वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ — पृष्ठ 831–840
वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 831–840
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किष्किन्धाकाण्डे स्नातोऽयं विविधैर्गन्धैरौषधैश्च यथाविधि ॥ ६ ॥
अर्चयिष्यति माल्यैश्च रत्नैश्च त्वां विशेषतः ।
इमां गिरिगुहां रम्यामभिगन्तुं त्वमर्हसि ॥ ७ ॥
कुरुष्व स्वामिसम्बन्धं वानरान् सम्प्रहर्षय । ‘ ये शास्त्रविधिके अनुसार नाना प्रकारके सुगन्धित पदार्थों और ओषधियोंसहित जलसे राज्यपर अभिषिक्ति होकर मालाओं तथा रत्नोंद्वारा आपकी विशेष पूजा करेंगे । अतः आप इस रमणीय पर्वत गुफा किष्किन्धामें पधारनेकी कृपा करें और इन्हें इस राज्यका स्वामी बनाकर वानरोंका हर्ष बढ़ावें ' ॥ ६-७ ॥ एवमुक्तो हनुमता राघवः परवीरहा ॥ ८ ॥
प्रत्युवाच हनूमन्तं बुद्धिमान् वाक्यकोविदः । हनुमान्जीके ऐसा कहनेपर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले तथा बातचीतमें कुशल बुद्धिमान् श्रीरघुनाथजीने उन्हें यों उत्तर दिया- ॥ ८३ ॥
चतुर्दश समाः सौम्य ग्रामं वा यदि वा पुरम् ॥ ९ ॥
न प्रवेक्ष्यामि हनुमन् पितुर्निर्देशपालकः । ' हनुमन्! सौम्य! मैं पिताकी आज्ञाका पालन कर रहा हूँ, अतः चौदह वर्षोंके पूर्ण होनेतक किसी ग्राम या नगरमें प्रवेश नहीं करूँगा ॥ ९ ३ ॥ सुसमृद्धां गुहां दिव्यां सुग्रीवो वानरर्षभः ॥ १० ॥
प्रविष्टो विधिवद् वीरः क्षिप्रं राज्येऽभिषिच्यताम् । ' वानरश्रेष्ठ वीर सुग्रीव इस समृद्धिशालिनी दिव्य गुफामें प्रवेश करें और वहाँ शीघ्र ही इनका विधिपूर्वक राज्याभिषेक कर दिया जाय ' ॥ १०३ ॥
एवमुक्त्वा हनूमन्तं रामः सुग्रीवमब्रवीत् ॥ ११ ॥
वृत्तज्ञो वृत्तसम्पन्नमुदारबलविक्रमम् ।
इममप्यङ्गदं वीरं यौवराज्येऽभिषेचय ॥ १२ ॥
हनुमान्से ऐसा कहकर श्रीरामचन्द्रजी सुग्रीवसे बोले— ' मित्र! तुम लौकिक और शास्त्रीय सभी व्यवहार जानते । हो । कुमार अङ्गद सदाचारसम्पन्न तथा महान् बल - पराक्रमसे परिपूर्ण हैं । इनमें वीरता कूट - कूटकर भरी है, अतः तुम इनको भी युवराजके पदपर अभिषिक्त करो ॥ ११-१२ ॥
ज्येष्ठस्य हि सुतो ज्येष्ठः सदृशो विक्रमेण च ।
अङ्गदोऽयमदीनात्मा यौवराज्यस्य भाजनम् ॥ १३ ॥
' ये तुम्हारे बड़े भाईके ज्येष्ठ पुत्र हैं । पराक्रममें भी उन्हींके समान हैं तथा इनका हृदय उदार है । अतः अङ्गद युवराजपदके सर्वथा अधिकारी हैं ॥१३ ॥
पूर्वोऽयं वार्षिको मासः श्रावणः सलिलागमः ।
प्रवृत्ताः सौम्य चत्वारो मासा वार्षिक संज्ञिताः ॥ १४ ॥
षड्विंशः सर्गः ८१ ९ ' सौम्य! वर्षा कहलानेवाले चार मास या चौमासे आ गये । इनमें पहला मास यह श्रावण, जो जलकी प्राप्ति करानेवाला है, आरम्भ हो गया ॥ १४ ॥
नायमुद्योगसमयः प्रविश त्वं पुरीं शुभाम् ।
अस्मिन् वत्स्याम्यहं सौम्य पर्वते सहलक्ष्मणः ॥ १५ ॥
' सौम्य! यह किसीपर चढ़ाई करनेका समय नहीं है । इसलिये तुम अपनी सुन्दर नगरीमें जाओ । मैं लक्ष्मण साथ इस पर्वतपर निवास करूँगा ॥ १५ ॥
इयं गिरिगुहा रम्या विशाला युक्तमारुता ।
प्रभूतसलिला सौम्य प्रभूतकमलोत्पला ॥ १६ ॥
' सौम्य सुग्रीव! यह पर्वतीय गुफा बड़ी रमणीय और विशाल है । इसमें आवश्यकताके अनुरूप हवा भी मिल जाती है । यहाँ पर्याप्त जल भी सुलभ है और कमल तथा उत्पल भी बहुत हैं ॥१६ ॥
कार्तिके समनुप्राप्ते त्वं रावणवधे यत ।
एष नः समयः सौम्य प्रविश त्वं स्वमालयम् ॥ १७ ॥
अभिषिञ्चस्व राज्ये च सुहृदः सम्प्रहर्षय । ' सखे! कार्तिक आनेपर तुम रावणके वधके लिये प्रयत्न करना । यही हमलोगोंका निश्चय रहा । अब तुम अपने महलमें प्रवेश करो और राज्यपर अभिषिक्त होकर सुहृदोंको आनन्दित करो ' ॥ १७३ ॥
इति रामाभ्यनुज्ञातः सुग्रीवो वानरर्षभः ॥ १८ ॥
प्रविवेश पुरीं रम्यां किष्किन्धां वालिपालिताम् । श्रीरामचन्द्रजीकी यह आज्ञा पाकर वानरश्रेष्ठ सुग्रीव उस रमणीय किष्किन्धापुरीमें गये, जिसकी रक्षा वालीने की थी ॥ १८३ ॥
तं वानरसहस्त्राणि प्रविष्टं अभिवार्य प्रविष्टानि सर्वतः उस समय गुफामें प्रविष्ट चारों ओरसे घेरकर हजारों वानर घुसे ॥ १ ९ ३ ॥ ततः प्रकृतयः सर्वा दृष्ट्वा वानरेश्वरम् ॥ १ ९ ॥ प्लवगेश्वरम् । हुए उन वानरराजको उनके साथ ही गुहामें हरिगणेश्वरम् ॥२० ॥
प्रणम्य मूर्धा पतिता वसुधायं समाहिताः । वानरराजको देखकर प्रजा आदि समस्त प्रकृतियोंने एकाग्रचित्त हो पृथ्वीपर माथा टेककर उन्हें प्रणाम किया ॥ सुग्रीवः प्रकृतीः सर्वाः सम्भाष्योत्थाप्य वीर्यवान् ॥ २१ ॥
भ्रातुरन्तःपुरं सौम्यं प्रविवेश महाबलः । महाबली पराक्रमी सुग्रीवने उन सबको उठने की आज्ञा दी और उन सबसे बातचीत करके वे भाई । सौम्य अन्तः पुरमें प्रविष्ट हुए ॥ २१३ ॥
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८२० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे प्रविष्टं भीमविक्रान्तं सुग्रीवं वानरर्षभम् ॥ २२ ॥
अभ्यषिञ्चन्त सुहृदः सहस्त्राक्षमिवामराः । भयंकर पराक्रम प्रकट करनेवाले वानरश्रेष्ठ सुग्रीवको अन्तःपुरमें आया देख उनके सुहृदोंने उनका उसी प्रकार अभिषेक किया, जैसे देवताओंने सहस्र नेत्रधारी इन्द्रका किया था ॥ २२३ ॥
तस्य पाण्डुरमाजहुश्छत्रं हेमपरिष्कृतम् ॥ २३ ॥
शुक्ले च वालव्यजने हेमदण्डे यशस्करे ।
तथा रत्नानि सर्वाणि सर्वबीजौषधानि च ॥ २४ ॥
सक्षीराणां च वृक्षाणां प्ररोहान् कुसुमानि च ।
शुक्लानि चैव वस्त्राणि श्वेतं चैवानुलेपनम् ॥ २५ ॥
सुगन्धीनि च माल्यानि स्थलजान्यम्बुजानि च ।
चन्दनानि च दिव्यानि गन्धांश्च विविधान् बहून् ॥ २६ ॥
अक्षतं जातरूपं च प्रियङ्गु मधुसर्पिषी ।
दधि चर्म च वैयाघ्रं पराय चाप्युपानहौ ॥ २७ ॥
समालम्भनमादाय गोरोचनमनःशिलाम् ।
आजग्मुस्तत्र मुदिता वराः कन्याश्च षोडश ॥ २८ ॥
पहले तो वे सब लोग उनके लिये सुवर्णभूषित श्वेत छत्र, सोनेकी डाँड़ीवाले दो सफेद चँवर, सब प्रकारके रत्न, बीज और ओषधियाँ, दूधवाले वृक्षोंकी नीचे लटकनेवाली जटाएँ, श्वेत पुष्प, श्वेत वस्त्र, श्वेत अनुलेपन, जल और थलमें होनेवाले सुगन्धित फूलोंकी मालाएँ, दिव्य चन्दन, नाना प्रकारके बहुत - से सुगन्धित पदार्थ, अक्षत, सोना, प्रियङ्गु ( कगनी ) मधु, घी, दही, व्याघ्रचर्म, सुन्दर एवं बहुमूल्य जूते, अङ्गराग, गोरोचन और मैनसिल आदि सामग्री लेकर वहाँ उपस्थित हुए, साथ ही हर्षसे भरी हुई सोलह सुन्दरी कन्याएँ भी सुग्रीवके पास आयीं ॥ २३–२८ ॥
ततस्ते वानरश्रेष्ठमभिषेक्तुं यथाविधि ।
रत्नैर्वस्त्रैश्च भक्ष्यैश्च तोषयित्वा द्विजर्षभान् ॥ २ ९ ॥
तदनन्तर उन सबने श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको नाना प्रकारके रत्न, वस्त्र और भक्ष्य पदार्थोंसे संतुष्ट करके वानरश्रेष्ठ सुग्रीवका विधिपूर्वक अभिषेक - कार्य आरम्भ किया ॥ २ ९ ॥
ततः कुशपरिस्तीर्णं समिद्धं जातवेदसम् ।
मन्त्रपूतेन हविषा हुत्वा मन्त्रविदो जनाः ॥ ३० ॥
मन्त्रवेत्ता पुरुषोंने वेदीपर अग्निकी स्थापना करके उसे प्रज्वलित किया और अग्निवेदीके चारों ओर कुश बिछाये । फिर अग्निका संस्कार करके मन्त्रपूत हविष्यके द्वारा प्रज्वलित अग्निमें आहुति दी ॥ ३० ॥
प्रतिष्ठा वरास्तरणसंवृते ।
प्रासादशिखरे रम्ये चित्रमाल्योपशोभिते ॥ ३१ ॥
प्राङ्मुखं विधिवन्मन्त्रैः स्थापयित्वा वरासने । तत्पश्चात् रंग - बिरंगी पुष्पमालाओंसे सुशोभित रमणीय अट्टालिकापर एक सोनेका सिंहासन रखा गया और उसपर सुन्दर बिछौना बिछाकर उसके ऊपर सुग्रीवको पूर्वाभिमुख करके विधिवत् मन्त्रोच्चारण करते हुए बिठाया गया ॥ ३१ ॥
नदीनदेभ्यः संहृत्य तीर्थेभ्यश्च समन्ततः ॥ ३२ ॥
आहृत्य च समुद्रेभ्यः सर्वेभ्यो वानरर्षभाः ।
अपः कनककुम्भेषु निधाय विमलं जलम् ॥ ३३ ॥
शुभैर्ऋषभशृङ्गैश्च कलशैश्चैव काञ्चनैः ।
शास्त्रदृष्टेन विधिना महर्षिविहितेन च ॥ ३४ ॥
गजो गवाक्षो गवयः शरभो गन्धमादनः ।
मैन्दश्च द्विविदश्चैव हनूमाञ्जाम्बवांस्तथा ॥ ३५ ॥
अभ्यषिञ्चत सुग्रीवं प्रसन्नेन सुगन्धिना ।
सलिलेन सहस्त्राक्षं वसवो वासवं यथा ॥ ३६ ॥
इसके बाद श्रेष्ठ वानरोंने नदियों, नदों, सम्पूर्ण दिशाओंके तीर्थों और समस्त समुद्रोंसे लाये हुए निर्मल जलको एकत्र करके उसे सोनेके कलशोंमें रखा । फिर गज, गवाक्ष, गवय, शरभ, गन्धमादन, मैन्द, द्विविद, हनुमान् और जाम्बवान्ने महर्षियोंकी बतायी हुई शास्त्रोक्त विधिके अनुसार सुवर्णमय कलशोंमें रखे हुए स्वच्छ और सुगन्धित जलसे साँडके सींगोंद्वारा सुग्रीवका उसी प्रकार अभिषेक किया, जैसे वसुओंने इन्द्रका अभिषेक किया था ॥
अभिषिक्ते तु सुग्रीवे सर्वे वानरपुङ्गवाः ।
प्रचुकुशुर्महात्मानो हृष्टाः शतसहस्रशः ॥ ३७ ॥
सुग्रीवका अभिषेक हो जानेपर वहाँ लाखोंकी संख्यामें एकत्र हुए समस्त महामनस्वी श्रेष्ठ वानर हर्षसे भरकर जयघोष करने लगे ॥ ३७ ॥
रामस्य तु वचः कुर्वन् सुग्रीवो वानरेश्वरः ।
अङ्गदं सम्परिष्वज्य यौवराज्येऽभ्यषेचयत् ॥ ३८ ॥
श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञाका पालन करते हुए वानरराज सुग्रीवने अङ्गदको हृदयसे लगाकर उन्हें भी युवराजके पदपर अभिषिक्त कर दिया ॥ ३८ ॥
अङ्गदे चाभिषिक्ते तु सानुक्रोशाः प्लवंगमाः ।
साधु साध्विति सुग्रीवं महात्मानो ह्यपूजयन् ॥ ३ ९ ॥
अङ्गदका अभिषेक हो जानेपर महामनस्वी दयालु वानर ' साधु - साधु ' कहकर सुग्रीवकी सराहना करने लगे ॥
रामं चैव महात्मानं लक्ष्मणं च पुनः पुनः ।
प्रीताश्च तुष्टुवुः सर्वे तादृशे तत्र वर्तिनि ॥ ४० ॥
इस प्रकार अभिषेक होकर किष्किन्धामें सुग्रीव और अङ्गदके विराजमान होनेपर समस्त वानर परम प्रसन्न हो महात्मा श्रीराम और लक्ष्मणकी बारंबार स्तुति करने लगे ॥ ४० ॥
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किष्किन्धाकाण्डे
हृष्टपुष्टजनाकीर्णा पताकाध्वजशोभिता ।
बभूव नगरी रम्या किष्किन्धा गिरिगह्वरे ॥। ४१ ॥ ।
उस समय पर्वतकी गुफामें बसी हुई किष्किन्धापुरी हृष्ट - पुष्ट पुरवासियोंसे व्याप्त तथा ध्वजा - पताकाओंसे सुशोभित होनेके कारण बड़ी रमणीय प्रतीत होती थी ॥ निवेद्य रामाय तदा महात्मने महाभिषेकं कपिवाहिनीपतिः । सप्तविंशः सर्गः ८२१ रुमां च भार्यामुपलभ्य वीर्यवा-नवाप राज्यं त्रिदशाधिपो यथा ॥ ४२ ॥
वानरसेनाके स्वामी पराक्रमी सुग्रीवने महात्मा श्रीरामचन्द्रजीके पास जाकर अपने महाभिषेकका समाचार निवेदन किया और अपनी पत्नी रुमाको पाकर उन्होंने उसी प्रकार वानरोंका साम्राज्य प्राप्त किया, जैसे देवराज इन्द्रने त्रिलोकीका ॥ ४२ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे षड्विंशः सर्गः ॥ २६ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें छब्बीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ २६ ॥
सप्तविंशः सर्गः प्रस्त्रवणगिरिपर श्रीराम और
अभिषिक्ते तु सुग्रीवे प्रविष्टे वानरे गुहाम् ।
आजगाम सह भ्रात्रा रामः प्रस्त्रवणं गिरिम् ॥ १ ॥
जब वानर सुग्रीवका राज्याभिषेक हो गया और वे । किष्किन्धामें जाकर रहने लगे, उस समय अपने भाई लक्ष्मणके साथ श्रीरामजी प्रस्रवणगिरिपर चले गये ॥ १ ॥
शार्दूलमृगसंघुष्टं सिंहैर्भीमरवैर्वृतम् ।
नानागुल्मलतागूढं बहुपादपसंकुलम् ॥ २ ॥
वहाँ चीतों और मृगोंकी आवाज गूँजती रहती थी । भयंकर गर्जना करनेवाले सिंहोंसे वह स्थान भरा था । नाना प्रकारकी झाड़ियाँ और लताएँ उस पर्वतको आच्छादित किये हुए थीं और घने वृक्षोंके द्वारा वह सब ओरसे व्याप्त था ॥
ऋक्षवानरगोपुच्छैर्मार्जारैश्च निषेवितम् ।
मेघराशिनिभं शैलं नित्यं शुचिकरं शिवम् ॥ ३ ॥
रीछ, वानर, लंगूर और बिलाव आदि जन्तु वहाँ निवास करते थे । वह पर्वत मेघोंके समूह - सा जान पड़ता था । दर्शन करनेवाले लोगोंके लिये वह सदा ही मङ्गलमय और पवित्र - कारक था ॥ ३ ॥
तस्य शैलस्य शिखरे महतीमायतां गुहाम् ।
प्रत्यगृह्णीत वासार्थं रामः सौमित्रिणा सह ॥ ४ ॥
उस पर्वतके शिखरपर एक बहुत बड़ी और विस्तृत गुफा थी । लक्ष्मणसहित श्रीरामने उसीका अपने रहनेके लिये आश्रय लिया ॥ ४ ॥
कृत्वा च समयं रामः सुग्रीवेण सहानघः ।
कालयुक्तं महद्वाक्यमुवाच रघुनन्दनः ॥ ५ ॥
विनीतं भ्रातरं भ्राता लक्ष्मणं लक्ष्मिवर्धनम् । रघुकुलका आनन्द बढ़ानेवाले निष्पाप श्रीरामचन्द्रजी वर्षाका अन्त होनेपर सुग्रीवके साथ रावणपर चढ़ाई करनेका लक्ष्मणकी परस्पर बातचीत निश्चय करके वहाँ आये थे । उन्होंने लक्ष्मीकी वृद्धि करनेवाले अपने विनययुक्त भ्राता लक्ष्मणसे यह समयोचित बात कही - ॥ ५३ ॥
इयं गिरिगुहा रम्या विशाला युक्तमारुता ॥ ६ ॥
अस्यां वत्स्याम सौमित्रे वर्षरात्रमरिंदम । ' शत्रुदमन सुमित्राकुमार! यह पर्वतकी गुफा बड़ी ही सुन्दर और विशाल है । यहाँ हवाके आने - जानेका भी मार्ग है । हमलोग वर्षाकी रातमें इसी गुफाके भीतर निवास करेंगे ॥ ६३ ॥
गिरिशृङ्गमिदं रम्यमुत्तमं पार्थिवात्मज ॥७ ॥
श्वेताभिः कृष्णताम्राभिः शिलाभिरुपशोभितम् । ' राजकुमार! पर्वतका यह शिखर बहुत ही उत्तम और रमणीय है । सफेद, काले और लाल हर तरहके प्रस्तर- खण्ड इसकी शोभा बढ़ा रहे हैं ॥७३ ॥
नानाधातुसमाकीर्णं नदीदर्दुरसंयुतम् ॥ ८ ॥
विविधैर्वृक्षषण्डैश्च चारुचित्रलतायुतम् ।
। नानाविहगसंघुष्टं मयूरवरनादितम् ॥ ९ ॥
' यहाँ नाना प्रकारके धातुओंकी खानें हैं । पास ही नदी बहती है । उसमें रहनेवाले मेढक यहाँ भी उछलते-कूदते चले आते हैं । नाना प्रकारके वृक्ष - समूह इसकी शोभा बढ़ाते हैं । सुन्दर और विचित्र लताओंसे यह शैल - शिखर हरा - भरा दिखायी देता है । भाँति - भाँतिके पक्षी यहाँ चहक रहे हैं तथा सुन्दर मोरोंकी मीठी बोली गूँज रही है ॥ ८ - ९ ॥
मालतीकुन्दगुल्मैश्च सिन्दुवारैः शिरीषकैः ।
कदम्बार्जुनसश्च पुष्पितैरुपशोभितम् ॥ १० ॥
' मालती और कुन्दकी झाड़ियाँ, सिन्दुवार, शिरीष,
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८२२ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे
कदम्ब, अर्जुन और सर्जके फूले हुए वृक्ष इस स्थानकी ।
शोभा बढ़ा रहे हैं ॥ १० ॥
इयं च नलिनी रम्या फुल्लपङ्कजमण्डिता ।
नातिदूरे गुहाया नौ भविष्यति नृपात्मज ॥ ११ ॥
' राजकुमार! यह पुष्करिणी खिले हुए कमलोंसे अलंकृत हो बड़ी रमणीय दिखायी देती है । यह हमलोगोंकी गुफासे अधिक दूर नहीं होगी ॥ ११ ॥
प्रागुदक्प्रवणे देशे गुहा साधु भविष्यति ।
पश्चाच्चैवोन्नता सौम्य निवातेयं भविष्यति ॥ १२ ॥
' सौम्य! यहाँका स्थान ईशानकोणकी ओरसे नीचा है, अतः यहाँ यह गुफा हमारे निवासके लिये बहुत अच्छी रहेगी । पश्चिम - दक्षिणके कोणकी ओरसे ऊँची यह गुफा हवा और वर्षासे बचानेके लिये अच्छी होगी * ॥ १२ ॥
गुहाद्वारे च सौमित्रे शिला समतला शिवा ।
कृष्णा चैवायता चैव भिन्नाञ्जनचयोपमा ॥ १३ ॥
' सुमित्रानन्दन! इस गुफाके द्वारपर समतल शिला है, जो बाहर बैठनेके लिये सुविधाजनक होनेके कारण सुखदायिनी है । यह लंबी - चौड़ी होनेके साथ ही खानसे काटकर निकाले हुए कोयलोंकी राशिके समान काली है ॥ १३ ॥
गिरिशृङ्गमिदं तात पश्य चोत्तरतः शुभम् ।
भिन्नाञ्जनचयाकारमम्भोधरमिवोदितम् ॥१४ ॥
' तात! देखो, यह सुन्दर पर्वत - शिखर उत्तरकी ओरसे कटे हुए कोयलोंकी राशि तथा घुमड़े हुए मेघोंकी घटाके समान काला दिखायी देता है ॥ १४ ॥
दक्षिणस्यामपि दिशि स्थितं श्वेतमिवाम्बरम् ।
कैलासशिखरप्रख्यं नानाधातुविराजितम् ॥ १५ ॥
' इसी तरह दक्षिण दिशामें भी इसका जो शिखर है, वह श्वेत वस्त्र और कैलास - शृङ्गके समान श्वेत दिखायी देता है । नाना प्रकारकी धातुएँ उसकी शोभा बढ़ाती हैं ॥ १५ ॥
प्राचीनवाहिनीं चैव नदीं भृशमकर्दमाम् ।
गुहायाः परतः पश्य त्रिकूटे जाह्नवीमिव ॥ १६ ॥
' वह देखो, इस गुफाके दूसरी ओर त्रिकूट पर्वतके समीप बहनेवाली मन्दाकिनीके समान तुङ्गभद्रा नदी बह रही है । उसकी धारा पश्चिमसे पूर्वकी ओर जा रही है । उसमें कीचड़का नाम भी नहीं है ॥ १६ ॥
* ईशानकोणकी ओर नीची तथा नैर्ऋत्यकोणकी ओरसे
चन्दनैस्तिलकैः सालैस्तमालैरतिमुक्तकैः ।
पद्मकैः सरलैश्चैव अशोकैश्चैव शोभिताम् ॥ १७ ॥
' चन्दन, तिलक, साल, तमाल, अतिमुक्तक, पद्मक, सरल और शोक आदि नाना प्रकारके वृक्षोंसे उस नदीकी कैसी शोभा हो रही है? ॥ १७ ॥
वानीरैस्तिमिदैश्चैव बकुलैः केतकैरपि ।
हिन्तालैस्तिनिशैर्नीपैर्वेतसैः कृतमालकैः ॥ १८ ॥
तीरजैः शोभिता भाति नानारूपैस्ततस्ततः ।
वसनाभरणोपेता प्रमदेवाभ्यलंकृता ॥१ ९ ॥
' जलबेंत, तिमिद, बकुल, केतक, हिन्ताल, तिनिश, नीप, स्थलबेंत, कृतमाल ( अमिलतास ) आदि भाँति-भाँतिके तटवर्ती वृक्षोंसे जहाँ - तहाँ सुशोभित हुई यह नदी वस्त्राभूषणोंसे विभूषित शृङ्गारसज्जित युवती स्त्रीके समान जान पड़ती है ॥ १८-१९ ॥
शतशः पक्षिसङ्घैश्च नानानादविनादिता 1 ।
एकैकमनुरक्तैश्च चक्रवाकैरलंकृता ॥ २० ॥
' सैकड़ों पक्षिसमूहोंसे संयुक्त हुई यह नदी उनके नाना प्रकारके कलरवोंसे गूँजती रहती है । परस्पर अनुरक्त हुए चक्रवाक इस सरिताकी शोभा बढ़ाते हैं ॥
पुलिनैरतिरम्यैश्च हंससारससेविता ।
प्रहसन्त्येव भात्येषा नानारत्नसमन्विता ॥२१ ॥
' अत्यन्त रमणीय तटोंसे अलंकृत, नाना प्रकारके रत्नोंसे सम्पन्न तथा हंस और सारसोंसे सेवित यह नदी अपनी हास्यच्छटा बिखेरती हुई - सी जान पड़ती है ॥ २१ ॥
क्वचिन्नीलोत्पलैश्छन्ना भातिरक्तोत्पलैः क्वचित् ।
क्वचिदाभाति शुक्लैश्च दिव्यैः कुमुदकुड्मलैः ॥ २२ ॥
' कहीं तो यह नील कमलोंसे ढकी हुई है, कहीं लाल कमलोंसे सुशोभित होती है और कहीं श्वेत एवं दिव्य कुमुदकलिकाओंसे शोभा पाती है ॥ २२ ॥
पारिप्लवशतैर्जुष्टा बर्हिक्रौञ्चविनादिता ।
रमणीया नदी सौम्य मुनिसङ्घनिषेविता ॥ २३ ॥
' सैकड़ों जल - पक्षियोंसे सेवित तथा मोर एवं क्रौञ्चके कलरवोंसे मुखरित हुई यह सौम्य नदी बड़ी रमणीय प्रतीत होती है । मुनियोंके समुदाय इसके जलका सेवन करते हैं ॥ २३ ॥
पश्य चन्दनवृक्षाणां पङ्क्तीः सुरुचिरा इव ।
ककुभानां च दृश्यन्ते मनसैवोदिताः समम् ॥ २४ ॥
ऊँची होनेसे उसका द्वार नैर्ऋत्यकोणकी ओर था — यह प्रतीत होता है, इससे उसमें पूर्वी हवा और उधरसे आनेवाली वर्षाका प्रवेश नहीं था ।
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किष्किन्धाकाण्डे ' वह देखो, अर्जुन और चन्दन वृक्षोंकी पंक्तियाँ । कितनी सुन्दर दिखायी देती हैं । मालूम होता है ये मनके संकल्पके साथ ही प्रकट हो गयी हैं ॥२४ ॥
अहो सुरमणीयोऽयं देशः शत्रुनिषूदन ।
दृढं रंस्याव सौमित्रे साध्वत्र निवसावहे ॥ २५ ॥
' शत्रुसूदन सुमित्राकुमार! यह स्थान अत्यन्त रमणीय और अद्भुत है । यहाँ हमलोगोंका मन खूब लगेगा । अतः यहीं रहना ठीक होगा ॥ २५ ॥
इतश्च नातिदूरे सा किष्किन्धा चित्रकानना ।
सुग्रीवस्य पुरी रम्या भविष्यति नृपात्मज ॥ २६ ॥
' राजकुमार! विचित्र काननोंसे सुशोभित सुग्रीवकी रमणीय किष्किन्धापुरी भी यहाँसे अधिक दूर नहीं होगी ॥
गीतवादित्रनिर्घोषः श्रूयते जयतां वर ।
नदतां वानराणां च मृदङ्गाडम्बरैः सह ॥ २७ ॥
' विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ लक्ष्मण! मृदङ्गकी मधुर ध्वनिके साथ गर्जते हुए वानरोंके गीत और वाद्यका गम्भीर घोष यहाँसे सुनायी देता है ॥ २७ ॥
लब्ध्वा भार्यां कपिवरः प्राप्य राज्यं सुहृद्वृतः ।
ध्रुवं नन्दति सुग्रीवः सम्प्राप्य महतीं श्रियम् ॥ २८ ॥
' निश्चय ही कपिश्रेष्ठ सुग्रीव अपनी पत्नीको पाकर, राज्यको हस्तगत करके और बड़ी भारी लक्ष्मीपर अधिकार प्राप्त करके सुहृदोंके साथ आनन्दोत्सव मना रहे हैं ' ॥ २८ ॥
इत्युक्त्वा न्यवसत् तत्र राघवः सहलक्ष्मणः ।
बहुदृश्यदरीकुञ्जे तस्मिन् प्रस्रवणे गिरौ ॥ २ ९ ॥
ऐसा कहकर श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मणके साथ उस प्रस्रवण पर्वतपर जहाँ बहुत - सी कन्दराओं और कुञ्जोंके दर्शन होते थे, निवास करने लगे ॥२ ९ ॥
सुसुखे हि बहुद्रव्ये तस्मिन् हि धरणीधरे ।
वसतस्तस्य रामस्य रतिरल्पापि नाभवत् ॥ ३० ॥
हृतां हि भार्यां स्मरतः प्राणेभ्योऽपि गरीयसीम् । यद्यपि उस पर्वतपर परम सुख प्रदान करनेवाले बहुत - से फल - फूल आदि आवश्यक पदार्थ थे, तथापि राक्षसद्वारा हरी गयी प्राणोंसे भी बढ़कर आदरणीय सीताका स्मरण करते हुए भगवान् श्रीरामको वहाँ तनिक भी सुख नहीं मिलता था ॥ ३०३ ॥
उदयाभ्युदितं दृष्ट्वा शशाङ्कं च विशेषतः ॥ ३१ ॥
आविवेश न तं निद्रा निशासु शयनं गतम् । विशेषतः उदयाचलपर उदित हुए चन्द्रदेवका दर्शन करके रातमें शय्यापर लेट जानेपर भी उन्हें नींद नहीं आती थी ॥३१३ ॥
सप्तविंशः सर्गः ८२३ तत्समुत्थेन शोकेन बाष्पोपहतचेतनम् ॥ ३२ ॥
तं शोचमानं काकुत्स्थं नित्यं शोकपरायणम् ।
तुल्यदुःखोऽब्रवीद्भ्राता लक्ष्मणोऽनुनयं वचः ॥ ३३ ॥
सीताके वियोगजनित शोकसे आँसू बहाते हुए वे अचेत हो जाते थे । श्रीरामको निरन्तर शोकमग्न रहकर चिन्ता करते देख उनके दुःखमें समानरूपसे भाग लेनेवाले भाई लक्ष्मणने उनसे विनयपूर्वक कहा- ॥ ३२-३३ ॥
अलं वीर व्यथां गत्वा न त्वं शोचितुमर्हसि ।
शोचतो ह्यवसीदन्ति सर्वार्था विदितं हि ते ॥ ३४ ॥
' वीर! इस प्रकार व्यथित होनेसे कोई लाभ नहीं है । अतः आपको शोक नहीं करना चाहिये; क्योंकि शोक करनेवाले पुरुषके सभी मनोरथ नष्ट हो जाते हैं, यह बात आपसे छिपी नहीं है ॥ ३४ ॥
भवान् क्रियापरो लोके भवान् देवपरायणः ।
आस्तिको धर्मशीलश्च व्यवसायी च राघव ॥ ३५ ॥
' रघुनन्दन! आप जगत्में कर्मठ - वीर तथा देवताओंका समादर करनेवाले हैं । आस्तिक, धर्मात्मा और उद्योगी हैं ॥ ३५ ॥
न ह्यव्यवसितः शत्रुं राक्षसं तं विशेषतः ।
समर्थस्त्वं रणे हन्तुं विक्रमे जिह्यकारिणम् ॥ ३६ ॥
' यदि आप शोकवश उद्यम छोड़ बैठते हैं तो पराक्रमके स्थानस्वरूप समराङ्गणमें कुटिल कर्म करनेवाले उस शत्रुका, जो विशेषतः राक्षस है, वध करनेमें समर्थ न हो सकेंगे ॥ ३६ ॥
समुन्मूलय शोकं त्वं व्यवसायं स्थिरीकुरु ।
ततः सपरिवारं तं राक्षसं हन्तुमर्हसि ॥ ३७ ॥
' अतः आप अपने शोकको जड़से उखाड़ फेंकिये और उद्योगके विचारको सुस्थिर कीजिये । तभी आप परिवारसहित उस राक्षसका विनाश कर सकते हैं ॥ ३७ ॥
पृथिवीमपि काकुत्स्थ ससागरवनाचलाम् ।
परिवर्तयितुं शक्तः किं पुनस्तं हि रावणम् ॥ ३८ ॥
' काकुत्स्थ! आप तो समुद्र, वन और पर्वतोंसहित समूची पृथ्वीको भी उलट सकते हैं; फिर उस रावणका संहार करना आपके लिये कौन बड़ी बात है? ॥ ३८ ॥
शरत्कालं प्रतीक्षस्व प्रावृट्कालोऽयमागतः ।
ततः सराष्ट्रं सगणं रावणं तं वधिष्यसि ॥ ३ ९ ॥
' यह वर्षाकाल आ गया है । अब शरद् ऋतुकी प्रतीक्षा कीजिये । फिर राज्य और सेनासहित रावणका वध कीजियेगा ॥ ३ ९ ॥
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८२४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे
अहं तु खलु ते वीर्यं प्रसुप्तं प्रतिबोधये ।
दीप्तैराहुतिभिः काले भस्मच्छन्नमिवानलम् ॥ ४० ॥
' जैसे राखमें छिपी हुई आगको हवनकालमें आहुतियोंद्वारा प्रज्वलित किया जाता हैं, उसी प्रकार मैं आपके सोये हुए पराक्रमको जगा रहा हूँ - भूले हुए बल - विक्रमकी याद दिला रहा हूँ ' ॥ ४० ॥
लक्ष्मणस्य हि तद् वाक्यं प्रतिपूज्य हितं शुभम् ।
राघवः सुहृदं स्निग्धमिदं वचनमब्रवीत् ॥ ४१ ॥
लक्ष्मणके इस शुभ एवं हितकर वचनकी सराहना करके श्रीरघुनाथजीने अपने स्नेही सुहृत् सुमित्राकुमारसे इस प्रकार कहा- ॥ ४१ ॥
वाच्यं यदनुरक्तेन स्निग्धेन च हितेन च ।
सत्यविक्रमयुक्तेन तदुक्तं लक्ष्मण त्वया ॥ ४२ ॥ ।
' लक्ष्मण! अनुरागी, स्नेही, हितैषी और सत्यपराक्रमी वीरको जैसी बात कहनी चाहिये वैसी ही तुमने कही है ॥ ४२ ॥
एष शोकः परित्यक्तः सर्वकार्यावसादकः ।
विक्रमेष्वप्रतिहतं तेजः प्रोत्साहयाम्यहम् ॥ ४३ ॥
' लो, सब तरहके काम बिगाड़नेवाले शोकको मैंने त्याग दिया । अब मैं पराक्रमविषयक दुर्धर्ष तेजको प्रोत्साहित करता हूँ ( बढ़ाता हूँ ) ॥ ४३ ॥
शरत्कालं प्रतीक्षिष्ये स्थितोऽस्मि वचने तव ।
सुग्रीवस्य नदीनां च प्रसादमनुपालयन् ॥ ४४ ॥
' तुम्हारी बात मान लेता हूँ । सुग्रीवके प्रसन्न होकर सहायता करने और नदियोंके जलके स्वच्छ होनेकी बाट देखता हुआ मैं शरत् - कालकी प्रतीक्षा करूँगा ॥४४ ॥
उपकारेण वीरस्तु प्रतिकारेण युज्यते ।
अकृतज्ञोऽप्रतिकृतो हन्ति सत्त्ववतां मनः ॥ ४५ ॥
' जो वीर पुरुष किसीके उपकारसे उपकृत होता । है, वह प्रत्युपकार करके उसका बदला अवश्य चुकाता है, किंतु यदि कोई उपकारको न मानकर या भुलाकर प्रत्युपकारसे मुँह मोड़ लेता है, वह शक्तिशाली श्रेष्ठ पुरुषोंके मनको ठेस पहुँचाता है ॥ ४५ ॥
तदेव युक्तं प्रणिधाय लक्ष्मणः कृताञ्जलिस्तत् प्रतिपूज्य भाषितम् । उवाच रामं स्वभिरामदर्शनं प्रदर्शयन् दर्शनमात्मनः शुभम् ॥ ४६ ॥
' श्रीरामजीके उस कथनको ही युक्तियुक्त मानकर लक्ष्मणने उसकी भूरि - भूरि प्रशंसा की और दोनों हाथ जोड़कर अपनी शुभ दृष्टिका परिचय देते हुए वे नयनाभिराम श्रीरामसे इस प्रकार बोले- ॥ ४६ ॥
यथोक्तमेतत् तव सर्वमीप्सितं नरेन्द्र कर्ता नचिरात् तु वानरः । शरत्प्रतीक्षः क्षमतामिमं भवान् जलप्रपातं रिपुनिग्रहे धृतः ॥ ४७ ॥
' नरेश्वर! जैसा कि आपने कहा है, वानरराज सुग्रीव शीघ्र ही आपका यह सारा मनोरथ सिद्ध करेंगे । अतः आप शत्रुके संहार करनेका दृढ़ निश्चय लिये शरत्कालकी प्रतीक्षा कीजिये और इस वर्षाकालके विलम्बको सहन कीजिये ॥ ४७ ॥
नियम्य कोपं परिपाल्यतां शरत् क्षमस्व मासांश्चतुरो मया सह । वसाचलेऽस्मिन् मृगराजसेवि संवर्तयन् शत्रुवधे समर्थः ॥ ४८ ॥
' क्रोधको काबूमें रखकर शरत्कालकी राह देखिये । बरसातके चार महीनोंतक जो भी कष्ट हो, उसे सहन कीजिये तथा शत्रुवधमें समर्थ होनेपर भी इस वर्षाकालको व्यतीत करते हुए मेरे साथ इस सिंहसेवित पर्वतपर निवास कीजिये ' ॥ ४८ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे सप्तविंशः सर्गः ॥ २७ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें सत्ताईसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ २७ ॥
अष्टाविंशः सर्गः श्रीरामके द्वारा वर्षा ऋतुका वर्णन स तदा वालिनं हत्वा सुग्रीवमभिषिच्य च । करते हुए श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मणसे कहने लगे- ॥१ ॥
वसन् माल्यवतः पृष्ठे रामो लक्ष्मणमब्रवीत् ॥ १ ॥ अयं स कालः सम्प्राप्तः समयोऽद्य जलागमः ।
इस प्रकार वालीका वध और सुग्रीवका राज्याभिषेक सम्पश्य त्वं नभो मेधैः संवृतं गिरिसंनिभैः ॥ २ ॥
करनेके अनन्तर माल्यवान् पर्वतके पृष्ठभागमें निवास ' सुमित्रानन्दन! अब यह जलकी प्राप्ति करानेवाला
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किष्किन्धाकाण्डे वह प्रसिद्ध वर्षाकाल आ गया । देखो, पर्वतके समान प्रतीत होनेवाले मेघोंसे आकाशमण्डल आच्छन्न हो गया है ॥२ ॥
नवमासधृतं गर्भं भास्करस्य गभस्तिभिः ।
पीत्वा रसं समुद्राणां द्यौः प्रसूते रसायनम् ॥ ३ ॥
' यह आकाशस्वरूपा तरुणी सूर्यकी किरणोंद्वारा समुद्रोंका रस पीकर कार्तिक आदि नौ मासोंतक धारण किये हुए गर्भके रूपमें जलरूपी रसायनको जन्म दे रही है ॥ ३ ॥
शक्यमम्बरमारुह्य ' मेघसोपानपंक्तिभिः ।
कुटजार्जुनमालाभिरलंकर्तुं दिवाकरः ॥ ४ ॥
' इस समय मेघरूपी सोपानपंक्तियों ( सीढ़ियों ) द्वारा आकाशमें चढ़कर गिरिमल्लिका और अर्जुनपुष्पकी मालाओंसे सूर्यदेवको अलंकृत करना सरल - सा हो गया है ॥४ ॥
संध्यारागोत्थितैस्ताम्म्रैरन्तेष्वपि च पाण्डुभिः ।
स्निग्धैरभ्रपटच्छेदैर्बद्धव्रणमिवाम्बरम् ॥ ५ ॥
' संध्याकालकी लाली प्रकट होनेसे बीचमें लाल तथा किनारेके भागोंमें श्वेत एवं स्निग्ध प्रतीत होनेवाले मेघखण्डोंसे आच्छादित हुआ आकाश ऐसा जान पड़ता है, मानो उसने अपने घावमें रक्तरञ्जित सफेद कपड़ोंकी पट्टी बाँध रखी हो ॥ ५ ॥
मन्दमारुतिनिःश्वासं संध्याचन्दनरञ्जितम् ।
आपाण्डुजलदं भाति कामातुरमिवाम्बरम् ॥ ६ ॥
' मन्द - मन्द हवा निःश्वास- सी प्रतीत होती है, संध्याकालकी लाली लाल चन्दन बनकर ललाट आदि अङ्गको अनुरञ्जित कर रही है तथा मेघरूपी कपोल कुछ - कुछ पाण्डुवर्णका प्रतीत होता है । इस तरह यह आकाश कामातुर पुरुषके समान जान पड़ता है ॥६ ॥
एषा धर्मपरिक्लिष्टा नववारिपरिप्लुता ।
सीतेव शोकसंतप्ता मही बाष्पं विमुञ्चति ॥ ७ ॥
' जो ग्रीष्म ऋतुमें घामसे तप गयी थी, वह पृथ्वी वर्षाकालमें नूतन जलसे भीगकर ( सूर्य - किरणोंसे तपी और आँसुओंसे भीगी हुई ) शोकसंतप्त सीताकी भाँति बाष्प विमोचन ( उष्णताका त्याग अथवा अश्रुपात ) कर रही है ॥७ ॥
मेघोदरविनिर्मुक्ताः कर्पूरदलशीतलाः ।
शक्यमञ्जलिभिः २ पातुं वाताः केतकगन्धिनः ॥ ८ ॥
अष्टाविंशः सर्गः ८२५ ' मेघके उदरसे निकली, कपूरकी डलीके समान ठंडी तथा केवड़ेकी सुगन्धसे भरी हुई इस बरसाती वायुको मानो अञ्जलियोंमें भरकर पीया जा सकता है ॥
एष फुल्लार्जुनः शैलः केतकैरभिवासितः ।
सुग्रीव इव शान्तारिर्धाराभिरभिषिच्यते ॥ ९ ॥
' यह पर्वत, जिसपर अर्जुनके वृक्ष खिले हुए हैं तथा जो केवड़ोंसे सुवासित हो रहा है, शान्त हुए शत्रुवाले सुग्रीवकी भाँति जलकी धाराओंसे अभिषिक्त हो रहा है॥९॥
मेघकृष्णाजिनधरा धारायज्ञोपवीतिनः ।
मारुतापूरितगुहाः प्राधीता इव पर्वताः ॥१० ॥
मेघरूपी काले मृगचर्म तथा वर्षाकी धारारूप यज्ञोपवीत धारण किये वायुसे पूरित गुफा ( या हृदय ) वाले ये पर्वत ब्रह्मचारियोंकी भाँति मानो वेदाध्ययन आरम्भ कर रहे हैं ॥ १० ॥
कशाभिरिव हैमीभिर्विद्युद्भिरभिताडितम् ।
अन्तः स्तनितनिर्घोषं सवेदनमिवाम्बरम् ॥ ११ ॥
' ये बिजलियाँ सोनेके बने हुए कोड़ोंके समान जान पड़ती हैं । इनकी मार खाकर मानो व्यथित हुआ आकाश अपने भीतर व्यक्त हुई मेघोंकी गम्भीर गर्जना के रूपमें आर्तनाद - सा कर रहा है ॥ ११ ॥
नीलमेघाश्रिता विद्युत् स्फुरन्ती प्रतिभाति मे ।
स्फुरन्ती रावणस्याङ्के वैदेहीव तपस्विनी ॥ १२ ॥
' नील मेघका आश्रय लेकर प्रकाशित होती हुई यह विद्युत् मुझे रावणके अङ्कमें छटपटाती हुई तपस्विनी सीताके समान प्रतीत होती है ॥ १२ ॥
इमास्ता मन्मथवतां हिताः प्रतिहता दिशः ।
अनुलिप्ता इव घनैर्नष्टग्रहनिशाकराः ॥ १३ ॥
' बादलोंका लेप लग जानेसे जिनमें ग्रह, नक्षत्र और चन्द्रमा अदृश्य हो गये हैं, अतएव जो नष्ट - सी हो गयी है - जिनके पूर्व, पश्चिम आदि भेदोंका विवेक लुप्त - सा हो गया है, वे दिशाएँ, उन कामियोंको, जिन्हें प्रेयसीका संयोगसुख सुलभ है, हितकर प्रतीत होती हैं ॥१३ ॥
क्वचिद् बाष्पाभिसंरुद्धान् वर्षागमसमुत्सुकान् ।
कुटजान् पश्य सौमित्रे पुष्पितान् गिरिसानुषु ।
। मम शोकाभिभूतस्य कामसंदीपनान् स्थितान् ॥ १४ ॥
' सुमित्रानन्दन! देखो, इस पर्वतके शिखरों पर | खिले हुए कुटज कैसी शोभा पाते हैं? कहीं तो पहली १. ' शक्यो ह्यम्बरमासाद्य ' इति पाठो युक्तः । २. ' शक्या अञ्जलिभिः ' इति स्वच्छः पाठः ।
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८२६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे बार वर्षा होनेपर भूमिसे निकले हुए भापसे ये व्याप्त हो । रहे हैं और कहीं वर्षाके आगमनसे अत्यन्त उत्सुक ( हर्षोत्फुल्ल ) दिखायी देते हैं । मैं तो प्रिया विरहके शोकसे पीड़ित हूँ और ये कुटज पुष्प मेरी प्रेमाग्निको उद्दीप्त कर रहे हैं ॥ १४ ॥
रजः प्रशान्तं सहिमोऽद्य वायु-र्निदाघदोषप्रसराः प्रशान्ताः । स्थिता हि यात्रा वसुधाधिपानां प्रवासिनो यान्ति नराः स्वदेशान् ॥ १५ ॥
' धरतीकी धूल शान्त हो गयी । अब वायुमें शीतलता आ गयी । गर्मीके दोषोंका प्रसार बंद हो गया ।
भूपालोंकी युद्धयात्रा रुक गयी और परदेशी मनुष्य ।
अपने - अपने देशको लौट रहे हैं ॥ १५ ॥
सम्प्रस्थिता मानसवासलुब्धाः प्रियान्विताः सम्प्रति चक्रवाकाः । अभीक्ष्णवर्षोदकविक्षतेषु यानानि मार्गेषु न सम्पतन्ति ॥ १६ ॥
' मानसरोवरमें निवासके लोभी हंस वहाँके लिये प्रस्थित हो गये । इस समय चकवे अपनी प्रियाओंसे मिल रहे हैं । निरन्तर होनेवाली वर्षाके जलसे मार्ग टूट - फूट गये हैं, इसलिये उनपर रथ आदि नहीं चल रहे हैं ॥ १६ ॥
क्वचित् प्रकाशं क्वचिदप्रकाशं नभः प्रकीर्णाम्बुधरं विभाति । क्वचित् क्वचित् पर्वतसंनिरुद्धं रूपं यथा शान्तमहार्णवस्य ॥ १७ ॥
' आकाशमें सब ओर बादल छिटके हुए हैं । कहीं तो उन बादलोंसे ढक जानेके कारण आकाश दिखायी नहीं देता है और कहीं उनके फट जानेपर वह स्पष्ट दिखायी देने लगता है । ठीक उसी तरह जैसे जिसकी तरङ्गमालाएँ शान्त हो गयी हों, उस महासागरका रूप कहीं तो पर्वतमालाओंसे छिप जानेके कारण नहीं दिखायी देता है और कहीं पर्वतोंका आवरण न होनेसे दिखायी देता है ॥ १७ ॥
व्यामिश्रितं सर्जकदम्बपुष्पै-नवं जलं पर्वतधातुताम्रम् । मयूरकेकाभिरनुप्रयातं शैलापगाः शीघ्रतरं वहन्ति ॥ १८ ॥
' इस समय पहाड़ी नदियाँ वर्षाके नूतन जलको बड़े वेगसे बहा रही हैं । वह जल सर्ज और कदम्बके फूलोंसे मिश्रित है, पर्वतके गेरू आदि धातुओंसे लाल रंगका हो गया है तथा मयूरोंकी केकाध्वनि उस जल कलकलनादका अनुसरण कर रही है ॥ १८ ॥
रसाकुलं षट्पदसंनिकाशं प्रभुज्यते जम्बुफलं प्रकामम् । अनेकवर्णं पवनावधूतं भूमौ पतत्याम्रफलं विपक्वम् ॥ १ ९ ॥ ' काले - काले भौंरोंके समान प्रतीत होनेवाले जामुनके सरस फल आजकल लोग जी भरकर खाते हैं और हवाके वेगसे हिले हुए आमके पके हुए बहुरंगी फल पृथ्वीपर गिरते रहते है ॥१ ९ ॥ विद्युत्पताकाः सबलाकमाला: शैलेन्द्रकूटाकृतिसंनिकाशाः । गर्जन्ति मेघाः समुदीर्णनादा मत्ता गजेन्द्रा इव संयुगस्थाः ॥ २० ॥
' जैसे युद्धस्थलमें खड़े हुए मतवाले गजराज उच्चस्वरसे चिग्घाड़ते हैं, उसी प्रकार गिरिराजके शिखरोंकी-सी आकृतिवाले मेघ जोर - जोरसे गर्जना कर रहे हैं । चमकती हुई बिजलियाँ इन मेघरूपी गजराजोंपर पताकाओंके समान फहरा रही हैं और बगुलोंकी पंक्तियाँ मालाके समान शोभा देती हैं ॥ २० ॥
वर्षोदकाप्यायितशाद्वलानि प्रवृत्तनृत्तोत्सवबर्हिणानि वनानि निर्वृष्टबलाहकानि पश्यापराह्णेष्वधिकं विभान्ति ॥ २१ ॥
' देखो, अपराह्नकालमें इन वनोंकी शोभा अधिक बढ़ जाती है । वर्षाके जलसे इनमें हरी - हरी घासें बढ़ गयी हैं । झुंड के झुंड मोरोंने अपना नृत्योत्सव आरम्भ कर दिया है और मेघोंने इनमें निरन्तर जल बरसाया है ॥ समुद्वहन्तः सलिलातिभारं बलाकिनो वारिधरा नदन्तः । महत्सु श्रङ्गेषु महीधराणां विश्रम्य विश्रम्य पुनः प्रयान्ति ॥ २२ ॥
' बक- पंक्तियोंसे सुशोभित ये जलधर मेघ जलका अधिक भार ढोते और गर्जते हुए बड़े - बड़े पर्वतशिखरोंपर मानो विश्राम ले - लेकर आगे बढ़ते हैं ॥ २२ ॥
मेघाभिकामा परिसम्पतन्ती सम्मोदिता भाति बलाकपंक्तिः । वातावधूता वरपौण्डरीकी लम्बेव माला रुचिराम्बरस्य ॥ २३ ॥
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किष्किन्धाकाण्डे ' गर्भ धारणके लिये मेघोंकी कामना रखकर । आकाशमें उड़ती हुई आनन्दमग्न बलाकाओंकी पंक्ति ऐसी जान पड़ती है, मानो आकाशके गलेमें हवासे हिलती हुई श्वेत कमलोंकी सुन्दर माला लटक रही हो ॥ २३ ॥
बालेन्द्रगोपान्तरचित्रितेन विभाति भूमिर्नवशाद्वलेन । गात्रानुपृक्तेन शुभे नारीव लाक्षोक्षितकम्बलेन ॥ २४ ॥
' छोटे - छोटे इन्द्रगोप ( वीरबहूटी ) नामक कीड़ोंसे बीच - बीचमें चित्रित हुई नूतन घाससे आच्छादित भूमि उस नारीके समान शोभा पाती है, जिसने अपने अङ्गपर तोतेके समान रंगवाला एक ऐसा कम्बल ओढ रखा हो, जिसको बीच - बीचमें महावरके रंगसे रँगकर विचित्र शोभासे सम्पन्न कर दिया गया हो ॥ २४ ॥
निद्रा शनैः केशवमभ्युपैति द्रुतं नदी सागरमभ्युपैति । हृष्टा बलाका घनमभ्युपैति कान्ता सकामा प्रियमभ्युपैति ॥ २५ ॥
' चौमासेके इस आरम्भकालमें निद्रा धीरे - धीरे भगवान् केशवके समीप जा रही है । नदी तीव्र वेगसे समुद्रके निकट पहुँच रही है । हर्षभरी बलाका उड़कर मेघकी ओर जा रही है और प्रियतमा सकामभावसे अपने प्रियतमकी सेवामें उपस्थित हो रही है ॥ २५ ॥
जाता वनान्ताः शिखिसुप्रनृत्ता जाताः कदम्बाः सकदम्बशाखा: । जाता वृषा गोषु समानकामा जाता मही सस्यवनाभिरामा ॥ २६ ॥
' वनप्रान्त मोरोंके सुन्दर नृत्यसे सुशोभित हो गये हैं । कदम्बवृक्ष फूलों और शाखाओंसे सम्पन्न हो गये हैं । साँड़ गौओंके प्रति उन्हींके समान कामभावसे आसक्त हैं और पृथ्वी हरी - हरी खेती तथा हरे - भरे वनोंसे अत्यन्त रमणीय प्रतीत होने लगी है ॥ २६ ॥
वहन्ति वर्षन्ति नदन्ति भान्ति ध्यायन्ति नृत्यन्ति समाश्वसन्ति । नद्य घना मत्तगजा वनान्ताः प्रियाविहीनाः शिखिनः प्लवंगमाः ॥ २७ ॥
' नदियाँ बह रही हैं, बादल पानी बरसा रहे हैं, मतवाले हाथी चिग्घाड़ रहे हैं, वनप्रान्त शोभा पा रहे हैं, प्रियतमाके संयोगसे वञ्चित हुए वियोगी प्राणी चिन्तामग्न अष्टाविंशः सर्गः ८२७ हो रहे हैं, मोर नाच रहे हैं और वानर निश्चिन्त एवं सुखी हो रहे हैं ॥ २७ ॥
प्रहर्षिताः केतकिपुष्पगन्ध-मात्राय मत्ता वननिर्झरेषु । प्रपातशब्दाकुलिता गजेन्द्राः सार्धं मयूरैः समदा नदन्ति ॥ २८ ॥
' वनके झरनोंके समीप क्रीडासे उल्लसित हुए मदवर्षी गजराज केवड़ेके फूलकी सुगन्धको सूँघकर मतवाले हो उठे हैं और झरनेके जलके गिरनेसे जो शब्द होता है, उससे आकुल हो ये मोरोंके बोलनेके साथ-साथ स्वयं भी गर्जना करते हैं ॥ २८ ॥
धारानिपातैरभिहन्यमानाः कदम्बशाखासु विलम्बमानाः । क्षणार्जितं पुष्परसावगाढं शनैर्मदं षट्चरणास्त्यजन्ति ॥ २ ९ ॥ ' जलकी धारा गिरनेसे आहत होते और कदम्बकी डालियोंपर लटकते हुए भ्रमर तत्काल ग्रहण किये पुष्परससे उत्पन्न गाढ़ मदको धीरे - धीरे त्याग रहे हैं ॥ अङ्गारचूर्णोत्करसंनिकाशैः फलैः सुपर्याप्तरसैः समृद्धैः । जम्बूद्रुमाणां प्रविभान्ति शाखा निपीयमाना इव षट्पदौघैः ॥ ३० ॥
' कोयलोंकी चूर्णराशिके समान काले और प्रचुर रससे भरे हुए बड़े - बड़े फलोंसे लदी हुई जामुन - वृक्षकी शाखाएँ ऐसी जान पड़ती हैं, मानो भ्रमरोंके समुदाय उनमें सटकर उनके रस पी रहे हैं ॥ ३० ॥
तडित्पताकाभिरलंकृताना-मुदीर्णगम्भीरमहारवाणाम् | विभान्ति रूप बलाहकानां रणोत्सुकानामिव वारणानाम् ॥ ३१ ॥
' विद्युत् - रूपी पताकाओंसे अलंकृत एवं जोर-जोरसे गम्भीर गर्जना करनेवाले इन बादलोंके रूप युद्धके । लिये उत्सुक हुए गजराजोंके समान प्रतीत होते हैं ॥ ३१ ॥
मार्गानुगः शैलवनानुसारी सम्प्रस्थितो मेघरवं निशम्य । युद्धाभिकामः प्रतिनादशङ्की मत्तो गजेन्द्रः प्रतिसंनिवृत्तः ॥ ३२ ॥
' पर्वतीय वनोंमें विचरण करनेवाला तथा अपने प्रतिद्वन्द्वीके साथ युद्धकी इच्छा रखनेवाला मदमत्त | गजराज, जो अपने मार्गका अनुसरण करके आगे बढ़ा
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८२८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे जा रहा था, पीछेसे मेघकी गर्जना सुनकर प्रतिपक्षी हाथीके गर्जनेकी आशङ्का करके सहसा पीछेको लौट पड़ा ॥ ३२ ॥
क्वचित् प्रगीता इव षट्पदौघैः
क्वचित् प्रनृत्ता इव नीलकण्ठैः ।
क्वचित् प्रमत्ता इव वारणेन्द्रै-विभान्त्यनेकाश्रयिणो वनान्ताः ॥ ३३ ॥
' कहीं भ्रमरोंके समूह गीत गा रहे हैं, कहीं मोर नाच रहे हैं और कहीं गजराज मदमत्त होकर विचर रहे हैं । इस प्रकार ये वनप्रान्त अनेक भावोंके आश्रय बनकर शोभा पा रहे हैं ॥ ३३ ॥
कदम्बसर्जार्जुनकन्दलाढ्या वनान्तभूमिर्मधुवारिपूर्णा 1 मयूरमत्ताभिरुतप्रनृत्तै-रापानभूमिप्रतिमा विभाति ॥ ३४ ॥
' कदम्ब, सर्ज, अर्जुन और स्थल - कमलसे सम्पन्न वनके भीतरकी भूमि मधु - जलसे परिपूर्ण हो मोरोंके मदयुक्त कलरवों और नृत्योंसे उपलक्षित होकर आपानभूमि ( मधुशाला ) के समान प्रतीत होती है ॥ ३४ ॥
मुक्तासमाभं सलिलं पतद्वै सुनिर्मलं पत्रपुटेषु लग्नम् । हृष्टा विवर्णच्छदना विहंगाः सुरेन्द्रदत्तं तृषिताः पिबन्ति ॥ ३५ ॥
' आकाशसे गिरता हुआ मोतीके समान स्वच्छ एवं निर्मल जल पत्तोंके दोनोंमें संचित हुआ देख प्यासे पक्षी पपीहे हर्षसे भरकर देवराज इन्द्रके दिये हुए उस जलको पीते हैं । वर्षासे भीग जानेके कारण उनकी पाँखें विविध रंगकी दिखायी देती हैं ॥ ३५ ॥
षट्पादतन्त्रीमधुराभिधानं
प्लवंगमोदीरितकण्ठतालम् ।
आविष्कृतं मेघमृदङ्गनादै-र्वनेषु संगीतमिव प्रवृत्तम् ॥ ३६ ॥
' भ्रमररूप वीणाकी मधुर झंकार हो रही है । मेढकोंकी आवाज कण्ठताल - सी जान पड़ती है । मेघोंकी गर्जनाके रूपमें मृदङ्ग बज रहे हैं । इस प्रकार वनमें संगीतोत्सवका आरम्भ - सा हो रहा है ॥ ३६ ॥
क्वचित् प्रनृत्तैः क्वचिदुन्नदद्भिः
क्वचिच्च वृक्षाग्रनिषण्णकायैः ।
व्यालम्बबर्हाभरणैर्मयूरै-र्वनेषु संगीतमिव प्रवृत्तम् ॥ ३७ ॥
' विशाल पंखरूपी आभूषणोंसे विभूषित मोर वनोंमें कहीं नाच रहे हैं, कहीं जोर - जोरसे मीठी बोली बोल रहे हैं और कहीं वृक्षोंकी शाखाओंपर अपने सारे शरीरका बोझ डालकर बैठे हुए हैं । इस प्रकार उन्होंने संगीत ( नाच - गान ) का आयोजन - सा कर रखा है ॥ ३७ ॥
स्वनैर्घनानां प्लवगाः प्रबुद्धा विहाय निद्रां चिरसंनिरुद्धाम् । अनेकरूपाकृतिवर्णनादा नवाम्बुधाराभिहता नदन्ति ॥ ३८ ॥
' मेघोंकी गर्जना सुनकर चिरकालसे रोकी हुई निद्राको त्यागकर जागे हुए अनेक प्रकारके रूप, आकार, वर्ण और बोलीवाले मेढक नूतन जलकी धारासे अभिहत होकर जोर - जोरसे बोल रहे हैं ॥ ३८ ॥
नद्यः समुद्वाहितचक्रवाका-स्तटानि शीर्णान्यपवाहयित्वा ।
दृप्ता नवप्रावृतपूर्णभोगा-दृतं स्वभर्तारमुपोपयान्ति ॥ ३ ९ ॥
( कामातुर युवतियोंकी भाँति ) दर्पभरी नदियाँ अपने वक्षपर ( उरोजोंके स्थानमें ) चक्रवाकोंको वहन करती हैं और मर्यादामें रखनेवाले जीर्ण - शीर्ण कूलकगारोंको तोड़ - फोड़ एवं दूर बहाकर नूतन पुष्प आदिके उपहारसे पूर्ण भोगके लिये सादर स्वीकृत अपने स्वामी समुद्रके समीप वेगपूर्वक चली जा रही हैं ॥३ ९ ॥ नीलेषु नीला नववारिपूर्णा मेघेषु मेघाः प्रतिभान्ति सक्ताः । दवाग्निदग्धेषु दवाग्निदग्धाः शैलेषु शैला इव बद्धमूलाः ॥४० ॥
' नीले मेघोंमें सटे हुए नूतन जलसे परिपूर्ण नील मेघ ऐसे प्रतीत होते हैं, मानो दावानलसे जले हुए पर्वतोंमें दावानलसे दग्ध हुए दूसरे पर्वत बद्धमूल होकर सट गये हों ॥ ४० ॥
प्रमत्तसंनादितबर्हिणानि सशक्रगोपाकुलशाद्वलानि 1 चरन्ति नीपार्जुनवासितानि गजाः सुरम्याणि वनान्तराणि ॥ ४१ ॥
' जहाँ मतवाले मोर कलनाद कर रहे हैं, जहाँकी हरी - हरी घासें वीरबहूटियोंके समुदायसे व्याप्त हो रही हैं तथा जो नीप और अर्जुन - वृक्षोंके फूलोंकी सुगन्धसे सुवासित हैं, उन परम रमणीय वनप्रान्तोंमें बहुत - से हाथी विचरा करते हैं ॥ ४१ ॥