वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ — पृष्ठ 821–830
वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 821–830
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किष्किन्धाकाण्डे मुखवाले विषधर सर्पको वहाँसे निकाला गया हो ॥ १७३ ॥ ।
तस्य निष्कृष्यमाणस्य बाणस्यापि बभौ द्युतिः ॥ १८ ॥
अस्तमस्तकसंरुद्धरश्मेर्दिनकरादिव वालीके शरीरसे निकाले जाते हुए उस बाणकी कान्ति अस्ताचलके शिखरपर अवरुद्ध किरणोंवाले सूर्यकी प्रभाके समान जान पड़ती थी ॥१८३ ॥
पेतुः क्षतजधारास्तु व्रणेभ्यस्तस्य सर्वशः ॥ १ ९ ॥ ताम्म्रगैरिकसम्पृक्ता धारा इव धराधरात् । बाणके निकाल लिये जानेपर वालीके शरीरके सभी घावोंसे खूनकी धाराएँ गिरने लगीं, मानो किसी पर्वतसे लाल गेरूमिश्रित जलकी धाराएँ बह रही हों ॥ १ ९ ३ ॥ अवकीर्णं विमार्जन्ती भर्तारं रणरेणुना ॥ २० ॥
अस्त्रैर्नयनजैः शूरं सिषेचास्त्रसमाहतम् । वालीका शरीर रणभूमिकी धूलसे भर गया था । उस समय तारा बाणसे आहत हुए अपने शूरवीर स्वामीके उस शरीरको पोंछती हुई उन्हें नेत्रोंके अश्रुजलसे सींचने लगी ॥ २०३ ॥
रुधिरोक्षितसर्वाङ्गं दृष्ट्वा विनिहतं पतिम् ॥ २१ ॥
उवाच तारा पिङ्गाक्षं पुत्रमङ्गदमङ्गना । अपने मारे गये पतिके सारे अङ्गोंको रक्तसे भीगा हुआ देख वालि - पत्नी ताराने अपने भूरे नेत्रोंवाले पुत्र अङ्गदसे कहा— ॥ २१३ ॥
अवस्थां पश्चिमां पश्य पितुः पुत्र सुदारुणाम् ॥ २२ ॥
सम्प्रसक्तस्य वैरस्य गतोऽन्तः पापकर्मणा । ' बेटा! देखो, तुम्हारे पिताकी अन्तिम अवस्था कितनी भयंकर है । ये इस समय पूर्व पापके कारण प्राप्त हुए वैरसे पार हो चुके हैं ॥ २२३ ॥
बालसूर्योज्ज्वलतनुं प्रयातं यमसादनम् ॥ २३ ॥
अभिवादय राजानं पितरं पुत्र मानदम् । ‘ वत्स! प्रात: कालके सूर्यकी भाँति अरुण गौर शरीरवाले तुम्हारे पिता राजा वाली अब यमलोकको जा पहुँचे । ये
तुम्हें बड़ा आदर देते थे । तुम इनके चरणोंमें प्रणाम करो ' ॥
एवमुक्तः समुत्थाय जग्राह चरणौ पितुः ॥ २४ ॥
भुजाभ्यां पीनवृत्ताभ्यामङ्गदोऽहमिति ब्रुवन् । माताके ऐसा कहनेपर अङ्गदने उठकर अपनी मोटी और गोलाकार भुजाओंद्वारा पिताके दोनों पैर पकड़ लिये और प्रणाम करते हुए कहा — ' पिताजी! मैं अङ्गद हूँ ' ॥ त्रयोविंशः सर्गः ८० ९ अभिवादयमानं त्वामङ्गदं त्वं यथा पुरा ॥ २५ ॥
दीर्घायुर्भव पुत्रेति किमर्थं नाभिभाषसे । तब तारा फिर कहने लगी- ' प्राणनाथ! कुमार अङ्गद पहलेकी ही भाँति आज भी आपके चरणोंमें प्रणाम करता है, किंतु आप इसे ' चिरंजीवी रहो बेटा ' ऐसा कहकर आशीर्वाद क्यों नहीं देते हैं? ॥ २५३ ॥
अहं पुत्रसहाया त्वामुपासे गतचेतनम् ।
सिंहेन पातितं सद्यो गौः सवत्सेव गोवृषम् ॥ २६ ॥
‘ जैसे कोई बछड़ेसहित गाय सिंहके द्वारा तत्काल मार गिराये हुए साँड़के पास खड़ी हो, उसी प्रकार पुत्रसहित मैं प्राणहीन हुए आपकी सेवामें बैठी हूँ ॥ २६ ॥
इष्ट्वा संग्रामयज्ञेन रामप्रहरणाम्भसा ।
तस्मिन्नवभृथे स्नातः कथं पत्ल्या मया विना ॥ २७ ॥
' आपने युद्धरूपी यज्ञका अनुष्ठान करके श्रीरामके बाणरूपी जलसे मुझ पत्नीके बिना अकेले ही अवभृथस्नान कैसे कर लिया? ॥ २७ ॥
या दत्ता देवराजेन तव तुष्टेन संयुगे ।
शातकौम्भीं प्रियां मालां तां ते पश्यामि नेह किम् ॥ २८ ॥
' युद्धमें आपसे संतुष्ट हुए देवराज इन्द्रने आपको जो सोनेकी प्रिय माला दे रखी थी, उसे मैं इस समय आपके गलेमें क्यों नहीं देखती हूँ? ॥ २८ ॥
राज्यश्रीर्न जहाति त्वां गतासुमपि मानद ।
सूर्यस्यावर्तमानस्य शैलराजमिव प्रभा ॥ २ ९ ॥
' दूसरोंको मान देनेवाले वानरराज! प्राणहीन हो जानेपर भी आपको राज्यलक्ष्मी उसी प्रकार नहीं छोड़ रही है, जैसे चारों ओर चक्कर लगानेवाले सूर्यदेवकी प्रभा गिरिराज मेरुको कभी नहीं छोड़ती है ॥२ ९ ॥ न मे वचः पथ्यमिदं त्वया कृतं न चास्मि शक्ता हि निवारणे तव । हता सपुत्रास्मि हतेन संयुगे सह त्वया श्रीर्विजहाति मामपि ॥ ३० ॥
' मैंने आपके हितकी बात कही थी; परंतु आपने उसे नहीं स्वीकार किया । मैं भी आपको रोक रखनेमें समर्थ न हो सकी । इसका फल यह हुआ कि आप युद्धमें मारे गये । आपके मारे जानेसे मैं भी अपने पुत्रसहित मारी गयी । अब लक्ष्मी आपके साथ ही मुझे और मेरे पुत्रको । भी छोड़ रही है ' ॥ ३० ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे त्रयोविंशः सर्गः ॥२३ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें तेईसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ २३ ॥
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८१० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे चतुर्विंशः सर्गः सुग्रीवका शोकमग्न होकर श्रीरामसे प्राणत्यागके लिये आज्ञा माँगना, ताराका श्रीरामसे अपने वधके लिये प्रार्थना तामाशु वेगेन दुरासदेन त्वभिप्लुतां शोकमहार्णवेन । पश्यंस्तदा वाल्यनुजस्तरस्वी भ्रातुर्वधेनाप्रतिमेन तेपे ॥ १ ॥
अत्यन्त वेगशाली और दुःसह शोकसमुद्रमें डूबी हुई ताराकी ओर दृष्टिपात करके वालीके छोटे भाई वेगवान् सुग्रीवको उस समय अपने भाईके वधसे बड़ा संताप हुआ । स बाष्पपूर्णेन मुखेन पश्यन् क्षणेन निर्विण्णमना मनस्वी । जगाम रामस्य शनैः समीपं भृत्यैर्वृतः सम्परिदूयमानः ॥ २ ॥
उनके मुखपर आँसुओंकी धारा बह चली । उनका मन खिन्न हो गया और वे भीतर - ही - भीतर कष्टका अनुभव करते हुए अपने भृत्योंके साथ धीरे - धीरे श्रीरामचन्द्रजीके पास गये ॥२ ॥
स तं समासाद्य गृहीतचाप-मुदात्तमाशीविषतुल्यबाणम् । यशस्विनं लक्षणलक्षिताङ्ग मवस्थितं राघवमित्युवाच ॥ ३ ॥
जिन्होंने धनुष ले रखा था, जिनमें धीरोदात्त नायकका स्वभाव विद्यमान था, जिनके बाण विषधर सर्पके समान भयंकर थे, जिनका प्रत्येक अङ्ग सामुद्रिक शास्त्रके अनुसार उत्तम लक्षणोंसे लक्षित था तथा जो परम यशस्वी थे, वहाँ खड़े हुए उन श्रीरघुनाथजीके पास जाकर सुग्रीव इस प्रकार बोले —॥३ ॥
यथा प्रतिज्ञातमिदं नरेन्द्र कृतं त्वया दृष्टफलं च कर्म । ममाद्य भोगेषु नरेन्द्रसुनो मनो निवृत्तं हतजीवितेन ॥ ४ ॥
' नरेन्द्र! आपने जैसी प्रतिज्ञा की थी, उसके अनुसार यह काम कर दिखाया । इस कर्मका राज्य-लाभरूप फल भी प्रत्यक्ष ही है । किंतु राजकुमार! इससे मेरा जीवन निन्दनीय हो गया है । अतः अब मेरा मन सभी भोगोंसे निवृत्त हो गया ॥ ४ ॥
अस्यां महिष्यां तु भृशं रुदत्यां पुरेऽतिविक्रोशति दुःखतप्ते । करना और श्रीरामका उसे समझाना नृपे संशयितेऽङ्गदे च न राम राज्ये रमते मनो मे ॥ ५ ॥
' श्रीराम! राजा वालीके मारे जानेसे ये महारानी तारा अत्यन्त विलाप कर रही हैं । सारा नगर दुःखसे संतप्त होकर चीख रहा है तथा कुमार अङ्गदका जीवन भी संशयमें पड़ गया है । इन सब कारणोंसे अब राज्यमें मेरा मन नहीं लगता है ॥५ ॥
क्रोधादमर्षादतिविप्रधर्षाद् भ्रातुर्वधो मेऽनुमतः पुरस्तात् । त्विदानीं हरियूथपेऽस्मिन् सुतीक्ष्णमिक्ष्वाकुवर प्रतप्स्ये ॥ ६ ॥
' इक्ष्वाकुकुलके गौरव श्रीरघुनाथजी! भाईने मेरा बहुत अधिक तिरस्कार किया था, इसलिये क्रोध और अमर्षके कारण पहले मैंने उसके वधके लिये अनुमति दे दी थी; परंतु अब वानरयूथपति वालीके मारे जानेपर मुझे बड़ा संताप हो रहा है । सम्भवतः जीवनभर यह संताप बना ही रहेगा ॥ ६ ॥
श्रेयोऽद्य मन्ये मम शैलमुख्ये तस्मिन् हि वासश्चिरमृष्यमूके । यथा तथा वर्तयतः स्ववृत्त्या मं निहत्य त्रिदिवस्य लाभः ॥ ७ ॥
' अपनी जातीय वृत्तिके अनुसार जैसे - तैसे जीवन-निर्वाह करते हुए उस श्रेष्ठ पर्वत ऋष्यमूकपर चिरकालतक रहना ही आज मैं अपने लिये कल्याणकारी समझता हूँ; किंतु अपने इस भाईका वध कराकर अब मुझे स्वर्गका भी राज्य मिल जाय तो मैं उसे अपने लिये श्रेयस्कर नहीं मानता हूँ ॥७ ॥
न त्वा जिघांसामि चरेति यन्मा-मयं महात्मा मतिमानुवाच ।
तस्यैव तद् राम वचोऽनुरूप-मिदं वचः कर्म च मेऽनुरूपम् ॥ ८ ॥
' बुद्धिमान् महात्मा वालीने युद्धके समय मुझसे कहा था कि ' तुम चले जाओ, मैं तुम्हारे प्राण लेना नहीं चाहता ' । श्रीराम! उनकी यह बात उन्हींके योग्य थी और मैंने जो आपसे कहकर उनका वध कराया, मेरा वह क्रूरतापूर्ण वचन और कर्म मेरे ही अनुरूप है ॥ ८ ॥
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किष्किन्धाकाण्डे भ्राता कथं नाम महागुणस्य भ्रातुर्वधं राम विरोचयेत । राज्यस्य दुःखस्य च वीर सारं विचिन्तयन् कामपुरस्कृतोऽपि ॥ ९ ॥
' वीर रघुनन्दन! कोई कितना ही स्वार्थी क्यों न हो? यदि राज्यके सुख तथा भ्रातृ - वधसे होनेवाले दुःखकी प्रबलतापर विचार करेगा तो वह भाई होकर अपने महान् गुणवान् भाईका वध कैसे अच्छा समझेगा? ॥९ ॥
Tut हि मे मतो नासीत् स्वमाहात्म्यव्यतिक्रमात् ।
ममासीद् बुद्धिदौरात्म्यात् प्राणहारी व्यतिक्रमः ॥ १० ॥
' वालीके मनमें मेरे वधका विचार नहीं था; क्योंकि इससे उन्हें अपनी मान - प्रतिष्ठामें बट्टा लगनेका डर था । मेरी ही बुद्धिमें दुष्टता भरी थी, जिसके कारण मैंने अपने भाईके प्रति ऐसा अपराध कर डाला, जो उनके लिये घातक सिद्ध हुआ ॥ १० ॥
द्रुमशाखावभग्नोऽहं मुहूर्तं परिनिष्टनन् ॥ सान्त्वयित्वा त्वनेनोक्तो न पुनः कर्तुमर्हसि ॥ ११ ॥
' जब वालीने मुझे एक वृक्षकी शाखासे घायल कर दिया और मैं दो घड़ीतक कराहता रहा, तब उन्होंने मुझे सान्त्वना देकर कहा - ' जाओ, फिर मेरे साथ युद्ध करनेकी इच्छा न करना ' ॥ ११ ॥
भ्रातृत्वमार्यभावश्च धर्मश्चानेन रक्षितः ।
मया क्रोधश्च कामश्च कपित्वं च प्रदर्शितम् ॥ १२ ॥
' उन्होंने भ्रातृभाव, आर्यभाव और धर्मकी भी रक्षा की है; परंतु मैंने केवल काम, क्रोध और वानरोचित चपलताका ही परिचय दिया है ॥ १२ ॥
अचिन्तनीयं प्राप्तोऽस्मि ' मित्र! भागी हुए थे, पापका भागी परिवर्जनीय-मनीप्सनीयं स्वनवेक्षणीयम् । पाप्मानमिदं वयस्य भ्रातुर्वधात् त्वाष्ट्रवधादिवेन्द्रः ॥ १३ ॥
जैसे वृत्रासुरका वध करनेसे इन्द्र पापके उसी प्रकार मैं भाईका वध कराकर ऐसे हुआ हूँ, जिसको करना तो दूर रहा, सोचना भी अनुचित है । श्रेष्ठ पुरुषोंके लिये जो सर्वथा त्याज्य, अवाञ्छनीय तथा देखनेके भी अयोग्य है ॥ १३ ॥
पाप्मानमिन्द्रस्य मही लं वृक्षाश्च कामं जगृहुः स्त्रियश्च । को नाम पाप्मानमिमं सहेत शाखामृगस्य प्रतिपत्तुमिच्छेत् ॥ १४ ॥
' इन्द्रके पापको तो पृथ्वी, जल, वृक्ष और स्त्रियोंने स्वेच्छासे ग्रहण कर लिया था; परंतु मुझ जैसे वानरके इस चतुर्विंशः सर्गः ८११ पापको कौन लेना चाहेगा? अथवा कौन ले सकेगा? ॥ १४ ॥
नाहमि सम्मानमिमं प्रजानां
न यौवराज्यं कुत एव राज्यम् ।
अधर्मयुक्तं कुलनाशयुक्त-मेवंविधं राघव कर्म कृत्वा ॥ १५ ॥
' रघुनाथजी! अपने कुलका नाश करनेवाला ऐसा पापपूर्ण कर्म करके मैं प्रजाके सम्मानका पात्र नहीं रहा । राज्य पाना तो दूरकी बात है, मुझमें युवराज होनेकी भी योग्यता नहीं है ॥ १५ ॥
पापस्य कर्तास्मि विगर्हितस्य क्षुद्रस्य लोकापकृतस्य लोके । शोको महान् मामभिवर्ततेऽयं वृष्टेर्यथा निम्नमिवाम्बुवेगः ॥ १६ ॥
' मैंने वह लोकनिन्दित पापकर्म किया है, जो नीच पुरुषोंके योग्य तथा सम्पूर्ण जगत्को हानि पहुँचानेवाला है । जैसे वर्षाके जलका वेग नीची भूमिकी ओर जाता है, उसी प्रकार यह भ्रातृ - वधजनित महान् शोक सब ओरसे मुझपर ही आक्रमण कर रहा है ॥१६ ॥
सोदर्यघातापरगात्रवालः संतापहस्ताक्षिशिरोविषाणः 1 मामभिहन्ति हस्ती दृप्तो नदीकूलमिव प्रवृद्धः ॥ १७ ॥
' भाईका वध ही जिसके शरीरका पिछला भाग और पुच्छ है तथा उससे होनेवाला संताप ही जिसकी सूँड, नेत्र, मस्तक और दाँत हैं, वह पापरूपी महान् मदमत्त गजराज नदीतटकी भाँति मुझपर ही आघात कर रहा है ॥ १७ ॥
अंहो बतेदं नृवराविषह्यं निवर्तते मे हृदि साधुवृत्तम् । अग्नौ विवर्णं परितप्यमानं किट्टं यथा राघव जातरूपम् ॥ १८ ॥
' नरेश्वर! रघुनन्दन! मैंने जो दुःसह पाप किया है, यह मेरे हृदयस्थित सदाचारको भी नष्ट कर रहा है । ठीक उसी तरह, जैसे आगमें तपाया जानेवाला मलिन सुवर्ण अपने भीतरके मलको नष्ट कर देता है ॥ १८ ॥
महाबलानां हरियूथपाना-मिदं कुलं राघव मन्निमित्तम् ।
अस्याङ्गस्यापि च शोकतापा-दर्धस्थितप्राणमितीव मन्ये ॥ १ ९ ॥
' रघुनाथजी! मेरे ही कारण वालीका वध हुआ, जिससे इस अङ्गदका भी शोक - संताप बढ़ गया और | इसीलिये इन महाबली वानर - यूथपतियोंका समुदाय
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८१२ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे अधमरा - सा जान पड़ता है ॥ १ ९ ॥ सुतः सुलभ्यः सुजनः सुवश्यः कुतस्तु पुत्रः सदृशोऽङ्गदेन । न चापि विद्येत स वीर देशो यस्मिन् भवेत् सोदरसंनिकर्षः ॥ २० ॥
' वीरवर! सुजन और वशमें रहनेवाला पुत्र तो मिल सकता है, परंतु अङ्गदके समान बेटा कहाँ मिलेगा? तथा ऐसा कोई देश नहीं है, जहाँ मुझे अपने भाईका सामीप्य मिल सके ॥ २० ॥
अद्याङ्गदो वीरवरो न जीवे-ज्जीवेत माता परिपालनार्थम् । विना तु पुत्रं परितापदीना सा नैव जीवेदिति निश्चितं मे ॥ २१ ॥
' अब वीरवर अङ्गद भी जीवित नहीं रह सकता । यदि जी सकता तो उसकी रक्षाके लिये उसकी माता भी जीवन धारण करती । वह बेचारी तो यों ही संतापसे दीन हो रही है, यदि पुत्र भी न रहा तो उसके जीवनका अन्त हो जायगा - यह बिलकुल निश्चित बात है ॥ २१ ॥
सोऽहं प्रवेक्ष्याम्यतिदीप्तमग्निं भ्रात्रा च पुत्रेण च सख्यमिच्छन् । इमे विचेष्यन्ति हरिप्रवीराः सीतां निदेशे परिवर्तमानाः ॥ २२ ॥
' अतः मैं अपने भाई और पुत्रका साथ देनेकी इच्छासे प्रज्वलित अग्निमें प्रवेश करूँगा । ये वानर वीर आपकी आज्ञामें रहकर सीताकी खोज करेंगे ॥ २२ ॥
कृत्स्नं तु ते सेत्स्यति कार्यमेत-न्मय्यप्यतीते मनुजेन्द्रपुत्र । कुलस्य हन्तारमजीवनार्ह रामानुजानीहि कृतागसं माम् ॥ २३ ॥
' राजकुमार! मेरी मृत्यु हो जानेपर भी आपका सारा कार्य सिद्ध हो जायगा । मैं कुलकी हत्या करनेवाला और अपराधी हूँ । अतः संसारमें जीवन धारण करनेके योग्य नहीं हूँ । इसलिये श्रीराम! मुझे प्राणत्याग करने की आज्ञा दीजिये ' ॥ २३ ॥
इत्येवमार्तस्य रघुप्रवीरः श्रुत्वा वचो वालिजघन्यजस्य । संजातबाष्पः परवीरहन्ता रामो मुहूर्तं विमना बभूव ॥ २४ ॥
दुःखसे आतुर हुए सुग्रीवके, जो वालीके छोटे भाई थे, ऐसे वचन सुनकर शत्रुवीरोंका संहार करनेमें समर्थ, रघुकुलके वीर भगवान् श्रीरामके नेत्रोंसे आँसू । बहने लगे । वे दो घड़ीतक मन - ही - मन दुःखका अनुभव करते रहे ॥ २४ ॥
तस्मिन् क्षणेऽभीक्ष्णमवेक्षमाणः क्षितिक्षमावान् भुवनस्य गोप्ता । रामो रुदन्तीं व्यसने निमग्नां समुत्सुकः सोऽथ ददर्श ताराम् ॥ २५ ॥
श्रीरघुनाथजी पृथ्वीके समान क्षमाशील और सम्पूर्ण जगत्की रक्षा करनेवाले हैं । उन्होंने उस समय अधिक उत्सुक होकर जब इधर - उधर बारंबार दृष्टि दौड़ायी, तब शोकमग्ना तारा उन्हें दिखायी दी, जो अपने स्वामीके लिये रो रही थी ॥ २५ ॥
चारुनेत्रां कपिसिंहनाथां पतिं समाश्लिष्य तदा शयानाम् । उत्थापयामासुरदीनसत्त्वां मन्त्रिप्रधानाः कपिराजपत्नीम् ॥ २६ ॥
कपियोंमें सिंहके समान वीर वाली जिसके स्वामी एवं संरक्षक थे, जो वानरराज वालीकी रानी थी, जिसका हृदय उदार और नेत्र मनोहर थे, वह तारा उस समय अपने मृत पतिका आलिङ्गन करके पड़ी थी । श्रीरामको आते देख प्रधान - प्रधान मन्त्रियोंने ताराको वहाँसे उठाया ॥ सा विस्फुरन्ती परिरभ्यमाणा भर्तुः समीपादपनीयमाना । ददर्श रामं शरचापपाणिं स्वतेजसा सूर्यमिव ज्वलन्तम् ॥ २७ ॥
तारा जब पतिके समीपसे हटायी जाने लगी, तब बारंबार उसका आलिङ्गन करती हुई वह अपनेको छुड़ाने और छटपटाने लगी । इतनेहीमें उसने अपने सामने धनुष-बाण धारण किये श्रीरामको खड़ा देखा, जो अपने तेजसे सूर्यदेवके समान प्रकाशित हो रहे थे ॥ २७ ॥
सुसंवृतं पार्थिवलक्षणैश्च तं चारुनेत्रं मृगशावनेत्रा । अदृष्टपूर्वं मयं स वे राजोचित शुभ बड़े मनोहर थे । उन कभी देखनेमें नहीं आये समझ गयी कि ये ही तस्येन्द्रकल्पस्य पुरुषप्रधान-काकुत्स्थ इति प्रजज्ञे ॥२८ ॥
लक्षणोंसे सम्पन्न थे । उनके नेत्र पुरुषप्रवर श्रीरामको, जो पहले थे, देखकर मृगशावकनयनी तारा ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम हैं ॥ दुरासदस्य महानुभावस्य समीपमार्या । आर्तातितूर्णं व्यसनं प्रपन्ना जगाम तारा परिविह्वलन्ती ॥ २ ९ ॥
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किष्किन्धाकाण्डे उस समय घोर संकटमें पड़ी हुई शोकपीड़ित आर्या तारा अत्यन्त विह्वल हो गिरती - पड़ती तीव्र गतिसे महेन्द्रतुल्य दुर्जय वीर महानुभाव भगवान् श्रीरामके समीप गयी ॥ २ ९ ॥ तं सा समासाद्य विशुद्धसत्त्वं शोकेन सम्भ्रान्तशरीरभावा । मनस्विनी वाक्यमुवाच तारा रामं रणोत्कर्षणलब्धलक्ष्यम् ॥ ३० ॥
शोकके कारण वह अपने शरीरकी भी सुध - बुध खो बैठी थी । भगवान् श्रीराम विशुद्ध अन्तःकरणवाले तथा युद्धस्थलमें सबसे अधिक निपुणताके कारण लक्ष्य बेधनेमें अचूक थे, उनके पास पहुँचकर वह मनस्विनी तारा इस प्रकार बोली- ॥ ३० ॥
त्वमप्रमेयश्च दुरासदश्च जितेन्द्रियश्चोत्तमधर्मकश्च । अक्षीणकीर्तिश्च विचक्षणश्च क्षितिक्षमावान् क्षतजोपमाक्षः ॥ ३१ ॥
' रघुनन्दन! आप अप्रमेय ( देश, काल और वस्तुक सीमासे रहित ) हैं । आपको पाना बहुत कठिन है । आप जितेन्द्रिय तथा उत्तम धर्मका पालन करनेवाले हैं । आपकी कीर्ति कभी नष्ट नहीं होती । आप दूरदर्शी एवं पृथ्वीके
समान क्षमाशील हैं । आपकी आँखें कुछ - कुछ लाल हैं ॥ ३१ ॥
त्वमात्तबाणासनबाणपाणि-र्महाबलः संहननोपपन्नः । मनुष्यदेहाभ्युदयं विहाय दिव्येन देहाभ्युदयेन युक्तः ॥ ३२ ॥
' आपके हाथमें धनुष और बाण शोभा पा रहे हैं । आपका बल महान् है । आप सुदृढ़ शरीरसे सम्पन्न हैं और मनुष्य- शरीरसे प्राप्त होनेवाले लौकिक सुखका परित्याग करके भी दिव्य शरीरके ऐश्वर्यसे युक्त हैं ॥ ३२ ॥
येनैव बाणेन हतः प्रियो मे तेनैव बाणेन हि मां जहीहि । हता गमिष्यामि समीपमस्य न मां विना वीर रमेत वाली ॥ ३३ । ( ' अतः मैं प्रार्थना करती हूँ कि आपने जिस बाणसे मेरे प्रियतम पतिका वध किया है, उसी बाणसे आप मुझे
भी मार डालिये । मैं मरकर उनके समीप चली जाऊँगी ।
वीर! मेरे बिना वाली कहीं भी सुखी नहीं रह सकेंगे ॥ ३३ ॥
पद्मामलपत्रनेत्र समेत्य सम्प्रेक्ष्य च मामपश्यन् । न ह्येष उच्चावचताम्रचूडा विचित्रवेषाप्सरसोऽभजिष्यत् ॥ ३३ ॥
चतुर्विंशः सर्गः ८१३ ' अमलकमलदललोचन राम! स्वर्गमें जाकर भी जब वाली सब ओर दृष्टि डालनेपर मुझे नहीं देखेंगे, तब उनका मन वहाँ कदापि नहीं लगेगा; नाना प्रकारके लाल फूलोंसे विभूषित चोटी धारण करनेवाली तथा विचित्र वेशभूषासे मनोहर प्रतीत होनेवाली स्वर्गकी अप्सराओंको वे कभी स्वीकार नहीं करेंगे ॥ ३४ ॥
स्वर्गेऽपि शोकं च विवर्णतां च मया विना प्राप्स्यति वीर वाली । रम्ये नगेन्द्रस्य तटावका विदेहकन्यारहितो यथा त्वम् ॥ ३५ ॥
' वीरवर! स्वर्गमें भी वाली मेरे बिना शोकका अनुभव करेंगे और उनके शरीरकी कान्ति फीकी पड़ जायगी । वे उसी तरह दुःखी रहेंगे जैसे गिरिराज ऋष्यमूकके सुरम्य तट - प्रान्तमें विदेहनन्दिनी सीताके बिना आप कष्टका अनुभव करते हैं ॥ ३५ ॥
त्वं वेत्थ तावद् वनिताविहीनः प्राप्नोति दुःखं पुरुषः कुमारः । तत् त्वं प्रजानञ्जहि मां न वाली दुःखं ममादर्शनजं भजेत ॥ ३६ ॥
' स्त्रीके बिना युवा पुरुषको जो दुःख उठाना पड़ता है, उसे आप अच्छी तरह जानते हैं । इस तत्त्वको समझकर आप मेरा वध करिये, जिससे वालीको मेरे विरहका दुःख न भोगना पड़े ॥ ३६ ॥
यच्चापि मन्येत भवान् महात्मा स्त्रीघातदोषस्तु भवेन्न मह्यम् । आत्मेयमस्येति हि मां जहि त्वं न स्त्रीवधः स्यान्मनुजेन्द्रपुत्र ॥ ३७ ॥
' महाराजकुमार! आप महात्मा हैं, इसलिये यदि ऐसा चाहते हों कि मुझे स्त्री - हत्याका पाप न लगे तो ' यह
वालीकी आत्मा है ' ऐसा समझकर मेरा वध कीजिये ।
इससे आपको स्त्री - हत्याका पाप नहीं लगेगा ॥ ३७ ॥
शास्त्रप्रयोगाद् विविधाश्च वेदा-दनन्यरूपाः पुरुषस्य दाराः । दारप्रदानाद्धि न दानमन्यत् प्रदृश्यते ज्ञानवतां हि लोके ॥ ३८ ॥
' शास्त्रोक्त यज्ञ - यागादि कर्मोंमें पति और पत्नी दोनोंका संयुक्त अधिकार होता है — पत्नीको साथ लिये बिना पुरुष यज्ञकर्मका अनुष्ठान नहीं कर सकता । इसके सिवा नाना प्रकारकी वैदिक श्रुतियाँ भी पत्नीको पतिका आधा शरीर बतलाती हैं । दूसरे स्त्रियोंका अपने पतिसे अभिन्न होना । सिद्ध होता है । ( अतः मुझे मारनेसे आपको स्त्रीवधका
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८१४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे दोष नहीं लग सकता और वालीको स्त्रीकी प्राप्ति हो । जायगी; क्योंकि ) संसारमें ज्ञानी पुरुषोंकी दृष्टिमें स्त्रीदानसे बढ़कर दूसरा कोई दान नहीं है ॥ ३८ ॥
त्वं चापि मां तस्य मम प्रियस्य
प्रदास्यसे धर्ममवेक्ष्य वीर ।
अनेन दानेन न लप्स्यसे त्व-मधर्मयोगं मम वीर घातात् ॥ ३ ९ ॥
' वीरशिरोमणे! यदि धर्मकी ओर दृष्टि रखते हुए आप भी मुझे मेरे प्रियतम वालीको समर्पित कर देंगे तो इस दानके प्रभावसे मेरी हत्या करनेपर भी आपको पाप नहीं लगेगा ॥ ३ ९ ॥ आर्तामनाथामपनीयमाना-मेवंगतां नार्हसि मामहन्तुम् । अहं हि मातङ्गविलासगामिना प्लवंगमानामृषभेण धीमता । विना वरार्होत्तमहेममालिना चिरं न शक्ष्यामि नरेन्द्र जीवितुम् ॥ ४० ॥
' मैं दुःखिनी और अनाथा हूँ । पतिसे दूर कर दी गयी हूँ । ऐसी दशामें मुझे जीवित छोड़ना आपके लिये उचित नहीं है । नरेन्द्र! मैं सुन्दर एवं बहुमूल्य श्रेष्ठ सुवर्णमालासे अलंकृत तथा गजराजके समान विलासयुक्त गति से चलनेवाले बुद्धिमान् वानरश्रेष्ठ वालीके बिना अधिक कालतक जीवित नहीं रह सकूँगी ' ॥ ४० ॥
इत्येवमुक्तस्तु विभुर्महात्मा तारां समाश्वास्य हितं बभाषे । मा वीरभार्ये विमतिं कुरुष्व लोको हि सर्वो विहितो विधात्रा ॥ ४१ ॥ ।
ताराके ऐसा कहनेपर महात्मा भगवान् श्रीरामने उसे । आश्वासन देकर हितकी बात कही — ' वीरपत्नी! तुम मृत्यु-विषयक विपरीत विचारका त्याग करो; क्योंकि विधाता इस सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि की है ॥ ४१ ॥
चैव सर्वं सुखदुःखयोगं लोकोऽब्रवीत् तेन कृतं विधात्रा । त्रयोऽपि लोका विहितं विधानं नातिक्रमन्ते वशगा हि तस्य ॥ ४२ ॥
‘ विधाताने ही इस सारे जगत्को सुख - दुःखसे संयुक्त किया है । यह बात साधारणलोग भी कहते और जानते हैं । तीनों लोकोंके प्राणी विधाताके विधानका उल्लङ्घन नहीं कर सकते; क्योंकि सभी उसके अधीन हैं ॥ ४२ ॥
प्रीतिं परां प्राप्स्यसि तां तथैव पुत्रश्च ते प्राप्स्यति यौवराज्यम् । धात्रा विधानं विहितं तथैव न शूरपत्न्यः परिदेवयन्ति ॥ ४३ ॥
' तुम्हें पहलेकी ही भाँति अत्यन्त सुख एवं आनन्दकी प्राप्ति होगी तथा तुम्हारा पुत्र युवराजपद प्राप्त करेगा । विधाताका ऐसा ही विधान है । शूरवीरोंकी स्त्रियाँ इस प्रकार विलाप नहीं करती हैं । ( अत: तुम भी शोक छोड़कर शान्त हो जाओ ) ' ॥ आश्वासिता न महात्मना तु प्रभावयुक्तेन परंतपेन । सा वीरपत्नी ध्वनता मुखेन सुवेषरूपा विरराम तारा ॥ ४४ ॥
शत्रुओंको संताप देनेवाले परम प्रभावशाली महात्मा श्रीरामके इस प्रकार सान्त्वना देनेपर सुन्दर वेश और रूपवाली वीरपत्नी तारा, जिसके मुखसे विलापकी ध्वनि निकलती रहती थी, चुप हो गयी — उसने रोना-धोना छोड़ दिया ॥ ४४ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे चतुर्विंशः सर्गः ॥ २४ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें चौबीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ २४ ॥
पञ्चविंशः सर्गः लक्ष्मणसहित श्रीरामका सुग्रीव, तारा और अङ्गदको समझाना तथा वालीके दाह-संस्कारके लिये आज्ञा प्रदान करना, फिर तारा आदिसहित सब वानरोंका वालीके शवको श्मशानभूमिमें ले जाकर अङ्गदके द्वारा उसका दाह - संस्कार कराना और उसे जलाञ्जलि देना स सुग्रीवं च तारां च साङ्गदां सहलक्ष्मणः । ताराको सान्त्वना देते हुए इस प्रकार कहा- ॥१ ॥
समानशोकः काकुत्स्थः सान्त्वयन्निदमब्रवीत् ॥ १ ॥ न शोकपरितापेन श्रेयसा युज्यते मृतः ।
लक्ष्मणसहित श्रीरामचन्द्रजी सुग्रीव आदिके शोकसे यदत्रानन्तरं कार्यं तत् समाधातुमर्हथ ॥ २ ॥
उनके समान ही दुःखी थे । उन्होंने सुग्रीव, अङ्गद और । ' शोक - संताप करनेसे मरे हुए जीवकी कोई
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किष्किन्धाकाण्डे भलाई नहीं होती । अतः अब आगे जो कुछ कर्तव्य है, उसको तुम्हें विधिपूर्वक सम्पन्न करना चाहिये ॥ २ ॥
लोकवृत्तमनुष्ठेयं कृतं वो बाष्पमोक्षणम् ।
न कालादुत्तरं किंचित् कर्मशक्यमुपासितुम् ॥ ३ ॥
' तुम सब लोग बहुत आँसू बहा चुके । अब उसकी आवश्यकता नहीं है । लोकाचारका भी पालन होना चाहिये । समय बिताकर कोई भी विहित कर्म नहीं किया जा सकता ( क्योंकि उचित समयपर न किया जाय तो उस कर्मका कोई फल नहीं होता ) ॥ ३ ॥
नियतिः कारणं लोके नियतिः कर्मसाधनम् ।
नियतिः सर्वभूतानां नियोगेष्विह कारणम् ॥ ४ ॥
' जगत्में नियति ( काल ) ही सबका कारण है । वही समस्त कर्मोंका साधन है और काल ही समस्त प्राणियोंको विभिन्न कर्मोंमें नियुक्त करनेका कारण है ( क्योंकि वही सबका प्रवर्तक है ) ॥ ४ ॥
न कर्ता कस्यचित् कश्चिन्नियोगे नापि चेश्वरः ।
स्वभावे वर्तते लोकस्तस्य कालः परायणम् ॥ ५ ॥
' कोई भी पुरुष न तो स्वतन्त्रतापूर्वक किसी कामको कर सकता है और न किसी दूसरेको ही उसमें लगानेकी शक्ति रखता है । सारा जगत् स्वभावके अधीन है और स्वभावका आधार काल है ॥ ५ ॥
न कालः कालमत्येति न कालः परिहीयते ।
स्वभावं च समासाद्य न कश्चिदतिवर्तते ॥ ६ ॥
' काल भी कालका ( अपनी की हुई व्यवस्थाका ) उल्लंघन नहीं कर सकता । वह काल कभी क्षीण नहीं होता । स्वभाव ( प्रारब्धकर्म ) को पाकर कोई भी उसका उल्लङ्घन नहीं करता ॥ ६ ॥
न कालस्यास्ति बन्धुत्वं न हेतुर्न पराक्रमः ।
न मित्रज्ञातिसम्बन्धः कारणं नात्मनो वशः ॥ ७ ॥
‘ कालका किसीके साथ भाई - चारेका, मित्रताका अथवा जाति - बिरादरीका सम्बन्ध नहीं है । उसको वशमें करनेका कोई
उपाय नहीं है तथा उसपर किसीका पराक्रम नहीं चल सकता ।
कारणस्वरूप भगवान् काल जीवके भी वशमें नहीं है ॥
किं तु कालपरीणामो द्रष्टव्यः साधु पश्यता ।
धर्मश्चार्थश्च कामश्च कालक्रमसमाहिताः ॥ ८ ॥
' अतः साधुदर्शी विवेकी पुरुषको सब कुछ कालका ही परिणाम समझना चाहिये । धर्म, अर्थ और काम भी कालक्रमसे ही प्राप्त होते हैं ॥ ८ ॥
इतः स्वां प्रकृतिं वाली गतः प्राप्तः क्रियाफलम् ।
सामदानार्थसंयोगैः पवित्रं प्लवगेश्वरः ॥ ९ ॥
पञ्चविंशः सर्गः ८१५ ' ( मेरे द्वारा मारे जानेके कारण ) वानरराज वाली शरीरसे मुक्त हो अपने शुद्ध स्वरूपको प्राप्त हुए हैं । नीतिशास्त्रके अनुकूल साम, दान और अर्थके समुचित प्रयोगसे मिलनेवाले जो पवित्र कर्म हैं, वे सभी उन्हें प्राप्त हो गये॥९॥
स्वधर्मस्य च संयोगाज्जितस्तेन महात्मना ।
स्वर्गः परिगृहीतश्च प्राणानपरिरक्षता ॥ १० ॥
' महात्मा वालीने पहले अपने धर्मके संयोगसे जिसपर विजय पायी थी, उसी स्वर्गको इस समय युद्धमें प्राणोंकी रक्षा न करके उन्होंने अपने हाथमें कर लिया है ॥ १० ॥
एषा वै नियतिः श्रेष्ठा यां गतो हरियूथपः ।
तदलं परितापेन प्राप्तकालमुपास्यताम् ॥ ११ ॥
' यही सर्वश्रेष्ठ गति है, जिसे वानरोंके सरदार वालीने प्राप्त किया है । अतः अब उनके लिये शोक करना व्यर्थ है । इस समय तुम्हारे सामने जो कर्तव्य उपस्थित है, उसे पूरा करो ' ॥ ११ ॥
वचनान्ते तु रामस्य लक्ष्मणः परवीरहा ।
अवदत् प्रश्रितं वाक्यं सुग्रीवं गतचेतसम् ॥ १२ ॥
श्रीरामचन्द्रजीकी बात समाप्त होनेपर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले लक्ष्मणने, जिनकी विवेकशक्ति नष्ट हो गयी थी, उन सुग्रीवसे नम्रतापूर्वक इस प्रकार कहा— ॥
कुरु त्वमस्य सुग्रीव प्रेतकार्यमनन्तरम् ।
ताराङ्गदाभ्यां सहितो वालिनो दहनं प्रति ॥ १३ ॥
' सुग्रीव! अब तुम अङ्गद और ताराके साथ रहकर वालीके दाह - संस्कार - सम्बन्धी प्रेतकार्य करो ॥ १३ ॥
समाज्ञापय काष्ठानि शुष्काणि च बहूनि च ।
चन्दनानि च दिव्यानि वालिसंस्कारकारणात् ॥ १४ ॥
' सेवकोंको आज्ञा दो - वे वालीके दाह - संस्कारके निमित्त प्रचुर मात्रामें सूखी लकड़ियाँ और दिव्य चन्दन ले आवें ॥
समाश्वासय दीनं त्वमङ्गदं दीनचेतसम् ।
मा भूर्बालिशबुद्धिस्त्वं त्वदधीनमिदं पुरम् ॥ १५ ॥
' अङ्गदका चित्त बहुत दुःखी हो गया है । इन्हें धैर्य बँधाओ । तुम अपने मनमें मूढता न लाओ - किंकर्तव्यविमूढ़ न बनो; क्योंकि यह सारा नगर तुम्हारे ही अधीन है ॥ १५ ॥
अङ्गदस्त्वानयेन्माल्यं वस्त्राणि विविधानि च ।
घृतं तैलमथो गन्धान् यच्चात्र समनन्तरम् ॥ १६ ॥
' अङ्गद पुष्पमाला, नाना प्रकारके वस्त्र, घी, तेल, सुगन्धित पदार्थ तथा अन्य सामान, जिनकी अभी आवश्यकता है, स्वयं ले आवें ॥१६ ॥
त्वं तार शिबिकां शीघ्रमादायागच्छसम्भ्रमात् ।
। त्वरा गुणवती युक्ता ह्यस्मिन् काले विशेषतः ॥ १७ ॥
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८१६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे ‘ तार! तुम शीघ्र जाकर वेगपूर्वक एक पालकी ले ।
आओ; क्योंकि इस समय अधिक फुर्ती दिखानी चाहिये ।
ऐसे अवसरपर वही लाभदायक होती है ॥ १७ ॥
सज्जीभवन्तु प्लवगाः शिबिकावाहनोचिताः ।
समर्था बलिनश्चैव निर्हरिष्यन्ति वालिनम् ॥ १८ ॥
' पालकीको उठाकर ले चलनेके योग्य जो बलवान् एवं समर्थ वानर हों, वे तैयार हो जायँ । वे ही वालीको यहाँसे श्मशानभूमिमें ले चलेंगे ' ॥ १८ ॥
एवमुक्त्वा तु सुग्रीवं सुमित्रानन्दवर्धनः ।
तस्थौ भ्रातृसमीपस्थो लक्ष्मणः परवीरहा ॥ १ ९ ॥
सुग्रीवसे ऐसा कहकर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले सुमित्रानन्दन लक्ष्मण अपने भाईके पास जाकर खड़े हो गये ॥
लक्ष्मणस्य वचः श्रुत्वा तारः सम्भ्रान्तमानसः ।
प्रविवेश गुहां शीघ्रं शिबिकासक्तमानसः ॥ २० ॥
लक्ष्मणकी बात सुनकर तारके मनमें हड़बड़ी मच गयी । वह शिबिका ले आनेके लिये शीघ्रतापूर्वक किष्किन्धा नामक गुफामें गया ॥ २० ॥
आदाय शिबिकां तारः स तु पर्यापतत् पुनः ।
वानरैरुह्यमानां तां शूरैरुद्वहनोचितैः ॥ २१ ॥
वहाँसे शिबिका ढोनेके योग्य शूरवीर वानरोंद्वारा कंधोंपर उठायी हुई उस शिबिकाको साथ लेकर तार फिर तुरंत ही लौट आया ॥ २१ ॥
दिव्यां भद्रासनयुतां शिबिकां स्यन्दनोपमाम् ।
पक्षिकर्मभिराचित्रां द्रुमकर्मविभूषिताम् ॥ २२ ॥
वह दिव्य पालकी रथके समान बनी हुई थी । उसके बीचमें राजाके बैठने योग्य उत्तम आसन था । उसमें शिल्पियोंद्वारा कृत्रिम पक्षी और वृक्ष बनाये गये थे, जो उस पालकीको विचित्र शोभासे सम्पन्न बना रहे थे ॥ २२ ॥
आचितां चित्रपत्तीभिः सुनिविष्टां समन्ततः ।
विमानमिव सिद्धानां जालवातायनायुताम् ॥ २३ ॥
वह शिबिका चित्रके रूपमें बने हुए पैदल सिपाहियोंसे भरी प्रतीत होती थी । उसकी निर्माणकला सब ओरसे बड़ी सुन्दर दिखायी देती थी । देखनेमें वह सिद्धोंके विमान - सी प्रतीत होती थी । उसमें कई खिड़कियाँ बनी थीं, जिनमें जालियाँ लगी हुई थीं ॥ २३ ॥
सुनियुक्तां विशालां च सुकृतां शिल्पिभिः कृताम् ।
दारुपर्वतकोपेतां चारुकर्मपरिष्कृताम् ॥२४ ॥
कारीगरोंने उस पालकीको बहुत सुन्दर बनानेका प्रयत्न किया था । उसका एक - एक भाग बड़ा सुघड़ बनाया गया था । आकारमें वह बहुत बड़ी थी । उसमें लकड़ियोंके क्रीडा - पर्वत बने हुए थे । वह मनोहर शिल्प- कर्मसे सुशोभित थी ॥ २४ ॥
वराभरणहारैश्च चित्रमाल्योपशोभिताम् ।
गुहागहनसंछन्नां रक्तचन्दनभूषिताम् ॥ २५ ॥
सुन्दर आभूषण और हारोंसे उसको सजाया गया था । विचित्र फूलोंसे उसकी शोभा बढ़ायी गयी थी । शिल्पियोंद्वारा निर्मित गुफा और वनसे वह संयुक्त थी तथा लाल चन्दनद्वारा उसे विभूषित किया गया था ॥ २५ ॥
पुष्पौघैः समभिच्छन्नां पद्ममालाभिरेव च ।
तरुणादित्यवर्णाभिर्भ्राजमानाभिरावृताम् ॥२६ ॥
नाना प्रकारके पुष्पसमूहोंद्वारा वह सब ओरसे आच्छादित थी तथा प्रातःकालके सूर्यकी भाँति अरुण कान्तिवाली दीप्तिमती पद्ममालाओंसे अलंकृत थी ॥ २६ ॥
ईदृशीं शिबिकां दृष्ट्वा रामो लक्ष्मणमब्रवीत् ।
क्षिप्रं विनीयतां वाली प्रेतकार्यं विधीयताम् ॥ २७ ॥
ऐसी पालकीका अवलोकन करके श्रीरामचन्द्रजीने लक्ष्मणकी ओर देखते हुए कहा - ' अब वालीको शीघ्र ही यहाँसे श्मशानभूमिमें ले जाया जाय और उनका प्रेतकार्य किया जाय ' ॥ २७ ॥
ततो वालिनमुद्यम्य सुग्रीवः शिबिकां तदा ।
आरोपयत विक्रोशन्नङ्गदेन सहैव तु ॥ २८ ॥
तब अङ्गदके साथ करुण - क्रन्दन करते हुए सुग्रीवने वालीके शवको उठाकर उस शिबिकामें रखा ॥ २८ ॥
आरोप्य शिबिकां चैव वालिनं गतजीवितम् ।
अलंकारैश्च विविधैर्माल्यैर्वस्त्रैश्च भूषितम् ॥ २ ९ ॥
मृत वालीको शिबिकामें चढ़ाकर उन्हें नाना प्रकारके अलंकारों, फूलोंके गजरों और भाँति - भाँतिके वस्त्रोंसे विभूषित किया ॥ २ ९ ॥
आज्ञापयत् तदा राजा सुग्रीवः प्लवगेश्वरः ।
और्ध्वदेहिकमार्यस्य क्रियतामनुकूलतः ॥ ३० ॥
तदनन्तर वानरोंके स्वामी राजा सुग्रीवने आज्ञा दी कि ' मेरे बड़े भाईका और्ध्वदेहिक संस्कार शास्त्रानुकूल विधिसे सम्पन्न किया जाय ॥ ३० ॥
विश्राणयन्तो रत्नानि विविधानि बहूनि च ।
अग्रतः प्लवगा यान्तु शिबिका तदनन्तरम् ॥ ३१ ॥
' आगे - आगे बहुत - से वानर नाना प्रकारके बहुसंख्यक
रत्न लुटाते हुए चलें । उनके पीछे शिबिका चले ॥ ३१ ॥
राज्ञामृद्धिविशेषा हि दृश्यन्ते भुवि यादृशाः ।
तादृशैरिह कुर्वन्तु वानरा भर्तृसत्क्रियाम् ॥ ३२ ॥
' इस भूतलपर राजाओंके और्ध्वदेहिक संस्कार उनकी
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किष्किन्धाकाण्डे बढ़ी हुई समृद्धिके अनुसार जैसे धूमधामसे होते देखे जाते । हैं, उसी प्रकार अधिक धन लगाकर सब वानर अपने स्वामी महाराज वालीका अन्त्येष्टि - संस्कार करें ' ॥ ३२ ॥
तादृशं वालिनः क्षिप्रं प्राकुर्वन्नौर्ध्वदेहिकम् ।
अङ्गदं परिरभ्याशु तारप्रभृतयस्तदा ॥ ३३ ॥
क्रोशन्तः प्रययुः सर्वे वानरा हतबान्धवाः । तब तार आदि वानरोंने वालीके और्ध्वदेहिक संस्कारका शीघ्र वैसा ही आयोजन किया । जिनके बान्धव वाली मारे गये थे, वे सब - के - सब वानर अङ्गदको हृदयसे लगाकर शीघ्रतापूर्वक वहाँसे रोते हुए शवके साथ चले ॥ ३३३ ॥
ततः प्रणिहिताः सर्वा वानर्योऽस्य वशानुगाः ॥ ३४ ॥
चुक्रुशुर्वीरवीरेति भूयः क्रोशन्ति ताः प्रियम् । उनके पीछे वालीके अधीन रहनेवाली सभी वानर-पत्नियाँ समीप आकर ‘ हा वीर, हा वीर ' कहती हुई अपने प्रियतमको पुकार - पुकारकर बारंबार रोने - चिल्लाने लगीं ॥ ताराप्रभृतयः सर्वा वानर्यो हतबान्धवाः ॥ ३५ ॥
अनुजग्मुश्च भर्तारं क्रोशन्त्यः करुणस्वनाः । जिनके जीवनधनका वध किया गया था, वे तारा आदि सब वानरियाँ करुणस्वरसे विलाप करती हुई अपने स्वामीके पीछे - पीछे चलने लगीं ॥ ३५३ ॥
तासां रुदितशब्देन वानरीणां वनान्तरे ॥ ३६ ॥
वनानि गिरयश्चैव विक्रोशन्तीव सर्वतः । वनके भीतर रोती हुई उन वानर वधुओंके रोदन-शब्दसे गूँजते हुए वन और पर्वत भी सब ओर रोते हुए-से प्रतीत होते थे ॥ ३६३ ॥
पुलिने गिरिनद्यास्तु विविक्ते जलसंवृते ॥ ३७ ॥
चितां चक्रुः सुबहवो वानरा वनचारिणः । पहाड़ी * नदी तुङ्गभद्राके एकान्त तटपर जो जलसे घिरा था, पहुँचकर बहुत - से वनचारी वानरोंने एक चिता तैयार की ॥ ३७३ ॥
अवरोप्य ततः स्कन्धाच्छिबिकां वानरोत्तमाः ॥ ३८ ॥
तस्थुरेकान्तमाश्रित्य सर्वे शोकपरायणाः । तदनन्तर पालकी ढोनेवाले श्रेष्ठ वानरोंने उसे अपने कंधेसे उतारा और वे सब शोकमग्न हो एकान्त स्थानमें जा बैठे ॥३८३ ॥
ततस्तारा पतिं दृष्ट्वा शिबिकातलशायिनम् ॥ ३ ९ ॥ आरोप्याङ्के शिरस्तस्य विललाप सुदुःखिता । तत्पश्चात् ताराने शिबिकामें सुलाये हुए अपने पतिके शवको देखकर उनके मस्तकको अपनी गोदमें ले लिया पञ्चविंशः सर्गः ८१७ और अत्यन्त दुःखी होकर वह विलाप करने लगी ॥ ३ ९ ३ ॥ हा वानरमहाराज हा नाथ मम वत्सल ॥ ४० ॥
हा महार्ह महाबाहो हा मम प्रिय पश्य माम् ।
जनं न पश्यसीमं त्वं कस्माच्छोकाभिपीडितम् ॥ ४१ ॥
' हा वानरोंके महाराज! हा मेरे दयालु प्राणनाथ! हा परम पूजनीय महाबाहु वीर! हा मेरे प्रियतम! एक बार मेरी ओर देखो तो सही । इस शोकपीड़ित दासीकी ओर तुम दृष्टिपात क्यों नहीं करते हो? ॥ ४०-४१ ॥
प्रहृष्टमिह ते वक्त्रं गतासोरपि मानद ।
अस्तार्कसमवर्णं च दृश्यते जीवतो यथा ॥४२ ॥
' दूसरोंको मान देनेवाले प्राणवल्लभ! प्राणोंके निकल जानेपर भी तुम्हारा मुख जीवित अवस्थाकी भाँति अस्ताचलवर्ती सूर्यके समान अरुण प्रभासे युक्त एवं प्रसन्न ही दिखायी देता है ॥ ४२ ॥
एष त्वां रामरूपेण कालः कर्षति वानर ।
येन स्म विधवाः सर्वाः कृता एकेषुणा रणे ॥ ४३ ॥
' वानरराज! श्रीरामके रूपमें यह काल ही तुम्हें खींचकर लिये जा रहा है, जिसने युद्धके मैदानमें एक ही बाण मारकर हम सबको विधवा बना दिया ॥ ४३ ॥
इमास्तास्तव राजेन्द्र वानर्यो ऽप्लवगास्तव ।
पादैर्विकृष्टमध्वानमागताः किं न बुध्यसे ॥४४ ॥
' महाराज! ये तुम्हारी प्यारी वानरियाँ, जो वानरोंकी भाँति उछलकर चलना नहीं जानती हैं, तुम्हारे पीछे - पीछे बहुत दूरके मार्गपर पैदल ही चली आयी हैं । इस बातको क्या तुम नहीं जानते? ॥ ४४ ॥
तवेष्टा ननु चैवेमा भार्याश्चन्द्रनिभाननाः ।
इदानीं नेक्षसे कस्मात् सुग्रीवं प्लवगेश्वर ॥ ४५ ॥
' वानरराज! जो तुम्हें परम प्रिय थीं वे तुम्हारी सभी चन्द्रमुखी भार्याएँ यहाँ उपस्थित हैं । तुम इन सबको तथा अपने भाई सुग्रीवको भी इस समय क्यों नहीं देख रहे हो? ॥
एते हि सचिवा राजंस्तारप्रभृतयस्तव ।
पुरवासिजनश्चायं परिवार्य विषीदति ॥ ४६ ॥
' राजन्! ये तार आदि तुम्हारे सचिव तथा ये पुरवासीजन तुम्हें चारों ओरसे घेरकर दुःखी हो रहे हैं ॥
विसर्जयैनान् सचिवान् यथापुरमरिंदम ।
ततः क्रीडामहे सर्वा वनेषु मदनोत्कटाः ॥४७ ॥
' शत्रुदमन! आप पहलेकी भाँति इन मन्त्रियोंको बिदा कर दीजिये । फिर हम सब प्रेमोन्मत्त होकर इन । वनोंमें आपके साथ क्रीडा करेंगी ' ॥ ४७ ॥
* * यह नदी सह्यपर्वतसे निकलकर किष्किन्धाकी पर्वत - मालाओंके बीचसे बहती हुई कृष्णा नदीमें जा मिली है ।
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८१८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे
एवं विलपतीं तारां पतिशोकपरीवृताम् ।
उत्थापयन्ति स्म तदा वानर्यः शोककर्शिताः ॥ ४८ ॥ ।
पतिके शोकमें डूबी हुई ताराको इस प्रकार विलाप करती देख उस समय शोकसे दुर्बल हुई अन्य वानरियोंने उसे उठाया ॥ ४८ ॥
सुग्रीवेण ततः सार्धं सोऽङ्गदः पितरं रुदन् ।
चितामारोपयामास शोकेनाभिप्लुतेन्द्रियः ॥ ४ ९ ॥
इसके बाद संतापपीड़ित इन्द्रियोंवाले अङ्गदने रोते-रोते सुग्रीवकी सहायतासे पिताको चितापर रखा ॥ ४ ९ ॥
ततोऽग्निं विधिवद् दत्त्वा सोऽपसव्यं चकार ह ।
पितरं दीर्घमध्वानं प्रस्थितं व्याकुलेन्द्रियः ॥ ५० ॥
फिर शास्त्रीय विधिके अनुसार उसमें आग । लगाकर उन्होंने उसकी प्रदक्षिणा की । इसके बाद यह सोचकर कि ' मेरे पिता लंबी यात्राके लिये प्रस्थित हुए हैं ' अङ्गदकी सारी इन्द्रियाँ शोकसे व्याकुल हो उठीं ॥ ५० ॥
संस्कृत्य वालिनं तं तु विधिवत् प्लवगर्षभाः ।
आजग्मुरुदकं कर्तुं नदीं शुभजलां शिवाम् ॥ ५१ ॥
इस प्रकार विधिवत् वालीका दाह - संस्कार करके सभी वानर जलाञ्जलि देनेके लिये पवित्र । जलसे भरी हुई कल्याणमयी तुङ्गभद्रा नदीके पर आये ॥ ५१ ॥
ततस्ते सहितास्तत्र ह्यङ्गदं स्थाप्य चाग्रतः ।
सुग्रीवतारासहिताः सिषिचुर्वालिने जलम् ॥५२ ॥
वहाँ अङ्गदको आगे रखकर सुग्रीव और तारासहित सभी वानरोंने वालीके लिये एक साथ जलाञ्जलि दी ॥ ५२ ॥
सुग्रीवेणैव दीनेन दीनो भूत्वा महाबलः ।
समानशोकः काकुत्स्थः प्रेतकार्याण्यकारयत् ॥ ५३ ॥
दुःखी हुए सुग्रीवके साथ ही उन्हींके समान शोकग्रस्त एवं दुःखी हो महाबली श्रीरामने वालीके समस्त प्रेतकार्य करवाये ॥ ५३ ॥
ततोऽथ तं वालिनमग्र्यपौरुषं प्रकाशमिक्ष्वाकुवरेषुणा हतम् । प्रदीप्य दीप्ताग्निसमौजसं तदा सलक्ष्मणं राममुपेयिवान् हरिः ॥५४ ॥
इस प्रकार इक्ष्वाकुवंशशिरोमणि श्रीरामके बाणसे मारे गये श्रेष्ठ पराक्रमी और प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी सुविख्यात वालीका दाह - संस्कार करके सुग्रीव उस समय लक्ष्मणसहित श्रीरामके पास आये ॥ ५४ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे पञ्चविंशः सर्गः ॥ २५ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें पचीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ २५ ॥
षड्विंशः सर्गः हनुमान्जीका सुग्रीवके अभिषेकके लिये श्रीरामचन्द्रजीसे किष्किन्धामें पधारनेकी प्रार्थना, श्रीरामका पुरीमें न जाकर केवल अनुमति देना, तत्पश्चात् सुग्रीव और अङ्गदका अभिषेक
ततः शोकाभिसंतप्तं सुग्रीवं क्लिन्नवाससम् ।
शाखामृगमहामात्राः परिवार्योपतस्थिरे ॥ १ ॥
अभिगम्य महाबाहुं राममक्लिष्टकारिणम् ।
स्थिताः प्राञ्जलयः सर्वे पितामहमिवर्षयः ॥ २ ॥
तदनन्तर वानरसेनाके प्रधान - प्रधान वीर ( हनुमान् आदि ) भीगे वस्त्रवाले शोक - संतप्त सुग्रीवको चारों ओरसे घेरकर उन्हें साथ लिये अनायास ही महान् कर्म करनेवाले महाबाहु श्रीरामकी सेवामें उपस्थित हुए । श्रीरामके पास आकर वे सभी वानर उनके सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गये, जैसे ब्रह्माजीके सम्मुख महर्षिगण खड़े रहते हैं ॥
ततः काञ्चनशैलाभस्तरुणार्कनिभाननः ।
अब्रवीत् प्राञ्जलिर्वाक्यं हनूमान् मारुतात्मजः ॥ ३ ॥
तत्पश्चात् सुवर्णमय मेरु पर्वतके समान सुन्दर एवं विशाल शरीरवाले वायुपुत्र हनुमान्जी, जिनका मुख प्रात: कालके सूर्यकी भाँति अरुण प्रभासे प्रकाशित हो रहा था, दोनों हाथ जोड़कर बोले - ॥ ३ ॥
भवत्प्रसादात् काकुत्स्थ पितृपैतामहं महत् ।
वानराणां सुदंष्ट्राणां सम्पन्नबलशालिनाम् ॥ ४ ॥
महात्मनां सुदुष्प्रापं प्राप्तं राज्यमिदं प्रभो ।
भवता समनुज्ञातः प्रविश्य नगरं शुभम् ॥ ५ ॥
संविधास्यति कार्याणि सर्वाणि ससुहृद्गणः । ‘ ककुत्स्थकुलनन्दन! आपकी कृपासे सुग्रीवको सुन्दर दाढ़वाले पूर्णबलशाली और महामनस्वी वानरोंका यह विशाल साम्राज्य प्राप्त हुआ, जो इनके बाप - दादोंके समयसे चला आ रहा है । प्रभो! यद्यपि इसका मिलना बहुत ही कठिन था तो भी आपके प्रसादसे यह इन्हें सुलभ हो गया । अब यदि आप आज्ञा दें तो ये अपने सुन्दर नगरमें प्रवेश करके सुहृदोंके साथ अपना सब राजकार्य सँभालें ॥