वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ — पृष्ठ 891–900

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 891–900

पृष्ठ 891

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किष्किन्धाकाण्डे ' तुम सब लोग भी बड़े पराक्रमी तथा कर्तव्याकर्तव्यके निर्णयमें प्रमाणभूत ( विश्वसनीय ) हो, तथापि इन्हें अपना प्रधान बनाकर तुम पश्चिम दिशाकी देखभाल आरम्भ करो ॥

दृष्टायां तु नरेन्द्रस्य पल्याममिततेजसः ।

कृतकृत्या भविष्यामः कृतस्य प्रतिकर्मणा ॥५६ ॥

' अमित तेजस्वी महाराज श्रीरामकी पत्नीका पता लग जानेपर हम कृतकृत्य हो जायँगे; क्योंकि उन्होंने जो उपकार किया है, उसका बदला इसी तरह चुक सकेगा ।

अतोऽन्यदपि यत्कार्यं कार्यस्यास्य प्रियं भवेत् ।

सम्प्रधार्य भवद्भिश्च देशकालार्थसंहितम् ॥ ५७ ॥

त्रिचत्वारिंशः सर्गः ८७ ९ | " ' अतः इस कार्यके अनुकूल और भी जो कर्तव्य देश, काल और प्रयोजनसे सम्बन्ध रखता हो, उसका विचार करके आपलोग उसे भी करें ' ॥ ५७ ॥

ततः सुषेणप्रमुखाः प्लवङ्गाः सुग्रीववाक्यं निपुणं निशम्य । आमन्त्र्य सर्वे प्लवगाधिपं ते जग्मुर्दिशं तां वरुणाभिगुप्ताम् ॥ ५८ ॥

सुग्रीवकी बातें अच्छी तरह सुनकर सुषेण आदि सब वानर उन वानरराजकी अनुमति ले वरुणद्वारा सुरक्षित । पश्चिम दिशाकी ओर चल दिये ॥ ५८ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे द्विचत्वारिंशः सर्गः ॥ ४२ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें बयालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ४२ ॥

त्रिचत्वारिंशः सर्गः सुग्रीवका उत्तर दिशाके स्थानोंका परिचय देते हुए शतबलि आदि वानरोंको वहाँ भेजना

ततः संदिश्य सुग्रीवः श्वशुरं पश्चिमां दिशम् ।

वीरं शतबलिं नाम वानरं वानरेश्वरः ॥ १ ॥

उवाच राजा सर्वज्ञः सर्ववानरसत्तमः ।

वाक्यमात्महितं चैव रामस्य च हितं तदा ॥ २ ॥

इस प्रकार अपने श्वशुरको पश्चिम दिशाकी ओर जानेका संदेश दे सर्वज्ञ, सर्व - वानर - शिरोमणि वानरेश्वर राजा सुग्रीव अपने हितैषी शतबलि नामक वीर वानरसे श्रीरामचन्द्रजीके हितकी बात बोले- ॥ १-२ ॥

वृतः शतसहस्त्रेण त्वद्विधानां वनौकसाम् ।

वैवस्वतसुतैः सार्धं प्रविष्टः सर्वमन्त्रिभिः ॥ ३ ॥

दिशं ह्युदीचीं विक्रान्तां हिमशैलावतंसिकाम् ।

सर्वतः परिमार्गध्वं रामपत्नीं यशस्विनीम् ॥ ४ ॥

' पराक्रमी वीर! तुम अपने ही समान एक लाख वनवासी वानरोंको जो यमराजके बेटे हैं, साथ लेकर अपने समस्त मन्त्रियोंसहित उस उत्तर दिशामें प्रवेश करो, जो हिमालयरूपी आभूषणोंसे विभूषित है और वहाँ सब ओर यशस्विनी श्रीरामपत्नी सीताका अन्वेषण करो ॥ ३-४ ॥

अस्मिन् कार्ये विनिर्वृत्ते कृते दाशरथेः प्रिये ।

ऋणान्मुक्ता भविष्यामः कृतार्थार्थविदां वराः ॥ ५ ॥

' अपने मुख्य प्रयोजनको समझनेवाले वीरोंमें श्रेष्ठ वानरो! यदि हमलोगोंके द्वारा दशरथनन्दन भगवान् श्रीरामका यह प्रिय कार्य सम्पन्न हो जाय तो हम उनके उपकारके ऋणसे मुक्त और कृतार्थ हो जायँगे ॥५ ॥

कृतं हि प्रियमस्माकं राघवेण महात्मना ।

तस्य चेत्प्रतिकारोऽस्ति सफलं जीवितं भवेत् ॥ ६ ॥

' महात्मा श्रीरघुनाथजीने हमलोगोंका प्रिय कार्य किया है । उसका यदि कुछ बदला दिया जा सके तो हमारा जीवन सफल हो जाय ॥ ६ ॥

अर्थिनः कार्यनिर्वृत्तिमकर्तुरपि यश्चरेत् ।

तस्य स्यात् सफलं जन्म किं पुनः पूर्वकारिणः ॥ ७ ॥

' जिसने कोई उपकार न किया हो, वह भी यदि किसी कार्यके लिये प्रार्थी होकर आया हो तो जो पुरुष उसके कार्यको सिद्ध कर देता है, उसका जन्म भी सफल हो जाता है । फिर जिसने पहलेके उपकारीके कार्यको सिद्ध किया हो, उसके जीवनकी सफलताके विषयमें तो कहना ही क्या है ॥ ७ ॥

एतां बुद्धिं समास्थाय दृश्यते जानकी यथा ।

तथा भवद्भिः कर्तव्यमस्मत्प्रियहितैषिभिः ॥ ८ ॥

' इसी विचारका आश्रय लेकर मेरा प्रिय और हित चाहनेवाले तुम सब वानरोंको ऐसा प्रयत्न करना चाहिये, जिससे जनकनन्दिनी सीताका पता लग जाय ॥ ८ ॥

अयं हि सर्वभूतानां मान्यस्तु नरसत्तमः ।

अस्मासु च गतः प्रीतिं रामः परपुरंजयः ॥ ९ ॥

' शत्रुओंकी नगरीपर विजय पानेवाले ये नरश्रेष्ठ श्रीराम समस्त प्राणियोंके लिये माननीय हैं । हमलोगोंपर भी इनका बहुत प्रेम है॥९॥

इमानि बहुदुर्गाणि नद्यः शैलान्तराणि च ।

भवन्तः परिमार्गन्तु बुद्धिविक्रमसम्पदा ॥ १० ॥

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८८० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे ' तुम सब लोग बुद्धि और पराक्रमके द्वारा इन । अत्यन्त दुर्गम प्रदेशों, पर्वतों और नदियोंके तटोंपर जा-जाकर सीताकी खोज करो ॥ १० ॥

तत्र म्लेच्छान् पुलिन्दांश्च शूरसेनांस्तथैव च ।

प्रस्थलान् भरतांश्चैव कुरूंश्च सह मद्रकैः ॥ ११ ॥

काम्बोजयवनांश्चैव शकानां पत्तनानि च ।

अन्वीक्ष्य दरदांश्चैव हिमवन्तं विचिन्वथ ॥ १२ ॥

' उत्तरमें म्लेच्छ, पुलिन्द, शूरसेन, प्रस्थल, भरत ( इन्द्रप्रस्थ और हस्तिनापुरके आस - पासके प्रान्त ), कुरु ( दक्षिण कुरु - कुरुक्षेत्रके आस - पासकी भूमि ), मद्र, काम्बोज, यवन, शकोंके देशों एवं नगरोंमें भलीभाँति अनुसंधान करके दरद देशमें और हिमालय पर्वतपर ढूँढ़ो ॥

लोध्रपद्मकषण्डेषु देवदारुवनेषु च ।

रावणः सह वैदेह्या मार्गितव्यस्ततस्ततः ॥ १३ ॥

' वहाँ लोध्र और पद्मककी झाड़ियोंमें तथा देवदारुके जंगलोंमें वैदेहीसहित रावणकी खोज करनी चाहिये ॥ १३ ॥

ततः सोमाश्रमं गत्वा देवगन्धर्वसेवितम् ।

कालं नाम महासानुं पर्वतं तं गमिष्यथ ॥ १४ ॥

' फिर देवताओं और गन्धवसे सेवित सोमाश्रममें होते हुए ऊँचे शिखरवाले काल नामक पर्वतपर जाओ ॥

महत्सु तस्य शैलेषु पर्वतेषु गुहासु च ।

विचिन्वत महाभागां रामपत्नीमनिन्दिताम् ॥ १५ ॥

' उस पर्वतकी शाखाभूत अन्य छोटे - बड़े पर्वतों और उन सबकी गुफाओंमें सती - साध्वी श्रीरामपत्नी महाभागा सीताका अन्वेषण करो ॥ १५ ॥

तमतिक्रम्य शैलेन्द्रं हेमगर्भं महागिरिम् ।

ततः सुदर्शनं नाम पर्वतं गन्तुमर्हथ ॥ १६ ॥

' जिसके भीतर सुवर्णकी खान हैं, उस गिरिराज कालको लाँघकर तुम्हें सुदर्शन नामक महान् पर्वतपर जाना चाहिये ॥ १६ ॥

ततो देवसखो नाम पर्वतः पतगालयः ।

नानापक्षिसमाकीर्णो विविधद्रुमभूषितः ॥ १७ ॥

‘ उससे आगे बढ़नेपर देवसख नामवाला पहाड़ मिलेगा, जो पक्षियोंका निवासस्थान है । वह भाँति-भाँतिके विहंगमोंसे व्याप्त तथा नाना प्रकारके वृक्षोंसे विभूषित है ॥ १७ ॥

तस्य काननषण्डेषु निर्झरेषु गुहासु च ।

रावणः सह वैदेह्या मार्गितव्यस्ततस्ततः ॥ १८ ॥

' उसके वनसमूहों, निर्झरों और गुफाओंमें तुम्हें विदेहकुमारी सीतासहित रावणकी खोज करनी चाहिये ॥ ।

तमतिक्रम्य चाकाशं सर्वतः शतयोजनम् ।

अपर्वतनदीवृक्षं सर्वसत्त्वविवर्जितम् ॥१ ९ ॥

' वहाँसे आगे बढ़नेपर एक सुनसान मैदान मिलेगा, जो सब ओरसे सौ योजन विस्तृत है । वहाँ नदी, पर्वत, वृक्ष और सब प्रकारके जीव - जन्तुओंका अभाव है ॥ १ ९ ॥

तत्तु शीघ्रमतिक्रम्य कान्तारं रोमहर्षणम् ।

कैलासं पाण्डुरं प्राप्य हृष्टा यूयं भविष्यथ ॥ २० ॥

' रोंगटे खड़े कर देनेवाले उस दुर्गम प्रान्तको शीघ्रता-पूर्वक लाँघ जानेपर तुम्हें श्वेतवर्णका कैलास पर्वत मिलेगा । वहाँ पहुँचनेपर तुम सब लोग हर्षसे खिल उठोगे ॥

तत्र पाण्डुरमेघाभं जाम्बूनदपरिष्कृतम् ।

कुबेरभवनं रम्यं निर्मितं विश्वकर्मणा ॥ २१ ॥

' वहीं विश्वकर्माका बनाया हुआ कुबेरका रमणीय भवन है, जो श्वेत बादलोंके समान प्रतीत होता है । उस भवनको जाम्बूनद नामक सुवर्णसे विभूषित किया गया है ॥

विशाला नलिनी यत्र प्रभूतकमलोत्पला ।

हंसकारण्डवाकीर्णा अप्सरोगणसेविता ॥ २२ ॥

' उसके पास ही एक बहुत बड़ा सरोवर है, जिसमें कमल और उत्पल प्रचुर मात्रामें पाये जाते हैं । उसमें हंस और कारण्डव आदि जलपक्षी भरे रहते हैं तथा अप्सराएँ उसमें जल - क्रीड़ा करती हैं ॥ २२ ॥

तत्र वैश्रवणो राजा सर्वलोकनमस्कृतः ।

धनदो रमते श्रीमान् गुह्यकैः सह यक्षराट् ॥ २३ ॥

' वहाँ यक्षोंके स्वामी विश्रवाकुमार श्रीमान् राजा कुबेर जो समस्त विश्वके लिये वन्दनीय और धन देनेवाले हैं, गुह्यकोंके साथ विहार करते हैं ॥ २३ ॥

तस्य चन्द्रनिकाशेषु पर्वतेषु गुहासु च ।

रावणः सह वैदेह्या मार्गितव्यस्ततस्ततः ॥ २४ ॥

' उस कैलासके चन्द्रमाकी भाँति उज्ज्वल शाखा-पर्वतोंपर तथा उनकी गुफाओंमें सब ओर घूम -फिरकर -1 तुम्हें सीतासहित रावणका अनुसंधान करना चाहिये ॥ २४ ॥

क्रौञ्चं तु गिरिमासाद्य बिलं तस्य सुदुर्गमम् ।

अप्रमत्तैः प्रवेष्टव्यं दुष्प्रवेशं हि तत् स्मृतम् ॥ २५ ॥

' इसके बाद क्रौञ्चगिरिपर जाकर वहाँकी अत्यन्त दुर्गम विवररूप गुफामें ( जो स्कन्दकी शक्तिसे पर्वतके विदीर्ण होनेके कारण बन गयी है ) तुम्हें सावधानीके साथ प्रवेश करना चाहिये; क्योंकि उसके भीतर प्रवेश करना अत्यन्त कठिन माना गया है ॥ २५ ॥

वसन्ति हि महात्मानस्तत्र सूर्यसमप्रभाः ।

देवैरभ्यर्थिताः सम्यग् देवरूपा महर्षयः ॥ २६ ॥

पृष्ठ 893

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किष्किन्धाकाण्डे त्रिचत्वारिंशः सर्गः ८८१ ' उस गुफामें सूर्यके समान तेजस्वी महात्मा । निवास करते हैं । उन देवस्वरूप महर्षियोंकी देवतालोग भी अभ्यर्थना करते हैं ॥ २६ ॥

क्रौञ्चस्य तु गुहाश्चान्याः सानूनि शिखराणि च ।

निर्दराश्च नितम्बाश्च विचेतव्यास्ततस्ततः ॥ २७ ॥

क्रौञ्च पर्वतकी और भी बहुत - सी गुफाएँ, अनेकानेक चोटियाँ, शिखर, कन्दराएँ तथा नितम्ब ( ढालू प्रदेश ) हैं; उन सबमें सब ओर घूम - फिरकर तुम्हें सीता और रावणका पता लगाना चाहिये ॥ २७ ॥

अवृक्षं कामशैलं च मानसं विहगालयम् ।

न गतिस्तत्र भूतानां देवानां न च रक्षसाम् ॥ २८ ॥

' वहाँसे आगे वृक्षोंसे रहित मानस नामक शिखर है, जहाँ शून्य होनेके कारण कभी पक्षीतक नहीं जाते हैं । कामदेवकी तपस्याका स्थान होनेके कारण वह क्रौञ्चशिखर कामशैलके नामसे विख्यात है । वहाँ भूतों, देवताओं तथा राक्षसोंका भी कभी जाना नहीं होता है ॥२८ ॥

स च सर्वैर्विचेतव्यः ससानुप्रस्थभूधरः ।

क्रौञ्चं गिरिमतिक्रम्य मैनाको नाम पर्वतः ॥ २ ९ ॥

' शिखरों, घाटियों और शाखापर्वतोंसहित समूचे क्रौञ्चपर्वतकी तुमलोग छानबीन करना । क्रौञ्चगिरिको लाँघकर आगे बढ़नेपर मैनाक पर्वत मिलेगा ॥ २ ९ ॥

मयस्य भवनं तत्र दानवस्य स्वयंकृतम् ।

मैनाकस्तु विचेतव्यः ससानुप्रस्थकन्दरः ॥ ३० ॥

' वहाँ मयदानवका घर है, जिसे उसने स्वयं ही अपने लिये बनाया है । तुमलोगोंको शिखरों, चौरस मैदानों और कन्दराओंसहित मैनाक पर्वतपर भलीभाँति सीताजीकी खोज करनी चाहिये ॥ ३० ॥

स्त्रीणामश्वमुखीनां तु निकेतस्तत्र तत्र तु ।

तं देशं समतिक्रम्य आश्रमं सिद्धसेवितम् ॥ ३१ ॥

' वहाँ यत्र - तत्र घोड़ेके - से मुँहवाली किन्नरियोंके निवासस्थान हैं । उस प्रदेशको लाँघ जानेपर सिद्धसेवित आश्रम मिलेगा ॥ ३१ ॥

सिद्धा वैखानसा यत्र वालखिल्याश्च तापसाः ।

वन्दितव्यास्ततः सिद्धास्तपसा वीतकल्मषाः ॥ ३२ ॥

प्रष्टव्या चापि सीतायाः प्रवृत्तिर्विनयान्वितैः । ' उसमें सिद्ध, वैखानख तथा वालखिल्य नामक तपस्वी निवास करते हैं । तपस्यासे उनके पाप धुल गये हैं । उन सिद्धोंको तुमलोग प्रणाम करना और विनीतभावसे सीताका समाचार पूछना ॥ ३२३ ॥

हेमपुष्करसंछन्नं तत्र वैखानसं सरः ॥ ३३ ॥

तरुणादित्यसंकाशैर्हंसैर्विचरितं शुभैः । ' उस आश्रमके पास ' वैखानस सर ' के नामसे प्रसिद्ध एक सरोवर है, जिसका जल सुवर्णमय कमलोंसे आच्छादित रहता है । उसमें प्रातःकालिक सूर्यके समान सुनहरे एवं अरुणवर्णवाले सुन्दर हंस विचरते रहते हैं ॥ औपवाह्यः कुबेरस्य सार्वभौम इति स्मृतः ॥ ३४ ॥

गजः पर्येति तं देशं सदा सह करेणुभिः । ' कुबेरकी सवारीमें काम आनेवाला सार्वभौम-नामक गजराज अपनी हथिनियोंके साथ उस देशमें सदा घूमता रहता है ॥ ३४३ ॥

तत् सरः समतिक्रम्य नष्टचन्द्रदिवाकरम् ।

अनक्षत्रगणं व्योम निष्पयोदमनादितम् ॥ ३५ ॥

' उस सरोवरको लाँघकर आगे जानेपर सूना आकाश दिखायी देगा । उसमें सूर्य, चन्द्रमा तथा तारोंके दर्शन नहीं होंगे । वहाँ न तो मेघोंकी घटा दिखायी देगी और न उनकी गर्जना ही सुनायी पड़ेगी ॥ ३५ ॥

गभस्तिभिरिवार्कस्य स तु देशः प्रकाश्यते ।

विश्राम्यद्भिस्तपः सिद्धैर्देवकल्पैः स्वयंप्रभैः ॥ ३६ ॥

' तथापि उस देशमें ऐसा प्रकाश छाया होगा, मानो सूर्यकी किरणोंसे ही वह प्रकाशित हो रहा है । वहाँ अपनी ही प्रभासे प्रकाशित तपःसिद्ध देवोपम महर्षि विश्राम करते हैं । उन्हींकी अङ्गप्रभासे उस देशमें उजाला छाया रहता है ॥ ३६ ॥

तं तु देशमतिक्रम्य शैलोदा नाम निम्नगा ।

उभयोस्तीरयोस्तस्या: कीचका नाम वेणवः ॥ ३७ ॥

' उस प्रदेशको लाँघकर आगे बढ़नेपर ' शैलोदा ' नामवाली नदीका दर्शन होगा । उसके दोनों तटोंपर कीचक ( वंशीकी - सी ध्वनि करनेवाले ) बाँस हैं; यह बात प्रसिद्ध है ॥ ३७ ॥

ते नयन्ति परं तीरं सिद्धान् प्रत्यानयन्ति च ।

। उत्तराः कुरवस्तत्र कृतपुण्यप्रतिश्रयाः ॥ ३८ ॥

' वे बाँस ही ( साधन बनकर ) सिद्ध पुरुषोंको शैलोदाके उस पार ले जाते और वहाँसे इस पार ले आते हैं । जहाँ केवल पुण्यात्मा पुरुषका वास है, वह उत्तर कुरुदेश शैलोदाके तटपर ही है ॥ ३८ ॥

ततः काञ्चनपद्माभिः पद्मिनीभिः कृतोदकाः ।

नीलवैदूर्यपत्राढ्या नद्यस्तत्र सहस्रशः ॥ ३ ९ ॥

' उत्तर कुरुदेशमें नील वैदूर्यमणिके समान हरे - हरे कमलोंके पत्तोंसे सुशोभित सहस्रों नदियाँ बहती हैं,

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८८२ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे जिनके जल सुवर्णमय पद्मोंसे अलंकृत अनेकानेक पुष्करिणियोंसे मिले हुए हैं ॥ ३ ९ ॥

रक्तोत्पलवनैश्चात्र मण्डिताश्च हिरण्मयैः ।

तरुणादित्यसंकाशा भान्ति तत्र जलाशयाः ॥ ४० ॥

' वहाँके जलाशय लाल और सुनहरे कमल-समूहोंसे मण्डित होकर प्रात: काल उदित हुए सूर्यके समान शोभा पाते हैं ॥ ४० ॥

महार्हमणिपत्रैश्च काञ्चनप्रभकेसरैः ।

नीलोत्पलवनैश्चित्रैः स देशः सर्वतो वृतः ॥ ४१ ॥

' बहुमूल्य मणियोंके समान पत्तों और सुवर्णके समान कान्तिमान् केसरोंवाले विचित्र - विचित्र नील कमलोंके द्वारा वहाँका प्रदेश सब ओरसे सुशोभित होता है ॥ ४१ ॥

निस्तुलाभिश्च मुक्ताभिर्मणिभिश्च महाधनैः ।

उद्धूतपुलिनास्तत्र जातरूपैश्च निम्नगाः ॥ ४२ ॥

सर्वरत्नमयैश्चित्रैरवगाढा नगोत्तमैः ।

जातरूपमयैश्चापि हुताशनसमप्रभैः ॥ ४३ ॥ ।

' वहाँकी नदियोंके तट गोल - गोल मोतियों, बहुमूल्य मणियों और सुवर्णोंसे सम्पन्न हैं । इतना ही नहीं, उन नदियोंके किनारे सम्पूर्ण रत्नोंसे युक्त विचित्र - विचित्र पर्वत भी विद्यमान हैं, जो उनके जलके भीतरतक घुसे हुए हैं । उन पर्वतोंमेंसे कितने ही सुवर्णमय हैं, जिनसे अग्निके समान प्रकाश फैलता रहता है ॥ ४२-४३ ॥

नित्यपुष्पफलास्तत्र नगाः पत्ररथाकुलाः ।

दिव्यगन्धरसस्पर्शाः सर्वकामान् स्त्रवन्ति च ॥ ४४ ॥

' वहाँके वृक्षोंमें सदा ही फल - फूल लगे रहते हैं और उनपर पक्षी चहकते रहते हैं । वे वृक्ष दिव्य गन्ध, दिव्य रस और दिव्य स्पर्श प्रदान करते हैं तथा प्राणियोंकी सारी मनचाही वस्तुओंकी वर्षा करते रहते हैं ॥ ४४ ॥

नानाकाराणि वासांसि फलन्त्यन्ये नगोत्तमाः ।

मुक्तावैदूर्यचित्राणि भूषणानि तथैव च ।

स्त्रीणां यान्यनुरूपाणि पुरुषाणां तथैव च ॥ ४५ ॥

' इनके सिवा दूसरे दूसरे श्रेष्ठ वृक्ष फलोंके रूपमें नाना प्रकारके वस्त्र, मोती और वैदूर्यमणिसे जटित आभूषण देते हैं, जो स्त्रियों तथा पुरुषोंके भी उपयोगमें आने योग्य होते हैं ॥ ४५ ॥

सर्वर्तुसुखसेव्यानि फलन्त्यन्ये नगोत्तमाः ।

महार्हमणिचित्राणि फलन्त्यन्ये नगोत्तमाः ॥ ४६ ॥

' दूसरे उत्तम वृक्ष सभी ऋतुओं में सुखपूर्वक सेवन करने योग्य अच्छे - अच्छे फल देते हैं । अन्यान्य सुन्दर | वृक्ष बहुमूल्य मणियोंके समान विचित्र फल उत्पन्न करते हैं ॥४६ ॥

शयनानि प्रसूयन्ते चित्रास्तरणवन्ति च ।

मनःकान्तानि माल्यानि फलन्त्यत्रापरे द्रुमाः ॥ ४७ ॥

पानानि च महार्हाणि भक्ष्याणि विविधानि च ।

स्त्रियश्च गुणसम्पन्ना रूपयौवनलक्षिताः ॥ ४८ ॥

' कितने ही अन्य वृक्ष विचित्र बिछौनोंसे युक्त शय्याओंको ही फलोंके रूपमें प्रकट करते हैं, मनको प्रिय लगनेवाली सुन्दर मालाएँ भी प्रस्तुत करते हैं, बहुमूल्य पेय पदार्थ और भाँति - भाँतिके भोजन भी देते हैं तथा रूप और यौवनसे प्रकाशित होनेवाली सद्गुणवती युवतियोंको भी जन्म देते हैं॥४७-४८ ॥

गन्धर्वाः किन्नराः सिद्धा नागा विद्याधरास्तथा ।

रमन्ते सततं तत्र नारीभिर्भास्वरप्रभाः ॥ ४ ९ ॥

' वहाँ सूर्यके समान कान्तिमान् गन्धर्व, किन्नर, सिद्ध, नाग और विद्याधर सदा नारियोंके साथ क्रीडा-विहार करते हैं ॥४ ९ ॥

सर्वे सुकृतकर्माणः सर्वे रतिपरायणाः ।

सर्वे कामार्थसहिता वसन्ति सह योषितः ॥ ५० ॥

' वहाँके सब लोग पुण्यकर्मा हैं, सभी अर्थ और कामसे सम्पन्न हैं तथा सब लोग काम - क्रीडापरायण होकर युवती स्त्रियोंके साथ निवास करते हैं ॥५० ॥

गीतवादित्रनिर्घोषः सोत्कृष्टहसितस्वनः ।

श्रूयते सततं तत्र सर्वभूतमनोरमः ॥ ५१ ॥

' वहाँ निरन्तर उत्कृष्ट हास - परिहासकी ध्वनिसे युक्त गीतवाद्यका मधुर घोष सुनायी देता है, जो समस्त प्राणियोंके मनको आनन्द प्रदान करनेवाला है ॥ ५१ ॥

तत्र नामुदितः कश्चिन्नात्र कश्चिदसत्प्रियः ।

अहन्यहनि वर्धन्ते गुणास्तत्र मनोरमाः ॥ ५२ ॥

' वहाँ कोई भी अप्रसन्न नहीं रहता । किसीकी भी बुरे कामोंमें प्रीति नहीं होती । वहाँ रहनेसे प्रतिदिन मनोरम गुणोंकी वृद्धि होती है ॥५२ ॥

समतिक्रम्य तं देशमुत्तरः पयसां निधिः ।

तत्र सोमगिरिर्नाम मध्ये हेममयो महान् ॥ ५३ ॥

' उस देशको लाँघकर आगे जानेपर उत्तरदिग्वर्ती समुद्र उपलब्ध होगा । उस समुद्रके मध्यभागमें सोमगिरि नामक एक बहुत ऊँचा सुवर्णमय पर्वत है ॥ ५३ ॥

इन्द्रलोकगता ये च ब्रह्मलोकगताश्च ये ।

देवास्तं समवेक्षन्ते गिरिराजं दिवं गताः ॥५४ ॥

' जो लोग स्वर्गलोकमें गये हैं, वे तथा इन्द्रलोक

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किष्किन्धाकाण्डे चतुश्चत्वारिंशः सर्गः ८८३

और ब्रह्मलोकमें रहनेवाले देवता उस गिरिराज सोमगिरिका ।

दर्शन करते हैं ॥५४ ॥

स तु देशो विसूर्योऽपि तस्य भासा प्रकाशते ।

सूर्यलक्ष्म्याभिविज्ञेयस्तपतेव विवस्वता ॥ ५५ ॥

' वह देश सूर्यसे रहित है तो भी सोमगिरिकी प्रभासे सदा प्रकाशित होता रहता है । तपते हुए सूर्यकी प्रभासे जो देश प्रकाशित होते हैं, उन्हींकी भाँति उसे सूर्यदेवकी शोभासे सम्पन्न - सा जानना चाहिये ॥ ५५ ॥

भगवांस्तत्र विश्वात्मा शम्भुरेकादशात्मकः ।

ब्रह्मा वसति देवेशो ब्रह्मर्षिपरिवारितः ॥ ५६ ॥

' वहाँ विश्वात्मा भगवान् विष्णु, एकादश रुद्रोंके रूपमें प्रकट होनेवाले भगवान् शंकर तथा ब्रह्मर्षियोंसे घिरे हुए देवेश्वर ब्रह्माजी निवास करते हैं ॥ ५६ ॥

न कथंचन गन्तव्यं कुरूणामुत्तरेण वः ।

अन्येषामपि भूतानां नानुक्रामति वै गतिः ॥ ५७ ॥

' तुमलोग उत्तर कुरुके मार्गसे सोमगिरितक जाकर उसकी सीमासे आगे किसी तरह बढ़ना । तुम्हारी तरह दूसरे प्राणियोंकी भी वहाँ गति नहीं है ॥५७ ॥

स हि सोमगिरिर्नाम देवानामपि दुर्गमः ।

तमालोक्य ततः क्षिप्रमुपावर्तितुमर्हथ ॥ ५८ ॥

' वह सोमगिरि देवताओंके लिये भी दुर्गम है । अतः उसका दर्शनमात्र करके तुमलोग शीघ्र लौट आना ॥ ५८ ॥

एतावद् वानरैः शक्यं गन्तुं वानरपुंगवाः ।

अभास्करममर्यादं न जानीमस्ततः परम् ॥ ५ ९ ॥

' श्रेष्ठ वानरो! बस, उत्तर दिशामें इतनी ही दूरतक तुम सब वानर जा सकते हो । उसके आगे न तो सूर्यका । इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये प्रकाश है और न किसी देश आदिकी सीमा ही । अतः आगेकी भूमिके सम्बन्धमें मैं कुछ नहीं जानता ॥ ५ ९ ॥

सर्वमेतद् विचेतव्यं यन्मया परिकीर्तितम् ।

यदन्यदपि नोक्तं च तत्रापि क्रियतां मतिः ॥ ६० ॥

' मैंने जो - जो स्थान बताये हैं, उन सबमें सीताकी खोज करना और जिन स्थानोंका नाम नहीं लिया है, वहाँ भी ढूँढ़नेका ही निश्चित विचार रखना ॥ ६० ॥

ततः कृतं दाशरथेर्महत्प्रियं महत्प्रियं चापि ततो मम प्रियम् । कृतं भविष्यत्यनिलानलोपमा विदेहजादर्शनजेन कर्मणा ॥ ६१ ॥

' अग्नि और वायुके समान तेजस्वी तथा बलशाली वानरो! विदेहनन्दिनी सीताके दर्शनके लिये तुम जो -जो कार्य या प्रयास करोगे, उन सबके द्वारा दशरथनन्दन भगवान् श्रीरामका महान् प्रिय कार्य सम्पन्न होगा तथा उसीसे मेरा भी प्रिय कार्य पूर्ण हो जायगा ॥ ६१ ॥

ततः कृतार्थाः सहिताः सबान्धवा मयार्चिताः सर्वगुणैर्मनोरमैः । चरिष्यथोर्वी प्रति शान्तशत्रवः सहप्रिया भूतधराः प्लवंगमाः ॥ ६२ ॥

‘ वानरो! श्रीरामचन्द्रजीका प्रिय कार्य करके जब तुम लौटोगे, तब मैं सर्वगुणसम्पन्न एवं मनोऽनुकूल पदार्थोंके द्वारा तुम सब लोगोंका सत्कार करूँगा । तत्पश्चात् तुमलोग शत्रुहीन होकर अपने हितैषियों और बन्धु - बान्धवसहित कृतार्थ एवं समस्त प्राणियोंके आश्रयदाता होकर अपनी प्रियतमाओंके साथ सारी पृथ्वीपर सानन्द विचरण करोगे ' ॥ किष्किन्धाकाण्डे त्रिचत्वारिंशः सर्गः ॥ ४३ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें तैंतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ४३ ॥

चतुश्चत्वारिंशः सर्गः श्रीरामका हनुमान्जीको अँगूठी देकर भेजना

विशेषेण तु सुग्रीवो हनूमत्यर्थमुक्तवान् ।

स हि तस्मिन् हरिश्रेष्ठे निश्चितार्थोऽर्थसाधने ॥ १ ॥

सुग्रीवने हनुमान्जीके समक्ष विशेषरूपसे सीताके अन्वेषणरूप प्रयोजनको उपस्थित किया; क्योंकि उन्हें यह दृढ़ विश्वास था कि वानरश्रेष्ठ हनुमान्जी इस कार्यको सिद्ध कर सकेंगे ॥ १ ॥

अब्रवीच्च हनूमन्तं विक्रान्तमनिलात्मजम् ।

सुग्रीवः परमप्रीतः प्रभुः सर्ववनौकसाम् ॥ २ ॥

समस्त वानरोंके स्वामी सुग्रीवने अत्यन्त प्रसन्न होकर परम पराक्रमी वायुपुत्र हनुमान्से इस प्रकार कहा – ॥ २ ॥

न भूमौ नान्तरिक्षे वा नाम्बरे नामरालये ।

नाप्सु वा गतिसङ्गं ते पश्यामि हरिपुंगव ॥ ३ ॥

' कपिश्रेष्ठ! पृथ्वी, अन्तरिक्ष, आकाश, देवलोक अथवा जलमें भी तुम्हारी गतिका अवरोध मैं कभी । नहीं देखता हूँ ॥ ३ ॥

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८८४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे

सासुराः सहगन्धर्वाः सनागनरदेवताः ।

विदिताः सर्वलोकास्ते ससागरधराधराः ॥४ ॥

' असुर, गन्धर्व, नाग, मनुष्य, देवता, समुद्र तथा पर्वतोंसहित सम्पूर्ण लोकोंका तुम्हें ज्ञान है ॥ ४ ॥

गतिर्वेगश्च तेजश्च लाघवं च महाकपे ।

पितुस्ते सदृशं वीर मारुतस्य महौजसः ॥ ५ ॥

‘ वीर! महाकपे! सर्वत्र अबाधित गति, वेग, तेज और फुर्ती — ये सभी सद्गुण तुममें अपने महापराक्रमी पिता वायुके ही समान हैं ॥ ५ ॥

तेजसा वापि ते भूतं न समं भुवि विद्यते ।

तद् यथा लभ्यते सीता तत्त्वमेवानुचिन्तय ॥ ६ ॥

' इस भूमण्डलमें कोई भी प्राणी तुम्हारे तेजकी समानता करनेवाला नहीं है; अतः जिस प्रकार सीताकी उपलब्धि हो सके, वह उपाय तुम्हीं सोचो ॥ ६ ॥

त्वय्येव हनुमन्नस्ति बलं बुद्धिः पराक्रमः ।

देशकालानुवृत्तिश्च नयश्च नयपण्डित ॥ ७ ॥

' हनुमन्! तुम नीतिशास्त्रके पण्डित हो । एकमात्र तुम्हींमें बल, बुद्धि, पराक्रम, देश - कालका अनुसरण तथा नीतिपूर्ण बर्ताव एक साथ देखे जाते हैं ' ॥ ७ ॥

ततः कार्यसमासङ्गमवगम्य हनूमति ।

विदित्वा हनुमन्तं च चिन्तयामास राघवः ॥ ८ ॥

सुग्रीवकी बात सुनकर श्रीरामचन्द्रजीको यह ज्ञात हुआ कि इस कार्यकी सिद्धिका सम्बन्ध - इसे पूर्ण करनेका सारा भार हनुमान्पर ही है । उन्होंने स्वयं भी यह अनुभव किया कि हनुमान् इस कार्यको सफल करनेमें समर्थ हैं । फिर वे इस प्रकार मन - ही - मन विचार करने लगे- ॥ ८ ॥

सर्वथा निश्चितार्थोऽयं हनूमति हरीश्वरः ।

निश्चितार्थतरश्चापि हनूमान् कार्यसाधने ॥ ९ ॥

' वानरराज सुग्रीव सर्वथा हनुमान्पर ही यह भरोसा किये बैठे हैं कि ये ही निश्चितरूपसे हमारे इस प्रयोजनको सिद्ध कर सकते हैं । स्वयं हनुमान् भी अत्यन्त निश्चितरूपसे इस कार्यको सिद्ध करनेका विश्वास रखते हैं ॥ ९ ॥

तदेवं प्रस्थितस्यास्य परिज्ञातस्य कर्मभिः ।

भर्त्रा परिगृहीतस्य ध्रुवः कार्यफलोदयः ॥ १० ॥

' इस प्रकार कार्योंद्वारा जिनकी परीक्षा कर ली गयी है तथा जो सबसे श्रेष्ठ समझे गये हैं, वे हनुमान् अपने स्वामी सुग्रीवके द्वारा सीताकी खोजके लिये भेजे जा रहे हैं । इनके द्वारा इस कार्यके फलका उदय ( सीताका दर्शन ) होना निश्चित है ' ॥ १० ॥

तं समीक्ष्य महातेजा व्यवसायोत्तरं हरिम् ।

कृतार्थ इव संहृष्टः प्रहृष्टेन्द्रियमानसः ॥ ११ ॥

ऐसा विचारकर महातेजस्वी श्रीरामचन्द्रजी कार्यसाधनके उद्योगमें सर्वश्रेष्ठ हनुमान्जीकी ओर दृष्टिपात करके अपनेको कृतार्थ - सा मानते हुए प्रसन्न हो गये । उनकी सारी इन्द्रियाँ और मन हर्षसे खिल उठे ॥

ददौ तस्य ततः प्रीतः स्वनामाङ्कोपशोभितम् ।

अङ्गुलीयमभिज्ञानं राजपुत्र्याः परंतपः ॥ १२ ॥

तदनन्तर शत्रुओंको संताप देनेवाले श्रीरामने प्रसन्नतापूर्वक अपने नामके अक्षरोंसे सुशोभित एक अँगूठी हनुमान्जीके हाथमें दी, जो राजकुमारी सीताको पहचानके रूपमें अर्पण करनेके लिये थी ॥ १२ ॥

अनेन त्वां हरिश्रेष्ठ चिह्नेन जनकात्मजा ।

मत्सकाशादनुप्राप्तमनुद्विग्नानुपश्यति ॥ १३ ॥

अँगूठी देकर वे बोले - ' कपिश्रेष्ठ! इस चिह्नके द्वारा जनककिशोरी सीताको यह विश्वास हो जायगा कि तुम मेरे पाससे ही गये हो । इससे वह भय त्यागकर तुम्हारी ओर देख सकेगी ॥१३ ॥

व्यवसायश्च ते वीर सत्त्वयुक्तश्च विक्रमः ।

सुग्रीवस्य च संदेशः सिद्धिं कथयतीव मे ॥ १४ ॥

' वीरवर! तुम्हारा उद्योग, धैर्य, पराक्रम और सुग्रीवका संदेश- ये सब मुझे इस बातकी सूचना - सी दे रहे हैं कि तुम्हारे द्वारा कार्यकी सिद्धि अवश्य होगी ' ॥ १४ ॥

स तद् गृह्य हरिश्रेष्ठः कृत्वा मूर्ध्नि कृताञ्जलिः ।

वन्दित्वा चरणौ चैव प्रस्थितः प्लवगर्षभः ॥ १५ ॥

वानरश्रेष्ठ हनुमान्ने वह अँगूठी लेकर उसे मस्तकपर रखा और फिर हाथ जोड़कर श्रीरामके चरणोंमें प्रणाम करके वे वानरशिरोमणि वहाँसे प्रस्थित हुए ॥ १५ ॥

स तत् प्रकर्षन् हरिणां महद् बलं बभूव वीरः पवनात्मजः कपिः । गताम्बुदे व्योम्नि विशुद्धमण्डलः शशीव नक्षत्रगणोपशोभितः ॥ १६ ॥

उस समय वीर - वानर पवनकुमार हनुमान् अपने साथ वानरोंकी उस विशाल सेनाको ले जाते हुए उसी तरह शोभा पाने लगे, जैसे मेघरहित आकाशमें विशुद्ध ( निर्मल ) मण्डलसे उपलक्षित चन्द्रमा नक्षत्र - समूहोंके साथ सुशोभित होता है ॥ १६ ॥

अतिबल बलमाश्रितस्तवाहं हरिवर विक्रम विक्रमैरनल्यैः ।

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किष्किन्धाकाण्डे पञ्चचत्वारिंशः सर्गः ८८५ पवनसुत यथाधिगम्यते सा बलका आश्रय लिया है । पवनकुमार हनुमान्! जिस जनकसुता हनुमंस्तथा कुरुष्व ॥ १७ ॥ प्रकार भी जनकनन्दिनी सीता प्राप्त हो सके, तुम अपने

जाते हुए हनुमान्को सम्बोधित करके श्रीरामचन्द्रजीने महान् बल - विक्रमसे वैसा ही प्रयत्न करो । अच्छा, फिर कहा — ' अत्यन्त बलशाली कपिश्रेष्ठ! मैंने तुम्हारे । अब जाओ ' ॥ १७ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे चतुश्चत्वारिंशः सर्गः ॥ ४४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें चौवालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ४४ ॥

पञ्चचत्वारिंशः सर्गः विभिन्न दिशाओंमें जाते हुए वानरोंका सुग्रीवके समक्ष अपने उत्साहसूचक वचन सुनाना

सर्वांश्चाहूय सुग्रीवः प्लवगान् प्लवगर्षभः ।

समस्तांश्चाब्रवीद् राजा रामकार्यार्थसिद्धये ॥ १ ॥

तदनन्तर वानरशिरोमणि राजा सुग्रीव अन्य समस्त वानरोंको बुलाकर श्रीरामचन्द्रजीके कार्यकी सिद्धिके लिये उन सबसे बोले —॥१ ॥

एवमेतद् विचेतव्यं भवद्भिर्वानरोत्तमैः ।

तदुग्रशासनं भर्तुर्विज्ञाय हरिपुंगवाः ॥ २ ॥

शलभा इव संछाद्य मेदिनीं सम्प्रतस्थिरे । ' कपिवरो! जैसा मैंने बताया है, उसके अनुसार तुम सभी श्रेष्ठ वानरोंको इस जगत् में सीताकी खोज करनी चाहिये । ' स्वामीकी उस कठोर आज्ञाको भलीभाँति समझकर वे सम्पूर्ण श्रेष्ठ वानर टिड्डियोंके दलकी भाँति पृथ्वीको आच्छादित करके वहाँसे प्रस्थित हुए ॥ २३ ॥

रामः प्रस्रवणे तस्मिन् न्यवसत् सहलक्ष्मणः ॥ ३ ॥

प्रतीक्षमाणस्तं मासं सीताधिगमने कृतः । श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मणके साथ उस प्रस्रवणगिरिपर ही ठहरे रहे और सीताका समाचार लानेके लिये जो एक मासकी अवधि निश्चित की गयी थी, उसकी प्रतीक्षा करने लगे ॥ ३३ ॥

उत्तरां तु दिशं रम्यां गिरिराजसमावृताम् ॥ ४ ॥

प्रतस्थे सहसा वीरो हरिः शतबलिस्तदा । उस समय वीर वानर शतबलिने गिरिराज हिमालयसे घिरी हुई रमणीय उत्तर दिशाकी ओर शीघ्रतापूर्वक प्रस्थान किया ॥४३ ॥

पूर्वां दिशं प्रतिययौ विनतो हरियूथपः ॥ ५ ॥

ताराङ्गदादिसहितः प्लवगः पवनात्मजः ।

अगस्त्याचरितामाशां दक्षिणां हरियूथपः ॥ ६ ॥

पश्चिमां च दिशं घोरां सुषेणः प्लवगेश्वरः ।

प्रतस्थे हरिशार्दूलो दिशं वरुणपालिताम् ॥ ७ ॥

वानर - यूथपति विनत पूर्व दिशाकी ओर गये । कपिगणोंके अधिपति पवनकुमार वानर हनुमान्जी तार और अङ्गद आदिके साथ अगस्त्यसेवित दक्षिण दिशाकी ओर प्रस्थित हुए तथा वानरेश्वर कपिश्रेष्ठ सुषेणने वरुणद्वारा सुरक्षित घोर पश्चिम दिशाकी यात्रा की ॥५-७ ॥

ततः सर्वा दिशो राजा चोदयित्वा यथातथम् ।

कपिसेनापतिर्वीरो मुमोद सुखितः सुखम् ॥ ८ ॥

वानर सेनाके स्वामी वीर राजा सुग्रीव सम्पूर्ण दिशाओंमें यथायोग्य वानरोंको भेजकर बहुत सुखी हुए और मन - ही - मन हर्षका अनुभव करने लगे ॥८ ॥

एवं संचोदिताः सर्वे राज्ञा वानरयूथपाः ।

स्वां स्वां दिशमभिप्रेत्य त्वरिताः सम्प्रतस्थिरे ॥ ९ ॥

इस तरह राजाकी आज्ञा पाकर समस्त वानर-यूथपति बड़ी उतावलीके साथ अपनी - अपनी दिशाकी ओर प्रस्थित हुए ॥ ९ ॥

नदन्तश्चोन्नदन्तश्च गर्जन्तश्च प्लवंगमाः ।

क्ष्वेडन्तो धावमानाश्च विनदन्तो महाबलाः ॥१० ॥

एवं संचोदिताः सर्वे राज्ञा वानरयूथपाः ।

आनयिष्यामहे सीतां हनिष्यामश्च रावणम् ॥ ११ ॥

अहमेको वधिष्यामि प्राप्तं रावणमाहवे ।

ततश्चोन्मथ्य सहसा हरिष्ये जनकात्मजाम् ॥ १२ ॥

वेपमानां श्रमेणाद्य भवद्भिः स्थीयतामिति ।

एक एवाहरिष्यामि पातालादपि जानकीम् ॥१३ ॥

विधमिष्याम्यहं वृक्षान् दारयिष्याम्यहं गिरीन् ।

धरणीं दारयिष्यामि क्षोभयिष्यामि सागरान् ॥ १४ ॥

अहं योजनसंख्यायाः प्लवेयं नात्र संशयः ।

शतयोजनसंख्यायाः शतं समधिकं ह्यहम् ॥ १५ ॥

भूतले सागरे वापि शैलेषु च वनेषु च ।

पातालस्यापि वा मध्ये न ममाच्छिद्यते गतिः ॥ १६ ॥

वे समस्त महाबली वानर और उनके यूथपति

पृष्ठ 898

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८८६ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे अपने राजाके द्वारा इस प्रकार प्रेरित हो भाँति - भाँतिके शब्द करते, उच्च स्वरसे गर्जते, दहाड़ते, किलकारियाँ मारते, दौड़ते और कोलाहल करते हुए कहने लगे-' राजन्! हम सीताको साथ लायेंगे और रावणका वध कर डालेंगे । युद्धमें यदि रावण मेरे सामने आ जाय तो मैं अकेला ही उसे मार गिराऊँगा । तत्पश्चात् उसकी सारी सेनाको मथकर कष्ट एवं भयसे काँपती हुई जानकीजीको सहसा यहाँ उठा लाऊँगा । आपलोग यहीं ठहरें । मैं अकेला ही पातालसे भी जनककिशोरीको निकाल लाऊँगा, वृक्षोंको उखाड़ फेकूँगा, पर्वतोंके टुकड़े - टुकड़े इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये | कर डालूँगा, पृथ्वीको विदीर्ण कर दूँगा और समुद्रोंको भी विक्षुब्ध कर डालूँगा । मैं सौ योजनतक कूद सकता हूँ, इसमें संशय नहीं है । मैं सौ योजनसे भी अधिक दूरतक जा सकता हूँ । पृथ्वी, समुद्र, पर्वत, वन और पातालमें भी मेरी गति नहीं रुकती ' ॥ १०-१६ ॥

इत्येकैकस्तदा तत्र वानरा बलदर्पिताः ।

ऊचुश्च वचनं तस्य हरिराजस्य संनिधौ ॥ १७ ॥

इस तरह वहाँ वानरराज सुग्रीवके समीप बल घमंडमें भरे हुए वानर उस समय एक - एक करके आते । और उनके सामने उपर्युक्त बातें कहते थे ॥ १७ ॥

किष्किन्धाकाण्डे पञ्चचत्वारिंशः सर्गः ॥ ४५ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें पैंतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ४५ ॥

षट्चत्वारिंशः सर्गः सुग्रीवका श्रीरामचन्द्रजीको अपने

गतेषु वानरेन्द्रेषु रामः सुग्रीवमब्रवीत् ।

कथं भवान् विजानीते सर्वं वै मण्डलं भुवः ॥ १ ॥

उन समस्त वानरयूथपतियोंके चले जानेपर श्रीरामचन्द्रजीने सुग्रीवसे पूछा - ' सखे! तुम समस्त भूमण्डलके स्थानोंका परिचय कैसे जानते हो? ' ॥ १ ॥

सुग्रीवश्च ततो राममुवाच प्रणतात्मवान् ।

श्रूयतां सर्वमाख्यास्ये विस्तरेण वचो मम ॥ २ ॥

तब सुग्रीवने विनीत होकर श्रीरामचन्द्रजीसे कहा— ' भगवन्! मैं सब कुछ विस्तारके साथ बता रहा हूँ । मेरी बातें सुनिये ॥ २ ॥

यदा तु दुन्दुभिं नाम दानवं महिषाकृतिम् ।

प्रतिकालयते वाली मलयं प्रति पर्वतम् ॥ ३ ॥

तदा विवेश महिषो मलयस्य गुहां प्रति ।

विवेश वाली तत्रापि मलयं तज्जिघांसया ॥ ४ ॥

‘ जब वाली महिषरूपधारी दानव दुन्दुभि * ( उसके पुत्र मायावी ) का पीछा कर रहे थे, उस समय वह महिष मलयपर्वतकी ओर भागा और उस पर्वतकी

कन्दरामें घुस गया । यह देख वालीने उसके वधकी ।

इच्छासे उस गुफाके भीतर भी प्रवेश किया ॥ ३-४ ॥

ततोऽहं तत्र निक्षिप्तो गुहाद्वारि विनीतवत् ।

न च निष्क्रामते वाली तदा संवत्सरे गते ॥ ५ ॥

* यहाँ दुन्दुभि और महिष शब्दसे उसके पुत्र मायावी भूमण्डल- भ्रमणका वृत्तान्त बताना ' उस समय मैं विनीतभावसे उस गुफाके द्वारपर खड़ा रहा; क्योंकि वालीने मुझे वहीं रख छोड़ा था । परंतु एक वर्ष व्यतीत हो जानेपर भी वाली उसके भीतरसे नहीं निकले ॥ ५ ॥

ततः क्षतजवेगेन आपुपूरे तदा बिलम् ।

तदहं विस्मितो दृष्ट्वा भ्रातुः शोकविषार्दितः ॥ ६ ॥

' तदनन्तर वेगपूर्वक बहे हुए रक्तकी धारासे उस समय वह सारी गुफा भर गयी । यह देखकर मुझे बड़ा विस्मय हुआ तथा मैं भाईके शोकसे व्यथित हो उठा ॥६ ॥

अथाहं गतबुद्धिस्तु सुव्यक्तं निहतो गुरुः ।

शिला पर्वतसंकाशा बिलद्वारि मया कृता ॥७ ॥

' फिर मेरी बुद्धिमें यह बात आयी कि अब मेरे बड़े भाई निश्चय ही मारे गये । यह विचार पैदा होते ही मैंने उस गुफाके द्वारपर एक पहाड़ - जैसी चट्टान रख दी ॥

अशक्नुवन्निष्क्रमितुं महिषो विनशिष्यति ।

ततोऽहमागां किष्किन्धां निराशस्तस्य जीविते ॥ ८ ॥

' सोचा – इस शिलासे द्वार बंद हो जानेपर मायावी निकल नहीं सकेगा, भीतर ही घुट - घुटकर मर जायगा । इसके बाद भाईके जीवनसे निराश होकर मैं किष्किन्धापुरीमें लौट आया ॥ ८ ॥

नामक दानवका ही वर्णन हुआ है - ऐसा मानना चाहिये; क्योंकि आगे कही जानेवाली सारी बातें उसीके वृत्तान्तसे सम्बन्ध रखती हैं । पिता भैँसेका रूप धारण करता था, यहीं गुण उसके पुत्र मायावीमें भी था । इसलिये उसको भी महिष या महिषाकृति कहना असङ्गत नहीं है ।

पृष्ठ 899

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किष्किन्धाकाण्डे षट्चत्वारिंशः सर्गः ८८७

राज्यं च सुमहत् प्राप्य तारां च रुमया सह ।

मित्रैश्च सहितस्तत्र वसामि विगतज्वरः ॥ ९ ॥

‘ यहाँ विशाल राज्य तथा रुमासहित ताराको पाकर मित्रोंके साथ मैं निश्चिन्ततापूर्वक रहने लगा ॥ ९ ॥

आजगाम ततो वाली हत्वा तं वानरर्षभः ।

ततोऽहमददां राज्यं गौरवाद् भययन्त्रितः ॥ १० ॥

‘ तत्पश्चात् वानरश्रेष्ठ वाली उस दानवका वध करके आ पहुँचे । उनके आते ही मैंने भाईके गौरवसे भयभीत हो वह राज्य उन्हें वापस कर दिया ॥ १० ॥

स मां जिघांसुर्दुष्टात्मा वाली प्रव्यथितेन्द्रियः ।

परिकालयते वाली धावन्तं सचिवैः सह ॥ ११ ॥

' परंतु दुष्टात्मा वाली मुझे मार डालना चाहता था, उसकी सारी इन्द्रियाँ यह सोचकर व्यथित हो उठी थीं कि ' यह मुझे मारनेके लिये ही गुफाका द्वार बंद करके भाग आया था । ' मैं अपनी प्राण - रक्षाके लिये मन्त्रियोंके साथ भागा और वाली मेरा पीछा करने लगा ॥११ ॥

ततोऽहं वालिना तेन सोऽनुबद्धः प्रधावितः ।

नदीश्च विविधाः पश्यन् वनानि नगराणि च ॥ १२ ॥

आदर्शतलसंकाशा ततो वै पृथिवी मया ।

अलातचक्रप्रतिमा दृष्टा गोष्पदवत् कृता ॥ १३ ॥

' वाली मेरे पीछे लगा रहा और मैं जोर - जोरको भागता गया । उसी समय मैंने विभिन्न नदियों, वनों और नगरोंको देखते हुए सारी पृथ्वीको गायकी खुरीकी भाँति मानकर उसकी परिक्रमा कर डाली । भागते समय मुझे यह पृथ्वी दर्पण और अलातचक्रके समान दिखायी दी ॥ १२-१३ ॥

पूर्वां दिशं ततो गत्वा पश्यामि विविधान् द्रुमान् ।

पर्वतान् सदरीन् रम्यान् सरांसि विविधानि च ॥ १४ ॥

' तदनन्तर पूर्व दिशामें जाकर मैंने नाना प्रकारके

वृक्ष, कन्दराओंसहित रमणीय पर्वत और भाँति - भाँतिके ।

सरोवर देखे ॥१४ ॥

उदयं तत्र पश्यामि पर्वतं धातुमण्डितम् ।

क्षीरोदं सागरं चैव नित्यमप्सरसालयम् ॥ १५ ॥

' वहीं नाना प्रकारके धातुओंसे मण्डित उदयाचल तथा अप्सराओंके नित्य - निवासस्थान क्षीरोद सागरका भी मैंने दर्शन किया ॥ १५ ॥

परिकाल्यमानस्तु तदा वालिनाभिद्गुतो ह्यहम् ।

पुनरावृत्य सहसा प्रस्थितोऽहं तदा विभो ॥ १६ ॥

' उस समय वाली पीछा करते रहे और मैं भागता रहा । प्रभो! जब मैं यहाँ फिर लौटकर आया, तब वालीके डरसे पुनः सहसा मुझे भागना पड़ा ॥ १६ ॥

दिशस्तस्यास्ततो भूयः प्रस्थितो दक्षिणां दिशम् ।

विन्ध्यपादपसंकीर्णां चन्दनद्रुमशोभिताम् ॥ १७ ॥

' उस दिशाको छोड़कर मैं फिर दक्षिण दिशा की ओर प्रस्थित हुआ, जहाँ विन्ध्यपर्वत और नाना प्रकारके वृक्ष भरे हुए हैं तथा चन्दनके वृक्ष जिसकी शोभा बढ़ाते हैं ॥ १७ ॥

द्रुमशैलान्तरे पश्यन् भूयो दक्षिणतोऽपराम् ।

अपरां च दिशं प्राप्तो वालिना समभिद्रुतः ॥ १८ ॥

' वृक्षों और पर्वतोंकी ओटमें बारंबार वालीको देखकर मैंने दक्षिण दिशाको छोड़ दिया तथा वालीके खदेड़नेपर पश्चिम दिशाकी शरण ली ॥ १८ ॥

स पश्यन् विविधान् देशानस्तं च गिरिसत्तमम् ।

प्राप्य चास्तं गिरिश्रेष्ठमुत्तरं सम्प्रधावितः ॥ १ ९ ॥

' वहाँ नाना प्रकारके देशोंको देखता हुआ मैं गिरिश्रेष्ठ अस्ताचलतक जा पहुँचा । वहाँ पहुँचकर मैं पुनः उत्तर दिशाकी ओर भागा ॥ १ ९ ॥

हिमवन्तं च मेरुं च समुद्रं च तथोत्तरम् ।

यदा न विन्दे शरणं वालिना समभिद्रुतः ॥ २० ॥

ततो मां बुद्धिसम्पन्नो हनुमान् वाक्यमब्रवीत् । ' हिमालय, मेरु और उत्तर समुद्रतक पहुँचकर भी जब वालीके पीछा करनेके कारण मुझे कहीं शरण नहीं मिली, तब परम बुद्धिमान् हनुमान्जीने मुझसे यह बात कही - ॥ २०३ ॥

इदानीं मे स्मृतं राजन् यथा वाली हरीश्वरः ॥ २१ ॥

मतङ्गेन तदा शप्तो ह्यस्मिन्नाश्रममण्डले ।

प्रविशेद् यदि वै वाली मूर्धास्य शतधा भवेत् ॥ २२ ॥

" राजन्! इस समय मुझे उस घटनाका स्मरण हो आया है, जैसा कि मतङ्गमुनिने उन दिनों वानरराज वालीको शाप दिया था कि ' यदि वाली इस आश्रम-मण्डलमें प्रवेश करेगा तो उसके मस्तकके सैकड़ों टुकड़े हो जायँगे ' ॥ २१-२२ ॥

तत्र वासः सुखोऽस्माकं निरुद्विग्नो भविष्यति ।

ततः पर्वतमासाद्य ऋष्यमूकं नृपात्मज ॥ २३ ॥

न विवेश तदा वाली मतङ्गस्य भयात् तदा । 44 ' अतः वहीं निवास करना हमलोगोंके लिये सुखद और निर्भय होगा ' । राजकुमार! इस निश्चयके अनुसार हमलोग ऋष्यमूक पर्वतपर आकर रहने लगे । उस समय । मतङ्ग ऋषिके भयसे वालीने वहाँ प्रवेश नहीं किया ॥

पृष्ठ 900

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८८८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे एवं मया तदा राजन् प्रत्यक्षमुपलक्षितम् । ' राजन्! इस प्रकार मैंने उन दिनों समस्त भूमण्डलको पृथिवीमण्डलं सर्वं गुहामस्म्यागतस्ततः ॥ २४ ॥ | प्रत्यक्ष देखा था । उसके बाद ऋष्यमूककी गुफामें आया था ' ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे षट्चत्वारिंशः सर्गः ॥ ४६ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें छियालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ४६ ॥

सप्तचत्वारिंशः सर्गः पूर्व आदि तीन दिशाओंमें गये हुए

दर्शनार्थं तु वैदेह्याः सर्वतः कपिकुञ्जराः ।

व्यादिष्टाः कपिराजेन यथोक्तं जग्मुरञ्जसा ॥ १ ॥

वानरराजके द्वारा समस्त दिशाओंकी ओर जानेकी आज्ञा पाकर वे सभी श्रेष्ठ वानर, जिनके लिये जिस ओर जानेका आदेश मिला था उसी ओर विदेहकुमारी सीताका पता लगानेके लिये उत्साहपूर्वक चल दिये ॥ १ ॥

ते सरांसि सरित्कक्षानाकाशं नगराणि च ।

नदीदुर्गास्तथा देशान् विचिन्वन्ति समन्ततः ॥ २ ॥

वे सरोवरों, सरिताओं, लतामण्डपों, खुले स्थानों और नगरोंमें तथा नदियोंके कारण दुर्गम प्रदेशोंमें सब ओर घूम - फिरकर सीताकी खोज करने लगे ॥ २ ॥

सुग्रीवेण समाख्याताः सर्वे वानरयूथपाः ।

तत्र देशान् विचिन्वन्ति सशैलवनकाननान् ॥ ३ ॥

सुग्रीवने जिन्हें आज्ञा दी थी, वे सभी वानरयूथपति अपनी - अपनी दिशाओंके पर्वत, वन और काननोंसहित सम्पूर्ण देशोंकी छानबीन करने लगे ॥ ३ ॥

विचित्य दिवसं सर्वे सीताधिगमने धृताः ।

समायान्ति स्म मेदिन्यां निशाकालेषु वानराः ॥ ४ ॥

सीताजीका पता लगानेकी निश्चित इच्छा मनमें लिये वे सब वानर दिनभर इधर - उधर अन्वेषण करते और रातके समय किसी नियत स्थानपर एकत्र हो जाते थे ॥

सर्वर्तुकांश्च देशेषु वानराः सफलद्रुमान् ।

आसाद्य रजनीं शय्यां चक्रुः सर्वेष्वहःसु ते ॥ ५ ॥

सारे दिन भिन्न - भिन्न देशोंमें घूम - फिरकर वे वानर सभी ऋतुओंमें फल देनेवाले वृक्षोंके पास जाकर रातको वहीं सोया अथवा विश्राम किया करते थे ॥ ५ ॥

तदहः प्रथमं कृत्वा मासे प्रस्त्रवणं गताः ।

कपिराजेन संगम्य निराशाः कपिकुञ्जराः ॥ ६ ॥

जानेके दिनको पहला दिन मानकर एक मास पूर्ण होनेतक वे श्रेष्ठ वानर निराश हो लौट आये वानरोंका निराश होकर लौट आना और कपिराज सुग्रीवसे मिलकर प्रस्रवणगिरिपर ठहर | गये ॥ ६ ॥

विचित्य तु दिशं पूर्वां यथोक्तां सचिवैः सह ।

अदृष्ट्वा विनतः सीतामाजगाम महाबलः ॥७ ॥

महाबली विनत अपने मन्त्रियोंके साथ पहले बताये अनुसार पूर्व दिशामें खोज करके वहाँ सीताको न पाकर किष्किन्धा लौट आये ॥ ७ ॥

दिशमप्युत्तरां सर्वां विविच्य स महाकपिः ।

आगतः सह सैन्येन भीतः शतबलिस्तदा ॥ ८ ॥

महाकपि शतबलि सारी उत्तर दिशाकी छानबीन करके भयभीत हो तत्काल सेनासहित किष्किन्धा आ गये ॥

सुषेणः पश्चिमामाशां विविच्य सह वानरैः ।

समेत्य मासे पूर्णे तु सुग्रीवमुपचक्रमे ॥ ९ ॥

वानरोंसहित सुषेण भी पश्चिम दिशाका अनुसंधान करके वहाँ सीताको न पाकर एक मास पूर्ण होनेपर सुग्रीवके पास चले आये॥९॥

तं प्रस्त्रवणपृष्ठस्थं समासाद्याभिवाद्य च ।

आसीनं सह रामेण सुग्रीवमिदमब्रुवन् ॥ १० ॥

प्रस्रवणगिरिपर श्रीरामचन्द्रजीके साथ बैठे हुए सुग्रीवके पास आकर सब वानरोंने उन्हें प्रणाम किया और इस प्रकार कहा- ॥ १० ॥

विचिताः पर्वताः सर्वे वनानि गहनानि च ।

निम्नगाः सागरान्ताश्च सर्वे जनपदाश्च ये ॥ ११ ॥

गुहाश्च विचिताः सर्वा याश्च ते परिकीर्तिताः ।

विचिताश्च महागुल्मा लताविततसंतताः ॥ १२ ॥

‘ राजन्! हमने समस्त पर्वत, घने जंगल, समुद्रपर्यन्त नदियाँ, सम्पूर्ण देश, आपकी बतायी हुई सारी गुफाएँ तथा लतावितानसे व्याप्त हुई झाड़ियाँ भी खोज डालीं ॥ गहनेषु च देशेषु दुर्गेषु विषमेषु च ।

सत्त्वान्यतिप्रमाणानि विचितानि हतानि च ।

ये चैव गहना देशा विचितास्ते पुनः पुनः ॥ १३ ॥

' घने वनों, विभिन्न देशों, दुर्गम स्थानों और