वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ — पृष्ठ 851–860
वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 851–860
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किष्किन्धाकाण्डे त्रिंशः सर्गः ८३ ९ जाती है, क्रौञ्च पक्षी बोलने लगते हैं और फूल उस ऋतुके हासकी भाँति खिल उठते हैं ॥ ५३ ॥
मीनोपसंदर्शितमेखलानां नदीवधूनां गतयोऽद्य मन्दाः । कान्तोपभुक्तालसगामिनीनां प्रभातकालेष्विव कामिनीनाम् ॥ ५४ ॥
' रातको प्रियतमके उपभोगमें आकर प्रातः काल अलसायी गतिसे चलनेवाली कामिनियोंकी भाँति उन नदीस्वरूपा वधुओंकी गति भी आज मन्द हो गयी है, जो मछलियोंकी मेखला - सी धारण किये हुए हैं ॥ ५४ ॥
सचक्रवाकानि शैवलानि काशैर्दुकूलैरिव संवृतानि । सपत्ररेखाणि सरोचनानि वधूमुखानीव नदीमुखानि ॥ ५५ ॥
' नदियोंके मुख नव वधुओंके मुँहके समान शोभा पाते हैं । उनमें जो चक्रवाक हैं, वे गोरोचनद्वारा निर्मित तिलकके समान प्रतीत होते हैं, जो सेवार हैं, वे वधूके मुखपर बनी हुई पत्रभङ्गीके समान जान पड़ते हैं तथा जो काश हैं, वे ही मानो श्वेत दुकूल बनकर नदीरूपिणी वधूके मुँहको ढके हुए हैं ॥ ५५ ॥
प्रफुल्लबाणासनचित्रितेषु प्रहृष्टषट्पादनिकूजितेषु 1 गृहीतचापोद्यतदण्डचण्डः प्रचण्डचापोऽद्य वनेषु कामः ॥ ५६ ॥
' फूले हुए सरकण्डों और असनके वृक्षोंसे जिनकी विचित्र शोभा हो रही है तथा जिनमें हर्षभरे भ्रमरोंकी आवाज गूँजती रहती है, उन वनोंमें आज प्रचण्ड धनुर्धर कामदेव प्रकट हुआ है, जो धनुष हाथमें लेकर विरही जनोंको दण्ड देनेके लिये उद्यत हो अत्यन्त कोपका परिचय दे रहा है ॥५६ ॥
लोकं सुवृष्ट्या परितोषयित्वा नदीस्तटाकानि च पूरयित्वा । निष्पन्नसस्यां वसुधां त्यक्त्वा नभस्तोयधराः प्रणष्टाः ॥ ५७ ॥
' अच्छी वर्षासे लोगोंको संतुष्ट करके नदियों और तालाबोंको पानीसे भरकर तथा भूतलको परिपक्व धानकी खेतीसे सम्पन्न करके बादल आकाश छोड़कर अदृश्य हो गये ॥ ५७ ॥
दर्शयन्ति शरन्नद्यः पुलिनानि शनैः शनैः ।
नवसंगमसव्रीडा जघनानीव योषितः ॥५८ ॥
' शरद् ऋतुकी नदियाँ धीरे - धीरे जलके हटनेसे अपने नग्न तटोंको दिखा रही हैं । ठीक उसी तरह जैसे प्रथम समागमके समय लजीली युवतियाँ शनैः - शनैः अपने जघन - स्थलको दिखानेके लिये विवश होती हैं ।
प्रसन्नसलिला: सौम्य कुरराभिविनादिताः ।
चक्रवाकगणाकीर्णा विभान्ति सलिलाशयाः ॥ ५ ९ ॥
' सौम्य! सभी जलाशयोंके जल स्वच्छ हो गये हैं । वहाँ कुरर पक्षियोंके कलनाद गूँज रहे हैं और चक्रवाकोंके समुदाय चारों ओर बिखरे हुए हैं । इस प्रकार उन जलाशयोंकी बड़ी शोभा हो रही है ॥ ५ ९ ॥
अन्योन्यबद्धवैराणां जिगीषूणां नृपात्मज ।
उद्योगसमयः सौम्य पार्थिवानामुपस्थितः ॥ ६० ॥
' सौम्य! राजकुमार! जिनमें परस्पर वैर बँधा हुआ है और जो एक - दूसरेको जीतनेकी इच्छा रखते हैं, उन भूमिपालोंके लिये यह युद्धके निमित्त उद्योग करनेका समय उपस्थित हुआ है ॥६० ॥
इयं सा प्रथमा यात्रा पार्थिवानां नृपात्मज ।
न च पश्यामि सुग्रीवमुद्योगं च तथाविधम् ॥ ६१ ॥
' नरेशनन्दन! राजाओंकी विजय यात्राका यह प्रथम अवसर है, किंतु न तो मैं सुग्रीवको यहाँ उपस्थित देखता हूँ और न उनका कोई वैसा उद्योग ही दृष्टिगोचर होता है ॥६१ ॥
असनाः सप्तपर्णाश्च कोविदाराश्च पुष्पिताः ।
दृश्यन्ते बन्धुजीवाश्च श्यामाश्च गिरिसानुषु ॥ ६२ ॥
‘ पर्वतके शिखरोंपर असन, छितवन, कोविदार, बन्धु-जीव तथा श्याम तमाल खिले दिखायी देते हैं ॥ ६२ ॥
हंससारसचक्राह्वैः कुरैश्च समन्ततः ।
पुलिनान्यवकीर्णानि नदीनां पश्य लक्ष्मण ॥ ६३ ॥
' लक्ष्मण! देखो तो सही, नदियोंके तटों पर सब ओर हंस, सारस, चक्रवाक और कुरर नामक पक्षी फैले हुए हैं ॥ ६३ ॥
चत्वारो वार्षिका मासा गता वर्षशतोपमाः ।
मम शोकाभितप्तस्य तथा सीतामपश्यतः ॥ ६४ ॥
' मैं सीताको न देखनेके कारण शोकसे संतप्त हो रहा हूँ; अतः ये वर्षाके चार महीने मेरे लिये सौ वर्षोंके समान बीते हैं ॥६४ ॥
चक्रवाकीव भर्तारं पृष्ठतोऽनुगता वनम् ।
विषमं दण्डकारण्यमुद्यानमिव चाङ्गना ॥ ६५ ॥
‘ जैसे चकवी अपने स्वामीका अनुसरण करत | है, उसी प्रकार कल्याणी सीता इस भयंकर एवं दुर्गम
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८४० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे
दण्डकारण्यको उद्यान - सा समझकर मेरे पीछे यहाँतक ।
चली आयी थी ॥ ६५ ॥
प्रियाविहीने दुःखार्ते हृतराज्ये विवासिते ।
कृपां न कुरुते राजा सुग्रीवो मयि लक्ष्मण ॥ ६६ ॥
' लक्ष्मण! मैं अपनी प्रियतमासे बिछुड़ा हुआ हूँ । मेरा राज्य छीन लिया गया है और मैं देशसे निकाल दिया गया हूँ । इस अवस्थामें भी राजा सुग्रीव मुझपर कृपा नहीं कर रहा है ॥ ६६ ॥
अनाथो हृतराज्योऽहं रावणेन च धर्षितः ।
दीनो दूरगृहः कामी मां चैव शरणं गतः ॥ ६७ ॥
इत्येतैः कारणैः सौम्य सुग्रीवस्य दुरात्मनः ।
अहं वानरराजस्य परिभूतः परंतपः ॥ ६८ ॥
' सौम्यलक्ष्मण! मैं अनाथ हूँ । राज्यसे भ्रष्ट हो गया हूँ । रावणने मेरा तिरस्कार किया है । मैं दीन हूँ । मेरा घर यहाँसे बहुत दूर है । मैं कामना लेकर यहाँ आया हूँ तथा सुग्रीव यह भी समझता है कि राम मेरी शरणमें आये हैं । इन्हीं सब कारणोंसे वानरोंका राजा दुरात्मा सुग्रीव मेरा तिरस्कार कर रहा है; किंतु उसे पता नहीं है कि मैं सदा शत्रुओंको संताप देनेमें समर्थ हूँ ॥ ६७-६८ ॥
स कालं परिसंख्याय सीतायाः परिमार्गणे ।
कृतार्थः समयं कृत्वा दुर्मतिर्नावबुध्यते ॥ ६ ९ ॥
' उसने सीताकी खोजके लिये समय निश्चित कर दिया था; किंतु उसका तो अब काम निकल गया है, इसीलिये वह दुर्बुद्धि वानर प्रतिज्ञा करके भी उसका कुछ खयाल नहीं कर रहा है ॥ ६ ९ ॥
स किष्किन्धां प्रविश्य त्वं ब्रूहि वानरपुङ्गवम् ।
मूर्ख ग्राम्यसुखे सक्तं सुग्रीवं वचनान्मम ॥ ७० ॥
' अतः लक्ष्मण! तुम मेरी आज्ञासे किष्किन्धापुरीमें जाओ और विषयभोगमें फँसे हुए मूर्ख वानरराज सुग्रीवसे इस प्रकार कहो — ॥७० ॥
अर्थिनामुपपन्नानां पूर्वं चाप्युपकारिणाम् ।
आशां संश्रुत्य यो हन्ति स लोके पुरुषाधमः ॥ ७१ ॥
' जो बल - पराक्रमसे सम्पन्न तथा पहले ही उपकार करनेवाले कार्यार्थी पुरुषोंको प्रतिज्ञापूर्वक आशा देकर पीछे उसे तोड़ देता है, वह संसारके सभी पुरुषोंमें नीच है ॥७१ ॥
शुभं वा यदि वा पापं यो हि वाक्यमुदीरितम् ।
सत्येन परिगृह्णाति स वीरः पुरुषोत्तमः ॥ ७२ ॥
' जो अपने मुखसे प्रतिज्ञाके रूपमें निकले हुए भले या बुरे सभी तरहके वचनोंको अवश्य पालनीय । समझकर सत्यकी रक्षाके उद्देश्यसे उनका पालन करता है, वह वीर समस्त पुरुषोंमें श्रेष्ठ माना जाता है ॥ ७२ ॥
कृतार्था ह्यकृतार्थानां मित्राणां न भवन्ति ये ।
तान् मृतानपि क्रव्यादाः कृतघ्नान् नोपभुञ्जते ॥ ७३ ॥
' जो अपना स्वार्थ सिद्ध हो जानेपर, जिनके कार्य नहीं पूरे हुए हैं । उन मित्रोंके सहायक नहीं होते- उनके कार्यको सिद्ध करनेकी चेष्टा नहीं करते, उन कृतघ्न पुरुषोंके मरनेपर मांसाहारी जन्तु भी उनका मांस नहीं खाते हैं ॥
नूनं काञ्चनपृष्ठस्य विकृष्टस्य मया रणे ।
द्रष्टुमिच्छसि चापस्य रूपं विद्युद्गणोपमम् ॥ ७४ ॥
' सुग्रीव! निश्चय ही तुम युद्धमें मेरे द्वारा खींचे गये सोनेकी पीठवाले धनुषका कौंधती हुई बिजलीके सामन रूप देखना चाहते हो ॥ ७४ ॥
घोरं ज्यातलनिर्घोषं क्रुद्धस्य मम संयुगे ।
निर्घोषमिव वज्रस्य पुनः संश्रोतुमिच्छसि ॥ ७५ ॥
' संग्राममें कुपित होकर मेरे द्वारा खींची गयी प्रत्यञ्चाकी भयंकर टङ्कारको, जो वज्रकी गड़गड़ाहटको भी मात करनेवाली है, अब फिर तुम्हें सुननेकी इच्छा हो रही है ॥ ७५ ॥
काममेवं गतेऽप्यस्य परिज्ञाते पराक्रमे ।
त्वत्सहायस्य मे वीर न चिन्ता स्यान्नृपात्मज ॥ ७६ ॥
' वीर राजकुमार! सुग्रीवको तुम - जैसे सहायकके साथ रहनेवाले मेरे पराक्रमका ज्ञान हो चुका है, ऐसी दशामें भी यदि उसे यह चिन्ता न हो कि ये वालीकी भाँति मुझे मार सकते हैं तो यह आश्चर्यकी ही बात है!॥
यदर्थमयमारम्भः कृतः परपुरंजय ।
समयं नाभिजानाति कृतार्थः प्लवगेश्वरः ॥ ७७ ॥
' शत्रु - नगरीपर विजय पानेवाले लक्ष्मण! जिसके लिये यह मित्रता आदिका सारा आयोजन किया गया, सीताकी खोजविषयक उस प्रतिज्ञाको इस समय वानरराज सुग्रीव भूल गया है — उसे याद नहीं कर रहा है; क्योंकि उसका अपना काम सिद्ध हो चुका ॥ ७७ ॥
वर्षाः समयकालं तु प्रतिज्ञाय हरीश्वरः ।
व्यतीतांश्चतुरो मासान् विहरन् नावबुध्यते ॥ ७८ ॥
' सुग्रीवने यह प्रतिज्ञा की थी कि वर्षाका अन्त होते ही सीताकी खोज आरम्भ कर दी जायगी, किंतु वह क्रीड़ा - विहारमें इतना तन्मय हो गया है कि इन बीते हुए चार महीनोंका उसे कुछ पता ही नहीं है ॥ ७८ ॥
सामात्यपरिषत्क्रीडन् पानमेवोपसेवते ।
शोकदीनेषु नास्मासु सुग्रीवः कुरुते दयाम् ॥ ७ ९ ॥
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किष्किन्धाकाण्डे ' सुग्रीव मन्त्रियों तथा परिजनोंसहित क्रीडाजनित । आमोद - प्रमोदमें फँसकर विविध पेय पदार्थोंका ही
सेवन कर रहा है । हमलोग शोकसे व्याकुल हो रहे हैं ।
तो भी वह हमपर दया नहीं करता है ॥७ ९ ॥
उच्यतां गच्छ सुग्रीवस्त्वया वीर महाबल ।
मम रोषस्य यद्रूपं ब्रूयाश्चैनमिदं वचः ॥ ८० ॥
' महाबली वीर लक्ष्मण! तुम जाओ । सुग्रीवसे बात करो । मेरे रोषका जो स्वरूप है, वह उसे बताओ और मेरा यह संदेश भी कह सुनाओ ॥ ८० ॥
न स संकुचितः पन्था येन वाली हतो गतः ।
समये तिष्ठ सुग्रीव मा वालिपथमन्वगाः ॥ ८१ ॥
सुग्रीव! वाली मारा जाकर जिस रास्तेसे गया है, वह आज भी बंद नहीं हुआ है । इसलिये तुम अपनी प्रतिज्ञापर डटे रहो । वालीके मार्गका अनुसरण न करो ॥ ८१ ॥
एक एव रणे वाली शरेण निहतो मया ।
त्वां तु सत्यादतिक्रान्तं हनिष्यामि सबान्धवम् ॥ ८२ ॥
' वाली तो रणक्षेत्रमें अकेला ही मेरे बाणसे मारा गया था, परंतु यदि तुम सत्यसे विचलित हुए तो मैं तुम्हें बन्धु - बान्धवोंसहित कालके गालमें डाल दूँगा ॥ ८२ ॥
यदेवं विहिते कार्ये यद्धितं पुरुषर्षभ ।
तत् तद् ब्रूहि नरश्रेष्ठ त्वर कालव्यतिक्रमः ॥ ८३ ॥ ।
एकत्रिंशः सर्गः ८४१ ' पुरुषप्रवर! नरश्रेष्ठ लक्ष्मण! जब इस तरह कार्य बिगड़ने लगे, ऐसे अवसरपर और भी जो - जो बातें कहनी उचित हों— जिनके कहनेसे अपना हित होता हो, वे सब बातें कहना । जल्दी करो; क्योंकि कार्य आरम्भ करनेका समय बीता जा रहा है ॥ ८३ ॥
कुरु सत्यं मम वानरेश्वर प्रतिश्रुतं धर्ममवेक्ष्य शाश्वतम् । वालिनं प्रेतगतो यमक्षये त्वमद्य पश्येर्मम चोदितः शरैः ॥ ८४ ॥
' सुग्रीवसे कहो - ' वानरराज! तुम सनातन धर्मपर दृष्टि रखकर अपनी की हुई प्रतिज्ञाको सत्य कर दिखाओ, अन्यथा ऐसा न हो कि तुम्हें आज ही मेरे बाणोंसे प्रेरित हो प्रेतभावको प्राप्त होकर यमलोकमें वालीका दर्शन करना पड़े'॥८४ ॥
स पूर्वजं तीव्रविवृद्धको लालप्यमानं प्रसमीक्ष्य दीनम् । चकार तीव्रां मतिमुग्रतेजा हरीश्व मानववंशवर्धनः ॥ ८५ ॥
मानव - वंशकी वृद्धि करनेवाले उग्र तेजस्वी लक्ष्मणने जब अपने बड़े भाईको दुःखी, बढ़े हुए तीव्र रोषसे युक्त तथा अधिक बोलते देखा, तब वानरराज सुग्रीवके प्रति कठोर भाव धारण कर लिया ॥ ८५ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे त्रिंशः सर्गः ॥ ३० ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३० ॥
एकत्रिंशः सर्गः सुग्रीवपर लक्ष्मणका रोष, श्रीरामका उन्हें समझाना, लक्ष्मणका किष्किन्धाके द्वारपर जाकर अङ्गदको सुग्रीवके पास भेजना, वानरोंका भय तथा प्लक्ष और प्रभावका सुग्रीवको कर्तव्यका उपदेश देना कामिन दीनमदीनसत्त्वं स शोकाभिपन्नं समुदीर्णकोपम् । नरेन्द्रसूनुर्नरदेवपुत्रं पूर्वजमित्युवाच ॥ १ ॥
रामानुजः श्रीरामके छोटे भाई नरेन्द्रकुमार लक्ष्मणने उस समय सीताकी कामनासे युक्त, दुःखी, उदारहृदय, शोकग्रस्त तथा बढ़े हुए रोषवाले ज्येष्ठ भ्राता महाराजपुत्र श्रीरामसे इस प्रकार कहा - ॥१ ॥
न वानरः स्थास्यति साधुवृत्ते न मन्यते कर्मफलानुषङ्गान् । न भोक्ष्यते वानरराज्यलक्ष्मीं तथा हि नातिक्रमतेऽस्य बुद्धिः ॥ २ ॥
' आर्य! सुग्रीव वानर है, वह श्रेष्ठ पुरुषोंके लिये उचित सदाचारपर स्थिर नहीं रह सकेगा । सुग्रीव इस बातको भी नहीं मानता है कि अग्निको साक्षी देकर श्रीरघुनाथजीके साथ मित्रता - स्थापनरूप जो सत् - कर्म किया गया है, उसीके फलसे मुझे निष्कण्टक राज्यभोग प्राप्त हुए हैं । अत: वह वानरोंकी राज्य लक्ष्मीका पालन एवं उपभोग नहीं कर सकेगा; क्योंकि उसकी बुद्धि मित्रधर्म पालनके लिये अधिक आगे नहीं बढ़ रही है ॥२ ॥
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८४२ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे मतिक्षयाद् ग्राम्यसुखेषु सक्त-स्तव प्रसादात् प्रतिकारबुद्धिः । हतोऽग्रजं पश्यतु वीरवालिनं न राज्यमेवं विगुणस्य देयम् ॥ ३ ॥
' सुग्रीवकी बुद्धि मारी गयी है, इसलिये वह विषयभोगोंमें आसक्त हो गया है । आपकी कृपासे जो उसे राज्य आदिका लाभ हुआ है, उस उपकारका बदला चुकानेकी उसकी नीयत नहीं है । अतः अब वह भी
मारा जाकर अपने बड़े भाई वीरवर वालीका दर्शन करे ।
ऐसे गुणहीन पुरुषको राज्य नहीं देना चाहिये ॥३ ॥
न ये कोपमुदीर्णवेगं निहन्मि सुग्रीवमसत्यमद्य । हरिप्रवीरैः सह वालिपुत्रो नरेन्द्रपुत्र्या विचयं करोतु ॥ ४ ॥
' मेरे क्रोधका वेग बढ़ा हुआ है । मैं इसे रोक नहीं सकता । असत्यवादी सुग्रीवको आज ही मारे डालता हूँ । अब वालिकुमार अङ्गद ही राजा होकर प्रधान वानर-वीरोंके साथ राजकुमारी सीताकी खोज करे ' ॥ ४ ॥
तमात्तबाणासनमुत्पतन्तं निवेदितार्थं रणचण्डकोपम् । उवाच रामः परवीरहन्ता स्ववीक्षितं सानुनयं च वाक्यम् ॥ ५ ॥
यों कहकर लक्ष्मण धनुष - बाण हाथमें ले बड़े वेगसे चल पड़े । उन्होंने अपने जानेका प्रयोजन स्पष्ट शब्दोंमें निवेदन कर दिया था । युद्धके लिये उनका प्रचण्ड कोप बढ़ा हुआ था तथा वे क्या करने जा रहे हैं, इसपर उन्होंने अच्छी तरह विचार नहीं किया था । उस समय विपक्षी वीरोंका संहार करनेवाले श्रीरामचन्द्रजीने उन्हें शान्त करनेके लिये यह अनुनययुक्त बात कही –॥५ ॥
नहि वै त्वद्विधो लोके पापमेवं समाचरेत् ।
कोपमार्येण यो हन्ति स वीरः पुरुषोत्तमः ॥ ६ ॥
' सुमित्रानन्दन! तुम - जैसे श्रेष्ठ पुरुषको संसारमें ऐसा ( मित्रवधरूप ) निषिद्ध आचरण नहीं करना चाहिये । जो उत्तम विवेकके द्वारा अपने क्रोधको मार देता है, वह वीर समस्त पुरुषोंमें श्रेष्ठ है ॥ ६ ॥
नेदमत्र त्वया ग्राह्यं साधुवृत्तेन लक्ष्मण ।
तां प्रीतिमनुवर्तस्व पूर्ववृत्तं च संगतम् ॥ ७॥
' लक्ष्मण! तुम सदाचारी हो । तुम्हें इस प्रकार सुग्रीवके मारनेका निश्चय नहीं करना चाहिये । उसके प्रति । जो तुम्हारा प्रेम था, उसीका अनुसरण करो और उसके साथ पहले जो मित्रता की गयी है, उसे निबाहो ॥ ७ ॥
सामोपहितया वाचा रूक्षाणि परिवर्जयन् ।
वक्तुमर्हसि सुग्रीवं व्यतीतं कालपर्यये ॥ ८ ॥
' तुम्हें सान्त्वनापूर्ण वाणीद्वारा कटु वचनोंका परित्याग करते हुए सुग्रीवसे इतना ही कहना चाहिये कि तुम सीताकी खोजके लिये जो समय नियत किया था, वह बीत गया ( फिर भी चुप क्यों बैठे हो ) ' ॥ ८ ॥
सोऽग्रजेनानुशिष्टार्थो यथावत् पुरुषर्षभः ।
प्रविवेश पुरीं वीरो लक्ष्मणः परवीरहा ॥ ९ ॥
अपने बड़े भाईके इस प्रकार यथोचित रूपसे समझानेपर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले पुरुषप्रवर वीर लक्ष्मणने किष्किन्धापुरीमें प्रवेश ( करनेका विचार ) किया ॥
ततः शुभमतिः प्राज्ञो भ्रातुः प्रियहिते रतः ।
लक्ष्मणः प्रतिसंरब्धो जगाम भवनं कपेः ॥ १० ॥
भाईके प्रिय और हितमें तत्पर रहनेवाले शुभ बुद्धिसे युक्त बुद्धिमान् लक्ष्मण रोषमें भरे हुए ही वानरराज सुग्रीवके भवनकी ओर चले ॥ १० ॥
शक्रबाणासनप्रख्यं धनुः कालान्तकोपमम् ।
प्रगृह्य गिरिशृङ्गाभं मन्दरः सानुमानिव ॥११ ॥
उस समय वे इन्द्रधनुषके समान तेजस्वी, काल और अन्तकके समान भयंकर तथा पर्वत - शिखरके समान विशाल धनुषको हाथमें लेकर शृङ्गसहित मन्दराचलके समान जान पड़ते थे ॥ ११ ॥
यथोक्तकारी वचनमुत्तरं चैव सोत्तरम् ।
बृहस्पतिसमो बुद्ध्या मत्वा रामानुजस्तदा ॥ १२ ॥
श्रीरामके अनुज लक्ष्मण अपने बड़े भाईकी आज्ञाका यथोक्तरूपसे पालन करनेवाले तथा बृहस्पतिके समान बुद्धिमान् थे । वे सुग्रीवसे जो बात कहते, सुग्रीव उसका जो कुछ उत्तर देते और उस उत्तरका भी ये जो कुछ उत्तर देते, उन सबको अच्छी तरह समझ - बूझकर वहाँसे प्रस्थित हुए थे ॥१२ ॥
कामक्रोधसमुत्थेन भ्रातुः क्रोधाग्निना वृतः ।
प्रभञ्जन इवाप्रीतः प्रययौ लक्ष्मणस्ततः ॥ १३ ॥
सीताकी खोजविषयक जो श्रीरामकी कामना थी और सुग्रीवकी असावधानीके कारण उसमें बाधा पड़नेसे जो उन्हें क्रोध हुआ था, उन दोनोंके कारण लक्ष्मणकी भी क्रोधाग्नि भड़क उठी थी । उस क्रोधाग्निसे घिरे हुए लक्ष्मण सुग्रीवके प्रति प्रसन्न नहीं थे । वे उसी अवस्थामें वायुके समान वेगसे चले ॥ १३ ॥
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किष्किन्धाकाण्डे
सालतालाश्वकर्णांश्च तरसा पातयन् बलात् ।
पर्यस्यन् गिरिकूटानि द्रुमानन्यांश्च वेगितः ॥ १४ ॥
उनका वेग ऐसा बढ़ा हुआ था कि वे मार्गमें मिलनेवाले साल, ताल और अश्वकर्ण नामक वृक्षोंको उसी वेगसे बलपूर्वक गिराते तथा पर्वतशिखरों एवं अन्य वृक्षोंको उठा - उठाकर दूर फेंकते जाते थे ॥ १४ ॥
शिलाश्च शकलीकुर्वन् पद्भ्यां गज इवाशुगः ।
दूरमेकपदं त्यक्त्वा ययौ कार्यवशाद् द्रुतम् ॥ १५ ॥
शीघ्रगामी हाथीके समान अपने पैरोंकी ठोकरसे शिलाओंको चूर - चूर करते और लंबी - लंबी डगें भरते हुए वे कार्यवश बड़ी तेजीके साथ चले ॥१५ ॥
तामपश्यद् बलाकीर्णां हरिराजमहापुरीम् ।
दुर्गामिक्ष्वाकुशार्दूलः किष्किन्धां गिरिसंकटे ॥ १६ ॥
इक्ष्वाकुकुलके सिंह लक्ष्मणने निकट जाकर वानरराज सुग्रीवकी विशाल पुरी किष्किन्धा देखी, जो पहाड़ोंके बीचमें बसी हुई थी । वानरसेनासे व्याप्त होनेके कारण वह पुरी दूसरोंके लिये दुर्गम थी ॥ १६ ॥
रोषात् प्रस्फुरमाणोष्ठः सुग्रीवं प्रति लक्ष्मणः ।
ददर्श वानरान् भीमान् किष्किन्धायां बहिश्चरान् ॥ १७ ॥
उस समय लक्ष्मणके ओष्ठ सुग्रीवके प्रति रोषसे फड़क रहे थे । उन्होंने किष्किन्धाके पास बहुतेरे भयंकर वानरोंको देखा जो नगरके बाहर विचर रहे थे ॥ १७ ॥
तं दृष्ट्वा वानराः सर्वे लक्ष्मणं पुरुषर्षभम् ।
शैलशृङ्गाणि शतशः प्रवृद्धांश्च महीरुहान् ।
जगृहु: कुञ्जरप्रख्या वानराः पर्वतान्तरे ॥ १८ ॥
उन वानरोंके शरीर हाथियोंके समान विशाल थे । उन समस्त वानरोंने पुरुषप्रवर लक्ष्मणको देखते ही पर्वतके अंदर विद्यमान सैकड़ों शैल - शिखर और बड़े-बड़े वृक्ष उठा लिये ॥१८ ॥
तान् गृहीतप्रहरणान् सर्वान् दृष्ट्वा तु लक्ष्मणः ।
बभूव द्विगुणं क्रुद्धो बह्विन्धन इवानलः ॥ १ ९ ॥
उन सबको हथियार उठाते देख लक्ष्मण दूने क्रोधसे जल उठे, मानो जलती आगमें बहुत - सी सूखी लकड़ियाँ डाल दी गयी हों ॥ १ ९ ॥
तं ते भयपरीताङ्गा क्षुब्धं दृष्ट्वा प्लवंगमाः ।
कालमृत्युयुगान्ताभं शतशो विद्रुता दिशः ॥ २० ॥
क्षुब्ध हुए लक्ष्मण काल, मृत्यु तथा प्रलयकालीन अग्निके समान भयंकर दिखायी देने लगे । उन्हें देखकर उन वानरोंके शरीर भयसे काँपने लगे और वे सैकड़ोंकी संख्यामें चारों दिशाओंमें भाग गये ॥ २० ॥
एकत्रिंशः सर्गः ८४३
ततः सुग्रीवभवनं प्रविश्य हरिपुंगवाः ।
क्रोधमागमनं चैव लक्ष्मणस्य न्यवेदयन् ॥ २१ ॥
तदनन्तर कई श्रेष्ठ वानरोंने सुग्रीवके महलमें जाकर लक्ष्मणके आगमन और क्रोधका समाचार निवेदन किया ।
तारया सहितः कामी सक्तः कपिवृषस्तदा ।
न तेषां कपिसिंहानां शुश्राव वचनं तदा ॥ २२ ॥
उस समय कामके अधीन हुए वानरराज सुग्रीव भोगासक्त हो ताराके साथ थे । इसलिये उन्होंने उन श्रेष्ठ वानरोंकी बातें नहीं सुनीं ॥ २२ ॥
ततः सचिवसंदिष्टा हरयो रोमहर्षणाः ।
गिरिकुञ्जरमेघाभा नगरान्निर्ययुस्तदा ॥ २३ ॥
तब सचिवकी आज्ञासे पर्वत, हाथी और मेघके समान विशालकाय वानर जो रोंगटे खड़े कर देनेवाले थे, नगरसे बाहर निकले ॥ २३ ॥
नखदंष्ट्रायुधाः सर्वे वीरा विकृतदर्शनाः ।
सर्वे शार्दूलदंष्ट्राश्च सर्वे विवृतदर्शनाः ॥ २४ ॥
वे सब - के - सब वीर थे । नख और दाँत ही उनके आयुध थे । वे बड़े विकराल दिखायी देते थे । उन सबकी दाढ़ें व्याघ्रोंकी दाढ़ोंके समान थीं और सबके नेत्र खुले हुए थे ( अथवा उन सबका वहाँ स्पष्ट दर्शन होता था - कोई छिपे नहीं थे ) ॥ २४ ॥
दशनागबलाः केचित् केचिद् दशगुणोत्तराः ।
केचिन्नागसहस्त्रस्य बभूवुस्तुल्यवर्चसः ॥ २५ ॥
किन्हीं में दस हाथियोंके बराबर बल था तो कोई सौ हाथियोंके समान बलशाली थे तथा किन्हीं-किन्हींका तेज ( बल और पराक्रम ) एक हजार हाथियोंके तुल्य था ॥ २५ ॥
ततस्तैः कपिभिर्व्याप्तां द्रुमहस्तैर्महाबलैः ।
अपश्यल्लक्ष्मणः क्रुद्धः किष्किन्धां तां दुरासदाम् ॥ २६ ॥
हाथमें वृक्ष लिये उन महबली वानरोंसे व्याप्त हुई किष्किन्धापुरी अत्यन्त दुर्जय दिखायी देती थी । लक्ष्मणने कुपित होकर उस पुरीकी ओर देखा ॥ २६ ॥
ततस्ते हरयः सर्वे प्राकारपरिखान्तरात् ।
निष्क्रम्योदग्रसत्त्वास्तु तस्थुराविष्कृतं तदा ॥ २७ ॥
तदनन्तर वे सभी महाबली वानर पुरीकी चहारदीवारी और खाईंके भीतरसे निकलकर प्रकटरूपसे सामने आकर खड़े हो गये ॥ २७ ॥
सुग्रीवस्य प्रमादं च पूर्वजस्यार्थमात्मवान् ।
दृष्ट्वा क्रोधवशं वीरः पुनरेव जगाम सः ॥ २८ ॥
आत्मसंयमी वीर लक्ष्मण सुग्रीवके प्रमाद तथा
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८४४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे
अपने बड़े भाईके महत्त्वपूर्ण कार्यपर दृष्टिपात करके ।
पुनः वानरराजके प्रति क्रोधके वशीभूत हो गये ॥ २८ ॥
स दीर्घोष्णमहोच्छ्वासः कोपसंरक्तलोचनः ।
बभूव नरशार्दूलः सधूम इव पावकः ॥ २ ९ ॥
वे अधिक गरम और लंबी साँस खींचने लगे । उनके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये । उस समय पुरुषसिंह लक्ष्मण धूमयुक्त अग्निके समान प्रतीत हो रहे थे ॥ २ ९ ॥
बाणशल्यस्फुरज्जिह्वः सायकासनभोगवान् ।
स्वतेजोविषसम्भूतः पञ्चास्य इव पन्नगः ॥ ३० ॥
इतना ही नहीं, वे पाँच मुखवाले सर्पके समान दिखायी देने लगे । बाणका फल ही उस सर्पकी लपलपाती हुई जिह्वा जान पड़ता था, धनुष ही उसका विशाल शरीर था तथा वे सर्परूपी लक्ष्मण अपने तेजोमय विषसे व्याप्त हो रहे थे ॥ ३० ॥
तं दीप्तमिव कालाग्निं नागेन्द्रमिव कोपितम् ।
समासाद्याङ्गदस्त्रासाद् विषादमगमत् परम् ॥ ३१ ॥
उस अवसरपर कुमार अङ्गद प्रज्वलित प्रलयाग्नि तथा क्रोधमें भरे हुए नागराज शेषकी भाँति दृष्टिगोचर होनेवाले लक्ष्मणके पास डरते - डरते गये । वे अत्यन्त विषादमें पड़ गये थे ॥३१ ॥
सोऽङ्गदं रोषताम्राक्षः संदिदेश महायशाः ।
सुग्रीवः कथ्यतां वत्स ममागमनमित्युत ॥ ३२ ॥
एष रामानुजः प्राप्तस्त्वत्सकाशमरिंदम ।
भ्रातुर्व्यसनसंतप्तो द्वारि तिष्ठति लक्ष्मणः ॥ ३३ ॥
तस्य वाक्यं यदि रुचिः क्रियतां साधु वानर ।
इत्युक्त्वा शीघ्रमागच्छ वत्स वाक्यमरिंदम ॥ ३४ ॥
महायशस्वी लक्ष्मणने क्रोधसे लाल आँखें करके अङ्गदको आदेश दिया — ' बेटा! सुग्रीवको मेरे आनेकी सूचना दो । उनसे कहना - शत्रुदमन वीर! श्रीरामचन्द्रजीके छोटे भाई लक्ष्मण होकर आपके पास हैं । वानरराज! यदि आज्ञाका अच्छी तरह अङ्गद! बस, इतना ही आओ ' ॥ ३२-३४ ॥ लक्ष्मणस्य वचः श्रुत्वा अपने भ्राताके दुःखसे दुःखी आये हैं और नगर - द्वारपर खड़े आपकी इच्छा हो तो उनकी पालन कीजिये । शत्रुदमन वत्स कहकर तुम शीघ्र मेरे पास लौट
शोकाविष्टोऽङ्गदोऽब्रवीत् ।
पितुः समीपमागम्य सौमित्रिरयमागतः ॥ ३५ ॥
लक्ष्मणकी बात सुनकर शोकाकुल अङ्गदने पिता सुग्रीवके समीप आकर कहा - ' तात! ये सुमित्रानन्दन लक्ष्मण यहाँ पधारे हैं ' ॥ ३५ ॥
अथाङ्गदस्तस्य सुतीव्रवाचा सम्भ्रान्तभावः परिदीनवक्त्रः । निर्गत्य पूर्वं नृपतेस्तरस्वी ततो रुमायाश्चरणौ ववन्दे ॥३६ ॥
( अब इसी बातको कुछ विस्तारके साथ कहते हैं - ) लक्ष्मणकी कठोर वाणीसे अङ्गदके बड़ी घबराहट हुई । उनके मुखपर अत्यन्त दीनता छा गयी । उन वेगशाली कुमारने वहाँसे निकलकर प वानरराज सुग्रीवके, फिर तारा तथा रुमाके चरणों में प्रणाम किया ॥ ३६ ॥
संगृह्य पादौ पितुरुग्रतेजा जग्राह मातुः पुनरेव पादौ । पादौ रुमायाश्च निपीडयित्वा निवेदयामास ततस्तदर्थम् ॥ ३७ ॥
उग्र तेजवाले अङ्गदने पहले तो पिताके दोनों पैर पकड़े फिर अपनी माता ताराके दोनों चरणोंका स्पर्श किया । तदनन्तर रुमाके दोनों पैर दबाये । इसके बाद पूर्वोक्त बात कही ॥ ३७ ॥
स निद्राक्लान्तसंवीतो वानरो न विबुद्धवान् ।
बभूव मदमत्तश्च मदनेन च मोहितः ॥ ३८ ॥
किंतु सुग्रीव मदमत्त एवं कामसे मोहित होकर पड़े थे । निद्राने उनके ऊपर पूरा अधिकार जमा लिया था । इसलिये वे जाग न सके ॥ ३८ ॥
ततः किलकिलां चक्रुर्लक्ष्मणं प्रेक्ष्य वानराः ।
प्रसादयन्तस्तं क्रुद्धं भयमोहितचेतसः ॥ ३ ९ ॥
इतनेमें बाहर क्रोधमें भरे हुए लक्ष्मणको देखकर भयसे मोहितचित्त हुए वानर उन्हें प्रसन्न करनेके लिये दीनतासूचक वाणीमें किलकिलाने लगे ॥ ३ ९ ॥
ते महौघनिभं दृष्ट्वा वज्राशनिसमस्वनम् ।
सिंहनादं समं चक्रुर्लक्ष्मणस्य समीपतः ॥ ४० ॥
लक्ष्मणपर दृष्टि पड़ते ही उन वानरोंने सुग्रीवके निकटवर्ती स्थानमें एक साथ ही महान् जलप्रवाह तथा वज्रकी गड़गड़ाहटके समान जोर - जोरसे सिंहनाद किया ( जिससे सुग्रीव जाग उठें ) ॥ ४० ॥
तेन शब्देन महता प्रत्यबुध्यत वानरः ।
मदविह्वलताम्राक्षो व्याकुलः स्त्रग्विभूषणः ॥ ४१ ॥
वानरोंकी उस भयंकर गर्जनासे कपिराज सुग्रीवकी नींद खुल गयी । उस समय उनके नेत्र मदसे चञ्चल और लाल हो रहे थे । मन भी स्वस्थ नहीं था । उनके गलेमें सुन्दर पुष्पमाला शोभा दे रही थी ॥४१ ॥
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किष्किन्धाकाण्डे द्वात्रिंशः सर्गः ८४५
अथाङ्गदवचः श्रुत्वा तेनैव च समागतौ ।
मन्त्रिणौ वानरेन्द्रस्य सम्मतोदारदर्शनौ ॥ ४२ ॥
प्लक्षश्चैव प्रभावश्च मन्त्रिणावर्थधर्मयोः ।
वक्तुमुच्चावचं प्राप्तं लक्ष्मणं तौ शशंसतुः ॥ ४३ ॥
अङ्गदकी पूर्वोक्त बात सुनकर उन्हींके साथ आये हुए दो मन्त्री प्लक्ष और प्रभावने भी, जो वानरराजके सम्मानपात्र और उदार दृष्टिवाले थे तथा राजाको अर्थ और धर्मके विषयमें ऊँच - नीच समझानेके लिये नियुक्त थे, लक्ष्मणके आगमनकी सूचना दी॥४२-४३ ॥
प्रसादयित्वा सुग्रीवं वचनैः सार्थनिश्चितैः ।
आसीनं पर्युपासीनौ यथा शक्रं मरुत्पतिम् ॥ ४४ ॥
सत्यसंधौ महाभागौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ।
मनुष्यभावं सम्प्राप्तौ राज्या राज्यदायिनौ ॥ ४५ ॥
राजाके निकट खड़े हुए उन दोनों मन्त्रियोंने देवराज इन्द्रके समान बैठे हुए सुग्रीवको खूब सोच -विचार कर निश्चित किये हुए सार्थक वचनोंद्वारा प्रसन्न किया और इस प्रकार कहा - ' राजन्! महाभाग श्रीराम और लक्ष्मण- दोनों भाई सत्यप्रतिज्ञ हैं । ( वे वास्तवमें भगवत्स्वरूप हैं ) उन्होंने स्वेच्छासे मनुष्य - शरीर धारण किया है । वे दोनों समस्त त्रिलोकीका राज्य चलानेके योग्य हैं । वे ही आपके राज्यदाता हैं ॥ ४४-४५ ॥
तयोरेको धनुष्पाणिर्द्वारि तिष्ठति लक्ष्मणः ।
यस्य भीताः प्रवेपन्तो नादान् मुञ्चन्ति वानराः ॥ ४६ ॥
' उनमेंसे एक वीर लक्ष्मण हाथमें धनुष लिये किष्किन्धाके दरवाजेपर खड़े हैं, जिनके भयसे काँपते हुए वानर जोर - जोरसे चीख रहे हैं ॥ ४६ ॥
स एष राघवभ्राता लक्ष्मणो वाक्यसारथिः ।
व्यवसायरथः प्राप्तस्तस्य रामस्य शासनात् ॥ ४७ ॥
' श्रीरामका आदेशवाक्य ही जिनका सारथि और कर्तव्यका निश्चय ही जिनका रथ है, वे लक्ष्मण श्रीरामकी आज्ञासे यहाँ पधारे हैं ॥ ४७ ॥
अयं च तनयो राजंस्ताराया दयितोऽङ्गदः ।
लक्ष्मणेन सकाशं ते प्रेषितस्त्वरयानघ ॥ ४८ ॥
' राजन्! निष्पाप वानरराज! लक्ष्मणने तारादेवीके इन प्रिय पुत्र अङ्गदको आपके निकट बड़ी उतावलीके साथ भेजा है ॥ ४८ ॥
सोऽयं रोषपरीताक्षो द्वारि तिष्ठति वीर्यवान् ।
वानरान् वानरपते चक्षुषा निर्दहन्निव ॥ ४ ९ ॥
' वानरपते! पराक्रमी लक्ष्मण क्रोधसे लाल आँखें किये नगरद्वारपर उपस्थित हैं और वानरोंकी ओर इस तरह देख रहे हैं, मानो वे अपनी नेत्राग्निसे उन्हें दग्ध कर डालेंगे ॥ ४ ९ ॥
तस्य मूर्ध्ना प्रणामं त्वं सपुत्रः सहबान्धवः ।
गच्छ शीघ्रं महाराज रोषो ह्यद्योपशाम्यताम् ॥ ५० ॥
' महाराज! आप शीघ्र चलें तथा पुत्र और बन्धु-बान्धवोंके साथ उनके चरणोंमें मस्तक नवावें और इस प्रकार आज उनका रोष शान्त करें ॥ ५० ॥
यथा हि रामो धर्मात्मा तत्कुरुष्व समाहितः ।
राजंस्तिष्ठ स्वसमये भव सत्यप्रतिश्रवः ॥ ५१ ॥
' राजन्! धर्मात्मा श्रीराम जैसा कहते हैं, सावधानीके साथ उसका पालन कीजिये । आप अपनी दी हुई बातपर अटल रहिये और सत्यप्रतिज्ञ बनिये'॥५१ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे एकत्रिंशः सर्गः ॥३१ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें इकतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३१ ॥
द्वात्रिंशः सर्गः हनुमान्जीका चिन्तित
अङ्गदस्य वचः श्रुत्वा सुग्रीवः सचिवैः सह ।
लक्ष्मणं कुपितं श्रुत्वा मुमोचासनमात्मवान् ॥ १ ॥
मन्त्रियोंसहित अङ्गदका वचन सुनकर और लक्ष्मणके कुपित होनेका समाचार पाकर मनको वशमें रखनेवाले सुग्रीव आसन छोड़कर खड़े हो गये ॥१ ॥
स च तानब्रवीद् वाक्यं निश्चित्य गुरुलाघवम् ।
मन्त्रज्ञान् मन्त्रकुशलो मन्त्रेषु परिनिष्ठितः ॥ २ ॥
वे मन्त्रणा ( कर्तव्यविषयक विचार ) के परिनिष्ठित हुए सुग्रीवको समझाना विद्वान् होनेके कारण मन्त्रप्रयोगमें अत्यन्त कुशल थे । उन्होंने श्रीरामचन्द्रजीकी महत्ता और अपनी लघुताका विचार करके मन्त्रज्ञ मन्त्रियोंसे कहा —॥२ ॥
न मे दुर्व्याहृतं किंचिन्नापि मे दुरनुष्ठितम् ।
लक्ष्मणो राघवभ्राता क्रुद्धः किमिति चिन्तये ॥ ३ ॥
' मैंने न तो कोई अनुचित बात मुँहसे निकाली है और न कोई बुरा काम ही किया है । फिर श्रीरघुनाथजीके | भ्राता लक्ष्मण मुझपर कुपित क्यों हुए हैं? इस बातपर
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८४६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे मैं बारंबार विचार करता हूँ ॥ ३ ॥
असुहृद्भिर्ममामित्रैर्नित्यमन्तरदर्शिभिः 1 मम दोषानसम्भूतान् श्रावितो राघवानुजः ॥ ४ ॥
' जो सदा मेरे छिद्र देखनेवाले हैं तथा जिनका हृदय मेरे प्रति शुद्ध नहीं है, उन शत्रुओंने निश्चय ही श्रीरामचन्द्रजीके छोटे भाई लक्ष्मणसे मेरे ऐसे दोष सुनाये हैं जो मेरे भीतर कभी प्रकट नहीं हुए थे ॥४ ॥
अत्र तावद् यथाबुद्धिः सर्वैरेव यथाविधि ।
भावस्य निश्चयस्तावद् विज्ञेयो निपुणं शनैः ॥ ५ ॥
' लक्ष्मणके कोपके विषयमें पहले तुम सब लोगोंको धीरे - धीरे कुशलतापूर्वक उनके मनोभावका विधिवत् निश्चय कर लेना चाहिये, जिससे उनके कोपके कारणका यथार्थ रूपसे ज्ञान हो जाय ॥ ५ ॥
न खल्वस्ति मम त्रासो लक्ष्मणान्नापि राघवात् ।
मित्रं स्वस्थानकुपितं जनयत्येव सम्भ्रमम् ॥ ६ ॥
' अवश्य ही मुझे लक्ष्मणसे तथा श्रीरघुनाथजीसे कोई भय नहीं है, तथापि बिना अपराधके कुपित हुआ मित्र हृदयमें घबराहट उत्पन्न कर ही देता है ॥ ६ ॥
सर्वथा सुकरं मित्रं दुष्करं प्रतिपालनम् ।
अनित्यत्वात् तु चित्तानां प्रीतिरल्पेऽपि भिद्यते ॥ ७ ॥
' किसीको मित्र बना लेना सर्वथा सुकर है, परंतु उस मैत्रीको पालना या निभाना बहुत ही कठिन है; क्योंकि मनका भाव सदा एक - सा नहीं रहता । किसीके द्वारा थोड़ी-सी भी चुगली कर दी जानेपर प्रेममें अन्तर आ जाता है ।
अतोनिमित्तं त्रस्तोऽहं रामेण तु महात्मना ।
यन्ममोपकृतं शक्यं प्रतिकर्तुं न तन्मया ॥ ८ ॥
' इसी कारण मैं और भी डर गया हूँ; क्योंकि महात्मा श्रीरामने मेरा जो उपकार किया है, उसका बदला चुकानेकी मुझमें शक्ति नहीं है ' ॥ ८ ॥
सुग्रीवेणैवमुक्ते तु हनूमान् हरिपुंगवः ।
उवाच स्वेन तर्केण मध्ये वानरमन्त्रिणाम् ॥ ९ ॥
सुग्रीवके ऐसा कहनेपर वानरोंमें श्रेष्ठ हनुमान्जी अपनी युक्तिका सहारा लेकर वानरमन्त्रियोंके बीचमें बोले - ॥ ९ ॥
सर्वथा नैतदाश्चर्यं यत् त्वं हरिगणेश्वर ।
न विस्मरसि सुस्निग्धमुपकारं कृतं शुभम् ॥ १० ॥
‘ कपिराज! मित्रके द्वारा अत्यन्त स्नेहपूर्वक किये गये उत्तम उपकारको जो आप भूल नहीं रहे हैं, इसमें सर्वथा कोई आश्चर्यकी बात नहीं है ( क्योंकि अच्छे पुरुषोंका ऐसा स्वभाव ही होता है ) ॥ १० ॥
राघवेण तु वीरेण भयमुत्सृज्य दूरतः ।
त्वत्प्रियार्थं हतो वाली शक्रतुल्यपराक्रमः ॥ ११ ॥
सर्वथा प्रणयात् क्रुद्धो राघवो नात्र संशयः ।
भ्रातरं सम्प्रहितवाँल्लक्ष्मणं लक्ष्मिवर्धनम् ॥१२ ॥
' वीरवर श्रीरघुनाथजीने तो लोकापवादके भयको दूर हटाकर आपका प्रिय करनेके लिये इन्द्रतुल्य पराक्रमी वालीका वध किया है; अतः वे निःसंदेह आपपर कुपित नहीं हैं । श्रीरामचन्द्रजीने शोभा - सम्पत्तिकी वृद्धि करनेवाले अपने भाई लक्ष्मणको जो आपके पास भेजा है, इसमें सर्वथा आपके प्रति उनका प्रेम ही कारण है ॥ ११-१२ ॥
त्वं प्रमत्तो न जानीषे कालं कालविदां वर ।
फुल्लसप्तच्छदश्यामा प्रवृत्ता तु शरच्छुभा ॥ १३ ॥
' समयका ज्ञान रखनेवालोंमें श्रेष्ठ कपिराज! आपने सीताकी खोज करनेके लिये जो समय निश्चित किया था, उसे आप इन दिनों प्रमादमें पड़ जानेके कारण भूल गये हैं । देखिये न, यह सुन्दर शरद् -ऋतु आरम्भ हो गयी है, जो खिले हुए छितवनके फूलोंसे श्यामवर्णकी प्रतीत होती है ॥ १३ ॥
निर्मलग्रहनक्षत्रा द्यौः प्रणष्टबलाहका ।
प्रसन्नाश्च दिशः सर्वाः सरितश्च सरांसि च ॥१४ ॥
' आकाशमें अब बादल नहीं रहे । ग्रह, नक्षत्र निर्मल दिखायी देते हैं । सम्पूर्ण दिशाओंमें प्रकाश छा गया है तथा नदियों और सरोवरोंके जल पूर्णतः स्वच्छ हो गये हैं ॥
प्राप्तमुद्योगकालं तु नावैषि हरिपुंगव ।
त्वं प्रमत्त इति व्यक्तं लक्ष्मणोऽयमिहागतः ॥ १५ ॥
' वानरराज! राजाओंके लिये विजय - यात्राकी तैयारी करनेका समय आ गया है; किंतु आपको कुछ पता ही नहीं है । इससे स्पष्ट प्रतीत होता है कि आप प्रमादमें पड़ गये हैं । इसीलिये लक्ष्मण यहाँ आये हैं ॥ १५ ॥
आर्तस्य हृतदारस्य परुषं पुरुषान्तरात् ।
वचनं मर्षणीयं ते राघवस्य महात्मनः ॥ १६ ॥
' महात्मा श्रीरामचन्द्रजीकी पत्नीका अपहरण हुआ है, इसलिये वे बहुत दुःखी हैं । अतः यदि लक्ष्मणके मुखसे उनका कठोर वचन भी सुनना पड़े तो आपको चुपचाप सह लेना चाहिये ॥ १६ ॥
कृतापराधस्य हि ते नान्यत् पश्याम्यहं क्षमम् ।
अन्तरेणाञ्जलिं बद्ध्वा लक्ष्मणस्य प्रसादनात् ॥ १७ ॥
' आपकी ओरसे अपराध हुआ है । अतः हाथ जोड़कर लक्ष्मणको प्रसन्न करनेके सिवा आपके लिये और कोई उचित कर्तव्य मैं नहीं देखता ॥ १७ ॥
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किष्किन्धाकाण्डे
नियुक्तैर्मन्त्रिभिर्वाच्यो ह्यवश्यं पार्थिवो हितम् ।
इत एव भयं त्यक्त्वा ब्रवीम्यवधृतं वचः ॥ १८ ॥
‘ राज्यकी भलाईके कामपर नियुक्त हुए मन्त्रियोंका यह कर्तव्य है कि राजाको उसके हितकी बात अवश्य बतावें । अतएव मैं भय छोड़कर अपना निश्चित विचार बता रहा हूँ ॥१८ ॥
अभिक्रुद्धः समर्थो हि चापमुद्यम्य राघवः ।
सदेवासुरगन्धर्वं वशे स्थापयितुं जगत् ॥ १ ९ ॥
' भगवान् श्रीराम यदि क्रोध करके धनुष हाथमें ले लें तो देवता - असुर - गन्धर्वोंसहित सम्पूर्ण जगत्को अपने वशमें कर सकते हैं ॥ १ ९ ॥
न स क्षमः कोपयितुं यः प्रसाद्यः पुनर्भवेत् ।
पूर्वोपकारं स्मरता कृतज्ञेन विशेषतः ॥ २० ॥
' जिसे पीछे हाथ जोड़कर मनाना पड़े, ऐसे पुरुषको क्रोध दिलाना कदापि उचित नहीं है । विशेषतः वह पुरुष जो मित्रके किये हुए पहले उपकारको याद । त्रयस्त्रिंशः सर्गः ८४७ रखता हो और कृतज्ञ हो, इस बातका अधिक ध्यान रखे ॥ २० ॥
तस्य मूर्ध्ना प्रणम्य त्वं सपुत्रः ससुहृज्जनः ।
राजंस्तिष्ठ स्वसमये भर्तुर्भार्येव तद्वशे ॥ २१ ॥
' राजन्! इसलिये आप पुत्र और मित्रोंके साथ मस्तक झुकाकर उन्हें प्रणाम कीजिये और अपनी प्रतिज्ञापर अटल रहिये । जैसे पत्नी अपने पतिके वशमें रहती है, उसी प्रकार आप सदा श्रीरामचन्द्रजीके अधीन रहिये ॥ २१ ॥
न रामरामानुजशासनं त्वया कपीन्द्रयुक्तं मनसाप्यपोहितुम् । मनो हि ते ज्ञास्यति मानुषं बलं सराघवस्यास्य सुरेन्द्रवर्चसः ॥ २२ ॥
' वानरराज! श्रीराम और लक्ष्मणके आदेशकी आपको मनसे भी उपेक्षा नहीं करनी चाहिये । देवराज इन्द्रके समान तेजस्वी लक्ष्मणसहित श्रीरघुनाथजीके अलौकिक बलका ज्ञान तो आपके मनको है ही ' ॥ २२ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे द्वात्रिंशः सर्गः ॥ ३२ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें बत्तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३२ ॥
त्रयस्त्रिंशः सर्गः लक्ष्मणका किष्किन्धापुरीकी शोभा देखते हुए सुग्रीवके महलमें प्रवेश करके क्रोधपूर्वक धनुषको टंकारना, भयभीत सुग्रीवका ताराको उन्हें शान्त करनेके लिये भेजना तथा ताराका समझा - बुझाकर उन्हें अन्तःपुरमें ले आना
अथ प्रतिसमादिष्टो लक्ष्मणः परवीरहा ।
प्रविवेश गुहां रम्यां किष्किन्धां रामशासनात् ॥ १ ॥
इधर गुफामें प्रवेश करनेके लिये अङ्गदके प्रार्थना करनेपर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले लक्ष्मणने श्रीरामकी आज्ञाके अनुसार किष्किन्धा नामक रमणीय गुफामें प्रवेश किया ॥१ ॥
द्वारस्था हरयस्तत्र महाकाया महाबलाः ।
बभूवुर्लक्ष्मणं दृष्ट्वा सर्वे प्राञ्जलयः स्थिताः ॥ २ ॥
किष्किन्धाके द्वारपर जो विशाल शरीरवाले महाबली वानर थे, वे सब लक्ष्मणको देख हाथ जोड़कर खड़े हो गये ॥२ ॥
निःश्वसन्तं तु तं दृष्ट्वा क्रुद्धं दशरथात्मजम् ।
बभूवुर्हरयस्त्रस्ता न चैनं पर्यवारयन् ॥ ३ ॥
दशरथनन्दन लक्ष्मणको क्रोधपूर्वक लंबी साँस खींचते देख वे सब वानर अत्यन्त भयभीत हो गये थे । इसलिये वे उन्हें चारों ओरसे घेरकर उनके साथ - साथ नहीं चल सके ॥ ३ ॥
स तां रत्नमयीं दिव्यां श्रीमान् पुष्पितकाननाम् ।
रम्यां रत्नसमाकीर्णां ददर्श महतीं गुहाम् ॥४ ॥
श्रीमान् लक्ष्मणने द्वारके भीतर प्रवेश करके देखा, किष्किन्धापुरी एक बहुत बड़ी रमणीय गुफाके रूपमें बसी हुई है । वह रत्नमयी पुरी नाना प्रकारके रत्नोंसे भरी - पूरी होनेके कारण दिव्य शोभासे सम्पन्न है । वहाँके वन - उपवन फूलोंसे सुशोभित दिखायी दिये ॥ ४ ॥
हर्म्यप्रासादसम्बाधां नानारत्नोपशोभिताम् ।
सर्वकामफलैर्वृक्षैः पुष्पितैरुपशोभिताम् ॥ ५ ॥
हय ( धनियोंकी अट्टालिकाओं ) तथा प्रासादों ( देवमन्दिरों और राजभवनों ) से वह पुरी अत्यन्त घनी दिखायी देती थी । नाना प्रकारके रत्न उसकी शोभा बढ़ाते थे । सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाले फलोंसे । युक्त खिले हुए वृक्षोंसे वह पुरी सुशोभित थी ॥ ५ ॥
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८४८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे
देवगन्धर्वपुत्रैश्च वानरैः कामरूपिभिः ।
दिव्यमाल्याम्बरधरैः शोभितां प्रियदर्शनैः ॥ ६ ॥
वहाँ दिव्य माला और दिव्य वस्त्र धारण करनेवाले परम सुन्दर वानर, जो देवताओं और गन्धर्वोंके पुत्र तथा इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले थे, निवास करते हुए उस नगरीकी शोभा बढ़ाते थे ॥ ६ ॥
चन्दनागुरुपद्मानां गन्धैः सुरभिगन्धिताम् ।
मैरेयाणां मधूनां च सम्मोदितमहापथाम् ॥ ७ ॥
वहाँ चन्दन, अगर और कमलोंकी मनोहर सुगन्ध छा रही थी । उस पुरीकी लंबी - चौड़ी सड़कें भी मैरेय तथा मधुके आमोदसे महक रही थीं ॥ ७ ॥
विन्ध्यमेरुगिरिप्रख्यैः प्रासादैर्नैकभूमिभिः ।
ददर्श गिरिनद्यश्च विमलास्तत्र राघवः ॥ ८ ॥
उस पुरीमें विन्ध्याचल तथा मेरुके समान ऊँचे - ऊँचे महल बने थे, जो कई मंजिलके थे । लक्ष्मणने उस गुफाके निकट ही निर्मल जलसे भरी हुई पहाड़ी नदियाँ देखीं ॥ ८ ॥
अङ्गदस्य गृहं रम्यं मैन्दस्य द्विविदस्य च ।
गवयस्य गवाक्षस्य गजस्य शरभस्य च ॥ ९ ॥
विद्युन्मालेश्च सम्पातेः सूर्याक्षस्य हनूमतः ।
वीरबाहोः सुबाहोश्च नलस्य च महात्मनः ॥ १० ॥
कुमुदस्य सुषेणस्य तारजाम्बवतोस्तथा ।
दधिवक्त्रस्य नीलस्य सुपाटलसुनेत्रयोः ॥ ११ ॥
एतेषां कपिमुख्यानां राजमार्गे महात्मनाम् ।
ददर्श गृहमुख्यानि महासाराणि लक्ष्मणः ॥ १२ ॥
उन्होंने राजमार्गपर अङ्गदका रमणीय भवन देखा । साथ ही वहाँ मैन्द, द्विविद, गवय, गवाक्ष, गज, शरभ, विद्युन्माली, सम्पाति, सूर्याक्ष, हनुमान्, वीरबाहु, सुबाहु, महात्मा नल, कुमुद, सुषेण, तार, जाम्बवान्, दधिमुख, नील, सुपाटल और सुनेत्र — इन महामनस्वी वानरशिरोमणियोंके
भी अत्यन्त सुदृढ़ श्रेष्ठ भवन लक्ष्मणको दृष्टिगोचर हुए ।
वे सब - के - सब राजमार्गपर ही बने हुए थे ॥ ९ –१२ ॥
पाण्डुराभ्रप्रकाशानि गन्धमाल्ययुतानि च ।
प्रभूतधनधान्यानि स्त्रीरत्नैः शोभितानि च ॥ १३ ॥
वे सभी भवन श्वेत बादलोंके समान प्रकाशित हो रहे थे । उन्हें सुगन्धित पुष्पमालाओंसे सजाया गया था । वे प्रचुर धन - धान्यसे सम्पन्न तथा रत्नस्वरूपा रमणियोंसे सुशोभित थे ॥ १३ ॥
पाण्डुरेण तु शैलेन परिक्षिप्तं दुरासदम् ।
वानरेन्द्रगृहं रम्यं महेन्द्रसदनोपमम् ॥ १४॥ ।
वानरराज सुग्रीवका सुन्दर भवन इन्द्रसदनके समान रमणीय दिखायी देता था । उसमें प्रवेश करना किसी
लिये भी अत्यन्त कठिन था । वह श्वेत पर्वतकी चहार-दीवारीसे घिरा हुआ था ॥ १४ ॥
शुक्लैः प्रासादशिखरैः कैलासशिखरोपमैः ।
। सर्वकामफलैर्वभैः पुष्पितैरुपशोभितम् ॥ १५ ॥
कैलास - शिखरके समान श्वेत प्रासाद - शिखर तथा समस्त मनोरथको पूर्ण करनेवाले फलोंसे युक्त पुष्पित दिव्य वृक्ष उस राजभवनकी शोभा बढ़ाते थे ॥ १५ ॥
महेन्द्रदत्तैः श्रीमद्धिर्नीलजीमूतसंनिभैः ।
दिव्यपुष्पफलैर्वृक्षैः शीतच्छायैर्मनोरमैः ॥ १६ ॥
वहाँ इन्द्रके दिये हुए दिव्य फल - फूलोंसे सम्पन्न मनोरम वृक्ष लगाये गये थे, जो परम सुन्दर, नीले मेघके समान श्याम तथा शीतल छायासे युक्त थे ॥ १६ ॥
हरिभिः संवृतद्वारं बलिभिः शस्त्रपाणिभिः ।
दिव्यमाल्यावृतं शुभ्रं तप्तकाञ्चनतोरणम् ॥ १७ ॥
अनेक बलवान् वानर हाथोंमें हथियार लिये उसकी ड्योढ़ीपर पहरा दे रहे थे । वह सुन्दर महल दिव्य मालाओंसे अलंकृत था और उसका बाहरी फाटक पक्के सोनेका बना हुआ था ॥१७ ॥
सुग्रीवस्य गृहं रम्यं प्रविवेश महाबलः ।
अवार्यमाणः सौमित्रिर्महाभ्रमिव भास्करः ॥ १८ ॥
महाबली सुमित्राकुमार लक्ष्मणने सुग्रीवके उस रमणीय भवनमें प्रवेश किया । मानो सूर्यदेव महान्
मेघके भीतर प्रविष्ट हुए हों । उस समय किसीने रोक-टोक नहीं की ॥ १८ ॥
स सप्त कक्ष्या धर्मात्मा यानासनसमावृताः ।
ददर्श सुमहद्गुतं ददर्शान्तःपुरं महत् ॥ १ ९ ॥
धर्मात्मा लक्ष्मणने सवारियों तथा विविध आसनोंसे सुशोभित उस भवनकी सात ड्योढ़ियोंको पार करके बहुत ही गुप्त और विशाल अन्तःपुरको देखा ॥ १ ९ ॥
हैमराजतपर्यकैर्बहुभिश्च वरासनैः ।
महार्हास्तरणोपेतैस्तत्र तत्र समावृतम् ॥ २० ॥
उसमें जहाँ - तहाँ चाँदी और सोनेके बहुत - से पलंग तथा अनेकानेक श्रेष्ठ आसन रखे हुए थे और उन सबपर बहुमूल्य बिछौने बिछे थे । उन सबसे वह अन्तःपुर सुसज्जित दिखायी देता था ॥ २० ॥
प्रविशन्नेव सततं शुश्राव मधुरस्वनम् ।
तन्त्रीगीतसमाकीर्ण समतालपदाक्षरम् ॥ २१ ॥