया करनेका क्षत्रियको अधिकार है ) ॥ ४० ॥
दुर्लभस्य च धर्मस्य जीवितस्य शुभस्य च ।
राजानो वानरश्रेष्ठ प्रदातारो न संशयः ॥ ४१ ॥
' वानरश्रेष्ठ! राजालोग दुर्लभ धर्म, जीवन और लौकिक अभ्युदयके देनेवाले होते हैं; इसमें संशय नहीं है ॥ ४१ ॥
तान् न हिंस्यान्न चाक्रोशेन्नाक्षिपेन्नाप्रियं वदेत् ।
देवा मानुषरूपेण चरन्त्येते महीतले ॥ ४२ ॥
' अतः उनकी हिंसा न करे, उनकी निन्दा न करे, उनके प्रति आक्षेप भी न करे और न उनसे अप्रिय वचन ही बोले; क्योंकि वे वास्तवमें देवता हैं, जो मनुष्यरूपसे इस पृथ्वीपर विचरते रहते हैं ॥ ४२ ॥
त्वं तु धर्ममविज्ञाय केवलं रोषमास्थितः ।
विदूषयसि मां धर्मे पितृपैतामहे स्थितम् ॥ ४३ ॥
' तुम तो धर्मके स्वरूपको न समझकर केवल रोषके वशीभूत हो गये हो, इसलिये पिता- पितामहोंके धर्मपर स्थित रहनेवाले मेरी निन्दा कर रहे हो ' ॥ ४३ ॥
एवमुक्तस्तु रामेण वाली प्रव्यथितो भृशम् ।
न दोषं राघवे दध्यौ धर्मेऽधिगतनिश्चयः ॥४४ ॥
श्रीरामके ऐसा कहनेपर वालीके मनमें बड़ी व्यथा हुई । इसे धर्मके तत्त्वका निश्चय हो गया । उसने श्रीरामचन्द्रजीके दोषका चिन्तन त्याग दिया ॥ ४४ ॥
प्रत्युवाच ततो रामं प्राञ्जलिर्वानरेश्वरः ।
यत् त्वमात्थ नरश्रेष्ठ तत् तथैव न संशयः ॥ ४५ ॥
इसके बाद वानरराज वालीने श्रीरामचन्द्रजीसे हाथ जोड़कर कहा — ' नरश्रेष्ठ! आप जो कुछ कहते हैं, बिलकुल ठीक है; इसमें संशय नहीं है ॥ ४५ ॥
प्रतिवक्तुं प्रकृष्टे हि नापकृष्टस्तु शक्नुयात् ।
यदयुक्तं मया पूर्वं प्रमादाद् वाक्यमप्रियम् ॥ ४६ ॥
तत्रापि खलु मे दोषं कर्तुं नार्हसि राघव ।
त्वं हि दृष्टार्थतत्त्वज्ञः प्रजानां च हिते रतः ।
कार्यकारणसिद्धौ च प्रसन्ना बुद्धिरव्यया ॥ ४७ ॥
‘ आप - जैसे श्रेष्ठ पुरुषको मुझ जैसा निम्न श्रेणीका प्राणी उचित उत्तर नहीं दे सकता; अतः मैंने प्रमादवश पहले जो अनुचित बात कह डाली है, उसमें भी आपको मेरा अपराध नहीं मानना चाहिये । रघुनन्दन! आप परमार्थतत्त्वके यथार्थ ज्ञाता और प्रजाजनोंके हितमें तत्पर रहनेवाले हैं । आपकी बुद्धि कार्य - कारणके निश्चयमें निर्भ्रान्त एवं निर्मल है ।
मामप्यवगतं धर्माद् व्यतिक्रान्तपुरस्कृतम् ।
धर्मसंहितया वाचा धर्मज्ञ परिपालय ॥ ४८ ॥
' धर्मज्ञ! मैं धर्मभ्रष्ट प्राणियोंमें अग्रगण्य हूँ और इसी रूपमें मेरी सर्वत्र प्रसिद्धि है तो भी आज आप शरणमें आया हूँ । अपनी धर्मतत्त्वकी वाणीसे आज मेरी भी रक्षा कीजिये ' ॥ ४८ ॥
बाष्पसंरुद्धकण्ठस्तु वाली सार्तरवः शनैः ।
उवाच रामं सम्प्रेक्ष्य पङ्कलग्न इव द्विपः ॥ ४ ९ ॥
इतना कहते - कहते आँसुओंसे वालीका गला भर आया और वह कीचड़में फँसे हुए हाथीकी तरह आर्तनाद करके श्रीरामकी ओर देखता हुआ धीरे - धीरे बोला ॥। ४ ९ ॥
न चात्मानमहं शोचे न तारां नापि बान्धवान् ।
यथा पुत्रं गुणज्येष्ठमङ्गदं कनकाङ्गदम् ॥ ५० ॥
' भगवन्! मुझे अपने लिये, ताराके लिये तथा बन्धु - बान्धवोंके लिये भी उतना शोक नहीं होता है, जितना सुवर्णका अङ्गद धारण करनेवाले श्रेष्ठ गुणसम्पन्न पुत्र अङ्गदके लिये हो रहा है ॥५० ॥
स ममादर्शनाद् दीनो बाल्यात् प्रभृति लालितः ।
तटाक इव पीताम्बुरुपशोषं गमिष्यति ॥ ५१ ॥
' मैंने बचपनसे ही उसका बड़ा दुलार किया है; अब मुझे न देखकर वह बहुत दुःखी होगा और जिसका जल पी लिया गया हो, उस तालाबकी तरह सूख जायगा ॥
बालश्चाकृतबुद्धिश्च एकपुत्रश्च मे प्रियः ।
तारेयो राम भवता रक्षणीयो महाबलः ॥ ५२ ॥
' श्रीराम! वह अभी बालक है । उसकी बुद्धि परिपक्व नहीं हुई है । मेरा इकलौता बेटा होनेके कारण ताराकुमार अङ्गद मुझे बड़ा प्रिय है । आप मेरे उस महाबली पुत्रकी रक्षा कीजियेगा ॥ ५२ ॥
सुग्रीवे चाङ्गदे चैव विधत्स्व मतिमुत्तमाम् ।
त्वं हि गोप्ता च शास्ता च कार्याकार्यविधौ स्थितः ॥ ५३ ॥
' सुग्रीव और अङ्गद दोनोंके प्रति आप सद्भाव रखें । अब आप ही इन लोगोंके रक्षक तथा इन्हें कर्तव्य - अकर्तव्यकी शिक्षा देनेवाले हैं ॥ ५३ ॥
या ते नरपते वृत्तिर्भरते लक्ष्मणे च या ।
सुग्रीवे चाङ्गदे राजंस्तां चिन्तयितुमर्हसि ॥ ५४ ॥
' राजन्! नरेश्वर! भरत और लक्ष्मणके प्रति आपका जैसा बर्ताव है, वही सुग्रीव तथा अङ्गदके प्रति भी होना चाहिये । आप उसी भावसे इन दोनोंका स्मरण करें ॥ ५४ ॥