वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ — पृष्ठ 881–890

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 881–890

पृष्ठ 881

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किष्किन्धाकाण्डे पकड़कर ही प्राणियोंको अपने पास खींच लेते हैं । यही । उनका नित्यका आहार है । इसके लिये उन्हें ब्रह्माजीसे अनुमति मिल चुकी है ॥ ३७ ॥

तं कालमेघप्रतिमं महोरगनिषेवितम् ।

अभिगम्य महानादं तीर्थेनैव महोदधिम् ॥ ३८ ॥

ततो रक्तजलं भीमं लोहितं नाम सागरम् ।

गत्वा प्रेक्ष्यथ तां चैव बृहतीं कूटशाल्मलीम् ॥ ३ ९ ॥

' इक्षुरसका वह समुद्र काले मेघके समान श्याम दिखायी देता है । बड़े - बड़े नाग उसके भीतर निवास करते हैं । उससे बड़ी भारी गर्जना होती रहती है । विशेष उपायोंसे उस महासागरके पार जाकर तुम लाल रंगके जलसे भरे हुए लोहित नामक भयंकर समुद्रके तटपर पहुँच जाओगे और वहाँ शाल्मलीद्वीपके चिह्नभूत कूटशाल्मली नामक विशाल वृक्षका दर्शन करोगे ॥ ३८-३९ ॥

गृहं च वैनतेयस्य नानारत्नविभूषितम् ।

तत्र कैलाससंकाशं विहितं विश्वकर्मणा ॥ ४० ॥

' उसके पास ही विश्वकर्माका बनाया हुआ विनतानन्दन गरुड़का एक सुन्दर भवन है, जो नाना प्रकारके रत्नोंसे विभूषित तथा कैलास पर्वतके समान उज्ज्वल एवं विशाल है ॥ ४० ॥

तत्र शैलनिभा भीमा मन्देहा नाम राक्षसाः ।

शैलशृङ्गेषु लम्बन्ते नानारूपा भयावहाः ॥ ४१ ॥

' उस द्वीपमें पर्वतके समान शरीरवाले भयंकर मंदेह नामक राक्षस निवास करते हैं, जो सुरासमुद्रके मध्यवर्ती शैल - शिखरोंपर लटकते रहते हैं । वे अनेक प्रकारके रूप धारण करनेवाले तथा भयदायक हैं ॥ ४१ ॥

ते पतन्ति जले नित्यं सूर्यस्योदयनं प्रति ।

अभितप्ताः स्म सूर्येण लम्बन्ते स्म पुनः पुनः ॥ ४२ ॥

निहता ब्रह्मतेजोभिरहन्यहनि राक्षसाः । ' प्रतिदिन सूर्योदयके समय वे राक्षस ऊर्ध्वमुख होकर सूर्यसे जूझने लगते हैं, परंतु सूर्यमण्डलके तापसे संतप्त तथा ब्रह्मतेजसे निहत हो सुरा - समुद्रके जलमें गिर पड़ते हैं । वहाँसे फिर जीवित हो उन्हीं शैल -शिखरोंपर लटक जाते हैं । उनका बारंबार ऐसा ही क्रम चला करता है ॥४२३ ॥

ततः पाण्डुरमेघाभं क्षीरोदं नाम सागरम् ॥ ४३ ॥

‘ शाल्मलिद्वीप एवं सुरा - समुद्रसे आगे बढ़नेपर ( क्रमशः घृत और दधिके समुद्र प्राप्त होंगे । वहाँ सीताकी खोज करनेके पश्चात् जब आगे बढ़ोगे, तब ) सफेद बादलोंकी -सी आभावाले क्षीरसमुद्रका दर्शन करोगे ॥४३ ॥

चत्वारिंशः सर्गः ८६ ९

गत्वा द्रक्ष्यथ दुर्धर्षा मुक्ताहारमिवोर्मिभिः ।

तस्य मध्ये महान् श्वेतो ऋषभो नाम पर्वतः ॥ ४४ ॥

' दुर्धर्ष वानरो! वहाँ पहुँचकर उठती हुई लहरोंसे युक्त क्षीरसागरको इस प्रकार देखोगे, मानो उसने मोतियोंके हार पहन रखे हों । उस सागरके बीचमें ऋषभ नामसे प्रसिद्ध एक बहुत ऊँचा पर्वत है, जो श्वेत वर्णका है ।

दिव्यगन्धैः कुसुमितैराचितैश्च नगैर्वृतः ।

सरश्च राजतैः पद्यैर्ज्वलितैर्हेमकेसरैः ॥ ४५ ॥

नाम्ना सुदर्शनं नाम राजहंसैः समाकुलम् । ‘ उस पर्वतपर सब ओर बहुत - से वृक्ष भरे हुए हैं, जो फूलोंसे सुशोभित तथा दिव्य गन्धसे सुवासित हैं । उसके ऊपर सुदर्शन नामका एक सरोवर है, जिसमें चाँदीके समान श्वेत रंगवाले कमल खिले हुए हैं । उन कमलोंके केसर सुवर्णमय होते हैं और सदा दिव्य दीसिसे दमकते । रहते हैं । वह सरोवर राजहंसोंसे भरा रहता है ॥ ४५३ ॥

विबुधाश्चारणा यक्षाः किंनराश्चाप्सरोगणाः ॥ ४६ ॥

हृष्टाः समधिगच्छन्ति नलिनीं तां रिरंसवः । ' देवता, चारण, यक्ष, किन्नर और अप्सराएँ बड़ी प्रसन्नताके साथ जल - विहार करनेके लिये वहाँ आया करती हैं ॥४६३ ॥

क्षीरोदं समतिक्रम्य तदा द्रक्ष्यथ वानराः ॥ ४७ ॥

जलोदं सागरं शीघ्रं सर्वभूतभयावहम् ।

तत्र तत्कोपजं तेजः कृतं हयमुखं महत् ॥ ४८ ॥

' वानरो! क्षीरसागर लाँघकर जब तुमलोग आगे बढ़ोगे, तब शीघ्र ही सुस्वादु जलसे भरे हुए समुद्रको देखोगे । वह महासागर समस्त प्राणियोंको भय देनेवाला है । उसमें ब्रह्मर्षि और्वके कोपसे प्रकट हुआ वडवामुख नामक महान् तेज विद्यमान है ॥ ४७-४८ ॥ अस्याहुस्तन्महावेगमोदनं सचराचरम् ।

तत्र विक्रोशतां नादो भूतानां सागरौकसाम् ।

श्रूयते चासमर्थानां दृष्ट्वाभूद् वडवामुखम् ॥४ ९ ॥

' उस समुद्रमें जो चराचर प्राणियोंसहित महान् वेगशाली जल है, वही उस वडवामुख नामक अग्निका आहार बताया जाता है । वहाँ जो वडवानल प्रकट हुआ है, उसे देखकर उसमें पतनके भयसे चीखते - चिल्लाते हुए समुद्रनिवासी असमर्थ प्राणियोंका आर्तनाद निरन्तर सुनायी देता है ॥ ४ ९ ॥

स्वादूदस्योत्तरे तीरे योजनानि त्रयोदश ।

जातरूपशिलो नाम सुमहान् कनकप्रभः ॥५० ॥

' स्वादिष्ट जलसे भरे हुए उस समुद्रके उत्तर

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८७० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे तेरह योजनकी दूरीपर सुवर्णमयी शिलाओंसे सुशोभित, । कनककी कमनीय कान्ति धारण करनेवाला एक बहुत ऊँचा पर्वत है ॥ ५० ॥

तत्र चन्द्रप्रतीकाशं पन्नगं धरणीधरम् ।

पद्मपत्रविशालाक्षं ततो द्रक्ष्यथ वानराः ॥ ५१ ॥

आसीनं पर्वतस्याग्रे सर्वदेवनमस्कृतम् ।

सहस्त्रशिरसं देवमनन्तं नीलवाससम् ॥ ५२ ॥

' वानरो! उसके शिखरपर इस पृथ्वीको धारण करनेवाले भगवान् अनन्त बैठे दिखायी देंगे । उनका श्रीविग्रह चन्द्रमाके समान गौरवर्णका है । वे सर्प जातिके हैं; परंतु उनका स्वरूप देवताओंके तुल्य है । उनके नेत्र प्रफुल्ल कमलदलके समान हैं और शरीर नील वस्त्रसे आच्छादित है । उन अनन्तदेवके सहस्र मस्तक हैं ।

त्रिशिराः काञ्चनः केतुस्तालस्तस्य महात्मनः ।

स्थापितः पर्वतस्याग्रे विराजति सवेदिकः ॥ ५३ ॥

' पर्वतके ऊपर उन महात्माकी ताड़के चिह्नसे युक्त सुवर्णमयी ध्वजा फहराती रहती है । उस ध्वजाकी तीन शिखाएँ हैं और उसके नीचे आधारभूमिपर वेदी बनी हुई है । इस तरह उस ध्वजकी बड़ी शोभा होती है ॥५३ ॥

पूर्वस्यां दिशि निर्माणं कृतं तत् त्रिदशेश्वरैः ।

ततः परं हेममयः श्रीमानुदयपर्वतः ॥ ५४ ॥

' यही तालध्वज पूर्व दिशाकी सीमाके सूचक-चिह्नके रूपमें देवताओंद्वारा स्थापित किया गया है । उसके बाद सुवर्णमय उदयपर्वत है, जो दिव्य शोभासे सम्पन्न है ॥ ५४ ॥

तस्य कोटिर्दिवं स्पृष्ट्वा शतयोजनमायता ।

जातरूपमयी दिव्या विराजति सवेदिका ॥ ५५ ॥

' उसका गगनचुम्बी शिखर सौ योजन लंबा है । उसका आधारभूत पर्वत भी वैसा ही है । उसके साथ वह दिव्य सुवर्णशिखर अद्भुत शोभा पाता है ॥ ५५ ॥

सालैस्तालैस्तमालैश्च कर्णिकारैश्च पुष्पितैः ।

जातरूपमयैर्दिव्यैः शोभते सूर्यसंनिभैः ॥ ५६ ॥

‘ वहाँके साल, ताल, तमाल और फूलोंसे लदे कनेर आदि वृक्ष भी सुवर्णमय ही हैं । उन सूर्यतुल्य तेजस्वी दिव्य वृक्षोंसे उदयगिरिकी बड़ी शोभा होती है ॥ ५६ ॥

तत्र योजनविस्तारमुच्छ्रितं दशयोजनम् ।

शृङ्गं सौमनसं नाम जातरूपमयं ध्रुवम् ॥ ५७ ॥

‘ उस सौ योजन लंबे उदयगिरिके शिखरपर एक सौमनस नामक सुवर्णमय शिखर है, जिसकी चौड़ाई एक योजन और ऊँचाई दस योजन है ॥५७ ॥

तत्र पूर्वं पदं कृत्वा पुरा विष्णुस्त्रिविक्रमे ।

द्वितीयं शिखरे मेरोश्चकार पुरुषोत्तमः ॥ ५८ ॥

‘ पूर्वकालमें वामन अवतारके समय पुरुषोत्तम भगवान् विष्णुने अपना पहला पैर उस सौमनस नामक शिखरपर रखकर दूसरा पैर मेरु पर्वतके शिखरपर रखा था ॥ ५८ ॥

उत्तरेण परिक्रम्य जम्बूद्वीपं दिवाकरः ।

दृश्यो भवति भूयिष्ठं शिखरं तन्महोच्छ्रयम् ॥ ५ ९ ॥

' सूर्यदेव उत्तरसे घूमकर जम्बूद्वीपकी परिक्रमा करते हुए जब अत्यन्त ऊँचे ' सौमनस ' नामक शिखरपर आकर स्थित होते हैं, तब जम्बूद्वीपनिवासियोंको उनका अधिक स्पष्टताके साथ दर्शन होता है ॥५ ९ ॥

तत्र वैखानसा नाम वालखिल्या महर्षयः ।

प्रकाशमाना दृश्यन्ते सूर्यवर्णास्तपस्विनः ॥ ६० ॥

' उस सौमनस नामक शिखरपर वैखानस महात्मा महर्षि बालखिल्यगण प्रकाशित होते देखे जाते हैं, जो सूर्यके समान कान्तिमान् और तपस्वी हैं ॥ ६० ॥

अयं सुदर्शनो द्वीपः पुरो यस्य प्रकाशते ।

तस्मिंस्तेजश्च चक्षुश्च सर्वप्राणभृतामपि ॥ ६१ ॥

' यह उदयगिरिके सौमनस शिखरके सामनेका द्वीप सुदर्शन नामसे प्रसिद्ध है; क्योंकि उक्त शिखरपर जब भगवान् सूर्य उदित होते हैं, तभी इस द्वीपके समस्त प्राणियोंका तेजसे सम्बन्ध होता है और सबके नेत्रोंको प्रकाश प्राप्त होता है ( यही इस द्वीपके ' सुदर्शन ' नाम होनेका कारण है ) ॥ ६१ ॥

शैलस्य तस्य पृष्ठेषु कन्दरेषु वनेषु च ।

रावणः सह वैदेह्या मार्गितव्यस्ततस्ततः ॥ ६२ ॥

' उदयाचलके पृष्ठभागोंमें, कन्दराओंमें तथा वनों में भी तुम्हें जहाँ - तहाँ विदेहकुमारी सीतासहित रावणका पता लगाना चाहिये ॥ ६२ ॥

काञ्चनस्य च शैलस्य सूर्यस्य च महात्मनः ।

आविष्टा तेजसा संध्या पूर्वा रक्ता प्रकाशते ॥ ६३ ॥

‘ उस सुवर्णमय उदयाचल तथा महात्मा सूर्यदेवके तेजसे व्यास हुई उदयकालिक पूर्व संध्या रक्तवर्णकी प्रभासे प्रकाशित होती है ॥ ६३ ॥

पूर्वमेतत् कृतं द्वारं पृथिव्या भुवनस्य च ।

सूर्यस्योदयनं चैव पूर्वा ह्येषा दिगुच्यते ॥ ६४ ॥

' सूर्यके उदयका यह स्थान सबसे पहले ब्रह्माजीने बनाया है; अतः यही पृथ्वी एवं ब्रह्मलोकका द्वार है ( ऊपरके लोकोंमें रहनेवाले प्राणी इसी द्वारसे भूलोकमें

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किष्किन्धाकाण्डे एकचत्वारिंशः सर्गः ८७१ प्रवेश करते हैं तथा भूलोकके प्राणी इसी द्वारसे । ब्रह्मलोकमें जाते हैं ) । पहले इसी दिशामें इस द्वारका निर्माण हुआ, इसलिये इसे पूर्व दिशा कहते हैं ॥ ६४ ॥

तस्य शैलस्य पृष्ठेषु निर्झरेषु गुहासु च ।

रावणः सह वैदेह्या मार्गितव्यस्ततस्ततः ॥ ६५ ॥

' उदयाचलकी घाटियों, झरनों और गुफाओंमें यत्र-तत्र घूमकर तुम्हें विदेहकुमारी सीतासहित रावणका अन्वेषण करना चाहिये ॥ ६५ ॥

ततः परमगम्या स्याद् दिक्पूर्वा त्रिदशावृता ।

रहिता चन्द्रसूर्याभ्यामदृश्या तमसावृता ॥ ६६ ॥

' इससे आगे पूर्व दिशा अगम्य है । उधर देवता रहते हैं । उस ओर चन्द्रमा और सूर्यका प्रकाश न होनेसे वहाँकी भूमि अन्धकारसे आच्छन्न एवं अदृश्य है ॥ ६६ ॥

शैलेषु तेषु सर्वेषु कन्दरेषु नदीषु च ।

ये च नोक्ता मयोद्देशा विचेया तेषु जानकी ॥ ६७ ॥

' उदयाचलके आस - पासके जो समस्त पर्वत, कन्दराएँ तथा नदियाँ हैं, उनमें तथा जिन स्थानोंका मैंने निर्देश नहीं किया है, उनमें भी तुम्हें जानकीकी खोज करनी चाहिये ॥ ६७ ॥

एतावद् वानरैः शक्यं गन्तुं वानरपुङ्गवाः ।

अभास्करममर्यादं न जानीमस्ततः परम् ॥ ६८ ॥

' वानरशिरोमणियो! केवल उदयगिरितक ही वानरोंकी पहुँच हो सकती है । इससे आगे न तो सूर्यका प्रकाश है और न देश आदिकी कोई सीमा ही है । अतः आगेकी भूमिके बारेमें मुझे कुछ भी मालूम नहीं है ॥ ६८ ॥

अभिगम्य तु वैदेहीं निलयं रावणस्य च ।

मासे पूर्णे निवर्तध्वमुदयं प्राप्य पर्वतम् ॥ ६ ९ ॥

' तुमलोग उदयाचलतक जाकर सीता और रावणके स्थानका पता लगाना और एक मास पूरा होते - होतेतक लौट आना ॥ ६ ९ ॥

ऊर्ध्वं मासान्न वस्तव्यं वसन् वध्यो भवेन्मम ।

सिद्धार्थाः संनिवर्तध्वमधिगम्य च मैथिलीम् ॥ ७० ॥

' एक महीनेसे अधिक न ठहरना । जो अधिक कालतक वहाँ रह जायगा, वह मेरे द्वारा मारा जायगा । मिथिलेशकुमारीका पता लगाकर अन्वेषणका प्रयोजन सिद्ध हो जानेपर अवश्य लौट आना ॥ ७० ॥

महेन्द्रकान्तां वनषण्डमण्डितां दिशं चरित्वा निपुणेन वानराः । अवाप्य सीतां रघुवंशजप्रियां ततो निवृत्ताः सुखिनो भविष्यथ ॥ ७१ ॥

' वानरो! वनसमूहसे अलंकृत पूर्व दिशामें अच्छी तरह भ्रमण करके श्रीरामचन्द्रजीकी प्यारी पत्नी सीताका समाचार जानकर तुम वहाँसे लौट आओ । इससे तुम | सुखी होओगे ' ॥ ७१ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे चत्वारिंशः सर्गः ॥ ४० ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें चालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ४० ॥

एकचत्वारिंशः सर्गः सुग्रीवका दक्षिण दिशाके स्थानोंका परिचय

ततः प्रस्थाप्य सुग्रीवस्तन्महद्वानरं बलम् ।

दक्षिणां प्रेषयामास वानरानभिलक्षितान् ॥ १ ॥

इस प्रकार वानरोंकी बहुत बड़ी सेनाको पूर्व दिशामें प्रस्थापित करके सुग्रीवने दक्षिण दिशाकी ओर चुने हुए वानरोंको, जो भलीभाँति परख लिये गये थे, भेजा ॥ १ ॥

नीलमग्निसुतं चैव हनूमन्तं च वानरम् ।

पितामहसुतं चैव जाम्बवन्तं महौजसम् ॥ २ ॥

सुहोत्रं च शरारिं च शरगुल्मं तथैव च ।

गजं गवाक्षं गवयं सुषेणं वृषभं तथा ॥ ३ ॥

* सुषेण दो थे - एक ताराके पिता और दूसरा उनसे देते हुए वहाँ प्रमुख वानर वीरोंको भेजना

मैन्दं च द्विविदं चैव सुषेणं गन्धमादनम् ।

उल्कामुखमनङ्गं च हुताशनसुतावुभौ ॥४ ॥

अङ्गदप्रमुखान् वीरान् वीरः कपिगणेश्वरः ।

वेगविक्रमसम्पन्नान् संदिदेश विशेषवित् ॥ ५ ॥

अग्निपुत्र नील, कपिवर हनुमान्जी, ब्रह्माजीके महाबली पुत्र जाम्बवान्, सुहोत्र, शरारि, शरगुल्म, गज, गवाक्ष, गवय, सुषेण * ( प्रथम ), वृषभ, मैन्द, द्विविद, सुषेण ( द्वितीय ), गन्धमादन, हुताशनके दो पुत्र उल्कामुख और अनङ्ग ( असङ्ग ) तथा अङ्गद आदि प्रधान - प्रधान वीरोंको, जो महान् वेग और पराक्रमसे सम्पन्न थे, भिन्न वानरयूथपति था ।

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८७२ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे विशेषज्ञ वानरराज सुग्रीवने दक्षिणकी ओर जानेकी आज्ञा दी ॥२-५ ॥

तेषामग्रेसरं चैव बृहद्बलमथाङ्गदम् ।

विधाय हरिवीराणामादिशद् दक्षिणां दिशम् ॥ ६ ॥

महान् बलशाली अङ्गदको उन समस्त वानर वीरोंका अगुआ बनाकर उन्हें दक्षिण दिशामें सीताकी खोजका भार सौंपा ॥ ६ ॥

ये केचन समुद्देशास्तस्यां दिशि सुदुर्गमाः ।

कपीशः कपिमुख्यानां स तेषां समुदाहरत् ॥ ७॥ ।

उस दिशामें जो कोई भी स्थान अत्यन्त दुर्गम थे, उनका भी कपिराज सुग्रीवने उन श्रेष्ठ वानरोंको परिचय दिया ॥ ७ ॥

सहस्रशिरसं विन्ध्यं नानाद्रुमलतायुतम् ।

नर्मदां च नदीं रम्यां महोरगनिषेविताम् ॥ ८ ॥

ततो गोदावरीं रम्यां कृष्णवेणीं महानदीम् ।

वरदां च महाभागां महोरगनिषेविताम् ।

मेखलानुत्कलांश्चैव दशार्णनगराण्यपि ॥ ९ ॥

आब्रवन्तीमवन्तीं च सर्वमेवानुपश्यत । वे बोले - ' वानरो! तुमलोग भाँति - भाँतिके वृक्षों और लताओंसे सुशोभित सहस्रों शिखरोंवाले विन्ध्यपर्वत, बड़े - बड़े नागों से सेवित रमणीय नर्मदा नदी, सुरम्य गोदावरी, महानदी, कृष्णवेणी तथा बड़े - बड़े नागों से सेवित महाभागा वरदा आदि नदियोंके तटोंपर और मेखल ( मेकल ), उत्कल एवं दशार्ण देशके नगरोंमें तथा आब्रवन्ती और अवन्तीपुरीमें भी सब जगह सीताकी खोज करो ॥ ८ - ९ ३ ॥ विदर्भानृष्टिकांश्चैव रम्यान् माहिषकानपि ॥ १० ॥

तथा वङ्गान् कलिङ्गांश्च कौशिकांश्च समन्ततः ।

अन्वीक्ष्य दण्डकारण्यं सपर्वतनदीगुहम् ॥ ११ ॥

नदीं गोदावरीं चैव सर्वमेवानुपश्यत ।

तथैवान्ध्रांश्च पुण्ड्रांश्च चोलान् पाण्ड्यांश्च केरलान् ॥ १२ ॥ ।

१. यहाँ दक्षिण दिशाका विभाग किष्किन्धासे न करके ' इसी प्रकार विदर्भ, ऋष्टिक, रम्य माहिषक देश, वङ्ग े , कलिङ्ग तथा कौशिक आदि देशोंमें सब ओर देखभाल करके पर्वत, नदी और गुफाओंसहित समूचे दण्डकारण्यमें छानबीन करना । वहाँ जो गोदावरी नदी है, उसमें सब ओर बारंबार देखना । इसी प्रकार आन्ध्र, पुण्ड्र, चोल, पाण्ड्य तथा केरल आदि देशोंमें भी ढूँढ़ना ॥

अयोमुखश्च गन्तव्यः पर्वतो धातुमण्डितः ।

विचित्रशिखरः श्रीमांश्चित्रपुष्पितकाननः ॥ १३ ॥

सुचन्दनवनोद्देशो मार्गितव्यो महागिरिः । ' तदनन्तर अनेक धातुओंसे अलंकृत अयोमुखरै ( मलय ) पर्वतपर भी जाना, उसके शिखर बड़े विचित्र हैं । वह शोभाशाली पर्वत फूले हुए विचित्र काननोंसे युक्त है । उसके सभी स्थानोंमें सुन्दर चन्दनके वन हैं । उस महापर्वत मलयपर सीताकी अच्छी तरह खोज करना ॥ ततस्तामापगां दिव्यां प्रसन्नसलिलाशयाम् ॥१४ ॥

तत्र द्रक्ष्यथ कावेरीं विहृतामप्सरोगणैः । ' तत्पश्चात् स्वच्छ जलवाली दिव्य नदी कावेरीको देखना, जहाँ अप्सराएँ विहार करती हैं ॥ १४३ ॥

तस्यासीनं नगस्याग्रे मलयस्य महौजसम् ॥ १५ ॥

द्रक्ष्यथादित्यसंकाशमगस्त्यमृषिसत्तमम् ' उस प्रसिद्ध मलयपर्वतके शिखरपर बैठे हुए सूर्यके समान महान् तेजसे सम्पन्न मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यका ४ दर्शन करना ॥ १५३ ॥

ततस्तेनाभ्यनुज्ञाताः प्रसन्नेन ` महात्मना ॥ १६ ॥

ताम्रपर्णी ग्राहजुष्टां तरिष्यथ महानदीम् । ' इसके बाद उन प्रसन्नचित्त महात्मासे आज्ञा लेकर ग्राहोंसे सेवित महानदी ताम्रपर्णीको पार करना ॥ १६३ ॥

सा चन्दनवनैश्चित्रैः प्रच्छन्नद्वीपवारिणी ॥ १७ ॥

कान्तेव युवती कान्तं समुद्रमवगाहते । ' उसके द्वीप और जल विचित्र चन्दनवनोंसे आर्यावर्तसे किया गया है । पूर्व समुद्रसे पश्चिम समुद्र और हिमालयसे विन्ध्यके भागको आर्यावर्त कहते हैं । सुग्रीवने दक्षिण दिशाके जिन स्थानोंका परिचय दिया है, उनकी सङ्गति आर्यावर्तसे ही दिशाका विभाजन करनेपर लगती है । २. अन्य पाठके अनुसार यहाँ मत्स्य देश समझना चाहिये । ३. रामायणतिलकके लेखक अयोमुखको मलय - पर्वतका नामान्तर मानते हैं । गोविन्दराज इसे सह्यपर्वतका पर्याय समझते हैं तथा रामायणशिरोमणिकार अयोमुखको इन दोनोंसे भिन्न स्वतन्त्र पर्वत मानते हैं । यहाँ तिलककारके मतका अनुसरण किया गया है । ४. यद्यपि पहले पञ्चवटीसे उत्तर भागमें अगस्त्यके आश्रमका वर्णन आया है तथापि यहाँ मलयपर्वतपर भी उनका आश्रम था, ऐसा मानना चाहिये । जैसे वाल्मीकि मुनिका आश्रम अनेक स्थानोंमें था, उसी तरह इनका भी था अथवा ये उसी नामके कोई दूसरे ऋषि थे ।

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किष्किन्धाकाण्डे एकचत्वारिंशः सर्गः ८७३ आच्छादित हैं; अतः वह सुन्दर साड़ीसे विभूषित युवती प्रेयसीकी भाँति अपने प्रियतम समुद्रसे मिलती है ॥ १७३ ॥

ततो हेममयं दिव्यं मुक्तामणिविभूषितम् ॥ १८ ॥

युक्तं कवाटं पाण्ड्यानां गता द्रक्ष्यथ वानराः । ' वानरो! वहाँसे आगे बढ़नेपर तुमलोग पाण्ड्यवंशी राजाओंके नगरद्वारपर * लगे हुए सुवर्णमय कपाटका दर्शन करोगे, जो मुक्तामणियोंसे विभूषित एवं दिव्य है ॥ ततः समुद्रमासाद्य सम्प्रधार्यार्थनिश्चयम् ॥ १ ९ ॥

अगस्त्येनान्तरे तत्र सागरे विनिवेशितः ।

चित्रसानुनगः श्रीमान् महेन्द्रः पर्वतोत्तमः ॥२० ॥

जातरूपमयः श्रीमानवगाढो महार्णवम् । ‘ तत्पश्चात् समुद्रके तटपर जाकर उसे पार करनेके सम्बन्धमें अपने कर्तव्यका भलीभाँति निश्चय करके उसका पालन करना । महर्षि अगस्त्यने समुद्रके भीतर एक सुन्दर सुवर्णमय पर्वतको स्थापित किया है, जो महेन्द्रगिरिके नामसे विख्यात है । उसके शिखर तथा वहाँके वृक्ष विचित्र शोभासे सम्पन्न हैं । वह शोभाशाली

पर्वत श्रेष्ठ समुद्रके भीतर गहराईतक घुसा हुआ है ।

नानाविधैर्नगैः फुल्लैर्लताभिश्चोपशोभितम् ॥ २१ ॥

देवर्षियक्षप्रवरैरप्सरोभिश्च शोभितम् ।

सिद्धचारणसङ्घैश्च प्रकीर्णं सुमनोरमम् ॥ २२ ॥

तमुपैति सहस्त्राक्षः सदा पर्वसु पर्वसु । ' नाना प्रकारके खिले हुए वृक्ष और लताएँ उस पर्वतकी शोभा बढ़ाती हैं । देवता, ऋषि, श्रेष्ठ यक्ष और अप्सराओंकी उपस्थितिसे उसकी शोभा और भी बढ़ जाती है । सिद्धों और चारणोंके समुदाय वहाँ सब ओर फैले रहते हैं । इन सबके कारण महेन्द्रपर्वत अत्यन्त मनोरम जान पड़ता है । सहस्र नेत्रधारी इन्द्र प्रत्येक पर्वके दिन उस पर्वतपर पदार्पण करते हैं ॥ २१-२२३ ॥ द्वीपस्तस्यापरे पारे शतयोजनविस्तृतः ॥ २३ ॥

अगम्यो मानुषैर्दीप्तस्तं मार्गध्वं समन्ततः ।

तत्र सर्वात्मना सीता मार्गितव्या विशेषतः ॥ २४ ॥

' उस समुद्रके उस पार एक द्वीप है, जिसका विस्तार सौ योजन है । वहाँ मनुष्योंकी पहुँच नहीं है । वह जो दीतिशाली द्वीप है, उसमें चारों ओर पूरा प्रयत्न करके तुम्हें सीताकी विशेषरूपसे खोज करनी चाहिये ॥

स हि देशस्तु वध्यस्य रावणस्य दुरात्मनः ।

राक्षसाधिपतेर्वासः सहस्त्राक्षसमद्युतेः ॥ २५ ॥

' वही देश इन्द्रके समान तेजस्वी दुरात्मा राक्षसराज रावणका, जो हमारा वध्य है, निवासस्थान है ॥ २५ ॥

दक्षिणस्य समुद्रस्य मध्ये तस्य तु राक्षसी ।

अङ्गारकेति विख्याता छायामाङ्क्षिप्य भोजिनी ॥ २६ ॥

' उस दक्षिण समुद्रके बीचमें अङ्गारका नामसे प्रसिद्ध एक राक्षसी रहती है, जो छाया पकड़कर ही प्राणियोंको खींच लेती और उन्हें खा जाती है ॥ २६ ॥

एवं निःसंशयान् कृत्वा संशयान्नष्टसंशयाः ।

मृगयध्वं नरेन्द्रस्य पत्नीममिततेजसः ॥ २७ ॥

' उस लङ्काद्वीपमें जो संदिग्ध स्थान हैं, उन सबमें इस तरह खोज करके जब तुम उन्हें संदेहरहित समझ लो और तुम्हारे मनका संशय निकल जाय, तब तुम लङ्काद्वीपको भी लाँघकर आगे बढ़ जाना और अमिततेजस्वी महाराज श्रीरामकी पत्नीका अन्वेषण करना ॥ २७ ॥

तमतिक्रम्य लक्ष्मीवान् समुद्रे शतयोजने ।

गिरिः पुष्पितको नाम सिद्धचारणसेवितः ॥ २८ ॥

' लङ्काको लाँघकर आगे बढ़नेपर सौ योजन विस्तृत समुद्रमें एक पुष्पितक नामका पर्वत है, जो परम शोभासे सम्पन्न तथा सिद्धों और चारणोंसे सेवित है ॥

चन्द्रसूर्यांशुसंकाशः सागराम्बुसमाश्रयः ।

भ्राजते विपुलैः शृङ्गैरम्बरं विलिखन्निव ॥ २ ९ ॥

' वह चन्द्रमा और सूर्यके समान प्रकाशमान है तथा समुद्रके जलमें गहराईतक घुसा हुआ है । वह अपने विस्तृत शिखरोंसे आकाशमें रेखा खींचता हुआ - सा सुशोभित होता है ॥२ ९ ॥ तस्यैकं काञ्चनं शृङ्गं सेवते यं दिवाकरः ।

श्वेतं राजतमेकं च सेवते यन्निशाकरः ।

न तं कृतघ्नाः पश्यन्ति न नृशंसा न नास्तिकाः ॥ ३० ॥

' उस पर्वतका एक सुवर्णमय शिखर है, जिसका प्रतिदिन सूर्यदेव सेवन करते हैं । उसी प्रकार इसका एक रजतमय श्वेत - शिखर है, जिसका चन्द्रमा सेवन करते हैं । कृतघ्न, नृशंस और नास्तिक पुरुष उस पर्वत-शिखरको नहीं देख पाते हैं ॥३० ॥

प्रणम्य शिरसा शैलं तं विमार्गथ वानराः ।

तमतिक्रम्य दुर्धर्षं सूर्यवान्नाम पर्वतः ॥ ३१ ॥

' वानरो! तुमलोग मस्तक झुकाकर उस पर्वतको प्रणाम करना और वहाँ सब ओर सीताको ढूँढ़ना । उस दुर्धर्ष । पर्वतको लाँघकर आगे बढ़नेपर सूर्यवान् नामक पर्वत मिलेगा ॥ * आधुनिक तंजौर ही प्राचीन पाण्ड्यवंशी नरेशोंका नगर है । इस नगरमें भी छानबीन करनेके लिये सुग्रीव वानरोंको आदेश दे रहे हैं ।

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८७४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे

अध्वना दुर्विगाहेन योजनानि चतुर्दश ।

ततस्तमप्यतिक्रम्य वैद्युतो नाम पर्वतः ॥ ३२ ॥

‘ वहाँ जानेका मार्ग बड़ा दुर्गम है और वह पुष्पितकसे चौदह योजन दूर है । सूर्यवान्‌को लाँघकर जब तुमलोग आगे जाओगे, तब तुम्हें ' वैद्युत ' नामक पर्वत मिलेगा ॥

सर्वकामफलैर्वृक्षैः सर्वकालमनोहरैः ।

तत्र भुक्त्वा वरार्हाणि मूलानि च फलानि च ॥ ३३ ॥

मधूनि पीत्वा जुष्टानि परं गच्छत वानराः । ' वहाँके वृक्ष सम्पूर्ण मनोवाञ्छित फलोंसे युक्त और सभी ऋतुओंमें मनोहर शोभासे सम्पन्न हैं । वानरो! उनसे सुशोभित वैद्युत पर्वतपर उत्तम फल - मूल खाकर और सेवन करने योग्य मधु पीकर तुमलोग आगे जाना ॥ तत्र नेत्रमनः कान्तः कुञ्जरो अगस्त्यभवनं यत्र निर्मितं ' फिर कुञ्जर नामक पर्वत और मनको भी अत्यन्त प्रिय ऊपर विश्वकर्माका बनाया हुआ सुन्दर भवन है ॥ ३४३ ॥

तत्र योजनविस्तारमुच्छ्रितं नाम पर्वतः ॥ ३४ ॥

विश्वकर्मणा । दिखायी देगा, जो नेत्रों लगनेवाला है । उसके महर्षि अगस्त्यका * एक दशयोजनम् ॥ ३५ ॥

शरणं काञ्चनं दिव्यं नानारत्नविभूषितम् । ' कुञ्जर पर्वतपर बना हुआ अगस्त्यका वह दिव्य भवन सुवर्णमय तथा नाना प्रकारके रत्नोंसे विभूषित है । उसका विस्तार एक योजनका और ऊँचाई दस योजनकी है ॥ ३५३ ॥

तत्र भोगवती नाम सर्पाणामालयः पुरी ॥ ३६ ॥

विशालरथ्या दुर्धर्षा सर्वतः परिरक्षिता ।

रक्षिता पन्नगैर्घोरैस्तीक्ष्णदंष्ट्रैर्महाविषैः ॥ ३७ ॥

' उसी पर्वतपर सर्पोंकी निवासभूता एक नगरी है, जिसका नाम भोगवती है ( यह पातालकी भोगवती पुरीसे भिन्न है ) । यह पुरी दुर्जय है । उसकी सड़कें बहुत बड़ी और विस्तृत हैं । वह सब ओरसे सुरक्षित है । तीखी दाढ़वाले महाविषैले भयंकर सर्प उसकी रक्षा करते हैं ॥ ३६-३७ ॥

सर्पराजो महाघोरो यस्यां वसति वासुकिः ।

निर्याय मार्गितव्या च सा च भोगवती पुरी ॥ ३८ ॥

' उस भोगवती पुरीमें महाभयंकर सर्पराज वासुकि निवास करते हैं ( ये योगशक्तिसे अनेक रूप धारण करके दोनों भोगवती पुरियोंमें एक साथ रह सकते हैं ) । * यह महर्षि अगस्त्यका तीसरा स्थान है । तुम्हें विशेषरूपसे उस भोगवती पुरीमें प्रवेश करके वहाँ सीताकी खोज करनी चाहिये ॥ ३८ ॥

तत्र चानन्तरोद्देशा ये केचन समावृताः ।

तं च देशमतिक्रम्य महानृषभसंस्थितिः ॥ ३ ९ ॥

' उस पुरीमें जो गुप्त एवं व्यवधानरहित स्थान हों, उन सबमें सीताका अन्वेषण करना चाहिये । उस प्रदेशको लाँघकर आगे बढ़नेपर तुम्हें ऋषभ नामक महान् पर्वत मिलेगा ॥ ३ ९ ॥

सर्वरत्नमयः श्रीमानृषभो नाम पर्वतः ।

गोशीर्षकं पद्मकं च हरिश्यामं च चन्दनम् ॥ ४० ॥

दिव्यमुत्पद्यते यत्र तच्चैवाग्निसमप्रभम् ।

न तु तच्चन्दनं दृष्ट्वा स्प्रष्टव्यं तु कदाचन ॥ ४१ ॥

' वह शोभाशाली ऋषभ पर्वत सम्पूर्ण रत्नोंसे भरा हुआ है । वहाँ गोशीर्षक, पद्मक, हरिश्याम आदि नामोंवाला दिव्य चन्दन उत्पन्न होता है । वह चन्दनवृक्ष अग्रिके समान प्रज्वलित होता रहता है । उस चन्दनको देखकर कदापि तुम्हें उसका स्पर्श नहीं करना चाहिये ॥

रोहिता नाम गन्धर्वा घोरं रक्षन्ति तद्वनम् ।

तत्र गन्धर्वपतयः पञ्च सूर्यसमप्रभाः ॥ ४२ ॥

' क्योंकि ' रोहित ' नामवाले गन्धर्व उस घोर वनकी रक्षा करते हैं । वहाँ सूर्यके समान कान्तिमान् पाँच गन्धर्वराज रहते हैं ॥ ४२ ॥

शैलूषो ग्रामणीः शिक्षः शुको बभ्रुस्तथैव च ।

रविसोमाग्निवपुषां निवासः पुण्यकर्मणाम् ॥ ४३ ॥

अन्ते पृथिव्या दुर्धर्षास्ततः स्वर्गजितः स्थिताः । ' उनके नाम ये हैं- शैलूष, ग्रामणी, शिक्ष ( शिग्रु ), शुक और बभ्रु । उस ऋषभसे आगे पृथिवीकी अन्तिम सीमापर सूर्य, चन्द्रमा तथा अग्निके तुल्य तेजस्वी पुण्यकर्मा पुरुषका निवास - स्थान है । अतः वहाँ दुर्धर्ष स्वर्गविजयी ( स्वर्गके अधिकारी ) पुरुष ही वास करते हैं ॥ ४३३ ॥

ततः परं न वः सेव्यः पितृलोकः सुदारुणः ॥ ४४ ॥

राजधानी यमस्यैषा कष्टेन तमसाऽऽवृता । ‘ उससे आगे अत्यन्त भयानक पितृलोक है; वहाँ तुम लोगोंको नहीं जाना चाहिये । यह भूमि यमराजकी राजधानी है, जो कष्टप्रद अन्धकारसे आच्छादित है ॥

एतावदेव युष्माभिर्वीरा वानरपुंगवाः ।

शक्यं विचेतुं गन्तुं वा नातो गतिमतां गतिः ॥ ४५ ॥

' वीर वानरपुङ्गवो! बस, दक्षिण दिशामें इतनी ही

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किष्किन्धाकाण्डे दूरतक तुम्हें जाना और खोजना है । उससे आगे पहुँचना असम्भव है; क्योंकि उधर जंगम प्राणियोंकी गति नहीं है ॥

सर्वमेतत् समालोक्य यच्चान्यदपि दृश्यते ।

गतिं विदित्वा वैदेह्याः संनिवर्तितुमर्हथ ॥ ४६ ॥

' इन सब स्थानोंमें अच्छी तरह देख - भाल करके और भी जो स्थान अन्वेषणके योग्य दिखायी दे, वहाँ भी विदेहकुमारीका पता लगाना; तदनन्तर तुम सबको लौट आना चाहिये ॥ ४६ ॥

यश्च मासान्निवृत्तोऽग्रे दृष्टा सीतेति वक्ष्यति ।

मत्तुल्यविभवो भोगैः सुखं स विहरिष्यति ॥४७ ॥

' जो एक मास पूर्ण होनेपर सबसे पहले यहाँ आकर यह कहेगा कि ‘ मैंने सीताजीका दर्शन किया है ' वह मेरे समान वैभवसे सम्पन्न हो भोग्य - पदार्थोंका अनुभव करता हुआ सुखपूर्वक विहार करेगा ॥ ४७ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये द्विचत्वारिंशः सर्गः ८७५

। ततः प्रियतरो नास्ति मम प्राणाद् विशेषतः ।

कृतापराधो बहुशो मम बन्धुर्भविष्यति ॥ ४८ ॥

' उससे बढ़कर प्रिय मेरे लिये दूसरा कोई नहीं होगा । वह मेरे लिये प्राणोंसे भी बढ़कर प्यारा होगा तथा अनेक बार अपराध किया हो तो भी वह मेरा बन्धु होकर रहेगा ॥ ४८ ॥

अमितबलपराक्रमा भवन्तो विपुलगुणेषु कुलेषु च प्रसूताः । मनुजपतिसुतां यथा लभध्वं तदधिगुणं पुरुषार्थमारभध्वम् ॥ ४ ९ ॥ ' तुम सबके बल और पराक्रम असीम हैं । तुम विशेष गुणशाली उत्तम कुलोंमें उत्पन्न हुए हो । राजकुमारी सीताका जिस प्रकार भी पता मिल सके, उसके । अनुरूप उच्च कोटिका पुरुषार्थ आरम्भ करो ' ॥ ४ ९ ॥ किष्किन्धाकाण्डे एकचत्वारिंशः सर्गः ॥ ४१ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें इकतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ४१ ॥

द्विचत्वारिंशः सर्गः सुग्रीवका पश्चिम दिशाके स्थानोंका परिचय

अथ प्रस्थाप्य स हरीन् सुग्रीवो दक्षिणां दिशम् ।

अब्रवीन्मेघसंकाशं सुषेणं नाम वानरम् ॥ १ ॥

तारायाः पितरं राजा श्वशुरं भीमविक्रमम् ।

अब्रवीत् प्राञ्जलिर्वाक्यमभिगम्य प्रणम्य च ॥ २ ॥

महर्षिपुत्रं मारीचमर्चिष्मन्तं महाकपिम् ।

वृतं कपिवरैः शूरैर्महेन्द्रसदृशद्युतिम् ॥ ३ ॥

बुद्धिविक्रमसम्पन्नं वैनतेयसमद्युतिम् ।

मरीचिपुत्रान् मारीचानर्चिर्माल्यान् महाबलान् ॥ ४ ॥

ऋषिपुत्रांश्च तान् सर्वान् प्रतीचीमादिशद् दिशम् ।

द्वाभ्यां शतसहस्त्राभ्यां कपीनां कपिसत्तमाः ॥ ५ ॥

सुषेणप्रमुखा यूयं वैदेहीं परिमार्गथ । दक्षिण दिशाकी ओर वानरोंको भेजनेके पश्चात् राजा सुग्रीवने ताराके पिता और अपने श्वशुर ' सुषेण ' नामक वानरके पास जाकर उन्हें हाथ जोड़कर प्रणाम किया और कुछ कहना आरम्भ किया । सुषेण मेघके समान काले और भयंकर पराक्रमी थे । उनके सिवा, महर्षि मरीचिके पुत्र महाकपि अर्चिष्मान् भी वहाँ उपस्थित थे, जो देवराज इन्द्रके समान तेजस्वी तथा शूरवीर श्रेष्ठ वानरोंसे घिरे हुए थे । उनकी कान्ति विनतानन्दन गरुड़के समान थी । वे बुद्धि और पराक्रमसे । देते हुए सुषेण आदि वानरोंको वहाँ भेजना सम्पन्न थे । उनके अतिरिक्त मरीचिके पुत्र मारीच नामवाले वानर भी थे, जो महाबली और ' अर्चिर्माल्य ' नामसे प्रसिद्ध थे । इनके सिवा और भी बहुत - से ऋषिकुमार थे, जो वानररूपमें वहाँ विराजमान थे । सुषेणके साथ उन सबको सुग्रीवने पश्चिम दिशाकी ओर जानेकी आज्ञा दी और कहा – ' कपिवरो! आप सब लोग दो लाख वानरोंको साथ ले सुषेणजीकी प्राधनतामें पश्चिमको जाइये और विदेहनन्दिनी सीताकी खोज कीजिये ॥ १–५३ ॥ सौराष्ट्रान् सहबाह्लीकांश्चन्द्रचित्रांस्तथैव च ॥६ ॥

स्फीताञ्जनपदान् रम्यान् विपुलानि पुराणि च ।

पुंनागगहनं कुक्षिं बकुलोद्दालकाकुलम् ॥७ ॥

तथा केतकषण्डांश्च मार्गध्वं हरिपुङ्गवाः । ' श्रेष्ठ वानरो! सौराष्ट्र, बाह्लीक और चन्द्रचित्र आदि देशों, अन्यान्य समृद्धिशाली एवं रमणीय जनपदों, बड़े - बड़े नगरों तथा पुन्नाग, बकुल और उद्दालक आदि वृक्षोंसे भरे हुए कुक्षिदेशमें एवं केवड़ेके वनोंमें सीताकी खोज करो ॥ ६-७ ॥ प्रत्यक्स्त्रोतोवहाश्चैव नद्यः शीतजलाः शिवाः ॥ ८ ॥

तापसानामरण्यानि कान्तारगिरयश्च ये ।

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८७६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे ‘ पश्चिमकी ओर बहनेवाली शीतल जलसे सुशोभित कल्याणमयी नदियों, तपस्वी जनोंके वनों तथा दुर्गम पर्वतोंमें भी विदेहकुमारीका पता लगाओ ॥ ८३ ॥

तत्र स्थलीर्मरुप्राया अत्युच्चशिशिराः शिलाः ॥ ९ ॥

गिरिजालावृतां दुर्गां मार्गित्वा पश्चिमां दिशम् ।

ततः पश्चिममागम्य समुद्रं द्रष्टुमर्हथ ॥ १० ॥

तिमिनक्राकुलजलं गत्वा द्रक्ष्यथ वानराः । ‘ पश्चिम दिशामें प्रायः मरुभूमि है । अत्यन्त ऊँची और ठंढी शिलाएँ हैं तथा पर्वतमालाओंसे घिरे हुए बहुत - से दुर्गम प्रदेश हैं । उन सभी स्थानोंमें सीताकी खोज करते हुए क्रमशः आगे बढ़कर पश्चिम समुद्रतक जाना और वहाँके प्रत्येक स्थानका निरीक्षण करना । वानरो! समुद्रका जल तिमि नामक मत्स्यों तथा बड़े - बड़े ग्राहोंसे भरा हुआ है । वहाँ सब ओर देख - भाल करना ॥ ९ -१०३ ॥ ततः केतकषण्डेषु तमालगहनेषु च ॥ ११ ॥

कपयो विहरिष्यन्ति नारिकेलवनेषु च ।

तत्र सीतां च मार्गध्वं निलयं रावणस्य च ॥ १२ ॥

' समुद्रके तटपर केवड़ोंके कुञ्जोंमें, तमालके काननोंमें तथा नारियलके वनोंमें तुम्हारे सैनिक वानर भलीभाँति विचरण करेंगे । वहाँ तुमलोग सीताको खोजना और रावणके निवास - स्थानका पता लगाना ॥

वेलातलनिविष्टेषु पर्वतेषु वनेषु च ।

मुरवीपत्तनं चैव रम्यं चैव जटापुरम् ॥ १३ ॥

अवन्तीमङ्गलेपां च तथा चालक्षितं वनम् ।

राष्ट्राणि च विशालानि पत्तनानि ततस्ततः ॥१४ ॥

समुद्रतटवर्ती पर्वतों और वनोंमें भी उन्हें ढूँढ़ना चाहिये । मुरवीपत्तन ( मोरवी ) तथा रमणीय जटापुरमें, अवन्ती * तथा अङ्गलेपापुरीमें, अलक्षित वनमें और बड़े-बड़े राष्ट्रों एवं नगरोंमें जहाँ - तहाँ घूमकर पता लगाना ॥

सिन्धुसागरयोश्चैव संगमे तत्र पर्वतः ।

महान् सोमगिरिर्नाम शतशृङ्गो महाद्रुमः ॥ १५ ॥

तत्र प्रस्थेषु रम्येषु सिंहाः पक्षगमाः स्थिताः ।

तिमिमत्स्यगजांश्चैव नीडान्यारोपयन्ति ते ॥ १६ ॥

' सिंधु - नद और समुद्रके संगमपर सोमगिरि नामक एक महान् पर्वत है, जिसके सौ शिखर हैं । वह पर्वत ऊँचे - ऊँचे वृक्षोंसे भरा है । उसकी रमणीय चोटियोंपर सिंह नामक पक्षी रहते हैं । जो तिमि नामवाले विशालकाय मत्स्यों और हाथियोंको भी अपने घोंसलोंमें उठा लाते हैं ॥ ।

। तानि नीडानि सिंहानां गिरिशृङ्गगताश्च ये ।

दृप्तास्तृप्ताश्च मातङ्गास्तोयदस्वननिःस्वनाः ॥ १७ ॥

विचरन्ति विशालेऽस्मिंस्तोयपूर्णे समन्ततः । ‘ सिंह नामक पक्षियोंके उन घोंसलोंमें पहुँचकर उस पर्वत - शिखरपर उपस्थित हुए जो हाथी हैं, वे उस पंखधारी सिंहसे सम्मानित होनेके कारण गर्वका अनुभव करते और मन - ही - मन संतुष्ट होते हैं । इसीलिये मेघोंकी गर्जनाके समान शब्द करते हुए उस पर्वतके जलपूर्ण विशाल शिखरपर चारों ओर विचरते रहते हैं ॥ तस्य शृङ्गं दिवस्पर्शं काञ्चनं चित्रपादपम् ॥ १८ ॥

सर्वमाशु विचेतव्यं कपिभिः कामरूपिभिः । ' सोमगिरिका गगनचुम्बी शिखर सुवर्णमय है । उसके ऊपर विचित्र वृक्ष शोभा पाते हैं । इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले वानरोंको चाहिये कि वहाँके सब स्थानोंको शीघ्रतापूर्वक अच्छी तरह देख लें ॥१८३ ॥

कोटिं तत्र समुद्रस्य काञ्चनीं शतयोजनाम् ॥ १ ९ ॥ दुर्दर्शों पारियात्रस्य गत्वा द्रक्ष्यथ वानराः । ' वहाँसे आगे समुद्रके बीचमें पारियात्र पर्वतका सुवर्णमय शिखर दिखायी देगा, जो सौ योजन विस्तृत है । वानरो! उसका दर्शन दूसरोंके लिये अत्यन्त कठिन है । वहाँ जाकर तुम्हें सीताकी खोज करनी चाहिये ॥ कोट्यस्तत्र चतुर्विंशद् गन्धर्वाणां तरस्विनाम् ॥ २० ॥

वसन्त्यग्निनिकाशानां घोराणां कामरूपिणाम् ।

पावकार्चिःप्रतीकाशाः समवेताः समन्ततः ॥ २१ ॥

' पारियात्र पर्वतके शिखरपर इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले, भयंकर, अग्नितुल्य तेजस्वी तथा वेगशाली चौबीस करोड़ गन्धर्व निवास करते हैं । वे सब - के - सब अग्निकी ज्वालाके समान प्रकाशमान हैं और सब ओरसे आकर उस पर्वतपर एकत्र हुए हैं ॥ २०-२१ ॥

नात्यासादयितव्यास्ते वानरैर्भीमविक्रमैः ।

नादेयं च फलं तस्माद् देशात् किंचित् प्लवङ्गमैः ॥ २२ ॥

' भयंकर पराक्रमी वानरोंको चाहिये कि वे उन गन्धर्वोंके अधिक निकट न जायँ- उनका कोई अपराध न करें और उस पर्वतशिखरसे कोई फल न लें ॥ २२ ॥

दुरासदा हि ते वीराः सत्त्ववन्तो महाबलाः ।

फलमूलानि ते तत्र रक्षन्ते भीमविक्रमाः ॥ २३ ॥

' क्योंकि वे भयंकर बल - विक्रमसे सम्पन्न धैर्यवान् महाबली वीर गन्धर्व वहाँके फल - मूलोंकी रक्षा करते * ' यह अवन्ती पूर्व दिशाके मार्गमें बतायी गयी अवन्तीसे भिन्न है ।

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किष्किन्धाकाण्डे हैं । उनपर विजय पाना बहुत ही कठिन है ॥ २३ ॥

तत्र यत्नश्च कर्तव्यो मार्गितव्या च जानकी ।

नहि तेभ्यो भयं किंचित् कपित्वमनुवर्तताम् ॥ २४ ॥

' वहाँ भी जानकीकी खोज करनी चाहिये और उनका पता लगानेके लिये पूरा प्रयत्न करना चाहिये । प्राकृत वानरके स्वभावका अनुसरण करनेवाले तुम्हारी सेनाके वीरोंको उन गन्धर्वोंसे कोई भय नहीं है ॥ २४ ॥

तत्र वैदूर्यवर्णाभो वज्रसंस्थानसंस्थितः ।

नानाद्रुमलताकीर्णो वज्रो नाम महागिरिः ॥ २५ ॥

' पारियात्र पर्वतके पास ही समुद्रमें वज्रनामसे प्रसिद्ध एक बहुत ऊँचा पर्वत है, जो नाना प्रकारके वृक्षों और लताओंसे व्याप्त दिखायी देता है । वह वज्रगिरि वैदूर्यमणिके समान नील वर्णका है । वह कठोरतामें वज्रमणि ( हीरे ) के समान है ॥ २५ ॥

श्रीमान् समुदितस्तत्र योजनानां शतं समम् ।

गुहास्तत्र विचेतव्याः प्रयत्नेन प्लवङ्गमाः ॥ २६ ॥

' वह सुन्दर पर्वत वहाँ सौ योजनके घेरे में प्रतिष्ठित है । उसकी लंबाई और चौड़ाई दोनों बराबर हैं । वानरो! उस पर्वतपर बहुत - सी गुफाएँ हैं । उन सबमें प्रयत्नपूर्वक सीताका अनुसंधान करना चाहिये ॥ २६ ॥

चतुर्भागे समुद्रस्य चक्रवान् नाम पर्वतः ।

तत्र चक्रं सहस्त्रारं निर्मितं विश्वकर्मणा ॥ २७ ॥

' समुद्रके चतुर्थ भागमें चक्रवान् नामक पर्वत है ।

वहीं विश्वकर्माने सहस्रार * चक्रका निर्माण किया था ॥ २७ ॥

तत्र पञ्चजनं हत्वा हयग्रीवं च दानवम् ।

आजहार ततश्चक्रं शङ्खं च पुरुषोत्तमः ॥ २८ ॥

' वहींसे पुरुषोत्तम भगवान् विष्णु पञ्चजन और हयग्रीव नामक दानवोंका वध करके पाञ्चजन्य शङ्ख तथा वह सहस्रार सुदर्शन चक्र लाये थे ॥ २८ ॥

तस्य सानुषु रम्येषु विशालासु गुहासु च ।

रावणः सह वैदेह्या मार्गितव्यस्ततस्ततः ॥ २ ९ ॥

' चक्रवान् पर्वतके रमणीय शिखरों और विशाल गुफाओंमें भी इधर - उधर वैदेहीसहित रावणका पता लगाना चाहिये ॥ २ ९ ॥

योजनानि चतुःष: षष्टिर्वराहो नाम पर्वतः ।

सुवर्णशृङ्गः सुमहानगाधे वरुणालये ॥ ३० ॥

‘ उससे आगे समुद्रकी अगाध जलराशिमें सुवर्णमय द्विचत्वारिंशः सर्गः ८७७

तत्र प्राग्ज्योतिषं नाम जातरूपमयं पुरम् ।

यस्मिन् वसति दुष्टात्मा नरको नाम दानवः ॥ ३१ ॥

' वहीं प्राग्ज्योतिष नामक सुवर्णमय नगर है, जिसमें दुष्टात्मा नरक नामक दानव निवास करता है ॥३१ ॥

तत्र सानुषु रम्येषु विशालासु गुहासु च ।

रावणः सह वैदेह्या मार्गितव्यस्ततस्ततः ॥ ३२ ॥

' उस पर्वतके रमणीय शिखरोंपर तथा वहाँकी विशाल गुफाओंमें सीतासहित रावणकी तलाश करनी चाहिये ॥ ३२ ॥

तमतिक्रम्य शैलेन्द्रं काञ्चनान्तरदर्शनम् ।

। पर्वतः सर्वसौवर्णो धाराप्रस्त्रवणायुतः ॥ ३३ ॥

' जिसका भीतरी भाग सुवर्णमय दिखायी देता है, उस पर्वतराज वराहको लाँघकर आगे बढ़नेपर एक ऐसा पर्वत मिलेगा, जिसका सब कुछ सुवर्णमय है तथा जिसमें लगभग दस सहस्र झरने हैं ॥ ३३ ॥

तं गजाश्च वराहाश्च सिंहा व्याघ्राश्च सर्वतः ।

अभिगर्जन्ति सततं तेन शब्देन दर्पिताः ॥ ३४ ॥

' उसके चारों ओर हाथी, सूअर, सिंह और व्याघ्र सदा गर्जना करते हैं और अपनी ही गर्जनाकी प्रतिध्वनिके शब्दसे दर्पमें भरकर पुनः दहाड़ने लगते हैं ॥ ३४ ॥

यस्मिन् हरिहयः श्रीमान् महेन्द्रः पाकशासनः ।

अभिषिक्तः सुरै राजा मेघो नाम स पर्वतः ॥ ३५ ॥।

' उस पर्वतका नाम है मेघगिरि । जिसपर देवताओंने हरित रंगके अश्ववाले श्रीमान् पाकशासन इन्द्रको राजाके पदपर अभिषिक्त किया था ॥ ३५ ॥

तमतिक्रम्य शैलेन्द्रं महेन्द्रपरिपालितम् ।

षष्टिं गिरिसहस्राणि काञ्चनानि गमिष्यथ ॥ ३६ ॥

तरुणादित्यवर्णानि भ्राजमानानि सर्वतः ।

जातरूपमयैर्वृक्षैः शोभितानि सुपुष्पितैः ॥ ३७ ॥

' देवराज इन्द्रद्वारा सुरक्षित गिरिराज मेघको लाँघकर जब तुम आगे बढ़ोगे, तब तुम्हें सोनेके साठ हजार पर्वत मिलेंगे, जो सब ओरसे सूर्यके समान कान्तिसे देदीप्यमान हो रहे हैं और सुन्दर फूलोंसे भरे हुए सुवर्णमय वृक्षोंसे सुशोभित हैं ॥३७ ॥

तेषां मध्ये स्थितो राजा मेरुरुत्तमपर्वतः ।

आदित्येन प्रसन्नेन शैलो दत्तवरः पुरा ॥ ३८ ॥

तेनैवमुक्तः शैलेन्द्रः सर्व एव त्वदाश्रयाः ।

मत्प्रसादाद् भविष्यन्ति दिवा रात्रौ च काञ्चनाः ॥ ३ ९ ॥

शिखरोंवाला वराह नामक पर्वत है, जिसका विस्तार त्वयि ये चापि वत्स्यन्ति देवगन्धर्वदानवाः । ते भविष्यन्ति भक्ताश्च प्रभया काञ्चनप्रभाः ॥ ४० ॥

चौंसठ योजनकी दूरीमें है ॥३० ॥

* जिसमें एक हजार अरे हों, उसे सहस्रार चक्र कहते हैं ।

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८७८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे ‘ उनके मध्यभागमें पर्वतोंका राजा गिरिश्रेष्ठ मेरु विराजमान है, जिसे पूर्वकालमें सूर्यदेवने प्रसन्न होकर वर दिया था । उन्होंने उस शैलराजसे कहा था कि ' जो दिन - रात तुम्हारे आश्रयमें रहेंगे, वे मेरी कृपासे सुवर्णमय हो जायँगे तथा देवता, दानव, गन्धर्व जो भी तुम्हारे ऊपर निवास करेंगे, वे सुवर्णके समान कान्तिमान् और मेरे भक्त हो जायँगे ' ॥ ३८–४० ॥

विश्वेदेवाश्च वसवो मरुतश्च दिवौकसः ।

आगत्य पश्चिमां संध्यां मेरुमुत्तमपर्वतम् ॥ ४१ ॥

आदित्यमुपतिष्ठन्ति तैश्च सूर्योऽभिपूजितः ।

अदृश्यः सर्वभूतानामस्तं गच्छति पर्वतम् ॥ ४२ ॥

' विश्वेदेव, वसु, मरुद्गण तथा अन्य देवता सायंकालमें उत्तम पर्वत मेरुपर आकर सूर्यदेवका उपस्थान करते हैं । उनके द्वारा भलीभाँति पूजित होकर भगवान् सूर्य सब प्राणियोंकी आँखोंसे ओझल होकर अस्ताचलको चले जाते हैं ॥ ४१-४२ ॥

योजनानां सहस्त्राणि दश तानि दिवाकरः ।

मुहूर्तार्थेन तं शीघ्रमभियाति शिलोच्चयम् ॥ ४३ ॥

‘ मेरुसे अस्ताचल दस हजार योजनकी दूरीपर है, किंतु सूर्यदेव आधे मुहूर्तमें ही वहाँ पहुँच जाते हैं ॥ ४३ ॥

शृङ्गे तस्य महद्दिव्यं भवनं सूर्यसंनिभम् ।

प्रासादगणसम्बाधं विहितं विश्वकर्मणा ॥ ४४ ॥

' उसके शिखरपर विश्वकर्माका बनाया हुआ एक बहुत बड़ा दिव्य भवन है, जो सूर्यके समान दीप्तिमान् दिखायी देता है । वह अनेक प्रासादोंसे भरा हुआ है ।

शोभितं तरुभिश्चित्रैर्नानापक्षिसमाकुलैः ।

निकेतं पाशहस्तस्य वरुणस्य महात्मनः ॥ ४५ ॥

' नाना प्रकारके पक्षियोंसे व्याप्त विचित्र - विचित्र वृक्ष उसकी शोभा बढ़ाते हैं । वह पाशधारी महात्मा वरुणका निवास - स्थान है ॥ ४५ ॥

अन्तरा मेरुमस्तं च तालो दशशिरा महान् ।

जातरूपमयः श्रीमान् भ्राजते चित्रवेदिकः ॥ ४६ ॥

‘ मेरु और अस्ताचलके बीच एक स्वर्णमय ताड़का वृक्ष है, जो बड़ा ही सुन्दर और बहुत ही ऊँचा है । उसके दस स्कन्ध ( बड़ी शाखाएँ ) हैं । उसके नीचेकी वेदी बड़ी विचित्र है । इस तरह वह वृक्ष बड़ी शोभा पाता है ॥४६ ॥

तेषु सर्वेषु दुर्गेषु सरस्सु च सरित्सु च ।

रावणः सह वैदेह्या मार्गितव्यस्ततस्ततः ॥ ४७ ॥

' वहाँके उन सभी दुर्गम स्थानों, सरोवरों और | सरिताओंमें इधर - उधर सीतासहित रावणका अनुसंधान करना चाहिये ॥ ४७ ॥

यत्र तिष्ठति धर्मज्ञस्तपसा स्वेन भावितः ।

मेरुसावर्णिरित्येष ख्यातो वै ब्रह्मणा समः ॥ ४८ ॥

' मेरुगिरिपर धर्मके ज्ञाता महर्षि मेरुसावर्णि रहते हैं, जो अपनी तपस्यासे ऊँची स्थितिको प्राप्त हुए हैं । वे प्रजापतिके समान शक्तिशाली एवं विख्यात ऋषि हैं ॥

प्रष्टव्यो मेरुसावर्णिर्महर्षिः सूर्यसंनिभः ।

प्रणम्य शिरसा भूमौ प्रवृत्तिं मैथिलीं प्रति ॥ ४ ९ ॥

' सूर्यतुल्य तेजस्वी महर्षि मेरुसावर्णिके चरणोंमें पृथ्वीपर मस्तक टेककर प्रणाम करनेके अनन्तर तुमलोग उनसे मिथिलेशकुमारीका समाचार पूछना ॥ ४ ९ ॥

एतावज्जीवलोकस्य भास्करो रजनीक्षये ।

कृत्वा वितिमिरं सर्वमस्तं गच्छति पर्वतम् ॥५० ॥

' रात्रिके अन्तमें ( प्रातःकाल ) उदित हुए भगवान् सूर्य जीव - जगत्के इन सभी स्थानोंको अन्धकाररहित ( एवं प्रकाशपूर्ण ) करके अन्तमें अस्ताचलको चले जाते हैं ॥ ५० ॥

एतावद् वानरैः शक्यं गन्तुं वानरपुङ्गवाः ।

अभास्करममर्यादं न जानीमस्ततः परम् ॥५१ ॥

' वानरशिरोमणियो! पश्चिम दिशामें इतनी ही दूरतक वानर जा सकते हैं । उसके आगे न तो सूर्यका प्रकाश है और न किसी देश आदिकी सीमा ही । अतः वहाँसे आगेकी भूमिके विषयमें मुझे कोई जानकारी नहीं है ॥

अवगम्य तु वैदेहीं निलयं रावणस्य च ।

अस्तं पर्वतमासाद्य पूर्णे मासे निवर्तत ॥ ५२ ॥

' अस्ताचलतक जाकर रावणके स्थान और सीताका पता लगाओ तथा एक मास पूर्ण होते ही यहाँ लौट आओ ॥

ऊर्ध्वं मासान्न वस्तव्यं वसन् वध्यो भवेन्मम ।

सहैव शूरो युष्माभिः श्वशुरो मे गमिष्यति ॥ ५३ ॥

' एक महीनेसे अधिक न ठहरना । जो ठहरेगा, उसे मेरे हाथसे प्राणदण्ड मिलेगा । तुमलोगोंके साथ मेरे पूजनीय श्वशुरजी भी जायँगे ॥ ५३ ॥

श्रोतव्यं सर्वमेतस्य भवद्भिर्दिष्टकारिभिः ।

गुरुरेष महाबाहुः श्वशुरो मे महाबलः ॥ ५४ ॥

' तुम सब लोग इनकी आज्ञाके अधीन रहकर इनकी सभी बातें ध्यानसे सुनना; क्योंकि ये महाबाहु महाबली सुषेणजी मेरे श्वशुर एवं गुरुजन हैं ( अतः तुम्हारे लिये भी गुरुकी भाँति ही आदरणीय हैं ) ॥ ५४ ॥

भवन्तश्चापि विक्रान्ताः प्रमाणं सर्व एव हि ।

प्रमाणमेनं संस्थाप्य पश्यध्वं पश्चिमां दिशम् ॥ ५५ ॥